रचना दीक्षित की प्रेम कविता

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मौन निमंत्रण

ये मेरा है मौन निमंत्रण,आज तुम्हें अजमाने को 

जब मैं पहुंचा देर शाम को खेतों औ खलिहानों को 

                                                                                                                  

तेरी साँसे पास न आयीं, मेरा दिल बहलाने को 

सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ,तुम्हे खींच कर लाने को

   

तुम क्या जानो,मुझ पागल,प्रेमी,बेचारे,दीवाने को    

मेरी बाहें मचल रही हैं,तुम्हें पास ले आने को 

 

सोच रहा हूँ,आलिंगन कर,मजबूर करूं सकुचाने को 

सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ,तुम्हे खींच कर लाने  को   

 

मेरी ऑंखें तरस रही हैं,इक दरस तुम्हारा पाने को 

सूखे अधरों पर प्यास खिली,क्या प्यासे ही रह जाने को 

 

क्यों पास नहीं तुम आ जाती,मधुशाला छलकाने को  

सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ,तुम्हे खींच कर लेन को   

 

मैंने तो भेजा था तुमको,मेरा दिल ले जाने को

मेरे दिल से दिल न मिले तो मजबूर नहीं लौटने को

 

याद न मेरी आएगी,अब तेरा दिल भरमाने को

सो अपनी साँसे भेज रहा हूँ,तुम्हें भूल कर आने को                                                 

 

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1 टिप्पणी "रचना दीक्षित की प्रेम कविता"

  1. Prem serdhye
    Rachna dixit
    Aap ki kavita bhut hi payri or mithi si legi
    Sadhu-bad
    NARESH MEHAN

    उत्तर देंहटाएं

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