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जगमोहन 'आज़ाद' की दो कविताएँ

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1)
मुझे चांद नहीं चाहिए
एक युग वह था
जब कृष्ण ने
यशोदा से कहा था-
मां,मुझे चांद ला दो
मैं इसके साथ ही खेलूगा...।
एक युग यह है
जिसका कृष्ण-
मां से कह रहा है
वह जो आसामान में
गोल-गोल चमकता तारा है
रोटी नहीं बन सकता क्या?
मेरे लिए...।
तू मुझे वह चमकती रोटी ला दे मां...
ताकि! मैं भूख से लड़ सकूं
जिंदा रह सकूं-
समझाती है मां कृष्ण को
वह रोटी नहीं,चांद है बेटा
और
कृष्ण है कि हठकर बैठा है-
नहीं मां,मुझे चांद नहीं
रोटी चाहिए मां रोटी...।
-जगमोहन 'आज़ाद'

(2)
अक्षरधाम
अब्बास अली
बनाते थे फूलों की माला
अक्षरधाम में...।
माला
चढ़ाई जाती थी
भगवान के दरबार में
खुशी से
निहाल हो उठते थे...अब्बास अली
अक्षरधाम में...।
भगवान खुश थे
उसके भक्त को-
मिल रही थी रोटी दो जून की
मान-सम्मान और नमाज़
अक्षरधाम में...।
एक रात
अमानुष दरिंदों ने
जला डाली दुकान
मार डाला...अब्बास अली को-
टूट गई-बिखर गई-
वह फूलों की माला...
चढ़ाया जाना था जिन्हें
अक्षरधाम में...।
-

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dono kavitaone aaj ka nagn satya dikhaya hai

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