गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – योगेन्द्र दत्त का व्यंग्य : तनाव से मुक्ति का तनाव

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(प्रविष्टि क्रमांक - 46)
सब आंखें बंद किए बैठे थे।
”आप सभी ध्यान लगाएं अपनी सांसों पर।
काउंट योर बै्रथ (सांसें गिनें अपनी)। आंखें न खोलें।“
सबकी आंखें बंद थीं। कुछ समय हो चुका था लोगों को ध्यान रमाए हुए। गुरुजी का एकालाप जारी था।
”आंखें खोलने से बड़ी हानि हो जाएगी। सांसें गिनने से आपके विचारों का क्रम टूटेगा। इससे आपको
नई ऊर्जा मिलेगी। आंखें खोलते ही सारी ऊर्जा बह जाएगी।“

सबको अपनी ऊर्जा की फ्रिक थी। किसी ने आंखें नहीं खोलीं। पर मेरे लिए यह मात्रा अनुमान का विषय था। केवल गुरुजी थे जो सबको देख सकते थे।
भक्त एक-दूसरे को नहीं देख सकते थे। उन्हें इसकी अनुमति नहीं थी। पर मेरा अनुमान है कि किसी ने आंखें नहीं खोलीं होंगी। सभी पराजय भाव से नत थे।

यह सत्ताहीनों का विमर्श था। एक ने यह घोषणा करके सत्ता प्राप्त कर ली थी कि उसे अब सत्ता की चाह नहीं रही। दूसरों ने यह सोचकर सशक्त महसूस करना सीख लिया था कि वे एक सत्ताशाली के निकट हैं। सारा खेल भावनाओं में ही चल रहा था और वहीं उसका फैसला भी हो जा रहा था।
पर मेरे लिए तनाव मुक्ति की चाह में यह परतंत्रता, यह अनुशासन अंसभव था। मेरी आंखें लगातार बंद नहीं रह पायीं।

गुरुजी के एकालाप का चरम क्षण निकट आ गया था। ”ध्यान रखिए गुरु पर आस्था का कोई विकल्प नहीं। जो मैं कहता हूं वैसा ही कीजिए। यह विधि जीवन में आपके बहुत काम आएगी। जब भी आप नियंत्रण खोने लगें, इस विधि को जीवन में उतारें। आपको नवजीवन प्राप्त हो जाएगा...।“
कुछ क्षण पश्चात उन्होंने कहा, ”अब एक-दो गहरी सांस लेकर आंखें खोल लीजिए।“
मुझे इन्हीं शब्दों की प्रतीक्षा थी। सबने आंखें खोल लीं। समझ में नहीं आया कि अब आंख खोलने से ऊर्जा क्यों नहीं बह सकती थी। पर नहीं बही। गुरुजी ने कहा है तो बह कैसे जाती।

किंतु गुरुजी संतुष्ट नहीं थे।
”मैंने देखा कि आपमें से कई भक्तों को आंखें बंद रखने में भी बड़ा कष्ट हो रहा था। ऐसे भक्त भला कितनी ऊर्जा प्राप्त कर पाए होंगे! मैं विस्मित नहीं हूं।
पर आप ही सोचिए, कई भक्तों ने तो कई बार आंखें खोल ली थीं।“
यह सुनते ही मेरी आंखों की सारी ऊर्जा बह गई। अब तक नहीं बही थी। मैं संतुष्ट था अब तक।
अब फिर सिर्फ बेचैनी बची थी। लगा वे मुझे ही कह रहे हैं, ‘तुम कृतघ्न हो।’
पर ईश्वर मेरे साथ था। कृतघ्नता की सीमा मुझ पर ही खत्म नहीं होती थी। इसी समय एक महिला का मोबाइल बज उठा। उसने फोन ऑन किया और धीमी आवाज में बोली - ”बाद में बात करना।’
गुरुजी के शिष्यों में महिलाएं ज्यादा थीं। उन्होंने अपनी चेलियों को संबोधित करते हुए कहा, ”इन्हें कहिए कल से न आएं।“

महिला ने फोन खत्म किया और इससे पहले कि चेलियां सक्रिय हो पातीं वह बीच में ही बोल पड़़ी, ”क्यों न आऊं मैं कल से! एक फोन आ ही गया तो क्या हुआ। कल से ऑफ कर दूंगी।“
गुरुजी को इस उद्दंडता की उम्मीद न थी। सारे भक्त-भक्तिनें उनकी आभा से अभिभूत थे। सब उनके पांव छूते थे। भवन में अगर सत्ता थी तो केवल उनकी।

इस महिला ने उनके आदेश को अस्वीकार कर दिया था।
चुनौती को सहज भाव से ले लेना सायास अर्जित सत्ता को रास नहीं आता। गुरुजी चेहरे की भंगिमा के विपरीत शांत स्वर में बोले, ”इससे सबके ध्यान में विघ्न पड़ता है। आप यहां जीवन की कला सीखने आए हैं। प्रेम के सागर को अनुभव करने आए हैं।“

”काहे के प्रेम का सागर...!“ महिला की बात पूरी नहीं हुई थी।
”यही तो तुम्हें यहां जानना है। प्रेम का अर्थ है अपूर्ण को चाहने की जो पूर्ण क्षमता अपने भीतर है उसे साकार करना। अभिव्यक्त...।“
उस महिला ने भी गुरुजी को बोलने का मौका दिए बिना कहा, ”आपको कैसे लगा कि मेरे अंदर प्रेम का भाव नहीं है। मैं अपूर्ण को पूर्ण रूप से प्रेम करना जानती हूं।“

गुरुजी को लगा कि महिला की बात पूरी हो गई है। मुंह खोल ही पाए थे कुछ कहने के लिए कि स्त्री
ने फिर हुंकार भरी-
”मेरी बेटी बीमार पड़ी है। अपूर्ण हुई न! उसका सुख, उसकी स्वतंत्राता, सब अधूरे हैं। फिर भी वही सब कुछ है मेरे लिए। आपकी समझ में नहीं आएगा पूर्ण-अपूर्ण का यह फेर। मुझे आता है।“
”तो आपको यह पहले बताना चाहिए था न।“

”आपने मौका कब दिया।“
”चलो अब दे दिया। कहो क्या बीमारी है तुम्हारी बेटी को।“
”मैं बता भी दूंगी तो आपको कोई फर्क पड़ेगा?
और उस नाजुक सी बच्ची की हालत में ही भला क्या फर्क आ जाएगा आपके जान लेने से? यह सब बताना यहां वेस्ट ऑफ टाइम है। मैं यहां आई थी इन तनावों के बीच खुद को जरा स्थिर करने के लिए।“
”तो उसमें तो हमने सहायता की है न!“

”जी नहीं, आपने तनाव को और बढ़ाया है।
समाधि के नियम मैं समझती हूं पर तनाव से मुक्ति के लिए भी अनुशासन चाहिए तो फिर मुक्ति कैसी! घर-दफ्तर
के अनुशासन क्या बुरे हैं।“ उसने हाथ हिला-हिला कर कहाµ ”आंख मत खोल देना, ऊर्जा बह जाएगी। किसी की तरफ देखना नहीं, ध्यान भटकेगा। फोन मत उठा लेना, औरों की समाधि में व्यवधान पड़ता है। इतने नियम तो मेरा अफसर भी मुझ पर नहीं थोपता। क्या सहायता दी आपने तनाव से मुक्ति में। मुझे और सचेत कर दिया अपने बारे में। आपने ही तो कहा था हमारी काँशसनेस ही हमारी समस्या है।“

महिला चुप हो गई।
गुरुजी भी चुप थे।
इस दौरान कुछ भक्त उठ कर बाहर जा चुके थे। अनुशासन भंग हो रहा था। उस महिला जैसे लोगों
को तनाव से मुक्ति मिल रही थी। कर्तव्यनिष्ठ चेले-चेलियां चुप थे। उनका तनाव बढ़ रहा था। बेचैन थे। उनके
लिए गुरुजी से बढ़कर कोई सत्ता नहीं थी। उन्हें उसी छोर से उम्मीद थी। पर गुरुजी तो चुपचाप बैठे थे।

एक चेली ने उस स्त्री से, जो अनाधिकार बहस करते हुए खड़ी हो गई थी, कहा -
”बैठ जाइए बहनजी। हम यहां निजी समस्याओं के बारे में भला क्या बात कर पाएंगे। बाद में बात करते हैं। आखिर हम भी तो एक परिवार जैसे ही हैं न! अभी सबको परेशान क्या करना।“

उस स्त्री ने खड़े-खड़े ही कहा,
”आप कितने दिन से यहां जीने की कला सीख रही हैं?“
”कई महीने हो गए। देखो मेरे पास तो गुरुजी का यह लॉकेट भी है।“ अनुशासन का एक और प्रतीक था यह।
विद्रोहिणी चिढ़ गई, ”तो फिर गिनो न अपनी सांसें। नवजीवन मिलेगा तुम्हें। तनाव खत्म हो जाएगा।“

यह कहकर वह महिला बाहर चली गई। जाहिर था कि वह कल से नहीं आएगी।
उसके जाते ही सबने राहत की सांस ली। बिना सांसें गिने।

यह मेरी ध्यान यात्रा का पहला दिन था।

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