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March, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

अशोक गौतम का व्यंग्य : दूसरे दर्जे की धमा चौकड़ी!!

मेरा और उनका रिश्ता तबका है जब हम दोनों एक साथ ऊपर नीचे की रसोई में एक ही वक्त कुंडी में डंडे से प्याज लहसुन कूटा करते थे और एक साथ अपनी अपनी ईमानदारी पर आंसू बहाया करते थे। डीए की कोई किश्त मिलती तो एक दूसरे के जी भर गले लगकर एक दूसरे को बधाई देते। बाद में वे वैष्णव हुए तो घर में ग्राइंडर ले आए, पर मैं कुंडी डंडे के साथ ही चलता रहा। चार दिन बाद वे फुली आटोमैटिक वाशिंग मशीन ले आए। पर मेरे घर में पटड़ी से कपड़े धोती मेरी पत्नी पसीना पोंछती रही, मेरे कबाड़ी के कुरतों के बटन और बाथरूम का फर्श तोड़ती रही। देखते ही देखते वे मालामाल हो गए। मैं आदमी होकर ही रो पीटकर चलता रहा, कभी इस लाले के उधार पर तो कभी उस लाले के उधार पर सगर्व पलता रहा। जबसे वे उपाधि धारक वैष्णव हुए तबसे कुछ ज्यादा ही मनचले भी हो गए। उनके चांदी कूटने के दिन रात शुरू। मुझे जब भी मिलते ,समझाते,‘यार! क्या रखा है कोरे आदमी होकर जीने में! ठाठ से जीना है तो मेरी तरह वैष्णव हो जा।’ पर मैं कोढ़ी नहीं समझा तो नहीं समझा। उस दिन अपना होने के कारण उन्होंने मुझे फिर समझाया,‘ यार ! ये क्या हाल बना रखा है? कुछ लेता क्यों नहीं?’‘लूं कैसे? बिन…

यशवन्त कोठारी का आलेख : राम कथा - अनन्ता

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राम के चरित्र ने हजारों वर्षों से लेखकों, कवियों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों को आकर्षित किया है, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें राम के चरित्र या रामायण की चर्चा न होती हो। राम कथा स्वयं में सम्पूर्ण काव्य है, संपूर्ण कथा है और संपूर्ण नाटक हैं। इस संपूर्णता के कारण ही राम कथा को हरिकथा की तरह ही अनन्ता माना गया है। फादर कामिल बुल्के ने सुदूर देश से आकर राम कथा का गंभीर अध्ययन, अनुशीलन किया और परिणामस्वरूप राम कथा जैसा वृहद ग्रन्थ आकारित हुआ। रामकथा के संपूर्ण परिप्रेक्ष्य को यदि देखा जाये तो ऐसा ग्रन्थ अन्य किसी भाषा में उपलब्ध नहीं हुआ है।वैदिक साहित्य में रामकथा के पात्रों का वर्णन मिलता है। शायद राम कथा का प्रवचन उन दिनों थोड़ा बहुत रहा होगा। दशरथ, राम आदि के नामों का उल्लेख भी पाया गया है। सीता को कृषि की देवी के रूप में निरुपित किया गया है तथा एक अन्य सीता को सूर्य की पुत्री के रूप में दर्शाया गया है। सीता शब्द भी अनेक बार आया है। वैदिक साहित्य में रामायण से संबंधित पात्रों के नाम अलग-अलग ढंग से विविध रूपों में आते है, मगर ये आपस में संबंधित नहीं है। राम कथा की कथा वस्तु भी कहीं द…

ओमप्रकाश कश्यप का आलेख : भारतीय लोकतंत्र – यात्रा और पड़ाव

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खून की बूंद न गिरते हुए भी लोगों के जीवन में सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन लाने की व्यवस्था का अभिप्राय है-लोकतंत्र! डॉ. आंबेडकर.कालेज के दिनों में एक कविता पढ़ी थी. कवि का नाम और कविता के आखर तो गड्डमड्ड हैं. ऐर-फेर के साथ बस कुछ शब्द दिलो-दिमाग में अटके हैं. कविता की पहली पंक्ति शायद यूं थी-देश रे देश....तेरे सिर पर कोल्हू.....इसे पेरेंगे जाट, बाह्मन, बनिया....! भारतीय राजनीतिक पटल पर वह इंदिरा गांधी और उनकी उग्र मनमानियों का युग था. मानवीय अस्मिता और जनाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले कलमकार, बुद्धिजीवी, विचारक, समाजप्रेमी, राजनेता वगैरह सभी गिरफ्तार किए जा रहे थे. स्वातंत्रयोत्तर भारत में स्वप्नभंग की आहत मानसिकता के बीच कवि ने इसको रचा था. भावुक मन से. संभवतः यह सोचकर कि लोग उसकी संवेदना को समझेंगे. कविता के मर्म तक जाकर, कुछ ऐसा करेंगे जिससे जनतंत्र की बदहाली कम की जा सके. लेकिन तीन दशक से अधिक बीत चुके हैं. कविता के माध्यम से कवि ने जो कामना की थी. जो स्वप्न उसने संजोए थे. मन को मारकर जो तंज कसा गया था, वह बेमानी सिद्ध हो चुका है. कवि की कामना के उलट स्थिति और भी बदतर हुई है. समाज मे…

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रचनाकार रविशंकर श्रीवास्तव 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462002 (भारत) कृपया ध्यान दें: (१) रचनाकार का प्रकाशन अवैतनिक अव्यावसायिक किया जाता है अतः रचनाओं के प्रकाशन के एवज में किसी तरह का मानदेय/रायल्टी प्रदान …

सीमा सिंघल की कविताएँ

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(1)हौसले हों गर बुलन्‍द . . .बातें करता सागर की तो उसका दायरा बड़ा है,तू नदी की बात कर, उसकी गोद में पला है।मजबूत इरादों को बना, और खुद फौलाद बन,तेरे साथ - साथ औरों का भी इसमें भला है।जज्‍बाती होना अच्‍छी बात है, पर जज्‍बातों के,साये में तो किसी का, जीवन नहीं चला है।घबरा जाना, फिर किस्‍मत पे छोड़ देना सब कुछ,ठीक है, कभी-कभी, पर सदा नहीं, तेरा भला है।हौसले हो गर बुलन्‍द ‘सीमा' मेरी बात पे यकीं कर,फिर कौन सा काम, कल पर किसी का टला है।(2)कोई मरहम नही रखता यहां ...........मुझसे पूछ तो मैं सच बतलाऊं तुझको लोगो के पास,अपने दुख और दूसरों की ख़ुशियों का हिसाब होता है।घाव पे किसी के कोई मरहम नही रखता यहां पर,सब के पास बस अपने जख्‍मों का हिसाब होता है ।कहने दे जिसे जो कहता है बुरा मत माना कर तू,ऊपर वाला अच्‍छे-बुरे सबका हिसाब कर लेता है।कोई किसी का खुदा नहीं होता मत डरा कर किसी से,सब का मालिक तो एक है जो खुद हिसाब कर लेता है।इंसान की फितरत है अच्‍छे दिन भूल जाता है अक्‍सर वो,गर्दिश में जो दिन गुजरे ‘सदा' उनका हिसाब रख लेता है।(3)ऊंचे दरख्‍तों के साये में . . . .कुछ भलाई के काम कर, औरों …

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : सेवा -निवृत्‍ति के संकट

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आखिर हिम्‍मत कर के मैंने स्‍वैच्‍छिक सेवा निवृत्‍ति ले ही ली। काफी पुरानी परम्‍परा है हिन्‍दी में। जिन्‍दगी भर नौकरी कर के समय पूर्व अवकाश लेकर हिन्‍दी की सेवा करने की। मैंने भी इसी परम्‍परा का निर्वहन किया है। अब समय से उठने , तैयार होने , संस्‍था जाकर पढ़ाने की जिम्‍मेदारी से पूर्ण रूप से मुक्‍त हो गया हूं। अब बस कागज , कलम , पुस्‍तकें , लेख , कहानियां , कविता और बस ऐसे ही दूसरे काम। अब बस लिखो। पढ़ो !छपो, छपाओ ! पुस्‍तकाकार करो। प्रकाशकों के, सम्‍पादकों के चक्‍कर लगाओ। दूरदर्शन, आकाशवाणी के आगे पीछे घूमो। किसी संस्‍था से सम्‍मान का जुगाड़ करो। यही तो सब साहित्‍य की सेवा का मेवा है। वास्‍तव में मैं काफी समय से सेवानिवृत्ति के लिए प्रयासरत था , अवसर आया , मैंने त्‍यागपत्र लिखा और दे दिया। मगर काफी दिनों तक कोई सुनवाई नहीं हुई। सरकार ऐसी चीजों की चिन्‍ता भी नहीं करती। कोई आये या जाये सरकार के क्‍या फरक पड़ता है। फरक मेरे पड़ता था सो मैंने एक स्‍मरण पत्र दिया। मंत्रालय ने तुरन्‍त कार्यवाही की ओर मुझे दो दिन में ही सेवानिवृत्ति की स्‍वीकृति दे दी। उस दिन सब कुछ सुहाना सुहाना था। छात्र-छ…

पुरू मालव की ग़ज़लें

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ग़ज़लरिश्‍तों से अब डर लगता हैरिश्‍तों से अब डर लगता है।टूटे पुल-सा घर लगता है।चेहरों पे शातिर मुस्‍कानेंहाथों में खंज़र लगता है।संग हवा के उड़ने वालामेरा टूटा पर लगता है।हथियारों की इस नगरी में ज़िस्‍म लहू से तर लगता है।जीवन के झोंकों पर तेरासाथ हमें पल भर लगता है।सारा जग सिमटा घर में तोघर जग के बाहर लगता है।----ग़ज़लजिसने ताउम्र अंधेरा सहा हैजिसने ताउम्र अंधेरा सहा हैकरके रोशन वो जग को चला हैहादिसे से घिरे क्‍या तुम्‍हीं हो?देख लो घर मेरा भी जला हैयूं ही हर सू नहीं ये चराग़ांख़ून मेरा दियों में जला हैदे रहा है सज़ा दर सज़ा तूकुछ बता भी मेरा ज़ुर्म क्‍या हैहम जिसको कर सके ना बयां ‘पुरू‘वो ग़ज़ल ने बख़ूबी कहा है....

आदेश कुमार पंकज की कविताएँ

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दो कवितायेंप्रश्‍नवर्षों से,एक प्रश्‍नजो -मेरे सामनेमुँह बाए खड़ा है ।हिमालय सा ,मेरे सामने अड़ा है ।मानों ,यह मुझे ,जिन्‍दगी के ,अन सुलझे प्रश्‍न कोहल करने कीदे रहा हो चुनौती ।मुझे ,दिन और रातदेता रहता है ताना ,कि -तुम इस प्रश्‍न को ,हल करके दिखाओ ।तो ,मैं मान लूँगा ,तुमकोइस सदी काधुरन्‍धर , विद्धान ।यही नहीं ,मैं बन जाऊँगा ,तेरा गुलामसदा सदा के लिये ,औरकरता रहूंगा ता उम्र ,तेरा ही गुण गान ।मैंने ,जब जबइस मुंह चिढ़ातेप्रश्‍न को ,हल करने का कियाहै प्रयास ।हर बार रह गयी है ,असफलता ही असफलतामेरे पास ।इसको,हल करने के लियेमैंने सभी ओर से,किया प्रयास ।कभी जोड़कभी घटानाकभी गुणा , तोकभी भाग किया ।पर,सदैव की भाँतिगलत और गलतउत्तर ही ,प्राप्‍त किया ।यह प्रश्‍न भीक्‍या -हर क्षणनये प्रश्‍नों कोदेता है जन्‍म ,और कर देता हैखड़ी ,प्रश्‍नों की एक फौजमेरे सामने ।मेरी असफलता परमुझे चिढ़ाता हैमुँह ।मेरे,गलत परिणाम परमुझ पर करता है ,अट्टहास ।मैं -प्रश्‍नों कोहल करने का करता हूँजितना प्रयास ।प्रश्‍नों केचक्रव्‍यूह मेंस्‍वयं फँसकर ,नियमों को भूलकर,बन जाता हूँ ,स्‍वयं एक प्रश्‍न ।प्रश्‍नों कीइस भूल भुलैया स…

आकांक्षा यादव की कविता : एक लड़की

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एक लड़कीन जाने कितनी बार टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों मेंहर किसी को देखती याचना की निगाहों सेएक बार तो हाँ कहकर देखोकोई कोर कसर नहीं रखूँगीतुम्‍हारी जिन्‍दगी संवारने में पर सब बेकारकोई उसके रंग को निहारतातो कोई लम्‍बाई मापता कोई उसे चलकर दिखाने को कहताकोई साड़ी और सूट पहनकर बुलातापर कोई नहीं देखता उसकी आँखों मेंजहाँ प्‍यार है, अनुराग हैलज्‍जा है, विश्‍वास है।21वीं सदी की बेटीजवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बेटी कोमाँ ने सिखाये उसके कर्तव्‍यठीक वैसे ही जैसे सिखाया था उनकी माँ नेपर उन्‍हें क्‍या पता ये इक्‍कीसवीं सदी की बेटी हैजो कर्तव्‍यों की गठरी ढोते-ढोतेअपने आँसुओं को चुपचाप पीना नहीं जानती हैवह उतनी ही सचेत हैअपने अधिकारों को लेकर जानती हैस्‍वयं अपनी राह बनानाऔर उस पर चलने के मानदण्‍ड निर्धारित करना।---आकांक्षा यादवप्रवक्‍ता, राजकीय बालिका इण्‍टर कॉलेज नरवल, कानपुर-209401kk_akanksha@yahoo.com

हर्ष शर्मा की कविता : व्यग्रता

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कवि तुम्हारी कल्पना में आऊंगी मैं,तुमको बहुत लुभाऊंगी मैं,तड़पोगे छटपटाओगे तुम,मुझे व्यक्त न कर पाओगे तुम,शब्द- दर- शब्द तलाशोगे मुझे,किन्तु मुझे न पाओगे तुम।जीवन के हर मोड़ पर मौजूद रहूंगी मैं,तुम्हारे वजूद में,तुम्हारे ख्यालों में,तुम्हारी आराधना में ,प्रार्थना में,तुम्हारी लालसा में, आकांक्षा में,तुम्हारे गम में, खुशी में,पर साकार मुझे न कर पाओगे तुम।कवि,मुझे ढूंढना गलियों में,चौबारों में,खेतों में,चौपालों में, नदियों में, पहाड़ों में,यहाँ भी मुझे व्यक्त करने का प्रयास करना,वरना, मैं सरिता हूँ, कवि,कल-कल-कल बह जाऊंगी मैं।बहुतेरे रोए हैं मेरे संग,मरण में,खुशी में ,विदाई में,लाइलाज बीमारी में, बेबसी मेंगरीब की लाचारी में,खोजना तुम मुझे वहां,अन्यथा, अश्रुधारा बन बह जाऊंगी मैं।हास में, परिहास में भी हूँ मैं,हंसी-हंसी में पकड़ सकते हो मुझेआगाह करती हूँ उतार लेना मुझे,कागज पर,चुके तो हंसी-हंसी में उड़ जाऊंगी मैं।मिलन के अहसास में,बिछोह की गहराई में,गोता लगा सकते हो तो आओवरना, मदिरा के नशे में मदमस्तहो जाऊंगी मैं।कवि, हो सकता है,तुम्हारे प्रयासों से पिघल जाऊं मैं,गीत गज़ल रुबाइयां बनकागज …

कृष्ण कुमार यादव का आलेख : गणेश शंकर ‘विद्यार्थी' का अद्‌भुत ‘प्रताप'

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विद्यार्थी जी की पुण्‍यतिथि पर (25 मार्च)गणेश शंकर ‘विद्यार्थी' का अद्‌भुत ‘प्रताप'कृष्ण कुमार यादवसाहित्‍य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्‍ति की ज्‍वाला क्रान्‍तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ साहित्‍य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्‍तम्‍भ थे, जिनके अखबार ‘प्रताप‘ ने स्‍वाधीनता आन्‍दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्‍तिकारी स्‍वाधीनता आन्‍दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्‍तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ का जन्‍म 26 अक्‍टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया, इलाहाबाद में हुआ था। उनके नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्‍तव सहायक जेलर थे, अतः अनुशासन उन्‍हें विरासत में मिला। गणेश शंकर के नामकरण के पीछे भी एक रोचक वाकया है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्र…

यशवन्त कोठारी का संस्मरण : ये जो थे पंडित शरद जोशी

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(शरद जोशी - चित्र साभार - लेखनी.नेट)
वे 1977 की सर्दियों के दिन थे। शरद जोशी किसी कवि सम्‍मेलन के चक्‍कर में उदयपुर आये थे। मैं उनसे मुलाकात करने के लिए होटल में पहुंचा। नाम सुनते ही शरद भाई बड़े तपाक से मिले। यार पार्टनर, तुम्‍हारा नाम तो जाना पहचाना है।'मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ कि देश का लब्‍ध प्रतिष्‍ठित लेखक मुझे जानता है। बातचीत के दौरान उन्‍होंने उदयपुर-दर्शन की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। होटल से हम दोनों सिटी पैलेस, म्‍यूजियम, सहेलियों की बाड़ी, फतेहसामगर पर आवारागर्दी करने निकल पड़े। दाल-बाटी की संगत की।उन दिनों वे उत्‍सव' फिल्‍म के संवाद लिख रहे थे। वसन्‍त सेना पर बड़ी बेबाक टिप्‍पणियां करते रहे। वसन्‍त, होली, कामदेव पर वे लगातार बोलते रहे। मैं श्रवण लाभ लेता रहा। सायंकाल कवि सम्‍मेलन में ठंड बढ़ जायेगी, अतः एक शाल उन्‍होंने मंगवाई।इस पहली मुलाकात के बाद मैं मुम्‍बई गया। तो मानवसरोवर होटल में उनसे मेरी फिर मुलाकात हुई। बातचीत हिन्‍दी व्‍यंग्‍य लेखन, नाटकों पर चल पड़ी। कई मित्रों पर बड़ी आत्‍मीयतापूर्ण टिप्‍पणियां उन्‍होंने कीं।कवि सम्‍मेलन के सिलसिले में वे अगली बार जयपुर आय…

कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता : हवाई जहाज़ या चिड़िया

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हवाई जहाज या चिड़ियाडा० कान्ति प्रकाश त्यागीएक बार अम्मा,पिताजी ,का खाना पहुंचाने गईमुझे भी कुछ पकड़ाकर ,साथ में लिवा ले गईपिताजी हल चलाते, कुछ गुनगुनाते थेशायद बैलों को ही, कुछ समझाते थेअम्मा को देखते ही,हल रोक दियाथोड़े से पानी से,हाथ मुंह धो लियावे गुड़ प्याज़ से,खाना खाते रहेअम्मा से ही ,कुछ बतियाते रहे
आकाश में उड़ती, एक चीज़ देखीअज़ीब आवाज़ करती चीज़ देखीपिताजी से पूछा ,यह क्या हैचील है, गिद्ध है,अथवा कौआ हैइतने ज़ोर से शोर,क्या कोई हौआ हैजैसे पानी में चलने वाला,पानी का जहाज़ हैवैसे यह हवा में उड़ने वाला,हवाई जहाज़ है
इसमें कौन लोग बैठते हैं, और कैसे बैठते हैंबड़े लोग बैठते हैं, मालूम नहीं कैसे बैठते हैंछोटे से दिमाग में, अनेक सवाल आएडर के कारण, उनसे से पूछ नहीं पाएक्या हम बड़े नहीं,हम क्यूं नहीं बैठेवे कौन लोग हैं,जो अब तक बैठेचौपाल पर कुछ लोग , हुक्का पी रहे थेछज्जू ताऊ को बड़ा आदमी कह रहे थे
छज्जू ताऊ के घर पहुंच गएहाथ जोड़ कर पैरों में पड़ गएपुचकारा,अच्छी तरह आशीर्वाद दियासुबह आने का कारण पूछ लियाताऊ जी !, क्या आप बड़े आदमी है ?.क्यूं बेटा ! , बड़े आदमी तो हैंक्या आप हवाई जहाज़ में बैठे हैं ?.
यदि ब…

श्याम यादव का आलेख : पत्रकारिता की पवित्रता पर प्रश्नचिह्न

आलेख- सवाल पत्रकारिता की पवित्रता पर ?- श्याम यादवदेश के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिह शेखावत ने पद्मश्री से सम्मानित और वरिष्ठ पत्रकार अभय छजलानी के नागरिक अभिनन्दन के अवसर पर पत्रकारिता से वैसी ही उम्मीद और आशा की जैसी देश की आजादी के पूर्व पत्रकारिता ने देश की आजादी में निभाई थी । पत्रकारिता से उन्होंने उम्मीद जताई कि वह देश की जड़ों में जकडे भ्रष्टाचार को वह उखाड़ फैंकेगी। शेखावत ही क्यों, देश का आम आदमी भी प्रजातन्त्र के इस चौथे स्तम्भ से ऐसी ही उम्मीद की आशा कर सकता है ।वैश्वीकरण के इस दौर में जब दुनिया सिमटती जा रही है ,सामाजिक परिवेश का तानाबाना, संस्कृति और सभ्यता को परे रख कर बुना जा रहा हो। उपभोक्तावाद और उदारीकरण ने व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं को सर्वोपरि कर दिया हो और इस महत्वकांक्षा को पाने के लिए तमाम वर्जनाओं को तोड़ने को तत्पर रहने वाले आम आदमी के बीच से जन्मे पत्रकार से पत्रकारिता के मापदण्ड़ों को छूने की अपेक्षा करना क्या उचित है ?आज सब ओर जब बदलाव की बयार बह रही हो तो यह कैसे संभव हो सकता है कि समाज से ही उपजा पत्रकार और उसकी पत्रकारिता का मापदण्ड़ नही बदलेगा? यह कोई आरोप नह…

हरि भटनागर की कहानी : भय

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उस लड़के को देखकर मैं यकायक डर गया जो मेरे घर के सामने आ खड़ा हुआ था।लड़का फटीचर हालत में था। तन पर बहुत ही गंदी, जगह-जगह फटी बनियान थी और पैंट गंदी तो थी ही, इतनी बड़ी थी कि किसी तरह वह उसे सँभाले था। पाँयचे जमीन पर लथर रहे थे और ऐसा लगता था पाँयचों की जगह पन्नी बँधी हो।उस लड़के को देखते ही मेरे जेहन में एक बात उभरी कि इसे कहीं देखा है। जेहन को कुरेद ही रहा था तो याद आया कि कुछ ही दिन पहले यह लड़का पुल की रेलिंग पर सोया हुआ था। यह कुछ ऐसा निश्चेष्टï और गहरी नींद में सोया पड़ा था कि राहगीरों को भ्रम हुआ कि चल बसा। लोगों की वहाँ भीड़ लग गई थी। एक आदमी ने उसे अपने छाते से कई बार कोंचा तब भी वह निश्चेष्टï और बेहिस ही बना रहा। तभी किसी ने उसके खुले मुँह पर पानी डाला तो वह हाँफता - गाली देता उठ बैठा। थोड़ी देर तक वह आँखें मलता रहा, मच्छरों से घायल गर्दन खुजाता रहा, फिर यकायक उठकर भाग खड़ा हुआ था।यह वही लड़का था। यही कोई नौ-दस साल का होगा, लेकिन अपनी उम्र से बड़ा लग रहा था। दुबला-पतला हडिय़ल और निहायत ही गंदा था जैसे महीनों से नहाया न हो। सिर के झोंटे उलझे और लटियाए थे जिनमें वह उँगलियाँ फेर…

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रचनाकार

रवि रतलामी

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