7 दिसम्बर 2009

समीर लाल ‘समीर’ की ग़ज़लें

(सुविख्यात चिट्ठाकार समीर लाल ‘समीर’ के काव्य संग्रह – बिखरे मोती की पांच प्रतियाँ रचनाकार के हिन्दी व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन में पुरस्कार स्वरूप प्रदान की जाएंगी. प्रस्तुत है उक्त संग्रह की 3 चुनिंदा ग़ज़लें )

(ग़ज़ल 1)


मौत से दिल्लगी हो गई
जिन्दगी अजनबी हो गई

दोस्तों से तो शिकवा रहा
गैरों से दोस्ती हो गई


उसके हंसने से जादू हुआ
तीरगी रोशनी हो गई

सांस गिरवी है हर इक घड़ी
कैसी ये बेबसी हो गई

रात भर राह तकता रहा
गुम कहाँ चाँदनी हो गई

आपका नाम बस लिख दिया
लीजिये शायरी हो गई

अपने घर का पता खो गया
कैसी दीवानगी हो गई
---


(ग़ज़ल 2)

हवाओं के संग में उड़े जा रहे हैं
उन्हें हम लिवाने जा रहे हैं

जो हमने पुकारा तो इठला के बोले
जरा ठहरिये क्यूं मरे जा रहे हैं

कई दिन से ख़त एक ही सिर्फ उनको
लिखे जा रहे हैं लिखे जा रहे हैं

कहा था उन्होंने अँधेरा बहुत है
उसी दिन से बस हम जले जा रहे हैं

मेरे जख़्म देखे हरे जो उन्होंने
वो सावन की बातें किए जा रहे हैं

---.
(ग़ज़ल 3)

हर शाम जिंदगी को फकत काटता रहा
जामों के बाद जाम हर इक नापता रहा

ऐसा कहाँ कि तुमसे मुझे आशिकी नहीं
इक बेवफा से वहमे वफ़ा पालता रहा

कब दोस्तों से थी मुझे उम्मीद साथ की
अपना ही साथ देने से मैं भागता रहा

बेबात क्या कही तुमने ये बात में
बातों में जो छुपी थी वही मानता रहा

बिखरी नहीं ‘समीर’ की दुनिया सजी हुई
ख्वाबों को आँख में लिए मैं जागता रहा.

---.
काव्य संकलन - बिखरे मोती से साभार.
कवि – समीर लाल समीर
पृष्ठ सं. 104, मूल्य 200 रुपए ($15 USD)
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन
पीसी लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड के सामने, सीहोर मप्र 466001

 

---.

8 प्रतिक्रियाएँ.:

  1. चिट्ठा जगत के मशहूर हस्ती समीर जी के बिखरे मोती की हर पंक्ति लाज़वाब है..बहुत बढ़िया लगा..धन्यवाद

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. कब दोस्तों से थी मुझे उम्मीद साथ की
    अपना ही साथ देने से मैं भागता रहा

    वाह
    ये डोल्लर और रुपैया में इतना भेद काहे

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. कहा था उन्होंने अँधेरा बहुत है
    उसी दिन से बस हम जले जा रहे हैं

    मेरे जख़्म देखे हरे जो उन्होंने
    वो सावन की बातें किए जा रहे हैं

    वाह समीर जी आप की ग़ज़ल ने सच में अँधेरा दूर ही कर दिया भले खुद जल कर ही सही। जहाँ तक हरे रंग की बात है सावन के अंधे को तो हरा ही दीखता है भले वो कैसे हुआ ?क्यों हुआ ?वो नहीं जानना चाहता बहुत अच्छी लगीं सभी गज़लें बधाई ।इतनी अच्छी गज़लें प्रकाशित करने के लिए रवि जी का आभार

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. लाजवाब ग़ज़लें .......... खूबसूरत शेर ...........

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. हवाओं के संग में उड़े जा रहे हैं
    उन्हें हम लिवाने जा रहे हैं


    उन्हें हम लिवाने चले जा रहे हैं..


    शायद टंकण में रह गया यहाँ.



    -बहुत आभार इस प्रस्तुति का और सभी के स्नेह का.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. यूँ तो सारी गज़लें बहुत खूबसूरत हैं पर ये पंक्तियाँ - आपका नाम बस लिख दिया , लीजिये शायरी हो गयी है ...बहुत पसंद आया ...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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