शनिवार, 26 दिसंबर 2009

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : अनीता मिश्रा का व्यंग्य - ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 38)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

अनीता मिश्रा

दोस्तों ये कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। ये कानपुर के राम नारायण बाजार में रहने वाले राधेश्याम जी के जीवन का दर्द है.. मुझे तो बड़ी तकलीफ हुई उनकी कहानी जानकार, सोच रही हूँ आपको भी सुना दूं....... यद्यपि राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया (बकौल उनकी माता जी .... चने चबाते-चबाते कब राधे हुई गए पता ही नहीं चला तबसे उनका नाम राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया है।)

हालांकि राधे भइया ने कहा है कि मैं भले ही लेखिका हूँ पर उनकी कहानी किसी को न बताऊँ क्योंकि ''सुनि इठिलैहैं लोग सबै, बांट लहै न कोय....... लेकिन सिर्फ लेखिका होती तो न बताती, स्त्री भी तो हूँ कैसे हजम कर जाऊँ अकेले, बिन बताए मुझे चैन कहाँ ..... पर आपको कसम हैं जो राधेश्याम जी की दस्तान आपने किसी को बताई।

तो .............. दोस्तों किस्सा ये है कि जब राधेश्याम जी ने ''सच का सामना'' टी0वी0 पर देखा तो उससे इतने प्रभावित हो गये कि उन्हें लगा जीवन में व्यक्ति को सिर्फ सच ही बोलना चाहिए ... हैरानी की बात है वेद, पुराण भी तो यही कहते हैं लेकिन राधे जी की समझ में ये बात टीवी देखकर आई ... (अपरम्पार महिमा मीडिया की....) खैर, सच का सामना से प्रभावित राधे जी ने पहला सच बोलने का बीड़ा उठाया और अपनी पत्नी को बताया कि उनके मायके जाने पर काम वाली झुमकी के एक दफा स्तन दबाये थे...... अब इसके पहले झुमकी, राधे उर्फ चब्बन भइया की झाडू उठा के मिट्टी पलीद करती, उन्होंने पांच सौ का नोट झुमकी को थमा दिया। जरूरतमंद झुमकी चब्बन भइया की इस हरकत को चबा गई। लेकिन सच सुनते ही पत्नी ने चंडिका का रूप धारण कर लिया उन्हें राधे भइया की हरकत से ज्यादा पांच सौ के नोट के जाने का गम था। उन्होंने अपने पति परमेश्वर को सारी चुनिन्दा गालियां दे डालीं। उनका प्रकोप हजार का नोट लेकर ही शान्त हुआ।

राधेश्याम जी समझ गये कि सच महंगा है। पर उन पर एक जुनून तारी था और उन्होंने सोच लिया था कि सच बोलने के रास्ते में कितनी भी कठिनाइयां आएं वो डिगेगें नहीं। राधेश्याम जी सच के सिवा कुछ नहीं बोलेंगे ये बात जल्दी ही सारे मुहल्ले में फैल गई ............ तो हुआ ये कि नगर निगम चुनाव होने वाले थे और लोगों को लगा कि स्वच्छ, साफ और बेदाग होने की ओर अग्रसर राधे भइया को चुनाव में खड़ा कर दिया जाये।

राधेश्याम जी धक्का देकर लोगों द्वारा सभासदी के चुनाव में खड़े कर दिए गये। चतुर चंट मीडिया वालों ने उनसे अजीब प्रश्न किए और उन्होंने ऐसे सच्चे जवाब दिए कि चुनाव परिणाम आने पर पता चला राधे उर्फ चब्बन भइया भारी बहुमत से पराजित हुए हैं। झूठ की एडिक्ट जनता चब्बन भइया का सच नहीं चबा पाई।

खैर, सच का रास्ता कांटों भरा है ये बात राधेश्याम भइया समझ गये थे लेकिन उन्होंने प्रण किया था कि सिर्फ सच ही बोलेंगे सो अब तक जोश कम नहीं हुआ था। यहां तक कि मुहल्ले के लड़के उन्हें चब्बन के बजाय *तिया कहने लगे थे पर उनके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा।

राधेश्याम जी की परचून की दुकान तो चुनाव के चक्कर में बंद हो गयी थी तो उन्हें अब एक पान मसाले की व्यापारी के यहां मुनीमगिरी की नौकरी करनी पड़ी।

अब वहां पान मसाले में क्या-क्या मिलावट होती है, घटिया कत्था, सुपारी किस तरह मसाले में मिलाए जाते हैं, सारे राज फाश राधेश्याम जी बाहर खोलने लगे.......नौकरी तो जानी ही थी... पर राधे उर्फ चब्बन भइया को खुद पान मसाला चबाने से घृणा हो गयी उन्होंने इसके बाद सड़क-दीवारें पीक से रंगीन करना बंद कर दिया।

राधेश्याम जी की आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है। रिश्ते नौकरी सब छूट रहे हैं। मुहल्ले वाले अलग तफरीह करते हैं। टीन एजर्स उन्हें मि॰एस॰एच॰ (सत्यवादी हरिश्चन्द्र) कहकर चिढ़ाते हैं। बीबी के तानों से उनका दम घुटता रहता है। दोनों बेटे नफरत से देखते हैं।

अब राधे उर्फ चब्बन भइया करें तो क्या करें मुझे तो नहीं समझ में आ रहा कि उन्हें क्या सलाह दूं। आपको कुछ सूझ रहा हो तो बताइए, उन्हें बता दूंगी कि आजकर जीने का सही सलीका क्या है। मैंने सिर्फ इतना कहूंगी ............ ऐ मूरख, तुझे जीने का सलीका ही नहीं,

सच छुपाने के लिये है, या बताने के लिये।

अब आप कहेंगे कि राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया की कहानी में गुलजार (ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी) जी कहां से आ गए। हुया ये कि सर्दी के मौसम में हमें वो अपनी दास्तान सुनाने निकले थे उस वक्त धूप थी सो सच्चाई के जुनून से भरे राधे भाई ने स्वेटर नहीं पहना। कुछ ही देर बाद बदली छा गई, ठंडी हवा चलने लगी, तो कांपते हुए राधे भइया बोले, देखा बहन जी सच्चाई का साथ ऊपर वाला भी नहीं देता ससुरी ठंडी हवा भी अभी चलनी थी।

2 blogger-facebook:

  1. सच और राजनीति तो नदी के दो किनारे हैं. ये कभी नहीं मिल सकते. फिर सच्चा आदमी नेता बनने के लायक ही नहीं होता. व्यंग्य के लिए लेखिका को बधाई. दीनदयाल शर्मा, राजस्थान,
    htttp://www.deendayalsharma.blogspot.com

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  2. बेनामी4:55 pm

    Kaafin satik byanga mara hai Radhe bhaiyya ko mohra bana kar.Yeh to jahir kar hi diya ke humare samaj me abhi bhi Radhe Bhaiyya ji ki kami nahi hai aur sach yeh bhi ki woh bas isiliye sisak sisak kar ro rahe hain apni sachhai par. Shukriya aur badhai !!!Naya bangya baan aapke sachhai ki tarkash se phir kab bahar niklega?

    उत्तर देंहटाएं

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