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एम. शाहुल हमीद की कविता – एक सिक्का

एक सिक्का

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मिले एक सिक्का, बिना, परिश्रम के तो,

चूम कर छोड़ देता – बच्चा।

 

तुरन्त कुछ खरीदकर खा लेता - बालक।

सम्भाल कर खेलती फिरती – बालिका।

 

जवानी के नशे में लगाता - कुमार।

सौंदर्य को निखारने में लगाती – कुमारी।

 

दस और एक ग्यारह कहता - बाप।

अंचल में छुपा भविष्य के लिए रखती – मॉ।

 

छोटी सी जरूरत पूरी कर लेते – बूढ़ा,बूढ़ी

परिश्रम के कुछ पल कम कर लेता – गरीब।

 

सोने का न होने पर चिंतित होता - अमीर।

व्यंग्य से देख विचार प्रकट करता – कवि।

 

मिले एक मानव, बिना परिश्रम के तो ,

देखकर भी अनदेखा बन जाता – समाज।

---

डॉ. एम. शाहुल हमीद,

प्रवक्ता, हिन्दी विभाग,

मनोंमणियम सुन्दरनार विवविद्यालय,

तिरूनेलवेलि

तमिलनाडु

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आप ने अपनी इस कविता एक सिक्का में बहुत कुछ कह दिया है...इतनी उलझी हुई बात को इतने सुलझे हुए ढंग से कहने के लिए आप मुबारक के हक़दार बन जाते हैं ....साहिर लुधियानवी साहिब की एक नज़म याद आ रही है...जिस में उन्होंने कहा है.....
..माटी का भी है कुछ मोल मगर;
इंसान की कीमत कुछ भी नहीं...

...आपकी ये सार्थकता और संवेदना बनी रहे इसी आशा, इच्छा और आंकाक्षा के साथ;
आपका अपना ही,
रेक्टर कथूरिया
http://punjabscreen.blogspot.com/

sandeep gaur

bahut badhia janab,,,,,,,,,,,,,i like the way u have crafted the poem.....
sandeep

बहुत बेहतरीन रचना गंभीर भाव लिए हुए

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