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March 2009
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मेरा और उनका रिश्ता तबका है जब हम दोनों एक साथ ऊपर नीचे की रसोई में एक ही वक्त कुंडी में डंडे से प्याज लहसुन कूटा करते थे और एक साथ अपनी अपनी ईमानदारी पर आंसू बहाया करते थे। डीए की कोई किश्त मिलती तो एक दूसरे के जी भर गले लगकर एक दूसरे को बधाई देते। बाद में वे वैष्णव हुए तो घर में ग्राइंडर ले आए, पर मैं कुंडी डंडे के साथ ही चलता रहा। चार दिन बाद वे फुली आटोमैटिक वाशिंग मशीन ले आए। पर मेरे घर में पटड़ी से कपड़े धोती मेरी पत्नी पसीना पोंछती रही, मेरे कबाड़ी के कुरतों के बटन और बाथरूम का फर्श तोड़ती रही। देखते ही देखते वे मालामाल हो गए। मैं आदमी होकर ही रो पीटकर चलता रहा, कभी इस लाले के उधार पर तो कभी उस लाले के उधार पर सगर्व पलता रहा। जबसे वे उपाधि धारक वैष्णव हुए तबसे कुछ ज्यादा ही मनचले भी हो गए। उनके चांदी कूटने के दिन रात शुरू। मुझे जब भी मिलते ,समझाते,‘यार! क्या रखा है कोरे आदमी होकर जीने में! ठाठ से जीना है तो मेरी तरह वैष्णव हो जा।’ पर मैं कोढ़ी नहीं समझा तो नहीं समझा।

उस दिन अपना होने के कारण उन्होंने मुझे फिर समझाया,‘ यार ! ये क्या हाल बना रखा है? कुछ लेता क्यों नहीं?’

‘लूं कैसे? बिना लिए ही शक की सुई मेरे ऊपर घूमती रहती है।’ मैंने अपने मन की व्यथा कही तो मुझे ही नहीं एक सच्चा दोस्त होने के नाते उन्हें भी रोना आ गया। मुझे तभी पता चला कि वक सच्ची को अब भी मेरे सच्चे दोस्त हैं।

‘ तो एक काम कर! मेरी मान और मेरी तरह वैष्णव हो जा।’

‘इससे क्या होगा! वैष्णव होना माने और मन को मार कर जीना।’

‘नहीं न यार! गए वो दिन। अब तो वैष्णव होना माने कपड़े उतार कर जीना।’ उन्होंने इधर उधर देखा और जब पाया कि आसपास कोई नहीं है तो जोर का ठहाका लगाया।

‘ मतलब!!!’

‘ मतलब, चैबीसों घंटे माथे पर बड़ा सा तिलक लगाना, शौचालय में भी राम राम रटते रहने का नाटक करना। दफ्तर में कोई काम करवाने आए तो उसकी ओर ध्यान न देकर धर्म कर्म की डींगें मारते हुए उसकी जेब पर अपना ध्यान केंद्रित करना। गले में रुद्राक्षों की माला, लंबी सी चोटी....’ बस, हो गया काम। महीने के लिए सौ का निवेश और हजारों की इनकम! फिर देखना चार दिन में ही अगर वारे न्यारे न हुए तो मेरा नाम बदल कर रख देना।’ वे कहते हुए कतई भी न झेंपे।

‘पर ये सब चीजें...’

‘बाजार में सब मिलता है,धोती से लेकर चोटी तक सब। कहे तो अभी मंगवा दूं ?’

‘पर क्या मुझे इस बदले रूप में लोग पहचान लेंगे?’ मन में शंका थी सो जाहिर कर दी।

‘पहचानेंगे क्या! लोग तो लोग,देवता भी आकर तुम्हारे चरण चूमेंगे।’

‘उसके बाद मैं सब करने के लिए अधिकृत हो जाऊंगा न!’मुझे अभावों से भरा घर लग्जरी वस्तुओं से भरता नजर आने लगा।

‘ हो जाएगा, सौ प्रतिशत। मुझे देख तेरे सामने खड़ा हूं। साक्षात् वैष्णव! जब से वैष्णव हुआ हूं न! पौबारह हैं। अब तो लोग भगवान पर शक कर सकते हैं पर मुझ पर नहीं। जबसे वैष्णव हो दफ्तर जाने लगा हूं खुल कर रिश्वत लेता हूं। पर क्या मजाल जो मुझ पर किसी को शक हो! मुहल्ले में सबसे बेईमानी करता हूं और वह भी निसंकोच! बाले काले कर कभी कभी इधर उधर मुंह भी मार लेता हूं। पर पत्नी की तो छोड़, औरों को भी मुझ पर आज तक शक नहीं हुआ। पहले पत्नी के सिर के बालों के लिए चम्मच भर तेल न होता था पर जबसे वैष्णव हुआ हूं हर चौथे दिन उसे तो उसे चार औरों को भी ब्यूटी पार्लर मजे से भेजता हूं। अच्छा, तो पूछ कैसे??’

‘कैसे??’ मेरा मुंह खुला तो खुला का खुला रह गया।

‘बस, ऐसे! ये वैष्णवपन का चोला जो है न! ये सब बुराइयों को अच्छाइयों का लेप लगा सबकी आंखें फोड़ देता हैै। और जनता तो वैष्णवों को हाथों हाथ उठाए रहती है।’कुछ देर तक वे कुछ चुप रहे। उसके बाद अपने कोट की जेब मुझे बताते बोले,‘ बता इसमें क्या हो सकता है?’ कह उन्होंने अपने गले में पड़ी रूद्राक्ष की माला को प्रोफेशनल टच दिया।

‘पहले तो मूंगफलियां हुआ करती थीं।’

‘वह भी पहली को! गए वो दिन यार! और आज ये चौबीसों घंटे काजू बादाम से भरी रहती हैं। काजू बादाम खा खाकर मेरा तो मुंह का स्वाद खराब हो ही गया इन जेबों का भी हो गया है। याद है न तुझे! पहले तो हमें यार औरों के मुंह से ही सुरा की खुशबू सूंघ तृप्त होना पड़ता था और आज घर में ही बार बना रखा है।’

‘पर यार! मेरे तो अभी भी वही हाल हैं।’

‘पहले कर्ज लेकर जीता था और आज बीसियों को सूद पर कर्ज देता हूं। कुल मिलाकर जबसे ये साला वैष्णव हुआ है न! सुरा, सुंदरी,संपत्ति के अंबार लगे हैं।’ कह वे मुस्कुराए तो मुस्कुराते ही रहे।

‘तो कोई कुछ कहता नहीं?’

‘वैष्णव हूं न! कौन कहेगा! पिटना है किसी को क्या वैष्णव पर उंगलियां उठाते हुए। दूसरे किसी को पूछने का वक्त है ही कहां किसी के पास। यहां तो लोगों के पास अपने लिए ही वक्त नहीं।’

‘पीठ पीछे भी नहीं?’

‘ आगे की सोच यार, आगे की। पीठ पीछे तो लोग भगवान को भी गालियां देते नहीं थकते।’’

‘सच??’

‘ आंखें ठीक हैं न तेरी?’

‘ हां तो!’

‘तो समाज में दिखता नहीं क्या?? जो जितने बड़े वैष्णव उनके उतने बड़े ठाठ।’

‘यार, आलू प्याज से नजरें हटें फिर तो कुछ और देखूं भी।’

‘अब तुझसे छिपाना क्या! अब तो मांस- मदिरा का नाम कोई मेरे सामने लेता भर है तो नाम सुनते ही मेरी जीभ मूत करना शुरू कर देती है और तब तक मूतती रहती जब तक वह मांस मदिरा का सेवन नहीं कर लेती। जो कोई आंख को भा जाती है तो तब तक चैन नहीं मिलता जब तक उसे अपने वैष्णवपन से नहला नहीं लेता। ज्यादा ही हुआ तो बाद में प्रायश्चित के लिए वैष्णवपन के तालाब में गोता लगाया और पाप मुक्त हो फे्रश हो गए। अब तो यार बस मजे ही मजे हैं। वैष्णवपन के इतने फायदे हैं कि मैं गिनाते गिनाते नहीं थकूंगा पर तुम सुनते सुनते थक जाओगे ।....तो शाम को घर आकर मुझसे दीक्षा ले लो और हो जाओ वैष्णव!’

‘तो दीक्षित अभी कर दो।’ मैं उनके चरणों में गिर पड़ा।

‘यार, इतने उतावले न हो! शुभ मुहूर्त में वैष्णव बनोगे तो सात पुश्तें तक तर जाएंगी।’

‘ हे गुरू! उतावला न हूं तो क्या करूं! मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वैष्णव होने के इतने लाभ हैं।’

‘इससे भी अधिक लाभ हैं गहराई से सोचो तो...’

‘ सच!!!’ मेरा मुंह एक बार खुला तो खुला का खुला रह गया।

कह वैष्णव मेरे पास से कमर मटकाते रेडलाइट एरिया की ओर हो लिए। कोई भला मानस मेरा आकर मेरा मुंह बंद कर जाए प्लीज!!

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अशोक गौतम

द्वारा-संतोष गौतम,निर्माण शाखा,

डॉ. वाय.एस. परमार विश्वविद्यालय नौणी-173230 सोलन ,हि.प्र.

yashvant kothari

राम के चरित्र ने हजारों वर्षों से लेखकों, कवियों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों को आकर्षित किया है, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें राम के चरित्र या रामायण की चर्चा न होती हो। राम कथा स्वयं में सम्पूर्ण काव्य है, संपूर्ण कथा है और संपूर्ण नाटक हैं। इस संपूर्णता के कारण ही राम कथा को हरिकथा की तरह ही अनन्ता माना गया है। फादर कामिल बुल्के ने सुदूर देश से आकर राम कथा का गंभीर अध्ययन, अनुशीलन किया और परिणामस्वरूप राम कथा जैसा वृहद ग्रन्थ आकारित हुआ। रामकथा के संपूर्ण परिप्रेक्ष्य को यदि देखा जाये तो ऐसा ग्रन्थ अन्य किसी भाषा में उपलब्ध नहीं हुआ है।

वैदिक साहित्य में रामकथा के पात्रों का वर्णन मिलता है। शायद राम कथा का प्रवचन उन दिनों थोड़ा बहुत रहा होगा। दशरथ, राम आदि के नामों का उल्लेख भी पाया गया है। सीता को कृषि की देवी के रूप में निरुपित किया गया है तथा एक अन्य सीता को सूर्य की पुत्री के रूप में दर्शाया गया है। सीता शब्द भी अनेक बार आया है। वैदिक साहित्य में रामायण से संबंधित पात्रों के नाम अलग-अलग ढंग से विविध रूपों में आते है, मगर ये आपस में संबंधित नहीं है। राम कथा की कथा वस्तु भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती है। बाल्मीकि कृत रामायण को सर्व प्रथम तथा प्रामाणिक ग्रन्थ माना जा सकता है। महाभारत में भी राम कथा का वर्णन है। अरण्य पर्व, द्रोणपर्व आदि में रामकथा का वर्णन है। बौद्ध साहित्य में भी रामकथा का विस्तृत वर्णन है। वास्तव में दशरथ जातक नामक ग्रन्थ को रामकथा का आधार ग्रन्थ माना जाता है। हजारों विद्वानों ने रामकथा को मूल रूप में व्याख्यायित किया गया है।

आदि कवि बाल्मीकि के जन्म से काफी पहले ही राम कथा का आख्यान प्रचलन में आ चुका था। वाल्मीकि ने इस कथा को आधार बनाकर रामकथा रामायण के रूप में पहली बार विस्तार से तथा समसामयिकता के आधार पर प्रस्तुत किया। रामकथा में मूल स्रोत के लिये, पाश्चात्य विद्वान ए वैबर ने दषरथ जातक को आधार माना है। दूसरा आधार होमर का माना गया है, मगर होमर की मूल कथा रामायण की कथा से काफी अलग है, अतः राम कथा का मूलाधार दो तीन स्वतंत्र आख्यान ही है, जिन्हे बाद में बाल्मीकि ने कथा सूत्र में पिरोकर रामायण के रूप में प्रस्तुत किया।

डॉ. याकोबी ने राम कथा का आधार दो भागों में विभाजित किया है जिन्हे ऐतिहासिक माना गया है जबकि दूसरे भाग में जो कथा है उसका मूल स्रोत वैदिक साहित्य में वर्णित देवताओं की कथाओं को माना है। रामकथा की ऐतिहासिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद है। एक तरफ नितान्त कल्पना को सहारा माना गया है तो दूसरी तरफ इसे ऐतिहासिक कथानक मानने वाले लोग हैं।

रामकथा का प्रारंभिक विकास कैसे हुआ होगा? वे कौन से कारक थे जिन्होनें मिलकर राम कथा का निर्माण किया होगा। वास्तव में रामकथा प्रारंभ से ही हमारी संस्कृति में फैली हुई है। रामकथा तीनों धर्मों यथा ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन में रुयायित की गई। अन्य साहित्य, संस्कृति तथा कला में भी राम कथा प्रभावशाली ढंग से निरुपित की गयी।

संस्कृत साहित्य में भी रामकथा का विस्तार से उपयोग किया गया। वाल्मीकि के बाद भी कई कवियों, लेखकों ने रामकथा को आधार बनाया। धार्मिक, साहित्य एवं ललित साहित्य दोनों में ही राम कथा को विकसित किया गया।

अन्य भारतीय भाषाओं में भी रामकथा को पर्याप्त स्थान दिया गया है। कम्बध कृत रामायण, रंगनाथ कृत द्विपद रामायण, तिक्कन कृत निर्वचनोतर रामायण, मोल्ल रामायण, रघुनाथ रामायण, रामचरितम, आनन्द रामायण, अध्यात्म रामायण, आदि प्रमुख रामकथा ग्रन्थ है।

सिंहली भाषा, कश्मीरी भाषा, असमियां आदि में भी राम कथा का वर्णन है। कृतिवास कृत रामायण बंगाली का प्रमुख रामकथा ग्रन्थ है। हिन्दी व अवधी का प्रसिद्ध रामकथा ग्रन्थ रामचरित मानस है, जिसके अन्य सभी ग्रन्थ फीके हैं।

रामकथा पर आधारित नरेन्द्र कोहली की उपन्यास श्रंखला भी पठनीय है।

मराठी भाषा में भावार्थ रामायण है जो एकनाथ द्वारा लिखी गयी है। उर्दू फारसी में भी रामकथाएं लिखी गयी हैं। अलबदायूनी ने रामायण का फारसी में अनुवाद किया है। रामायण मसीही भी जहांगीर काल में लिखी गई थी ।

तिब्बत रामायण, खोतानी रामायण, हिन्देषिया रामायण, मलयन अर्वाचीन रामकथा, जापान की रामकथा आदि भी उपलब्ध हैं।

रामकथा में कुछ है ऐसा जो सबको आकर्षित करता है। राजनीति, धर्म, आधुनिकता, देशी-विदेशी सब रामकथा से प्रभावित होते है। दुख सुख में, जीवन की सांध्य बेला में, असफलता निराशा, हताशा के क्षणों में आज भी हजारों हजार लोगों का एक मात्र अवलम्बन रामकथा ही है। जो वाल्मीकि कृत रामायण नहीं पढ़ समझ सकते। वे तुलसीकृत या अपनी भाषा की रामकथा पढ़ते हैं समझते हैं और अपने दुख दर्द को कम करते हैं। राम ही नहीं, रामायण के अन्य पात्र भी चरित्र चित्रण की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं और जब भी वे पढ़े जाते हैं तो लगता है कि संपूर्ण घटनाक्रम व्यक्ति के जीवन से ही संबंधित है। इसी कारण व्यक्ति को धार्मिकता के अलावा मनोवैज्ञानिक ढंग से भी रामकथा प्रभावित करती है। धर्म, राजनीति के अलावा रामकथा एक अत्यंत श्रेष्ठ आख्यान है और आने वाले हजारों वर्षों तक यह एक श्रेष्ठ आख्यान रहेगा तथा लेखकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर - 302002

फोन - 2670596

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खून की बूंद न गिरते हुए भी लोगों के जीवन में सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन लाने की व्यवस्था का अभिप्राय है-लोकतंत्र! डॉ. आंबेडकर.

कालेज के दिनों में एक कविता पढ़ी थी. कवि का नाम और कविता के आखर तो गड्डमड्ड हैं. ऐर-फेर के साथ बस कुछ शब्द दिलो-दिमाग में अटके हैं. कविता की पहली पंक्ति शायद यूं थी-देश रे देश....तेरे सिर पर कोल्हू.....इसे पेरेंगे जाट, बाह्मन, बनिया....! भारतीय राजनीतिक पटल पर वह इंदिरा गांधी और उनकी उग्र मनमानियों का युग था. मानवीय अस्मिता और जनाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले कलमकार, बुद्धिजीवी, विचारक, समाजप्रेमी, राजनेता वगैरह सभी गिरफ्तार किए जा रहे थे. स्वातंत्रयोत्तर भारत में स्वप्नभंग की आहत मानसिकता के बीच कवि ने इसको रचा था. भावुक मन से. संभवतः यह सोचकर कि लोग उसकी संवेदना को समझेंगे. कविता के मर्म तक जाकर, कुछ ऐसा करेंगे जिससे जनतंत्र की बदहाली कम की जा सके. लेकिन तीन दशक से अधिक बीत चुके हैं. कविता के माध्यम से कवि ने जो कामना की थी. जो स्वप्न उसने संजोए थे. मन को मारकर जो तंज कसा गया था, वह बेमानी सिद्ध हो चुका है. कवि की कामना के उलट स्थिति और भी बदतर हुई है. समाज में जातीय विभाजन और तत्संबंधी ऊंच-नीच की भावना गहराती ही जा रही है. लोकतंत्र की प्रबुद्धता के बड़े-बड़े दावों के बावजूद देश में जाति-धर्म और क्षेत्रीयता पर आधारित विभाजन और भी गहरा हुआ है. भीड़तंत्र में ढलकर वह अपनी मूल पहचान और संवेदना से दूर होता जा रहा है. और संसद...जाने दीजिए, सच सुनते ही ‘भलेमानस’ तिलमिला उठेंगे. जनमानस में सांसदों की हैसियत का अनुमान मात्रा इसी से लगाया जा सकता है कि पीछे जब आतंकवादियों ने संसद-भवन पर दबिश की तो दबे स्वर में हर शख्स यही कह रहा था कि आतंकवादियों को आखिर मरना तो था ही. काश! वे अपना काम ठीक-ठाक कर जाते. जहां जनप्रतिनिधियों के प्रति आमजन के ऐसे खयाल हों, वहां लोकतंत्र की वास्तविकता अपने आप समझी जा सकती है. कोढ़ में खाज यह कि एक ओर तो संसदीय लोकतंत्र, जाति एवं संप्रदाय आधारित ऊंच-नीच की भावना का शिकार होता होता जा रहा है, दूसरी ओर पीछे के रास्ते से पूंजीपति और धन्नासेठ संसद-भवन की सीटों को कब्जाते जा रहे हैं. जनप्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित स्थानों पर काबिज होते ही यह वर्ग सरकारी मशीनरी को स्वार्थानुरूप मोड़ने का प्रयास करता है. उधर अधिकांश लोग मान चुके हैं कि अपनी खामियों के बावजूद लोकतंत्र निर्विकल्प है. वस्तुतः अपने देश में जनता की लोकतांत्रिक प्रबुद्धता का दावा इतना बढ़-चढ़कर किया जाता है, कि बुद्धिजीवीवर्ग आमतौर पर उसकी खामियों पर चर्चा करने से भी कतराता है. इसी कमजोरी का फायदा उठाकर चुनाव में नागनाथ और सांपनाथ आमने-सामने होते हैं. विवश मतदाता को उन्हीं में से किसी एक को चुनना पड़ता है.

विद्वतजन कह सकते हैं कि नेताओं का पाप लोकतंत्र के मत्थे क्यों मढ़ा जाए. उन्हें भी तो जनता ही चुनकर भेजती है. एक तरह से वे हमारे लोकचरित्र का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. नैतिकता यदि लोकजीवन से ही नदारद है तो राजनीति में कहां से आएगी! फिर भारत में लोकतंत्र आज की बात नहीं. उसकी उपस्थिति तो सहस्राब्दियों से है; और शायद तभी से ऐसा ही चलता आया है. उनका दावा अकारथ भी नहीं है. वैदिक साहित्य में गणपति शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर हुआ है. इसका एक अर्थ गण अर्थात नागरिक भी है. तदनुसार गणपति का आशय नागरिकों द्वारा सर्वसम्मति अथवा सम्मति की बहुलता के आधार पर चुने गए प्रशासक से है. हिंदू परंपरा में गणपति को सभी देवताओं में अग्रणी, सर्वप्रथम पूज्य माना गया है. इस बात की प्रबल संभावना है कि इस शब्द की व्युत्पत्ति गणतांत्रिक राज्य में हुई हो. बाद में जब समाज में पांडित्य के नाम पर पोंगापन असर जमाने लगा, निहित स्वार्थों के लिए बुद्धिजीवी वर्ग राजशाही की चाटुकारिता में डूब गया, तब गणतांत्रिक पद्धति पर आंच आना स्वाभाविक ही था. परिणामस्वरूप गणपति का अर्थ भी रूढ़ होकर हाथी की सूंड वाला प्राणी हो गया. यह भी संभव है कि गणतंत्र के विरोधियों ने उसका मखौल उड़ाने के लिए यह व्यंजनायुक्त प्रतीक गढ़ा हो. राजशाही के चौतरफा साम्राज्य में यह यह स्वाभाविक भी था. गणतंत्र आधारित छोटे-छोटे राज्यों को छोड़ दें तो, भारत समेत पूरे विश्व में लोकतंत्र एवं समानता-आधारित बृहद समाज-रचना उन दिनों दूर की बात थी. इसलिए सोलहवीं शताब्दी में थामस मूर ने जब अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘यूटोपिया’ की रचना की तो उसमें गणतंत्र और समानता-आधारित समाज रचना पर तंज करते हुए उसका उपहास किया गया था. यह बात अलग है कि कालांतर में थामस मूर द्वारा दिया गया नया शब्द ‘यूटोपिया’ परिवर्तनवादियों की आंखों में नई उम्मीद, नया ख्बाब बनकर उभरने लगा था, जिससे आगे चलकर लोकतंत्र आधारित वास्तविक समाजों की रचना संभव हो पाई.

जो हो गणेश को देवता-प्रमुख के रूप में मिलने वाला सम्मान आज भी इस बात का द्योतक है कि गणपति का अभिप्राय समूह का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति से ही था। भारत में गणतंत्र की मौजूदगी के संबंध में बौद्ध ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्तंत में एक चर्चित कथा है. उसके अनुसार मगध-सम्राट अजातशत्रु वैशाली के सुख-समृद्धि से ईर्ष्या करते हैं; तथा उसे किसी भी भांति अपने राज्य में मिलाना चाहते हैं. सम्राट की ओर से महामात्य वर्षकार लिच्छिवी गणराज्यों पर हमला करने से पहले परामर्श के लिए महात्मा बुद्ध के पास जाते हैं. यह जानने के लिए कि विजय के लिए यह युद्ध क्या उपयुक्त रहेगा, यदि युद्ध हुआ तो विजयश्री किसका वरण करेगी-वर्षकार महात्मा बुद्ध आश्रम में पहुंचते हैं, लेकिन आचार्य को खुलकर जवाब देने के बजाय बुद्ध अपने प्रिय शिष्य आनंद को एक रूपक के माध्यम से समझाते हैं. वज्ज़िगणों की संघीय एकता की प्रशंसा करते हुए वे कहते हैं कि उनकी एकता और गणतंत्रीय निष्ठा जब तक अक्षुण्ण है, तब तक उन्हें युद्ध में कोई परास्त नहीं कर सकता. तत्कालीन भारत में लोकतंत्र की व्याप्ति की ओर संकेत करते हुए पाणिनी साहित्य के अध्येता वी. एस. अग्रवाल लिखते हैं कि उस समय देश-भर में नए-नए गणतंत्र स्थापित करने की जैसे होड़ मची हुई थी. विशेषकर उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित वाहीक देशों में नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य तो अपनी चरमस्थिति को प्राप्त कर चुका था, जहां केवल सौ परिवारों वाले गोष्ठ, स्वयं को स्वतंत्र गणतांत्रिक राज्य के रूप में स्थापित कर रहे थे. वैशाली, कौशांबी जैसे संपन्न राज्यों तथा कुशावती जैसे संपन्न नगरों का वर्णन जातक कथाओं तथा पालि साहित्य में अनेक स्थानों पर हुआ है। ये सभी राज्य गणतांत्रिक प्रणाली द्वारा शासित थे.

भारतीय गणतंत्र की पुरातनता के इन दावों में सचाई तो है, मगर वैशाली, कुशावती आदि राज्यों के बहाने जिस पुरातन गणतंत्र का दावा अक्सर किया जाता है, वह एक प्रकार का उदार कुलीनतंत्र ही था, जिसमें ब्राह्मण विशेषाधिकारयुक्त वर्ग था. गणसमूहों की दुर्बलता ही मानी जाएगी कि उनमें सामाजिक समानता पर विचार नहीं किया गया. हालांकि उनमें से अधिकांश बौद्धधर्म को अपना चुके थे, मगर सामाजिक वर्णक्रम में तब भी ब्राह्मणों का ही वर्चस्व बोलबाला था. गणसमूहों का प्रमुख प्रायः वही होता था, जो समाजक्रम में अपनी श्रेष्ठता का दावा करने में सक्षम हो. दरअसल प्राचीन भारत में गणतंत्र का जो स्वर्णकाल है, वही स्वतंत्र आर्थिक समूहों के चरम विकास का भी युग है. जब यहां परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक समूह अपने उत्कर्ष की चरमावस्था में थे. विभिन्न कामधंधों में दक्ष शिल्पकार, कारीगर छोटे-बड़े व्यापारिक समूहों में संयोजित होकर दूर-दूर तक व्यापार करते थे. इन्हें श्रेणी, पुग, नैगम व्रात्य, गण आदि कहा जाता था. वर्णभेद के आधार पर विभाजित समाज के निचले क्रम में कुछ गणतांत्रिक राज्यों की शासन व्यवस्था क्षत्रियों एवं कुछ की राजन्यों के अधीन थी, जो अपने वर्गीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते थे. राजन्यों में विभिन्न प्रकार के व्यापारी, सैनिक, शिल्पकार यथा कुंभकार, बढ़ई, जुलाहे, तैलिक, सार्थवाह आदि सम्मिलित थे, जो अपने श्रम-कौशल के बल पर जीविकोपार्जन करते थे. उनके संगठनों को राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर संगठन-प्रमुखों को राजदरबार में ससम्मान आमंत्रित किया जाता था. दूसरे शब्दों में प्राचीन भारत में गणतंत्र संपत्ति और संसाधनों के विकेंद्रीकरण की भी व्यवस्था रही है. वह एक युग-परिवर्तनकारी काम था. अगर उस समय समाज में जाति और वर्ग-संबंधी बंधन शिथिल पड़ जाते, तब संभव था कि पूरा देश गणतंत्र की वास्तविक मर्यादा को पा लेता.

उस कालखंड में समाज का अधिकांश हिस्सा राजशाही के अधीन था. बुद्धिजीवियों में से अधिकांश, विशेषकर प्रभुत्वशाली वर्ग यानी राजशाही के समर्थक थे. यहां तक कि चाणक्य जैसा महान बुद्धिजीवी भी प्रभुता-संपन्न केंद्र का पक्षधर था. इसी दौर में अपने वर्गीय हितों को ध्यान में रखते, प्रतिक्रियावादी रुख अपनाते हुए ब्राह्मणांे ने स्मृतियों और पुराणों की रचना की. धर्म का ऐसा ताना-बाना गढ़ा कि सामंतवाद सामाजिक चरित्र का प्रमुख लक्षण बन गया. इसके परिणामस्वरूप उन दिनों आम आदमी को न तो राजनीति से कोई मतलब था, न राजनीति के दरवाजे प्रत्येक नागरिक के लिए समानरूप से खुले थे. उसके लिए धर्म था. समाज में आपसी व्यवहार को नियमित करने के लिए समर्थन और वर्जनाएं थीं. इससे जाति और धर्म आमजन-जीवन का अभिन्न अंग बनते चले गए. यहां तक कि मनुष्य के व्यवहार एवं सिद्धांत का बड़ा हिस्सा इन्होंने कब्जा लिया. बौद्धधर्म ने कतिपय उदारतापूर्ण व्यवहार करते हुए जीवन को निरर्थक रूढ़ियों और कर्मकांडों से मुक्त करने की कोशिश अवश्य की. लेकिन समाज के जातीय विभाजन को छिन्न-भिन्नकर उसे समरस बनाने में वह नाकामयाब ही रहा. हां, उसके प्रभावकाल में विभिन्न शिल्पकार समूहों, छोटे-मोटे व्यापारियों को इतना अवसर जरूर मिला कि वे संगठित होकर व्यापार कर सकें. बावजूद इसके अनेक जाति-वर्गों में विभाजित समूहों के लिए, राजनीति दूरस्थ टापू और धर्म-संप्रदाय उसके लोकजीवन, घर-आंगन का हिस्सा बनते चले गए. इन्हें आचार-विचार और व्यवहार का हिस्सा बनाने तथा सत्ता और संसाधनों की केंद्रीय व्यवस्था को मिले समर्थन ने सामंतवर्ग को जन्म दिया.

सत्ता और संसाधनों पर एकाधिकार की भावना तथा अपनी खामियों को छिपाने के लिए धार्मिक मठाधीशों ने पाप-पुण्य की अवधारणाएं गढ़ीं. इससे धार्मिक जड़ता को प्रश्रय मिला और वर्गकेंद्रित विभाजन का आधार पुष्ठ होता चला गया. श्रमेत्तर सुख को वरीयता मिलने से समाज में परजीवी किस्म के वर्ग का उदय हुआ. अपनी स्थिति को मजबूत करने तथा लोगों को उलझाए रखने के लिए इसी वर्ग ने पारलौकिक सुख जैसी आधारहीन मान्यताओं को जन्म दिया. ईश्वर के बाद सम्राट को दूसरी प्रमुख सत्ता बताकर उसको समस्त कार्यकलापों का केंद्रबिंदु बना दिया गया. जिससे राज्य उत्तरोत्तर मजबूत होता चला गया. उस दौर का अधिकांश साहित्य सामंतवाद और राजा की भांड-स्तुति से भरा पड़ा है. विपुल संस्कृत वांगमय में एक ग्रंथ भी ऐसा नहीं है, जिसमें लोकतंत्र और जनाधिकारिता का खुलकर समर्थन किया गया हो, अथर्ववेद की एक लोकोन्मुखी प्रार्थना में यह जरूर कहा गया है-प्रजा सुखे सुख राज्ञः-प्रजानां च हिते हितम्... कि प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है, प्रजा के कल्याण से ही राजा का कल्याण संभव है. मगर इस बात की भी प्रबल संभावना है कि इस व्यवस्था का उपयोग सम्राट पर दबाव बनाए रखने और इस बहाने अपने वर्गीय हित साधने के लिए किया जाता हो. क्योंकि वैदिक एवं वेदोत्तर साहित्य में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता जब तत्कालीन वुद्धिजीवीवर्ग ने गणतांत्रिक मूल्यों अथवा जनसामान्य के अधिकारों की सुरक्षा के लिए व्यापक स्तर पर राजा का विरोध किया हो. जबकि धार्मिक मूल्यों की अवमानना पर सत्ता के विरोध के अनगिनत उदाहरण हैं. यानी जनतंत्र की उपस्थिति में भी उसकी मूल भावना के अनुरूप काम बहुत कम हुआ. इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनतंत्र एक छोटे से इतिहास खंड और कुछेक राज्यों तक सिमटकर रह गया. फिर जैसे ही समाज पर परंपरावादियों का वर्चस्व बढ़ा, जनतंत्र को निरंकुश राजतंत्र में ढलते अथवा उसका अंग बनते देर नहीं लगी.

जिस लोकतंत्र से आज हम सब परिचित हैं और जिसके तहत प्रत्येक हर चौथे-पांचवे वर्ष देश में लोकतंत्र के कुंभ को मनाया जाता है, उसकी अवधारणा मूल रूप से सतरहवीं शताब्दी में फ्रांस मे विकसित हुई. वहां भी लोकतंत्र का विकास औद्योगिकीकरण और समाज में पूंजी के बढ़ते वर्चस्व के विरुद्ध हुआ था. सामंतों और जागीरदारों ने पहले नई तकनीक का लाभ उठाने के लिए बड़े-बड़े कारखाने स्थापित किए, उनमें काम करने के लिए उन्हें सस्ते श्रम की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने बेहद कम दरों पर मजदूरों को भरती करना आरंभ कर दिया. तकनीक और मशीनों के चमत्कार ने कई वुद्धिजीवियों को भी उनके समर्थन में खड़ा कर दिया था. प्रौद्योगिकीय क्रांति का सबसे प्रबल समर्थक फ्रांसिसी बेकन था. उसको पूरा विश्वास था कि मानवीय श्रम की बचत करने वाली मशीनें ही अंततः मनुष्य की आजादी की वाहक सिद्ध होंगी, जिनका उपयोग कहीं भी और कभी भी, दूसरे उत्पादक कार्यों के लिए किया जा सकेगा. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ की अवधारणा में विश्वास रखने वाले बेकन का मानना था कि नवीन प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक चेतना प्रकृति के ऊपर मनुष्य की विजय का प्रतीक है. मगर उसका यह सपना बहुत जल्दी छिन्न-भिन्न होता नजर आने लगा था. औद्योगिकीकरण द्वारा तत्कालीन यूरोपीय समाज में आया परिवर्तन गुणात्मक था. उसकी ओर इशारा करते हुए सुप्रसिद्ध इतिहासकार सी. डी. एम. बेटलवी ने लिखा है-

‘औद्योगिक क्रांति से न तो विशेषाधिकार-युक्त वर्ग उत्पन्न हुआ, न इससे गरीबी आई और न इससे वर्ग-विभेदों को ही प्रश्रय मिला, किंतु औद्योगिक क्रांति ने निश्चित रूप से ऐसे साधन उत्पन्न कर दिए थे, जिनसे कुछ विशेषाधिकार और शक्तियां एक वर्ग के हाथों में केंद्रित होती चली गईं. दूसरी ओर ऐसे मनुष्यों का वर्ग था जो पैसे के लिए अपना श्रम बेचता था, जो अपनी जीविका और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अथवा पूंजी, लालसाओं, साहस और औद्योगिक प्रशिक्षण के अभाव के कारण, दूसरों की आर्थिक अधीनता में रहने के लिए विवश था.’

अभिप्राय यह है कि प्रौद्योगिकीय क्रांति ने तत्कालीन समाज में मौजूद वर्गभेद को और गाढ़ा करने करने का काम किया था, जिसकी मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर रूसो ने भी तीव्र शब्दों में आलोचना की थी. यह त्रासदी सिर्फ किताबी न थी. स्थिति उससे बहुत अधिक दारुण थी. अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लंदन के बुनकरों की दुर्दशा का वर्णन इ. पी. थामसन ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘दि मेकिंग आफ इंग्लिश वर्किंग क्लास’ में किया है-

‘उनके (बुनकरों के) घर का सारा साज-सामान, फर्नीचर आदि बिक चुका था। पहनने को केवल चिथड़े नसीब होते थे। प्रतिदिन सोलह-सोलह घंटे लगातार मेहनत करने वाले कारीगरों का इतना बुरा हाल था कि उन्हें आलू, प्याज, शकरकंद, दलिया, शीरे जैसी चीजों के सहारे पेट भरना पड़ता था...ऊपर से प्रदूषण का बुरा हाल था. वह लगातार बढ़ता ही जा रहा था. सार्वजनिक सफाई व्यवस्था बेहद खराब थी. 1848 में रोशडेल की मजदूर-बस्तियों में औसत आयु मात्रा इकीस वर्ष थी, जो ब्रिटेन के उस समय के राष्ट्रीय औसत से छह वर्ष कम थी...अपने एकमात्र वस्त्रों को गंदगी से बचाने के लिए औरतें, बच्चे को जन्म देते समय अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, दो अन्य औरतों के कंधों का सहारा लेकर खड़ी हो जाती थीं. उसी अवस्था में वे बच्चे को जन्म देती थीं. जो बुनकर अपनी बेमिसाल कारीगरी के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते थे, जो अपना समस्त जीवन पूरी दुनिया का तन ढकने के लिए कपड़े और बिस्तर आदि बुनने में लगा देते थे, उनके अपने शरीर पर फटे चिथड़े और बिस्तर पर गंदे तौलिये पड़े होते थे.’

इस घोर श्रम-शोषण के विरुद्ध जब लोकचेतना बढ़ी, पूंजीपतियों के विरुद्ध जब बहुत अधिक लिखा जाने लगा तो उन्होंने तकनीक का सहारा लेना आरंभ कर दिया. उस समय तक पूंजीपति वर्ग वैचारिक क्रांति, समाजवाद और समानतावादी विचारधाराओं का आलोचक था. मगर उच्च तकनीक से जब सघन उत्पादन होने लगा और उसको ठिकाने लगाने की समस्या खड़ी हो गई. दूसरी ओर शिक्षा और औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप लोगों की आमदनी में भी सुधार हुआ था-तब लोगों की बढ़ती खरीद-क्षमता का लाभ उठाने के लिए पूंजीपतियों ने व्यक्ति-स्वातंत्रय को समर्थन देना आरंभ कर दिया. दर्शन की प्रयोजनवाद, विज्ञानवाद, उपयोगितावाद, सुखवाद और अस्तित्ववाद जैसी शाखाओं का उद्भव इसी दौर की घटना है. इन सभी में जीवन को भौतिकवादी नजरिये से देखा गया था. मानवाधिकारों के प्रति समर्पण की उच्च भावना ने इसी दौर में चार्टिस्ट आंदोलन को जन्म दिया, जिन्होंने समाज में समान आधिकारिता के लिए लंबा संघर्ष किया था. चार्टिस्ट आंदोलन की शुरुआत 1838 में लोक-अधिकारपत्र (People Charter) के प्रकाशन के साथ हुई थी, जिसे विलियम लावेट और उसके साथियों ने तैयार किया था. उस अधिकारपत्र में 21 साल से ऊपर के नागरिकों के लिए समान मताधिकार, गुप्त मतदान की व्यवस्था जैसी कुल छह मांगें प्रस्तुत की गई थीं. अपनी मांगों के समर्थन में उन्होंने एक के बाद एक तीन देशव्यापी हड़तालें की थीं. पूंजीवादी राज्यव्यवस्था के विरुद्ध चलाए गए हस्ताक्षर अभियान में चार्टिस्ट आंदोलनकारी तीन करोड़ से ऊपर नागरिकों के हस्ताक्षर कराने में सफल रहे थे. ब्रिटेन में पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना की दिशा में वह एक बड़ा कदम था. आगे चलकर सरकारी दमन के आगे चार्टिस्ट आंदोलनकारी बिखरते चले गए. उन छितराए आंदोलनकारियों में से कुछ ने पारस्परिक सहयोग के माध्यम से उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत की, जिससे समाज में परिवर्तनकारी सहकारिता आंदोलन का सूत्रपात हुआ.

पूरब और पश्चिम में गणतंत्रीय प्रणाली के विकास के साथ जुड़ा अजब-सा साम्य यह है कि दोनों ही जगहों पर गणतंत्र का विकास आर्थिक-सामाजिक आत्मनिर्भरता की भावना से प्रेरित था. मगर धीरे-धीरे आर्थिक आत्मनिर्भरता की भावना प्रधान होती चली गई और सामाजिक समानता की ओर से या तो विद्वानों का ध्यान बिलकुल हट गया, अथवा उसे मात्रा नारे में सिमेटकर निपटा दिया गया. कुछ यह मानकर कि आर्थिक आत्मनिर्भरता सामाजिक लोकतंत्र का स्वप्न सच करने में भी सहायक होगी, विद्वतजन समाज में पूंजी के बढ़ते प्रभाव और उसके निरंकुश व्यवहार की ओर से आंखें मूंदे रहे. परिणामस्वरूप सामाजिक समानता की भावना जो लोकतंत्र का अभीष्ट थी, की ओर लोगों का कम ही ध्यान गया. आर्थिक उपलब्धियों को प्रमुखता देने वाले समूहों ने संगठित होकर राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने तथा तत्कालीन राजनीति में अपनी दखलंदाजी बढ़ाने का कार्य किया. चूंकि उनकी आर्थिक हैसियत लगभग एकसमान थी, वे न केवल इस आधार पर एकजुट होने के अभ्यस्त हो चुके थे, बल्कि जान चुके थे कि अपनी आर्थिक संपन्नता और एकजुटता के बल पर वे राजनीतिक गलियारों में सम्मान पा सकते हैं, और उसको प्रभावित भी कर सकते हैं. इसलिए उन्होंने गणतंत्र की शरण में जाना आवश्यक समझा. साथ ही निहित स्वार्थों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की भावना को उपभोग की विविधता एवं चयन की स्वतंत्रता के रूप में व्याख्यायित करना आरंभ कर दिया. शिक्षा समेत मानवीय विवेक को ऊंचाई प्रदान करने वाले अन्य उपादान अंततः व्यक्तिवादी चेतना और मुक्त उपभोग यानी बाजार के पैरोकार बनते चले गए. खासकर शिक्षा के व्यावसायिकीकरण द्वारा यह बात लोगों के दिमाग में बिठा दी गई कि उसका प्रमुख लक्ष्य मनुष्य को आर्थिक निर्भरता प्रदान करना है. इससे शिक्षा का लोककल्याणकारी चेहरा उत्तरोत्तर मैला होता चला गया. परिणामस्वरूप पूंजीवादी विस्तार के साथ-साथ अर्थसत्तावादी लोकतंत्र अपनी वैश्विक पहचान बनाता चला गया.

भारत के लिए लोकतंत्र में भले की पुरातन पद्धति रही हो, मगर यहां आरंभ से ही उसके नाम पर सामंतवादी, प्रतिक्रियावादी शक्तियां निहित स्वार्थों के लिए समानाधिकार की भावना का दोहन करती रही हैं. वे यह काम मनुष्य को जाति और धर्म के नाम पर विभाजित करके करती हैं. उनके बरक्स बाजार व्यक्ति-स्वातंत्रय की भावना का उपयोग मनुष्य को उपभोक्ता के रूप में ढालने के लिए करना चाहता है. स्वार्थ के लिए सामंतवादी-साम्राज्यवादी शक्तियां राजनीति को माध्यम बनाती हैं, और सत्ता में भागीदारी का लालच देकर समाज के विभिन्न वर्गों के अंतसंघर्ष को विस्तार देती हैं. दूसरी ओर पूंजीवादी शक्तियां बाजार और मीडिया के माध्यम से लोगों के दिलो-दिमाग पर इस तरह छा जाना चाहती हैं कि आम व्यक्ति उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ सोच भी न सके. वस्तुतः स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भारतीय समाज का एक लोकतांत्रिक चरित्र बन चुका था. या कहिए कि आजादी के संघर्ष के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने वाले लोग एक-दूसरे की भावनाओं को समझकर सहअस्तित्व के लिए कल्याणकारी निर्णय लेना सीख चुके थे. यह भी हो सकता है कि समाज की विघटनकारी स्वार्थी ताकतें जो सत्ता की करीबी का लाभ उठाकर अपना उल्लू सीधा करने में लगी रहती थीं, वे बदनाम होकर अपनी सामाजिक पहचान को धूमिल कर चुकी थीं और आमजनमानस पर उनका प्रभाव नगण्य था. दूसरे शब्दों में अशिक्षा के बावजूद समाज में पर्याप्त विवेकशीलता थी. लंबे संघर्ष, सहजीवन और सांस्कृतिक समरूपता ने लोगों को एकजुटता का अवसर दिया था, जिससे देश अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद हुआ था. इसी दबाव के कारण राजे-रजबाड़ों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा. यहां तक कि महात्मा गांधी को जातिप्रथा के बारे में अपना परंपरावादी दृष्टिकोण बदलते हुए दलितोद्धार जैसे सामाजिक समानतावादी मुद्दों को अपने कार्यक्रमों में सम्मिलित करना पड़ा. बहुख्यात तथ्य है कि वर्षों तक भारतीय स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी प्रारंभ में वर्गवाद के पोषक थे, मगर भारतीय राजनीति में डाॅ. आंबेडकर के बढ़ते प्रभाव ने समाज के शोषित एवं उत्पीड़ित वर्ग की आंखों में आत्मसम्मान एवं समानता का सपना रोपा था. उन दिनों इस वर्ग की आंखों में बदलाव की तीव्र वांछा और मन में जबरदस्त आक्रोश था, जिसकी उपेक्षा कर पाना गांधीजी के लिए भी असंभव ही था. डाॅ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के संयुक्त दबावों के चलते स्वतंत्र भारत की सरकार को सामाजिक आजादी को अपना संवैधानिक लक्ष्य घोषित करना पड़ा. तय किया गया कि राजनीतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक समानता का ऐसा वातावरण विकसित किया जाएगा, जिसमें प्रत्येक नागरिक खुद को स्वाधीन अनुभव कर सके. इसके लिए संविधान में नीतिनिर्देशक तत्वों को विशेषरूप से सम्मिलित किया था, जिनके बारे में डाॅ. आंबेडकर ने कहा था कि-

‘मेरे दृष्टिकोण में नीतिनिर्देशक तत्व का अत्यंत महत्त्व है. क्योंकि यह हमारा आदर्श आर्थिक लोकतंत्र प्रदान करता है. कारण हम संविधान की यंत्रणा के द्वारा सिर्फ संसदीय लोकतंत्र स्थापित नहीं करना चाहते. नीति-निर्देशक तत्वों द्वारा हम अर्थव्यवस्था और आदर्श समाज-व्यवस्था स्थापित करने की अपेक्षा करते हैं. इसलिए हमने जानबूझकर संविधान में नीतिनिर्देशक तत्वों का समावेश किया है.’

आजादी के बाद देश में विभिन्न दलों की सरकारें बनीं. लोकतंत्रीय व्यवस्था के चलते दलित एवं शोषित वर्ग के लोग भी सत्ता के शिखर पर पहुंचने में कामायाब रहे हैं. किंतु लोकतंत्र को लेकर जो आदर्शोन्मुखी कामना संविधान में की गई थी, व्यवहार में वह उस लक्ष्य से उत्तरोत्तर परे होता गया है. इस बीच भारत में दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति के नए स्वर उभरे, लोकतंत्र ने उन्हें अवसर दिया कि वे अपने मान-सम्मान और बराबरी के संघर्ष को राजनीति की जमीन पर भी आगे बढ़ा सकें. इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली, जिसके परिणामस्वरूप आज देश के अनेक प्रांतों में उन वर्गों की सरकारें हैं, जिन्हें पहले घोषितरूप में सत्ता से परे रखा जाता था, मगर समाज में जाति और संप्रदाय के नाम पर आए दिन होने वाले वाले झगड़े इस बात के प्रतीक हैं कि देश आज भी आजादी के लक्ष्य को पाने में नाकाम रहा है. अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के चलते ये वर्ग सत्ता में साझेदारी तो हासिल कर चुके हैं, मगर सामाजिक आजादी का लक्ष्य आज भी अधूरा है. हालांकि यह निर्विवाद सचाई है कि लोकतंत्र आज मौजूद शासनपद्धतियों में सर्वाधिक मानवीय और नैतिकता-संपन्न शासन-पद्धति है. इसलिए फिलहाल तो वह निर्विकल्प ही है. उसमें खामियां जरूर हैं, जिनका निदान खोजने की आज सर्वाधिक जरूरत है. देश-भर में लोकतंत्र के नाम पर चल रहे बाजारवाद, जातिवाद, संकीर्णतावाद के खेल को समझने के लिए हमें इसके शुद्धीकरण के प्रयास जरूर करने होंगे. इसके लिए छोटे-छोटे कस्बों से लेकर बड़े महानगरों तक लोगों को लोकतंत्र तथा नागरिक अधिकारों के बारे में परचाना होगा. उन्हें बताना होगा कि सामाजिक लोकतंत्र राजनीतिक लोकतंत्र से बड़ी और महत्त्वपूर्ण चीज है. स्वाधीन भारत में गांधीजी कांग्रेस को सक्रिय राजनीति से दूर रखकर जिस संकल्प की सिद्धि चाहते थे, वह कुछ ऐसा ही था. आज के भारत को सबसे ज्यादा जरूरत उसी की है. तभी स्वतंत्रता और आदर्श समाज की स्थापना का सपना सच हो सकता है. डाक्टर आंबेडकर के शब्दों में कहें तो-

‘मेरा आदर्श समाज वह समाज है जिसका आधार समता, स्वतंत्रता एवं भाईचारा है. और क्यों नहीं. भाईचारे पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है. मैं नहीं मानता कि किसी को कोई आपत्ति हो सकती है. एक आदर्श समाज परिवर्तनशील होना चाहिए. इसके अलावा ऐसे स्रोतों से परिपूर्ण होना चाहिए, जिनके द्वारा एक हिस्से में होने वाले परिवर्तन को दूसरे हिस्सों में पहुंचाया जा सके. एक आदर्श समाज में ज्ञानपूर्वक ढंग से संचारित एवं सहभागिता अनेक हित होने चाहिए. एक-दूसरे से मिलने के दूसरे तरीकों के साथ संपर्क के विभिन्न और मुक्त बिंदु होने चाहिए. दूसरे शब्दों में सामाजिक अंतःपरासण होना चाहिए. यह भाईचारा है, जिसका दूसरा नाम लोकतंत्र है.’

तो जरूरत लोकतंत्र को लोक के, आमजन के और अधिक निकट ले जाने, उसको आर्थिक जकड़बंदी से दूर रखने की है. विभिन्न समूहों, नागरिकों की आत्मनिर्भरता लोकतंत्र का अभीष्ट अवश्य है, मगर उसकी वास्तविक सिद्धि समरस एवं समानतापूर्ण समाज की स्थापना के बगैर अधूरी है. अतः समस्त बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों यहां तक कि व्यापारियों, पेशेवरों और सामान्य नागरिकों का यह दायित्व है कि वे जैसे भी हो लोकतंत्र की सिद्धि और समृद्धि के लिए समर्पण-भाव से काम करें. यही हमारा मनोरथ है, यही आज की जरूरत.

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रचनाकार
रविशंकर श्रीवास्तव
101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462002 (भारत)
कृपया ध्यान दें: (१) रचनाकार का प्रकाशन अवैतनिक अव्यावसायिक किया जाता है अतः रचनाओं के प्रकाशन के एवज में किसी तरह का मानदेय/रायल्टी प्रदान करना संभव नहीं है. ध्येय यह है कि उत्कृष्ट रचनाएँ इंटरनेट के माध्यम से जन जन को सर्वसुलभ हों. अतः रचनाओं के अप्रकाशित होने जैसा कोई बंधन नहीं है. प्रिंट मीडिया में पूर्व-प्रकाशित, चर्चित, पुरस्कृत रचनाएँ हो तो और अच्छा. इंटरनेट / अपने ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित रचनाओं को दोबारा रचनाकार पर या इंटरनेट पर अन्यत्र प्रकाशित करने का कोई अर्थ नहीं है, अतः कृपया ऐसी रचनाएँ न भेजें. 

यदि प्रकाशन हेतु ग़ज़ल / कविता भेज रहे हों तो कृपया कम से कम 10 कविताएं एक साथ प्रकाशनार्थ भेजें.
रचनाएँ भेजने से पूर्व वर्तनी  व व्याकरण इत्यादि की जाँच अवश्य कर लें.

(२) ई-मेल से रचना भेजने के पश्चात् कृपया एक सप्ताह इंतजार करें. उसके पश्चात् ही स्मरण दिलाएँ. कई दफा तात्कालिक व्यस्तताओं तथा अन्य रचनाओं के अनुक्रम के कारण तत्काल प्रकाशन नहीं हो पाता है. एक सप्ताह बाद किसी तरह की सूचना प्राप्त न होने पर रचना फिर से भेजें या सूचित करें क्योंकि कई मर्तबा जेनुइन ई-मेल स्पैम भी हो जाता है.

कृपया नीचे दी गई बातों का भी ध्यानपूर्वक पालन करें:

हिन्द युग्म में एक पोस्ट प्रकाशित हुई है - "किसी अन्य की रचना को अपना कहने का जोखिम ना लें, इंटरनेट आपकी चोरी पकड़ लेगा".  इसी तारतम्य में देखा जा रहा है कि इंटरनेट पर लगभग मुफ़्त में (आमतौर पर ब्लॉगों में) छपाई की सुविधा हासिल हो जाने के बाद अचानक हर कोई अपनी रचना हर संभव तरीके से इंटरनेट पर हर कहीं लाने को तत्पर दीखता है. देखने में आया है कि इंटरनेट पर रचनाकार अपनी रचना रचनाकार में प्रकाशित करने भेज रहा है तो साथ साथ साहित्य शिल्पी, हिन्द युग्म, अनुभूति-अभिव्यक्ति, सृजन-गाथा, शब्दकार और ऐसे ही दर्जनों अन्य जाल-प्रकल्पों पर भी अपनी वही रचनाएं प्रकाशनार्थ भेज रहा है. कुछ अति उत्साही किस्म के लोग अपनी ब्लॉग रचनाओं को एक-दो नहीं, बल्कि तीन-तीन, चार-चार जगह पर छाप रहे हैं. परंतु इसका कोई अर्थ, कोई प्रयोजन है? शायद नहीं. दरअसल, ऐसा करके हम इंटरनेट पर और ज्यादा कचरा फैला रहे होते हैं. आप सभी सुधी रचनाकारों से आग्रह है कि इंटरनेट पर रचनाएँ प्रकाशित करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें तो उत्तम होगा -

(1) यदि आपका अपना स्वयं का ब्लॉग है, तो उसमें पूर्व प्रकाशित रचनाओं को फिर से प्रकाशनार्थ न भेजें. इंटरनेट एक बड़े खुले किताब की तरह है. जिसमें सर्च कर किसी विशेष पृष्ठ पर आसानी से व तुरंत जाया जा सकता है. एक ही रचना को कई-कई पृष्ठों पर प्रकाशित करने का कोई अर्थ नहीं है. इंटरनेट पर अप्रकाशित (प्रिंट मीडिया में पूर्व प्रकाशित का तो स्वागत है) रचनाओं को ही इंटरनेटीय पत्रिकाओं को प्रकाशनार्थ भेजें. रचना एक ही इंटरनेट पत्रिका को भेजें. एक पत्रिका में प्रकाशित रचना को, अपवादों को छोड़कर, अन्य दूसरी पत्रिका में प्रकाशित न करवाएँ. आमतौर पर रचनाएँ जल्द ही प्रकाशित हो जाती हैं क्योंकि इंटरनेटी पत्रिकाओं में पृष्ठ सीमा इत्यादि का बंधन नहीं होता. आपको ईमेल से त्वरित सूचना भी प्राप्त हो जाती है. रचना के प्रकाशन के उपरांत आप चाहें तो अपने ब्लॉग में संक्षिप्त विवरण देकर उसका लिंक लगा सकते हैं.

(2) यह अवधारणा गलत है कि जितनी ज्यादा जगह में एक रचना प्रकाशित होगी उतना ज्यादा लोग पढ़ेंगे. 5-10 प्रतिशत शुरूआती हिट्स भले ही ज्यादा मिल जाएं, परंतु अंतत: लंबे समय में खोजबीन कर बारंबार पठन पाठन में वही रचना प्रयोग में आएगी जिसमें स्तरीय, सारगर्भित सामग्री होगी. लोगबाग खुद ही ब्लॉगवाणी पसंद जैसे पुस्त-चिह्न औजारों (भविष्य में ऐसे दर्जनों औजारों के आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता) का प्रयोग आपकी रचना को लोकप्रिय बनाने में करेंगे. अत: रचना इंटरनेट पर एक ही स्थल में प्रकाशित करें. यदि आपका अपना स्वयं का ब्लॉग या जाल-स्थल है तो आपकी रचना के लिए इंटरनेट पर इससे बेहतर और कोई दूसरा स्थल नहीं. यदि आप अपना स्वयं का डोमेन लेकर रचनाएँ प्रकाशित कर रहे हैं तब भी यह अनुशंसित है कि वर्डप्रेस या ब्लॉगर जैसे सदा सर्वदा के लिए मुफ़्त उपलब्ध प्रकल्पों के जरिए अपनी रचना प्रकाशित करें, व डोमेन पते से रीडायरेक्ट करें. कल को हो सकता है कि आप डोमेन का नवीनीकरण करवाना भूल जाएं, या फिर कोई पचास साल बाद आपके वारिसों को आपका डोमेन फालतू खर्च वाला लगने लगे.

(3) रचना ईमेल से भेजने के पश्चात् एक सप्ताह का समय दें. आमतौर पर इतने समय में इंटरनेटी पत्रिकाओं से प्रकाशन बाबत सूचना रचनाकारों तक पहुँच जाती है. उसके पश्चात् ही रचनाएं दोबारा भेजें. यदि संभव हो तो रचना दोबारा भेजने से पहले पूछ-ताछ कर लें, ताकि बार बार बड़ी फाइलों को अपलोड-डाउनलोड करने से बचा जा सके. आमतौर पर अच्छी प्रकाशन योग्य रचना को त्वरित ही प्रकाशित कर दिया जाता है. यदि रचना स्मरण दिलाने के बाद भी प्रकाशित नहीं होती हो तो कृपया अन्यथा न लें, क्योंकि बहुधा फरमा में नहीं बैठ पाने के कारण रचना प्रकाशित नहीं हो पाती. साथ ही हर रचना के बारे में प्रत्युत्तर की आशा न रखें. आधुनिक इंटरनेटी युग में सबसे कीमती वस्तु है समय. समयाभाव और साधनाभाव में बहुधा प्रत्येक को प्रत्युत्तर दे पाना संभव नहीं होता. अतः कृपया कृपा बनाए रखें. धैर्य भी.

(4) इंटरनेटी पत्रिका का स्वरूप, उसका तयशुदा फरमा, सामग्री इत्यादि को एक बार देख लेने के उपरांत ही अपनी रचनाएँ भेजें. इंटरनेट का प्रचार प्रसार चहुँओर फैलने से सामग्री की स्तरीयता में तेजी से कमी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. साथ ही, आमतौर पर इंटरनेट के साहित्यिक प्रकल्प रचनाकार जैसे स्थल राजनीतिक आलेख व टिप्पणियाँ प्रकाशित नहीं करते हैं, अत: इन्हें प्रकाशनार्थ न भेजें. इस तरह की तमाम सामग्री आप अपने ब्लॉग में बेधड़क प्रकाशित कर सकते हैं. यदि आपका ब्लॉग नहीं है तो, यकीन मानिए, ब्लॉग बनाना और उसमें लिखना बेहद आसान है. बाजू पट्टी में दी गई कड़ियों से और जानकारी प्राप्त करें.

(5) इंटरनेटी पत्रिकाओं के संपादकों से आग्रह है कि रचना के प्रकाशन से पूर्व वे रचना की कोई शुरूआती पंक्ति गूगल सर्च में डालकर देख लें कि वह कहीं पूर्व प्रकाशित तो नहीं है. यदि रचना पूर्व प्रकाशित है तो रचयिता को सूचित करें, और अपवाद स्वरूप कुछ विशिष्ट रचनाओं को छोड़ कर आमतौर पर इंटरनेट पर पूर्व प्रकाशित रचना को फिर से प्रकाशित न करें. पहले जब यूनिकोड प्रचलित नहीं था, तब एक ही रचना के शुषा, कृतिदेव, अर्जुन इत्यादि फोंटों में अलग अगल स्थलों पर प्रकाशित होने की बात तो ठीक थी, परंतु अब इसकी न तो जरूरत है, न ही प्रयोजन.
(6) यदि आप पुराने फ़ॉन्टों में लिख रहे हैं, तो इंटरनेट पर बहुत ही खूबसूरत ऑनलाइन फ़ॉन्ट कन्वर्टर यहाँ पर उपलब्ध है. उसमें अपनी रचना यूनिकोड में परिवर्तित करें, फिर गूगल डॉक में (यदि खाता नहीं है तो एक खाता खोल लें) हिन्दी वर्तनी की जांच (हालांकि यह उतना उन्नत नहीं है, मगर काम लायक तो है ही) कर लें. इस तरह से वर्तनी की जाँच कर ली गई, यूनिकोड में परिवर्तित रचना को प्रकाशनार्थ भेजें तो निश्चित तौर पर ऑनलाइन पत्रिकाओं के संपादक आपके अनुग्रही रहेंगे.

(7) एक बेहद महत्वपूर्ण बात - आप अपनी रचनाओं की वर्तनी, मात्रा इत्यादि की भली प्रकार जाँच परख कर प्रकाशनार्थ भेजें. जाल पर गूगल डॉक्स http://docs.google.com/?pli=1 पर हिन्दी की  बढ़िया  वर्तनी जाँच सुविधा है. इसका प्रयोग करें. यदि आपकी हिन्दी, आपको लगता है कि में सुधार की आवश्यकता है, तो अपने अन्य रचनाकार मित्रों जिनकी हिन्दी ठीक है उनसे एक बार परामर्श लेने में संकोच न करें. गलत वर्तनी युक्त रचनाओं को अस्वीकृत कर दिया जाएगा और इस संबंध में कोई पत्राचार नहीं किया जाएगा.

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(1)

हौसले हों गर बुलन्‍द . . .

बातें करता सागर की तो उसका दायरा बड़ा है,

तू नदी की बात कर, उसकी गोद में पला है।

मजबूत इरादों को बना, और खुद फौलाद बन,

तेरे साथ - साथ औरों का भी इसमें भला है।

जज्‍बाती होना अच्‍छी बात है, पर जज्‍बातों के,

साये में तो किसी का, जीवन नहीं चला है।

घबरा जाना, फिर किस्‍मत पे छोड़ देना सब कुछ,

ठीक है, कभी-कभी, पर सदा नहीं, तेरा भला है।

हौसले हो गर बुलन्‍द ‘सीमा' मेरी बात पे यकीं कर,

फिर कौन सा काम, कल पर किसी का टला है।

 

(2)

कोई मरहम नही रखता यहां ...........

मुझसे पूछ तो मैं सच बतलाऊं तुझको लोगो के पास,

अपने दुख और दूसरों की ख़ुशियों का हिसाब होता है।

घाव पे किसी के कोई मरहम नही रखता यहां पर,

सब के पास बस अपने जख्‍मों का हिसाब होता है ।

कहने दे जिसे जो कहता है बुरा मत माना कर तू,

ऊपर वाला अच्‍छे-बुरे सबका हिसाब कर लेता है।

कोई किसी का खुदा नहीं होता मत डरा कर किसी से,

सब का मालिक तो एक है जो खुद हिसाब कर लेता है।

इंसान की फितरत है अच्‍छे दिन भूल जाता है अक्‍सर वो,

गर्दिश में जो दिन गुजरे ‘सदा' उनका हिसाब रख लेता है।

(3)

ऊंचे दरख्‍तों के साये में . . . .

कुछ भलाई के काम कर, औरों के काम आ,

नाम चट्‌टानों पे लिख कोई मशहूर नहीं होता ।

आंखों में बसने के संग सांसों में पला हो जो,

फ़कत कह देने से वह दिल से दूर नहीं होता ।

खुद से खफ़ा है तू औरों से खुश क्‍या होगा,

मायूस दिल हो गर तो चेहरे पे नूर नहीं होता ।

ऊंचे दरख्‍तों के साये में छांव, चाहे न लगे,

लेकिन ठंडी हवाओं से वो दूर नहीं होता ।

ख्‍वाहिशों के समन्‍दर में लगाता है गोता हर कोई,

हकीकत का मोती सदा' हर मुठ्‌ठी में नहीं होता ।

(4) सदा उद्धार करती आई है . . . .

जब बहती निर्मल नदी हिम गिरि के करीब ही,

उसकी निर्मलता देख, गिरि भी अडिग रहते हैं ।

अनवरत बहते रहना, प्‍यासे को पानी देना कैसे,

कर लेती है सब सरिता, मन ही मन कहते हैं ।

छुपा के अन्‍तर्मन में रेत के ढेर उजली दिखती,

निर्मल जल इतना दिखता प्रतिबिम्‍ब कहते हैं ।

कहीं नर्मदा बन जाती है कहीं सरयू कहलाती ये,

गंगा-जमुना का जहां मिलन, उसे संगम कहते हैं ।

कितनों जीवों का जीवन संजोये अपने आप में,

पापियों को तार देती, इसमें स्‍नान से कहते हैं ।

शिव की जटा बिराजी ये, भागीरथ धरा में लाये इसे

ये सदा उद्धार करती आई है जग का सब कहते है।

 

(5)

सजाकर सपनों को तेरे . . . .

चाहत को तेरी गर मैने अपना बनाया होता,

सपनों को तेरे अपनी आंखों में सजाया होता ।

सजाकर सपनों को तेरे, तुझे प्‍यार के झूले में,

हमसफर अपनी वीरान राहों का बनाया होता ।

तेरी खामोश आंखों से मैंने नजरे मिलाकर,

की होती बातें तुझे हाले दिल बताया तो होता ।

तेरा वो खामोश रहकर कहना दिल की बातें,

तेरे दिल को मैने अपना राजदार बनाया होता ।

पल दो पल की खुशियां पाकर उनको फिर खो देना,

खेल तकदीर के ‘सदा' मैं पहले समझ पाया होता

 

(6) चाहत नाम है वफ़ा का . . . . .

नजर से नजर मिलने का कसूर इतना ही होता है,

दीवारें कितनी भी उठाए कोई एतराज नही होता है।

आ गया जो दिल किसी पे तो क्‍या करेंगे आप,

इश्‍क को देखिए हुस्‍न का मोहताज नहीं होता है ।

जोश, और जुनून का आलम होता है दिल में हरदम,

कदम कितना भी आहिस्‍ता उठे बेआवाज नहीं होता है।

चाहत नाम है वफ़ा का, ये ज़ज्‍बा, नेमत है खुदा की,

छुपाये कोई कितना भी पर यह राज नहीं होता है।

राजा रंक न जाने ये, जात-पात न माने ये, चाहत में,

मानो तो कोई किसी का ‘सीमा' सरताज नहीं होता है।

 

(7)

नाम तेरा लेते ही . . . .

जब तक हम साथ हैं हंस लेते हैं,

हो के दूर भी हमें मुस्‍कराना है।

शिकवा शिकायत जाने भी दो,

रुठे हैं जो उनको भी मनाना है।

आओ उमंग की बातें करते हैं

फिर मुझको तुमसे दूर जाना है।

आंख में आंसू भर आते हैं जुदाई में,

इनको छलकने से भी तो बचाना है।

नाम तेरा लेते ही ‘सदा' चमकती आंखे,

तेरे दीदार का भी लुत्‍फ तो उठाना है।

 

(8)

लगन जब सच्‍ची हो . . . .

अरमानों की मेंहदी लगाना मेरे नाम वाली,

सजी है वादों की डोली जो यहां तेरे लिये ।

प्रीत की रस्‍में होगी मिलन की कसमें भी,

लाया हूं मनुहार की वरमाला तेरे लिये ।

आंगन में तेरे सितारे भी गवाह है चांद भी,

भरुंगा मांग तेरी जो होगी तू सिर्फ मेरे लिये ।

ये सात फेरों का बंधन बांधेगा मन से हमें ऐसे,

होंगे आज से हम एक सिर्फ एक दूजे के लिये ।

हसरतें पूरी हो जाती सारी लगन जब सच्‍ची हो,

तेरा हर ख्‍वाब ‘सदा' मेरा होगा मैं हूं तेरे लिये ।

 

(9) चुरा लिये जिन्‍दगी ने . . . .

हसरतों के समन्‍दर में जब - तब,

एक नई हसरत जन्‍म लेती रही ।

चुपके से उसको बहला दिया मैने जब,

देख बेबसी मेरी वो भी दफन होती रही ।

घुटन, दर्द, आंसू भी उसके न हुये जब,

पल- पल वो पराई खुद से होती रही ।

लुटा दिया उसने यूं तबस्‍सुम का खजाना,

खोखली हंसी से खुद ही आहत होती रही ।

चुरा लिये जिन्‍दगी ने हर हंसी पल उसके,

फिर भी ‘ सदा' वो उसकी बन्‍दगी करती रही ।

 

(10)

बंदिशें लगा के देखा है मैने . . .

दर्द से मेरा रिश्ता बहुत है पुराना,

आंसुओं का भी है यहां आना-जाना ।

कुछ अश्‍क दूर तक आ के, ठहर जाते हैं तो,

कुछ का काम होता है, केवल छलक जाना ।

सुनाता हूं दास्‍तां जब अधूरे प्‍यार की, कहता हूं,

बन्‍द कर दो अब तो यूं अपना आना-जाना ।

तमाम बंदिशें लगा के देखा है मैंने उस पर,

न बंद हुआ उसका, मुझे यूं सरेआम रुलाना ।

तनहाई के साये में ही ‘सदा' गुजरा मेरा हर पल,

शान में था उसकी हर महफ़िल की जान बन जाना ।

 

सीमा सिंघल, रीवा (म.प्र.)

 

yashvant kothari

आखिर हिम्‍मत कर के मैंने स्‍वैच्‍छिक सेवा निवृत्‍ति ले ही ली। काफी पुरानी परम्‍परा है हिन्‍दी में। जिन्‍दगी भर नौकरी कर के समय पूर्व अवकाश लेकर हिन्‍दी की सेवा करने की। मैंने भी इसी परम्‍परा का निर्वहन किया है। अब समय से उठने , तैयार होने , संस्‍था जाकर पढ़ाने की जिम्‍मेदारी से पूर्ण रूप से मुक्‍त हो गया हूं। अब बस कागज , कलम , पुस्‍तकें , लेख , कहानियां , कविता और बस ऐसे ही दूसरे काम। अब बस लिखो। पढ़ो !छपो, छपाओ ! पुस्‍तकाकार करो। प्रकाशकों के, सम्‍पादकों के चक्‍कर लगाओ। दूरदर्शन, आकाशवाणी के आगे पीछे घूमो। किसी संस्‍था से सम्‍मान का जुगाड़ करो। यही तो सब साहित्‍य की सेवा का मेवा है।

वास्‍तव में मैं काफी समय से सेवानिवृत्ति के लिए प्रयासरत था , अवसर आया , मैंने त्‍यागपत्र लिखा और दे दिया। मगर काफी दिनों तक कोई सुनवाई नहीं हुई। सरकार ऐसी चीजों की चिन्‍ता भी नहीं करती। कोई आये या जाये सरकार के क्‍या फरक पड़ता है। फरक मेरे पड़ता था सो मैंने एक स्‍मरण पत्र दिया। मंत्रालय ने तुरन्‍त कार्यवाही की ओर मुझे दो दिन में ही सेवानिवृत्ति की स्‍वीकृति दे दी। उस दिन सब कुछ सुहाना सुहाना था। छात्र-छात्राएं मेरी विदाई की तैयारियां , कर रहे थे , अध्‍यापक साथी , अपने विदाई भाषण तैयार कर रहे थे। बाबू लोग मेरे गुण गा रहे थे। विदाई शानदार थी। शानदार नाश्‍ता। शानदार सजावट। शानदार भाषण। सच पूछो तो मुझे इसी दिन पता न चला कि मैं इतना महान इतना प्रतिभाशाली और छात्रों का प्रिय अध्‍यापक था। मुझे स्‍मृतिचिन्‍ह , साफा , गुलदस्‍ते , फूल मालाएँ दी गई। एक अभिनन्‍दन पत्र भी मुद्रित कर के मेरी सेवामें प्रेषित किया गया। छात्र-छात्राओं का उत्‍साह देखने लायक था। वे मेरा आशीर्वाद लेने को आतुर थे। मैंने भी कोई कंजूसी नहीं बरती। मैंने अपने विदाई भाषण में छतीस वर्षों का अनुभव बयां किया। मुझे नौकरी के प्रारम्‍भिक दिन याद आये मैंने अपने गुरूओं माता पिता तथा पुराने साथियों का आदर के साथ स्‍मरण किया भविष्य में सहयोग का वादा किया। साथियो ने मेरी कर्तव्‍यपरायणता , ईमानदारी के पुल बान्‍धे। मुझे प्रसिद्ध लेखक बताया। धीरे धीरे विदाई समारोह पूरा हुआ। मैं एक मित्र की कार में धर आया। पत्‍नी ने आरती उतारी। मैंने सांयकाल मित्रों को डिनर पर बुलाया। मित्रों ने शाल ओढ़ाकर मुझे सम्‍मानित किया। मैं अभिभूत था। आनन्‍दित था। धीरे धीरे उत्‍साह समाप्‍त हुआ। अब केवल यादें रह गई। न प्रयोगशाला, न तकनीशियन ,न छात्र ,न छात्राएं ,न शोध प्रोजेक्‍ट, न बीकर न टेस्‍ट ट्‌युब न ब्‍यूरेट , न मीटिंगें , न फाइलें न किचकिच न काम चोरी न बाबुओं की उपेक्षा न चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की चिरोरी अब सब कुछ निवृत्त हो गये। किसी के कक्ष में जाने की आवश्‍यकता नहीं अपनी मरजी का मालिक मैं स्‍वयं मैं ․․․․मैं और केवल मैं।

न शोध , न चाक , न डस्‍टर , न ब्‍लेकबोर्ड , न प्राचार्य का डर , न विभागाध्‍यक्ष का खौफ , न छात्रों के प्रश्‍न , न छात्राओं की हंसी। सब कुछ पीछे बहुत पीछे छूट गये। सेवानिवृत्ति के लाभों के लिए भी चक्‍कर नहीं लगाने पड़े , सब समय पर मिल गये। काश स्‍वैच्‍छिक सेवा निवृत्ति नहीं लेता कुछ और मौज मार लेता। मगर मन तो साहित्‍य में रमता है न। सो मन की मान ली।

कभी मन हुआ तो राजनीति के फटे में अपनी टांग अड़ा लूगां। या कभी शुद्ध पत्र कारिता करने लग जाउगां मगर फिलहाल केवल कुछ स्‍तम्‍भ लेखन करना ठीक रहेगा। लिखा और भेज दो ऐसा सोच कर ही कागज - कलम ले लिए है।

बच्‍चे अक्‍सर फोन पर पूछते है पापाजी आजकल टाइम पास हो जाता है। मैं आनन्‍द से जवाब देता हूं टाइम है ही नहीं वही पुराना नित्‍यकर्म चल रहा है कालेज का समय लेखन में चला गया है। एक बच्‍चे ने कहा लेखक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता है , वो तो अन्‍तिम दम तक लिखता रहता है , लिखना ही उसकी नियति है।

गली-मोहल्ले की महिलाएं पत्‍नी से पूछती ‘ अभी से ही सेवानिवृत्ति ----- इतने बूढ़े तो नहीं लगते। कामवाली बाई ने कहा … अभी से ही धर में बैठ जाओगे तो खाओगे क्‍या ? उसका प्रश्‍न वाजिब था। पत्‍नी ने कोई जवाब नहीं दिया। सेवा निवृत्ति के बाद गली में ताश , शतरंज , चौपड़ खेलने वाले बहुत ही कुछ लोगो ने सामाजिक कार्यो का बीड़ा उठा लिया है। सफाई , नल , बिजली , सड़क की शाश्‍वत समस्‍याओं पर ये लोग चिन्‍तन करते है , अधिकारियों को पत्र लिखते हैं और जवाब का या कार्यवाही का इन्‍तजार करते हैं।

सेवानिवृत्ति के संकटों का भी कोई अन्‍त नहीं है। मन ही मर जाता है। शरीर भी धीरे धीरे साथ छोड़ने लग जाता है। स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याएं भी उभर आती है। समाज , परिवार , परिवंश भी उपेक्षित समझने लगता है। बाबा तुम्‍हारा समय गया। अब रामराम भजो। सरकार , समाज भी दया का पात्र समझने लगती है। वास्‍तव में व्‍यक्‍ति सेवानिवृत्ति के दिन का इन्‍तजार नौकरी की शुरूआत के साथ ही करने लग जाता है। कई बार वो अधिवार्षिकी की आयु में वृद्धि की सुखद कल्‍पना करता है कभी खुद ही अपनी सेवा वृद्धि के उपाय करता है और कभी किसी दूसरी वृति की तलाश में भटकने लग जाता है। और इस भटकाव का कोई अन्‍त नहीं है।

मेरे कई मित्र भी सेवानिवृत्त है। कुछ टायर्ड कुछ रिटायर्ड है और कुछ अभी भी केवल टायर है। एक पुलिस अधिकारी सेवा निवृत्ति के बाद राधा बन गये। कृष्ण के इश्क में पागल हो गये। वैसे भी बुढ़ापे में रोमांस की आवश्‍यकता ज्‍यादा होती है। एक अन्‍य मित्र बोले प्‍यार सेवानिवृत्ति के पैसे से बेटी की शादी करूंगा फिर हरिद्वार में बस जाउँगा। एक अन्‍य मित्र बोले मैं तो राजनीति में कूद पड़ूंगा। ये सबसे चोखी जगह है। एक और सेवा निवृत्ति के बाद बच्‍चों के पास जाकर रहने की सोच रहे थे कि बच्‍चे ही आ गये और सेवा निवृत्ति के लाभों को लेकर झगड़ने लगे। एक अन्‍य सज्‍जन पत्‍नी के साथ तीर्थों पर जाना चाहते थे मगर घुटनों का दर्द , कमर का दर्द ,उच्‍च रक्‍त चाप मधुमेह , गठिया आदि ने ऐसा झकड़ा की खाट ही पकड़नी पड़ी।

सेवानिवृत्ति के संकटों की माया अनन्‍त है , यह कथा कभी खतम नहीं होती है।

सेवानिवृत्ति की उम्र राजनेताओं पर भी लागू होनी चाहिये। सेवानिवृत्ति विज्ञान पर भी शोध की आवश्‍यकता है। वैसे भी राजनेता सेवा निवृत्ति के बाद भी निगम , वार्डों, राजभवनों में घुस जाते है। खिलाडी बेचारे वैसे जवानी में ही सेवानिवृत्त हो जाते है मगर फिर भी चयनकर्ता बन कर ही दम लेते है। अफसरों का क्‍या कहना कुर्सी पर होते है तो किसी को कहीं पूछते कुर्सी से हटते ही उन्‍हें कोई नहीं पूछता।

कायर लोग रिटायर नहीं होना चाहते। गठिया से बेदम है , शरीर आराम चाहता है मगर मन का क्‍या करे वैसे भी शायर ने कहा है

तुम्‍हारे हुस्‍न का हुक्‍का तो बुझ चुका है बेगम !

ये हमीं है जो गुड़गुड़ाये जा रहे है।

ते ये सेवानिवृत्ति का हुक्‍का है जो हम भी गुड़गुड़ाये जा रहे है। देखें कब तक इसमे आंच रहती है। साहित्‍य की गुड़ गुड़ को चलाये रखने की इजाजत दीजिये।

सेवानिवृत्ति के बाद अफसर , नेता के पास न कार न डाइवर न अर्दली , न फाईलें , बेचारे क्‍या करे।अध्‍यापक को कक्षा की याद आती है। कई बार घर पर ही इतना बोल देते है कि घर वाले घन्‍टी बजा कर पीरियड समाप्‍ति की सूचना देते हैं और व्‍याख्‍यान बन्‍द हो जाता है।

सेवा का मेवा खाने की आदत पड़ जाने पर सेवा निवृत्ति के संकट बहुत बढ़ जाते हैं सरकार सभी निशुल्‍क सुविधाएं वापस ले लेती है और बेचारा अफसर धर पर बैठा बैठा घर वालों को कोसता रहता है।

सेवा में आया है तो जायगा। यह जानते हुए भी व्‍यक्‍ति सेवा के प्रति मोह को त्याग नहीं पाता है। हर व्‍यक्‍ति सेवा के बाद का समय भी सेवा में ही बिताना चाहता है, वो कुछ न कुछ करता है और दुख पाता है। मुझे भर्तहरी याद आ रहे हैं कालो न भुक्‍त्‍वा वयमेव भुक्‍तवा ….। सोचता हूं चलो चाकरी से छुट्‌टी अब साहित्‍य का दामन पकड कर बाकी का समय आराम से गुजारूगां क्‍या खयाल है आपका।

 

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यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@yahoo.com

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ग़ज़ल

रिश्‍तों से अब डर लगता है

रिश्‍तों से अब डर लगता है।

टूटे पुल-सा घर लगता है।

 

चेहरों पे शातिर मुस्‍कानें

हाथों में खंज़र लगता है।

 

संग हवा के उड़ने वाला

मेरा टूटा पर लगता है।

 

हथियारों की इस नगरी में

ज़िस्‍म लहू से तर लगता है।

 

जीवन के झोंकों पर तेरा

साथ हमें पल भर लगता है।

 

सारा जग सिमटा घर में तो

घर जग के बाहर लगता है।

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ग़ज़ल

जिसने ताउम्र अंधेरा सहा है

जिसने ताउम्र अंधेरा सहा है

करके रोशन वो जग को चला है

 

हादिसे से घिरे क्‍या तुम्‍हीं हो?

देख लो घर मेरा भी जला है

 

यूं ही हर सू नहीं ये चराग़ां

ख़ून मेरा दियों में जला है

 

दे रहा है सज़ा दर सज़ा तू

कुछ बता भी मेरा ज़ुर्म क्‍या है

 

हम जिसको कर सके ना बयां ‘पुरू‘

वो ग़ज़ल ने बख़ूबी कहा है

....

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दो कवितायें

 

प्रश्‍न

 

वर्षों से,

एक प्रश्‍न

जो -

मेरे सामने

मुँह बाए खड़ा है ।

हिमालय सा ,

मेरे सामने अड़ा है ।

मानों ,

यह मुझे ,

जिन्‍दगी के ,

अन सुलझे प्रश्‍न को

हल करने की

दे रहा हो चुनौती ।

मुझे ,

दिन और रात

देता रहता है ताना ,

कि -

तुम इस प्रश्‍न को ,

हल करके दिखाओ ।

तो ,

मैं मान लूँगा ,

तुमको

इस सदी का

धुरन्‍धर , विद्धान ।

यही नहीं ,

मैं बन जाऊँगा ,

तेरा गुलाम

सदा सदा के लिये ,

और

करता रहूंगा ता उम्र ,

तेरा ही गुण गान ।

मैंने ,

जब जब

इस मुंह चिढ़ाते

प्रश्‍न को ,

हल करने का किया

है प्रयास ।

हर बार रह गयी है ,

असफलता ही असफलता

मेरे पास ।

इसको,

हल करने के लिये

मैंने सभी ओर से,

किया प्रयास ।

कभी जोड़

कभी घटाना

कभी गुणा , तो

कभी भाग किया ।

पर,

सदैव की भाँति

गलत और गलत

उत्तर ही ,

प्राप्‍त किया ।

यह प्रश्‍न भी

क्‍या -

हर क्षण

नये प्रश्‍नों को

देता है जन्‍म ,

और कर देता है

खड़ी ,

प्रश्‍नों की एक फौज

मेरे सामने ।

मेरी असफलता पर

मुझे चिढ़ाता है

मुँह ।

मेरे,

गलत परिणाम पर

मुझ पर करता है ,

अट्टहास ।

मैं -

प्रश्‍नों को

हल करने का करता हूँ

जितना प्रयास ।

प्रश्‍नों के

चक्रव्‍यूह में

स्‍वयं फँसकर ,

नियमों को भूलकर,

बन जाता हूँ ,

स्‍वयं एक प्रश्‍न ।

प्रश्‍नों की

इस भूल भुलैया से

आकर तंग ,

कुछ लोगों ने

तो -

तोड़. डाली हैं

अपनी ,

कलमें और स्‍लेटें

और कर दी है

यह घोषणा कि -

सभी प्रश्‍न

हो गये हैं हल ।

परन्‍तु हम ऐसा

कुछ भी नहीं करेंगे ।

अंतिम सांस तक

हम-

उस पेचीदे प्रश्‍न से

लड़ते रहेंगे ,

और

सभी प्रश्‍नों को

सही - सही

हल करेंगे ।

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वक्‍त

 

वक्‍त था

वक्‍त है

वक्‍त

चला जायेगा ।

वक्‍त

वक्‍त के पीछे

वक्‍त

छोड़. जायेगा ।

कुछ अवशेष

और

कुछ होगा

अभी शेष

वक्‍त

किसी की

दया या कृपा

का मोहताज नहीं ।

वह घूमता है

निरन्‍तर

अपनी धुरी पर

निर्विध्‍न भाव से

वक्‍त में

ऐसा वेग है

जो कि -

किसी भी

अवरोध के सामने

न तो झुकता है,

और

न ही मानता है

हार ।

वह ,

छू सकता है ,

किसी भी

अनछुए पहलू को,

भेद सकता है

मोटी से मोटी

दीवारों को ,

लाँघ सकता है

वह

विशाल सागर को ।

वक्‍त

एक शमशीर है

वक्‍त

व्‍यक्ति की

तकदीर है ।

वक्‍त है

सबका मालिक

चाहता है

जिसको बना देता है

सरदार ।

वही व्‍यक्ति

बन जाता है

असतदार ।

क्षण भर में

कर देता है

भिखारी को राजा

और

राजा को कंगाल ।

पलक झपकते ही

हो जाता है व्‍यक्ति

मालामाल ।

इसी को कहते हैं

वक्‍त का

करवट बदलना

और

यही होता है

वक्‍त का कमाल ।

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आदेश कुमार पंकज

गणित अध्‍यापक ,कवि ,समीक्षक एवं मंच संचालक

जूनियर 45 -ए

रेणुसागर- 231218

सोनभद्र उ0प्र0

Email:- adeshpankaj@gmail.com

akansha yadav

एक लड़की

न जाने कितनी बार

टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में

हर किसी को देखती

याचना की निगाहों से

एक बार तो हाँ कहकर देखो

कोई कोर कसर नहीं रखूँगी

तुम्‍हारी जिन्‍दगी संवारने में

पर सब बेकार

 

कोई उसके रंग को निहारता

तो कोई लम्‍बाई मापता

कोई उसे चलकर दिखाने को कहता

कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता

पर कोई नहीं देखता

उसकी आँखों में

जहाँ प्‍यार है, अनुराग है

लज्‍जा है, विश्‍वास है।

 

21वीं सदी की बेटी

जवानी की दहलीज पर

कदम रख चुकी बेटी को

माँ ने सिखाये उसके कर्तव्‍य

ठीक वैसे ही

जैसे सिखाया था उनकी माँ ने

पर उन्‍हें क्‍या पता

ये इक्‍कीसवीं सदी की बेटी है

जो कर्तव्‍यों की गठरी ढोते-ढोते

अपने आँसुओं को

चुपचाप पीना नहीं जानती है

वह उतनी ही सचेत है

अपने अधिकारों को लेकर

जानती है

स्‍वयं अपनी राह बनाना

और उस पर चलने के

मानदण्‍ड निर्धारित करना।

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आकांक्षा यादव

प्रवक्‍ता, राजकीय बालिका इण्‍टर कॉलेज

नरवल, कानपुर-209401

kk_akanksha@yahoo.com

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कवि तुम्हारी कल्पना में आऊंगी मैं,

तुमको बहुत लुभाऊंगी मैं,

तड़पोगे छटपटाओगे तुम,

मुझे व्यक्त न कर पाओगे तुम,

शब्द- दर- शब्द तलाशोगे मुझे,

किन्तु मुझे न पाओगे तुम।

 

जीवन के हर मोड़ पर मौजूद रहूंगी मैं,

तुम्हारे वजूद में,तुम्हारे ख्यालों में,

तुम्हारी आराधना में ,प्रार्थना में,

तुम्हारी लालसा में, आकांक्षा में,

तुम्हारे गम में, खुशी में,

पर साकार मुझे न कर पाओगे तुम।

कवि,मुझे ढूंढना गलियों में,चौबारों में,

खेतों में,चौपालों में, नदियों में, पहाड़ों में,

यहाँ भी मुझे व्यक्त करने का प्रयास करना,

वरना, मैं सरिता हूँ, कवि,

कल-कल-कल बह जाऊंगी मैं।

 

बहुतेरे रोए हैं मेरे संग,

मरण में,खुशी में ,विदाई में,

लाइलाज बीमारी में, बेबसी में

गरीब की लाचारी में,

खोजना तुम मुझे वहां,

अन्यथा, अश्रुधारा बन बह जाऊंगी मैं।

 

हास में, परिहास में भी हूँ मैं,

हंसी-हंसी में पकड़ सकते हो मुझे

आगाह करती हूँ उतार लेना मुझे,

कागज पर,

चुके तो हंसी-हंसी में उड़ जाऊंगी मैं।

 

मिलन के अहसास में,

बिछोह की गहराई में,

गोता लगा सकते हो तो आओ

वरना, मदिरा के नशे में मदमस्त

हो जाऊंगी मैं।

 

कवि, हो सकता है,

तुम्हारे प्रयासों से पिघल जाऊं मैं,

गीत गज़ल रुबाइयां बन

कागज पर उतर जाऊं मैं,

अपनी सफलता कतई न

समझना इसे,

रेत की मानिंद तुम्हारे हाथों से फिसल जाऊंगी मैं ।

 

मैं समय की मानिंद हूँ

क्षण- क्षण बदल जाती हूँ

मेरा तुम्हारे ख्यालों में आना- जाना

शायद व्यग्र करता होगा तुम्हें

सच कहती हूँ,कवि

तुम्हारी इसी व्यग्रता का परिणाम हूँ मैं ।

विद्यार्थी जी की पुण्‍यतिथि पर (25 मार्च)

 

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी' का अद्‌भुत ‘प्रताप'

 

कृष्ण कुमार यादव

 

साहित्‍य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्‍ति की ज्‍वाला क्रान्‍तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ साहित्‍य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्‍तम्‍भ थे, जिनके अखबार ‘प्रताप‘ ने स्‍वाधीनता आन्‍दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्‍तिकारी स्‍वाधीनता आन्‍दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्‍तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ का जन्‍म 26 अक्‍टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया, इलाहाबाद में हुआ था। उनके नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्‍तव सहायक जेलर थे, अतः अनुशासन उन्‍हें विरासत में मिला। गणेश शंकर के नामकरण के पीछे भी एक रोचक वाकया है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्रतिमा दी थी, तभी से उन्‍होंने यह माना था कि यदि गोमती देवी का कोई पुत्र होगा तो उसका नामकरण गणेश शंकर किया जायेगा। मूलतः फतेहपुर जनपद के हथगाँव क्षेत्र के निवासी गणेश शंकर के पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्‍तव ग्‍वालियर राज्‍य में मुंगावली नामक स्‍थान पर अध्‍यापक थे। गणेश शंकर आरम्‍भ से ही किताबें पढ़ने के काफी शौकीन थे, इसी कारण मित्रगण उन्‍हें ‘विद्यार्थी‘ कहते थे। बाद में उन्‍होंने यह उपनाम अपने नाम के साथ लिखना आरम्‍भ कर दिया। विद्यार्थी जी की प्रारम्‍भिक शिक्षा पिता जी के स्‍कूल मुंगावली, जहाँ वे एंग्‍लो-वर्नाकुलर मिडिल स्‍कूल में अध्‍यापक थे, में हुई। विद्यार्थी जी उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के अच्‍छे जानकार थे। 1904 में उन्‍होंने भलेसा से अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा पास किया, जिसमें पहली बार हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में मिली थी। तत्‍पश्‍चात पिताजी ने विद्यार्थी जी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए बड़े भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। कानपुर में आकर विद्यार्थी जी ने क्राइस्‍ट चर्च कालेज की प्रवेश परीक्षा दी पर भाई का तबादला मुंगावली हो जाने से आगे की पढ़ाई फिर वहीं हुई। वर्ष 1907 में विद्यार्थी जी आगे की पढ़ाई के लिए कायस्‍थ पाठशाला गये। इलाहाबाद प्रवास के दौरान विद्यार्थी जी की मुलाकात ‘कर्मयोगी‘ साप्‍ताहिक के सम्‍पादक सुन्‍दर लाल से हुई एवं इसी दौरान वे उर्दू पत्र ‘स्‍वराज्‍य‘ के संपर्क में भी आये। गौरतलब है कि अपनी क्रान्‍तिधर्मिता के चलते ‘स्‍वराज्‍य‘ पत्र के आठ सम्‍पादकों को सजा दी गई थी, जिनमें से तीन को कालापानी की सजा मुकर्रर हुई थी। सुन्‍दरलाल उस दौर के प्रतिष्‍ठित संपादकों में से थे। लोकमान्‍य तिलक को इलाहाबाद बुलाने के जुर्म में उन्‍हें कालेज से निष्‍कासित कर दिया गया था एवं इसी कारण उनकी पढ़ाई भी भंग हो गई थी। सुन्‍दरलाल के संपर्क में आकर विद्यार्थी जी ने ‘स्‍वराज्‍य‘ एवं ‘कर्मयोगी‘ के लिए लिखना आरम्‍भ किया। यहीं से पत्रकारिता एवं क्रान्‍तिकारी आन्‍दोलन के प्रति उनकी आस्‍था भी बढ़ती गई।

इलाहाबाद से गणेश शंकर ‘विद्यार्थी' कानपुर आये एवं इसे अपनी कर्मस्‍थली बनाया। कानपुर में कलकत्‍ता से अरविंद घोष द्वारा सम्‍पादित ‘वन्‍देमातरम्‌‘ ने विद्यार्थी जी को आकृष्‍ट किया एवं इसी दौरान उनकी मुलाकात पं0 पृथ्‍वीनाथ मिडिल स्‍कूल के अध्‍यापक नारायण प्रसाद अरोड़ा से हुई। अरोड़ा जी की सिफारिश पर विद्यार्थी जी को उसी स्‍कूल में अध्‍यापक की नौकरी मिल गई। पर पत्रकारिता की ओर मन से प्रवृत्‍त विद्यार्थी जी का मन यहाँ भी नहीं लगा और नौकरी अन्‍ततः छोड़ दी। उस समय महावीर प्रसाद द्विवेदी कानपुर में ही रहकर ‘सरस्‍वती‘ का सम्‍पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी इस पत्र से भी सहयोगी रूप में जुड़े रहे। एक तरफ पराधीनता का दौर, उस पर से अंग्रेजी हुकूमत के अत्‍याचार ने विद्यार्थी जी को झकझोर कर रख दिया। उन्‍होंने पत्रकारिता को राजनैतिक चेतना को जोड़कर कार्य करना आरम्‍भ किया। इसी दौरान वे इलाहाबाद लौटकर वहाँ से प्रकाशित साप्‍ताहिक ‘अभ्‍युदय‘ के सहायक संपादक भी रहे। पर विद्यार्थी जी का मनोमस्‍तिष्‍क तो कानपुर में बस चुका था, अतः वे पुनः कानपुर लौट आये।

कानपुर में विद्यार्थी जी ने 1913 से साप्‍ताहिक ‘प्रताप' के माध्‍यम से न केवल क्रान्‍ति का नया प्राण फूँका बल्‍कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया जो सारी हिन्‍दी पत्रकारिता की आस्‍था और शक्‍ति का प्रतीक बन गया। प्रताप प्रेस में कम्‍पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्‍लाक बनाने के स्‍थान पर नाना प्रकार के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को 1921-1931 तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह प्रायः ‘प्रताप‘ में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्‍पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, पर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति के निमित्‍त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्‍तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्‍तशुदा क्रान्‍तिकारी साहित्‍य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्‍ध थी। यह ‘प्रताप' ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्‍मा गाँधी की महत्‍ता को समझा और चम्‍पारण-सत्‍याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्‍ट्र को गाँधी जी जैसे व्‍यक्‍तित्‍व से परिचित कराया। चौरी-चौरा तथा काकोरी काण्‍ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप' के माध्‍यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्‍ति कविता 'पुष्‍प की अभिलाषा' प्रताप अखबार में ही मई 1922 में प्रकाशित हुई। बालकृष्‍ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेहीजी, प्रताप नारायण मिश्र इत्‍यादि ने प्रताप के माध्‍यम से अपनी देशभक्‍ति को मुखर आवाज दी।

विद्यार्थी जी एक पत्रकार के साथ-साथ क्रान्‍तिधर्मी भी थे। वे पहले ऐसे राष्‍ट्रीय नेता थे जिन्‍होंने काकोरी षडयंत्र केस के अभियुक्‍तों के मुकदमे की पैरवी करवायी और जेल में क्रान्‍तिकारियों का अनशन तुड़वाया। कानपुर को क्रान्‍तिकारी गतिविधियों का केन्‍द्र बनाने में विद्यार्थी जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सरदार भगत सिंह, चन्‍द्रश्‍ोखर आजाद, विजय कुमार सिन्‍हा, राजकुमार सिन्‍हा जैसे तमाम क्रान्‍तिकारी विद्यार्थी जी से प्रेरणा पाते रहे। वस्‍तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्‍ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्‍द्र भट्‌टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्‍पादक थे। बाद में भट्‌टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं0 राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्‍ड में सजा मिली। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्‍त सिंह के छद्‌म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। सर्वप्रथम दरियागंज, दिल्‍ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्‍ली की यात्रा की और लौटकर ‘प्रताप' के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्‍द्रश्‍ोखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्‍तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भेंट करके क्रान्‍तिकारी राम प्रसाद बिस्‍मिल की आत्‍मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्‍यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्‍मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्‍या का कन्‍यादान भी किया। यही नहीं अशफाकउल्‍ला खान की कब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।

विद्यार्थी जी का ‘प्रताप‘ तमाम महापुरूषों को भी आकृष्‍ट करता था। 1916 में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्‍मा गाँधी और लोकमान्‍य तिलक इक्‍के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे। 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विद्यार्थी जी स्‍वागत मंत्री रहे और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ घोड़े पर चढ़कर अधिवेशन स्‍थल का भ्रमण करते थे। यह विद्यार्थी जी ही थे जिन्‍होंने श्‍यामलाल गुप्‍त ‘पार्षद‘ को प्रताप प्रेस में रखा एवं उनके गान ‘राष्‍ट्र पताका नमो-नमो‘ को ‘झण्‍डा ऊँचा रहे हमारा‘ में तब्‍दील कर दिया। विद्यार्थी जी सिद्धांतप्रिय व्‍यक्‍ति थे। एक बार जब ग्‍वालियर नरेश ने उन्‍हें सम्‍मानित किया और कहा कि मुझे खुशी है कि आपके पिताजी मेरे अंतर्गत मुंगावली में कार्यरत रहे हैं, परन्‍तु आप मेरे बारे में अपने अखबार में लगातार विरोधी खबरें छाप रहे हैं। तो विद्यार्थी जी ने निडरता से कहा कि मैं आपका और पिताजी के आपसे सम्‍बन्‍धों का सम्‍मान करता हूँ, परन्‍तु इसके चलते अखबार के साथ अन्‍याय नहीं कर सकता। हाँ, यदि आप इन खबरों का प्रतिवाद लिखकर भेजेंगे तो अवश्‍य प्रकाशित करूँगा।

कालान्‍तर में विद्यार्थी जी गाँधीवादी विचारधारा से काफी प्रभावित हुए एवं यह उनकी लोकप्रियता का भी सबब बना। वे क्रान्‍तिकारियों एवं गाँधीवादी विचारधारा के अनुयायियों के लिए समान रूप से प्रिय थे। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया तो भारतीय जनमानस आगबबूला हो उठा। अंगे्रजी निर्दयता के विरूद्ध जनमानस सड़कों पर उतर आया। निडर एवं साहसी व्‍यक्‍तित्‍व के धनी तथा साम्‍प्रदायिकता विरोधी विद्यार्थी जी इस दौरान भड़के हिन्‍दू-मुस्‍लिम दंगों को शान्‍त कराने के लिए लोगों के बीच उतर पड़े। उधर विद्यार्थी जी के प्रताप से अंग्रेजी हुकूमत भी भयभीत थी। रायबरेली में मुंशीगंज गोली काण्‍ड के तहत ‘प्रताप‘ पर मानहानि का केस चल रहा था और अंग्रेज बार-बार यह संदेश दे रहे थे कि जब तक कानपुर में ‘प्रताप‘ जीवित है, तब तक प्रदेश में शान्‍ति स्‍थापना मुश्‍किल है। भड़की हिंसा को काबू करने के दौरान 25 मार्च 1931 को विद्यार्थी जी साम्‍प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए। उनका शव अस्‍पताल की लाशों के मध्‍य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्‍किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अन्‍तिम संस्‍कार कर दिया गया पर ‘प्रताप‘ के माध्‍यम से ‘विद्यार्थी‘ जी ने राजनैतिक आन्‍दोलन, क्रान्‍तिकारी चेतना, क्रान्‍तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्‍य को जो ऊँचाईयाँ दीं, उसने उन्‍हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच में ही अन्‍ततः स्‍वाधीनता की लौ प्रज्‍जवलित हुई।

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k k yadav

जीवन-वृत्त : कृष्ण कुमार यादव

भारत सरकार की सिविल सेवा में अधिकारी होने के साथ-साथ हिंदी साहित्य में भी जबरदस्त दखलंदाजी रखने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कृष्ण कुमार यादव का जन्म १० अगस्त १९७७ को तहबरपुर आज़मगढ़ (उ. प्र.) में हुआ. जवाहर नवोदय विद्यालय जीयनपुर-आज़मगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९९९ में आप राजनीति-शास्त्र में परास्नातक उपाधि प्राप्त हैं. समकालीन हिंदी साहित्य में नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, आजकल, वर्तमान साहित्य, उत्तर प्रदेश, अकार, लोकायत, गोलकोण्डा दर्पण, उन्नयन, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, आज, द सण्डे इण्डियन, इण्डिया न्यूज, अक्षर पर्व, युग तेवर इत्यादि सहित 200 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं व सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, लिटरेचर इंडिया, हिंदीनेस्ट, कलायन इत्यादि वेब-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन. अब तक एक काव्य-संकलन "अभिलाषा" सहित दो निबंध-संकलन "अभिव्यक्तियों के बहाने" तथा "अनुभूतियाँ और विमर्श" एवं एक संपादित कृति "क्रांति-यज्ञ" का प्रकाशन. बाल कविताओं एवं कहानियों के संकलन प्रकाशन हेतु प्रेस में. व्यक्तित्व-कृतित्व पर "बाल साहित्य समीक्षा" व "गुफ्तगू" पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. शोधार्थियों हेतु आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक "बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव" शीघ्र प्रकाश्य. आकाशवाणी पर कविताओं के प्रसारण के साथ दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में कवितायेँ प्रकाशित. विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित. अभिरुचियों में रचनात्मक लेखन-अध्ययन-चिंतन के साथ-साथ फिलाटेली, पर्यटन व नेट-सर्फिंग भी शामिल. बकौल साहित्य मर्मज्ञ एवं पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज'- " कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्चपदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरंतर बेचैन रहता है. उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व संतुलन है. वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ साहित्यकार हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षड्यंत्रों और पाखंडों का बड़ी मार्मिकता के साथ उदघाटन करते हैं."

 

सम्प्रति/सम्पर्क:

कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर-208001

ई-मेल: skkyadav.y@rediffmail.com ब्लॉग: www.kkyadav.blogspot.com


(शरद जोशी - चित्र साभार - लेखनी.नेट)
वे 1977 की सर्दियों के दिन थे। शरद जोशी किसी कवि सम्‍मेलन के चक्‍कर में उदयपुर आये थे। मैं उनसे मुलाकात करने के लिए होटल में पहुंचा। नाम सुनते ही शरद भाई बड़े तपाक से मिले।

यार पार्टनर, तुम्‍हारा नाम तो जाना पहचाना है।'

मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ कि देश का लब्‍ध प्रतिष्‍ठित लेखक मुझे जानता है। बातचीत के दौरान उन्‍होंने उदयपुर-दर्शन की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। होटल से हम दोनों सिटी पैलेस, म्‍यूजियम, सहेलियों की बाड़ी, फतेहसामगर पर आवारागर्दी करने निकल पड़े। दाल-बाटी की संगत की।

उन दिनों वे उत्‍सव' फिल्‍म के संवाद लिख रहे थे। वसन्‍त सेना पर बड़ी बेबाक टिप्‍पणियां करते रहे। वसन्‍त, होली, कामदेव पर वे लगातार बोलते रहे। मैं श्रवण लाभ लेता रहा। सायंकाल कवि सम्‍मेलन में ठंड बढ़ जायेगी, अतः एक शाल उन्‍होंने मंगवाई।

इस पहली मुलाकात के बाद मैं मुम्‍बई गया। तो मानवसरोवर होटल में उनसे मेरी फिर मुलाकात हुई। बातचीत हिन्‍दी व्‍यंग्‍य लेखन, नाटकों पर चल पड़ी। कई मित्रों पर बड़ी आत्‍मीयतापूर्ण टिप्‍पणियां उन्‍होंने कीं।

कवि सम्‍मेलन के सिलसिले में वे अगली बार जयपुर आये। मैं भी स्‍थानान्‍तरित होकर जयपुर आ गया था। मैं अपने साथ उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्‍तक यथासंभव' ले गया था, उन्‍होंने लिखा-

प्रिय भाई यशवन्‍त को उसके द्वारा क्रय की गई उसे ही सप्रेम।'

- शरद जोशी

23.3.1985

शरद जोशी से मैंने स्‍वतंत्र लेखनजीवी होने के गुण पूछे। वे कुछ गंभीर होकर बोले-

बड़ा मुश्‍किल है, पत्रकारिता या फिल्‍म जगत।''

सायंकाल आवारागर्दी करते रहे। एम.आई. रोड से उन्‍होंने बच्‍चियों के लिए कुछ दुपट्टे खरीदे। अपनी बहन से मिलने के लिए पानों के दरीबे में मुड़ गये। मैं अपने घर की ओर चल दिया।

शरद भाई जब भी मिले, पूरी आत्‍मीयता और अपनेपन के साथ। मुझे कभी लगा हीं नहीं कि वे मेरे से काफी वरिष्‍ठ हैं।

हिन्‍दी एक्‍सप्रेस' के सम्‍पादक बनने के तुरन्‍त बाद उनका पत्र आया। जल्‍दी सामग्री भ्‍ोजें।मगर मैं ही आलसी साबित हुआ। बाद में वे जब गोरेगांव के यशवन्‍त नगर में रहने लगे तो एक बार मुझे कहा था-तुम्‍हारे नाम के नगर में रहता हूं। वे मेरी पुस्‍तकों, रचनाओं की यदा-कदा प्रशंसा और कठोर समीक्षा भी करते थे। उनसे तीन-चार बार की मुलाकातों में ही मुझे लग गया था कि मैं उनसे काफी कुछ सीख सकता हूं। लेकिन घड़े में घड़े जितना ही समाता है।

शरद भाई का जन्‍म 21 मई, 1931 को उज्‍जैन (म.प्र.) में हुआ था। पद्‌मश्री से सम्‍मानित इस लेखक को बार-बार पढ़ने की इच्‍छा होती है। यथासंभव' और नाटक अंधों का हाथी' मुझे विश्‍ोष प्रिय है। वे अक्‍सर कहते थे- भारत की जमीन पर व्‍यंग्‍य ही सबसे ज्‍यादा फैलने वाली फसल है।' और आज कल के हालात देखने पर लगता है, शरद भाई बहुत ठीक कहते थे। काश, शरद भाई इतनी जल्‍दी नहीं जाते। कुछ और अच्‍छी रचनाएं देकर हिन्‍दी की गरीबी दूर करते। मगर अफसोस वे नहीं हैं केवल उनकी रचनाएं हैं जो हमें उनकी याद दिलाती रहती हैं। शरद भाई ने बाद में फिल्‍मों में उत्‍सव', ‘मन का आंगन' जैसी फिल्‍में दीं तो दूरदर्शन पर ये जो है जिंदगी', ‘विक्रम बेताल' जैसे धारावाहिक दिये। दूसरी ओर वे कवि-सम्‍मेलनों में कवियों से भारी लिफाफा प्राप्‍त करते रहे। उन्‍हें साहित्‍य अकादमी का पुरस्‍कार नहीं मिला, मगर यह अकादमी का दुर्भाग्‍य था, शरद भाई का नहीं।

शरद भाई को शत-शत नमन!

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यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002

e_mail: ykkothari3@yahoo.com

 

 

हवाई जहाज या चिड़िया

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डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

 

क बार अम्मा,पिताजी ,का खाना पहुंचाने गई

मुझे भी कुछ पकड़ाकर ,साथ में लिवा ले गई

पिताजी हल चलाते, कुछ गुनगुनाते थे

शायद बैलों को ही, कुछ समझाते थे

अम्मा को देखते ही,हल रोक दिया

थोड़े से पानी से,हाथ मुंह धो लिया

वे गुड़ प्याज़ से,खाना खाते रहे

अम्मा से ही ,कुछ बतियाते रहे


आकाश में उड़ती, एक चीज़ देखी

अज़ीब आवाज़ करती चीज़ देखी

पिताजी से पूछा ,यह क्या है

चील है, गिद्ध है,अथवा कौआ है

इतने ज़ोर से शोर,क्या कोई हौआ है

जैसे पानी में चलने वाला,पानी का जहाज़ है

वैसे यह हवा में उड़ने वाला,हवाई जहाज़ है


इसमें कौन लोग बैठते हैं, और कैसे बैठते हैं

बड़े लोग बैठते हैं, मालूम नहीं कैसे बैठते हैं

छोटे से दिमाग में, अनेक सवाल आए

डर के कारण, उनसे से पूछ नहीं पाए

क्या हम बड़े नहीं,हम क्यूं नहीं बैठे

वे कौन लोग हैं,जो अब तक बैठे

चौपाल पर कुछ लोग , हुक्का पी रहे थे

छज्जू ताऊ को बड़ा आदमी कह रहे थे


छज्जू ताऊ के घर पहुंच गए

हाथ जोड़ कर पैरों में पड़ गए

पुचकारा,अच्छी तरह आशीर्वाद दिया

सुबह आने का कारण पूछ लिया

ताऊ जी !, क्या आप बड़े आदमी है ?.

क्यूं बेटा ! , बड़े आदमी तो हैं

क्या आप हवाई जहाज़ में बैठे हैं ?.


यदि बैठे हैं, तो बताइये कैसे बैठे हैं

मेरे जिज्ञासा भरे प्रश्न थे

परन्तु वे बिल्कुल निरुत्तर थे

हम तो पढ़े लिखे नहीं,सफ़र नहीं कर पाए

ईश्वर करे, तू हमारा बेटा जरूर कर पाए

एक बार परिवार के साथ सरकस गए

वहां मेरे प्रश्नों के कुछ उत्तर मिल गए


कलाकारों को रस्सी की सीढ़ी से चढ़ते देखा

उसी रस्सी की सीढ़ी से ,उन्हें उतरते देखा

मेरे एक प्रश्न का उत्तर मिल गया

दूसरा प्रश्न था, प्रश्न ही रह गया

उड़नेवाला प्रत्येक पक्षी, हवाई जहाज़ लगने लगा

किसी को उतरते न देख, मन विचलित होने लगा


आवाज़ सुनते ही, मन नाचने लगता

घन्टों उसी के बारे में, सोचता रहता

 

अम्मा बाबूजी ने पूछा, बेटा ! ,जब तू बड़ा हो जायेगा

क्या अपने अम्मा-बाबूजी को हवाई सैर करायेगा

हाँ कहते ही अम्मा-बाबूजी ने गोदी में उठा लिया

बहुत सारे आशीर्वाद देकर, ढेर सारा प्यार किया

रात गई, बात गई

ज़िन्दगी चलती गई


बस काल का पहिया चलता गया

छोटे बड़े का अन्तर समझता गया

उच्च शिक्षा हेतु, विदेश जाने का अवसर मिला

बाबूजी के निधन का वहीं दुखद समाचार मिला

समाचार ने बिलकुल झकझोर दिया

बचपन में किए वायदे को याद किया

गांव आया,अम्मा से हवाई यात्रा का निवेदन किया

अम्मा ने न जाने ,क्यूं निवेदन को ठुकरा दिया


भाईयों के परिवार के प्रति दायित्व की बात की

दायित्व से मुक्त होने पर ही, यात्रा की बात की

गर्मियों की छुट्टियों में गांव आते थे

अम्मा के साथ खूब गप लड़ाते थे

धीरे धीरे बच्चों को मच्छर काटने लगे

वे छुट्टियों में, गांव आने से कतराने लगे

अम्मा महीनों पहले तैयारी करती थी

प्रत्येक की पसन्द का ध्यान रखती थी


आंगन को पीली मिट्टी से लीपा जाता था

कमरे की दीवारों को सफ़ेदी से पोता जाता था

खुली छत पर अब पूरा एकाधिकार था

हमारे अतिरिक्त, न कोई दावेदार था

इसी छत के लिए, कई युद्ध कर चुके हैं

कई बार जीते, कई बार हार चुके हैं


अब यह छत बिना लड़े मिल रही है

इसलिए अच्छी नहीं लग रही है

एक बार कारण वश ,वायदा न निभा सका

अम्मा के बुलाने के बावज़ूद, घर न आ सका

अम्मा को ताने देने पड़ोसी आने लगे

हमारे खिलाफ़ उनको भड़काने लगे


अम्मा ने उन्हीं को बुरी तरह फ़टकारा

तुम कौन होती हो , यह मामला हमारा

तुमने कभी स्कूल का मुंह देखा है

जो बच्चों की पढ़ाई समझ पाओगी

तुम्हारे लिए काला अक्षर भैंस बराबर

मुशकिल पढ़ाई, क्या समझ पाओगी

एक बार मैं टिकट लेकर गांव गया

अम्मा ने इस बार भी ठुकरा दिया


याद कर !, कहा था, तेरे बाबूजी के साथ जाऊंगी

वे तो वायदा तोड़ गए, मैं तो वादा निभाऊंगी

वैसे भी मुझे, बैलगाड़ी में सफ़र करने में उल्टी आती है

हवाई यात्रा कैसे कर पाऊंगी, बात समझ नहीं आती है

अगली बार ,बहू बच्चों सहित हवाई जहाज़ से गांव आना

कैसा सफ़र रहा, कैसा लगा, ढंग से अपनी अम्मा को बताना


अम्मा के यह शब्द कानों में गूंजते रहे

वे अपना वादा पूरा करने चली गई

शायद बाबूजी इंतज़ार कर रहे होंगे

हम को छोड़ उनसे मिलने चली गई

कल आज हो गया, आज कल हो गया

भूल भुलैया में, जीवन कटता गया

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Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

आलेख

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सवाल पत्रकारिता की पवित्रता पर ?

 

- श्याम यादव

 

देश के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिह शेखावत ने पद्मश्री से सम्मानित और वरिष्ठ पत्रकार अभय छजलानी के नागरिक अभिनन्दन के अवसर पर पत्रकारिता से वैसी ही उम्मीद और आशा की जैसी देश की आजादी के पूर्व पत्रकारिता ने देश की आजादी में निभाई थी । पत्रकारिता से उन्होंने उम्मीद जताई कि वह देश की जड़ों में जकडे भ्रष्टाचार को वह उखाड़ फैंकेगी। शेखावत ही क्यों, देश का आम आदमी भी प्रजातन्त्र के इस चौथे स्तम्भ से ऐसी ही उम्मीद की आशा कर सकता है ।

वैश्वीकरण के इस दौर में जब दुनिया सिमटती जा रही है ,सामाजिक परिवेश का तानाबाना, संस्कृति और सभ्यता को परे रख कर बुना जा रहा हो। उपभोक्तावाद और उदारीकरण ने व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं को सर्वोपरि कर दिया हो और इस महत्वकांक्षा को पाने के लिए तमाम वर्जनाओं को तोड़ने को तत्पर रहने वाले आम आदमी के बीच से जन्मे पत्रकार से पत्रकारिता के मापदण्ड़ों को छूने की अपेक्षा करना क्या उचित है ?

आज सब ओर जब बदलाव की बयार बह रही हो तो यह कैसे संभव हो सकता है कि समाज से ही उपजा पत्रकार और उसकी पत्रकारिता का मापदण्ड़ नही बदलेगा? यह कोई आरोप नहीं है, पत्रकार या पत्रकारिता पर । लेकिन यह सही है कि पत्रकारिता के स्वरूप में परिवर्तन आया है और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है ,क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है । बदलाव की यह प्रक्रिया आज मजबूरी है और यह मजबूरी पत्रकारिता के साथ भी वैसे ही है जैसे कि अन्य व्यवसायों के साथ । वैसे भी पत्रकारिता अब मिशन की जगह व्यवसाय बन चुकी है ।

पत्रकारिता में व्यवसायिकता के आते ही इसका स्वरुप भी परिवर्तित हुआ। कागज और कलम की जगह पत्रकारिता में दृश्य और घटना आधारित दृश्य पत्रकारिता ने अपना ली । टेलीविजन पर समाचार दिखाए नहीं वरन् बनाएं जाने लगे। समचार दिन ब दिन कमतर होते जा रहे है और घटनाओं को जबरन समाचारों की शक्ल दी जा रही है । एक ही घटना का विश्लेषण धारावहिको की भांति कई कई दिनों तक प्रसारित कर टी आर पी को प्राप्त करने का जरिया बनाया जा रहा है। यह विश्लेषणात्मक समाचार शैली सनसनी लिए हुए रहती है और बिना किसी सीमा के जब चाहे तब ब्रेकिंग न्यूज बना कर एस एम एस के जरिए दर्शकों की जेब खाली करवा लेती है ।

आरुषी हत्याकाण्ड एक ऐसा ही एपीसोड था जो लगातार 50 -60 दिनों तक लगभग सभी चैनलों पर चला था । उस किशोरी की हत्या के बाद से ही नित नई कहानी चैनलों पर सनसनी फैलाती रही और उसके नौकर हेमराज की मौत के बाद तो कभी उसके साथ सम्बन्ध बताने की कोशिश की गई तो कभी उसके माता पिता के चरित्र को तार तार किया जा कर उसे ब्रेकिंग न्यूज बनाई गई ।

खोजी पत्रकारिता का ऐसा कृत्य शायद पहले नहीं हुआ हो ,मगर क्या पत्रकारिता के कारण उसके कातिल पकडे गए या वह थ्यौरी जिसे दृश्य पत्रकारिता सामने ला रही थी केवल मनगढ़न्त और केवल चैनजों की लोकप्रियता तक ही सिमट कर रह गई थी ।

प्रसिद्ध फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन के पुत्र अभिषेक बच्चन की शादी का एक एक पल दिखाने के लिए जिस तरह चैनलों में होड़ मची थी उसने यह साबित कर दिया कि नवउदारवाद और बाजारबाद, जनसंचार के साधनों और माध्यमों पर कब्जा किए बैठे है । यही कारण है कि नर्मदा विस्थापितों के लिए लड़ने वाली मेधापाटकर और ऐसे अन्य आदिवासियों के आन्दोलन उन समाचार वैल्यू की पहुंच में नहीं आ पाते जो सनसनी या टी आर पी बढ़ा सके । या यूं कहा जाय कि इस तरह की व्यवस्था के दुष्प्रभाव या आम निरक्षर असहाय आदमी के हित में उठने वाले घटनाक्रम उन दर्शकों के कान सुन्न करने की क्षमता नहीं रखते जो दृश्य पत्रकारिता के दर्शक है।

जेम्स अगस्ट हिक्की या भारतेन्दु हरीशचन्द्र, बालगंगाधर तिलक , महात्मा गांधी ,गणेशशंकर विद्यार्थी या राजेन्द्र माथुर तक के महामना इसी भारतीय पत्रकारिता की देन है जिन्होंने पत्रकारिता की धार नहीं खोई ।

देश का एक पूर्व उपराष्ट्रपति जब यह कहता है कि उसके देश में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और उसके द्रवित मन में जो आस उपजी है वह पत्रकारिता ही होती है । वे उम्मीद जताते है कि आज पत्रकारिता वैसेी ही भूमिका का निर्वहन करे जैसी उसने देश की आजादी में निभाई थी ।

जनसंचार माध्यम इस वैश्वीकरण और संकुचित हो रही इस दुनिया में एक हथियार बन गए है। एक ऐसे अमोघ अस्त्र जिनसे भ्रष्टाचार क्या पूरी दुनिया जीती जा सकती है ।प्रश्न तो सिर्फ इनके इस्तेमाल करने का है ? आम आदमी की सुन्न हो चुकी संवेदनाओं को जागृत करने उन्हें उन ताकतों के खिलाफ उठ खड़ा होने या देश की संस्कृति और सभ्यता तथा आकन्ठ भ्रष्टाचार में डूब चुकी लोकनीति को ठीक करने की जो आवश्यकता महसूस की जा रही है उसमें सिर्फ और सिर्फ पत्रकारिता की ओर आशा भरी निगाहों से देखा जा रहे है ।

प्रश्न फिर भी वही । व्यवसायिकता हर ओर है और प्रतिस्पर्धा भी हर जगह है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड़। इस होड़ में क्या खोया जा रहा है इससे किसी को कोई सरोकार नहीं है । मिडिया भी इससे अछूता नहीं है । प्रिन्स यदि ट्युबवेल में गिरता है लाईव कवरेज के नाम पर मार्केटिंग के बन्दें उसमें भी एस एम एस के जरिए लाखों के वारे न्यारे कर लेते है ।

घटनाओं के दृश्यों से इस समय में पत्रकारिता से केवल और केवल मुनाफा कमाने और दर्शकों को दृश्यों से संवेदनहीन, सुन्न करने के लिए एंकरों के ग्लैमर से सजे, रट्टू तोते की तरह संचालित इस नई पत्रकारिता से सवालों के जवाब तलाशने की आज आवश्यकता है ? क्या होंगे इन सवालों के जवाब यह तो नहीं कहा जा सकता मगर इन सवालों को टटोलना तो होगा ही और इन्हें खोजने में अखबारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है ।

सवालों का जाल घूम फिर कर वही आ जाता है कि क्या प्रजातन्त्र का यह चौथा प्रहरी अपनी जवाबदेहता को पूरी कर पाएगा । एक ऐसी जवाबदेहता जो विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में बिना किसी संवैधानिक अधिकार के पत्रकारिता को दे रखी हो ओर वह उसका निर्वहन भी करती आई है । बोफोर्स और कमला जैसे मामले पत्रकारिता ने ही उजागर किए है लेकिन अब बदली हुई परिस्थियों में जब देश में भ्रष्टाचार चरम पर चला गया हो तो इस चौथे स्तंभ का यूं मौन रहना और देश के पूर्व उप राष्ट्रपति द्वारा उसे उखाड़ फैंकने के लिए उससे आव्हान करना क्या यह नहीं दर्शाता कि पत्रकारिता को वापस उसी रास्ते पर आना चाहिए जिस के लिए उसकी पहचान है । अपनी इसी जवाबदेहता को यदि यह पत्रकारिता पूरी कर ले तो भारतीय लोकतन्त्र का यह चौथाप्रहरी सही मायने में अपनी भूमिका निभा कर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के साथ अपनी पवित्रता को भी सिद्ध कर सकेगी ।

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©श्याम यादव ‘‘श्रीविनायक ’’22 बी, संचारनगर एक्सटेंशन इन्दौर 452016

स लड़के को देखकर मैं यकायक डर गया जो मेरे घर के सामने आ खड़ा हुआ था।

लड़का फटीचर हालत में था। तन पर बहुत ही गंदी, जगह-जगह फटी बनियान थी और पैंट गंदी तो थी ही, इतनी बड़ी थी कि किसी तरह वह उसे सँभाले था। पाँयचे जमीन पर लथर रहे थे और ऐसा लगता था पाँयचों की जगह पन्नी बँधी हो।

उस लड़के को देखते ही मेरे जेहन में एक बात उभरी कि इसे कहीं देखा है। जेहन को कुरेद ही रहा था तो याद आया कि कुछ ही दिन पहले यह लड़का पुल की रेलिंग पर सोया हुआ था। यह कुछ ऐसा निश्चेष्टï और गहरी नींद में सोया पड़ा था कि राहगीरों को भ्रम हुआ कि चल बसा। लोगों की वहाँ भीड़ लग गई थी। एक आदमी ने उसे अपने छाते से कई बार कोंचा तब भी वह निश्चेष्टï और बेहिस ही बना रहा। तभी किसी ने उसके खुले मुँह पर पानी डाला तो वह हाँफता - गाली देता उठ बैठा। थोड़ी देर तक वह आँखें मलता रहा, मच्छरों से घायल गर्दन खुजाता रहा, फिर यकायक उठकर भाग खड़ा हुआ था।

यह वही लड़का था। यही कोई नौ-दस साल का होगा, लेकिन अपनी उम्र से बड़ा लग रहा था। दुबला-पतला हडिय़ल और निहायत ही गंदा था जैसे महीनों से नहाया न हो। सिर के झोंटे उलझे और लटियाए थे जिनमें वह उँगलियाँ फेरता हुआ कुछ सोच रहा था। रहटे की एक लंबी गोदी थी जिसे वह बहँगी की तरह कंधों पर टिकाए था। दोनों हाथ उसके उसी पर झूल रहे थे।

लड़के को देखकर मैं डर गया कि कहीं कुछ गड़बड़ न करे। चुप्पे से फाटक खोले और कुर्सी न उठा ले जाए! सैप्टिक टैंक का ढक्कन ही न पार कर दे! पिछवाड़े सामान पड़ा हुआ है — बर्तन, बाल्टी, पंप, पीतल की टोंटी, तार पर टँगे कीमती कपड़े! क्या भरोसा ऐसे आवारों का जो सड़क पर ही मरते-खपते हों!

हालाँकि मैंने अपने घर की का फी सुरक्षित घेरेबंदी कर रखी है कि कोई पर नहीं मार सकता, बावजूद इसके मैं भयभीत था कि ऐसे नंगों, दुष्टïों का क्या भरोसा, कैसा भी म जबूत, अभेद्य घेरा ये तोड़ दें और कुछ भी उड़ा ले जाएँ! आप क्या कर लोगे इनका? किसी विद्वान ने सही कहा है कि इन आवारों के पास खोने के लिए क्या है जबकि पाने के लिए संसार है!

जोर से चिल्लाकर मैंने लड़के को डपटा ताकि वह भाग जाए। लेकिन मेरे ऐसा करने से लड़का टस से मस न हुआ। बल्कि और इट्टमीनान से, निर्भय-सा सड़क के किनारे खड़ा हो गया जैसे कह रहा हो कि मैं सड़क पर खड़ा हूँ, तुम्हारी जगह नहीं जो डपट रहा है!

पत्नी ने कहा — बड़ा ढीठ है! देखो कैसे देख रहा है, आँखें फाड़कर! अरे, अरे, देखो, रहटा कैसे लहरा रहा है, जैसे नट हो! इसे तो किसी सर्कस में होना चाहिए।

पत्नी जोरों से हँसीं। उनमें जरा भी भय न था जबकि मैं आंदोलित था।

थोड़ी देर बाद पत्नी रसोई के काम में उलझ गईं और मैं ऑफिस जाने की तैयारी में कि —

फाटक बजा।

मैंने देखा, फाटक पर लड़का था।

मैं चीखा - क्या है?

वह बोला - साब, पानी चाहिए!

- नहीं है पानी, भाग यहाँ से! - मैं ची खा — दूर हो गेट से, पीछे हट, नहीं ल_ï बजा दूँगा। पता नहीं कहाँ से कमीने आ जाते हैं... नंगे-भुक्खड़ जैसे लंघन से उठे हों साले! और कोई जगह नहीं, बस यहीं आना है पिट्टïस को। और कहीं खड़ा होता तो अभी जूते पड़ जाते पच्चीसों ... साब पानी चाहिए, होटल है कोई क्या? हरामखोर...

मैं गुस्से में बड़बड़ा रहा था और फाटक का खटका चढ़ाने में लगा था। इस बीच पत्नी रसोई से पानी का जग लिए आईं और लड़के से बोलीं — ले, पानी पी और भाग, फिर दिखना नहीं! नहीं तो पीटूँगी!

अँजुरी जोड़े वह पानी पी रहा था, आँखें पानी की धार को देख रही थीं। पानी अँजुरी में कम मट्टथे पर ज्यादा गिर रहा था जो उसके गंदे चेहरे को भिगो रहा था — मुझे पत्नी पर गुस्सा आ रहा है, जबरन पानी पिला रही हैं, कुछ समझती नहीं, कैसी नालायक हैं! — बड़बड़ाता मैं बाथरूम में घुस गया।

थोड़ी देर बाद जब मैं रोटी खा रहा था, फाटक फिर बजा।

देखा तो वही लड़का।

आग बबूला होते मैंने पूछा, क्या है?

- रोटी दे दो साब! भूख लगी है!

- नहीं है रोटी, भगो यहाँ से!

- तुम तो खा रहे हो, मुझसे कहते हो कि नहीं है! दो ना साब!

बात तो उसने सच कही थी। मेरे गुस्से से रिक्तम चेहरे पर मुस्कुराहट की लालिमा तैर गई। बावजूद इसके मैंने गुस्से को बनाए रखा। चीखा - जाते हो कि दूँ एक लात!

- मार दो साब! खड़ा हूँ।

- भाग यहाँ से!

- साब एक रोटी!

पत्नी ने रोटी लाकर दी। लड़के ने मुझे कनखियों से देखा, हल्का-सा मुस्कुराया जैसे कह रहा हो कि कैसे हो साब! रोटी को मना करते हो!

लड़के ने रोटी ली जैसे झपट्टïा मारा हो और समूची रोटी मुँह में रख ली और चबाने की िजल्लत उठाए बिना वह उसे गटक गया। ऐसा करते हुए मुझे लगा कि रोटी उसके हलक में फँस गई है! तभी उसकी साँस भी रुक रही है। उसे बेचैनी हो रही है जिस वजह वह छाती पीटने-सा लगा जिसका असर आँखों पर भी था। आँखों में पानी तैर गया था।

मुझे घबराहट-सी हुई। पत्नी पानी के लिए रसोई की तर फ दौड़ीं।

लड़के को पानी पीने की जरूरत नहीं पड़ी। पल भर में रोटी हलक के नीचे उतर गई थी और वह मुस्कुरा रहा था!

पत्नी ने नारा जगी जताई और उसे बरजा।

जब मैं कपड़े पहन रहा था, ऑफिस जाने को था, फाटक फिर बजा। देखा तो वही लड़का फिर खड़ा था जो कुछ देर पहले रफूचक्कर हो गया था।

मुझे यह भाँपते देर न लगी कि लड़का कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ करेगा! तभी यहीं मँडरा रहा है!

- अब क्या है? — मैं तिड़का।

जवाब में लड़के ने फटी बनियान उतारी और इंधौरी भरे शरीर पर हवा करता बोला

— साब, बुश्शट दे दो! आज तक मैंने कभी बुश्शट नहीं पहनी।

आपे से बाहर होता मैं बोला — नहीं है बुश्शर्ट, तुम जाओ नहीं तुम्हारी पिटाई लगाऊँगा, बहुत हो गई शैतानी...

- साब, शैतानी कहाँ कर रहा हूँ? — मुस्कुराता वह बोला - एक बुश्शट दे दो न साब! आपके पास तो...

- ह जारों हैं, तो क्या लुटा दूँ? — मैं बोला

- साब! आपकी छत झाड़ दूँ तब दे दोगे?

मैं सावधान हुआ। यह इसकी चाल है! बोला — नहीं, छत नहीं झड़वानी है, भाग यहाँ से, नहीं कुंदी करूँगा तेरी!

जब सीधे से वह नहीं माना तो मैं कर्रा हुआ और उसे धकेलकर घर से दूर किया और ऑफिस के लिए रवाना हुआ!

मैं ऑफिस तो जरूर आ गया लेकिन मन घर में लगा हुआ था। वह नाकिस लड़का था जो कुछ न कुछ गड़बड़ करने पर उतारू था। सामान तो जाए, कहीं पत्नी पर हमला न कर बैठे!

दिन भर ऑफिस के काम में मन नहीं लगा। आशंका ही आशंका। कई बार पत्नी को फोन किया तो उनकी मुस्कुराती आवा ज से थोड़ा आश्वस्त हुआ लेकिन फोन रखते ही फिर वही आशंका! वही डर! वही भय!

ऑफिस छूटने से दो घंटे पहले ही मैं घर आ गया।

पत्नी ने मुस्कुराते हुए फाटक खोला तो जान में जान थी।

स्कूटर टिका रहा था वह लड़का गली के छोर से लचका-सा खाता, आता दिखा— इस वक्त वह मेरी बुश्शर्ट पहने था!

पत्नी उसे देख मुस्करा रही थीं और मैं फिर आशंका के घेरे में था।

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