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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अशोक गौतम का व्यंग्य : कोई हों तो बताएँ प्‍लीज

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(प्रविष्टि क्रमांक - 28)

(महत्वपूर्ण सूचना : प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

वर्षों से अपने आपसे परेशान होने के कारण किसी पहुंचे बंदे की तलाश में था कि कोई चमत्‍कारी बंदा मिले और मेरा पंगा छू मंत्र हो जाए। पर पहुंचा हुआ बंदा था कि मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था और पंगे थे कि श्‍ौतान की आंत की तरह खिचते ही जा रहे थे।

कल यों अनमने मन से अखबार पढ़ रहा था कि अखबार में विज्ञापन देखा तो आंख्‍ों जैसे थीं वैसे ही खुल की खुली रह गईं। लगा दो रूपये के अखबार में अनमोल समस्‍याओं का समाधान मिल गया। पहुंचे बंदे ने कल्‍याणार्थ विज्ञापन दिया था कि समस्‍या जैसी भी हो, जड़ से गारंटी के साथ खत्‍म करने को वो माद्‌दा रखता है। समस्‍याओं के पत्‍ते झाड़ने वाले तो बहुत देख्‍ो होंगे।

और मैं पत्‍नी को बिन बताए दफ्‌तर से फरलो मार जा पहुंचा अपने शहर के आलीशान होटल में पहुंचे पहुंचे के पास। पहली बार किसी होटल में गया था सो भीतर जाते डरा सहमा भी। क्‍या कहें जनाब! हम ठहरे ढाबे के बंदे। लंच में भूख लगी तो ढाबे वाले से पत्‍तल पर ले रगड़ दिए पांच सात चूहे की मींगणों सने फुलके और पत्‍तल दे मारी परे। सच कहूं तो बड़े बड़े होटलों की ओर देखने से भी मन घबराता है अपना तो।

बाबा को देखा तो बस देखता ही रह गया। हद है यार ! दुनिया की समस्‍याओं को अपने ऊपर लेने के बाद भी साठी का बीस सा दमकता चेहरा । क्‍या काले बाल! रंगे हए तो लगे नहीं। बाबा का मेकअप !! वाह रे वाह! आधी टेंशन तो यों ही उन्‍हें देख जाती लगी।

‘आओ भक्‍त! कैसे आना हुआ? किस समस्‍या के मारे हो? जन्‍मपत्री लाए हो?'

‘नहीं बाबा। क्‍या है न कि वो तो घर के चूहों ने कुछ न मिलने पर कभी की खा दी है।'

‘तो अपनी हस्‍तरेखा बताओ।'

‘ वो तो बाबा शादी के दो महीने बाद से ही घर के बरतन धोते धोते घिस चुकी है।' मैंने कहा तो वे भीतर ही भीतर हंसे।

‘ तो अपना कोई फोटो वैगरह लाए हो?' उन्‍होंने पूछा तो गुस्‍सा आ गया। हद है यार! पांच फुट का आदमी सामने बैठा नहीं दिख रहा!

‘बाबा मैं जो हूं तो फोटो की जरूरत क्‍या!'

‘है बंदे है! ये होना भी कोई होना है बंदे?' कह वे फिर मुस्‍कुराए तो मुझे अपने होने पर बेहद ग्‍लानि हुई। इससे अच्‍छा तो ये होता यार कि तू होता ही नहीं। पर क्‍या करे साहब! अपनी मरजी से मरा जाता तो आज को अपने देश का 75 प्रतिशत से अधिक वोटर खत्‍म हो चुका होता,‘माफ करना बाबा! अब जो भी है आपके सामने है। अब तो सामने पड़े शीश्‍ो ने भी पहचानना छोड़ दिया है।'

‘ तो ठीक है भक्‍त। कितने वाली समस्‍या का समाधान चाहते हो?'

‘ मतलब!!'

‘नौकरी के 5001 ।प्रमोशन के 2100 । मन चाही सीट के 3100 । कारोबार में आई रूकावट हटाना चाहते हो तो 5100 । अध्‍ोड़पन के प्‍यार में रूकावट आ गई हो तो....., फिर शादी के लिए मन कर रहा हो तो......, घरवाली से अनबन हो रही हो तो....'

‘वह तो बाबा जबसे शादी हुई है तबसे ही चल रही है।'

‘ तो हम किस लिए हैं... बिन बारगेनिंग के मोल चुकाओ और हर समस्‍या से मुक्‍त हो जाओ। घरवाली से तलाक चाहते हो? घर में रोज रोज की चख चख से परेशान हो? शरीर को खाया पिया नहीं लगता न? डोनेशन न दे पाने के कारण बच्‍चों की पढ़ाई में रूकावट आ गई है? रोज रिश्‍वत लेने के बाद भी घर में बरकत नहीं? धर्मपत्‍नी के साथ रहते हुए चार बच्‍चों के बाप होने के बाद भी खोया हुआ प्‍यार जाते हुए भी पाना चाहते हो?रिश्‍तेदारों से धोखा खाए हो ? कोई बात नहीं। ये लो रेट लिस्‍ट और अपनी जेब की हिसाब से प्राथमिकता के आधार पर अपनी समस्‍याओं का दाम चुका 24 घंटे में छुटकारा पाओ, चैलेंज के साथ। बेटा अब आ गए हो तुम सही जगह, अब देखो तुम्‍हारी समस्‍याओं को चखाता हूं मैं कैसा मजा। समस्‍या कैसी भी हो, जड़ से खत्‍म गारंटी के साथ कर दूंगा, देखते ही देखते देखते जाओ, तुम्‍हारा बचा जीवन खुशियों से सात जन्‍मों के लिए भर दूंगा। पचास साल से ऊपर के बंदों को एक साथ दो समस्‍याओं के समाधान पर 25 प्रतिशत की स्‍पेशल छूट हर मौसम में।' कह बाबा ने अपने आसन के नीचे से रेट लिस्‍ट निकाल मुझे थमा दी। रेट लिस्‍ट पर कुछ ऐसों के हंसते हुए फोटो छपे थे जो बाबा की कृपा से अपनी समस्‍याओं से मुक्‍त हो मस्‍ती भरा जीवन जी रहे थे। कुछ देर लिस्‍ट देखने के बाद मैंने बाबा से कहा,‘ पर बाबा! ये जो आपने रेट लिस्‍ट में समस्‍याएं दर्शाई हैं इनमे से मेरी समस्‍या तो कोई भी नहीं।'

‘मतलब!!!'बाबा चौंके।

‘मेरी समस्‍या तो अपने आपसे बचना है।'

‘ ...पता नही क्‍यों ..पहली और आखिरी बार तुम्‍हारे आगे सच बोल रहा हूं। यार माफ करना! इसी अपने आपसे बचने के लिए ही तो मैं होटल होटल भटक रहा हूं। न अपने आप के जाल में फंसा होता और न आज ये सब करना पड़ता। जा भक्‍त जा! अपने आप से बचने की समस्‍या का समाधान मिले तो मुझे भी बताना। मुंह मांगा दाम दूंगा।'

आप की नजर में कोई सच्‍ची को चमत्‍कारी बंदा हो तो पता दें, बाबा भी दुआएं देंगे,और मैं तो दूंगा ही।

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डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास ,अपर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक सोलन-173212 हि.प्र.

ashokgautam001@gmail.com

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