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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य उपन्यास : असत्यम् अशिवम् असुन्दरम् (5)

“…आप कहेंगे ये सामान कहां से आये हैं। प्रयोगशाला कहां से आती है। तो इसका सीधा सपाट जवाब ये है कि क्यों नहीं आपको एक झापड़ मार दिया जाये ताकि आप और आप जैसे दूसरे लोग इस तरह के सवाल बूझना बन्द कर दें और अपने काम से काम रखें। अरे भाई नेता हैं तो क्या उनका निजि जीवन नहीं हो सकता और यदि निजि जीवन है तो आप उसमें तांका झाकी करने का क्या अधिकार रखते हैं।…” – इसी उपन्यास से.॥ श्री ॥ असत्यम्।अशिवम्॥असुन्दरम्॥।(व्यंग्य-उपन्यास) महाशिवरात्री। 16-2-07 -यशवन्त कोठारी86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 Email:ykkothari3@yahoo.com समर्पणअपने लाखों पाठकों को,सादर । सस्नेह॥-यशवन्त कोठारी(बेहद पठनीय और धारदार व्यंग्य से ओतप्रोत इस उपन्यास को आप पीडीएफ़ ई-बुक के रूप में यहाँ  से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं)(पिछले अंक से जारी…)व्यवस्था कैसी भी हो। प्रजातन्त्र हो। राजशाही हो। तानाशाही हो। सैनिक शासन हो। स्वेच्छाचारिता हमेशा स्वतन्त्रता पर हावी हो जाती है। सामान्तवादी संस्कार समाज में समान रूप से उपस्थित रहते हैं। कामरेड हो या कांग्रेसी कामरेड हो या केसरिया कामरेड या रूसी कामरेड या चीनी कामरेड या स्था…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य उपन्यास : असत्यम् अशिवम् असुन्दरम् (4)

“..उसने पढ़ रखा था कि सपने बुनने से कभी-कभी चादर, शाल, रजाई, अंगोछा आदि बन जाते हैं। वैसे भी सपने देखना-बुनना इस देश में बिल्कुल निःशुल्क था। सरकार चाहकर भी इन सपनों पर टेक्स नहीं लगा पा रही थी। सरकार का ध्यान आते ही कल्लू को अपने पिता के मृत्यु-प्रमाण-पत्र को प्राप्त करने में जो परेशानी आई थी, उसे सोच-सोचकर उसने झबरे से कहा।‘देखा सरकार को मेरे मरे बाप का प्रमाण-पत्र देने में भी मौत आ गई।'झबरा क्या जवाब देता। सफेदी कहीं रोटी, मांस के टुकड़े के लिए भटक रही थी। झबरा चुपचाप बैठा था।…” – इसी उपन्यास से.॥ श्री ॥ असत्यम्।अशिवम्॥असुन्दरम्॥।(व्यंग्य-उपन्यास) महाशिवरात्री। 16-2-07 -यशवन्त कोठारी86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 Email:ykkothari3@yahoo.com समर्पणअपने लाखों पाठकों को,सादर । सस्नेह॥-यशवन्त कोठारी(बेहद पठनीय और धारदार व्यंग्य से ओतप्रोत इस उपन्यास को आप पीडीएफ़ ई-बुक के रूप में यहाँ  से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं)(पिछले अंक से जारी…)माधुरी के मौहल्ले वाले स्कूल कम जूनियर कॉलेज के प्रिन्सिपल हांफ्ते हुए माधुरी के बंगले पर प्रकट हुए। शुक्लाजी की सांस फूलती देखकर माधुरी …

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