रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

रवि भारद्वाज की कहानी - संस्था

Image075

'' जब दवा ही दर्द बन जाये,तो क्‍या किया जाये, समाज के उस श्रेणी के बच्‍चे जो फुटपाथ पर सोते हैं, जो बीनते हैं कूड़ा घरों से कूड़ा, दिन भर के मेहनत के बाद क्‍या पाते हैं, चौराहों पर लाल बत्‍ती पर खड़ी गाड़ियों पर कपड़ा मारते हैं कभी आप उन्‍हें कुछ दे देते हों और कभी नहीं । वो बच्‍चे जो चाय की दुकान पर मालिक की प्रताड़ना सहते हैं ग्राहकों के ताने सहते रहते हैं, दिन भर में उन्‍हें क्‍या मिलता है? किसी ग्राहक को छोड़ा हुआ समोसा, ब्रैड का पीस, और दिन भर खटते रहो कभी सोचा हैं आपने उनके बारे में, कितनी ऐसी कन्‍यायें है जिनकी माँ वैश्‍या हैं। क्‍या देता है ये सभ्‍य समाज उन्‍हें, हमारी संस्‍था सोचती हैं उनके बारे में, समाज के सभी वर्गों से हमारी अपील हैं कि हमारे साथ जुड़ें और इन बच्‍चों को जो समाज ने हाशिये पर ला खड़े किये हैं उन्‍हें भी मुख्‍य धारा से जोड़ें। कितनी बड़ी विडम्‍बना है हमारे समाज की़ ऐसा ही बल्‍कि इससे भी लम्‍बा भाषण था श्रीमती आशा तिवाड़ी का ।

मुझे भी उन्‍होंने अपने इस समारोह में आमंत्रित किया था । श्रीमती तिवाड़ी के भाषण के बाद तालियॉ बजी। नारे लगें और कितने ही लोगों ने समारोह स्‍थल पर ही (आन दी स्‍पाट) अपना पंजीकरण भी उनकी संस्‍था में करा लिया। उनके और उनकी जैसी अन्‍य कई संभ्रान्‍त महिलाओं ने उपस्‍थित जन समुदाय को अपने भाषणों और इन हाशिये पर खड़े बच्‍चों के लिये अपने आगामी कार्यक्रमों के बारे में बताया । लोगों के जोश को देख कर ऐसा प्रतीत होता था कि अब इन बच्‍चों के दिन बहुरने वाले हैं । फिर भी जैसा कि मेरी अपनी आदत हैं मैं तमाशा घुस कर देखता हूं ।

मुझे भी श्रीमती तिवाड़ी ने अपना पंजीकरण कराने के लिये कहा,

मैने कहा '' मैं घर का आदमी हूं मुझे आप इस संस्‍था से जुड़ा व्‍यक्‍ति ही समझिये आपकी संस्‍था द्वारा जो भी कार्यक्रम भविष्‍य में होने वाला है मैं अपना पूरा सहयोग तन मन धन से देने को तैयार हूं आपकी संस्‍था इन बच्‍चों के लिये जो भी कर रही है, सरकार की नीतियों के अनुरूप ही तो कर रही है किसी को भी ऐतराज उठाने का सवाल कहाँ पैदा होता हैं''?

''मुझे आपसे ऐसी ही उम्‍मीद है'' श्रीमती तिवाड़ी ने कहा।

उसके बाद सूक्ष्‍म जलपान का आयोजन था । सभी आमंत्रित व्‍यक्‍ति उस हाल की ओर मुड़ गये । क्‍योंकि मुझे एक अन्‍यत्र स्‍थान पर काम था मैने संस्‍था की अन्‍य महिलाओं से विदा मांगी । सभी का आग्रह था कि आप भी कुछ ले लें लेकिन मैने शालीनता पूर्वक मना कर दिया । बाहर पार्किंग से मैने अपना स्‍कूटर निकाला मुख्‍य द्वार पर खड़े दरबान ने मुझे नमस्‍ते किया । मैं मुख्‍य द्वार से बाहर आ गया । सड़क पर वही बच्‍चे खड़े थे किसी के हाथ में ब्रश और पालिस की डब्‍बी थी । किसी के कन्‍धे पर कूड़े से भरा थैला था । किसी के हाथ में गाड़ी साफ करने का झाड़न था । कोई कोई तो पेन्‍ट और ब्रश लिये (शायद वे बच्‍चे पोस्‍टर बनाने वाले थे) कोई डंडे पर गुब्‍बारे बांधे खड़ा था । इसी तरह के बहुत से बच्‍चे थे जिनके बारे में अन्‍दर इतनी गम्‍भीर मंत्रणा हो रही थी । वे बच्‍चे अन्‍दर घुसने की फिराक में थे लेकिन दरबान और स्‍वागत समिति के सदस्‍य उन्‍हें डांटकर, किसी को मारते और लतियाते हुये बाहर धकेल रहे थे ।

आपस में कह रहे थे ''इन मरदूदों को देखे जहां कहीं खाने पीने को मिलता हैं, इन्‍हें पता नहीं कैसे खबर लग जाती है, आ जाते हैं अपने रिश्तेदारों को लेकर ।''एक स्‍वागत समिति के सदस्‍य ने जोड़ा ''और दूसरे शहर में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को भी बुला लेते हैं'' ।

फिर एक समवेत ठहाका लगा ।

''आप ठीक कह रही हैं मिसेज रस्‍तोगी । शादी ब्‍याह के आस पास इतने मेहमान नहीं होते जितने ये भुक्‍क्‍ड़ बच्‍चे होते हैं, न जाने कब ऐसे लोगों से छुटकारा मिलेगा । इसी तरह की कुछ बातें मेरे कानों में पड़ी ।

मैं सोच रहा था कि इस शहर के इस वातानुकूलित हाल में इतनी बड़ी गम्‍भीर गोष्‍ठी में इन बच्‍चों को प्रतिनिधित्‍व कब मिलेगा, मिलेगा भी या नहीं।

शाम को जब मैं घर पहुंचा तो मेरी बेटी ने बताया कि तिवाड़ी आन्‍टी ने आज अपनी काम वाली की बच्‍ची को बहुत मारा ।

''अरे क्‍यों, वह तो बहुत छोटी हैं, और वह तो अपनी माँ के साथ आती है इनका छोटा बड़ा काम भी करती हैं, उसकी माँ ने कुछ नहीं कहा '' मैंने अपनी बिटिया से पूछा। उसकी माँ तो बस रो रही थी और कह रही थी कि ''कल से काम पर नहीं आऊंगी मेरा हिसाब कर देना'' ।

''पर उस लड़की का कसूर क्‍या था'' मेरा बगला प्रश्‍न था ।

बिटिया ने बताया कि ''उसने तिवाड़ी आन्‍टी के बाथरूम को यूज किया, इसके अलावा तो उसका कोई कसूर नहीं था '' ।

मैं सोच रहा था कि इतनी बड़ी संस्‍था का सदस्‍य न बनकर मैने कोई अपराध तो नहीं किया ।

---

RK Bhardwaj

rkantbhardwaj@gmail़com

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget