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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

नन्दलाल भारती का उपन्यास : चांदी की हँसुली

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जाड़े की रात । हाड़फोड़ शीत लहर। सियारों की चिल्‍लाहट । रह रहकर कुत्‍तों का रोना भय पैदा करने को काफी था । ज्‍यों ज्‍यों रात बढ़ती जा रही थी जाड़े का असर और अधिक होता जा रहा था । रह रह कर रिमझिम बारिस उपर से उसर की गलन से हाड़ हाड़ कांप रहा था । गुदरीराम ओलाव पर हाथ सेंक रहा था । उससे यह ठण्‍ड बर्दाश्‍त नहीं हो रही थी जबकि वह इसी गांव में पैदा हुआ था। जब उसे ज्‍यादा ठण्‍ड लगने लगती तो वह सोनरी की मां को आवाज देने लगता । वह बेचारी कुछ लकड़ी कण्‍डा और लाकर ओलाव में झोंक देती । जलती आग को वो निहाल होकर तापता । सोनरी की मां मंगरी को बोलता तुम कहीं ना जाओ यहीं आग के पास बैठो । वह बोलती अरे आग तापने से ही काम चलेगा क्‍या ।रोटी भी तो बनानी होगी । बच्‍चों को भूख लग रही होगी । ये जाड़ा तो रात में ही ज्‍यादा हाड़ फोड़ती है । ….>--- इसी उपन्यास से.संपूर्ण उपन्यास ई-बुक के रूप में यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ें.और भी ढेर सारे हिन्दी ई-बुक डाउनलोड की सूची यहाँ देखें

नरेन्द्र निर्मल के गीत व कविताएँ

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नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां उफ हू उफ हूं-3 नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हूं उफ हूं-2 ऐ मेरे खुदा तू सुनले जरा-2 बंगला गाड़ी दे और माल भी जरा उफ हू उफ हूं-3 नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हूं-3 उसको घुमा लाउं, चांद पे ले जाउं-2 जो वो मांगे चांद, चांद धरती पे ले आउं उफ हू उफ हूं-3 नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हूं-3 हर बाजी जीत जाऊंगा नई दुनिया बनाऊंगा-2 सब कुछ जो होगा पास में पर नौकरी मिलेगी कहां उफ हू उफ हूं-3 नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हू-3 ------जांबाजों की ढेर लगीमोमबत्तियाँ जली आंसू बहेंएकता का बिगुल बजानेताओं पर गाज गिरीनिकम्मों को सजा मिलीसबूत ढूंढे गएदोषी भी मिलेसजा देना मुकम्मल नहींलोहा गरम हैकहीं मार दे न हथौड़ापानी डालने के लिएअब कूटनीति है चलीलेकिन जनता जाग चुकी हैसवाल पूछने आगे बढ़ी हैपर शायद जवाबकिसी के पास है ही नहींजिन्होंने देश को तोड़ाजाति क्षेत्र मजहब के नाम परआज खामोश है वे सबमौकापरस्ती औरतुष्टिकरण की बात परच…

राकेश कुमार पाण्डेय की कविताएँ

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'माटी की परी' खेतों में माटी ढोती, इक अलहड़ सी बाला ने,
घर आ उतार कुदाल, माँ से कुछ ऐसे बोली ।
पेट क्षुधा के हाथों शोषित शैशव ने,
देख महल के ख्वाबों को, अपना मुंह कुछ ऐसे खोली । माँ वो कुंकुम, रोली, चूड़ी, कन्गन,
मुझको भी सारे श्रृंगार दिला दो ।
पायल की मीठी छम-छम बोली से,
मन मे भी मेरे, पलाश के टेशू सा इक बासंती शाम खिला दो ।
इन हाथों मे भी मेहँदी से कलियाँ और बूटे बनवा,
इक बार जरा महलों की गुड़िया सा माँ मुझको बनवा दो। पहन जरा मैं भी परियों सी बन जाऊं,
माँ मुझको भी ऐसी इक चोली सिलवा दो ।
मै भी इन पलकों को, घटा गगन सी स्याह बना लूँ ,
मेरे नयनों मे भी अंजन भर माँ मुझको सजवा दो ।
अपनी जुल्फों को उन्मुक्त हवा मे, मै भी लहरा लूँ,
मेरे सांवल अधरों को भी माँ, इक बार जरा सिन्दूरी रन्ग पिलवा दो । मेरी भी थोड़ी रंगत निखरा दे,
ऐसी ख्वाब दिखाने वाली, जन्नत की परियों से माँ मुझको मिलवा दो।
अपनी काया देख जरा मै भी खुद को भरमा लूँ,
अब की बार हाट से माँ मुझको, कोई ऐसी एक दर्पण दिलवा दो। सुन सब नम आँखों से, माँ ने बिटिया से कुछ ऐसे बोली,
घर का …

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के कुछ गीत

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***** गीत २कागा आया हैजयकार करो, जीवन के हर दिनसौ बार मरो... राजहंस कोबगुले सिखा रहेमानसरोवर तजपोखर उतरो... सेवा परमेवा को वरीयतानित उपदेशोमत आचरण करो... तुलसी त्यागोकैक्टस अपनाओबोनसाई बनअपनी जड़ कुतरो... स्वार्थ पूर्ति हितकहो गधे को बापनिज थूका चाटोनेता चतुरों... कंकर में शंकरहमने देखाशंकर को कंकरकर दो ससुरों... मात-पिता मांगेप्रभु से लड़केभूल फ़र्ज़, हकलड़के लो पुत्रों... ***** गीत ३मगरमचछ सरपंचमछलियाँ घेरे मेंफंसे कबूतर आजबाज के फेरे में... सोनचिरैया विकलन कोयल कूक रहीहिरनी नाहर देखन भागी, मूक रहीजुड़े पाप ग्रह सभीकुण्डली मेरे में... गोली अमरीकीबोली अंगरेजी हैऊपर चढ़ क्योंतोडी स्वयं नसेनी है? सन्नाटा छायाजनतंत्री डेरे में... हँसिया फसलेंअपने घर में भरता हैघोड़ा-मालीहरी घास ख़ुद चरता हैशोले सुलगे हैंकपास के डेरे में... ***** गीत ४सूरज ने भेजी हैवसुधा को पाती, संदेसा लाई हैधूप गुनगुनाती... आदम को समझाइंसान बन सकेकिसी नैन में बसेमधु गान बन सकेहाथ में ले हाथसुबह सुना दे प्रभाती... उषा की विमलतानिज आत्मा में धारदुपहरी प्रखरता परजान सके वारसंध्या हो आशा केदीप टिमटिमाती... निशा से नवेलीस्व…

सोमेश शेखर चन्द्र की कहानी : सफर

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बस रूकती, इसके पहले ही वह उससे कूद, रेलवे स्टेशन के टिकट घर की तरफ लपक लिया था। उसकी ट्रेन के छूटने का समय हो चुका था इसलिए वह काफी जल्दी में था। टिकट घर के भीतर पहुँचकर, यह जानने के लिए कि, किस खिड़की पर उसके स्टेशन का टिकट मिलेगा, जल्दी जल्दी, खिड़कियों के ऊपर टंगे बोर्ड पढ़ा था। ’’यहाँ सभी जगहों के टिकट मिलते हैं’’ वाली खिड़की पर नजर पड़ते ही उसकी आँखे चमक उठी थी और वह उसी तरफ लपक लिया था। टिकट घर की खिड़की के ऊपर टंगी घड़ी के मुताबिक, उसकी ट्रेन छूटने में, अब सिर्फ, तीन मिनट ही बाकी रह गए थे और इतने कम समय में टिकट कटवाना और दौड़कर ट्रेन पकड़ना, उसे बड़ा नामुमकिन सा लग रहा था जिसके चलते वह घबराया हुआ था और जल्दी से जल्दी टिकट कटवाकर, ट्रेन छूटने के पहले, उसे पकड़ लेने की उतावली में था। वैसे उसकी इस उतावली की एक वजह और भी थी वह यह कि, उसके घर की तरफ, दिन भर में सिर्फ यही एक ट्रेन जाती थी और इसके छूट जाने का मतलब था अगले चौबीस घंटे तक, बिना खाए पिए, खून जमा देने वाली ठंड में, स्टेशन पर ठिठुर ठिठुर कर अपनी जान देना। हालांकि ठंड से बचने के लिए वह, सभी मुमकिन उपाय कर रखा था, लेकिन जैसे जैसे शाम न…

कृष्ण कुमार यादव की कविता : हे! राम

हे रामएक बार फिरगाँधी जी खामोश थेसत्‍य और अहिंसा के प्रणेता की जन्‍मस्‍थली हीसांप्रदायिकता की हिंसा मेंधू-धू जल रही थीक्‍या इसी दिन के लिएहिन्‍दुस्‍तान व पाक के बंटवारे कोजी पर पत्‍थर रखकर स्‍वीकारा था!अचानक उन्‍हें लगाकिसी ने उनकी आत्‍माको ही छलनी कर दियाउन्‍होंने ‘हे राम' कहना चाहापर तभी उन्‍मादियों की एक भीड़उन्‍हें रौंदती चली गई।-----कृष्‍ण कुमार यादवभारतीय डाक सेवाएंवरिष्‍ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्‍डल, कानपुर-208001 kkyadav.y@rediffmail.comकृष्ण कुमार यादव की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग पर:http://www.kkyadav.blogspot.com

पुरू मालव का आलेख : प्रेमचंद की अज्ञानता या आलोचक की महामूर्खता

पाखी के दिसम्बर 2008 अंक में श्री रत्नकुमार साम्भरिया का एक लेख पूस की रात और प्रेमचंद की अज्ञानता प्रकाशित हुआ है। उसी संदर्भ में मेरा ये आलेख है। पूस की रात कहानी के माध्यम से रत्न कुमार सांभरिया द्वारा प्रेमचंद का बुद्वि-परीक्षण करना, निष्कर्ष स्वरुप उन्हें अज्ञान कथाकार घोषित करना तथा स्वयं की सर्वज्ञता प्रकट करना बहुत अच्छा लगा। जो लोग प्रेमचंद को महान कथाकार और उपन्यास सम्राट के नाम से जानते हैं इस लेख को पढ़कर उनकी आंखें जरुर खुल चुकी होगी कि प्रेमचंद इतने अज्ञान कथाकार थे जो ऋतुओं का चक्र भी नहीं जानते थे। लेकिन लगता है सम्पादक महोदय लेखक के विचारों से सहमत नहीं हैं। प्रकाशित लेख के पूर्व ही उन्होने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया है। प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का महान लेखक ही नहीं माना बल्कि उन्हे विश्व के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों के समकक्ष खड़ा कर दिया है। लेख के शीर्षक मा़त्र को पढ़कर कोई भी अनुमान लगा सकता है कि ये कितना विद्वेषतापूर्ण है। कहानी की कुछ तथ्यगत त्रुटियों को अज्ञानता कहना कहां की बुद्विमानी है। हंस के नियमित स्तंभ अक्षरशः में अभिनव ओझा विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशि…

गौतम कुमार ‘सागर’ की कुछ कविताएँ

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मंगल करने वाली मां,कहलाती है मंगला माँ !!एक निवेदन करुँ मैं तुमसेखड़ा हो कर दरबार में .मुझ पर थोड़ी करना कृपाखड़ा मैं भी कतार में .मैं देश रहूँ , परदेश रहूँ ,पर रहे तुम्हारा साथ माँ .अनजान डगर पे बिन तेरेरह जाऊंगा अनाथ माँ .सबको सफल करने वालीकहलाती सुसफला माँ !!---- * ----तू मंगला माँ कल्याणीजगतमातु महारानी .हर्ष का एक द्वीप तो दोचहुदिशी पानी पानी .---- * ----माँ पर मुझे भरोसा हैऔर स्वयं पर है विश्वास .एक दिन मुठ्ठी में होगासफलता का ये आकाश---- * ----बस इतनी कृपा करना माँ .अपने चरणों में रखना माँ .मेरे हृदय, मेरी आत्मा,रोम-रोम में बसना माँ .---- * ----1जीवन है एक सतत धारा चलना मानव की नियति है .मोह के रेशमी शिविरों में मत उलझाओ हृदय को .माया के मादक गंध सेमत बहकाओ हृदय को .पग-पग पर दस सहयात्रीमिलेंगे तुमको राहों में .कितनों का चेहरा कैद करोगेछोटी-सी निगाहों में ?अतीत बिसार भविष्य देखनावर्तमान की वही प्रगति है .पल-पल जो निचोड़ के जीताजीवन का वही रस लेता है .स्मृति अरण्य वासी को जीवन सर्प बन डस लेता है .कहो गर्व से तुम मानव होइस जगत की तुम रौनक हो .फिर अंधेरा अंतरतम क्योंतुम तो दिवा के …

नन्दलाल भारती का आलेख : वर्तमान समय में साहित्यकारों की भूमिका

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साहित्यकार आस्था विश्वास,सामाजिक न्याय एवं दर्शन को सदियों से हस्तानान्तरित करते एवं समय के संवाद को शब्द का अमृतपान कराकर मानव कल्याण हेतु लिपिबध्द करते आ रहे है । साहित्यकार कभी भी अपनी भूमिका से नहीं विचलित हुआ है । वर्तमान पीढ़ी के साहित्यकार समाज एवं राष्ट्र को सच्चे एवं अच्छे विचारों से सुदृढ कर रहे हैं। वर्तमान समय में साहित्यकारों की भूमिका और विस्तृत हुई है । साहित्यकार राष्ट्र एवं समाजोपयोगी चिन्तन के मुद्दे अपनी रचनाओं के माध्यम से सहज ही उपलब्ध करवाते जो समाज सुदृढ में मील के पत्थर साबित होते हैं । साहित्यकार अपनी भूमिका पर तटस्थ है । आजादी के दिनों में साहित्यकारों ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभायी । साहित्यकारों की कलमें जातीय-धार्मिक उन्माद,श्रेष्ठता-निम्नता, गरीबी -अमीरी से उपजी सामाजिक पीड़ा के आक्रोश को कम करने के मुद्दे पर खूब चली है और आज भी थमी नहीं है । संकट के दौर में साहित्यकार समय की नब्ज को पहचान कर लेखन कर रहे हैं । साहित्यकार सर्वमंगलकारी विचार के इतिहास रचते हैं । साहित्यकार महज रचनाकार ही नहीं होता । वह सद्भावना सभ्यता संस्कृति लोककथाओं और नेक परम्पर…

गणेश लाल मीणा की रपट : रेत पर उदयपुर में संगोष्ठी

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उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक डॉ. माधव हाड़ा ने भगवानदास मोरवाल के चर्चित उपन्यास रेत के संबंध में कहा कि समाजशास्त्रीयता इस उपन्यास का साहित्येतर मूल्य है। उन्होंने कहा कि अस्मितावादी आग्रहों से परे होने पर भी रेत की संवेदना हाशिये के समाज से इस तरह संपृक्त है कि उसे अनदेखा करना अनुचित होगा। डॉ. हाड़ा ने किस्सा गोई को उपन्यास के शैल्पिक विन्यास की बड़ी सफलता बताया।
    साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका बनास द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के डॉ. आशुतोष मोहन ने मोरवाल के तीनों उपन्यासों की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी उपन्यास अपनी पारम्परिक रूढ़ियों को तोड़कर नया रूप और अर्थवत्ता ग्रहण कर रहा है। डॉ. मोहन ने रेत की तुलना दूसरे अस्मितावादी उपन्यासों से किए जाने को गैर जरूरी बताते हुए इसकी नायिका रुक्मिणी को एक यादगार चरित्र बताया।
     संगोष्ठी में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के सह-आचार्य डॉ. मलय पानेरी ने रेत पर पत्र…

सीमा सचदेव का कविता संग्रह : मेरी आवाज भाग -2

भूमिका:- भाषा भावों की वाहिका होती है | मेरी आवाज़ भाग-२ उन भावों का संग्रह है जो समय-समय पर कहीं अंतरमन में उमड़े और लेखनी का रूप ले लिया |उसी लेखनी को आवाज़ देने के लिए प्रस्तुत है- मेरी आवाज़ भाग-२ |मेरी आवाज मेरे माता-पिता को एक छोटा सा उपहार है जिन्होंने मुझे आवाज़ दी |आशा है पाठकों को मेरा यह अति लघु प्रयास पसंद आएगा |(प्रस्तुत कविता संग्रह पीडीएफ़ ईबुक के रूप में यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ें)सीमा सचदेवमेरी आवाज़ ६० कविताओं का संग्रह है १.प्रणाम करूं तुझको माता२.प्यारे पापा३.प्रणाम तुझे भारत माता४.हे कान्हा अब फिर से आओ५.कविता के लिए वध६.प्यास७.भूख की अर्थी८.टीस९.असली-नकली चेहरा१०.माँ११आतंकवाद और आतंकवादी की माँ १२.पीड़ पराई१३.कलाकार१४.घर१५.नारी परीक्षा१६.पापी पेट१७.माँ का कर्ज़१८.माँ का सौदा१९.कठपुतली२०.अंधेरे से उजाले तक२१.सूर्य की इन्तजार में२२.अज्ञात कन्या २३.मुखौटा (क्षणिकाएँ )२४.लोकल ट्रेन२५.कसम से वो दर्द हम...२६.पापा (क्षणिकाएँ )२७.उधार की जिन्दगी२८.कचरे वाली२९.हम जलाने वाले नहीं३०.मकडी३१.गाय३२.हाय-हाय३३.मँहगाई३४.सिम्बोलिक लेन्गुएज३५.जब चेहरे से नकाब हटाया मैने३६.जिन्दगी है तो जिय…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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