आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : रमेश चन्द्र पाल का व्यंग्य – तिल से तेल

तिल से तेल

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 31)

(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

संसार का व्‍यक्‍ति से, व्‍यक्‍ति का तेल से, और तेल का तिल से सम्‍बन्‍ध बहुत पुराना है। शायद ही कोई व्‍यक्‍ति ऐसा होगा जो तेल का इस्‍तेमाल न करता हो। अधिकतर लोग इस विचारधारा के होते हैं कि आम खाओ गुट्‌ठली से क्‍या लेना-देना। जो गुठली से आम खाने तक की बातों का ध्‍यान रखते हैं वह हमेशा तनावग्रस्‍त होते हैं। जो देशवासी अपने देश और तेल के बारे में नहीं सोचते उन्‍हें मैं भारत देश का नागरिक ही नहीं मानता। क्‍योंकि तेल खाने, लगाने, गाड़ी चलाने, से लेकर न जाने किस-किस काम आता है। अतएव देश के प्रत्‍येक नागरिक को एक-एक बूंद तेल बचाना चाहिए।

प्रत्‍येक लेखक की भी अपनी कुछ जिम्‍मेदारियॉ होती है कि वह अपने देश के बारे में सोचे इस वजह से मैं मजबूर सोचने लगा कि तेल आता कहाँ से है। यह भारत वर्ष में कितने वर्षो तक उपलब्‍ध रहेगा। आजकल प्रत्‍येक आदमी के पास सोचने के लिये समय नहीं है क्‍योंकि वह अब मल्‍टी नेशनल हो रहा है। हमारे देश का लेखक इसीलिये गरीब होता है क्‍योंकि उसके पास सोचने के अतिरिक्‍त कुछ नहीं होता है।

यह एक राष्‍ट्रीय व्‍यापी चिन्‍ता का विषय है। आज मैं सोच रहा हूं कल सारा देश इस विषय पर सोचेगा कि तेल कैसे बन सकता हैं, कहाँ से निकाला जा सकता है। पेट्रोल, डीजल, सी0एन0जी0, एल0पी0जी0, बायो गैस, कार्बन हाईड्रोजन आदि के अलावा और क्‍या विकल्‍प हो सकता है। तेल उत्‍पादन के लिये।

मैंने बचपन में सुना है था कि लोग तिल से तेल निकालते हैं। क्‍योंकि तिल का तेल मीठा होता है। यदि मैं एक बार तिल से तेल निकलने में सफल हो गया तो फिर समझो तेल मिल लगाने में अधिक देर नहीं लगेगी। यही अनुभव बालू से तेल निकालने के भी काम आ सकता है। फिर क्‍या कुछ दिनों में मैं बालू के खदानों का मालिक और चारों ओर तेल ही तेल होगा। फिर मैं शनि देव को भी देख लूंगा मुफ्‌त में कैसे जनता से तेल लेते हैं।

इसी सोच ने मुझे बाजार से तिल खरीदने की प्रेरणा दी। फिर क्‍या था बन्‍दा ढ़ाई सौ ग्राम तिल लेकर ही घर लौटा और फिर शुरू हुआ ''मिशन तेल''। इन तिलों को पहले साफ किया फिर मुसलों की बारिश शुरू की। बच्‍चे इक्‍कठे हो गये। धीरे-धीरे बात मुहल्‍ले के आखरी कोने तक फैल गयी की शर्मा जी (क्‍योंकि मैं अधिक शर्मिला हूं इसलिये मुहल्‍ले के सभी लोग शर्मा जी के नाम से पुकारते हैं) तेल निकाल रहे हैं। एक घण्‍टा, दो घण्‍टा, चार घण्‍टा हो गया परन्‍तु तेल नहीं निकला तो नहीं निकला। हां मेरे शरीर का जरूर तेल निकलने गया। कपड़े तेल-तेल हो गये।

अब पता चला की यह तेल कितनी दुर्लभ चीज है कि राधा ने नाचने से पहले नौ मन तेल की मांग क्‍यों रखी थी। क्‍योंकि ''न नौ मन तेल हुआ होगा और न राधा नाचेगी होगी।'' जिसे नौ मन तेल मिल जाये तो राधा क्‍या उसका पूरा परिवार एक साथ नाचेगा।

इधर तिल गायब हो चुका था उसके स्‍थान पर आटे की एक लुगदी बन गई। आज लगा की तेल निकालना भी एक खानदानी काम होता है। क्‍योंकि इसके पहले लोग बैल और कोलूहु रखते थे। अब न तो बैल रहा और न ही कोल्‍हू। ढ़ाई सौ ग्राम तिल खोने के बाद भी मैंने हिम्‍मत नहीं हारी तेल के बारे में सोचता रहा।

आज पहली बार महसूस हुआ कि तेल कडुआ और ज्‍वलनशील होता है। तभी लोग कहते हैं कि पहले तेल देखो फिर तेल की धार देखो। मेहनत इतनी की और नसीब कुछ भी नहीं हुआ। लोकतन्‍त्र में जनता पिसती है और उसी का तेल निकल जाता है। बेचारे बैलों की जगह आज जनता ने ले ली है। आजकल तो दो पहिए और चौ पहिये ने इस कदर तेल पीना शुरू कर दिया है उसके बदले केवल धुंआ उगल रहा है। पहले दो पैर वाला आदमी और चार पैर वाला जानवर आपस में ताल मेल बिठाकर चलते थे। जब कभी दो पैर वाला थक जाता था तो चार पैर वाले उसकी मदद करते थे और अपनी पीठ पर बिठा लिया करते थे।

आज बाजार में तेल का भाव है आदमी का कोई भाव नहीं है। मैं शुक्रगुजार हूं ऊपर वाले का जो उसने प्रत्‍येक देश में गंजे बनाये। और दूसरा कम्‍पनियों ने ब्रिलक्रीम बनाई अन्‍यथा तेल की खपत का क्‍या होता। सारा तेल तो सिर पर ही लग जाता। कितनों ने तो देश हित में सिर में तेल लगाना छोड़ दिया। इसलिये लोगों की सोच में बदलाव आया और लोगों ने दीपावली पर तेल के दीपक की जगह बिजली के दीये जलाने शुरू कर दिये।

आजकल किसी देश की सम्‍पन्‍नता उस देश में उपलब्‍ध तेल के आधार पर आंकी जाती है। हमारे देश में तेल के देवता शनि हैं। अर्थात जिसके पास तेल है। उसी से सब डरते हैं।

----

( रमेश चन्‍द्र पाल )

6/366 विकास नगर,

लखनऊ-22

टिप्पणियाँ

  1. बहुत जानदार और शानदार रचना है जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. "तिल से तेल" में इतना करारापन नहीं आया. आज जब भी किसी को मौका मिलता है. लोग तेल देने से नहीं चूकते. नेता पूरे देश को तेल दे रहे है. कोई नहीं बोलता. तेल लगाने वालों की आज कोई कमी नहीं है. अपना स्वार्थ हल करने के लिए लोग मिनटों में मालिश शुरु कर देते हैं. दीनदयाल शर्मा

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.