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May 2009
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आतंकवाद को निर्मूल करने के लिए सर्व धर्म समभाव

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

धर्म की प्रासंगिकता एक व्‍यक्‍ति की मुक्‍ति में ही नहीं है। धर्म की प्रासंगिकता एवं प्रयोजनशीलता शान्‍ति, व्‍यवस्‍था, स्‍वतंत्रता, समता, प्रगति एवं विकास से सम्‍बन्‍धित समाज सापेक्ष परिस्‍थितियों के निर्माण में भी निहित है।

धर्म साधना की अपेक्षा रखता है। धर्म के साधक को राग-द्वेषरहित होना होता है। धार्मिक चित्त प्राणिमात्र की पीड़ा से द्रवित होता है। तुलसीदास ने कहा- ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई'। सत्‍य के साधक को बाहरी प्रलोभन अभिभूत करने का प्रयास करते हैं। मगर वह एकाग्रचित्त से संयम में रहता है। प्रत्‍येक धर्म के ऋषि, मुनि, पैगम्‍बर, संत, महात्‍मा आदि तपस्‍वियों ने धर्म को अपनी जिन्‍दगी में उतारा। उन लोगों ने धर्म को ओढ़ा नहीं अपितु जिया। साधना, तप, त्‍याग आदि दुष्‍कर हैं। ये भोग से नहीं, संयम से सधते हैं। धर्म के वास्‍तविक स्‍वरूप को आचरण में उतारना ही वास्‍तविक धर्म है। महापुरुष ही सच्‍ची धर्म-साधना कर पाते हैं।

इन महापुरुषों के अनुयायी जब अपने आराध्‍य-साधकों जैसा जीवन नहीं जी पाते तो उनके नाम पर सम्‍प्रदाय, पंथ आदि संगठनों का निर्माण कर, भक्‍तों के बीच आराध्‍य की जय-जयकार करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री मान लेते हैं। अनुयायी साधक नहीं रह जाते, उपदेशक हो जाते हैं।ये धार्मिक व्‍यक्‍ति नहीं होते, धर्म के व्‍याख्‍याता होते हैं। इनका उद्‌देश्‍य धर्म के अनुसार अपना चरित्र निर्मित करना नहीं होता, धर्म का आख्‍यान मात्र करना होता है। जब इनमें स्‍वार्थ-लिप्‍सा का उद्रेक होता है तो ये धर्म-तत्त्वों की व्‍याख्‍या अपने स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगते हैं। धर्म की आड़ में अपने स्‍वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलाल अथवा ठेकेदार अध्‍यात्‍म सत्‍य को भौतिकवादी आवरण से ढकने का बार-बार प्रयास करते हैं। इन्‍हीं के कारण चित्त की आन्‍तरिक शुचिता का स्‍थान बाह्य आचार ले लेते हैं। पाखंड बढ़ने लगता है। कदाचार का पोषण होने लगता है।

आतंक एवं धर्म परस्‍पर एकदम विपरीतार्थक हैं। धर्म अहिंसा, उदारता, सहिष्‍णुता, उपकारिता एवं परहित के लिए त्‍याग सिखाता है जबकि आतंकवाद हिंस्रता,उग्रता एवं कट्‌टरता, नृशंसता, क्रूरता एवं गैर लोगों का संहार करना सिखाता है। मज़हब नेकचलनी सिखाता है; दहशतगर्दी वहशीपन सिखाता है। मज़हबी रहमदिल होता है; दहशतगर्द बेरहम होता है। मज़हबी मोमदिल होता है; दहशतगर्द पत्‍थरदिल होता है। मज़हबी बंदानवाज़ होता है; दहशतगर्द ज़ल्‍लाद होता है। मज़हबी हमदर्द और मेहरबान होता है; दहशतगर्द वहशी और दरिंदा होता है। मज़हबी सादिक होता है; दहशतगर्द दोज़खी होता है।

जब धर्म /मजहब का यथार्थ अमृत तत्त्व आतंकवादियों के हाथों में कैद हो जाता है तब धर्म/मजहब के नाम पर अधार्मिकता एवं साम्‍प्रदायिकता का जहर वातावरण में घुलने लगता है। धर्म /मजहब धर्म की रक्षा के लिए धर्म युद्‌ध / जे़हाद के नारे भोले भाले नौजवानों के दिमाग में साम्‍प्रदायिकता एवं उग्रवादी आतंक के बीजों का वपन कर उनको विनाश, विध्‍वंस, तबाही, जनसंहार के जीते जागते औज़ार बना डालते हैं।

कीचड़ को कीचड़ से साफ नहीं किया जा सकता। आतंकवाद को यदि मिटाना है, निर्मूल करना है तो धर्माचार्यों को धर्म /मजहब के वास्‍तविक एवं यथार्थ स्‍वरूप को उद्‌घाटित करना होगा, विवेचित करना होगा, मीमांसित करना होगा। सबको मिलजुलकर एकस्‍वर से यह प्रतिपादित करना होगा कि यदि चित्त में राग एवं द्वेष है, मेरे तेरे का भाव है तो व्‍यक्‍ति धार्मिक नहीं हो सकता। सबको मिलजुलकर एकस्‍वर से यह प्रतिपादित करना होगा कि धर्म न कहीं गाँव में होता है और न कहीं जंगल में बल्‍कि वह तो अन्‍तरात्‍मा में होता है। प्रत्‍येक प्राणी के अन्‍दर उसका वास है, इस कारण अपने अन्‍दर झाँकना चाहिए, अन्‍दर की आवाज सुनना चाहिए तथा अपने हृदय अथवा दिल को आचारवान, चरित्रवान, नेकचलन एवं पाकीज़ा बनाना चाहिए। शास्‍त्रों के पढ़ने मात्र से उद्धार सम्‍भव नहीं है। क्‍या किसी ‘परम सत्ता' एवं हमारे बीच किसी ‘तीसरे' का होना जरूरी है ? क्‍या अपनी लौकिक इच्‍छाओं की पूर्ति के लिए ईश्‍वर /अल्‍लाह के सामने शरणागत होना अध्‍यात्‍म साधना है ? क्‍या धर्म-साधना की फल-परिणति सांसरिक इच्‍छाओं की पूर्ति में निहित है ? सांसारिक इच्‍छाओं की पूर्ति के उद्‌देश्‍य से आराध्‍य की भक्‍ति करना धर्म है अथवा सांसारिक इच्‍छाओं के संयमन के लिए साधना-मार्ग पर आगे बढ़ना धर्म है ? क्‍या स्‍नान करना, तिलक लगाना, माला फेरना, आदि बाह्य आचार की प्रक्रियाओं को धर्म-साधना का प्राण माना जा सकता है ? धर्म की सार्थकता वस्‍तुओं एवं पदार्थों के संग्रह में है अथवा राग-द्वेष रहित होने में है ? धर्म का रहस्‍य संग्रह, भोग, परिग्रह, ममत्‍व, अहंकार आदि के पोषण में है अथवा अहिंसा, संयम, तप, त्‍याग आदि के आचरण में ?

यदि हम भारतवर्ष के संदर्भ में विचार करें तो उपनिषद्‌ युग में दर्शन और चिन्‍तन के धरातल पर जितनी विशालता, व्‍यापकता एवं मानवीयता विद्‌यमान रही परवर्ती काल में, विशेष रूप से मध्‍य युग में वैयक्‍तिक एवं सामाजिक आचरण के धरातल पर नहीं रही। जब चिन्‍तन एवं व्‍यवहार में विरोध उत्‍पन्‍न हो गया तो भारतीय समाज की प्रगति एवं विकास की धारा भी अवरुद्ध हो गयी। उदाहरणार्थ, दर्शन के धरातल पर उपनिषद्‌ के चिन्‍तकों ने प्रतिपादित किया था कि यह जितना भी स्‍थावर जंगम संसार है, वह सब एक ही परब्रह्म के द्वारा आच्‍छादित है। उन्‍होंने संसार के सभी प्राणियों को ‘आत्‍मवत्‌' मानने एवं जानने का उद्‌घोष किया था, मगर सामाजिक धरातल पर समाज के सदस्‍यों को उनके गुणों के आधार पर नहीं अपितु जन्‍म के आधार पर जातियों, उपजातियो, वर्णों, उपवर्णों में बाँट दिया गया तथा इनके बीच ऊँच-नीच की दीवारें खड़ी कर दी गईं।

मध्‍य युग में धर्म के बाह्य आचारों एवं आडम्‍बरों को सन्‍त कवियों ने उजागर किया। सन्‍त नामदेव ने ‘पाखण्‍ड भगति राम नही रीझें' कहकर धर्म के तात्त्विक स्‍वरूप की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट किया तो कबीर ने ‘जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ' कहकर

साधना-पथ पर द्विधारहित एवं संशयहीन मनःस्‍थिति से कामनाओं एवं परिग्रहों को त्‍याग कर आगे बढ़ने का आह्‌वान किया। पंडित लोग पढ़-पढ़कर वेदों का बखान करते हैं, किन्‍तु इसकी सार्थकता क्‍या है ? जीवन की चरितार्थता आत्‍म-साधना में है और ऐसी ही साधना के बल पर दादूदयाल यह कहने में समर्थ हो सके कि ‘काया अन्‍तर पाइया, सब देवन को देव'। कहने का तात्‍पर्य केवल यह कहना अभीष्‍ट है कि धर्म दर्शन की वास्‍तविक विशालता, व्‍यापकता एवं मानवीयता को स्‍वार्थी तत्‍व धर्म के ठेकेदार बनकर धर्म के नाम पर अपने स्‍वार्थां की सिदि्‌ध करने लगते हैं।

आत्‍मस्‍वरूप का साक्षात्‍कार अहंकार एवं ममत्‍व के विस्‍तार से सम्‍भव नहीं है। अपने को जानने के लिए अन्‍तश्‍चेतना की गहराइयों में उतरना होता है। धार्मिक व्‍यक्‍ति कभी स्‍वार्थी नहीं हो सकता। आत्‍म-गवेषक अपनी आत्‍मा से जब साक्षात्‍कार करता है तो वह ‘एक' को जानकर ‘सब' को जान लेता है, पहचान लेता है, सबसे अपनत्‍व-भाव स्‍थापित कर लेता है। आत्‍मानुसंधान की यात्रा में व्‍यक्‍ति एकाकी नहीं रह जाता, उसके लिए सृष्‍टि का प्रत्‍येक प्राणी आत्‍मतुल्‍य हो जाता है। एक की पहचान सबकी पहचान हो जाती है तथा सबकी पहचान से वह अपने को पहचान लेता है। भाषा के धरातल पर इसमें विरोधाभास हो सकता है, अध्‍यात्‍म के धरातल पर इसमें परिपूरकता है। जब व्‍यक्‍ति आत्‍मसाक्षात्‍कार के लिए प्रत्‍येक पर-पदार्थ के प्रति अपने ममत्‍व एवं अपनी आसक्‍ति का त्‍याग करता है तब वह राग-द्वेषरहित हो जाता है, वह आत्‍मचेतना से जुड़ जाता है, शेष सबके प्रति उसमें न राग रहता है न द्वेष। इसी प्रकार जब साधक सृष्‍टि के प्रत्‍येक प्राणी को आत्‍मतुल्‍य समझता है तब भी उसका न किसी से राग रह जाता है और न किसी से द्वेष। धर्म /मजहब का वास्‍तविक अभिप्राय व्‍यक्‍ति के चित्त का शुद्धिकरण है। संसार के सभी धर्म/मजहब/रिलिज़न समस्‍त प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव, प्रेमभाव तथा समभाव होना सिखाते हैं। संसार का कोई भी धर्म/मजहब/रिलिज़न निहत्‍थे लोगों, महिलाओं, बच्‍चों का संहार करना नहीं सिखाता। इस दृष्‍टि से ‘सर्वधर्म समभाव' में से यदि विशेषणों को हटा दें तो शेष रह जाता है ः ‘धर्म-भाव'। सम्‍प्रदाय में भेद दृष्‍टि है, धर्म में अभेद-दृष्‍टि। हमारी कामना है कि विश्‍व में इसी अभेद-दृष्‍टि का विकास हो। धर्म से पहले जुड़ने वाला कोई भी ‘विशेषण' किसी भी स्‍थिति में कभी भी अपने ‘विशेष्‍य' से अधिक महत्‍वपूर्ण न बने।

विश्‍व के सभी धर्मों/मजहबों /रिलिज़नों में नैतिक मूल्‍यों का प्रतिपादन है, मानव मूल्‍यों की स्‍थापना है, मानव-जाति में सदाचारण के प्रसार का प्रयास है। इन नैतिक मूल्‍यों, सद्‌गुणों एवं सदाचारों को व्‍यक्‍त करने वाली शब्‍दावली में भिन्‍नता होने के कारण बाह्यधरातल पर हमें धर्मों के साधना-पक्ष में अन्‍तर प्रतीत होता है, तात्त्विक दृष्‍टि से सभी धर्म मनुष्‍य के सद्‌पक्ष को उजागर करते हैं, सामाजिक जीवन में शान्‍ति, बन्‍धुत्‍व, प्रेम, अहिंसा एवं समतामूलक विकास के पक्षधर हैं। प्रत्‍येक धर्म में व्‍यक्‍ति के राग-द्वेष के कारणों को दूर करने का विधान स्‍पष्‍ट है। क्रोध से द्वेष का तथा अहंकार, माया एवं लोभ से राग का परिपाक होता है। व्‍यक्‍ति क्षमा द्वारा क्रोध को, मार्दव या विनम्रता द्वारा अहंकार को, आर्जव या निष्‍कपटता द्वारा माया या तृष्‍णा को तथा शुचिता द्वारा लोभ को जीतता है। तदनन्‍तर व्‍यक्‍ति सत्‍य का प्रकाश प्राप्‍त कर पाता है। संयम के द्वारा व्‍यक्‍ति इन्‍द्रियों की विषय-उन्‍मुखता पर प्रतिबन्‍ध लगाता है या उन्‍हें नियंत्रित करता है। तप रूपी अग्‍नि में कषाय, वासनाएँ, कल्‍मषताएँ जल जाती हैं। इसके बाद व्‍यक्‍ति संचित पदार्थों का त्‍याग करता है, वस्‍तुओं के प्रति आसक्‍ति समाप्‍त करता है तथा काम भाव को संयत कर काम-वासना पर विजय प्राप्‍त करता है। विभिन्‍न धर्मों के आचार्यों को धर्म के साधना पक्ष की समानता को उजागर करने का प्रयास करना चाहिए।

आतंकवाद को यदि निर्मूल करना है तो सभी धर्मों / मजहबों के धर्मगु़रुओं/मौलवियों को सर्वधर्म समभाव की उदात्त चेतना का विकास करना होगा। मतवादों का भेद हमारे ज्ञान एवं प्रतिपादन शक्‍ति की अपूर्णता के कारण है। एकांगी प्रतिपादन के कारण वे परस्‍पर विरोधी प्रतीत होते हैं। विरोधों का शमन सम्‍भव है। प्रतीयमान विरोधी दर्शनों में समन्‍वय स्‍थापित किया जा सकता है। यह अलग से विवेचना की अपेक्षा रखता है। सम्‍प्रति, यह कहना अभीष्‍ट है कि -“ईश्वर अल्‍लाह तेरो नाम, सबको सन्‍मति दे भगवान।”

 

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प्रियेश दत्त मालवीय की कलाकृतियाँ उनके निर्माण के लिहाज से वाकई अजूबा हैं, मगर दर्शनीयता और कला में नहीं. प्रियेश गर्म प्रेस से कैनवस और कागज पर रंग उकेरते हैं, पारंपरिक ब्रश और रंग से नहीं. निश्चित तापमान पर गर्म प्रेस को कागज या कैनवस पर रखते हैं और गरमी से जब कागज और केनवस के टिशू धूसर रंग प्राप्त कर लेते हैं, तो उनके बीच, उनके ओरिएंटेशन और प्रभाव डालते हुए प्रियेश आकृतियों और दृश्यों की रचना करते हैं जो अपने आप में अनूठा तो होता ही है, परिपूर्ण और दर्शनीय भी होता है.

प्रियेश कहते हैं – गर्म प्रेस को कैनवस पर संतुलित अवधि तक स्पर्श करने से कैनवस के अमूर्त रूप में मौजूद पीले, कत्थई व काले रंग के विभिन्न ‘टोन’ स्वतः ही उभरने लगते हैं, साथ ही मछली का सरलतम आकार व लहरें भी सौगात रूप में प्राप्त होती हैं, जो पानी के निर्मल संसार को प्रकट करती है. तदोपरांत रंग ब्रश के माध्यम से लगाते ही कृति अपने खामोश उद्देश्य को प्रदर्शित करने में सक्षम होती है और यही मेरी कला का अभीष्ट भी है.

प्रस्तुत है उनकी कुछ नायाब कलाकृतियाँ :

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(माखनलाल चतुर्वेदी की मूल रचना ‘साहित्य देवता’ आज के ‘चिट्ठाकार देव’ उर्फ ‘ब्लॉगर देवता’ पर क्या सटीक नहीं बैठती? पढ़ें और मजे लें --)

 

साहित्य देवता

माखनलाल चतुर्वेदी

 

मैं तुम्हारी एक तसवीर खींचना चाहता हूँ । “परन्तु भूल मत जाना कि मेरी तसवीर खींचते खींचते तुम्हारी भी एक तसवीर खिंचती चली आ रही है” अरे, मैं तो स्वयं ही अपने भावी जीवन की एक तसवीर अपने अटैची केस में रखे हुए हूँ । तुम्हारी बना चुकने के बाद मैं उसे प्रदर्शनी में रखने वाला हूँ । किन्तु मेरे मास्टर मैं यह पहले देख लेना चाहता हूँ_ कि मेरे भावी जीवन को किस तरह चित्रित कर तुमने अपनी जेब में रख छोड़ा है ।

“प्रदर्शनी में रखो तुम अपनी बनाई हुई, और मैं अपनी बनाई हुई रख दूँ केवल तुम्हारी तस्वीर।”

ना सेनानी मैं किसी भी आईने पर बिकने नहीं आया । मैं कैसा हूँ यह पतित होते समय खूब देख लेता हूँ । चढ़ते समय तो तुम्हीं केवल तुम्हीं दीख पड़ते हो ।

“क्या देखना है ?”

तुम्हें; और तुम कैसे हो यह कलम के घाट उतारने के समय यह हरगिज नहीं भूल जाना है कि तुम किसके हो ।

“आज चित्र खींचने की बेचैनी क्यों है ?”

कल तक मैं तुम्हारा मोल तोल कूता करता था । आज अपनी इस वेदना को लिखने के आनन्द का भार मुझसे नहीं सँभलता ।

“सचमुच पत्थर की कीमत बहुत थोड़ी होती है; वह बोझीला ही अधिक होता है।

बिना बोझ के छोटे पत्थर भी होते हैं; जिनमें से एक एक की कीमत पचासों हाथियों से नहीं कूती जाती । परन्तु...

“परन्तु क्या?”

मेरे प्रियतम तुम वह मूल्य नहीं हो जिसकी अभागे गाहक की अड़चनों को देख कर, अधिक से अधिक माँग की जाती है ।

हाँ, तो तुम्हारा चित्र खींचना चाहता हूं । मेरी कल्पना की जीभ को लिखने दो कलम की जीभ को बोल लेने दो । किन्तु, हृदय और मसिपात्र दोनों तो काले हैं । तब मेरा प्रयत्न, चातुर्य का अर्थ विराम, अल्हड़ता का अभिराम केवल धवलताका गर्व गिराने वाला श्याम मात्र होगा । परन्तु यह काली बूँदें अमृत बिंदुओं से भी अधिक मीठी अधिक आकर्षक और मेरे लिए अधिक मूल्यवान है । मैं उनसे आराध्य चित्र जो बना रहा हूँ।

***

कौन सा आकार दूँ ? मानव हृदय के मुग्ध संस्कार जो हो । चित्र खींचने की सुध कहाँ से लाऊँ । तुम अनन्त जाग्रत आत्माओं के ऊँचे और गहरे, -पर स्वप्न जो हो ! मेरी काली कलम का बल समेटे नहीं सिमटता । तुम कल्पनाओं के मन्दिर में बिजली की व्यापक चकाचौंध जो हो । मानव सुख के फूलों और लड़ाके सिपाही के रक्त बिन्दुओं के संग्रह तुम्हारी तसवीर खीचूँ मैं ? तुम तो वाणी के सरोवर में अन्तरात्मा के निवासी की जगमगाहट हो । लहरों से परे पर लहरों में खेलते हुए । रजत के बोझ और तपन से खाली पर पंछियों, वृक्ष राजियों और लताओं तक को रुपहलेपन में नहलाए हुए।

वेदनाओं के विकास के संग्रहालय तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ? मानव जीवन की अब तक पनपी हुई महत्ता के मन्दिर, ध्वनि की सीढियों से उतरता हुआ ध्येय का माखनचोर, क्या तुम्हारी गोद के कोने में ‘राधे’ कहकर नहीं दौड़ा आ रहा है ? अहा, तब तो तुम जमीन को आसमान से मिलाने वाले जीने हो; गोपाल के चरण चिह्नों को साध साधकर चढ़ने के साधन ! ध्वनि की सीढियाँ जिस क्षण लचक रही हों और कल्पना की सुकोमल रेशम डोर जिस समय गोविन्द के पदारविन्द के पास पहुँच कर झूलने की मनुहार कर रही हो उस समय यदि वह झूल पड़ता होगा? आह, तुम कितने महान् हो ? इसीलिए लाँगफेलो बेचारा तुम्हारे चरण चिह्नों के मार्ग की कुञ्जी तुम्हारे ही द्वार पर लटका गया है, मेरे मास्टर । चिड़ियों की चहक का संगीत, मैं और मेरी अमृत निस्यंदिनी गाय ब्रज लता दोनों सुनते हैं । “सखि चलो सजन के देस, जोगन बन के धूनी •डालेंगे” - मैं और मेरा घोड़ा दोनों जहाँ थे वहीं “शम्भु” जी ने अपनी यह तान छेड़ी थी । परन्तु वह तो तुम्हीं थे, जिसने द्विपद और चतुष्पद का विश्व को निगूढ़ तत्त्व सिखाया । अरे, पर मैं तो भूल ही गया, मैं तो तुम्हारी तस्वीर खींचने वाला था न?

हाँ? तो अब मैं तुम्हारी तसवीर खींचना चाहता हूँ । पशुओं को कच्चा खाने वाली जबान और लज्जा ढकने के लिए लपेटी जाने वाली वृक्षों की छालें, वे इतिहास से भी परे खड़े हुए हैं और यह देखो श्रेणी बद्ध अनाज के अंकुर और शाहजादे कपास के वृक्ष बाकायदा अपने ऐश्वर्य को मस्तक पर रख कर भूपाल बनने के लिए वायु के साथ होड़ बद रहे हैं । इन दोनों जमानों के बीच की जंजीर तुम्हीं तो हो । विचारों के उत्थान और पतन तथा सीधे और टेढ़े पन को मार्ग दर्शक बना तुम्हीं न कपास के तंतुओं से झीने तार खींचकर विचार ही की तरह आचार के जगत् में कल्याणी पांचाली वाणी की लाज बचा रही हो ?

कितने दुःशासन आये और चले गये । तुम्हारी बीन से रात को तड़पा देने वाली सोरठ गाई थी और सबेरे विश्व संहारकों से जूझने जाते समय उसी बीन से युद्ध के नक्कारे पर डंके की चोट लगाई गई थी । नगाधिराजों के मस्तक पर से उतरने वाली निम्नगाथाओं की मस्ती भरी दौड़ पर और उनसे निकलने वाली लहरों की कुरबानी से हरियाली होने वाली भूमि पर लजीली पृथ्वी से लिपटे तरल नीलाम्बर महासागरों पर और उनकी लहरों को चीर कर गरीबों के रक्त से कीचड़ सान, साम्राज्यों का निर्माण करने के लिए दौड़ने वाले जहाजों के झंडों पर तुम्हीं केवल तुम्हीं लिखे दीखते हो ।

इंग्लैंड का प्रधान मन्त्री, इटली का •डिक्टेटर, अफगानिस्तान का पदच्युत, चीन का ऊंघ कर जागता हुआ और रूस का सिंहासन उलटने और क्रान्ति से शान्ति का पुण्याह्वान करने वाला गरीब यह तो तुम्हीं हो । यदि तुम स्वर्ग न उतारते तो मन्दिरों में किसकी आरती उतरती ? वहाँ चमगादड़ टँगे रहते, उलूक बोलते । मस्तिष्क के मन्दिर जहाँ भी तुमसे खाली हैं यही तो हो रहा है । कुतुबमीनारों और पिरामिडों के गुम्बज तुम्हारे ही आदेश से आसमान से बातें कर रहे हैं ।

आँखों की पुतलियों में यदि तुम कोई तसवीर न खींच देते तो वे बिना दाँतो के ही चोंथ डालतीं, बिना जीभ के ही रक्त चूस लेतीं ।

वैद्य कहते हैं धमनियों से रक्त की दौड़ का आधार हृदय है - क्या हृदय तुम्हारे सिवा किसी और का नाम है ?

व्यास का कृष्ण और वाल्मीकि का राम किसके पंखों पर चढ़ कर हजारों वर्षों की छाती छेदते हुए आज भी लोगों के हृदयों में विराज रहे हैं । वे चाहे कागज के बने हों चाहे भोज पत्रों के वे पंख तो तुम्हारे ही थे ।

रूठो नहीं, स्याही के शृंगार मेरी इस स्मृति पर तो पत्थर ही पड़ गये कि मैं तुम्हारा चित्र खींच रहा था ।

****.

परन्तु तुम सीधे कहाँ बैठते हो ? तुम्हारा चित्र ? बड़ी टेढ़ी खीर है । सिपहसालार तुम देवत्व को मानवत्व की चुनौती हो । हृदय से छन कर, धमनियों में दौड़ने वाले रक्त की दौड़ हो और हो उन्माद के अतिरेक के रक्त तर्पण भी ।

आह, कौन नहीं जानता कि तुम कितनों ही की बंसी की धुन हो; धुन वह, जो गोकुल से उठ कर विश्व पर अपनी मोहिनी का सेतु बनाये हुए है । काल की पीठ पर बना हुआ वह पुल मिटाये मिटता नहीं भुलाये भूलता नहीं ।

ऋषियों का राग, पैगम्बरों का पैगाम, अवतारों की आन युगों को चीरती किस लालटेन के सहारे हमारे पास तक आ पहुँची ? वह तो तुम हो । और आज भी कहाँ ठहर रहे हो ? सूरज और चांद को अपने रथ के पहिये बना, सूझ के घोड़ों पर बैठे बढे ही तो चले जा रहे हो प्यारे । उस समय हमारे सम्पूर्ण युग का मूल्य तो मेल ट्रेन में पड़ने वाले छोटे से स्टेशन का-सा भी नहीं होता ।

पर इस समय तो तुम मेरे पास बैठे हो !

तुम्हारी एक मुट्ठी में भूतकाल का देवत्व छटपटा रहा है - अपने समस्त समर्थकों समेत; दूसरी मुट्ठी में विश्व का विकसित पुरुषार्थ विराजमान है ।

धूल के नन्दन में परिवर्तित स्वरूप कुञ्जबिहारी आज तो कल्पना की फुलवारियाँ भी विश्व की स्मृतियों में तुम्हारी तर्जनी के इशारों पर लहलहा रही है ।

तुम नाथ नहीं हो, इसीलिए कि मैं अनाथ नहीं हू । किन्तु हे अनन्त पुरुष यदि तुम विश्व की कालिमा का बोझ सँभालने मेरे घर न आते तो ऊपर आकाश भी होता और नीचे जमीन भी; नदियाँ भी बहतीं, और सरोवर भी लहराते; परन्तु मैं और चिड़ियाँ, दोनों और छोटे मोटे जीव जन्तु स्वाभाविक लता पत्रों और अन्न कणों से अपना पेट भरते होते । मैं भर वैशाख में भी वृक्षों पर शाखा मृग बना होता । चीते सा गुर्राता, मोर सा कूकता, और कोयल सा गा भी देता ।

परन्तु मेरा और विश्व के हरियालेपन का उतना ही सम्बन्ध होता जितना नर्मदा के तट पर हरसिंगार की वृक्ष राशि में लगे हुए टेलिग्राफ के खम्भों का नर्मदा से कोई सम्बन्ध हो ।

उस दिन भगवान् ‘समय’ न जाने किसका, न जाने कब कान उमेठ कर चलते बनते ? मुझे कौन जानता ? विन्ध्य की जामुनों और अरावली की खिरनियों के उत्थान और पतन का इतिहास किसके पास लिखा है ! इसीलिए तो मैं तुमसे कहता हूँ -

“ऐसे ही बैठे रहो ऐसे ही मुसकाहु ।“

“क्यों?”

इसलिए कि अन्तरतट की तरल तूलिकायें समेट कर अराजक ! मैं तुम्हारा चित्र खींचना चाहता हूँ।

***.

क्या तुम अराजक नहीं हो ? कितनी गद्दियाँ तुमने चकनाचूर नहीं की ? कितने सिंहासन तुमने नहीं तोड़ डाले ? कितने मुकुटों को गला कर घोड़ों की सुनहली खोगीरें नहीं बना दी गईं ?

सोते हुए अखंड नरमुण्डों के जागरण, नाड़ी रोगी के ज्वर की माप बताने में चूक सकती है, किन्तु तुम मुग्ध होकर भी जमाने को गणित के अकों जैसा नपा तुला और दीपक जैसा स्पष्ट निर्माण करते चले आ रहे हो । आह, राज्य पर होने वाले आक्रमण को बरदाश्त किया जा सकता है, किन्तु मनोराज्य की लूट तो दूर, उस पर पड़ने वाली ठोकर कितने प्रलय नहीं कर डालती ।

सोने के सिहासनों पर विराजमानों की हत्याओं से जमाने के मनस्वियों के हाथ लाल हैं और नक्शे पर दिये जाने वाले रंग की तरह इस शक्ति की सीमा निश्चित है । परन्तु मनोराज्य की मृगछाला पर बैठे हुए बिना शस्त्र और बिना सेना के बृहस्पति के अधिकार को चुनौती कौन दे सके ?

मनोराज्य पर छूटने वाला तीर प्रलय की प्रथम चेतावनी लेकर लौटता है । म्रनोराध्य के मस्तक पर फहराता हुआ विजय-ध्वज जिस दिन धूलि धूसरित होने लगे उस दिन मनुष्यत्व दूरबीन से भी ढूंढे कहाँ मिलेगा ? उस दिन ज्वालामुखी फट पड़ा होगा, वज्र टूट पड़ा होगा ।

प्यारे, शून्य के अंक, गति के संकेत और विश्व के पतन पथ की तथा विस्मृति की गति की लाल झंडी तुम्हीं तो हो । तुम्हारा रंग उतरने पर वह आत्म तर्पण ही है जो फिर तुम पर लालिमा बरसा सके । जिस मन्दिर का झंडा लिपट जाय, वह डांवा डोल हो उठे उसमें नर नारायण नहीं रहते । उस देश को पराये चरण अभी धोने हैं, अपने मांस से पराये चूल्हे अभी सौभाग्यशील बनाये रखने हैं, पराई उतरन अभी पहननी हैं । मैं प्रियतम, तुम्हारी- “उतरन पहनी हुई तसवीर नहीं खींचूंगा।”

****.

उतरन - बुरी तरह स्मरण हो आया । बुरे समय, बुरे दिन । अपना कुछ न रहने वाला ही उतरन पहने । जो क्षिïतज के परे अपनी अँगुली पहुँचा पावे, जो प्रत्यक्ष् के उस ओर रखी हुई वस्तु को छू सके वह उतरन क्यों पहने ?

फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओं का आपस का लेन देन उतरन नहीं, वह तो भाईचारे की भेंट है ।

एक भिखारिन माँ मेरी भी है । उसने भी रत्न प्रसव किये हैं । पत्थरों से बोझीले; ककड़ों से गिनती में अधिक; खाली अंतःकरण में मृदंग से अधिक आवाज करने वाले।

मातृ मन्दिर में उतरन एक दूसरे से होड़ ले रहा है । उतरन संग्रह की बहादुरी का इतिहास उसकी पीठ पर लदा हुआ है ।

गत वर्ष होने वाले विश्व परिवर्तनों के छपे पुराने अखबारों पर आज हम हवाई जहाज के नये आविष्कार की तरह बहस करते हैं ।

वीणा, बंसी और जल तरंग का सर्वनाश ही नहीं हो चुका, हारमोनियम और पियानो भी किस काम आएँगे ?

हमारा कोई गीत भी तो हो ? कला से नहलाया हुआ, हृदय तोड़ कर निकला हुआ।

वीणा में तार नहीं; दिल में गुबार नहीं ।

न जाने हम तुम्हारा जन्मोत्सव मनाते हैं या मरण त्योहार ? बैलगाड़ी पर बैठे बैठे हवाई जहाज देखा करते हैं । बिल्ली के रास्ता काट जाने पर हमारा अपशकुन होता है; किन्तु बेतार का तार स्विट्जरलैंड की खबर आस्ट्रेलिया पहुँचा कर भी हमारी श्रुतियों को नहीं छूता । तब हमारी सरस्वती से तो उसका सम्बन्ध ही कैसे हो सकता है ? एंजिन के रूप में धधकती हुई ज्वालामुखी का एक व्यापार हमारी छाती पर हो रहा है ।

प्यारे, इस समय ऊधोगति की ज्वाल मालाओं में से ऊँचा उठने के लिए आकर्षण चाहिए । कृषकों ने इसी लालच से तुम्हारा नाम कृष्ण रखा होगा ।

जरा तुम युग संदेशवाहिनी अपर्ना बांसुरी लेकर बैठ जाओ । रामायण में जहाँ बालकांड है वहाँ लंकाकांड भी तो है । तुम्हारी तान में भैरवी भी हो, कलिंगड़ा भी हो ।

जरा बंसी लेकर बैठ जाओ । मैं तुम्हारा चित्र मुरलीधर के रूप में चाहता हूँ ।

****.

“शिव संहार करते हैं” - कौन जाने ? किन्तु मेरे सखा तुम जरूर महलों के संहारक हो । झोपड़ियों ही से तुम्हारा दिव्य गान उठता है । किन्तु यह तुम्हारी पर्णकुटी देखो । जाले चढ़ गये हैं, वातायन बन्द हो गये हैं । सूर्य की नित्य नवीन प्राण-प्रेरक और प्राणपूरक किरणों की यहाँ गुजर कहाँ ? वे तो द्वार खटखटा कर लौट जाती हैं ।

द्वार पर चढ़ी हुई बेलें पानी की पुकार करती हुई बिना फलवती हुए ही अस्तित्व खो रही हैं । पितृ तर्पण करने वाले अल्हड़ों को लेकर मैं इस कुटी का कूड़ा साफ करने ही में लग जाना चाहता हूँ । कितने तप हुए किन्तु इस कुटिया में सूर्य दर्शन नहीं होते । मेरे देवता ! तुम्हारे मन्दिर की जब यह अवस्था किए हुए हूँ तब बिना प्रकाश बिना हरियालेपन, बिना पुष्प और बिना विश्व की नवीनता को तुम्हारे द्वार पर खड़ा किए, तुम्हारा चित्र ही कहाँ उतार पाऊँगा ?

विस्तृत नीले आसमान का पत्रक पाकर भी, देवता ! तुम्हारी तसवीर खींचने में शायद दैवी चितेरे इसीलिए असफल हुए, उन्होंने चन्द्र की रजतिमा की दावात में, कलम डुबोकर चित्रण की कल्पना पर चढने का प्रयत्न किया और प्रतीक्षा की उद्विग्नता में सारा आसमान धबीला कर चलते बने । इस बार मैं पुष्प लेकर नहीं, कलियाँ तोड़ कर आने की तैयारी करूँगा; और ऐ विश्व के प्रथम प्रभात के मन्दिर, उषा के तपोमय प्रकाश की चादर तुम्हें ओढ़ाकर, तुम्हारे उस अन्तरतट का चित्र खींचने आऊँगा जहाँ तुम अशेष संकटों पर अपने हृदय के टुकड़े बलि करते हुए, शेष के साथ खिलवाड़ कर रहे होगे ।

आज तो उदास पराजित और भविष्य की वेदनाओं की गठरी सिर पर लादे, बाग में उन कलियों के आने की उम्मीद में ठहरता हूँ, जिनके कोमल अन्तस्तल को छेद कर, उस समय जब तुम नगाधिराज का मुकुट पहने दोनों स्कंधों से आने वाले संदेशों पर मस्तक डुला रहे होगे, गंगी और जमुनी का हार पहने बंग के पास तरल चुनौती पहुँचा रहे होगे, नर्मदा और ताप्ती की करधनी पहने विन्ध्य को विश्व नापने का पैमाना बना रहे होगे, कृष्णा और कावेरी की कोरवाला नीलाम्बर पहने विजयनगर का संदेश पुण्य प्रदेश से गुजार कर सह्याद्रि और अरावली को सेनानी बना मेवाड़ में ज्वाला जगाते हुए देहली से पेशावर और भूटान चीर कर अपनी चिरकल्याणमयी वाणी से विश्व को न्योता पहुँचा रहे होगे; और हवा और पानी की बेड़ियाँ तोड़ने का निश्चय कर, हिन्द महासागर से अपने चरण धुलवा रहे होगे –

- ठीक उसी सन्निकट भविष्य में, हाँ सूजी से कलियों का अन्तःकरण छेद, मेरे प्रियतम मैं तुम्हारा चित्र खींचने आऊँगा । - तब तक चित्र खींचने योग्य अरुणिमा भी तो तैयार रखनी होगी ।

बिना मस्तकों को गिने और रक्त को मापे ही मैं तुम्हारा चित्र खींचने आ गया ।

देवता, वह दिन आने दो स्वर; स्वर सध जाने दो ।

***.

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(प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894) का यह व्यंग्यात्मक आलेख कोई सौ सवा सौ वर्ष पुराना है, मगर परिस्थितियाँ शायद अब भी वैसी ही नहीं हैं?)

इन महापुरुष का वर्णन करना सहज काम नहीं है । यद्यपि अब उनके किसी अंग में कोई सामर्थ्य नहीं रही अतः इनसे किसी प्रकार की ऊपरी सहायता मिलना असंभव सा है पर हमें उचित है कि इनसे डरें इनका सम्मान करे और इनके थोड़े से बचे खुचे जीवन को गनीमत जानें क्योंकि इन्होंने अपने बाल्यकाल में विद्या के नाते चाहे काला अक्षर भी न सीखा हो युवावस्था में चाहे एक पैसा भी न कमाया हो तथापि संसार की ऊंच नीच का इन्हें हमारी अपेक्षा बहुत अधिक अनुभव है इसी से शास्त्र की आज्ञा है कि वयोधिक शूद्र भी द्विजाति के लिए माननीय है । यदि हममें बुद्धि हो तो इनसे पुस्तकों का काम ले सकते हैं वरंच पढ़ने में आँखों को तथा मुख को कष्ट होता है न समझ पड़ने पर दूसरों के पास दौड़ना पड़ता है पर इनसे केवल इतना कह देना बहुत है कि हां बाबा, फिर क्या हुआ । हाँ बाबा ऐसा हो तो कैसा हो? बस बाबा साहब अपने जीवन भर का आन्तरिक कोषखोल कर रख देंगे । इसके अतिरिक्त इनसे •डरना इसलिए उचित है कि हम क्या हैं हमारे पूज्य पिता दादा ताऊ भी इनके आगे के छोकड़े थे । यदि यह बिगड़ें तो किसकी कलई नहीं खोल सकते 1 किसके नाम पर गट्टा सी नहीं सुना सकते ? इन्हें संकोच किसका है? बक्की के अलावा इन्हें कोई कलंक ही क्या लगा सकता है ? जब यह आप ही चिता पर एक पाँव रखे बैठे हैं कब्र में पाँव लटकाये हुए हैं तब इनका कोई कर क्या सकता है ।

यदि इनकी बातें कु बातें हम न सहें तो करें क्या?  यह तनिक सी बात में कष्टित और कुंठित हो जायँगे और असमर्थता के कारण सच्चे जी से शाप देंगे जो वास्तव में बड़े बड़े तीक्ष्ण शस्त्रों की भांति अनिष्टकारक होगा। जब कि महात्मा कबीर के कथनानुसार मरी खाल की हाय से लोहा तक भस्म हो जाता है तब इनकी पानी भरी खाल की हाय कैसा कुछ अमंगल नहीं कर सके ! इससे यही न उचित है कि इनके सच्चे अशक्त अन्तःकरण का आशीर्वाद लाभ करने का उद्योग करे क्योंकि समस्त धर्म ग्रन्थों में इनका आदर करना लिखा है। सारे राजनियमों में इनके लिये पूर्ण दण्ड की विधि नहीं है और सोच देखिए तो यह दया पात्र जीव है, क्योंकि सब प्रकार पौरुष से रहित हैं केवल जीभ नहीं मानती इससे आँय बाँय शाँय किया करते हें या अपनी खटिया पर थूकते रहते हैं । इसके सिवा किसी का कुछ बिगाड़ते ही नहीं हैं । हाँ इस दशा में दुनिया के झंझट छोड़ के भगवान का भजन नहीं करते, वृथा चार दिन के लिए झूठी हाय हाय में कुढ़ते कुढ़ाते रहते हैं । यह बुरा है । पर इसके लिए क्यों इनकी निन्दा की जाय ?

आजकल बहुतेरे मननशील युवक कहा करते हैं कि बुड्ढे खबीसों के मारे कुछ नहीं होने पाता वे अपनी पुरानी अकिल के कारण प्रत्येक देश हितकारक नव विधान में विघ्न खड़ा कर देते हैं । हमारी समझ में यह कहने वालों की भूल है नहीं तो सब लोग एक से ही नहीं होते । यदि हिकमत के साथ राह पर लाये जायँ तो बहुत से बुड्ढे ऐसे निकल आवेंगे जिनसे अनेक युवकों को अनेक भाँति की मौखिक सहायता मिल सकती है । रहे वे बुड्ढे जो सचमुच अपनी सत्यानाशी लकीर के फकीर अथवा अपने ही पापी पेट के गुलाम हैं । वे पहले हई  कै जने ? दूसरे अब वह समय नहीं रहा कि उनके कुलक्षण किसी से छिपे हों । फिर उनका क्या डर ? चार दिन के पाहुन कछुवा मछली अथवा कीड़ों की परसी हुई थाली, कुछ अमरौती खा के आये हैं नहीं कौवे के बच्चे हईं  नहीं, बहुत जियेंगे दस वर्ष । इतने दिन मर पचके दुनिया भर का पीकदान बन के, दस लोगों के तलवे चाट के अपने स्वार्थ के लिए पराये हित में बाधा करेंगे भी तो कितनी; सो भी जब देश भाइयों का एक बड़ा समूह दूसरे ढर्रे पर जा रहा है तब आखिर थोड़े ही दिन में आज मरे कल दूसरा दिन होना है ।

फिर उनके पीछे हम अपने सदुद्योगों में त्रुटि क्यों करें । जब थोड़ी सी घातों की जिन्दगी के लिए वे अपना बेढंगापन नहीं छोड़ते तो हम अपनी बृहजीवनाशा में स्वधर्म क्यों छोड़ें । हमारा यही कर्तव्य है कि उनकी शुश्रूषा करते रहें क्योंकि भले हों वा बुरे पर हैं हमारे ही । अतः हमें चाहिए कि अदब के साथ उन्हें संसार की अनित्यता अथवा ईश्वर धर्म देशोपकार एवं बन्धुवात्सल्य की सभ्यता का निश्चय कराते रहें । सदा समझाते रहें कि हमारे तो तुम बाबा ही हो । अगले दिनों के ऋषियों की भांति विद्यावृद्ध शानवृद्ध तपोवृद्ध हो तो भी बाबा हो और बाबा लोगों की भाँति ‘आपन पेट हाहू मैं ना देहों काहू’ का सिद्धान्त रखते हो तो भी वयोवृद्ध के नाते बाबा ही हो, पर इतना स्मरण रखो कि अब जमाने की चाल वह नहीं रही जो तुम्हारी जवानी में थी । इससे उत्तम यह  कि इस वाक्य को गाँठ बाँधो कि चाल वह चल कि ‘पसे मर्ग’ मुझे याद करें । काम वह कर कि जमाने में तेरा नाम रहे नहीं तो परलोक में बैंकुठ पाने पर भी उसे थूक-थूक  के नरक बना लोगे, इस लोक का तो कहना ही क्या है ।

अभी थूक खखार देख कुटुम्बवाले घृणा करते हैं, यदि वर्तमान करतूतें विदित हो गई तो सारा जगत् सदा थुड़ थुड़ करेगा । यों तो मनुष्य की देह ही क्या है जिसके यावदवयव घृणामय हैं, केवल बनानेवाले की पवित्रता के निहोरे श्रेष्ठ कहलाते हैं, नहीं तो निरी खारिज खराब हाल की खलीती है तिस पर भी उस अवस्था में जब कि

निवृत्ता भोगेच्छा परुषबाहुमानो विगलितः

समानाः स्वर्याताः सदपि सुहृदो जीवितसमाः ।

शनैर्यष्ट्युत्थानं धनतिमिररुद्धपि नयने,

अहो दुष्टः कायस्तपपि मरणापायचकितः ।।

यदि भगवच्चरणानुसरण एवं सदाचरण न हो सका तो हम क्या है राह चलनेवाले तक धिक्कारेंगे और कहेंगे कि ‘कहा धन धामेऐ धरि लेहुगे सरा मैं भये जरिन तऊ रामै न भजत हौ’ यदि समझ जाआगे तो अपना लोक परलोक बनाओगे दूसरों के लिए उदाहरण काम में लाओगे नहीं तो हमें क्या है हम तो अपनीवाली किये देते हैं तुम्ही अपने किये का फल पाओगे । लोग कहते हैं कि बारह बरसवाले को बैद्य क्या है, तुम तो परमात्मा की दया से पँचगुने छगुने दिन भुगता बैठे हो तुम्हें तो चाहिए कि दूसरों को समझाओ पर यदि स्वयं कर्त्तव्याकर्त्तव्य न समझो तो तुम्हें तो क्या कहें हमारी समझ को धिक्कार है जो ऐसे वाक्यरत्न ऐसे कुत्सित ठौर पर फेंका करती है।

इधर व्‍यंग्‍य में विषयों का अकाल है। समाचारों का अकाल है। घिसे पिटे लेखक घिसेपिटे विषयों पर घिसेपिटे व्‍यंग्‍य लिखकर घिसेपिटे स्‍थानों पर प्रकाशित कराकर घिसेपिटे चेक प्राप्‍त कर रहे हैं। कुछ लोग घोस्‍ट राइटिंग के घोस्‍ट के पीछे पड़े हुए है। हर व्‍यक्‍ति अपने आपको सफल समझता है और अन्‍य व्‍यक्‍ति उसे असफल, गलत, बेकार, नाकारा, निकम्‍मा घोषित करते रहते हैं।

जैसा कि आप जानते है हर सफल व्‍यक्‍ति की सफलता के पीछे एक महिला होती है और उस महिला के पीछे उस सफल व्‍यक्‍ति की पत्‍नी होती है। इधर मेरी अफलताओं की समस्‍त जिम्‍मेदारी मैं स्‍वयं लेता हूँ ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आये।

प्रारम्‍भ में मैंने खेलकूद के क्षेत्र में प्रयास किये। असफल रहा मैंने फिल्‍मों में घुसने का प्रयास किया असफल रहा। मैंने नाटकों में प्रयास किया मंच से दूर कर दिया गया। मैंने कविताएं लिखी किसी ने नहीं पढ़ी। मैंने आलोचना के क्षेत्र में हाथ पांव मारे आलोचना बेचारी आलू चना हो गई। मैंने विज्ञापन बनाये, उत्‍पादों की बिक्री घट गई। कक्षाओं में गम्‍भीरता से पढ़ाया छात्रों ने कक्षाओं में आना बन्‍द कर दिया। मैंने अफसरों की चमचागिरी के प्रयास किया, असफल रहा। सम्‍पादकों की जी हजूरी करने की कोशिश की, नहीं चल पाया।

मैंने महापुरूषों के फटे में टांग उड़ाने की कोशिश की। लोगों ने टांगे तोड़ दी। मैंने स्‍तम्‍भ लेखन के क्षेत्र में हाथ आजमाये और कई पत्र-पत्रिकाएं बन्‍द हो गई। मैंने फीचर लेखन के क्षेत्र में कोशिश की, असफल रहा। मैंने मंच पर हास्‍यास्‍पद रस की कविताएं पढ़ी, श्रोताओं ने सड़े अण्‍डों और टमाटरों से स्‍वागत किया। मंच पर एक पैर के जूते आये और नैपथ्‍य से दोनों पैरों के चले गये।

मैनें मोहल्‍ले में सामाजिक कार्यों का बीड़ा उठाया। पड़ोसियों ने सर कलम करने की चेतावनी दे डाली। असफलताओं का हिमालय ऊँचे से ऊँचा होता चला गया। जीवन असफलताओं से भरा हुआ है। जीवन है तो असफलताएं, परेशानियां है। मेरे दुःखी जीवन का दुःखड़ा खत्‍म होने का नाम ही नहीं लेता। मैंने एक पत्रिका के सम्‍पादन का भार ग्रहण किया और पत्रिका ने कुछ ही अंकों के बाद दम तोड़ दिया। विफलताओं का यह किस्‍सा और भी आगे चला। मैंने कई प्‍यार किये और हर एक में असफल रहा। जिससे प्‍यार किया उससे शादी नहीं करने की परम्‍परा का मैंने भी निर्वाह किया। मैंने विदेश जाकर काम करने के प्रयास किये, असफल रहा। मैंने सुदर्शन दिखने के प्रयास हेतु वर्जिश की, असफल रहा और काफी समय खाट पर पड़ा रहा। मेरी असफलताओं में बेचैनी, उच्‍च रक्‍तचाप, पेट की परेशानियों का बड़ा हाथ रहा। जब भी सफलता आने का समय होता कोई दूसरा बाजी मार लेता और मैं ठगा सा देखता रह जाता। पुरस्‍कारों के लिए प्रयास किया, असफल रहा। मैंने कलेण्‍डर को देखकर मौसमी लेखन शुरू करने का प्रयास किया, असफल रहा। आकाशवाणी, दूरदर्शन पर वार्ताएं पढ़ने की कोशिश की, असफल रहा।

मैं वकील, डॉक्‍टर, इन्‍जीनियर, नेता, अफसर भी नहीं बन सका। कुछ प्राकृतिक कारणों से मैं देवदासी भी नहीं बन सका।

असफलताओं का और मेरा चोली-दामन का साथ है। पूरा जीवन विफलताओं से भरा है और अन्‍धेरे में रोशनी का दिया टिमटिमा रहा है तो बस व्‍यंग्‍य का है। आप क्‍या सोचते है, जीवन में कौन सफल होता है। सफलता किसके चरण चूमती है? और क्‍यों? सफल हाने के लिए स्‍वाभिमान को क्‍यों बेचना पड़ता है। मैं गुरू था लोग गुरू घंटाल निकले। गुरू गुड़ और चेले शक्‍कर हो गये। यारों स्‍वाभिमान को घर पर छोड़ो और सफल हो जाओ या फिर मेरी तरह असफलताओं के गीत गाओं, और अन्‍त में शायर का कहना है।

मैं सजदे मैं नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।

पूरा बदन दर्द से दोहरा हुआ होगा॥

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-यशवन्‍त कोठारी,

86, लक्ष्‍मी नगर,

ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर - 302002

फोन ः 2670596

ईमेल - ykkothari3@yahoo.com

हुर्रे! वे चुनाव हार गए। उनके घर गया था। उनके सामने उनके लिए भगवान से उनकी हारी हुई कुर्सी की आत्‍मा के लिए शांति मांगने। किसी मंदिर, गुरूद्वारे में जाकर उनकी हार के लिए अगर भगवान से शांति की कामना करता तो उन्‍हें विश्‍वास ही न होता। कारण, वे अपने वोटरों से ताजा ताजा धोखा खाए हुए थे। उनके अपने चुनाव क्षेत्र के वोटर तो उनको खा ही गए दूसरे चुनाव क्षेत्र के वोटरों ने भी उनको नहीं बख्‍शा। और वे ये सोचकर वोटरों को खिलाते रहे कि अबके अपनी जीत का रिकार्ड बुक आफ गिन्‍नीज में अपने नाम लिखवा कर रहेंगे कि इस चुनाव क्षेत्र में जितने कुल वोट थे ये उससे भी अधिक वोटों से जीते। दूसरे वे सबको दिल खोलकर ये सोच खिलाते पिलाते रहे कि बस एक बार चुनाव जीत जाएं फिर सारे हिसाब न बराबर कर लूं तो मुझे आदमजात की औलाद न कहें।

पर कुर्सी ने उनकी न सुनी। नेता तो बहरे थे ही कम्‍बख्‍त अब ये कुर्सियां भी ऊंचा सुनने लगी हैं।

उनके घर हिम्‍मत करके घुसा तो वे महाशोक की मुद्रा में। असल में क्‍या है कि न भूखे श्‍ोर की मांद में जाना आसान होता है पर हारे हुए नेता के घर शोक करने जाना मुश्‍किल। वे शोक में इतने डूबे थे कि साक्षात्‌ सामने बैठे होने के बाद भी कहीं नजर न आ रहे थे। हे भगवान ! तू किसी नेता को हराकर उसके साथ इतनी बड़ ज्‍यादती क्‍यों करता है? वोटर थे कि उनके घर शोक मनाने सिर झुकाए मुसकराते हुए आ रहे थे ,कुछ देर वहां बैठ कर जैसे ही चाय ठंडा आ जाते, सुड़क कर जा रहे थे। उनके घर उनकी हार के गम में शामिल होने वालों का तांता लगा हुआ था। इतने लोग उन्‍हें अगर वोट देते तो कम से कम जमानत तो बचती।

मैं जैसे कैसे बीसियों को पछाड़ अपना रोना थोबड़ा उन्‍हें बता उनका सच्‍चा हिमायती होने के लिए उनके पास पहुंचा ही कि उनके चमचे ने घोषणा कि,‘ हारे हुए नेता जी अब किसी से नहीं मिलेंगे। अब उनका आत्‍म मंथन करने का समय शुरू हो रहा है। शोक प्रकट करने आए से मेरा निवेदन है कि वे फिर कभी नेता जी से समय लेकर आएं। आपके यहां आने पर जो आपको तकलीफ हुई उसके लिए नेता जी की ओर से मैं आपसे क्षमा मांगता हूं। पर नेता जी का आदेश है कि वे चाय ठंडा लेकर जरूर जाएं। नेता जी की आत्‍मा को शांति तभी मिलेगी। नेता जी की आत्‍मा को आपसे मिले वोट तो शांत कर नहीं सके, शायद आपकी प्रार्थना इनकी कुर्सी के लिए तड़पती आत्‍मा को शांत कर दे।'

चमचे के इतना कहते ही शोक प्रकट करने वालों में खुशी की लहर दौड़ गई। चलो असली रूप में आ जाएं। नकली भाव चहरे पर रखे हुए आदमी बहुत जल्‍दी थक जाता है न! लोग ठहाके लगाते हुए चाय ठंडा पी रहे थे और प्‍लास्‍टिक के गिलासों की गरदनें मरोड़ रहे थे।

हे समझदार वोटरो! नेता जी की गरदन तो मरोड़ कर रख दी, अब तो गुस्‍सा छोड़ो।

मैंने प्रेस का कार्ड दिखाया तो एक चमचे ने चेहरे पर तीनों लोकों का शोक फैलाए मुझे अंदर आने दिया। असल में मेरा प्रेस से कोई वास्‍ता नहीं। वो तो मेरे एक मित्र जो जबरदस्‍ती एक साप्‍ताहिक निकालते हैं, कि इस बहाने उन्‍हें सरकारी विज्ञापन भी मिल जाते हैं और जब किसी को परेशान करना हो तो उसे परेशान भी कर लेते हैं। उन्‍होंने मेरा प्रेस कार्ड बना दिया है कि कई बार काम आ जाता है, और देखिए काम आ भी गया।

चमचे ने नेता जी के कान में कुछ फुसफुसाया तो उनकी गई चेतना लौट कर आई।

वे वैसे ही बेआत्‍मा हो कुर्सी पर पड़े पड़े मरी आवाज में बोले,‘ आओ बैठो! किस अखबार से हो?'

‘ साप्‍ताहिक भड़ास से।' बे आत्‍मा के नेता के सिवाय इस मृत्‍यु लोक में और कौन बातें कर सकता है? मैंने उनका मौना झूलता देखा तो सोचा कि शायद मौने को लकवा मार गया हो सो पूछ बैठा,‘ ये मौने को क्‍या हो गया?'

‘जलसों में जा जाकर तलवारें उठा उठा कर झूल गया।' पता नहीं लोकतंत्र में जीत के लिए मंचों पर तलवारें लहराने को रिवाज कब चूकेगा।

‘ हमारे साप्‍ताहिक भड़ास ने आपकी फेवर में हवा बनाने की कोशिश तो पूरी की थी पर वोटरों को शायद कुछ और ही मंजूर रहा होगा।' मैंने अपने मित्र के अखबार का सशक्‍त पक्ष उनके सामने रखा। हालांकि मुझे पता है कि उस अखबार को छापने के बाद मेरा मित्र भी नहीं पढ़ता।

‘ कम्‍बख्‍त अबके तो मैंने संपत्‍ति की घोषणा जितनी थी उससे चार गुणा अधिक कर डाली थी।' कह वे हारने के बाद भी संसद की ओर कूच करते लगे।

‘क्‍यों?'

‘इसलिए की जनता को बाद में कोई आबजेक्‍शन न हो कि चुनाव जीतने के बाद खाया है।'

‘ खिलाया पिलाया तो आपने बहुत, फिर आप हारे क्‍यों?'

‘साली जनता लगता है अब दिन पर दिन नमक हराम हो रही है। नमक का कर्ज चुकाना भी भूल रही है।'

‘अब क्‍या योजना है?'

‘पहले तो तीर्थ व्रत करूंगा फिर एक किताब लिखूंगा।'

‘किस पर?'

‘वोटरों पर।'

‘ आपकी हार का कोई खास कारण?'

‘जूते न पड़ना। अब देखिए न! इस चुनाव में जिन जिन को जूते पड़े वे सब जीते। अगली बार अगर पार्टी ने टिकट दिया तो कुछ और जनता को बांटने के बदले इन्‍हें जूते ही जूते बांटूंगा।' कह उन्‍होंने सिर झुका लिया। अचानक मुझे स्‍मरण हो आया कि जब मैं छोटा था और स्‍कूल में पढ़ता था, तो मेरे बापू मुझे पेपर शुरू होने से पहले पढ़ने के लिए जूते मारा करते थे। और जब जब मुझे पेपरों से पहले जूते पड़ते थे तब तब मैं जूतों की कृपा से पास भी हो जाता था।

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डा. अशोक गौतम

द्वारा संतोष गौतम,निर्माण शाखा

डा, वाय. एस. परमार विश्‍वविद्यालय नौणी, ,सोलन -173230 हि.प्र.

ईमेल - a_gautamindia@rediffmail.com

रामधारी सिंह दिनकर' का काव्‍य : काव्‍य के माघ्‍यम से राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक चेतना की सशक्‍त अभिव्‍यक्‍ति

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

 

रामधारी सिंह ‘ दिनकर ' के कृतित्‍व ने विचारकों का ध्‍यान जिन दिशाओं की ओर आकृष्‍ट किया है, वे हैं - उनकी ओजस्‍विता, गतिशीलता, गीतोन्‍मुखता, विद्रोही स्‍वर, सांस्‍कृतिक और राष्‍ट्रीय चेतना, मंगल कामना और विवेक की संयुक्‍ति तथा जनतांत्रिक विचार।

दिनकर के काव्‍य पर विचार करते समय कुछ प्रश्‍न उपस्‍थित होते हैं :-

- क्‍या दिनकर स्‍वच्‍छन्‍द धारा के कवि हैं ?

- क्‍या दिनकर ‘अज्ञेय' के कथन के अनुरूप रोमांटिक राष्‍ट्रवादी हैं अथवा डॉ0 नगेन्‍द्र के कथन के अनुरूप सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवादी कवि हैं ?

- एक ही काल और परिस्‍थिति में जीवित रहकर भी दिनकर का काव्‍य पंत, प्रसाद, निराला और मैथिलीशरण गुप्‍त के काव्‍य से किस प्रकार भिन्‍न है और क्‍या उसे किसी वाद के घेरे में बांधा जा सकता है ?

- दिनकर का चिन्‍तन केवल चिन्‍तन ही है या कोई समाधान भी प्रस्‍तुत करता है ?

स्‍वच्‍छन्‍दतावाद को प्रायः यूरोपीय रोमाण्‍टिसिज्‍म का समानार्थी माना जाता है। हिन्‍दी के स्‍वच्‍छन्‍दतावादी कवि जिन्‍हें ‘छायावादी कवि' के नाम से अभिहित किया जाता है, भावप्रवणता एवं कल्‍पना अथवा अन्‍तर्दृष्‍टि के बल पर अन्‍तः सौन्‍दर्य का उद्‌घाटन करने में समर्थ रचनाकारों के रूप में अपनी पहचान स्‍थापित करते हैं। प्रकृति के कण-कण में आध्‍यात्‍मिक चेतना और सौन्‍दर्य का प्रसार देखने के कारण उन्‍हें सर्वात्‍मवादी एवं प्रकृत-रहस्‍यवादी भी कहा गया है। डॉ0 हजारी प्रसाद द्विवेदी रोमांटिक साहित्‍य के मूल में ‘उन्‍मुक्‍त आवेगों की प्रधानता तथा कल्‍पना प्रवण अर्न्‍तदृष्‍टि' स्‍वीकार करते हैं तो पं0 नन्‍द दुलारे वाजपेयी रोमांटिक धारा के मूल में स्‍वतन्‍त्रता की लालसा और बन्‍धनों के त्‍याग की व्‍याप्‍ति मानते हैं। यहॉ यह भी कहना अभीष्‍ट है कि हिन्‍दी स्‍वच्‍छन्‍दतावादी काव्‍य में रोमानी प्रवृत्‍तियों की प्रधानता है किन्‍तु इसी काव्‍य धारा में सांस्‍कृतिक/राष्‍ट्रीय तत्‍व भी समाहित हैं। सांस्‍कृतिक एवं राष्‍ट्रीय पक्ष की प्रमुखता को लेकर हिन्‍दी में जिन कवियों ने रचनाएं की हैं, उनकी एक अलग उपधारा है और इस उपधारा के कवि हैं :-

(1) माखन लाल चतुर्वेदी (2) सियाराम शरण गुप्‍त (3) बालकृष्‍ण शर्मा ‘नवीन' (4) दिनकर

कामायनी जैसी गरिमामयी कृति की विषय-वस्‍तु और उसकी शिल्‍पविधि का प्रभाव ‘दिनकर' पर है किन्‍तु उसके आगे वे नतशिर नहीं हुए। स्‍वच्‍छन्‍दतावाद से दिनकर की भिन्‍नता को संकेत रूप में इस प्रकार अभिव्‍यक्‍त किया जा सकता है कि दिनकर ने ‘बनफूल' को प्रकृति प्रेमी के रूप में नहीं बल्‍कि जीवन दृष्‍टा के रूप में ‘साधारण' का प्रतीक मानकर श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया है। वर्ण्‍य विषय का यह विपर्यय मूलतः स्‍वच्‍छन्‍दतावाद से परिचालित होते हुए भी छायावादी काव्‍य रूढ़ियों के विपरीत पड़ा है। दिनकर की प्रारम्‍भिक रचनाओं में यह विपर्यय ‘विद्रोह' के रूप में अंकित है। आरम्‍भिक काव्‍य में श्रृंगार और हुंकार की सम्‍मिलित भूमि देखी जा सकती है। ‘रेणुका' काव्‍य संकलन के आरम्‍भ में ‘युगधर्म' और ‘जागृति-हुंकार' अभिव्‍यक्‍त है। ‘हिमालय के प्रति' कविता में राष्‍ट्रीय-सांस्‍कृतिक चेतना की खुली अभिव्‍यक्‍ति हुई है। पुण्‍य भूमि पर कराल संकट आ पड़ा है और व्‍याकुल सुत तड़प रहे हैं। आह्‌वान है :-

कह दे शंकर से, आज करें, वे प्रलय नृत्‍य फिर एक बार,

सारे भारत में गूँज उठे, ‘हर-हर-बम' का फिर महोच्‍चार।

‘रेणुका' में रोमानी कविताएँ राष्‍ट्रीय चेतना को साथ लेकर चलीं पर ‘हुंकार' में कवि अधिक आक्रोशी मुद्रा अपनाता है। ‘रसवंती' में दिनकर आरम्‍भ से ही अधिक उदात्‍त भूमि पर खड़े दिखाई पड़ते हैं। तभी वे ‘उर्वशी' में ‘कामाध्‍यात्‍म' का प्रक्षेपण कर सके।

दिनकर के प्रारम्‍भिक काव्‍य चरण में स्‍वच्‍छंदतावादी काव्‍य के दो तत्‍व-रोमानीवृत्ति और राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक चेतना मुख्‍य रूप से दिखाई पड़ते हैं किन्‍तु प्रारम्‍भ से ही वे अपने स्‍वतंत्र व्‍यक्‍तित्‍व के निर्माण के प्रति सचेत रहे और इसी कारण वे अधिक उदात्त भूमियों पर संचरण करने में सफल हुए।

दिनकर की 1955 ई0 में प्रकाशित ‘नील-कुसुम' को हिन्‍दी के कुछ विद्वानों ने प्रयोगवादी रचना माना है किन्‍तु मेरी दृष्‍टि में ‘नील-कुसुम' में संगृहीत रचनाएं प्रयोगवादी रचनाएं नहीं हैं :

1. दिनकर जी यह नहीं मानते कि जिस नई संवेदना के वे वाहक हैं वह हिन्‍द के सामान्‍य पाठक को छू तक नहीं गई है।

2. इसमें संकलित कविताओं के विषय ‘अपरिचित, अप्रत्‍याशित और अनपेक्षित नहीं हैं।

3. प्रयोगवादी कविता मूलतः प्रश्‍न चिन्‍हों की कविता है, संदेह और आशंका की कविता है, नील कुसुम वैसी कृति नहीं हैं। उसमें परम्‍परा की सुरभि का अभाव नहीं है।

नील कुसुम की कविताएँ उनकी काव्‍य यात्रा की ऐसी आधारशिला है जिस पर वे ‘उर्वशी' जैसी प्रबन्‍ध रचना का निर्माण कर सके। कुरुक्षेत्र एवं उर्वशी उनके विशेष चर्चित आख्‍यानकाव्‍य हैं तथा इन कृतियों में दिनकर ने अपनी गीतात्‍मक प्रवृत्‍तियों को जीवन के कतिपय वृहत्तर संदर्भों की ओर मोड़ा। कुरुक्षेत्र में युद्ध एवं शान्‍ति का संदर्भ एवं प्रसंग है, पर संघर्ष से बचने का समर्थन नहीं है। युद्ध एक तूफान है जो भीषण विनाश करता है पर जब तक समाज में शोषण, दमन, अन्‍याय मौजूद है तब तक संघर्ष अनिवार्य है :

युद्ध को तुम निन्‍द्‌य कहते हो, मगर,

जब तलक हैं उठ रही चिनगारियाँ

भिन्‍न स्‍वार्थों के कुलिश-संघर्ष की,

युद्ध तब तक विश्‍व में अनिवार्य है।

व्‍यक्‍ति का है धर्म तप, करुणा, क्षमा,

व्‍यक्‍ति को शोभा विनय भी, त्‍याग भी,

किन्‍तु उठता प्रश्‍न जब समुदाय का,

भूलना पड़ता हमें तप-त्‍याग को।

दिनकर ने वैयक्‍तिक मुक्‍ति' की अपेक्षा समाजिक प्रवृत्‍ति की उपादेयता एवं सामाजिक समता को स्‍वीकार किया है :

शान्‍ति नहीं तब तक जब तक

सुख भाग न नर का सम हो

नहीं किसी को बहुत अधिक हो

नहीं किसी को कम हो

जब तक मनुज-मनुज का यह

सुखभाग नहीं सम होगा,

शामित न होगा कोलाहल,

संघर्ष नहीं कम होगा।

वे भाग्‍यवाद में विश्‍वास नहीं करते। वे वर्तमान जीवन की विपदाओं, कष्‍टों, अभावों का कारण विगत जीवन के कर्मों को मानकर हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं चाहते। जंगल में जाकर तप एवं साधना के बल पर आत्‍म कल्‍याण करने में वे विश्‍वास नहीं रखते। वे मनुष्‍य के पुरुषार्थ को जगाने का उपक्रम करते हैं। वे समाज में रहकर संघर्ष, कर्म-कौशल, परिश्रम एवं उदयम बल से समस्‍याओं का समाधान में विश्‍वास करते हैं।

सब हो सकते तुष्‍ट, एक-सा /सब सुख पा सकते हैं,

चाहें तो पल में धरती को / स्‍वर्ग बना सकते हैं

‘‘छिपा दिये सब तत्‍व आवरण /के नीचे ईश्‍वर ने

संघर्षों से खोज निकाला, / उन्‍हें उद्यमी नर ने।

‘‘ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्‍य में/ मनुज नहीं लाया है;

अपना सुख उसने अपने / भुजबल से ही पाया है।

‘‘प्रकृति नहीं डर कर झुकती है /कभी भाग्‍य के बल से

सदा हारती वह मनुष्‍य के, / उद्‌यम से, श्रम जल से

उर्वशी में पुरूरवा-उर्वशी की पौराणिक कथा के माध्‍यम से चिरन्‍तन पुरुष तथा चिरन्‍तन नारी के प्रश्‍नों पर विचार किया गया है। ‘उर्वशी' हिन्‍दी के विद्वानों में विवादमूलक कृती रही है। कुछ आलोचकों ने कहा है कि ‘उर्वशी' में एक दुर्निवार कामुक अहं ने अस्‍वाभाविक ढंग से आध्‍यात्‍मिक मुकुट पहनने की कोशिश की हैं तो कुछ आलोचकों ने उर्वशी को ‘समाधिस्‍थ चित्‍त' की देन बतलाया है। वास्‍तविकता यह है कि अध्‍यात्‍म की ओर मुड़ने वाला पुरूरवा भौतिक सुख से अतृप्‍त रहकर किसी अभौतिक सुख की ओर उच्‍छ्‌वसित भर ही है। उर्वशी सकल कामनाओं की प्रतीक है। अरविन्‍द की भविष्‍यत्‌ युग के बारे में धारणा है कि मानव बौद्धिक स्‍तर से ऊपर उठेगा और संबुद्धि के संकेतों से गतिशील होकर ऊर्ध्‍व यात्रा करेगा।

उर्वशी अपूर्णता से उत्तरोत्तर विकास की ओर की यात्रा है। उर्वशी में भौतिक स्‍तर पर अभिव्‍यंजित ‘‘काम'' का यदि आध्‍यात्‍मीकरण नहीं भी है तो कम से कम काम का उदात्तीकरण अवश्‍य है।

अंत में , निष्‍कर्ष यह है कि रामधारी सिंह ‘दिनकर' के काव्‍य में राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक चेतना की सशक्‍त अभिव्‍यक्‍ति हुई है। उन्‍होंने वैयक्‍तिक ‘मुक्‍ति' की अपेक्षा सामाजिक समस्‍याओं के समाधान पर बल दिया है । उन्‍होंने व्‍यक्ति के पुरुषार्थ को सचेत किया है, प्रेरित किया है, जाग्रत किया है, उद्‌बुद्ध एवं प्रबुद्ध किया है। उनका विश्वास है कि व्‍यक्ति अपने श्रम, उद्‌यम एवं कर्म-कौशल से अपना भाग्‍य बना सकता है, अपनी तकदीर बदल सकता है। इस दृष्‍टि से रामधारी सिंह ‘दिनकर' का काव्‍य आज भी प्रासंगिक है।

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सम्‍पर्क :

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान)

123, हरि एन्‍क्‍लेव, बुलन्‍दशहर-203001

दूरभाष : (05732-233089)

E-mail : mahavirsaranjain@indiatimes.com / mahavirsaranjain@gmail.com

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मुट्‌ठी भर बीज

मुट्‌ठी भर बीज से

करनी है मुझे

हरी भरी समूची पृथ्‍वी

गिनो मत इन बीजों को

मत हँसो इन पर

सिर्फ प्रदक्षिणा करो

दे सको तो दो मुझे

उस जमीन में से गज भर जमीन

जिस पर तुम खड़े हो

अपने हिस्‍से की धूप में से एक टुकड़ा धूप

अंजुलि भर पानी

फिर देखना

तुम्‍हारे देखते ही देखते

मैं उगाउँगा कुछ पेड़

कुछ फूल कुछ फल

कुछ खुशबू कुछ छाया

फलों से निकलेंगे कुछ और बीज

फिर होंगी कुछ और मुटि्‌ठयां बीजों से भरी

रंग उठेगी पृथ्‍वी एक दिन जरूर

हरे रंग से

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चन्‍द्र प्रकाश श्रीवास्‍तव

विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक – हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा में क्योंकर तत्काल शामिल किया जाना चाहिए  – कारणों की पड़ताल कर रहे हैं केंद्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निदेशक – महावीर सरन जैन

 

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएं एवं हिन्‍दी :

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

एम00, डी0फिल, डी0लिट्0

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ :

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाएँ हैं : 1. अरबी, 2. चीनी 3. अंग्रेजी 4. फ्रेंच, 5. रूसी 6. स्‍पेनिश

(दे0 Year Book of the United Nations 1955, Vol. 49, pp. 1416-17, New

York )

संयुक्‍त राष्‍ट्र की ये 6 आधिकारिक भाषाएं अन्‍य अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगठनों की भी आधिकारिक भाषाएँ हैं। उदाहरणार्थ : (1) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) (2) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय विकास एजेंसी (IDA) (3) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) (4) संयुक्‍त राष्‍ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्‍कृतिक संगठन (UNESCO) (5) विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) (6) संयुक्‍त राष्‍ट्र औद्‌योगिक विकास संगठन (UNIDO) (7) संयुक्‍त राष्‍ट्र अन्‍तर्राष्‍ट्रीय बाल-आपातिक निधि (UNICEF)

संयुक्‍त राष्‍ट्र की आधिकारिक भाषाएं एवं हिन्‍दी :

सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्‍या की दृष्‍टि से विश्‍व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें हिन्‍दी को तीसरा स्‍थान दिया जाता था। सन् 1991 के सैन्‍सस आफ इण्‍डिया का भारतीय भाषाओं के विश्‍लेषण का ग्रन्‍थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ (दे0 Census of India 1991 Series 1 - India Part I of 1997, Language : India and states - Table C - 7) यूनेस्‍को की टेक्‍नीकल कमेटी फॉर द वर्ल्ड लैंग्‍वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा यूनेस्‍को-प्रश्‍नावली के आधार पर हिन्‍दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्‍त दायित्‍व के निर्वाह के लिए केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान के तत्‍कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा। प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने दिनांक 25 मई ,1999 को यूनेस्‍को को अपनी विस्‍तृत रिपोर्ट भेजी।

प्रोफेसर जैन ने विभिन्‍न भाषाओं के प्रामाणिक आंकड़ों एवं तथ्‍यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्‍ताओं की दृष्‍टि से विश्‍व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्‍थान हिन्‍दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय प्रोफेसर जैन ने ब्रिटिश काउन्‍सिल आफ इण्‍डिया से अंग्रेजी मातृभाषियों की पूरे विश्‍व की जनसंख्‍या के बारे में तथ्‍यात्‍मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया। ब्रिटिश काउन्‍सिल ऑफ इण्‍डिया ने इसके उत्‍तर में गिनीज बुक आफ नालेज (1997 संस्करण, पृष्ठ-57) फैक्‍स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्‍सिल द्वारा भेजी गई सूचना के अनुसार पूरे विश्‍व में अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्‍या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) है। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्‍दी को स्‍वीकार करने वालों की संख्‍या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्‍वीकार करने वालों की संख्‍या का योग 04,34,06,932 है। हिन्‍दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्‍वीकार करने वालों की संख्‍या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। प्रोफेसर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिद्ध किया कि भाषिक दृष्‍टि से हिन्‍दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड आदि सभी देशों के अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्‍या के योग से अधिक जनसंख्‍या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्‍पूर्ण भारत में मानक हिन्‍दी के व्‍यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्‍दीतर भाषी राज्‍यों में बहुसंख्‍यक द्विभाषिक-समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्‍य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्‍दी का अधिक प्रयोग करता है जो हिन्‍दी के सार्वदेशिक व्‍यवहार का प्रमाण है। भारत की राजभाषा हिन्‍दी है तथा पाकिस्‍तान की राज्‍यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्‍दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्‍तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है।

विश्‍व के लगभग 93 देशों में हिन्‍दी का या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रयोग होता है अथवा उन देशों में हिन्‍दी के अध्‍ययन अध्‍यापन की सम्‍यक् व्‍यवस्‍था है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्‍या हिन्‍दी भाषा से अधिक है किन्‍तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्‍दी की अपेक्षा सीमित है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्‍दी की अपेक्षा अधिक है किन्‍तु हिन्‍दी बोलने वालों की संख्‍या अंग्रेजी भाषियों से अधिक है।

विश्‍व के इन 93 देशों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -

( I ) इस वर्ग के देशों में भारतीय मूल के आप्रवासी नागरिकों की आबादी देश की जनसंख्‍या में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। इन अधिकांश देशों में सरकारी एवं गैर-सरकारी प्राथमिक एवं माध्‍यमिक स्‍कूलों में हिन्‍दी का शिक्षण होता है। इन देशों के अधिकांश भारतीय मूल के आप्रवासी जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्‍दी का प्रयोग करते हैं एवं अपनी सांस्‍कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में हिन्‍दी को ग्रहण करते हैं। इन देशों में निम्‍नलिखित देश उल्‍लेखनीय हैं- 1.मारीशस 2. फिजी 3. सूरीनाम 4. गयाना 5. त्रिनिडाड एण्‍ड टुबेगो। त्रिनिडाड के अतिरिक्त अन्‍य सभी देशों में हिन्‍दी का व्‍यापक प्रयोग एवं व्‍यवहार होता है।

( II ) इस वर्ग के देशों में ऐसे निवासी रहते हैं जो हिन्‍दी को विश्‍व भाषा के रूप में सीखते हैं, पढ़ते हैं तथा हिन्‍दी में लिखते हैं। इन देशों की विभिन्‍न शिक्षण संस्‍थाओं में प्रायः स्‍नातक एवं / अथवा स्‍नातकोत्‍तर स्‍तर पर हिन्‍दी की शिक्षा का प्रबन्‍ध है। कुछ देशों के विश्‍वविद्यालयों में हिन्‍दी में शोध कार्य करने तथा डाक्‍टरेट की उपाधि प्राप्‍त करने की भी व्‍यवस्‍था है। इन देशों में निम्‍नलिखित देशों के नाम उल्‍ल्‍ेखनीय हैं -

महाद्वीप देश

(क) अमेरिका महाद्वीपः 6. संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका 7. कनाडा 8. मैक्‍सिको 9. क्‍यूबा

(ख) यूरोप महाद्वीप : 10. रूस 11. ब्रिटेन (इंग्‍लैण्ड) 12. जर्मनी 13. फ्रांस 14. बेल्‍जियम 15. हालैण्ड (नीदरलैण्‍ड्स) 16. आस्‍ट्रिया17. स्‍विटजरलैण्ड 18. डेनमार्क 19. नार्वे 20. स्‍वीडन 21. फिनलैंड 22. इटली 23. पौलैंड 24. चेक 25. हंगरी 26. रोमानिया 27. बल्‍गारिया 28. उक्रैन 29. क्रोशिया

(ग ) अफ्रीका महाद्वीप : 30. दक्षिण अफ्रीका 31. री-यूनियन द्वीप

(घ) एशिया महाद्वीप : 32. पाकिस्‍तान 33. बंग्‍लादेश 34. श्रीलंका 35. नेपाल 36. भूटान 37. म्‍यंमार (बर्मा) 38. चीन 39. जापान 40. दक्षिण कोरिया 41. मंगोलिया 42. उजबेकिस्‍तान 43. ताजिकस्‍तान 44. तुर्की 45. थाइलैण्ड

(ड. ) आस्‍ट्रेलिया : 46. आस्‍ट्रेलिया

( III ) इसका उल्‍लेख किया जा चुका है कि भारत की राजभाष्‍ाा हिन्‍दी है तथा पाकिस्‍तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्‍दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्‍तान में संपर्क भाषा के रूप में व्‍यवहृत है। भारत एवं पाकिस्‍तान के अलावा हिन्‍दी एवं उर्दू मातृभाषियों की बहुत बड़ी संख्‍या विश्‍व के लगभग 60 देशों में निवास करती है। इन देशों में भारत, पाकिस्‍तान, बंगलादेश, भूटान, नेपाल आदि देशों के आप्रवासियों / अनिवासियों की विपुल आबादी रहती है। इन देशों की यह आबादी सम्‍पर्क-भाषा के रूप में हिन्‍दी-उर्दू' का प्रयोग करती है, हिन्‍दी की फिल्‍में देखती है; हिन्‍दी के गाने सुनती है तथा टेलीविजन पर हिन्‍दी के कार्यक्रम देखती है। इन देशों में संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका , कनाडा , मैक्‍सिकोे , ब्रिटेन (इंग्‍लैण्ड) , जर्मनी, फ्रांस ,हालैण्ड (नीदरलैण्‍ड्स) , दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, उजबेकिस्‍तान, ताजिकस्‍तान, थाइलैण्ड, आस्‍ट्रेलिया आिद देशों के अलावा निम्‍नलिखित देशों के नाम उल्‍लेखनीय हैं :- 47. अफगानिस्‍तान 48. अर्जेन्‍टीना 49. अल्‍जेरिया 50. इक्‍वेडोर 51 ़इण्‍डोनेशिया 52. इराक 53. ईरान 54. उगांडा 55.ओमान 56. कजाकिस्‍तान 57. क़तर 58. कुवैत 59. केन्‍या 60. कोट डी ' इवोइरे 61.ग्‍वाटेमाला 62 ़ जमाइका 63. जाम्‍बिया 64. तंजानिया 65. नाइजीरिया 66. निकारागुआ 67 ़न्‍यूजीलैण्ड 68. पनामा 69. पुर्तगाल 70. पेरु 71.पैरागुवै 72 ़ फिलिपाइन्स 73. बहरीन 74. ब्राजील 75.ब्रुनेई 76 ़ मलेशिया 77. मिस्र 78 ़ मेडागास्कर 79. मोजाम्‍बिक 80.मोरक्‍को 81 ़मौरिटानिया 82 ़ यमन 83. लीबिया 84. लेबनान 85 ़वेनेजुएला 86. सऊदी अरब 87. संयुक्‍त अरब अमीरात 88. सिंगापुर 89 ़सूडान 90. सेशेल्स 91. स्‍पेन 92. हांगकांग (चीन) 93 ़होंडूरास

हिन्‍दी की फिल्‍मों, हिन्‍दी के गानों तथा टी0वी0 कार्यक्रमों का प्रसार :

हिन्‍दी की फिल्‍मों, गानों, टी0वी0 कार्यक्रमों ने हिन्‍दी को कितना लोकप्रिय बनाया है - इसका आकलन करना कठिन है। केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान में हिन्‍दी पढ़ने के लिए आने वाले 67 देशों के विदेशी छात्रों ने इसकी पुष्‍टि की कि हिन्‍दी फिल्‍मों को देखकर तथा हिन्‍दी फिल्‍मी गानों को सुनकर उन्‍हें हिन्‍दी सीखने में मदद मिली। लेखक ने स्‍वयं जिन देशों की यात्रा की तथा जितने विदेशी नागरिकों से बातचीत की उनसे भी जो अनुभव हुआ उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिन्‍दी की फिल्‍मों तथा फिल्‍मी गानों ने हिन्‍दी के प्रसार में अप्रतिम योगदान दिया है। सन् 1995 के बाद से टी0वी0 के चैनलों से प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता भी बढ़ी है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जिन सेटेलाईट चैनलों ने भारत में अपने कार्यक्रमों का आरम्‍भ केवल अंग्रेजी भाषा से किया था; उन्‍हें अपनी भाषा नीति में परिवर्तन करना पड़ा है। अब स्‍टार प्लस, जी0टी0वी0, जी न्‍यूज, स्‍टार न्‍यूज, डिस्‍कवरी, नेशनल ज्‍योग्राफिक आदि टी0वी0 चैनल अपने कार्यक्रम हिन्‍दी में दे रहे हैं। दक्षिण पूर्व एशिया तथा खाड़ी के देशों के कितने दर्शक इन कार्यक्रमों को देखते हैं - यह अनुसन्‍धान का अच्‍छा विषय है।

सन् 1984 से सन् 1988 के बीच लेखक ने यूरोप के 18 देशों की यात्राएं कीं। यूरोप के देशों में कोलोन, बी0बी0सी0, ब्रिटिश रेडियो, सनराइज, सबरंग के हिन्‍दी सेवा कार्यक्रमों को हिन्‍दी प्रेमी बड़े चाव से सुनते हैं। यूरोप के देशों में ऐसी गायिकाएं हैं जो हिन्‍दी फिल्‍मों के गाने गाती हैं तथा स्‍टेज शो करती हैं ।

( अपने विदेश प्रवास की उक्त अवधि में जो फिल्‍मी गाने विभिन्‍न यूरोपीय देशों में सर्वाधिक लोकप्रिय थे उनके नाम इस प्रकार हैं - 1. आवारा हूँ 2. मेरा जूता है जापानी 3. सर पर टोपी लाल, हाथ में रेशम का रूमाल, हो तेरा क्‍या कहना 4. जब से बलम घर आए जियरा मचल मचल जाए 5. आई लव यू 6. मुड़-मुड़ के न देख, मुड़-मुड़ के 7. ईचक दाना, बीचक दाना, दाने ऊपर दाना, छज्‍जे ऊपर लड़की नाचे, लड़का है दीवाना 8. मेघा छाये आधी रात, निदिंया हो गई बैरन 9. मौसम है आशिकाना, है दिल कहीं से उनको ढूँढ लाना 10. दम मारो दम, मिट जाये गम 11. सुहाना सफर है 12. तेरे बिना जिन्‍दगी से कोई शिकवा तो नहीं 13. बोल रे पपीहरा 14. चन्‍दो ओ ! चन्‍दा 15. यादों की बारात निकली है या दिल के द्वारे 17. जिन्‍दगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्‍या हो, किसने जाना 17. न कोई उमंग है, न कोई तरंग है, मेरी जिन्‍दगी है क्‍या ? एक कटी पतंग है 18. बहारों ! मेरा जीवन भी संवारों, 19. आ जा रे परदेसी, मैं तो खड़ी इस पार ।)

सन् 1995 के बाद टेलिविजन के प्रसार के कारण अब विश्व के प्रत्‍येक भूभाग में हिन्‍दी फिल्‍मों तथा हिन्‍दी फिल्‍मी गानों की लोकप्रियता सर्वविदित है ।

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिंदी ।मातृभाषियों की संख्‍या :

सन् 1998 के बाद विश्‍व स्‍तर पर हिन्‍दी की संख्‍या के आंकड़ों में परिवर्तन आ गया।भाषिक आंकड़ों की दृष्‍टि से सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्‍थों के आधार पर संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिंदी के मातृभाषा वक्‍ताओं की संख्‍या निम्‍न तालिका में प्रस्‍तुत है (मिलियन में )

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिन्‍दी के मातृभाषियों की संख्‍या के आंकड़े

भाषा स्रोत (1) स्रोत (2) स्रोत (3) स्रोत (4)

चीनी 836 800 874 874

हिन्‍दी 333 550 366 366

स्‍पेनिश 332 400 322-358 322-358

अंग्रेजी 322 400 341 341

अरबी 186 200 ----- ----

रूसी 170 170 167 167

फ्रांसीसी 072 090 077 077

(1) Encarta Encyclopedia--- article of Dr. Bernard Comrie (1998)

(2) D. Dalby: The Linguasphere Register of the World’s Languages and Speech

Communities, Cardiff, Linguasphere Press (1999)

(3) Ethnologue, Volume 1. Languages of the World: Edited by Barbara F. Grimes, 14th. Edition, SIL International (2000)

(4) The World Almanac and Book of Facts, World Almanac Education Group(2003)

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(1)एनकार्टा एन्‍साइक्‍लोपीडिया में भाषा के बोलने वालो की संख्‍या की दृष्‍टि से जो संख्‍या है वह इस प्रकार है :

1. चीनी 836 मिलियन (83 करोड़ 60 लाख)

2. हिन्‍दी 333 मिलियन (33 करोड़ 30 लाख)

3. स्‍पेनिश 332 मिलियन (33 करोड़ 20 लाख)

4. अंग्रेजी 322 मिलियन (32 करोड़ 20 लाख)

5. अरबी 186 मिलियन (18 करोड़ 60 लाख)

6. रूसी 170 मिलियन (17 करोड़)

7़ फ्रांसीसी 72 मिलियन (7 करोड़ 20 लाख)

(2) दूसरे स्रोत के ग्रन्‍थ में संख्‍या इस प्रकार है -

1 ़ चीनी 800 मिलियन (80 करोड़)

2 ़ हिन्‍दी 550 मिलियन (55 करोड़),

3 ़ स्‍पेनिश 400 मिलियन (40 करोड़)

4 ़ अंग्रेजी 400 मिलियन(40 करोड़ ),

5 ़ अरबी 200 मिलियन (20 करोड़)

6 ़ रूसी 170 मिलियन (17 करोड़)

7 ़ फ्रैंच 90 मिलियन (9 करोड़)।

(3) तीन एवं चार स्रोतों के ग्रन्‍थों के आंकड़े एक जैसे हैं। इसका कारण यह है कि द वःल्‍ड अल्‍मानेक एण्‍ड बुक ऑफ फैक्‍ट्स (The World Almanac and Book of Facts) के आंकड़ों का आधार एथनोलॉग ही है।

इन दोनो ग्रन्‍थों में प्रतिपादित संख्‍या इस प्रकार है :

1 ़ चीनी 874 मिलियन (87 करोड़ 40 लाख)

2 ़ हिन्‍दी 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख)

3 ़ स्‍पेनिश 322-358 मिलियन (32 करोड़ 20 लाख से 35 करोड़ 80 लाख)

4 ़अंग्रेजी 341 मिलियन (34 करोड़ 10 लाख)।

इन ग्रन्‍थों में अरबी को रिक्‍त दिखाया गया है। इसका कारण इन ग्रन्‍थों में यह प्रतिपादित है कि अरबी एक क्‍लासिकल लैंग्‍वेज है तथा इन्‍होंने भाषाओं के जो आँकड़े दिये हैं, वे मातृभाषियों के हैं, द्वितीयभाषा वक्‍ताओं (सैकेन्‍ड लैंग्‍वेज स्‍पीकर्स) के नहीं। इस कारण इन्‍होनें टेबिल में अरबी लैंग्‍वेज को नहीं रखा है।

रूसी भाषियों की संख्‍या 167 मिलियन (16 करोड़ 70 लाख) तथा फ्रेंच भाषियों की संख्‍या 77 मिलियन (7 करोड़ 70 लाख) है।

मातृभाषियों की संख्‍या का अन्तर :-

तालिका का अध्‍ययन करने से यह स्‍पष्‍ट है कि इन ग्रन्‍थों में विभिन्‍न भाषाओं के मातृभाषियों की संख्‍या के आँकड़ों में एकरूपता/समानता नहीं है। तालिका में स्रोत-2 के ग्रन्‍थ में हिन्‍दी भाषियों की संख्‍या है - 550 मिलियन(55 करोड़), किन्‍तु तीन एवं चार स्रोत के ग्रन्‍थों में हिन्‍दी भाषियों की संख्‍या प्रतिपादित है - 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख) । जब वैज्ञानिक ढंग से आँकड़े इकट्‌ठे हो रहे हैं तथा मातृ भाषियों की दृष्‍टि से आँकड़े प्रस्‍तुत किये जा रहे हैं तो यह अन्‍तराल क्‍यों है ? स्रोत 3 एवं 4 के ग्रन्‍थों का ध्‍यान से अध्‍ययन करने के बाद आंकड़ों के अन्‍तर का रहस्‍य उद्‌घाटित हो जाता है। इन ग्रन्‍थों में हिन्‍दी के क्षेत्रगत भेदों एवं शैलीगत भेदों को अलग-अलग भाषाओं के रूप में प्रदर्शित किया गया है। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के अन्‍तर्गत बोले जाने वाले इन क्षेत्रगत एवं शैलीगत भेदों के मातृभाषियों की जो संख्‍याएँ प्रतिपादित हैं उन संख्‍याओं को 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख) संख्‍या में जोड़ने पर हिन्‍दी के मातृभाषियों की संख्‍या पहुँच जाती है - 553 मिलियन(55 करोड़ 30 लाख) । स्रोत-2 में हिन्‍दी भाषियों की संख्‍या का योग है- 550 मिलियन( 55 करोड़)। स्रोत-3 एवं स्रोत-4 के ग्रन्‍थों में हिन्‍दी भाषा के जिन 11 क्षेत्रगत (Regional) तथा शैलीगत (Stylistic) भेदों के मातृभाषियों की संख्‍या को अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है, उनकी संख्‍याओं का योग कर देने पर इन दोनो ग्रन्‍थों में हिन्‍दी भाषियों की संख्‍या हो जाती है - 553 मिलियन (55 करोड़ 30 लाख)

संसार में ऐसा कोई भाषा क्षेत्र नहीं होता, जिसमें क्षेत्रगत भेद नहीं होते। कहावत है - चार कोस पर बदले पानी, आठ कोस पर बानी। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्‍या 700-800 मिलियन (70 करोड़ से 80 करोड़) है तथा उसका भाषा क्षेत्र हिन्‍दी भाषा क्षेत्र की अपेक्षा बहुत विस्‍तृत है। चीनी भाषी क्षेत्र में जो भाषिक रूप बोले जाते हैं वे सभी परस्‍पर बोधगम्‍य नहीं हैं। जब पाश्‍चात्‍य भाषा वैज्ञानिक चीनी भाषा की विवेचना करते हैं तो किसी प्रकार का विवाद पैदा नहीं करते किन्‍तु स्रोत-3 एवं 4 जैसे ग्रन्‍थों के विद्वान जब हिन्‍दी भाषा की विवेचना करते हैं तो हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के अन्‍तर्गत बोले जाने वाले हिन्‍दी भाषा के उपभाषा रूपों को भाषा का दर्जा दे देते हैं। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के अन्‍तर्गत भारत के निम्‍नलिखित राज्य/केन्‍द्र शासित प्रदेश समाहित हैं :-1. उत्‍तर प्रदेश 2. उत्‍तराखंड 3. बिहार 4. झारखण्ड 5. मध्‍य प्रदेश 6़. छत्‍तीसगढ़ 7. राजस्‍थान 8. हिमाचल प्रदेश 9. हरियाणा 10. दिल्‍ली 11. चण्‍डीगढ़।

हिन्‍दी भाषा का क्षेत्र बहुत व्‍यापक है। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में ऐसी बहुत सी उपभाषाएँ हैं जिनमें पारस्‍परिक बोधगम्‍यता का प्रतिशत बहुत कम है, किन्‍तु ऐतिहासिक एवं सांस्‍कृतिक दृष्‍टि से सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र एक भाषिक इकाई है तथा इस भाषा-भाषी क्षेत्र के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने क्षेत्रगत भेदों को हिन्‍दी भाषा के रूप में मानते एवं स्‍वीकारते आए हैं। भारत के संविधान की दृष्‍टि से यही स्‍थिति है। सन् 1997 में भारत सरकार के सैन्‍सस ऑफ इण्‍डिया द्वारा प्रकाशित ग्रन्‍थ में भी यही स्‍थिति है।

खड़ी बोली' हिन्‍दी भाषा क्षेत्र का उसी प्रकार एक भेद है, जिस प्रकार हिन्‍दी भाषा के अन्‍य बहुत से क्षेत्रगत भेद हैं। प्रत्‍येक भाषा क्षेत्र में अनेक क्षेत्रगत, वर्गगत एवं शैलीगत भिन्‍नताएँ होती हैं। प्रत्‍येक भाषा क्षेत्र में किसी क्षेत्र विशेष के भाषिक रूप के आधार पर उस भाषा का मानक रूप विकसित होता है, जिसका उस भाषा-क्षेत्र के सभी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे व्‍यक्‍ति औपचारिक अवसरों पर प्रयोग करते हैं। पूरे भाषा क्षेत्र में इसका व्‍यवहार होने तथा इसके प्रकार्यात्‍मक प्रचार-प्रसार के कारण विकसित भाषा का मानक रूप भाषा क्षेत्र के समस्‍त भाषिक रूपों के बीच संपर्क सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है। प्रत्‍येक देश की एक राजधानी होती है तथा विदेशों में किसी देश की राजधानी के नाम से प्रायः देश का बोध होता है, किन्‍तु सहज रूप से समझ में आने वाली बात है कि राजधानी ही देश नहीं होता।

जिस प्रकार भारत अपने 28 राज्‍यों एवं 07 केन्‍द्र शासित प्रदेशों को मिलाकर भारतदेश है, उसी प्रकार भारत के जिन राज्‍यों एवं शासित प्रदेशों को मिलाकर हिन्‍दी भाषा क्षेत्र है, उस हिन्‍दी भाषा-क्षेत्र के अन्‍तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उनकी समाष्‍टि का नाम हिन्‍दी भाषा है। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के प्रत्‍येक भाग में व्‍यक्‍ति स्‍थानीय स्‍तर पर क्षेत्रीय भाषा रूप में बात करता है। औपचारिक अवसरों पर तथा अन्तर-क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय एवं सार्वदेशिक स्‍तरों पर भाषा के मानक रूप अथवा व्‍यावहारिक हिन्‍दी का प्रयोग होता है। आप विचार करेेंं कि उत्तर प्रदेश हिन्‍दी भाषी राज्‍य है अथवा खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्‍नौजी, अवधी, बुन्‍देली आदि भाषाओं का राज्‍य है। इसी प्रकार मध्‍य प्रदेश हिन्‍दी भाषी राज्‍य है अथवा बुन्‍देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का राज्‍य है। जब संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की बात करते हैं तब संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के अन्‍तर्गत जितने राज्‍य हैं उन सबकी समष्‍टि का नाम ही तो संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका है। विदेश सेवा में कार्यरत अधिकारी जानते हैं कि कभी देश के नाम से तथा कभी उस देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा होती है। वे ये भी जानते हैं कि देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा भले ही होती है, मगर राजधानी ही देश नहीं होता। इसी प्रकार किसी भाषा के मानक रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक रूप होता है : मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। इसी प्रकार खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्‍दी का विकास अवश्‍य हुआ है किन्‍तु खड़ी बोली ही हिन्‍दी नहीं है। तत्‍वतः हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के अन्‍तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उन सबकी समष्‍टि का नाम हिन्‍दी है। हिन्‍दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का षडयंत्र अब विफल हो गया है क्‍योंकि 1991 की भारतीय जनगणना के अंतर्गत जो भारतीय भाषाओं के विश्‍लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है उसमें मातृभाषा के रूप में हिन्‍दी को स्‍वीकार करने वालों की संख्‍या का प्रतिशत उत्‍तर प्रदेश (उत्‍तराखंड राज्‍य सहित) में 90.11, बिहार (झारखण्‍ड राज्‍य सहित) में 80.86, मध्‍य प्रदेश (छत्‍तीसगढ़ राज्‍य सहित) में 85.55, राजस्‍थान में 89.56, हिमाचल प्रदेश में 88.88, हरियाणा में 91.00, दिल्‍ली में 81.64 तथा चण्‍डीगढ़ में 61.06 है।

हिन्‍दी एक विशाल भाषा है। विशाल क्षेत्र की भाषा है। अब यह निर्विवाद है कि चीनी भाषा के बाद हिन्‍दी संसार में दूसरे नम्‍बर की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

यदि हम सम्‍पूर्ण प्रयोक्‍ताओं की संख्‍या की दृष्‍टि से बात करें जिसमें मातृभाषा वक्‍ता (First Language Speakers) तथा द्वितीयभाषा वक्‍ता(Second Language Speakers) दोनो हों तो हिन्‍दी भाषियों की संख्‍या लगभग एक हजार मिलियन (सौ करोड़) है। दूसरे स्रोत के ग्रन्थ (The Linguasphere Register of the World's Languages and Speech Communities) में इस दृष्‍टि से हिन्‍दी भाषियों की संख्‍या 960 मिलियन मानी गई है । जो प्रमाणिक तथ्य प्रस्‍तुत हैं उनसे यह निर्विवाद है कि हिन्‍दी को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्‍यता मिलनी चाहिए।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन(सेवानिवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान) 123, हरिएन्‍कलेव, चांदपुर रोड, बुलन्दशहर - 203001

(भारत की 100 से अधिक भाषाओं के बारे में अपने शोधपरक आलेख में विस्तार पूर्वक बता रहे हैं केंद्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निदेशक महावीर सरन जैन)

भारत की भाषाएँ

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

 

एम0ए0, डी0फिल, डी0लिट्‌0

भारत में भाषाओं, प्रजातियों, धर्मों, सांस्‍कृतिक परम्‍पराओं एवं भौगोलिक स्‍थितियों का असाधारण एवं अद्वितीय वैविध्‍य विद्‌यमान है। विश्‍व के इस सातवें विशालतम देश को पर्वत तथा समुद्र शेष एशिया से अलग करते हैं जिससे इसकी अपनी अलग पहचान है, अविरल एवं समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है , राष्‍ट्र की अखंडित मानसिकता है। अनेकता में एकता' तथा एकता में अनेकता' की विशिष्‍टता के कारण भारत को विश्‍व में अद्वितीय सांस्‍कृतिक लोक माना जाता है।

भाषिक दृष्‍टि से भारत बहुभाषी देश है। यहॉ मातृभाषाओं की संख्‍या 1500 से अधिक है (दे0 जनगणना 1991, रजिस्‍ट्रार जनरल ऑफ इण्‍डिया) । इसी जनगणना के अनुसार 10,000 से अधिक लोगो द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की संख्‍या 114 है। (जम्‍मू और कश्‍मीर की जनगणना न हो पाने के कारण इस रिपोर्ट में लददाखी का नाम नहीं है। इसी प्रकार इस जनगणना में मैथिली को हिन्‍दी के अन्‍तर्गत स्‍थान मिला है। अब मैथिली भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची की एक परिगणित भाषा है।) लद्‌दाखी एवं मैथिली को सम्‍मिलित करने पर 10,000 से अधिक लोगो द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की संख्‍या 116 हो जाती है।

भाषा वैज्ञानिक संसार की भाषाओं को उनके ऐतिहासिक सम्‍बन्‍धों के आधार पर मुख्‍य रूप से बारह भाषा परिवारों में वर्गीकृत करते हैं। इनमें से 6 भाषा परिवारों का सम्‍बन्‍ध यूरेशिया (यूरोप और एशिया), तीन भाषा परिवारों का सम्‍बन्‍ध अफ्रीका, दो भाषा परिवारों का सम्‍बन्‍ध उत्‍तरी एवं दक्षिण अमरीका तथा एक भाषा परिवार का सम्‍बन्‍ध आस्‍ट्रेलिया महाद्वीप से है।

यूरेशिया के 6 भाषा परिवारों में से दक्षिण एशिया' में मुख्‍यतः चार भाषा परिवारों की भाषायें बोली जाती हैं। भारत में भी सामी भाषा परिवार की अरबी' के अपवाद के अलावा इन्‍हीं चार भाषा परिवारों की भाषायें बोली जाती हैं। ये चार भाषा परिवार हैं ः

1- भारोपीय परिवार (भारत में भारत-ईरानी उप परिवार की आर्य भाषाएं , दरद शाखा की कश्‍मीरी तथा जर्मेनिक' उपपरिवार की अंग्रेजी)

2- द्रविड़ परिवार

3- आग्‍नेय परिवार (आस्‍ट्रो-एशियाटिक)

4- चीनी-तिब्‍बती परिवार (इस परिवार की स्‍यामी/थाई/ताई उपपरिवार की अरूणाचल प्रदेश में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा खम्‍प्‍टी' को छोड़कर भारत में तिब्बत-बर्मी उपपरिवार की भाषाएं बोली जाती हैं।)

जिन 116 भाषाओं की ओर पूर्व में संकेत किया गया है, उनमें से सात (7) भाषाएं ऐसी हैं जिनके बोलने वाले भारत के विभिन्‍न राज्‍यों/केन्‍द्र शासित प्रदेशों में निवास करते हैं तथा जिनका भारत में अपना भाषा क्षेत्र' नहीं है। संस्‍कृत प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल की भाषा है। मुगलों के शासनकाल के कारण अरबी तथा अंग्रेजों के शासन काल के कारण अंग्रेजी के बोलने वाले भारत के विभिन्‍न भागों में निवास करते हैं। सिन्‍धी एवं लहंदा के भाषा क्षेत्र पाकिस्‍तान में हैं। 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्‍तान से आकर इन भाषाओं के बोलने वाले भारत के विभिन्‍न भागों में बस गए। 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में लहंदा बोलने वालों की संख्‍या 27,386 है। इस भाषा के बोलने वाले आन्‍ध्र प्रदेश, हरियाणा, मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र, पंजाब, राजस्‍थान, 0प्र0, दिल्‍ली आदि में रहते हैं तथा अपनी पहचान मुल्‍तानी' के रूप में अधिक करते हैं। सिन्‍धी भाषा के बोलने वालों की संख्‍या 2,122,848 है। इस भाषा के बोलने वाले गुजरात, महाराष्‍ट्र, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान राज्‍यों में अपेक्षाकृत अधिक संख्‍या में निवास करते हैं। ये भारत के लगभग 30 राज्‍यों / केन्‍द्रशासित प्रदेशों में फैले हुए हैं। लहंदा एवं सिन्‍धी दोनो भाषाओं के बोलने वालों में द्विभाषिता / त्रिभाषिता / बहुभाषिता का प्रसार हो रहा है। जो जहाँ बसा है, वहाँ की भाषा से इनके भाषा रूप में परिवर्तन हो रहा है। इसी प्रकार तिब्‍बती लोग भारत के 26 राज्‍यों में रह रहे हैं। इनकी मातृ भाषा तिब्‍बती है जिनकी संख्‍या 69,416 है। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, 0प्र0 , अरूणाचल प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल में इनकी संख्‍या अपेक्षाकृत अधिक है। उर्दू जम्‍मू एवं कश्‍मीर की राजभाषा तथा आन्‍ध्र प्रदेश, 0प्र0, बिहार कर्नाटक आदि राज्‍यों की दूसरी प्रमुख भाषा है। भाषा वैज्ञानिक हिन्‍दी एवं उदूर् को भिन्‍न भाषाएं नहीं मानते किन्‍तु भारतीय संविधान में उर्दू परिगणित भाषा है तथा इसके बोलने वाले भारत के आन्‍ध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र, 0प्र0, पश्‍चिम बंगाल, दिल्‍ली तथा तमिलनाडु में निवास करते हैं। भारत में उर्दू भाषी लोगों की संख्‍या 43,406,932 है।

भाषाओं का विवरण निम्‍न आधारों पर प्रस्‍तुत किया जाएगा -

1- भाषा परिवार

2- परिगणित / अपरिगणित - भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में परिगणित भाषाओं की संख्‍या अब 22 है। प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल की संस्‍कृत के अतिरिक्‍त आधुनिक भारतीय भाषाएँ निम्‍नलिखित हैं ः-

1- असमिया 2 बंगला 3 बोडो 4 डोगरी 5. गुजराती 6 हिन्‍दी 7 कश्‍मीरी 8 कन्नड़ 9 कोंकणी 10 मैथिली 11 मलयालम 12 मणिपुरी 13 मराठी 14 नेपाली 15 उडि.या 16 पंजाबी 17 तमिल 18 तेलुगु 19 संताली 20 सिन्‍धी 21 उर्दू

इन 22 परिगणित भाषाओं में से पन्‍द्रह भाषाएं भारतीय आर्य भाषा शाखा की, चार भाषाएं द्रविड़ परिवार की, एक भाषा (संताली) आग्‍नेय परिवार की तथा दो भाषाएं (बोडो, मणिपुरी) तिब्‍बत बर्मी उप परिवार की हैं। 1991 की जनगणना के समय परिगणित भाषाओं की संख्‍या 18 थी। इस जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्‍या 83,85,83,988 में से 9629 प्रतिशत लोग अर्थात 80,74,41,612 लोग उन 18 परिगणित भाषाओं में से किसी एक भाषा को बोलते थे।

1- भारोपीय परिवार (भारतीय आर्यभाषाएं) -

भारतीय आर्य भाषाओं में संस्‍कृत प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल की भाषा है। आज भी संस्‍कृत का धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक कृत्‍यों में प्रयोग होता है। विश्‍व की सर्वोन्‍नत एवं श्रेष्‍ठतम भाषाओं में अग्रणी स्‍थान पाने वाली संस्‍कृत भाषा का विशिष्‍ट महत्‍व है। इसी कारण इसको परिगणित भाषाओं में स्‍थान दिया गया है। संस्‍कृत के अतिरिक्त आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की मातृभाषाओं की संख्‍या लगभग 570 है जिनमें से 20 भाषायें प्रमुख हैं। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के बोलने वालों का प्रतिशत भारत की जनसंख्‍या में 7530 है।

संस्‍कृत के अलावा 14 आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएं परिगणित सूची के अन्‍तर्गत आती हैं।

(क) परिगणित -

क्र0 सं0 भाषा का नाम भाषा के बोलने वालों की संख्‍या राज्य / राज्‍यों के नाम

1 असमिया 13,079,696 असम

2 बंगला 69,595,738 पश्‍चिम बंगाल, त्रिपुरा

3 डोगरी 00,089,681 जम्‍मू-कश्‍मीर

4 गुजराती 40,673,814 गुजरात

5 हिन्‍दी 337,272,114 हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखण्ड, राजस्‍थान, हिमाचल प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, दिल्‍ली, चंडीगढ़

6 कश्‍मीरी विवरण अनुपलब्ध

जम्‍मू-कश्‍मीर

7 कोंकणी 01,760,607 गोवा

8 मैथिली 07,766,597 बिहार

9 मराठी 62,481,681 महाराष्‍ट्र, गोवा

10 नेपाली 02,076,645 सिक्‍किम, अरुणाचल प्रदेश

11 उडि.या 28,061,313 उड़ीसा

12 पंजाबी 23,378,744 पंजाब

13 सिन्‍धी 02,122,848 -

14 उर्दू 43,406,932 -

15 संस्‍कृत 00,049,736 -

(ख) अपरिगणित

16 भीली 5,572,308 राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश

17 विष्‍णुप्रिया 0,059,233 असम

18 हलबी 0,534,313 मध्‍यप्रदेश

19 खानदेशी 0,973,709 महाराष्‍ट्र, गुजरात

20 लहंदा 0,027,386 -

21 अंग्रेजी

(भारोपीय परिवार की जर्मेनिक उप परिवार की भाषा) 0,178,598 -

2 द्रविड़ परिवार -

द्रविड़ शब्‍द की सार्थकता तथा इस मान्‍यता कि आर्य परिवार की भाषाएं उत्‍तर भारत में एवं द्रविड़ परिवार की भाषाएं दक्षिण भारत में बोली जाती है- के सम्‍बन्‍ध में पुनर -विचार आवश्‍यक है। पादरी राबर्ट ए काल्‍डबेल ने इस परिवार की सभी भाषाओं को द्रविड़' नाम से पुकारा और यह नाम प्रचलित हो गया। द्रविड़ शब्‍द कर्नाटक, तेलंगाना एवं आन्‍ध्र आदि क्षेत्रों का बोधक नहीं था। स्कन्‍द पुराण में वर्णित है कि - 1 कर्णाट, 2 तेलंगा, 3 गुर्ज्‍जरा 4 आन्‍ध्र 5 द्रविड़ा पंच विंध्‍य दक्षिणवासिनः। इस प्रकार द्रविड़' शब्‍द मूलतः एक क्षेत्र का वाचक है , इस परिवार की सभी भाषाओं का वाचक नहीं है। इस परिवार की ब्राहुई, माल्‍तो, कुरुख/ओरॉब दक्षिण भारत में नहीं बोली जाती। ब्राहुई तो पाकिस्‍तान-अफगानिस्‍तान के सीमान्‍त क्षेत्र ब्‍लूचिसतान' में बोली जाती है। इसी प्रकार श्रीलंका के उत्‍तरी भाग की सिंधली भाषा आर्य परिवार की भाषा है। इसी कारण लोक प्रचलित धारणा एवं मान्‍यता संगत नहीं है।

द्रविड़ भाषाओं के बोलने वालों का प्रतिशत भारत की जनसंख्‍या का 2253 प्रतिशत है। द्रविड़ परिवार की मातृभाषाओं की संख्‍या 153 है जिनमें से 17 भाषाएँ प्रमुख हैं। इनमें तमिल, तेलुगु, मलयालम एवं कन्नड़ परिगणित भाषाएं हैं, शेष 13 भाषाएं अपरिगणित हैं। द्रविड़ परिवार की भाषाओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है।

द्रविड़ परिवार की भाषाएं

1 2 3 4

दक्षिणी दक्षिण-मध्य

मध्य

उत्‍तर एवं पूर्व

1- मलयालम

2- तमिल

3- कन्नड़

4- कूरगी/कोडगु

5- तुलु 1- तेलुगु

2- जातपु

3- कोलामी

4- कोंडा

5- कोया 1- गोंडी

2- खोंड / कोंध

3- किसन

4- कुइ

5- पारजी 1- कुरुख/ओरांब

2- माल्तो

(क) परिगणित -

क्र0 सं0 भाषा का नाम भाषा के बोलने वालों की संख्‍या राज्य / राज्‍यों के नाम

22 कन्नड़

32,753,676 कर्नाटक

23 मलयालम 30,377,176 केरल

24 तमिल 53,006,368 तमिलनाडु

25 तेलुगु 66,017,615 आन्‍ध्र प्रदेश

(ख) अपरिगणित

26 कूरगी/कोडगू 97,011 कर्नाटक

27 गोंडी 2,124,852 मध्‍य प्रदेश

28 जातपु 25,730 आन्‍ध्र प्रदेश

29 खोंड / कोंध 220,783 उड़ीसा, आन्‍ध्र प्रदेश

30 किसन 162,088 उड़ीसा

31 कोलामी 98,281 महाराष्‍ट्र, आन्‍ध्र प्रदेश

32 कोंडा 17,864 आन्‍ध्र प्रदेश

33 कोया 270,994 आन्‍ध्र प्रदेश

34 कुइ 641,662 उड़ीसा

35 कुरुख/ओरांव 1,426,618 झारखण्ड, उड़ीसा, छत्‍तीसगढ़, पश्‍चिम बंगाल

36 माल्‍तो 108,148 झारखण्ड

37 पारजी 44,001 छत्‍तीसगढ़, उड़ीसा

38 तुलु 1,552,259 कर्नाटक

3- आग्‍नेय परिवार (आस्‍ट्रो-एशियाटिक)

भारत में इस परिवार की तीन शाखाओं की भाषाएं बोली जाती हैं। खासी शाखा की प्रमुख भाषा खासी' मेघालय में खासी जनजाति तथा जयन्‍तिया पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों के द्वारा बोली जाती है। निकोबारी शाखा की मातृभाषाएं (भाषा का नाम- निकोबारी) निकोबार द्वीप समूह के जनजाति के लोगों के द्वारा बोली जाती है। इस परिवार की तीसरी शाखा की भाषाएं पश्‍चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा, छत्‍तीसगढ़, उत्‍तराखण्‍ड एवं तमिलनाडु के जनजाति के लोगों के द्वारा बोली जाती हैं। इस शाखा की संताली परिगणित सूची की भाषा है। इस परिवार की सभी भाषाओं के बोलने वालों की संख्‍या का प्रतिशत भारत की जनसंख्‍या में एक प्रतिशत से कुछ अधिक (113) है।

(क) परिगणित -

क्र0 सं0 भाषा का नाम भाषा के बोलने वालों की संख्‍या राज्य / राज्‍यों के नाम

39 संताली 8,216,325 झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, पश्‍चिम बंगाल

(ख) अपरिगणित

40 भूमिज 45,302 उड़ीसा

41 गदबा 28,158 उड़ीसा, आन्‍ध्र प्रदेश

42 हो 949,216 बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा

43 जुआड़ 16,858 उड़ीसा

44 खडि.या 225,556 झारखण्ड

45 खासी 912,283 मेघालय

46 कोडा/ कोरा 28,200 पश्‍चिम बंगाल

47 कोरकु / कुर्कू 466,073 मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र

48 कोरवा 27,485 छत्‍तीसगढ़

49 मुंडा 413,894 उड़ीसा, असम, पश्‍चिम बंगाल

50 मुंडारी 861,378 बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा

51 निकोबारी 26,261 अण्‍डमान एवं निकोबार द्वीप समूह

52 सवर 273,168 उड़ीसा

4 तिब्‍बत बर्मी -

इस परिवार की मातृभाषाओं की संख्‍या 226 है। भाषाओं की संख्‍या 48 है। भारत में तिब्‍बत बर्मी उपपरिवार की दो प्रमुख शाखाये हैं - 1 तिब्‍बती - हिमालयी, 2 बर्मी - आसामी। इस परिवार की सभी भाषाओं के बोलने वालों की संख्‍या का प्रतिशत भारत की जनसंख्‍या में एक प्रतिशत से भी कम है (097 प्रतिशत) । इस परिवार की भाषाओं के अन्तर - सम्‍बन्‍धों की वास्‍तविकता को समझना बहुत कठिन है। इस परिवार की भाषाएँ पर्वतीय क्षेत्रों में बोली जाती हैं। परस्‍पर आवागमन एवं सामाजिक सम्‍पर्क में बाधा होती है। भाषाओं की विपुल संख्‍या का यह प्रधान कारण है। इस परिवार की भाषाओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है।

तिब्‍बती-हिमालयी

तिब्‍बती - 1 तिब्‍बती 2 लददाखी 3 दां जोंगका 4 भोटिया/ भुटिया 5 मोनपा

हिमालयी - 1 लिम्‍बू, 2 लाहुली 3 किन्‍नौरी 4 लेप्‍चा / रोंग

बर्मी - आसामी

बोदो वर्ग - 1 कोछ, 2 गारो 3 त्रिपुरी / तिपुरी 4 दिमाशा 5 देउरी 6 बोडो 7 मिकिर / कार्वी 8 राभा 9 लालुड़

नगा वर्ग - 1 अंगामी 2 आओ 3 काबुई 4 रोड़मय 5 कोन्‍याक

6 खियमड़न, 6 चाड़ 7 चखेसाड़ 8 जेलियाड़ 9 ताड़खुल 10 ताड़सा / लुड़चाड़ 11 नोक्ते 12 फोम 13 माओ 14 यिमचुड़र 15 रेड़मा 16 लोथा 17 वाड़चो 18 साड़तम 19 सेमा

कुकी-चिन वर्ग - 1 कुकी 2 थाडो 3 पाइते 4 मणिपुरी 5 मिजो/लुशाई 6 लखेर/भरा 7 वाइफ.े 8 ह्‌मार

बर्मी वर्ग - 1 मोघ

m- मिरि/मिशिड़ वर्ग - 1 आदि 2 निस्‍सी / दफ.ला 3 मिरि / मिशिड़

(क) परिगणित -

क्र0 सं0 भाषा का नाम भाषा के बोलने वालों की संख्‍या राज्य / राज्‍यों के नाम

53 बोडो / बोराे 1,221,881 असम, पश्‍चिम बंगाल

54 मणिपुरी 1,270,216 मणिपुर

(ख) अपरिगणित

55 आदि 158,409 अरुणाचल प्रदेश

56 अनाल 12,156 मणिपुर

57 अंगामी 97,631 नागालैंड

58 आओ 172,449 नागालैंड

59 भुटिया / भोटिया 55,483 सिक्‍किम, हिमाचल प्रदेश

60 चखेसाड़ 30,985 नागालैंड

61 छकरू /छोकरी 48,207 नागालैंड

62 चाड़ 32,478 नागालैंड

63 देउरी 17,901 असम

64 दिमासा 88,543 असम

65 गंगटे 13,695 मणिपुर

66 गारो 675,642 मेघालय, असम

67 हलम 29,322 त्रिपुरा

68 ह्‌मार 65,204 मणिपुर, असम

69 काबुई/ रोड़मय 68,925 मणिपुर

70 कार्बी / मिकिर 366,229 असम

71 खेज्.हा

13,004 नागालैंड, मणिपुर

72 खियमड़न 23,544 नागालैंड

73 किन्‍नौरी 61,794 हिमाचल प्रदेश

74 कोछ 26,179 मेघालय, असम

75 कोम 13,548 मणिपुर

76 कोन्‍याक 137,722 नागालैंड

77 कुकी 58,263 मणिपुर, असम, नागालैंड

78 लाहुली 22,027 हिमाचल प्रदेश

79 लखेर / भरा 22,947 मिजोरम

80 लददाखी पूर्ण विवरण अनुपलब्ध

5 - जम्‍मू और कश्‍मीर

81 लालुड़ 33,746 असम

82 लेप्‍चा 39,342

सिक्‍किम, पश्‍चिम बंगाल

83 लियाड़मेइ 27,478 मणिपुर

84 लिम्‍बु 28,174 सिक्‍किम

85 लोथा 85,802 नागालैंड

86 लुशाई / मिजो 538,842 मिजोरम

87 माओ 77,810 मणिपुर

88 मराम 10,144 मणिपुर

89 मरिड़ 15,268 मणिपुर

90 मिरि / मिशिड़ 390,583 असम

91 मिश्‍मी 29,000 अरुणाचल प्रदेश

92 मोघ 28,135 त्रिपुरा

93 मोनपा 43,226 अरुणाचल प्रदेश

94 निस्‍सी / दफ.ला 173,791 अरुणाचल प्रदेश

95 नोक्‍ते 30,441 अरुणाचल प्रदेश

96 पाइते 49,237 मणिपुर

97 पवि 15,346 मिजोरम

98 फोम 65,350 नागालैंड

99 पोछुरी 11,231 नागालैंड

100 राभा 139,365 असम

101 रेड़मा 37,521 नागालैंड

102 साड़तम 47,461 नागालैंड

103 सेमा 166,157 नागालैंड

104 शेरपा 16,105 सिक्‍किम

105 ताँग खुल 101,841 मणिपुर

106 ताँड़सा 28,121 अरुणाचल प्रदेश

107 थाडो 107,992 मणिपुर

108 तिब्‍बती 69,416

109 त्रिपुरी 694,940 त्रिपुरा

110 वाइफे. 26,185 मणिपुर

111 वाड़चो 39,600 अरुणाचल प्रदेश

112 यिमचुड़र 47,227 नागालैंड

113 जेलियाड़ 35,079 नागालैंड

114 जेमि 22,634 असम, मणिपुर, नागालैंड

115 जोउ 15,966 मणिपुर

6- सामी परिवार

116 अरबी 21,975

भारत की भाषाओं की समानता एवं एकता के सम्‍बन्‍ध में दूसरे लेख में विचार किया जाएगा ।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवानिवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान)

123, हरिएन्‍कलेव, चांदपुर रोड,

बुलन्‍दशहर - 203001

धर्म पर जब जब भी बात होती है, विवाद होते रहे हैं. मेरा धर्म अच्छा तेरा धर्म घटिया. पर, क्या भविष्य का धर्म वास्तविक रूप में सर्व-धर्म-समभाव युक्त वैज्ञानिक धर्म होगा? पड़ताल कर रहे हैं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निर्देशक महावीर सरन जैन

भविष्य का धर्म और दर्शन : स्वरूप एवं प्रतिमान

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

एम0ए0, डी0फिल, डी0लिट्‌0

 

विज्ञान की उपलब्‍धियों एवं अनुसंधानों ने मनुष्‍य को चमत्‍कृत कर दिया है। प्रतिक्षण अनुसंधान हो रहे हैं। जिन घटनाओं को न समझ पाने के कारण उन्‍हें अगम्‍य रहस्‍य मान लिया गया था वे आज अनुसंधेय हो गयी हैं। तत्‍वचिन्‍तकों ने सृष्‍टि की बहुत-सी गुत्‍थियों की व्‍याख्‍या परमात्‍मा एवं माया के आधार पर की। इस कारण उनकी व्‍याख्‍या इस लोक का यथार्थ न रहकर परलोक का रहस्‍य बन गयी। आज का व्‍यक्‍ति उनके बारे में भी जानना चाहता है। अन्‍वेषण की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है। भौतिकवादी प्रगति एवं विकास का पथ प्रशस्त हो रहा है। भौतिकवादी प्रगति एवं विकास के बावजूद मनुष्‍य संतुष्ट नहीं है। वह मकान तो आलीशान बना पा रहा है मगर घर नहीं बसा पा रहा है। परिवार के सदस्‍यों के बीच प्‍यार एवं विश्‍वास की कमी होती जा रही है। व्‍यक्‍ति की चेतना क्षणिक, संशयपूर्ण एवं तात्‍कालिकता में केन्‍द्रित होती जा रही है। सम्‍पूर्ण भौतिक सुखों को अकेला ही भोगने की दिशा में व्‍यग्र मनुष्‍य अन्‍ततः अतृप्‍ति का अनुभव कर रहा है।

आज के संत्रस्‍त मनुष्‍य को आशा एवं विश्‍वास की आलोकशिखा थमानी है। आज के संत्रस्‍त मनुष्‍य को जीवन मूल्‍यों पर विश्‍वास करना सिखाना है। समस्‍या यह है कि व्‍यक्‍ति परम्‍परागत मूल्‍यों पर विश्‍वास नहीं कर पा रहा है। उसके लिए वे अविश्‍वसनीय एवं अप्रासंगिक हो गये हैं। नये युग को नये जीवन-मूल्‍य चाहिए। परिवर्तन सृष्टि का नियम है । संसार को अब ऐसे धर्म-दर्शन की आवश्‍यकता है जो व्‍यक्‍ति को सुख प्रदान कर सके ; उसे शान्ति दे सके; उसकी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं राजनैतिक समस्‍याओं का समाधान कर सके।

वैज्ञानिक विकास के कारण हमने जिस शक्‍ति का संग्रह किया है, उसका उपयोग किस प्रकार हो; प्राप्‍त गति एवं ऊर्जा का नियोजन किस प्रकार हो - यह आज के युग की जटिल समस्‍या है। विज्ञान ने हमें शक्‍ति, गति एवं ऊर्जा प्रदान की है। लक्ष्‍य हमें धर्म एवं दर्शन से प्राप्‍त करने हैं।

धर्म ही ऐसा तत्‍व है जो मानव मन की असीम कामनाओं को सीमित करने की क्षमता रखता है। धर्म मानवीय दृष्‍टि को व्‍यापक बनाता है। धर्म मानव मन में उदारता, सहिष्‍णुता एवं प्रेम की भावना का विकास करता है। समाज की व्‍यवस्‍था, शांति तथा समाज के सदस्‍यों में परस्‍पर प्रेम, सद्‌भाव एवं विश्‍वासपूर्ण व्‍यवहार के लिए धर्म का आचरण एक अनिवार्य शर्त है। इसका कारण यह है कि मन की कामनाओं को नियंत्रित किये बिना समाज रचना संभव नहीं है। जिंदगी में संयम की लगाम आवश्‍यक है। कामनाओं को नियंत्रित करने की शक्‍ति या तो धर्म में है या शासन की कठोर व्‍यवस्‍था में। धर्म का अनुशासन ‘आत्‍मानुशासन' है। शासन का अनुशासन हम पर ‘पर का नियंत्रण' है।

धर्म संप्रदाय नहीं है। जिंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्‍यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्‍ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्‍व है जिसके आचरण से व्‍यक्‍ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्‍य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है।

मध्‍ययुग में विकसित धर्म एवं दर्शन के परम्‍परागत स्‍वरूप एवं धारणाओं के प्रति आज के व्‍यक्‍ति की आस्‍था कम हो गई है। मध्‍ययुगीन धर्म एवं दर्शन के प्रमुख प्रतिमान थे - स्‍वर्ग की कल्‍पना, सृष्‍टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्‍वर की कल्‍पना, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, अपने देश एवं काल की माया एवं प्रपंचों से परिपूर्ण अवधारणा। मध्‍ययुगीन चेतना के केन्‍द्र में ईश्वर का कर्तृत्‍व रूप प्रतिष्‍ठित था। अपने श्रेष्ठ आचरण, श्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान जीवन की समस्‍याओं का समाधान करने की ओर ध्‍यान कम था, अपने आराध्‍य की स्‍तुति एवं जयगान करने में ध्‍यान अधिक था। धर्म की आड़ में अपने स्‍वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलालों ने अध्‍यात्म-सत्‍य को अंधी आस्‍तिकता के आवरण से ढकने का प्रयास किया। इनकी चिन्‍ता का केन्‍द्र मनुष्‍य की वर्तमान समस्‍याओं का समाधान नहीं था। इन्‍होंने मनुष्‍य को स्‍वर्ग अथवा बहिश्‍त में पहुँचकर मौजमस्‍ती की जिंदगी बिताने की राह दिखाई और उपदेश दिया कि हमारे माध्‍यम से आराध्‍य के प्रति तन-मन-धन से समर्पण करो - पूर्ण आस्‍था, पूर्ण विश्‍वास, पूर्ण निष्‍ठा के साथ आराध्‍य की भक्‍ति करो। तर्क एवं विवेक को साधना पथ का सबसे बड़ा अवरोधक तत्‍व मान लिया गया।

धर्म के व्‍याख्‍याताओं ने संसार के प्रत्‍येक क्रिया-कलाप को ईश्‍वर की इच्‍छा माना तथा मनुष्‍य को ईश्‍वर के हाथों की कठपुतली के रूप में स्‍वीकार किया। दार्शनिकों ने व्‍यक्‍ति के वर्तमान जीवन की विपन्‍नता का हेतु ‘कर्म-सिद्धान्त' के सूत्र में प्रतिपादित किया। इसकी परिणति मध्‍ययुग में यह हुई कि वर्तमान की सारी मुसीबतों का कारण ‘भाग्य' अथवा ईश्‍वर की मर्जी को मान लिया गया। धर्म के ठेकेदारों ने पुरुषार्थवादी-मार्ग के मुख्य-द्वार पर ताला लगा दिया। समाज या देश की विपन्‍नता को उसकी नियति मान लिया गया। समाज भाग्‍यवादी बनकर अपनी सुख-दुःखात्‍मक स्‍थितियों से सन्‍तोष करता रहा।

आज के युग ने यह चेतना प्रदान की है कि विकास का रास्‍ता हमें स्‍वयं बनाना है। किसी समाज या देश की समस्‍याओं का समाधान कर्म-कौशल, व्‍यवस्‍था-परिवर्तन, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्‍ठा से सम्‍भव है। इस कारण व्‍यक्‍ति, समाज तथा देश अपनी समस्‍याओं के समाधान करने के लिए तत्‍पर हैं, जिन्‍दगी को बेहतर बनाने के लिए प्रयत्‍नशील हैं। जीवन के प्रत्‍येक क्षेत्र में प्रगति एवं विकास की ललक बढ़ रही है।

वर्तमान जिन्‍दगी को सुधारने तथा सँवारने की अपेक्षा, पहले के व्‍यक्‍ति को ‘परलोक' की चिन्‍ता अधिक रहती थी। उसका ध्‍यान ‘स्‍वर्ग' या ‘बहिश्त' में पहुँचकर सुख एवं मौज-मस्‍ती प्राप्‍त करने की तरफ अधिक रहता था। भौतिक इच्‍छाओं की सहज एवं पूर्ण तृप्‍ति की कल्‍पना ‘स्‍वर्ग' या ‘बहिश्त' की परिकल्‍पना का आधार बनी। आज के मनुष्‍य की रुचि अपने वर्तमान जीवन को संवारने में अधिक है। उसका ध्‍यान ‘भविष्‍योन्‍मुखी' न होकर वर्तमान में है। वह दिव्‍यताओं को अपनी ही धरती पर उतार लाने के प्रयास में लगा हुआ है। वह पृथ्‍वी को ही स्‍वर्ग बना देने के लिए बेताब है।

विज्ञान ने दुनिया को समझने और जानने का वैज्ञानिक मार्ग प्रतिपादित किया है। विज्ञान ने स्‍पष्‍ट किया है कि यह विश्‍व किसी की इच्‍छा का परिणाम नहीं है। सभी पदार्थ कारण-कार्य भाव से बद्ध हैं। भौतिक विज्ञान ने सिद्ध किया है कि किसी पदार्थ का कभी विनाश नहीं होता, उसका केवल रूपांतर होता है। विज्ञान ने शक्‍ति के संरक्षण के सिद्धान्‍त का प्रतिपादन किया है। पदार्थ के अविनाशिता के सिद्धान्‍त की पुष्‍टि की है। समकालीन अस्‍तित्‍ववादी दर्शन ने भी ईश्‍वर का निषेध किया है। आधुनिकता का मूल प्रस्‍थान-बिन्‍दु यह विचार है कि ईश्‍वर मनुष्‍य का स्रष्‍टा नहीं है अपितु मनुष्‍य ही ईश्‍वर का स्रष्‍टा है।

मध्‍ययुगीन चेतना के केन्‍द्र में ईश्‍वर प्रतिष्‍ठित था। आज की चेतना के केन्‍द्र में मनुष्‍य प्रतिष्‍ठित है। मनुष्‍य ही सारे मूल्‍यों का स्रोत है। वही सारे मूल्‍यों का उपादान है।

विज्ञान द्वारा प्रतिपादित अवधारणाओं में, साम्‍यवादी दर्शन में तथा अस्‍तित्‍ववादी दर्शन में कुछ विचार-प्रत्‍यय समान हैं - तीनों ने ईश्‍वर का निषेध किया है तथा ईश्‍वर के स्‍थान पर मनुष्‍य की स्‍थापना की है। तीनों भाग्‍यवादी नहीं हैं, कर्मवादी तथा पुरुषार्थवादी हैं। तीनों में मनुष्‍य की जिन्‍दगी को सुखी बनाने का संकल्‍प है। अस्‍तित्‍ववादी दर्शन ने वैयक्‍तिक स्‍वतन्‍त्रता की चेतना प्रदान की है। साम्‍यवादी दर्शन ने सामाजिक समता पर बल दिया है। विज्ञान, मार्क्‍सवाद, अर्स्‍तित्‍ववादी-दर्शन तीनों की सीमाएँ भी हैं।

विज्ञान बुद्धि एवं तर्क मात्र के आश्रित है। मानवीयता एवं सामाजिकता केवल तर्क एवं बुद्धि से संगठित नहीं होते। उनके संगठन में तर्क एवं बुद्धि के अतिरिक्‍त कल्‍पना, मनोभाव एवं संवेगों की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जीवन में केवल बुद्धिजगत के ही नहीं अपितु भावजगत के तत्‍व भी महत्‍वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।

मार्क्‍सवाद वर्ग संघर्ष पर आधारित है। साम्‍यवादी विचारधारा मनुष्‍य की व्‍यक्‍तिगत स्‍वतन्‍त्रता के सम्‍बन्‍ध में अत्‍यन्‍त निर्मम तथा कठोर है। वर्ग संघर्ष एवं द्वन्‍द्वात्‍मक भौतिकवादी चिन्‍तन के कारण वह समाज को बांटती है। गतिशील पदार्थों की विरोधी शक्‍तियों के संघर्ष या द्वन्‍द्व को जीवन की भौतिकवादी व्‍यवस्‍था के मूल में मानने के कारण सतत संघर्ष की भूमिका प्रदान करती है। मानव जाति को परस्‍पर अनुराग एवं एकत्‍व की आधारभूमि प्रदान नहीं करती। मार्क्‍सवाद हिंसात्‍मक क्रांति में विश्‍वास करता है। जिस देश में हिंसात्‍मक क्रांति होती है ; वह प्रतिक्रिया में मानसिक उत्‍पीड़न को जन्‍म देती है। हिंसा के माध्‍यम से सत्‍ता पर कब्‍जा करने के बाद शासनाध्‍यक्ष के कोष में आत्म-स्वातंत्र्य शब्‍द की सत्‍ता समाप्‍त हो जाती है। सभी प्रकार की स्‍वतन्‍त्रता का दमन किया जाता है। पूर्वी यूरोप के समाजवादी गण राज्‍यों में जनता को समेटकर मजदूर वर्ग, फिर मजदूर वर्ग को कम्‍युनिस्‍ट पार्टी, कम्‍युनिस्‍ट पार्टी को कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की केन्‍द्रीय समिति का पोलित ब्‍यूरो, फिर कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की केन्‍द्र समिति के पोलित ब्‍यूरो को कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की केन्‍द्रीय समिति का सचिव मंडल तथा इस सचिव मण्‍डल को व्‍यक्‍ति विशेष की तानाशाही में केन्‍द्रित कर दिया गया था जिसके विरुद्ध जन-क्रान्‍तियां हुईं ।

अस्‍तित्‍ववादी दर्शन यह मानता है कि मनुष्‍य का स्रष्‍टा ईश्वर नहीं है और इसीलिए मानव-स्‍वभाव, उसका विकास, उसका भविष्‍य भी निश्‍चित एवं पूर्व मीमांसित नहीं है। मनुष्‍य वह है जो अपने आपको बनाता है। मानव को महत्‍व देते हुए भी अस्‍तित्‍ववादी-दर्शन समाज के धरातल पर अत्‍यन्‍त अव्‍यवहारिक है। वह यह मानता है कि चेतनाओं के पारस्‍परिक सम्‍बन्‍धों की आधार भूमि सामंजस्‍य नहीं अपितु विरोध है। व्‍यक्‍तियों के अस्‍तित्‍व वृत्तों के मध्‍य संघर्ष, भय, घृणा आदि भाव हैं। इस प्रकार अस्‍तित्‍ववादी दर्शन व्‍यक्‍ति और व्‍यक्‍ति के मध्‍य संघर्ष एवं अविश्‍वास की भूमिका मानता है।

आज के धार्मिक एवं दार्शनिक मनीषियों को वह मार्ग खोजना है जिससे मानव अपनी बहिर्मुखता के साथ-साथ अन्‍तर्मुखता का भी विकास कर सके। पारलौकिक चिन्‍तन व्‍यक्‍ति के आत्‍म विकास में चाहे कितना भी सहायक हो किन्‍तु उससे सामाजिक सम्‍बन्‍धों की सम्‍बद्धता, समरसता एवं सामाजिक समस्‍याओं के समाधान में अधिक सहायता नहीं मिलती है। आज के भौतिकवादी युग में केवल वैराग्‍य से काम चलने वाला नहीं है। भौतिकवाद का अतिरेक भी मनुष्‍य को संतुष्‍ट नहीं कर पा रहा है। आज हमें मानव की भौतिकवादी एवं आध्‍यात्‍मिक दृष्‍टियों में संतुलन स्‍थापित करना होगा, भौतिक इच्‍छाओं का दमन नहीं, उनका संयमन करना होगा; स्‍वार्थ की कामनाओं में परार्थ का रंग मिलाना होगा। आज मानव को जहाँ एक ओर इस प्रकार का दर्शन शांति नहीं दे सकता कि केवल ब्रह्म सत्‍य है, जगत मिथ्‍या है वहीं दूसरी ओर केवल भौतिक तत्‍वों की ही सत्ता को सत्‍य मानने वाला दृष्‍टिकोण भी जीवन के उन्‍न्‍यन में सहायक नहीं हो सकता ।

व्‍यक्‍ति धर्म को छोड़ना नहीं चाहता। मगर परम्‍परागत धर्म उसके विज्ञानसम्‍मत विवेक को संतुष्‍ट नहीं कर पा रहा है। पाश्‍चात्‍य समाज ऐसे किसी धर्म की कल्‍पना नहीं कर पा रहा है जिसका स्‍वरूप ईश्‍वर के कर्तृत्‍व के बिना विवेचित किया जा सके। परम्‍परागत धर्म की इस मान्‍यता को छोड़ना होगा कि यह संसार ईश्‍वर की इच्‍छा की परिणति है। हमें विज्ञान की इस दृष्‍टि को स्‍वीकार करना होगा कि सृष्‍टि रचना के व्‍यापार में ईश्‍वर के कर्तृत्‍व की भूमिका नहीं है। सृष्‍टि रचना व्‍यापार में प्रकृति के नियमों को स्‍वीकार करना होगा।

आज हमें धर्म के केन्‍द्र में मनुष्‍य को प्रतिष्‍ठित कर उसके पुरुषार्थ एवं विवेक को जाग्रत करना है, उसके मन में सृष्‍टि के समस्‍त जीवों के प्रति अपनत्‍व भाव जगाना है। मनुष्य और मनुष्‍य के बीच आत्‍मतुल्‍यता की ज्‍योति जगानी है जिससे परस्‍पर समझदारी, प्रेम तथा विश्‍वास उत्‍पन्‍न हो सके। आज के मनुष्‍य को वही धर्म-दर्शन प्रेरणा दे सकता है तथा मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक समस्‍याओं के समाधान में प्रेरक हो सकता है जिसके निम्‍न प्रतिमान हों :-

वैज्ञानिक अवधारणाओं का परिपूरक हो। लोकतंत्र के आधारभूत जीवन मूल्‍यों का पोषक हो। सर्वधर्म समभाव का पर्याय हो। अन्‍योन्‍याश्रित विश्‍व व्‍यवस्‍था एवं सार्वभौमिक दृष्‍टि का प्रदाता हो। विश्‍व शान्‍ति एवं अन्तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना का प्रेरक हो ।

धर्म-दर्शन एवं विज्ञान

विज्ञान एवं अध्‍यात्‍म की सीमाएं पृथक हैं, मगर दोनों की मूलभूत अवधारणाओं में सामंजस्‍य स्‍थापित किया जा सकता है। यदि दोनो अपने-अपने आग्रह छोड़ दें तो दोनों के बीच सामरस्य के सूत्र स्‍थापित किये जा सकते हैं।

अध्‍यात्‍म एवं विज्ञान के बीच सामरस्‍य का मार्ग स्‍थापित करने के लिए परम्‍परागत धर्म की इस मान्‍यता को छोड़ना पड़ेगा कि यह संसार ईश्‍वर की इच्‍छा की परिणति है वहीं दूसरी ओर विज्ञान को भी अपनी भौतिकवादी सीमाओं का अतिक्रमण करना होगा। विज्ञान विशुद्ध रूप से भौतिकवादी रहा है। विश्‍व के मूल में पदार्थ एवं शक्‍ति को ही अधिष्‍ठित देखता आया है। विज्ञान को अपार्थिव चिन्‍मय सत्‍ता का भी संस्‍पर्श करना होगा। भविष्‍य के विज्ञान को अपना यह आग्रह भी छोड़ना होगा कि जड़ पदार्थ से चेतना का आविर्भाव होता है। पदार्थ के रूपांतर से स्‍मृति एवं बुद्धि के गुणों को उत्‍पन्‍न किया जा सकता है मगर चेतना उत्‍पन्‍न नहीं की जा सकती। चेतना का अध्‍ययन अध्‍यात्‍म का विषय है।

़ ‘जानना' चेतना का व्‍यवच्देदक गुण है। जीव चेतन है। अजीव अचेतन है। जीव का स्‍वभाव चैतन्‍य है। अजीव का स्‍वभाव जड़त्‍व अथवा अचैतन्‍य है। जो जानता है वह जीवात्‍मा है। जो नहीं जानता वह अनात्‍मा है। जीव आत्‍मा सहित है। अजीव में आत्‍मा नहीं है। जीव सुख दुख की अनुभूति करता है। अजीव को सुख दुख की अनुभूति नहीं होती। जो जानता है, वह चेतना है; जो नहीं जानता, वह अचेतना है। स्‍मृति एवं बुद्धि तथा मस्‍तिष्‍क के समस्‍त व्‍यापार ‘चेतना' नहीं हैं। पदार्थ के रूपांतर से स्‍मृति एवं बुद्धि के गुणों को उत्‍पन्‍न किया जा सकता है मगर चेतना उत्‍पन्‍न नहीं की जा सकती।

एक दृष्‍टि ने माना कि परम चैतन्‍य से ही जड़ जगत की सृष्‍टि होती है। दूसरी दृष्‍टि मानती है कि भौतिक द्रव्‍य की ही सत्ता है। भौतिक पदार्थ के अतिरिक्‍त अन्‍य किसी की सत्ता नहीं है। बुद्धि एवं मन की भॉँति चेतना भी ‘स्‍नायुजाल की बद्धता' अथवा ‘विभिन्‍न तंत्रिकाओं का तंत्र' है जो अन्‍ततः अणुओं एवं आणविक क्रियाशीलता का परिणाम है। भविष्‍योन्‍मुखी दृष्‍टि है कि दोनों की भिन्‍न सत्ता है। जिस वस्‍तु का जैसा उपादान कारण होता है, वह उसी रूप में परिणत होता है। चेतन के उपादान अचेतन में नहीं बदल सकते। अचेतन के उपादान चेतन में नहीं बदल सकते। न कभी ऐसा हुआ है, न हो रहा है और न होगा कि जीव अजीव बन जाए तथा अजीव जीव बन जाए। आत्‍मा अमूर्त तत्‍व है। इन्‍द्रियों का वह विषय नहीं है। इन्‍द्रियाँ उसे जान नहीं पातीं। इससे इन्‍द्रियों की सीमा सिद्ध होती है। इससे आत्‍मा का अस्‍तित्‍व नहीं है - यह सिद्ध नहीं होता। जड़ पदार्थ का रूपान्‍तरण ऊर्जा (प्राण), स्‍मृति, कृत्रिम प्रज्ञा एवं बुद्धि में सम्‍भव है किन्‍तु इनमें चैतन्‍य नहीं होता। कम्‍प्‍यूटर चेतनायुक्‍त नहीं है। कम्‍प्‍यूटर को यह चेतना नहीं होती कि वह है, वह कार्य कर रहा है। कम्‍प्‍यूटर मनुष्‍य की चेतना से प्रेरित होकर कार्य करता है। उसे सुख दुख की अनुभूति नहीं होती। उसे स्व-संवेदन नहीं होता। ‘मैं हूँ,' ‘मैं सुखी हूँ', ‘मैं दुखी हूँ' - शरीर को इस प्रकार के अनुभवों की प्रतीति नहीं होती। इस प्रकार के अनुभवों की जिसे प्रतीति होती है, वह शरीर से भिन्‍न है। आत्‍मा में चैतन्‍य नामक विशेष गुण है। आत्‍मा में जानने की शक्‍ति है। आत्‍मा के द्वारा जीव को अपने अस्‍तित्‍व का बोध होता है। ज्ञान का मूल स्रोत आत्‍मा ही है।

विज्ञान एवं अध्‍यात्म के बीच सामरस्‍य का मार्ग स्‍थापित करने में मनोविज्ञान का अध्ययन भी सहायक हो सकता है । मनोविज्ञान में ‘संज्ञानात्‍मक मनोविज्ञान' पर कार्य हो रहा है। पहले मनोविज्ञान उत्तेजन-प्रतिक्रिया व्‍यवहार के आधार पर ही मानवीय व्‍यवहार का अध्ययन करता था। आज का मनोविज्ञान उद्‌दीपनों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर मानवीय व्‍यवहार का अध्ययन करने तक सीमित नहीं है। अब मनोविज्ञान मानवीय व्‍यवहार को समझने के लिए प्रत्‍यक्षण, स्‍मृति, कल्‍पना, तर्क, निर्णय, अनुभव बोध आदि का भी उपयोग कर रहा है। संज्ञानात्‍मक मनोविज्ञान के अध्‍ययन का आधार संज्ञान है। संवेदन एवं संज्ञान में अन्‍तर है। संवेदन के द्वारा प्राणी को उत्तेजना का आभास होता है। संज्ञान शक्‍ति के द्वारा मनुष्‍य संवेदनों को नाम, रूप, गुण आदि भेदों से संगठित कर, ज्ञान प्राप्‍त करता है। मनोविज्ञान को गहन समाधि एवं स्‍वभावोन्‍मुख गहन ध्‍यान में लीन साधक की शान्त, निर्विकल्प, विचार शून्‍य एवं क्रियाहीन स्‍थिति के अन्‍तर्निरीक्षण की विधि एवं पद्धति का संधान करना होगा।

विज्ञान को इस आधारणा का अतिक्रमण करना होगा कि भौतिक विज्ञान के नियमों से सम्‍पूर्ण वास्‍तविकता की व्‍याख्‍या सम्‍भव है। इस दिशा में सन् 1936 में गोदेल (Godel) द्वारा प्रतिपादित प्रमेय का महत्‍व है। उन्‍होंने सिद्ध किया कि गणित की बहुत सी वास्‍तविकताओं को सिद्ध नहीं किया जा सकता। गणित की यह अपूर्णता अज्ञान के कारण नहीं है। इसका कारण गणित की आधारभूत संरचना है ।

“ ------ the celebrated theorem of Godel (1936 ), proven in a most rigorous manner, states that there are many truths in mathematics which can never be proved. It shows that the incompleteness in mathematics is not due to ignorance but due to its very basic structure."( Raja Ramanna : Physical space in the context of all knowledge (Indian horizons, Vol. XXXVI, Nos. 1-2, pp. 1-6, Indian Council for Cultural Relations, New Delhi, 1987).

पहले भौतिक-विज्ञानी मानते थे कि भौतिकी व्‍याख्‍या में तरंग एवं सूक्ष्‍म अंश परस्‍पर विपरीत छोर हैं। परमाणु के आविष्‍कार के बाद भौतिक-विज्ञान का उक्‍त सिद्धान्‍त अमान्‍य हो गया है। अब सर्वमान्‍य है कि परमाणु क्रिया की व्‍याख्‍या के लिए दोनों की साथ-साथ व्याख्‍या करना आवश्‍यक है। परमाणु के सम्‍बन्‍ध में यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि परमाणु के अंशों को गणित की दृष्‍टि से विश्‍लेषित किया जा सकता है। परमाणु के अंशों की किसी भी विधि से झलक पाना सम्‍भव नहीं है। ऊर्जाणु का सूक्ष्म-अंश युगपत एकाधिक स्‍थानों पर हो सकता है अथवा एकाधिक मार्गों पर गमन कर सकता है। जब भौतिक जगत के ऊर्जाणु के स्‍वरूप की आधारभूत यथार्थता का प्रत्‍यक्षण इतना दुष्‍कर एवं जटिल है तब समस्‍त आभासों का अतिक्रमण करने वाले आत्‍म तत्‍व का किसी यंत्र से प्रत्‍यक्षण किस प्रकार सम्‍भव है। जिससे सबको जाना जाता है उसको बाह्य-विधि से कैसे जाना सकता है। विज्ञान में ऊर्जाणु भौतिकी (Quantum Physics) के क्षेत्र में नए अनुसंधान कार्य हो रहे हैं। इनसे भविष्‍य में आत्‍मा अथवा चेतना के स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व का प्रमाण सिद्ध होना सम्‍भव है। विज्ञान में ऊर्जा भौतिकी आदि क्षेत्रों में जो नव्‍यतम अनुसंधान हुए हैं, उनके आलोक में विज्ञान इस सिद्धान्‍त की पुष्‍टि की ओर कदम बढ़ा रहा है कि प्रत्‍येक प्राणी की चेतना को प्रकट करने के लिए जैविक चेतना संहिति (biological nervous system) तो केवल भौतिक ढाँचा जुटाता है।

धर्म-दर्शन एवं लोकतन्‍त्र

प्रजातंत्रात्मक शासन व्‍यवस्‍था में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को समान अधिकार प्राप्‍त होते हैं। दर्शन के धरातल पर भी हमें प्रत्‍येक प्राणी की समता का उद्‌घोष करना होगा। प्रजातंत्रात्‍मक जीवन पद्धति के स्‍वतंत्रता एवं समानता दो बहुत बड़े मूल्य हैं। राजतंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था एवं प्रजातंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था में मूलभूत अन्‍तर हैं। जाति-पाँति, ऊँच-नीच की भेदभावना एवं आर्थिक विषमता में मध्‍ययुगीन राजतंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था का भी योगदान रहा है। उस युग में किसी देश की राजधानी में सबसे अधिक वैभवपूर्ण स्‍मारक या तो राजा का महल होता था या देवता का मन्‍दिर। राजागण अपने को भगवान समझते थे। राजा के दरबार में उसके प्रशंसक होते थे।

राजतंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था में राजा ही सर्वोच्‍च एवं सर्वशक्‍तिमान होता है। उसके दरबार में दरबारदारियों की विनम्रता चरम सीमा पर होती है। राजा की कृपा पर ही उनका अस्‍तित्‍व निर्भर रहता है। मध्‍य युग में धर्म के क्षेत्र में भक्‍ति का विकास हुआ। भक्‍ति का मूल है - आराध्‍य की सेवा, शरणागति एवं आराधना। भक्‍ति में भक्‍त भगवान का अनुग्रह प्राप्‍त करना चाहता है। बिना भगवान के अनुग्रह के उसका कल्‍याण सम्‍भव नहीं है। राजतंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था एवं मध्‍ययुगीन भक्‍ति का स्‍वरूप समानान्‍तर विकसित हुआ। राजतंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था में समाज में प्रत्‍येक मनुष्‍य को समान अधिकार प्राप्‍त नहीं होते। उस व्‍यवस्‍था में राजा के अनुग्रह एवं इच्‍छानुसार समाज की व्‍यवस्‍था परिचालित होती है। भक्‍ति में साधक अपनी साधना के बल पर मुक्‍ति का अधिकार प्राप्‍त नहीं कर पाता, उसके लिए भगवत कृपा होनी जरूरी है। इन्‍हीं शासन व्‍यवस्‍था एवं धार्मिक चिन्‍तन के कारण सामाजिक धरातल पर विभेदकारी स्‍थितियों का निर्माण हुआ।

प्रजातंत्रात्‍मक शासन व्‍यवस्‍था में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को राजनैतिक दृष्‍टि से समान

संवैधानिक अधिकार प्राप्‍त होते हैं। स्‍वतंत्रता, समानता एवं बन्‍धुत्‍व लोकतंत्र के आधारभूत जीवन मूल्‍य हैं। दर्शन के धरातल पर भी हमें प्रत्‍येक प्राणी में आत्‍म शक्‍ति के अस्‍तित्‍व का उद्‌घोष करना होगा । दर्शन एवं धर्म का प्रतिपादन सामाजिक समता एवं एकता की दृष्‍टि से करना होगा । वर्णों, वादों, सम्‍प्रदायों आदि का लेबिल चिपकाकर मानव-मानव को बांटने वाले दर्शन को तिलांजलि देनी होगी। मानवीय महिमा का जोरदार समर्थन करना होगा। आत्‍मा की स्‍वतंत्रता की प्रजातंत्रात्‍मक उद्‌घोषणा करनी होगी। उद्‌घोष करना होगा कि अस्‍तित्‍व की दृष्‍टि से प्रत्‍येक आत्‍मा स्‍वतंत्र है एवं स्‍वरूप की दृष्‍टि से सभी आत्‍मायें समान हैं। संसार में अनन्‍त प्राणी हैं और उनमें से प्रत्‍येक में जीवात्‍मा विद्यमान है। कर्म बंध के फलस्‍वरूप ये जीवात्‍मायें जीवन की नाना दशाओं, नाना योनियों, नाना प्रकार के शरीरों एवं अवस्‍थाओं में परिलक्षित होती हैं किन्‍तु सभी में उच्‍चतम विकास की समान शक्‍तियां निहित हैं। प्रत्‍येक प्राणी आत्‍म तुल्य है । प्रत्‍येक प्राणी को आत्‍म तुल्‍य मानने से परस्‍पर सौहार्द एवं बन्‍धुत्‍व की भावना सहज रूप से उत्‍पन्‍न होती है।

प्रजातंत्र में विभिन्‍न दल होते हैं। जनता अपने प्रतिनिधि के रूप में अपने विधायकों का चुनाव करती है। प्रजातंत्रात्‍मक शासन-व्‍यवस्‍था की सफलता के लिए विधायकों की मानसिकता में बदलाव आना जरूरी है। उन्‍हें यह समझना होगा कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं। उन्‍हें जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप अपने आचरण को ढालना होगा। सभी दलों का लक्ष्‍य समाज की प्रगति एवं विश्‍वास होना चाहिए। उन्‍हें किसी विषय पर विविध दृष्‍टियों से विचार करने के अनन्‍तर मानवीय हित की दृष्‍टि से सर्वश्रेष्‍ठ निर्णय तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए। इस दृष्‍टि से लोकतंत्र केवल शासन व्‍यवस्‍था नहीं है, एक सम्‍पूर्ण जीवन दर्शन है जिसके आधारभूत मूल्‍य स्‍वतंत्रता, समानता, बन्‍धुत्‍व एवं अनेकान्‍त हैं। इन सभी मूल्‍यों के आचरण के लिए अहिंसा मूलक धर्म-दर्शन की स्‍थापना आवश्‍यक है।

सर्व धर्म समभाव

धर्म की प्रासंगिकता एक व्‍यक्‍ति की मुक्‍ति में ही नहीं है। धर्म की प्रासंगिकता एवं प्रयोजनशीलता शान्‍ति, व्‍यवस्‍था, स्‍वतंत्रता, समता, प्रगति एवं विकास से सम्‍बन्‍धित समाज सापेक्ष परिस्‍थितियों के निर्माण में भी निहित है।

धर्म का सम्‍बन्‍ध आचरण से है। धर्म आचरणमूलक है। दर्शन एवं धर्म में अन्‍तर है। दर्शन मार्ग दिखाता है, धर्म की प्रेरणा से हम उस मार्ग पर बढ़ते हैं। हम किस प्रकार का आचरण करें - यह ज्ञान दर्शन से प्राप्‍त होता है। जिस समाज में दर्शन एवं धर्म में सामंजस्‍य रहता है, ज्ञान एवं क्रिया में अनुरूपता होती है, उस समाज में शान्‍ति होती है तथा सदस्‍यों में परस्‍पर मैत्री-भाव रहता है।

भारतवर्ष में दर्शन और चिन्‍तन के धरातल पर जितनी विशालता, व्‍यापकता एवं मानवीयता रही है, उतनी आचरण के धरातल पर नहीं रही। जब चिन्‍तन एवं व्‍यवहार में विरोध उत्‍पन्‍न हो गया तो भारतीय समाज की प्रगति एवं विकास की धारा भी अवरुद्ध हो गयी।

दर्शन के धरातल पर उपनिषद् के चिन्‍तकों ने प्रतिपादित किया कि यह जितना भी स्‍थावर जंगम संसार है, वह सब एक ही परब्रह्म के द्वारा आच्‍छादित है। उन्‍होंने संसार के सभी प्राणियों को ‘आत्‍मवत्' मानने एवं जानने का उद्‌घोष किया, मगर सामाजिक धरातल पर समाज के सदस्‍यों को उनके गुणों के आधार पर नहीं अपितु जन्‍म के आधार पर जातियों, उपजातियों, वर्णों, उपवर्णों में बाँट दिया तथा इनके बीच ऊँच-नीच की दीवारें खड़ी कर दीं।

धर्म साधना की अपेक्षा रखता है। धर्म के साधक को राग-द्वेषरहित होना होता है। धार्मिक चित्त प्राणिमात्र की पीड़ा से द्रवित होता है। तुलसीदास ने कहा- ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई'। सत्‍य के साधक को बाहरी प्रलोभन अभिभूत करने का प्रयास करते हैं। मगर वह एकाग्रचित्त से संयम में रहता है। प्रत्‍येक धर्म के ऋषि, मुनि, पैगम्बर, संत, महात्‍मा आदि तपस्‍वियों ने धर्म को अपनी जिन्‍दगी में उतारा। उन लोगों ने धर्म को ओढ़ा नहीं अपितु जिया। साधना, तप, त्‍याग आदि दुष्‍कर हैं। ये भोग से नहीं, संयम से सधते हैं। धर्म के वास्‍तविक स्‍वरूप को आचरण में उतारना सरल कार्य नहीं है। महापुरुष ही सच्‍ची धर्म-साधना कर पाते हैं। इन महापुरुषों के अनुयायी जब अपने आराध्य-साधकों जैसा जीवन नहीं जी पाते तो उनके नाम पर सम्‍प्रदाय, पंथ आदि संगठनों का निर्माण कर, भक्‍तों के बीच आराध्‍य की जय-जयकार करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री मान लेते हैं। अनुयायी साधक नहीं रह जाते, उपदेशक हो जाते हैं। ये धार्मिक व्‍यक्‍ति नहीं होते, धर्म के व्‍याख्‍याता होते हैं। इनका उद्‌देश्‍य धर्म के अनुसार अपना चरित्र निर्मित करना नहीं होता, धर्म का आख्‍यान मात्र करना होता है। जब इनमें स्‍वार्थ-लिप्‍सा का उद्रेक होता है तो ये धर्म-तत्त्वों की व्‍याख्‍या अपने स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगते हैं। धर्म की आड़ में अपने स्‍वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलाल अथवा ठेकेदार अध्‍यात्‍म सत्‍य को भौतिकवादी आवरण से ढकने का बार-बार प्रयास करते हैं। इन्‍हीं के कारण चित्त की आन्‍तरिक शुचिता का स्‍थान बाह्य आचार ले लेते हैं। पाखंड बढ़ने लगता है। कदाचार का पोषण होने लगता है। जब धर्म का यथार्थ अमृत तत्त्व सोने के पात्र में कैद हो जाता है तब शताब्‍दी में एकाध साधक ऐसे भी होते हैं जो धर्म-क्रान्‍ति करते हैं, धर्म के क्षेत्र में व्‍याप्‍त अधार्मिकता एवं साम्‍प्रदायिकता पर प्रहार कर, उसके यथार्थ स्‍वरूप का उद्‌घाटन करते हैं।

मध्‍य युग में धर्म के बाह्य आचारों एवं आडम्‍बरों को सन्‍त कवियों ने उजागर किया। सन्‍त नामदेव ने ‘पाखण्‍ड भगति राम नही रीझें' कहकर धर्म के तात्त्विक स्‍वरूप की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट किया तो कबीर ने ‘जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ' कहकर साधना-पथ पर द्विधारहित एवं संशयहीन मनःस्‍थिति से कामनाओं एवं परिग्रहों को त्‍याग कर आगे बढ़ने का आह्‌वान किया। पंडित लोग पढ़-पढ़कर वेदों का बखान करते हैं, किन्‍तु इसकी सार्थकता क्‍या है ? जीवन की चरितार्थता आत्म-साधना में है और ऐसी ही साधना के बल पर दादूदयाल यह कहने में समर्थ हो सके कि ‘काया अन्‍तर पाइया, सब देवन को देव'।

दर्शन के धरातल पर हमें प्रतिपादित करना होगा कि धर्म न कहीं गाँव में होता है और न कहीं जंगल में बल्‍कि वह तो अन्‍तरात्‍मा में होता है। अन्‍तरात्‍मा के दर्शन एवं परिष्‍कार से कल्‍याण सम्‍भव है। शास्‍त्रों के पढ़ने मात्र से उद्धार सम्‍भव नहीं है। यदि चित्त में राग एवं द्वेष है तो समस्‍त शास्‍त्रों में निष्‍णात होते हुए भी व्‍यक्‍ति धार्मिक नहीं हो सकता। क्‍या किसी ‘परम सत्ता' एवं हमारे बीच किसी ‘तीसरे' का होना जरूरी है ? क्‍या लौकिक इच्‍छाओं की पूर्ति के लिए ईश्‍वर के सामने शरणागत होना ही अध्‍यात्‍म साधना है ? क्‍या धर्म-साधना की फल-परिणति सांसरिक इच्‍छाओं की पूर्ति में निहित है ? सांसारिक इच्‍छाओं की पूर्ति के उद्‌देश्‍य से आराध्य की भक्‍ति करना धर्म है अथवा सांसारिक इच्‍छाओं के संयमन के लिए साधना-मार्ग पर आगे बढ़ना धर्म है ? क्‍या स्‍नान करना, तिलक लगाना, माला फेरना आदि बाह्य आचार की प्रक्रियाओं को धर्म-साधना का प्राण माना जा सकता है ? धर्म की सार्थकता वस्‍तुओं एवं पदार्थों के संग्रह में है अथवा राग-द्वेष रहित होने में है ? धर्म का रहस्‍य संग्रह, भोग, परिग्रह, ममत्व, अहंकार आदि के पोषण में है अथवा अहिंसा, संयम, तप, त्‍याग आदि के आचरण में ? आत्‍मस्‍वरूप का साक्षात्‍कार अहंकार एवं ममत्‍व के विस्‍तार से सम्‍भव नहीं है। अपने को पहचानने के लिए अन्‍दर झाँकना होता है, अन्‍तश्‍चेतना की गहराइयों में उतरना होता है। धार्मिक व्‍यक्‍ति कभी स्‍वार्थी नहीं हो सकता। आत्म-गवेषक अपनी आत्‍मा से जब साक्षात्‍कार करता है तो वह ‘एक' को जानकर ‘सब' को जान लेता है, पहचान लेता है, सबसे अपनत्व-भाव स्‍थापित कर लेता है। आत्‍मानुसंधान की यात्रा में व्‍यक्‍ति एकाकी नहीं रह जाता, उसके लिए सृष्‍टि का प्रत्‍येक प्राणी आत्‍मतुल्‍य हो जाता है। एक की पहचान सबकी पहचान हो जाती है तथा सबकी पहचान से वह अपने को पहचान लेता है। भाषा के धरातल पर इसमें विरोधाभास हो सकता है, अध्‍यात्‍म के धरातल पर इसमें परिपूरकता है। जब व्‍यक्‍ति आत्‍मसाक्षात्‍कार के लिए प्रत्‍येक पर-पदार्थ के प्रति अपने ममत्‍व एवं अपनी आसक्‍ति का त्‍याग करता है तब वह राग-द्वेषरहित हो जाता है, वह आत्‍मचेतना से जुड़ जाता है, शेष सबके प्रति उसमें न राग रहता है न द्वेष। इसी प्रकार जब साधक सृष्‍टि के प्रत्‍येक प्राणी को आत्‍मतुल्‍य समझता है तब भी उसका न किसी से राग रह जाता है और न किसी से द्वेष। धर्म का अभिप्राय व्‍यक्‍ति के चित्त का शुद्धिकरण है जहाँ पिण्‍ड में ही ब्रह्माण्ड' है। समस्‍त प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव, प्रेमभाव तथा समभाव होना ही धर्म है और इस दृष्‍टि से ‘सर्वधर्म समभाव' में से यदि विशेषणों को हटा दें तो शेष रह जाता है : ‘धर्म-भाव'। सम्‍प्रदाय में भेद दृष्‍टि है, धर्म में अभेद-दृष्‍टि। हमारी कामना है कि विश्‍व में इसी अभेद-दृष्‍टि का विकास हो। धर्म से पहले जुड़ने वाला कोई भी ‘विशेषण' किसी भी स्‍थिति में कभी भी अपने ‘विशेष्य' से अधिक महत्‍वपूर्ण न बने।

प्रत्‍येक धर्म में व्‍यक्‍ति के राग-द्वेष के कारणों को दूर करने का विधान स्‍पष्‍ट है। क्रोध से द्वेष का तथा अहंकार, माया एवं लोभ से राग का परिपाक होता है। व्‍यक्‍ति क्षमा द्वारा क्रोध को, मार्दव या विनम्रता द्वारा अहंकार को, आर्जव या निष्‍कपटता द्वारा माया या तृष्‍णा को तथा शुचिता द्वारा लोभ को जीतता है। तदनन्तर व्‍यक्‍ति सत्‍य का प्रकाश प्राप्‍त कर पाता है। संयम के द्वारा व्‍यक्‍ति इन्‍द्रियों की विषय-उन्‍मुखता पर प्रतिबन्‍ध लगाता है या उन्‍हें नियंत्रित करता है। तप रूपी अग्‍नि में कषाय, वासनाएँ, कल्‍मषताएँ जल जाती हैं। इसके बाद व्‍यक्‍ति संचित पदार्थों का त्‍याग करता है, वस्‍तुओं के प्रति आसक्‍ति समाप्‍त करता है तथा काम भाव को संयत कर काम-वासना पर विजय प्राप्‍त करता है। विश्‍व के सभी धर्मों में नैतिक मूल्‍यों का प्रतिपादन है, मानव मूल्‍यों की स्‍थापना है, मानव-जाति में सदाचारण के प्रसार का प्रयास है। इन नैतिक मूल्‍यों, सद्‌गुणों एवं सदाचारों को व्‍यक्‍त करने वाली शब्‍दावली में भिन्‍नता होने के कारण बाह्य धरातल पर हमें धर्मों के साधना-पक्ष में अन्‍तर प्रतीत होता है, तात्त्विक दृष्‍टि से सभी धर्म मनुष्‍य के सद्‌पक्ष को उजागर करते हैं, सामाजिक जीवन में शान्‍ति, बन्‍धुत्व, प्रेम, अहिंसा एवं समतामूलक विकास के पक्षधर हैं । सर्वधर्म समभाव की उदात्त चेतना का विकास सम्‍भव है। मतवादों का भेद हमारे ज्ञान एवं प्रतिपादन शक्‍ति की अपूर्णता के कारण है। प्रत्‍येक तत्‍त्‍व पर अनेक दृष्‍टियों से विचार सम्‍भव है। एकांगी प्रतिपादन के कारण वे परस्‍पर विरोधी प्रतीत होती हैं। प्रतीत होने वाले विरोधों का शमन सम्‍भव है। उदाहरण के लिए संग्रहनय की अपेक्षा से वेदान्‍त दर्शन तथा ऋजुसूत्रनय की दृष्‍टि से बौद्ध दर्शन की संगत व्‍याख्‍या सम्‍भव है। प्रतीयमान विरोधी दर्शनों में समन्‍वय स्‍थापित किया जा सकता है ।

धर्म-दर्शन एवं अन्‍योन्‍याश्रित विश्‍व व्‍यवस्‍था

वैज्ञानिक प्रगति तथा तकनीकी विकास के कारण आज दुनिया बहुत छोटी हो गयी है। विश्‍व एकता की चेतना का भी तेजी से विकास हुआ है। व्‍यक्‍ति यह समझने तथा पहचानने लगा है कि विश्‍व के एक भाग की घटना का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ता है। सम्‍पूर्ण पृथ्‍वीलोक को एक इकाई मानकर चिन्‍तन होना आरम्‍भ हो गया है। इस चिन्‍तन के प्रेरणा-स्रोत आज दर्शन, धर्म, काव्य, कला आदि ही नहीं हैं अपितु विज्ञान, तकनीकी विकास, यातायात, सूचना-क्रान्‍ति आदि अनेक कारक हैं ।

अब हम यह अनुभव करने लगे हैं कि हमारे पृथ्‍वी लोक के मनुष्य-जगत एवं प्रकृति-जगत की अनेक ऐसी समस्‍याएँ हैं जिनका समाधान एकदेशीय धरातल पर सम्भव नहीं है। समस्‍याएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, परस्‍पर गुँथी हुई हैं। इनके समाधान के लिए विश्‍वजनीन दृष्‍टिकोण अपनाना आवश्‍यक है। इनका समाधान सार्वदेशिक धरातल पर ही सम्‍भव है।

विश्‍व के देशों में इस बात पर आम सहमति विकसित होनी चाहिए कि विकास का अर्थ केवल मशीनों के द्वारा अधिक उत्‍पादन करना नहीं है। विकास अपने में साध्‍य नहीं है। विकास केवल साधन है। विकास का लक्ष्‍य मनुष्‍य है। विकास साधन है और साध्‍य है - मनुष्‍य जाति का हित-सम्‍पादन। विकास का उद्देश्य है - मनुष्‍य की समग्र उन्‍नति। विश्‍व में विकास की ऐसी व्‍यवस्‍था स्‍थापित हो जिससे मनुष्‍य के अन्‍तर्जात गुणों का पूर्ण विकास सम्‍भव हो सके। उसकी सृजनशीलता की विविध रूपों में पूर्ण अभिव्‍यक्‍ति सम्‍भव हो सके, मनुष्‍य की भौतिक सन्‍तुष्‍टि के साथ-साथ उसकी आत्‍मिक सन्‍तुष्‍टि भी हो सके। मनुष्‍य अपना जीवन सुखी बनाने के साथ-साथ उसे सार्थक भी बना सके।

कुछ व्‍यवस्‍थाओं ने व्‍यक्‍तिगत स्वातंत्र्य को तथा कुछ ने आर्थिक समानता को सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण माना। मिखाइल गोर्बाचोव की ‘परेस्‍त्रोइका' या पुर्नरचना की नीति के प्रभाव के कारण पूर्वी यूरोप के देशों में तथाकथित साम्‍यवादी शासन-व्‍यवस्‍था के दुर्ग ढह चुके हैं तथा वहाँ जनक्रान्‍तियों की सफलता के कारण लोकतन्‍त्र स्‍थापित हो गया है। पूंजीवादी देशों की सरकारें भी समाज के निर्धन, विपन्न, कजोर, बेसहारा, बेरोजगार वर्गों के लिए कल्‍याणकारी कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं। ‘पूँजी' को विपन्‍न वर्गों के लिए समायोजित किया जा रहा है। अब धीरे-धीरे विश्‍व के अधिकांश देशों ने नये जीवन-मूल्‍यों को मान्‍यता देना आरम्‍भ कर दिया है। इनमें निम्‍नलिखित मूल्‍यों का उल्‍लेख करना प्रासंगिक होगा :- (1) स्‍वतन्‍त्रता (2) व्‍यक्‍ति की प्रतिष्‍ठा (3) जनशक्‍ति एवं जन-आकांक्षाओं का आदर (4) समता (5) समाज के सुविधाविहीन वर्गों के प्रति दायित्व-बोध (़6) पुरुष एवं स्‍त्री की समानता (7) विश्व-बन्‍धुत्‍व एवं विश्व-मैत्री (8) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना (9) एक-दूसरे की संस्‍कृति, परम्‍परा, धर्म, रीति-रिवाजों के प्रति आदर (10) लोकतन्‍त्रात्‍मक शासन-व्‍यवस्‍था।

विभिन्‍न राष्‍ट्रों के बीच समानता तथा आम सहमति के आधार पर समस्‍याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए , पारस्‍परिक लाभ के आधार पर विकास के लिए सार्वभौमिक सहयोग के सिद्धान्‍त को मान्‍यता प्राप्त होनी चाहिए ।

विश्‍व के सामने बहुत-सी समस्‍याएँ एवं चुनौतियाँ हैं, अनेक संकट हैं। इनमें से अधिकांश समस्‍याएँ एवं चुनौतियाँ एकदेशी नहीं हैं। सार्वभौमिक चिन्‍ता के प्रश्‍नों एवं समस्‍याओं का उत्तर एवं समाधान परस्‍पर सहयोग से ही संभव है :

(क) विकसित देशों ने अपने निवासियों की भोजन, आवास, वस्‍त्र, शिक्षा, चिकित्‍सा आदि मूलभूत आवश्‍यकताओं को लगभग पूरा कर लिया है लेकिन विकासशील देशों के निवासियों की मूलभूत आवश्‍यकताएँ अभी पूरी नहीं हो सकी हैं। विकसित एवं विकासशील देशों में असमानाताएँ बहुत अधिक हैं। विकसित देशों को अपेक्षित नीतिगत परिवर्तन करने होंगे तथा समता सम्‍बन्‍धी प्रतिबद्धताओं को कार्यरूप में परिणत करना होगा।

(ख) विकसित देशों में भी आर्थिक समृद्धि के लाभों के असमान वितरण से समाज के निर्धन वर्गों में व्‍याकुलता तथा गहरे असन्‍तोष के लक्षण विद्यमान हैं।

(ग) विकास को पूर्णतः मानवीय दृष्‍टि से देखना होगा। विश्‍व की अर्थव्‍यवस्‍था की संरचनात्‍मक समस्‍याओं का हल ढूँढते समय तथा नीतियों को क्रियान्‍वित करते समय नीति-निर्माताओं को इस बात को ध्‍यान में रखना होगा कि नीति का लक्ष्‍य विकसित एवं विकासशील देशों के समाजों में विद्यमान आर्थिक असमानताओं को दूर करना है। विकासशील देशों के विकास को सुनिश्‍चित करने के लिए कुछ व्‍यापक उपायों पर अमल होना जरूरी है। विकास के मार्ग में जिन नीतियों को बाधक माना जाता है उनको विकासशील देशों की सरकारों को अपनाए रखने का दुराग्रह छोड़ना होगा। विकसित देशों को विकासशील देशों के साथ व्‍यापार की अपनी शर्तों में सुधार करना होगा, संरक्षणवाद को तिलांजलित देनी होगी, विकासशील देशों के ऊपर कमरतोड़ ऋण के बोझ की समस्‍या को सुविचारित ढंग से हल करना होगा, विकासशील देशों को मिलने वाली आधिकारिक विकास सहायता में पर्याप्‍त वृद्धि करनी होगी, बहुपक्षीय विकास संस्‍थाओं के संसाधनों की स्‍थिति को सुदृढ़ करना होगा, विज्ञान और प्रोद्यौगिकी के क्षेत्रों में सभी देशों के पारस्‍परिक हित के लिए अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सहयोग की एक नयी व्‍यवस्‍था स्‍थापित करनी होगी तथा अस्‍त्र-शस्‍त्रों पर व्‍यय होने वाली धनराशि को विकासशील देशों की समस्‍याओं के निराकरण के लिए विनियोजित करना होगा।

(घ) विकास मात्र आर्थिक उन्‍नति पर ही केन्‍द्रित नहीं रह सकता। जन-जन की निर्धनता समाप्‍त करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने, पुरुष एवं स्‍त्री वर्गों की असमानताओं को दूर करने तथा संसार के सभी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी देशों से यह अपेक्षित है कि वे एकीकृत तथा सार्वदेशिक दृष्‍टि से विचार करें, नीतियाँ बनावें तथा कार्यक्रमों को क्रियान्‍वित करें। गरीबी और सामाजिक कुव्‍यवस्‍था ये दोनों ही आर्थिक विकास और जीवन-स्तर-उन्‍नयन के मार्ग की मुख्‍य रुकावटें हैं। इस कारण विकास की दिशा में आर्थिक उपायों के साथ-साथ सामाजिक दृष्‍टि से भी संगठित प्रयास किए जाने जरूरी हैं। सामाजिक एवं प्रशासनिक दृष्‍टियों से आतंकवाद, बढ़ते अपराध, नशीले तथा मादक द्रव्‍यों का सेवन, कैंसर एवं एड्‌स जैसे रोगों का प्रसार किसी देश विशेष की समस्‍याएँ नहीं हैं। आर्थिक एवं सामाजिक संरचना में सम्‍यक् सुधारों के द्वारा ही इन समस्‍याओं के स्‍थायी समाधान का मार्ग खोजा जा सकता है।

(ड) जनसंख्‍या-पर्यावरण-प्राकृतिक संसाधन का विकास से गहरा सम्‍बन्‍ध है। जनसंख्‍या-वृद्धि की कम दर और आर्थिक विकास के उन्‍नत स्‍तर में सीधा सम्‍बन्‍ध है। किसी देश की जन्‍म दर का वहाँ के सामाजिक-आर्थिक विकास से सहसम्‍बन्‍ध है। सामाजिक और आर्थिक विकास ही उच्‍च जन्‍मदर को रोकने का सही उपाय है। विश्व की बढ़ती आबादी के भयावह परिणामों की ओर सबका ध्‍यान आकृष्‍ट होना चाहिए। विकासशील देशों में शहरी क्षेत्रों में जनसंख्‍या का बढ़ता बोझ भारी आर्थिक और सामाजिक समस्‍याएँ ही पैदा नहीं कर रहा है अपितु पर्यावरण के लिए भी संकट उत्‍पन्‍न कर रहा है। शहरी जनसंख्‍या के विस्‍तार के कारण शहरों में अन्‍धाधुन्‍ध भवनों का निर्माण हो रहा है। अव्‍यावहारिक भवन-निर्माण-परियोजनाओं के कारण शहरों के मकान ‘घर' न होकर ‘माचिस की बन्‍द डिब्‍बियों' के रूप में बदलते जा रहे हैं। प्रत्‍येक शहर अपनी पहचान खोता जा रहा है तथा इस्‍पात और कंकरीट आदि भौतिक पदार्थों से निर्मित बहुमंजिली इमारतों के जंगल में बदलता जा रहा है। शहरों का फैलाव इतना अधिक बढ़ता जा रहा है कि व्‍यक्‍ति को अपने फ्‍लैट से निकलकर अपने कर्म-स्‍थल तक पहुँचने तथा वहाँ से अपने फ्‍लैट लौटने में समय, श्रम एवं अर्थसाध्‍य कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सामाजिक जीवन में एकाकीपन, अलगाव, मानसिक दबाव तथा असुरक्षा की भावनाएँ बढ़ रही हैं। इसी कारण प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति भरी भीड़ में अकेला होता जा रहा है।

मानसिक अशान्‍ति के इस चक्रव्‍यूह में फँसा हुआ व्‍यक्‍ति भौतिक पदार्थों के अधिकाधिक उपभोग की तरफ बढ़ रहा है। विकसित देशों की बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियाँ अपने संसाधनों के कारण अपने उत्‍पादनों की बाजारों में खपत बढ़ाने के लिए उपभोक्‍ताओं को तरह-तरह से आकर्षित करके ‘उपभोग-प्रवृत्‍ति' को बढ़ावा देने में संलग्‍न हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि पृथ्‍वी का सम्‍पूर्ण पर्यावरण तरह-तरह के प्रदूषणों से दूषित हो गया है तथा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अपनी चरमसीमा पर पहुँच गया है। आकाश, भूमि तथा जल तीनों की चिन्‍त्‍य स्‍थिति है। विभिन्‍न प्रकार के प्रदूषणों के कारण पृथ्‍वीलोक के जीवन की रक्षा करने वाली ‘ओज़ोन परत' क्षत-विक्षत हो चुकी है। पृथ्‍वी की हरियाली रेगिस्‍तान में बदलती जा रही है। आदमी जंगल के हरे-भरे पेड़ो को काटता जा रहा है जिसके कारण रेगिस्‍तान बनने की क्रिया तेज होती जा रही है। चरागाहों तथा खेती करने योग्‍य जमीन का आवश्‍यकता से अधिक उपयोग किया जा चुका है। मनुष्‍य ने अपना तथा अपने पशुओं का पेट भरने के लिए ही नहीं अपितु मकानों के निर्माण, ईधन,औषधि आदि के लिए भी पेड़-पौधों को बहुत बड़ी मात्रा में नष्‍ट कर दिया है। जब वर्षा होती है तब वर्षा का जल भूमि में प्रवेश किये बिना भूमि की खाद को बहा ले जाता है। इसके कारण धीरे-धीरे वनस्‍पति तथा खादवाली मिट्‌टी के नष्‍ट हो जाने से मरुस्‍थल का दायरा बढ़ रहा है।

बड़ी-बड़ी जनसंख्‍या वाले नगरों तथा औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों के कार्बनिक तथा अकार्बनिक अवशिष्‍ट जल में मिलकर अधिकांश नदियों के जल को प्रदूषित कर रहे हैं। प्रदूषित जल ही रिस-रिसकर भूमि के अन्‍दर जाकर भूमिगत जल में मिल रहा है। इस शताब्‍दी के अन्‍त तक पानी का उपभोग दुगना हो जायेगा। एक तरफ पानी निरन्‍तर प्रदूषित हो रहा है, दूसरी तरफ उपभोक्‍ताओं के लिए अधिकाधिक पेयजल उपलब्‍ध कराने की समस्‍या बढ़ती जा रही है।

पर्यावरण में सुधार के जो तकनीकी प्रयास हो रहे हैं उनसे वांछित सफलता मिलना सन्‍देहास्‍पद है। हमें प्रकृति एवं परिवेश के साथ भावात्‍मक सम्‍बन्‍ध स्‍थापित करने होंगे, यह अनुभव करना होगा कि मनुष्‍य जगत तथा प्रकृति जगत अन्‍योन्‍याश्रित हैं । भौतिकवादी दृष्टि है - योग्‍यतम की उत्तर जीविता । धर्म-दर्शन की दृष्‍टि है - विश्‍व के सभी पदार्थ परस्‍पर उपकारक हैं। धर्म-दर्शन की दृष्‍टि अहिंसा भाव का विकास करती है। अहिंसक व्‍यक्‍ति कभी प्रकृति पर विजय प्राप्‍त करने के लिए प्रयास नहीं करता। अहिंसक व्‍यक्‍ति प्रकृति से सामंजस्‍य करने का प्रयास करता है। अहिंसक व्‍यक्‍ति प्रकृति के संसाधनों का दोहन नहीं करता। मनुष्‍य को प्रकृति पर शासन करने की लालसा को छोड़कर उसके साथ समरस होने का प्रयास करना होगा। मनुष्‍य को यंत्रों पर इतना अधिक आश्रित नहीं होना चाहिए कि वह प्रकृति से ही दूर चला जाये। मनुष्‍य का जीवन एवं उद्योग दोनो के यंत्रचालित होने के दुष्‍परिणाम स्‍पष्‍ट हैं। इससे बेरोजगारी का अनुपात बढ़ रहा है तथा प्रकृति में प्रदूषण का प्रसार हो रहा है। मानव संसाधनों का सुनियोजित उपयोग जरूरी है। मानव-श्रम एवं शक्‍ति के पूर्ण समायोजन हो जाने के बाद ही औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों को ‘स्‍वचालन' की शरण लेनी चाहिए, मनुष्‍य को ‘रोबोट' से अधिक महत्‍व मिलना चाहिए। ऐसी प्रबन्‍ध कुशलता से क्‍या लाभ जो मानव-समूहों को रोजगार के अवसरों से वंचित कर दे। उत्‍पादन, प्रगति, विकास, समृद्धि आदि की सार्थकता तभी मानी जा सकती है जब ये समाज में मनुष्य-समूहों तथा समुदायों की आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति में अपना योग देने में समर्थ हों तथा मनुष्‍य जाति में मानवीयता, नैतिकता एवं सृजनात्‍मकता की ओर भावना का विकास करें। धर्म-दर्शन से प्रेरित विकास एवं प्रगति का लक्ष्य होना चाहिए - विश्‍व शान्‍ति तथा अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना के प्रति समर्पित तथा प्रकृति-जगत् के संरक्षण एवं उसके प्रति मैत्री-भाव के लिए संकल्‍पित मानवीय भावना का विस्‍तार। इस प्रकार की भावना से मानव की मूलभूत भौतिक आवश्‍यकताओं एवं मानसिक आकांक्षाओं को पूरा करने वाली एक न्‍यायसंगत विश्व-व्‍यवस्‍था स्‍थापित हो सकेगी।

धर्म-दर्शन एवं विश्‍व शान्‍ति तथा अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना

आज का मनुष्‍य किसी भी कीमत पर युद्ध नहीं चाहता। सभी महाद्वीपों की जनता ने शान्‍ति आन्‍दोलनों का समर्थन किया है तथा राजनेताओं से अनुरोध किया है कि वे तनाव-शैथिल्‍य और निरस्‍त्रीकरण की दिशा में कदम उठायें। विभिन्न देशों की जनता ने शान्‍ति के समर्थन और नाभिकीय युद्ध के विरुद्ध जिस प्रकार विशाल प्रदर्शन किये हैं, उनसे इस तथ्‍य की सहज पुष्‍टि होती है।

द्वितीय महायुद्ध के भयावह परिणामों से हम सब परिचित हैं। जिन देशों ने युद्ध की यातनाओं एवं विभीषिकाओं को झेला है, वहाँ की जनता आगामी युद्ध की आशंका मात्र से भयाक्रान्‍त है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस तथ्‍य को स्‍पष्‍ट किया है कि सीमित नाभिकीय युद्ध की अवधारणा भ्रान्‍तिपूर्ण है। भविष्‍य में कभी ‘तृतीय विश्‍वयुद्ध' नहीं होगा, अगर हुआ तो वह ‘अन्‍तिम युद्ध' होगा। अगर कभी वह युद्ध छिड़ गया तो वह सम्‍पूर्ण मानवीय जीवन तथा भूमण्‍डल का विनाशकारक अवसान होगा। नाभिकीय प्रौद्योगिकी की प्रचण्‍ड विध्‍वंसक क्षमता के निःसृत होने पर केवल आज का पार्थिव जीवन ही नष्‍ट नहीं हो जायेगा, अपितु वह सृष्‍टि के ब्रह्मांडीय इतिहास एवं लोकों के पारस्‍परिक सन्‍तुलन-चक्र के भी विपरीत होगा। नाभिकीय टकराव की विनाश लीला में न कोई विजेता होगा न कोई पराजित। इसका परिणाम होगा : - (1) मानवता का अन्त (2) प्रकृति का अन्त (3) भूमण्‍डल से सभी प्रकार के जीवन का अन्त।

एक देश की अथवा दुनिया के एक क्षेत्र की शान्‍ति का विचार अब अप्रासंगिक हो गया है। किसी देश अथवा क्षेत्र की सीमाओं में शान्‍ति अथवा संघर्ष को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। किसी की विजय अथवा किसी की पराजय के प्रश्‍न अर्थहीन हो गये हैं। विश्‍व शान्‍ति एवं हम सबकी सत्ता अन्‍योन्‍याश्रित हैं।

सामाजिक और आर्थिक प्रगति में तेजी लाने के लिए भरोसेमन्‍द एवं कारगर तंत्र निर्मित करने की प्रक्रिया में तेजी लाने की आवश्‍यकता असंदिग्‍ध है। विश्‍व शक्‍तियों के बीच किसी मुद्‌दे पर तनाव है तो उसकी परिणति युद्ध में नहीं होनी चाहिए। शिखर वार्ताओं के द्वारा समस्‍या का समाधान होना चाहिए। नाभिकीय शस्‍त्रों के परीक्षण पर रोक लगाने, नाभिकीय अस्‍त्रों के उपयोग को प्रतिबंधित करने, विनाशकारी अस्‍त्र-शस्‍त्रों के मौजूदा जमा भण्‍डारों को नष्‍ट करने तथा नाभिकीय हथियारों की पूर्ण समाप्‍ति के लिए सभी विश्‍व शक्‍तियों को समयबद्ध कार्यक्रम बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। नई अन्‍तर्राष्‍ट्रीय अर्थव्यवस्‍था स्‍थापित करनी होगी।

व्‍यक्‍ति के प्रति अधिकतम आदर तथा उसके आत्‍मसम्‍मान के प्रति सरोकार की भावना रखने की भावना नीति-निर्देशक तत्‍व के रूप में स्‍वीकार कर ली गयी है। समाजवाद को पूरी तरह जनवाद में परिवर्तित कर दिया गया है। फरमानशाही और केंद्रीकृत आर्थिक प्रबन्ध-तन्‍त्र की विकृतियों को दूर करके प्रबन्ध-तन्‍त्र में जनवादी आधार को मान्‍यता दी जा चुकी है।

पूंजीवादी देशों में भी सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन हुए हैं। इन देशों में ‘कल्‍याणकारी राज्य' की अवधारणा विकसित हो चुकी है। सरकार की कर्तव्य-सीमा के अन्‍तर्गत वृद्धों, बेसहारा बच्‍चों, बीमारों एवं बेरोजगारों के लिए कल्‍याणकारी कार्यक्रम चलाना समाहित हो गया है। अधिकांश उन्‍नत पूंजीवादी देशों की सरकारों के द्वारा इस प्रकार के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।

जनता की शक्‍ति बढ़ रही है, शासकों की शक्‍ति घट रही है। किसी देश के राष्‍ट्राध्‍यक्ष की तानाशाही के विरुद्ध जन-जागृति बढ़ रही है। जनमत का दबाव तेज होता जा रहा है।

जिस देश व समाज में हिंसात्‍मक क्रान्‍ति होती है वह प्रतिक्रिया में मानसिक उत्‍पीड़न को जन्‍म देती है। हिंसा के माध्‍यम से सत्ता पर कब्जा करने के बाद शासनाध्‍यक्ष ‘आत्म-स्‍वातंत्र्य' की बात को हवा में उड़ा देते हैं। सभी प्रकार की स्‍वतन्‍त्रता का दमन किया जाता है तथा सामान्‍य नागरिकों को बन्‍दी की तरह रहने के लिए विवश बना दिया जाता है। इसके विपरीत ‘प्रजातन्‍त्र' एवं ‘लोकतन्‍त्र' शासन-व्यवस्‍था राजनीतिक दृष्‍टि से अहिंसावादी दृष्‍टि की परिणति है।

अहिंसक जीवन एवं सद्‌भावपूर्ण-व्‍यवहार से महात्‍मा गांधी जी भी बहुत प्रभावित थे और उनका मत था कि ‘यही विश्व-संस्‍कृति और विश्व-मानवता की आधारशिला बन सकते हैं।' अहिंसा की भावना पर आधारित विश्‍व शान्‍ति की प्रासंगिकता, सार्थकता एवं प्रयोजनशीलता स्‍वयंसिद्ध हैं। विश्‍वशान्‍ति का अर्थ केवल यही नहीं है कि संसार में कहीं युद्ध न हो। विश्‍व शान्‍ति की सकारात्‍मक अवधारणा सम्‍पूर्ण मानव जाति की प्रगति एवं उसके विकास में निहित है।

विश्‍व शान्‍ति की सार्थकता एक नये विश्‍व के निर्माण में है। जिसके लिए विश्‍व के सभी देशों में परस्‍पर सद्‌भावना का विकास आवश्‍यक है।

शांतिपूर्ण सह-अस्‍तित्‍व एवं विकास के लिए घटकों द्वारा आग्रहपूर्ण नीति का त्‍याग तथा सहयोगपूर्ण नीति का वरण आवश्‍यक है। सह-अस्‍तित्‍व की परिपुष्‍टि के लिए समभाव की विचारणा का पल्‍लवन आवश्‍यक है। समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखना तथा समस्‍त जीवों को समभाव से देखना आवश्‍यक है। किसी एक जाति में अन्‍य की अपेक्षा कोई असाधारण विशेषताएँ नहीं होतीं। जाति और कुल से त्राण नहीं होता। प्राणी-मात्र आत्‍मतुल्‍य है। इस कारण प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को संसार के सभी प्राणियों को आत्‍मतुल्‍य मानना चाहिए, सबको आत्‍मतुल्‍य समझना चाहिए, सबके प्रति मैत्री भाव रखना चाहिए।

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना के लिए पृथ्‍वीलोक के विभिन्‍न सामाजिक संवर्गों एवं राजनीतिक इकाइयों के बीच सद्‌भाव, समझदारी एवं सहयोग आवश्‍यक है। यह आवश्‍यक है कि सामाजिक धरातल पर समता की भावना विकसित हो, राजनीतिक धरातल पर सभी देश परस्पर एक-दूसरे की स्‍वतन्‍त्रता तथा प्रभुसत्ता का आदर करें एवं एक-दूसरे के आन्‍तरिक मामलों में हस्‍तक्षेप न करें तथा आर्थिक धरातल पर देशों के बीच व्‍याप्‍त आर्थिक असन्‍तुलन एवं वैषम्‍य समाप्‍त हो।

विभिन्‍न देशों के बीच परस्‍पर सम्‍पर्क बढ़ना आवश्‍यक है, विचारों का आदान-प्रदान होना आवश्‍यक है। जब किसी देश का प्रतिनिधिमण्‍डल अथवा राष्‍ट्राध्‍यक्ष दूसरे देश की सद्‌भावना-यात्रा करता है तो परस्‍पर वार्ता एवं मिलन के कारण उन देशों के सम्‍बन्‍धों में प्रगाढ़ता आती है, सहयोग एवं सद्‌भावना बढ़ती है। राजनीतिज्ञों एवं राजनयिकों के अतिरिक्‍त देशों के सामान्‍य नागरिकों के बीच भी सम्‍पर्क बढ़ना चाहिए।

यह भी आवश्‍यक है कि अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सहयोग की ‘बहुपक्षीय व्‍यवस्‍था' के प्रति सभी देशों की आस्‍था बढ़े और प्रतिबद्धता सुदृढ़ हो। सर्वसामान्‍य की भलाई एवं कल्‍याण के लिए किये जाने वाले सहकारी कार्यों का दायरा बढ़ना चाहिए। आज पृथ्‍वीलोक में बहुत-सी जटिल समस्‍याएँ उत्‍पन्‍न हो गयी हैं। सार्वभौम चिन्‍ता के प्रश्‍नों का ‘बहुपक्षीय व्‍यवस्‍था' के अन्‍तर्गत अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सहयोग के अलावा अन्‍य किसी दूसरे उपाय से समाधान सम्‍भव नहीं है। इस दृष्‍टि से देशों को अपेक्षित उपाय करने के लिए मानवीय, कल्‍याणकारी एवं पृथ्‍वीलोक के पर्यावरण एवं परिवार-नियोजन सम्‍बन्‍धी प्रतिबद्धताओं को कार्यरूप देने के लिए सार्थक एवं सक्षम भूमिका का निर्वाह करना होगा।

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना के संवर्द्धन के लिए सभी देशों को मानवीय विकास एवं प्रगति को केवल राष्‍ट्रीय दृष्‍टि से न देखकर पूर्णतः मानवीय और आधारभूत अनिवार्यता की दृष्‍टि से देखना होगा, मौजूदा असमानताओं को दूर करने की दिशा में सहयोगी बनना होगा और संसार में सभी जगह मनुष्‍य की जिन्‍दगी तथा विकास की दर को बेहतर बनाने में सहायता करनी होगी। इसी रास्‍ते शान्‍ति, न्‍याय, समानता और विकास पर आधारित नयी विश्व-व्‍यवस्‍था स्‍थापित हो सकेगी, अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍बन्‍ध लोकतांत्रिक बन सकेंगे तथा ‘नयी विश्‍व सूचना एवं संचार व्‍यवस्‍था' का विकास हो सकेगा।

समकालीन युग ने इस तथ्‍य को पहचाना है कि आर्थिक विषमता को समाप्‍त किये बिना समाज में सच्‍ची सुख-शान्‍ति स्‍थापित नहीं हो सकती। अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना के स्‍थायित्‍व के लिए विभिन्‍न देशों की आर्थिक असमानता और उनके असन्‍तुलन को मिटाना जरूरी है। उद्योगीकृत विकसित देशों तथा विकासशील एवं अविकसित देशों के जीवन-स्तर, प्रौद्योगिकी स्‍तर एवं संसाधनों के स्‍तर के अन्‍तरालों को कम करने की आवश्‍यकता असंदिग्‍ध है।

साम्राज्‍यवाद, उपनिवेशवाद तथा नव-उपनिवेशवाद की नीतियों के कारण आर्थिक दृष्‍टि से जो देश निर्धन हैं उनकी आर्थिक समस्‍याओं के समाधान की आवश्‍यकता की आलोचनात्‍मक विवेचना करने तथा समाधान के स्‍वरूप पर सैद्धान्तिक बहस करने का अवकाश नहीं है, इसको विद्वान एवं राजनयिक जिस नाम से चाहे पुकारें - सुधार, विकास संरचना, पुनः संरचना - इनमें से जो नाम देना चाहें, दें, विकसित देशों को इस दिशा में तात्‍कालिक एवं कारगर कदम उठाने होंगे। इन देशों को निम्‍नलिखित तथ्‍यों को हृदयंगम करना होगा :

(क) विश्‍व की दो-तिहाई आबादी के बराबर वाले इन देशों के समाजों में जो निर्धनता, निरक्षरता, भुखमरी, कुपोषण और रोगग्रस्‍तता है वह इनके ऊपर हुए औपनिवेशिक शोषण का परिणाम है।

(ख) यदि इन देशों के समाजों की स्‍थितियों को तत्‍काल नहीं सुधारा गया तो अन्‍तर्राष्‍ट्रीय क्षितिज पर आर्थिक असन्‍तुलन से उद्‌भूत तनाव तथा संघर्ष की स्‍थितियाँ उत्‍पन्‍न हो जायेंगी। यदि तात्‍कालिक आर्थिक वैषम्‍य एवं असन्‍तुलन को दूर नहीं किया गया तो उसके परिणाम भयावह होंगे।

(ग) विकसित औद्योगिक देशों की खुशहाली अन्‍ततः विकासशील देशों के आर्थिक भविष्‍य पर निर्भर है ।

(घ) वस्‍तुतः सुरक्षित, स्‍थायी, समृद्ध और समीचीन सार्वभौम अर्थव्‍यवस्‍था की तत्‍काल स्‍थापना युगीन आवश्‍यकता है।

नाभिकीय शस्‍त्र-मुक्‍त और हिंसा-रहित संसार की निर्मिति के लिए यह आवश्‍यक है कि संसार के सभी देश सैनिक कार्यों पर किये जाने वाले विशाल, अन्‍धाधुंध, अनुत्‍पादक एवं निरर्थक व्‍यय में पर्याप्‍त कमी करें। जब महाशक्‍तियों में एक-दूसरे के विरुद्ध या तीसरे देशों के विरुद्ध नाभिकीय और परम्‍परागत सभी प्रकार के युद्धों का परित्‍याग करने, बाह्य अन्‍तरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने, नाभिकीय शस्‍त्र-परीक्षणों को बन्‍द करने, रासायनिक शस्‍त्रों पर प्रतिबन्‍ध एवं उन्‍हें पूरी तरह नष्‍ट करने तथा सैन्य-क्षमताओं को नियंत्रित करने आदि विचारों के प्रति रजामंदी बढ़ रही है तब ऐसी स्‍थिति में यह परमावश्‍यक है कि सभी देश अपने सैन्‍य बजटों में पर्याप्‍त कटौती करें।

अर्थशास्‍त्रियों ने सैनिक व्‍यय का बेरोजगारी तथा मुद्रास्‍फीति के साथ सह-सम्‍बन्‍ध का प्रामाणिक विवरण प्रस्‍तुत किया है। संसाधनों को युद्ध सामग्री एवं शस्‍त्र उत्‍पादन के उच्‍च प्राविधिक क्षेत्रों की ओर मोड़े जाने से विश्‍व में बेरोजगारी एवं मुद्रास्‍फीति बढ़ती है। निजी उद्योग अस्‍त्र-शस्‍त्रों के विक्रय में भारी मुनाफा कमाते हैं। वे रक्षा-अनुबन्‍धों में जिस प्रकार दिलचस्‍पी लेते हैं वह सर्वविदित है। सैनिक उत्‍पादन में की गयी पूँजी-निवेश की अपेक्षा असैनिक उत्‍पादन में की गयी पूँजी-निवेश से काफी ज्‍यादा रोजगार मिलता है। विश्‍व में कुल वार्षिक सैन्य-व्‍यय इतना अधिक है कि इस धनराशि के पचास प्रतिशत भाग को खाद्य पदार्थों एवं उपभोक्‍ता वस्‍तुओं के उत्‍पादन में विनियोजित एवं हस्‍तांतरित करने से पूरे विश्‍व की भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी दूर हो सकती है। इस समय जो अनुसंधान हो रहे हैं उनको बन्‍द करने की आवश्‍यकता नहीं है, उनके प्रयोग-क्षेत्रों को बदलने की जरूरत है। नाभिकीय अनुसंधानों को अभी सैनिक कार्यों के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है। इन अनुसंधानों का विनियोग ऊर्जा की समस्‍या के समाधान के लिए किया जा सकता है। इसी प्रकार जीव-रसायनशास्‍त्र के क्षेत्र में जो अनुसंधान हो रहे हैं उनका प्रयोग विध्‍वंस-सामग्री एवं युद्ध सामग्री के उत्‍पादन के स्‍थान पर स्‍वास्‍थ्‍य सम्बन्धी समस्‍याओं के समाधान के लिए किया जा सकता है।

आज के विश्‍व के समक्ष उपस्‍थित चुनौतियों का प्रभावकारी ढंग से मुकाबला करने के लिए देशों की गतिविधियों में समरसता स्‍थापित करने के लिए और बहुपक्षीयवाद की अवधारणा को सुदृढ़ करने के लिए यह आवश्‍यक है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ और अधिक मजबूत बने, विभिन्‍न अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगठनों की कार्य-पद्धति और अधिक कारगर बने।

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना के लिए विश्‍वबन्‍धुत्‍व की भावना का पल्‍लवन आवश्‍यक है। विश्‍व के सभी लोग इस पृथ्‍वी रूपी जहाज पर सवार सहयात्री हैं। सहयोग एवं मैत्री की इस भावना से विश्व शान्‍ति के प्रति प्रतिबद्ध शक्‍तियों को संगठित एवं पुनर्बलित करने की आवश्‍यकता है। इस भावना के विकास की आवश्‍यकता है कि यह पूरी दुनिया अन्‍ततः एक है। यदि विश्व-शान्‍ति एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना खण्‍डित होती है तो अशांति की ज्‍वाला पूरे विश्‍व को भस्‍मीभूत कर देगी। शान्‍ति एवं सद्‌भावना के विकसित एवं परिपुष्‍ट होने पर हमारी यह धरती ही स्‍वर्ग बन जायेगी।

देवता बाहर नहीं है, हमारी अन्‍तश्‍चेतना में है। अपनी अन्‍तश्‍चेतना की दिव्‍य ज्‍योति को प्रखर करने की आवश्‍यकता है। आज के युग ने मशीनी सभ्‍यता के चरम विकास से सम्‍भावित विनाश के जिस राक्षस को उत्‍पन्‍न कर लिया है वह किसी यंत्र से नहीं अपितु ‘अहिंसा-मन्‍त्र' से ही नष्‍ट हो सकता है।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवानिवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान)

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