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पुस्तक समीक्षा : देवी नागरानी का ग़ज़ल संग्रह – दिल से दिल तक

Dil se Dil Tak
Devi JPG
दिल से ग़ज़ल तक
अवसर था श्री आर. पी. शर्मा ‘ महर्षि ’ की नवीनतम पुस्तक ‘ ग़ज़ल लेखन कला ’ के विमोचन का। मैं और शैलजा नरहरि निर्धारित समय पर ‘ महर्षि ’ जी के निवास स्थान दादर पहुँच गए थे । मुंबई महानगर के कुछ वरिष्ठ शाइर भी आ चुके थे । ‘ महर्षि ’ जी ने हमें बताया - एक सिन्धी शाइरा श्रीमती देवी नागरानी भी आने वाली हैं । वह आजकल हिन्दुस्तानी ज़ुबान में ग़ज़लें लिख रही हैं । कुछ समय पश्चात् इस शाइरा का आगमन हुआ । अच्छी लम्बाई, गौर वर्ण, लम्बा चेहरा और उनके शालीनता पूर्ण मृदु व्यवहार ने हम सबको आकर्षित किया । आयु के सत्तरवें सातवें दशक की यात्रा में है ये भद्र महिला अति सुरीली आवाज़ में ग़ज़लों को प्रस्तुत करती हैं । उस दिन इनकी ग़ज़लों को सुनने के बाद मुझे बहुत साफ-साफ महसूस हुआ था कि इनकी ग़ज़लों में बहुत गहरे तक ख़ामोशी, तन्हाई, आँसू और वक्त-बेवक्त के बेदर्द-दर्द की गहन पीड़ा है।
इसके बाद प्रायः फोन पर बातचीत का सिलसिला चलता रहा । अब तक श्रीमती देवी नागरानी का पहला ग़ज़ल संग्रह चराग़े-दिल तैयार हो चुका था । इस किताब का विमोचन मेरा अगला पड़ाव था। इस पुस्तक की समीक्षा मुझे लिखनी थी और इस अवसर पर मुझे पढ़कर सुनानी भी थी । अतः अब तक मैं इनकी ग़ज़लों को ख़ूब अच्छी तरह से खंगाल चुका हूँ। श्रीमती देवी नागरानी का ये दूसरा ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक प्रकाशित हो रहा है । मुझे इस संग्रह को प्रकाशन से पूर्व पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है । इस संग्रह की सभी ग़ज़लों में इनके अन्तर्मन में बहुत गहरे तक बैठी हुई पीड़ा स्वयं बोलती है । ये पीड़ा वियोग, सम्बन्धों, मित्रता, दुश्मनी, राजनीति, भ्रष्ट समाज, खुद्दारी, साहस और कुछ अन्य ऐसे सरोकारों को खोलती है जिनका सम्बन्ध दायित्व और जीवन के उस जीवटपन से है जिसने देवी की ग़ज़लों के कथ्य को एक निश्चित परिपक्वता प्रदान की है । आयु में बहन देवी से मैं लगभग एक दशक बड़ा हूँ अतः मेरा आशीर्वाद एवं अनेक बधाईयाँ। इस पुस्तक से मैंने कुछ शे ’ र चुने हैं । आशा है पाठकों को भी रुचिकर होंगे ।
अपना ही अक्स देवीदेखूँ तो मान भी लूँ,
आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है

लगाईं तोहमतें बहरों ने मुझ पर,
वो समझे बेज़ुबाँ मैं हो गया हूँ

अब ख़तरों का खौफ किसे
जल कर ख़ाक हुआ जब घर

साथ तन्हाइयों के रहते हैं
ऐ जहाँ वालो हम मज़े से हैं

रेत पर घर बने हैं रिश्तों के
तेज़ झोकों से वो तो बिखरेंगे

मौत थी उसकी सियासी
कह रहे हैं हादसा है

ग़मे-दुनिया का तर्जुमाँ देवी
है मेरी शाइरी तो क्या कीजे

भरोसा दोस्त से बढ़ कर किया था मैंने दुश्मन पर
मेरा ईमान हर लम्हा मकामे-इम्तहाँ पर था

बेगुनाही तो मेरी साबित है
फिर सज़ाएँ हैं किन ख़ताओं की

यूँ न ख़ामोशियाँ सिसकती फिर
दर्द गर दर्द की दवा होता

अनबन ईंटों में कुछ हुई होगी
यूँ न दीवार वो गिरी होगी

महफल में सबसे देवीहँसकर मिली है लेकिन
तन्हाइयों में रोई खुद से लिपट-लिपट कर
---
वसन्त पंचमी - २००८
म.ना. नरहरि, श्रीपाल वन नं. १, सी-विंग, जी-दस, खारोडी नाका, विरार - ४०१ ३०३
--

दिल से दिल तक संग्रह से  देवी नागरानी की दो ग़ज़लें

ग़ज़लः ३४
कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे
जाने क्या था उसे गिला मुझसे
ऐब मेरे गिना रहा है जो
दोस्त बनकर गले मिला मुझसे
चंद साँसों की देके मुहलत यूँ
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे
जिसने रक्खा था कै़द में मुझको
वो रिहाई क्यों चाहता मुझसे
क्या लकीरों की कोई साज़िश है
रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे
शोर ख़ामोशियों का मत पूछों
कह गई अपना हर गिला मुझसे
सिलसिला राहतों का टूट गया
किस्मतें जब हुई खफ़ा मुझसे.
देवी नागरानी
**

ग़ज़लः ३६
आदमी को कहाँ ख़ुद की पहचान है
अपने फन से, हुनर से भी अनजान है
बन न पाया है वो एक इन्सान तक
आदमी हैं कहाँ वो तो शैतान है
वो जो इन्सान था इक फरिश्ता बना
आदमीयत का अब वह निगहबान है
अपने मुँह का निवाला मुझे दे दिया
वो ख़ुदा है, ग़रीबों का रहमान है
लड़खड़ा कर उठा, गिर गया, फिर उठा
हाँ यहीं आगे बढ़ने की पहचान है
जाँ की परवाह न की, सरहदों पर लड़ा
देश की आन से बढ़के क्या जान है ?
पेट पर लात ‘ देवी ’ न मारो कभी
छीनता है जो रोटी वो शैतान है
देवी
नागरानी

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बहुत ही सुंदर गज़लें हैं सभी इसको प्रकाशित करने के लिए रवि जी का आभार

आयु के सत्तरवें दशक की यात्रा में ..aap galat likh gaye hai

सत्तरवें दशक ka matlab 700

saatva dasak likhna uchit hoga ya सत्तरवें varsh

gajlen acchi hai

पेट पर लात ‘ देवी ’ न मारो कभी

छीनता है जो रोटी वो शैतान है

purmaani khayal

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