गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – श्याम गुप्त का व्यंग्य : अंधी दुनिया

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(प्रविष्टि क्रमांक - 42)


क्या कहा ! अंधी दुनिया ! जी हाँ , आपके कर्ण पल्लवों ने ठीक ही सुना। वास्तव में बात यही है , सही है और कुछ भी नहीं है। आपने यूं तो बहुत से अंधे देखे होंगे पर आज हम आपको ऐसे 'ढाई घड़ी के अंधों ' की दुनिया से अवगत कराना चाहते हैं जो आपने देखते सुनते हुए भी नहीं देखी होगी।हो सकता है आप सोच रहे हों यह कलम तोड़ महामूर्ख 'बात का बतंगड़' ,'तिल का ताड़' बनाकर आपकी गणना भी अंधों में न कार दे।कहीं आप लेख को पढ़कर आपे से बाहर हो जायं तो इन पन्नों को सिगरेट सुलगाने में कदापि प्रयोग न लायें क्यूंकि ये शब्द सूक्ष्म -भाव होकर चाय या सिगरेट के धुएं के साथ समाहित होकर अंतर्मन में लीन हो जायेंगे। और यदि आप इन्हें अपने कम्प्यूटर मॉनीटर पर पढ़ रहे हैं तो और भी धैर्य रखें नहीं तो... वैसे भी, शब्द ब्रह्म है और अविनाशी ....| खैर आपतो स्वयं ही समझदार हैं ( अधिकतर लोगों के तो रिश्ते-नातेदार ही समझदार होते हैं) अतः आशा है आप ऐसा नहीं करेंगे।


हाँ, तो हमने कहा, अंधी दुनिया ! यह दुनिया वास्तव में ही अंधी है। आप कहेंगे वाह ! हम तो हैं ही नहीं। हमारे तो दो आँखें हें , बड़ी बड़ी, आकर्षक, प्रलोभनकारी. दूर तक देखने वाली, यहाँ तक कि दूसरों के कर्म व गुणों में छिद्रों का शीघ्र अन्वेषण कार लेतीं हैं। फिर हम कैसे......| पर श्रीमान ,हमारे अंधों की परिभाषा में तो बिना आँखों के अंधे थोड़े ही अंधे हें , अपितु आँखों वाले अंधे ही अंधे हैं। बिलकुल पूरी तरह दो आँखों वाले। जानना चाहते हैं तो राह चलते किसी से टकरा जाइए , अंधे की उपाधि पाइए और जान जाइए।


लीजिये , रास्ते चलते आप हमारे कहने से टकरा गए ( क्यों ?) , आपको शीघ्र ही चिरपरिचित शब्दों में उपाधियाँ प्राप्त होंगी ' अंधा है क्या' , 'दिखाई नहीं देता' , 'आँखें नहीं हैं बटन हें क्या ' , चश्मा लगा रखा है ,चार आँखें हैं फिर भी अंधे हो क्या ?' लीजिये हम तो अंधे बना ही दिए गए परन्तु हुज़ूर, आप भी क्या कम अंधे हैं , क्या आपको दिखाई नहीं देता कि हमारे आँखें हें या नहीं जो पूछते हैं।भाई क्या करें? यही है अंधी दुनिया की अंधी रीति।


आप किसी मित्र के घर पहुंचते हैं, वे छूटते ही कहेंगे ,अरे आप ! लो भई, क्या आप हमें टटोल कार ये पता कर रहे हैं कि ये हम हें। और आप भी सब कुछ देखते हुए भी' ढाई घड़ी के अंधे' होकर पूछ बैठेंगे कि 'कैसे हो', 'क्या कर रहे हो ?' और उत्तर भी उसी सुर-ताल में फ़टाफ़ट मिलता है जैसे वर्षों से सोच कर रखा हो , ' अजी कुछ नहीं '... समझ गए न।


अरे यह क्या ! आपके मन-मानस में क्रोध देवता का आविर्भाव होता जा रहा है। अब आप क्रोध में अंधे बनते जा रहे हैं। क्रोध में अंधों ने दुनिया में क्या-क्या कहर नहीं ढाया है। 'क्रोध पाप कर मूल'। दुर्योधन ने क्रोध में अंधा होकर द्रौपदी का चीर हरण कर डाला और रख डाली अपने कुल-नाश की नींव। द्रौपदी ने भी बदले के क्रोध में अंधी होकर महाभारत की रचना कर डाली। हम तो यही कहेंगे, क्रोध को तो आप त्याग ही दें श्रीमान !


कुछ आन्ह्कों वाले धन के मदांध होते हैं , कुछ यश में अंधे; और सत्ता के मद में अंधे तो संसार में जाने क्या क्या कुकर्म नहीं कर जाते।  'प्रभुता पाय काहि मद नाहीं' , राज्य मद में ही तो अंधा होकर नहुष ने इंद्राणी से विवाह प्रस्ताव रख डाला और स्वर्ग के राज्य से हाथ धोकर अधम योनि को प्राप्त हुआ। और काम मद में अंधेपन का क्या ही कहर है कि विश्व विजयी रावण को सीता के कारण कुल सहित नामो निशाँ से मिट जाना पडा। लोभी और लालची भी आँखों वाले अंधे हो जाते हैं। यहाँ तक कि उन्हें लोभ रूपी चश्मा लगाकर सभी एक से एक बड़े और अमीर दिखाई देते हैं --
          ""घर घर दोलत दीन ह्वै, जन जन जाँचत जाय|
दिए लोभ चश्मा चखनि , लघु पुनि बड़ो लखाय।|''


ये प्रेम भी बड़ी विचित्र वस्तु है। इसके अंधे का तो कोई इलाज़ ही नहीं। इन्हें तो सारा संसार ही एक सा दिखाई देता है| उंच-नीच, जाति-पांति, भेद-भाव , माँ- बाप, सभी को एक तराजू में तौल कर भुला देने को मन करता है। अपनी औकात भूलकर चाँद तारे तोड़ कर लाने का दम भरता है| चाहे कोई कितना भी नारकीय -पाप पंक मय क्यों न हो सारा विश्व 'सिया-राम मय, प्रेम मय ' लगता है।'सावन के अंधे ' को सर्वत्र हरा ही हरा सूझता है। इस रोग के अंधों पर तो कोटिभि ग्रन्थ व महाकाव्य लिखे जा सकते हैं। पर कुछ भी हो ये आँखों वाले अंधे कभी कभी बड़ी ऊंची बातें कर व कह जाते हैं| अपने तुलसी को ही लीजिये ,मुर्दे को नाव बनाकर तर गए यमुना पार,सांप को रस्सी समझ कर चढ़ गए प्रिया की खिड़की , डांट खाकर बन गए महाकवि तुलसीदास , रच गए " राम चरित मानस"| प्रेमी की धुन में अंधी 'गणिका' ने महाज्ञानी-ध्यानी ऋषि को ही तत्वार्थ-ज्ञान की राह दिखादी। आँखें ,मन और प्रेम की त्रिकल जोड़ी का अंधेपन से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। आँखें होते हुए भी शकुंतला महर्षि के आगमन को नहीं देख पायी और वर्षों के विरहानलव कष्टों की साक्षी बनी|


आजकल के स्वार्थ के अंधों की क्या कहें ! पूछिए ही मत ,अंधापन मानो युग चलन हो गया है| सत्ता वाले अंधे होकर त्राहि-त्राहि करती जनता , टूटी सड़कें,बुझी लाइटें,खुले मैनहोल ,अन्याय व बिकता न्याय नहीं देख पाते। नेता को वोट से अन्यथा कुछ दिखाई नहीं देता। पुलिस वाले को भले नागरिकों के गुनाहों से आगे ( क्योंकि वे सिर्फ डंडा फटकारने पर हीअपनी जेब ढीली करते हैं ) चोर,लुटेरे,बलात्कारी दिखाई ही नहीं देते| कर्मचारी रिश्वत के अंधे हैं, अधिकारी पद दुरुपयोग के। चिकित्सक को मरता हुआ मरीज़ व इन्जीनियर को वगैर सीमेंट का गारा व गिरती हुई बिल्डिंग नहीं दिखाई देती| व्यापारियों ,मिलावट खोरों ,धंधेबाजों को रोजाना मरते हुए लोग व बढ़ते हुए रोगियों की संख्या नहीं दिखाई देती| रह गए धर्मांध , उन्हें आतंकवाद के अलावा कुछ सूझता ही नहीं ,मरते हुए निर्दोष दिखाई ही नहीं देते| और तो और .. कहाँ तक कहें , हम स्वयं अंधे होकर सब कुछ देखते -सुनते हुए भी सब करते हैं, चुपचाप सब सहन करते हैं, अंधे होकर अंधेपन को बढ़ावा देते हैं|


तो पाठक गण ! हमें पूर्ण आशा है कि आप अंधी दुनिया से पूर्ण परिचित हो गये होंगे , और हमसे सहमत होंगे कि ' हम सब अंधे हैं'। यदि अब भी न समझे तो हम क्या करें , कहीं आप भी तो....| भई, बिना आँखों के अंधों का सहारा तो लाठी हो सकती है पर इन आँखों वाले अंधों का सहारा ....? ईश्वर ही मालिक है| यदि वे अपने अंतर्मन की आँखें खोल कर उसे देख सकें तो।नहीं तो सर्वत्र अन्धेरा ही अन्धेरा है। पर हमें पूर्ण आशा है कि शायद इसी अंधेरे से नई राह निकलेगी , क्योंकि सृष्टि से पहले भई चारों और मायावी अन्धेरा ही था---
           ''तम आसीत्तमसा गूढमग्रे अप्रकेतम सलिलं सर्वदा इदम ""
और फ़िर ॐ का प्रकाश हुआ । तभी तो कहा है ’ तमसो मा ज्योतिर्गमय’  और " ये अन्धेरा ही उजाले की किरण लायेगा "।
खैर तो पाठक गण ! आप हमसे सहमत हों या न हों ,पर बिना आँख वाले अंधे यदि इस लेख को पढेंगे तो अवश्य ही इतने सारे लोगों को अपनी श्रेणी में आया जान कर हमारी प्रशंसा करेंगे कि हम भई क्या दूर की कौड़ी लाये हैं।

                       -------- - डा श्याम गुप्त , सुश्यानिदी , के -३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२. मो.

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