बुधवार, 23 दिसंबर 2009

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विभा रानी का व्यंग्य – मारो मारो बेटियों को मारो

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 36)

(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

यार लोग परेशान हैं कि किसी ने अपनी नवजात बेटी को मार दिया, क्योंकि उसे बेटी नहीं चाहिये थी. कमाल है, अरे नहीं चाहिये थी तो नहीं चाहिये थी. अब इसमें इतना शोर या मातम मचाने की क्या ज़रूरत? उसका बच्चा, उसकी मर्ज़ी! उसने आपसे पूछकर तो बाप बनने की प्रक्रिया नहीं शुरु की थी ना! अब उसकी इच्छा! आखिर बेटी थी उसकी.

बेटियों को मारने का सिलसिला कोई आज का है क्या? गंगा तो इससे भी महान थी. भीष्म के पहले के सात सात बेटों को जनमते ही मार दिया. सोचिए, आज का कोई मां-बाप इतना बडा कलेजा दिखाएगा कि बेटों को मार दे? गंगा के उन सात बेटों ने अपनी मौत का बदला शायद इस तरह से लिया है कि उन्होंने सभी के मन में भर दिया कि बेटियां ही सभी संताप की जड हैं, इसलिए जनमते ही छुटी पा लो. बाद की आह और वाह से बचे रहोगे. गंगा भी तो बेटी ही थी न!

अब बताइये, बेटियां जनम कर ही कौन सा तीर मार लेंगी? एक किरण बेदी, या कल्पना चावला या सुनीता विलियम्स बन जाने से क्या कोई क्रांति आ जाएगी? सभी बेटियां अपने अधिकार भाव से पैदा होने लग जाएंगी? अपनी मर्ज़ी से पढने लग जाएंगी? अपनी मर्ज़ी से ब्याह कर लेंगी? ब्याह के बाद पति या ससुराल के अत्याचार से बच जाएंगी? दहेज़ के बदले उन्हें लड्डू दिए जाने लगेंगे? ब्याह के समय् उनसे शील, सुभाव, चरित्र, रूप, गुन की बात नहीं की जाने लगेंगी? इतने सारे झंझट किसलिए भाई? बेटियों के कारण ही ना? जीवन कितना सुखी, शांत, सरल हो जाएगा, अगर बेटियां नहीं हुई तो?

कितने फायदे हैं ना बेटियों के ना होने से. घर में किसी को रखवाली नहीं करनी पडेगी. पढाने के लिए उसे कहीं भेजा जाए, इस पर सोचना नहीं पड़ेगा, कहीं आने जाने के लिए उसके साथ एक अदद संरक्षक की ज़रूरत पर बल नहीं देना पड़ेगा, उसके साथ कोई छेड़छाड़ ना करे, वह हर रोज अपने घर सुरक्षित पहुंच जाया करे, इस पर मगजमारी नहीं करनी पडेगी, शादी के बाद वह सुखी है कि नहीं, दहेज की प्रताड़ना या अन्य प्रताड़ना दी तो उसे नहीं जा रही है, इस आशंका में आपकी नींद हराम तो नहीं हुई रहेगी, दफ्तर में कोई उस पर बिना वज़ह छींटाकशी कर रहा है, यह देख कर आपकी जान तो नहीं सूखती रहेगी, उसका किसी तरह का कोई यौन शोषण तो नहीं हो रहा है, इससे आपकी आत्मा कनछती तो नहीं रहेगी? वह कहीं अपने मन से किसी जात कुजात में शादी कर के आपकी इज़्जत को बट्टा ना लगाए और अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए आप उसका उसके प्यार समेत खात्मा ना कर दें.

यह सब कुछ भी नहीं होगा और हम सभी चैन और आराम की नींद सो सकेंगे, अगर बेटियां नहीं होंगी. सबसे बड़ी बात तो यह कि तब इंसानों की पैदवार रुक जाएगी, बेटियां ही नहीं होंगी तो बच्चे कैसे पैदा होंगे और जब बच्चे ही पैदा नहीं होंगे तो ये सब काम भी नहीं होंगे और जब ये सब काम नहीं होंगे तो इन सब पर सोचने और परेशान होने की ज़रूरत भी नहीं रहेगी. इसलिए, आइये, सब मिल जुलकर एक दूसरे का आह्वान करें और इस धरती पर से सभी बेटियों को नेस्तनाबूद करें.

6 blogger-facebook:

  1. व्यंग अच्छा लगा धन्यवाद्

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  2. kya pratikriya dun...........ek satya ko kis bebaki se pesh kiya hai..........in halaton par dukh jataun ya badhayi dun?

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  3. कम से कम इसे तो व्यंग्य नहीं कहेंगे?

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  4. क्या कहूँ मैं भी दो (जुड़वां) बेटियों की माँ हूँ .हथेली पर रख कर पाला है पर आगे के लिए मैं भी डरती हूँ की क्या होगा ?सारा दिन उन्हीं में सांसे अटकी रहती हैं. क्योंकि वो अब बड़ी हो गयीं है, अच्छी क्वालिफिकेशन है, समझदार हैं, और बहुत खुबसूरत हैं. तो एक तो लड़की ऊपर से इतने सारे अवगुण ! मुझ पर क्या गुजरती होगी ? इस रचना के बहाने जाने कितनी माओं का दिल पढ़ लिया है आपने बहुत बहुत बधाई

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  5. विभा रानी जी की इस रचना में कड़वा सच भी है, कहने की दलेरी भी और दिल को चीर जाने वाली तीर जैसी तेज़ी भी...जिस तरह से गंगा की बात की गयी है वह बात, वह अंदाज़, वह दलेरी बहुत ही महत्वपूर्ण है जो कह रही है कुछ उन लोगों से जो यह कहते नहीं थकते की हम महान, हमारा अतीत महान, हमारा सब कुछ महान....वक्त आ गया है यह सोचने का कि इतने धर्म कर्म वाली इस भूमि पर लगातार खून खराबा, अत्याचार, पाप और गरीबी जैसे कलंक क्यूँ हैं....???? अगर हमारे अतीत का वर्तमान यही है तो फिर सोचना होगा कि क्या था हमारा अतीत और क्या होगा हमारा भविष्य...????

    यह सार्थकता और संवेदना बनी रहे इसी आशा, इच्छा और आंकाक्षा के साथ;

    आपका अपना ही,

    रेक्टर कथूरिया
    http://punjabscreen.blogspot.com/

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  6. बेनामी1:02 am

    kam se kam ise vyangya to nahin kahenge. bhadas ka mahatva hota hai par aise serious maslon par ye andaz sirf mazak udane jaisa lagta hai. ise sirf aap hasya kah sakte hain. ismine vyangya kahan hai.

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