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अशोक गौतम का व्यंग्य : चीड़ू की पाठशाला

ashok gautam

अपने गांव के प्राइमीरी इस्कूल के अकेले चीड़ू ड्राइंग मास्टर जी सर का दसवीं के जाली सर्टिफीकेट पर नाम केएस है। जब एक दिन उनको इस्कूल के इकलौते पक्के मास्टर जी ने अपनी जगह ठेके पर पढ़़ाने के लिए तैनात कर खुद होल सेल का काम शुरू किया तो वे इस्कूल में केएस से खेस हो गए। कुछ दिन तक बच्चे उन्हें केएस ड्राइंग मास्टर जी सर भी कहते रहे पर जैसे जैसे वे घिसते रहे उनका नाम घिस कर केएस से खेस ड्राइंग मास्टर जी सर हो गया।

पंद्रह साल से इस इस्कूल में पूरे दम खम के साथ बच्चों को आदर्श नागरिक बना रहे हैं। एक चीड़ू के माध्यम से अकेले ही पांच पांच कक्षाओं को हिसाब, हिंदी और हिंदी के माध्यम से अंगे्रजी। पक्के मास्टर जी को अब कोई जानता भी नहीं कि वे इस इस्कूल के असली मास्टर जी थे। वे महीने की हर पहली को इस्कूल रात को आते हैं और चीड़ू ड्राइंग मास्टर जी के हाथों पर तयशुदा ठेके के नोट धर दो नग पी पिला गिरते पड़ते चले जाते हैं। उनका होल सेल का काम अच्छा चल निकला है।

कक्षा कोई भी हो । ड्राइंग मास्टर सर जी सफेद पड़ चुके ब्लैक बोर्ड के अधफट्टे के बिलकुल बीच पंद्रह साल से जमे चीड़ू पर एक बार फिर चाक फेर हर क्लास के लिए एक नए दिन का चीड़ू बना देते हैं और फिर चुपचाप बीड़ी सुलगा किनारे बैठ गुनगुनाते रहते हैं। आज तक उन्होंने न उसकी टांगें ठीक की न उसके पंख। जो एकबार विधाता की तरह बन गया सो बन गया। अब तो चीड़ू सुधरेगा तो अगले जन्म में ही। आने वालों को बना बनाया चीड़ू मिल जाता है तो जाने वालों के साथ वह जाने को लाख गुहार भी करे पर चीड़ू मास्टर जी सर उसे छोड़ें तब न! चीड़ू अगर जाती क्लास के साथ उड़ गया तो इस्कूल में बचेगा क्या!! हर क्लास के बच्चों को चीड़ू मास्टर जी सर से कुछ मिले या न पर उनको बना बनाया चीड़ू जरूर मिल जाता है, इस्कूल में आने से पहले ही।

......और बच्चे गणित की किताब खोल कापी में चीड़ू बनाने जुट जाते हैं। बच्चे विज्ञान की किताब खोल कापी में चीड़ू बनाने जुट जाते हैं। बच्चे हिंदी की किताब खोल कापी में चीड़ू बनाने जुट जाते हैं। बच्चे अगली क्लास में चले जाते हैं पर चीड़ू है कि वहीं का वहीं डटा रहता है। बच्चे हैं कि प्राइमीरी इस्कूल से मिडिल इस्कूल में चले जाते हैं। कुछेक की तो शादियां भी हो गई, बच्चे भी चीड़ू देखने लग गए, पर चीड़ू ड्राइंग मास्टर जी सर का चीड़ू ब्लैक बोर्ड पर से मजाल है जो टस से मस हुआ हो।

अब तो चीड़ू है कि ब्लैक बोर्ड को ही अपना पक्का घोंसला कर बैठा है। पर किसी बच्चे की क्या मजाल जो उसे वहां से उड़ाकर भगाने की हिम्मत करे। पहले तो बच्चे दबी जबान में खेस ड्राइंग मास्टर जी सर को पीठ पीछे ही चीड़ू गुरू जी सर कहते थे पर अब सामने भी बोल लेते हैं। कुछ दिन तक तो ड्राइंग मास्टर जी सर ने बच्चों को मां बहन की गालियां भी दीं, पर अब कुछ नहीं कहते , चुपचाप सुन लेते हैं। बुढ़ियाते जा रहे हैं न।

आज फिर क्लास में आते ही चीड़ू ड्राइंग मास्टर जी सर ने पंद्रह साल से बोर्ड के बीचों बीच कब्जा जमाए चीड़ू के रात को फीके पड़े अंगों पर टूटा चाक घुमा कर चैन की लंबी सांस ली तो बंसी के बेटे ने टोक दिया,‘चीड़ू मास्टर जी! ओ चीड़ू सर जी!!’

‘ हां बोल भूतनी के क्या बीमारी है?’

‘मास्टर जी! आपने आज भी चीड़ू के पंख छोटे ही रखे । पेट बड़ा ही रखा। और टांग भी एक ही। एक छोटे दूसरे बड़े पंख से चीड़ू उड़ नहीं पाएगा चीड़ू गुरू जी।’

‘ अबे चीड़ू उड़ना ही कहां चाहता है यहां से! इसे पता है यहां से उड़ कर जाएगा तो खाएगा क्या? सालों, अपनी तरह गधा सोचते हो चीड़ू को? ....और किसी की क्या मजाल जो यहां से चीड़ू को उड़ा दे। हाथ पांव न तोड़ के रख दूं उसके। अब तो वह उड़ कर नहीं मरकर ही यहां से जाएगा।’ कह चीड़ू मास्टर जी सर ने हाथ में बचा चाक का टुकड़ा बिना निशाना लगाए उसके सिर पर दे मारा तो वह बचने के बाद भी अपने सिर को बचा सका और आगे से सिर को मलता बैठ गया।

‘पर मास्टर जी इस चीड़ू का लाभ क्या है? भैंस बना देते तो?’ राम सुखिया की लड़की ने महीना पहले धोए बालों को खुजलाते कहा।

‘क्या करूंगा भैंस बनाकर! सालो, जिस दिन से यहां आया हूं तबसे दूध तो पानी वाला ही दे रहे हो। उस दिन भैंस बनेगी जिस दिन मुझे खालिस दूध लाओगे। समझे!! चलो कापी में चीड़ू बनाना शुरू करो।’

‘नहीं चीड़ू मास्टर सर जी। हम नहीं बनाएंगे अब चीड़ू। वह चीड़ू तो बिलकुल नहीं जो हमारे चाचे बुआ के बक्त से ऐसे ही यहीं बैठा हो। अब हम पांचवीं में हो गए हैं। हम भी उड़ने वाले हैं। इसलिए इस चीड़ू के पंख ,पेट ठीक करो ताकि यह भी हमारे साथ उड़ जाए।’ दो बच्चे एक साथ बोले तो चीड़ू मास्टर जी सर चुप रहे अपनी कमर दबाते हुए। चीड़ू मास्टर जी सर ने अपनी कमर दबाई तो सब बच्चे हंसने लगे।

‘हंस क्यों रहे हो भूतनियों के?? कल जब मेरी उम्र के होओगे तो कमर नहीं पूरे सड़ जाओगे।’

‘आपकी कमर में दर्द क्यों हो रही है चीड़ू मास्टर सर जी? कल मालिस के लिए गाय का घी लाऊं क्या?’ संते के पंद्रह साले ने चीड़ू मास्टर जी सर को पट्टू डालने की कोशिश की।

‘साले गाय के घी के नाम पर गधे की चर्बी दे जाते हैं। चल चुपचाप बैठ और ठीक वैसे ही चीड़ू बना जैसे मैंने बनाया है नहीं तो अबके भी फेल कर दूंगा।’ सबको पता था कि मास्टर सर जी गई रात को भी मुफ्त की दारू पीकर गिर गए थे नाले में। मुफ्त की पीने के लिए तो वे लाहौर तक पैदल जा पहुंचे।

‘सर जी! चीड़ू बनाने का फायदा क्या है?’ सीतु के लड़के ने पूछा।

‘ अबे! परे बैठ! ड्राइंग मास्टर जी सर से जबान लड़ाता है। उसे तोलने की कोशिश करता है जिसने आज तक दुनिया को तोला है।’

‘नहीं चीड़ू मास्टर सर जी। ऐसी बात नहीं। मैं तो अपने ज्ञान को बढ़ाना चाहता हूं।’ कह उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।

‘तो ठीक है। पर पहले बता गाय बनाने का फायदा क्या है?’

‘गाय दूध देती है। गाय गोबर देती है। गाय हमारी माता है।’

‘सालों तभी उसे सड़कों पर आवारा छोड़ रहे हो??’ अब चीड़ू मास्टर जी सर का गुस्सा देखने लायक था,‘ तुम्हारी छोड़ी हुई माओं ने कल मेरी सारी साग भाजी की सारी क्यारी खा दी। अब साग भाजी कहां से आएगी??’

‘मैं लाता रहूंगा सर जी।’

‘शाबाश! ऐसे होते हैं अच्छे बच्चे। बहुत बड़ा आदमी बनेगा जिंदगी में। कल सरसों का साग ले आना। तू आज चीड़ू नहीं बनाएगा।’

‘चीड़ू ड्राइंग मास्टर सर जी! अब पता चला कि चीड़ू का पेट बड़ा क्यों, एक टांग से लंगड़ा क्यों ,पंख छोटे बड़े क्यों,?’

‘अच्छा बोलो, इस चीड़ू का पेट बड़ा क्यों?’

‘ जय हिंद!!हम सब चीड़ू मास्टर जी सर को साग भाजी रोज लाएंगे।’ पूरे प्राइमीरी इस्कूल के बच्चों ने एक साथ कहा तो चीड़ू ड्राइंग मास्टर जी सर ने मन ही मन कहा, गधे की औलादो! इतना भी नहीं जानते! चीड़ू का मोटा पेट नहीं रखता तो कभी का उड़ न जाता। जो ये उड़ जाता तो मैं करता क्या। मेरी तो रोजी रोटी ही ये चीड़ू है। अब तो ये उड़ेगा तो मेरे साथ ही उड़ेगा। मैं गधा नहीं, ड्राइंग मास्टर सर जी हूं सर जी।

है कोई माई का लाल जो उस गांव के ब्लैक बोर्ड पर बरसों से जमे इस चीड़ू को उड़ा सके।

---

अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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