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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – घुघूती बासूती का व्यंग्य : विट्ठल

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(प्रविष्टि क्रमांक - 40) (महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम त...

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(प्रविष्टि क्रमांक - 40)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

विट्ठल ! महाराष्ट्र में कष्ट में, दुःखी होने पर लोग प्रायः विट्ठल की ही पुकार करते हैं। मुझे भी इस नाम से कोई कष्ट न था, बल्कि राह चलते यदि इनका मन्दिर दिखता तो हाथ जोड़ देती थी। यह बस तब तक था जब तक विट्ठल नामक ड्राइवर हमें नहीं मिला था। जब से वह मिला तब से इस नाम के साथ अपनी असहायता ही याद आती है। अब तो यह व्यक्ति दिखते ही असली विट्ठल को याद कर लेती हूँ, पुकारती हूँ उसे कि हे प्रभु, रक्षा करना। मुझे पूर्ण विश्वास है कि प्रभु रक्षा करना भी चाहता होगा परन्तु यह विट्ठल, हमारा विट्ठल उनके नेक इरादों पर पानी फेर ही देता है।

हम बहुत ही भयंकर गर्म जगह पर रहते हैं। आस पास जहाँ भी दृष्टि जाए केवल पत्थर, चट्टानें, बंजर जमीन, हरियाली का कहीं नामो निशान ही नहीं है। उस पर वर्ष में आठ महीने गर्मी रहती है। दो महीने बरसात में भी बरसात रुकी नहीं कि मारे गर्मी के भाप के भभके उठते हैं। ऐसे में ऊपर वाले विट्ठल की कृपा से एअर कंडिशंड कार है। परन्तु यह नीचे वाला, हमारा विट्ठल, इसे जैसे गर्मी से प्रेम है। यह ए.सी. का शत्रु है। कार बिल्कुल नई हो या पुरानी, यदि वह उसके हाथ आ जाए तो ए. सी. खराब ही होता है। कभी गैस लीक हो गई है तो कभी कुछ और बहाना, ए.सी. न चलाने का। जबर्दस्ती चलवा भी लो तो जब तक ठंडी हवा में नींद का झोंका आता है और मैं सपने में किसी पहाड़ पर पहुँचती हूँ तबतक टपटप टपकता पसीना मुझे मीठी नींद से उठा देता है। क्या हुआ विट्ठल, ए.सी. क्यों बंद किया पूछने पर वह बहरा बन जाता है या फिर अधिक बार पूछो तो गूँगा या फिर कुछ ऐसा बुदबुदा देता है जो मुझे सुनाई नहीं देता।

फिर जबर्दस्ती ए.सी. चलवाकर एक पुस्तक पढ़ने में खो जाती हूँ। अभी तो कहानी में आनन्द आना भी नहीं शुरू हुआ होता और पसीना चूने लगता है। मैं फिर ए.सी. चलवाती हूँ तो कार रुक जाती है। पूछने पर वह ए.सी. को दोष देकर बताता है कि इंजन गरम हो गया या ऐसा ही कुछ और। मैं हारकर खिड़कियाँ खोल लूं का आनन्द उठाती हुई यात्रा करती हूँ।

यदि ए.सी. चले तो कार की गति कुछ ऐसी होती है कि साइकिल सवार भी उसे पीछे छोड़ जाते हैं। वह कहता है कि ए.सी. चलता है तो कार गति नहीं पकड़ती। अब स्वयं कार चलाना तो आता नहीं सो कुछ कहूँ भी तो कैसे ? प्रायः ए.सी. चलवाने की सजा में स्टेशन पर दौड़ते हुए ट्रेन पकड़ी है। हवाईअड्डे पहुँचने तक विमान उड़ चुका होता है। विट्ठल को क्या कहें, वह सोचता है कि हम विमान भी दौड़ते हुए पकड़ कर उस पर लटक जाएँगे। फिर भी मैं हूँ कि ए.सी. चलवाने की जिद नहीं छोड़ पाती।

एक दिन तो ए.सी. चलवाकर मैं मीठी नींद सो रही थी। यहाँ यह बात बता दूँ कि मुझे अनिद्रा की बीमारी है और यह बीमारी केवल मेरे बिस्तरे व रात के समय तक ही सीमित है। बस, कार, ट्रेन, विमान में बैठते ही मुझे बढ़िया नींद के झोंके आने लगते हैं। हाँ, तो मैं मीठी नींद का आनन्द ले रही थी। अचानक एक झटके से गाड़ी रुकी। जब तक मैं आँखें मलती हुई उठकर देखती कि क्या हुआ है, सामने भीड़ इकट्ठी हो गई थी। विट्ठल जी बड़बड़ा रहे थे, "और चलवाओ ए. सी. ! मुझे ए.सी. में नींद आ जाती है। अब आँख लगेगी तो दुर्घटना तो होगी ही।" मेरे ज्ञान चक्षु खुले, 'अहा, तो यह था ए.सी. न चलाने का रहस्य !' परन्तु रहस्योद्घाटन बहुत देर से हुआ था। हम पूरी तरह से गाँव वालों की भीड़ से घिर चुके थे।

विट्ठल मुझे घूर रहा था जैसे कह रहा हो कि अब निपटो इनसे। वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था। उसकी निश्चिन्तता देख तो यही लगा कि कोई बड़ी दुर्घटना तो नहीं हुई है। भीड़ कार के बॉनेट तक पर सवार थी तो सामने मनुष्य क्या कोई बड़ा जानवर भी घायल नहीं हुआ हो सकता था। मैं कार से उतरी। एक ग्रामीण भीड़ को चीरता हुआ मेरे सामने आया। उसके हाथ में एक लहूलुहान मृत मुर्गी थी। मेरी कन्नड़ टूटी फूटी थी, ग्रामीण की हिन्दी टूटी फूटी थी। सो टूटी फूटी भाषा में स्वर्गवासी मुर्गी के स्वर्गवास पर मैंने दुख प्रकट किया और क्षमा माँगी। फिर मुर्गी का मूल्य लगाया गया।

वह बोला,"पूरे दो सौ रुपए में बेचने वाला था मैं इसे ।"

मैंने कहा,"डेढ़ सौ रुपए में तो मैं एक मुर्गी खरीदती हूँ।"

वह बोला,"मैं तो दो सौ में बेचता हूँ।"

भीड़ बढ़ती देखकर मैंने पर्स में से दो सौ रुपए निकाले और उसे दे दिए। सोचा कि मामला खत्म हो गया। एक बार फिर से क्षमा माँगकर कार में बैठने लगी।

वह बोला,"रोज दो रुपए का अंडा देती थी।"

मैंने कहा,"जब बेचने वाले थे तो अंडे कहाँ से मिलते?"

वह बोला,"छह महीने बाद बेचने वाला था।"

शेष गाँव वाले भी उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे। विट्ठल निर्लिप्त भाव से ऊँघ रहा था। मुर्गी मारी उसने और फँस मैं गई थी। कन्नड़ आती थी उसे और बोल मैं रही थी।

फिर से सौदा शुरू हुआ। ग्रामीण का गणित अच्छा था।

वह बोला,"एक महीने में तीस अंडे।"

मैंने टोका,"कोई मुर्गी रोज अंडे नहीं देती।" आखिर मैंने भी अपने घर में मुर्गियाँ यूँ ही तो नहीं पाली थीं। आज मेरा मुर्गी ज्ञान काम आने वाला था। मैं मन ही मन मुस्काई।

वह बोला,"आपकी मुर्गी रोज अंडा नहीं देती होगी। मेरी तो देती थी।"

मैंने कहा,"ऐसा हो ही नहीं सकता।"

वह बोला,"बिल्कुल होता था। पूछ लो मेरे पड़ोसी से।"

मैंने कहा,"मैं क्यों पूछूँ तुम्हारे पड़ोसी से?"

वह बोला,"क्योंकि लगभग रोज ही यही हमारी मुर्गी का अंडा चुराता था।"

पड़ोसी बोला,"हाँ, बिल्कुल रोज अंडा देती थी। मैं रोज अंडा चुराता था। अब मैं अंडा कैसे चुराऊँगा?"

अंडाचोर पड़ोसी अंडेविहीन भविष्य की कल्पना कर लगभग रोने लग गया था।

मैंने कहा,"जब अंडे चोरी हो जाते थे तो तुम बेचते कैसे थे? तुम्हारी तो कोई हानि नहीं हुई।"

वह बोला,"तो ठीक है, मेरे पड़ोसी की हानि तो हुई। उसको ही पैसे दे दो।"

वह और उसका पड़ोसी हिसाब लगाने लगे।

वह बोला,"एक महीने में तीस अंडे। छह महीने में एक सौ अस्सी अंडे।"

पड़ोसी बोला,"एक महीने में तीस अंडे। दो रुपए के हिसाब से साठ रुपए।"

वह बोला,"दो रुपए के हिसाब से तीन सौ साठ रुपए हुए।"

पड़ोसी बोला,"साठ रुपए महीने के हिसाब से छह महीने के तीन सौ साठ रुपए हुए।"

जब तक मैं उनके बचपन के स्कूल के गणित के अध्यापक को नतमस्तक होती तब तक पड़ोसी मुझसे तीन सौ साठ रुपए झटक चुका था।

मैं कार का दरवाजा खोलने लगी।

ग्रामीण बोला,"मैं उसे दो दिन बाद पकाने वाला था।"

मैंने पूछा,"किसे?"

वह बोला,"मुर्गी को।"

मैं बोली,"उसे तो तुम बेच रहे थे।"

वह बोला,"छह महीने बाद।"

मैंने कहा,"फिर पकाते कैसे?"

वह बोला,"जिन्दा होती तो पका भी सकता था। दो दिन बाद मेरे मेहमान आने वाले हैं। अब उन्हें क्या खिलाऊँगा? अब मुझे दो सौ रुपए में मुर्गी खरीदनी पड़ेगी।"

कार का दरवाजा खोल ही नहीं सकती थी। वह रोके हुए था। कार के अंदर से विट्ठल जी तमाशा देख रहे थे। मुझे तो लग रहा था कि मन ही मन मुस्करा रहा था। मेरी सहायता को बाहर ही नहीं आ रहा था। यह वही विट्ठल था जो सब्जी खरीदते समय तो थैले ना उठाने पड़ें इसलिए आस पास नहीं फटकता था किन्तु यदि कपड़े, जूते, चप्पलों की दुकान के अन्दर जाऊँ या यहाँ तक की बाल कटवाने भी जाऊँ तो परछाई की तरह साथ लगा रहता था। मैंने बेबसी से कार के दरवाजे की तरफ देखा। बिना ए.सी.के ही सही परन्तु कार के अंदर होना कितना सुखद होगा।

हारकर कहा,"दो सौ रुपए भी दूँगी पर पहले अन्दर बैठने दो।"

रास्ता मिला तो ग्रामीण बोला,"पहले दो सौ रुपए दो तभी अन्दर बैठने दूँगा।"

मैंने कहा,"बैठने दोगे तभी दूँगी।"

किसी तरह सुलह कर उसने मुझे एक पैर कार में रखने दिया। मैंने दो सौ रुपए पकड़ा दिए। उसने बड़े आराम से मुस्करा कर धन्यवाद कहा। फिर कार का दरवाजा बन्द करते करते कहा,"मेमसाहब, सबसे पहले अपने ड्राइवर को नौकरी से निकाल देना।"

अहा, क्या बात कही थी! यही जो मेरे वश में होता। विट्ठल था यूनियन का सदस्य। मैं नौकरी से निकाली जा सकती थी विट्ठल नहीं। फिर भी उसकी बात से मैं इतनी खुश हुई कि एक दस का नोट और उसे पकड़ाकर उसे नमस्ते कह दिया।

परन्तु न जाने क्यों मुझे लगा कि विट्ठल और वह दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्करा रहे थे। क्या यह मेरी आँखों का भ्रम था या उन्होंने आँखों ही आँखों में आपस में कुछ बात की थी?

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रचनाकार: व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – घुघूती बासूती का व्यंग्य : विट्ठल
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – घुघूती बासूती का व्यंग्य : विट्ठल
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