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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अतुल चतुर्वेदी का व्यंग्य : कोयले की दलाली में…

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(प्रविष्टि क्रमांक - 50)

इस बार मैं फिर कटघरे में हूं , मालिक नाराज है । हमेशा की तरह वादी भी वही है और न्यायधीश भी वही । उसका कहना है कि तुम गंदगी ज्यादा फैलाते हो , प्रदूषण करते हो। तुम इसका जुर्माना भरो । मैंने कहा-“ माई-बाप मैं ठहरा गरीब आदमी ,दिन को मिल जाय तो रात का भरोसा नहीं । मैं भला क्या कचरा फैलाऊंगा । ” सेठ नहीं माना, कहने लगा –“ बकवास बंद करो । सिगड़ी नहीं कुकिंग गैस का इस्तेमाल करो । कब तक पिछड़े बने रहोगे ...पीजा- बर्गर से ही काम नही चलेगा । तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है । ” मैंने कहा –“ साहब आपने तो पूरी धरती गर्मा रखी है मिसाइलें और बम दाग-दाग कर । आप तो आग लगा कर चैन से सो जाते हो और हम बरसों तक आपके खिलवाड़ का दंश भोगते रहते हैं । आपकी ऐय्याशी की लातें हम कब तक अपने पेट पर खाते रहें । ” सेठ का गुस्सा सातवें आसमान पर था । वो मुट्ठी भींचते हुए बोला – “हमने जो कुछ भी किया विश्व शांति के लिए किया ,उसमें हमारा कोई स्वार्थ नहीं था । हमारे मानवतावादी नजरिए की पुष्टि नोबेल प्राइज ने कर दी है । ” मैं भी बहसियाने के मूड में था । इसलिए तर्कों का असलाह ले पिल पड़ा-“ सही फरमा रहे हैं आप पड़ोसी पर आक्रमण मानवता की भलाई के लिए ही तो था । एड्स, बर्ड फ्लू ,एंथ्रेक्स, स्वाइन फ्लू सब आपकी कृपा का ही परिणाम है ।आपका मानवतावादी चेहरा तो आज तक हिरोशिमा और वियतनाम में झांक रहा है । वाह रे मानवता रक्षक क्या कहने आपके । ”

तब तक उस सेठ के दो-चार धनाढ्य साथी भी वहां आ चुके थे । उनमें खुसुर-पुसुर होने लगी । एक बोला –“इन ससुरों पर पाबंदी लगाओ ...देखो कितना शोर और गंदगी है इनकी बस्तियों में । ” दूसरा हस्तक्षेप करते हुए बोला – “आबादी तो देखो भुक्खड़ों की । चालीस प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं तब ये हाल है इनका । ” उनकी चर्चा चल रही थी कि एक गांधीवादी वहां आ टपके । बोले मैं बताऊं – “बापू ने हिन्द स्वराज्य में कहा है कि हाथ-पैरों से काम करो और तंदुरुस्त रहो । हमारे यहां तो वैसे ही इतनी मानव क्षमता है । ये कल कारखाने, सीमेंट के जंगल ही जलवायु को अधिक खतरा पैदा कर रहे हैं सेठ जी ...तुम्हारे शहर में ही सबसे ज्यादा कोयले से चलने वाले बिजलीघर हैं । ” गांधी भक्त की बात सुनकर तीसरा सेठ नाराज हो गया ।

क्रोधित होते हुए बोला –“ क्या सठिया गए हो तुम लोग...गया बापू का जमाना । किस पर फालतू टाइम रखा है आजकल । ” गांधी भक्त कहां मानने वाला था । उसने सत्याग्रह वाला पाठ अच्छी तरह पढ़ा , ओढ़ा, बिछाया था । वो सत्याग्रह फैला कर बैठ गया कहने लगा –“बापू इंद्रिय संयम पर जोर देते थे , शाकाहारी थे ।

...तुम सब ये भोगवाद का दुष्परिणाम भोग रहे हो । तुम्हारे बूचड़खाने ही अधिक कालापन फैला रहे हैं । उनका कचरा आसानी से रिसाइकल भी नही हो सकता है। ” गांधीवादी को देखकर मेरा उत्साह भी बढ़ गया । हम दोनों एक और एक ग्यारह हो गए।

मैंने कहा-“ तुम पैसेवालों का यही शगल है पहले समस्या खड़ी करो फिर उसमें पूरी दुनिया को शामिल करो । तुम्हारी आग है तुम बुझाओ , हमारी आहूति क्यों भला ?” मेरा सेठ बोल उठा –“ देखो , ये कृतज्ञता ज्ञापन का मामला है भाई । तुमने मेरा नमक ही नही गेहूं , दवाएं, पैसा तक खाया है तो अब बारुद , धुआं भी खाओ । उसे रोकने में भी हाथ बटाओ । हम-तुम तो मौसरे भाई ठहरे आखिर । ” भाई संबोधन सुन कर मेरी आत्मा पसीज उठी । मेरा मन उन्हें चूमने को हुआ । उनके व्हाइट हाउस की चौखट पर दंडवत करने की तीव्र इच्छा हुयी । मैंने लगभग रिरियाते हुए कहा –“ साहब, इसके लिए मुझे क्या करना होगा ?”

वे खुश होते हुए बोले –“ वेल ,नथिंग बस थोड़ा सा कार्बन... आई मीन थोड़ा सा कालापन कम करना होगा । ” मैं सकपकाया –“सेठ जी ये कैसे संभव है । हमारे यहां तो तरह-तरह का कालापन पसरा है । काले कारनामों का हमारा तो अत्यन्त समृद्ध इतिहास रहा है । न्याय से ले कर सत्ता तक के नियंताओं के हाथों में कालिख लगी हुयी है । कुछ एक तो न जाने कितनी बार कालामुँह करते हुए रंग हाथ पकड़े भी गए हैं । हम भला कालापन कैसे मिटा पाएंगे ...तरह-तरह की कालिमा है हमारे माथे पर सिक्ख नरसंहार से ले कर गुजरात दंगों तक की । नहीं ,नहीं सर हमसे ये सब न होगा ...देखिए, देखिए न जातिवाद , प्रांतवाद ,संप्रदायवाद का कालापन इधर ही तो बढ़ता आ रहा है । लगता है पूरा देश ढक गया है उसमें । ”

सेठ जी बोले-“ हम कुछ नहीं जानते तुम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । ये गंगा ,यमुना किसने प्रदूषित की हैं । हिमालय पर विकिरण फैलाने का जिम्मेदार कौन है? बंधु ये कोयले की दलाली है इसमें कितना भी बच कर जाओ कहीं-न-कहीं तो कालिख लगेगी ही । ” मैं क्या करता भला । पैर पटकते हुए और हाथ रगड़ते-रगड़ते वापिस लौट आया ।

--

अतुल चतुर्वेदी

380 , शास्त्री नगर , दादाबाड़ी

कोटा राज .

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बहुत ही मुश्किल है बच के निकलना कोयले की दलाली से ठीक उसी प्रकार जैसे बेचारे ग़रीब ही फँस जाते है देश का प्रदूषण बिगड़ने में बाकी तो साफ साफ निकल जाते है..बढ़िया रचना...धन्यवाद!!

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