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एम. शाहुल हमीद की कविता : अपनी राह

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अपनी राह

बेखबर अनजान थे

हम अपनी राह पर ,

चमक कहीं सी आयी,

अचानक अपनी राह पर,

बना वह बन्‍दी हमें,

कच्‍चे डोर व अपनी राह पर,

जिसे देख मचे,

कोलाहल अपनी राह पर,

बने सभी दुश्‍मन हमारे,

अपनी राह पर,

थी खबर इसकी हमें,

मगर हुए हम खबर अपनी राह पर,

बढ़े हम आगे ही आगे,

कभी फिसलते, गिरते, बिलखते, अपनी राह पर,

उस तक पहुंच गये,

जहाँ थी ना दूजी राह अपनी राह पर,

बस चमक ही चमक थी,

सत्‍य की राह पर।

---

डॉ. एम. शाहुल हमीद,

प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग,

मनोंमणियम सुन्‍दरनार विश्‍वविद्यालय,

तिरूनेलवेलि

तमिलनाडु

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रचना कैसी लगी:

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अच्छी लगी रचना।

कभी फिसलते, गिरते, बिलखते, अपनी राह पर,

उस तक पहुंच गये,

जहाँ थी ना दूजी राह अपनी राह पर,

बहुत सही कहा बस हौसला होना चाहिए
बधाई स्वीकारें

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