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महावीर सरन जैन का आलेख : आतंकवाद को निर्मूल करने के लिए सर्व धर्म समभाव

आतंकवाद को निर्मूल करने के लिए सर्व धर्म समभाव प्रोफेसर महावीर सरन जैनधर्म की प्रासंगिकता एक व्‍यक्‍ति की मुक्‍ति में ही नहीं है। धर्म की प्रासंगिकता एवं प्रयोजनशीलता शान्‍ति, व्‍यवस्‍था, स्‍वतंत्रता, समता, प्रगति एवं विकास से सम्‍बन्‍धित समाज सापेक्ष परिस्‍थितियों के निर्माण में भी निहित है। धर्म साधना की अपेक्षा रखता है। धर्म के साधक को राग-द्वेषरहित होना होता है। धार्मिक चित्त प्राणिमात्र की पीड़ा से द्रवित होता है। तुलसीदास ने कहा- ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई'। सत्‍य के साधक को बाहरी प्रलोभन अभिभूत करने का प्रयास करते हैं। मगर वह एकाग्रचित्त से संयम में रहता है। प्रत्‍येक धर्म के ऋषि, मुनि, पैगम्‍बर, संत, महात्‍मा आदि तपस्‍वियों ने धर्म को अपनी जिन्‍दगी में उतारा। उन लोगों ने धर्म को ओढ़ा नहीं अपितु जिया। साधना, तप, त्‍याग आदि दुष्‍कर हैं। ये भोग से नहीं, संयम से सधते हैं। धर्म के वास्‍तविक स्‍वरूप को आचरण में उतारना ही वास्‍तविक धर्म है। महापुरुष ही सच्‍ची धर्म-साधना कर पाते हैं। इन महापुरुषों के अनुयायी जब अपने आराध्‍य-साधकों जैसा जीवन नहीं जी पाते तो उनक…

प्रियेश दत्त मालवीय की अजूबा कलाकृतियाँ

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प्रियेश दत्त मालवीय की कलाकृतियाँ उनके निर्माण के लिहाज से वाकई अजूबा हैं, मगर दर्शनीयता और कला में नहीं. प्रियेश गर्म प्रेस से कैनवस और कागज पर रंग उकेरते हैं, पारंपरिक ब्रश और रंग से नहीं. निश्चित तापमान पर गर्म प्रेस को कागज या कैनवस पर रखते हैं और गरमी से जब कागज और केनवस के टिशू धूसर रंग प्राप्त कर लेते हैं, तो उनके बीच, उनके ओरिएंटेशन और प्रभाव डालते हुए प्रियेश आकृतियों और दृश्यों की रचना करते हैं जो अपने आप में अनूठा तो होता ही है, परिपूर्ण और दर्शनीय भी होता है.प्रियेश कहते हैं – गर्म प्रेस को कैनवस पर संतुलित अवधि तक स्पर्श करने से कैनवस के अमूर्त रूप में मौजूद पीले, कत्थई व काले रंग के विभिन्न ‘टोन’ स्वतः ही उभरने लगते हैं, साथ ही मछली का सरलतम आकार व लहरें भी सौगात रूप में प्राप्त होती हैं, जो पानी के निर्मल संसार को प्रकट करती है. तदोपरांत रंग ब्रश के माध्यम से लगाते ही कृति अपने खामोश उद्देश्य को प्रदर्शित करने में सक्षम होती है और यही मेरी कला का अभीष्ट भी है.प्रस्तुत है उनकी कुछ नायाब कलाकृतियाँ :

माखनलाल चतुर्वेदी का व्यंग्य निबन्ध : ‘ब्लॉगर देवता’

(माखनलाल चतुर्वेदी की मूल रचना ‘साहित्य देवता’ आज के ‘चिट्ठाकार देव’ उर्फ ‘ब्लॉगर देवता’ पर क्या सटीक नहीं बैठती? पढ़ें और मजे लें --)साहित्य देवता माखनलाल चतुर्वेदी मैं तुम्हारी एक तसवीर खींचना चाहता हूँ । “परन्तु भूल मत जाना कि मेरी तसवीर खींचते खींचते तुम्हारी भी एक तसवीर खिंचती चली आ रही है” अरे, मैं तो स्वयं ही अपने भावी जीवन की एक तसवीर अपने अटैची केस में रखे हुए हूँ । तुम्हारी बना चुकने के बाद मैं उसे प्रदर्शनी में रखने वाला हूँ । किन्तु मेरे मास्टर मैं यह पहले देख लेना चाहता हूँ_ कि मेरे भावी जीवन को किस तरह चित्रित कर तुमने अपनी जेब में रख छोड़ा है ।“प्रदर्शनी में रखो तुम अपनी बनाई हुई, और मैं अपनी बनाई हुई रख दूँ केवल तुम्हारी तस्वीर।”ना सेनानी मैं किसी भी आईने पर बिकने नहीं आया । मैं कैसा हूँ यह पतित होते समय खूब देख लेता हूँ । चढ़ते समय तो तुम्हीं केवल तुम्हीं दीख पड़ते हो ।“क्या देखना है ?”तुम्हें; और तुम कैसे हो यह कलम के घाट उतारने के समय यह हरगिज नहीं भूल जाना है कि तुम किसके हो ।“आज चित्र खींचने की बेचैनी क्यों है ?”कल तक मैं तुम्हारा मोल तोल कूता करता था । आज अपनी इस वे…

प्रतापनारायण मिश्र का आलेख : वृद्ध

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(प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894) का यह व्यंग्यात्मक आलेख कोई सौ सवा सौ वर्ष पुराना है, मगर परिस्थितियाँ शायद अब भी वैसी ही नहीं हैं?)इन महापुरुष का वर्णन करना सहज काम नहीं है । यद्यपि अब उनके किसी अंग में कोई सामर्थ्य नहीं रही अतः इनसे किसी प्रकार की ऊपरी सहायता मिलना असंभव सा है पर हमें उचित है कि इनसे डरें इनका सम्मान करे और इनके थोड़े से बचे खुचे जीवन को गनीमत जानें क्योंकि इन्होंने अपने बाल्यकाल में विद्या के नाते चाहे काला अक्षर भी न सीखा हो युवावस्था में चाहे एक पैसा भी न कमाया हो तथापि संसार की ऊंच नीच का इन्हें हमारी अपेक्षा बहुत अधिक अनुभव है इसी से शास्त्र की आज्ञा है कि वयोधिक शूद्र भी द्विजाति के लिए माननीय है । यदि हममें बुद्धि हो तो इनसे पुस्तकों का काम ले सकते हैं वरंच पढ़ने में आँखों को तथा मुख को कष्ट होता है न समझ पड़ने पर दूसरों के पास दौड़ना पड़ता है पर इनसे केवल इतना कह देना बहुत है कि हां बाबा, फिर क्या हुआ । हाँ बाबा ऐसा हो तो कैसा हो? बस बाबा साहब अपने जीवन भर का आन्तरिक कोषखोल कर रख देंगे । इसके अतिरिक्त इनसे •डरना इसलिए उचित है कि हम क्या हैं हमारे पूज्य पिता दादा…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : मेरी असफलताएँ

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इधर व्‍यंग्‍य में विषयों का अकाल है। समाचारों का अकाल है। घिसे पिटे लेखक घिसेपिटे विषयों पर घिसेपिटे व्‍यंग्‍य लिखकर घिसेपिटे स्‍थानों पर प्रकाशित कराकर घिसेपिटे चेक प्राप्‍त कर रहे हैं। कुछ लोग घोस्‍ट राइटिंग के घोस्‍ट के पीछे पड़े हुए है। हर व्‍यक्‍ति अपने आपको सफल समझता है और अन्‍य व्‍यक्‍ति उसे असफल, गलत, बेकार, नाकारा, निकम्‍मा घोषित करते रहते हैं।जैसा कि आप जानते है हर सफल व्‍यक्‍ति की सफलता के पीछे एक महिला होती है और उस महिला के पीछे उस सफल व्‍यक्‍ति की पत्‍नी होती है। इधर मेरी अफलताओं की समस्‍त जिम्‍मेदारी मैं स्‍वयं लेता हूँ ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आये।प्रारम्‍भ में मैंने खेलकूद के क्षेत्र में प्रयास किये। असफल रहा मैंने फिल्‍मों में घुसने का प्रयास किया असफल रहा। मैंने नाटकों में प्रयास किया मंच से दूर कर दिया गया। मैंने कविताएं लिखी किसी ने नहीं पढ़ी। मैंने आलोचना के क्षेत्र में हाथ पांव मारे आलोचना बेचारी आलू चना हो गई। मैंने विज्ञापन बनाये, उत्‍पादों की बिक्री घट गई। कक्षाओं में गम्‍भीरता से पढ़ाया छात्रों ने कक्षाओं में आना बन्‍द कर दिया। मैंने अफसरों की चमचागिर…

अशोक गौतम का व्यंग्य : हे जूते! रे जूते!

हुर्रे! वे चुनाव हार गए। उनके घर गया था। उनके सामने उनके लिए भगवान से उनकी हारी हुई कुर्सी की आत्‍मा के लिए शांति मांगने। किसी मंदिर, गुरूद्वारे में जाकर उनकी हार के लिए अगर भगवान से शांति की कामना करता तो उन्‍हें विश्‍वास ही न होता। कारण, वे अपने वोटरों से ताजा ताजा धोखा खाए हुए थे। उनके अपने चुनाव क्षेत्र के वोटर तो उनको खा ही गए दूसरे चुनाव क्षेत्र के वोटरों ने भी उनको नहीं बख्‍शा। और वे ये सोचकर वोटरों को खिलाते रहे कि अबके अपनी जीत का रिकार्ड बुक आफ गिन्‍नीज में अपने नाम लिखवा कर रहेंगे कि इस चुनाव क्षेत्र में जितने कुल वोट थे ये उससे भी अधिक वोटों से जीते। दूसरे वे सबको दिल खोलकर ये सोच खिलाते पिलाते रहे कि बस एक बार चुनाव जीत जाएं फिर सारे हिसाब न बराबर कर लूं तो मुझे आदमजात की औलाद न कहें। पर कुर्सी ने उनकी न सुनी। नेता तो बहरे थे ही कम्‍बख्‍त अब ये कुर्सियां भी ऊंचा सुनने लगी हैं।उनके घर हिम्‍मत करके घुसा तो वे महाशोक की मुद्रा में। असल में क्‍या है कि न भूखे श्‍ोर की मांद में जाना आसान होता है पर हारे हुए नेता के घर शोक करने जाना मुश्‍किल। वे शोक में इतने डूबे थे कि साक्षात्…

महावीर सरन जैन का आलेख : दिनकर का काव्य

रामधारी सिंह दिनकर' का काव्‍य : काव्‍य के माघ्‍यम से राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक चेतना की सशक्‍त अभिव्‍यक्‍तिप्रोफेसर महावीर सरन जैनरामधारी सिंह ‘ दिनकर ' के कृतित्‍व ने विचारकों का ध्‍यान जिन दिशाओं की ओर आकृष्‍ट किया है, वे हैं - उनकी ओजस्‍विता, गतिशीलता, गीतोन्‍मुखता, विद्रोही स्‍वर, सांस्‍कृतिक और राष्‍ट्रीय चेतना, मंगल कामना और विवेक की संयुक्‍ति तथा जनतांत्रिक विचार।दिनकर के काव्‍य पर विचार करते समय कुछ प्रश्‍न उपस्‍थित होते हैं :- - क्‍या दिनकर स्‍वच्‍छन्‍द धारा के कवि हैं ? - क्‍या दिनकर ‘अज्ञेय' के कथन के अनुरूप रोमांटिक राष्‍ट्रवादी हैं अथवा डॉ0 नगेन्‍द्र के कथन के अनुरूप सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवादी कवि हैं ? - एक ही काल और परिस्‍थिति में जीवित रहकर भी दिनकर का काव्‍य पंत, प्रसाद, निराला और मैथिलीशरण गुप्‍त के काव्‍य से किस प्रकार भिन्‍न है और क्‍या उसे किसी वाद के घेरे में बांधा जा सकता है ?- दिनकर का चिन्‍तन केवल चिन्‍तन ही है या कोई समाधान भी प्रस्‍तुत करता है ?स्‍वच्‍छन्‍दतावाद को प्रायः यूरोपीय रोमाण्‍टिसिज्‍म का समानार्थी माना जाता है। हिन्‍दी के स्‍वच्‍छन्‍दतावाद…

चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव की कविता : मुट्ठी भर बीज

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मुट्‌ठी भर बीजमुट्‌ठी भर बीज सेकरनी है मुझेहरी भरी समूची पृथ्‍वीगिनो मत इन बीजों कोमत हँसो इन परसिर्फ प्रदक्षिणा करोदे सको तो दो मुझेउस जमीन में से गज भर जमीनजिस पर तुम खड़े होअपने हिस्‍से की धूप में से एक टुकड़ा धूपअंजुलि भर पानीफिर देखनातुम्‍हारे देखते ही देखते मैं उगाउँगा कुछ पेड़कुछ फूल कुछ फलकुछ खुशबू कुछ छायाफलों से निकलेंगे कुछ और बीजफिर होंगी कुछ और मुटि्‌ठयां बीजों से भरीरंग उठेगी पृथ्‍वी एक दिन जरूरहरे रंग से----चन्‍द्र प्रकाश श्रीवास्‍तव

महावीर सरन जैन का आलेख : संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएं एवं हिन्‍दी

विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक – हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा में क्योंकर तत्काल शामिल किया जाना चाहिए  – कारणों की पड़ताल कर रहे हैं केंद्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निदेशक – महावीर सरन जैनसंयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएं एवं हिन्‍दी :प्रोफेसर महावीर सरन जैन एम00, डी0फिल, डी0लिट्0संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ :संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाएँ हैं : 1. अरबी, 2. चीनी 3. अंग्रेजी 4. फ्रेंच, 5. रूसी 6. स्‍पेनिश (दे0 Year Book of the United Nations 1955, Vol. 49, pp. 1416-17, NewYork )संयुक्‍त राष्‍ट्र की ये 6 आधिकारिक भाषाएं अन्‍य अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगठनों की भी आधिकारिक भाषाएँ हैं। उदाहरणार्थ : (1) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) (2) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय विकास एजेंसी (IDA) (3) अन्‍तर्राष्‍ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) (4) संयुक्‍त राष्‍ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्‍कृतिक संगठन (UNESCO) (5) विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) (6) संयुक्‍त राष्‍ट्र औद्‌योगिक विकास संगठन (UNIDO) (7) संयुक्‍त राष्‍ट्र अन्‍तर्राष्‍ट्रीय …

महावीर सरन जैन का आलेख : भारत की भाषाएँ

(भारत की 100 से अधिक भाषाओं के बारे में अपने शोधपरक आलेख में विस्तार पूर्वक बता रहे हैं केंद्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निदेशक महावीर सरन जैन)भारत की भाषाएँप्रोफेसर महावीर सरन जैनएम0ए0, डी0फिल, डी0लिट्‌0भारत में भाषाओं, प्रजातियों, धर्मों, सांस्‍कृतिक परम्‍पराओं एवं भौगोलिक स्‍थितियों का असाधारण एवं अद्वितीय वैविध्‍य विद्‌यमान है। विश्‍व के इस सातवें विशालतम देश को पर्वत तथा समुद्र शेष एशिया से अलग करते हैं जिससे इसकी अपनी अलग पहचान है, अविरल एवं समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है , राष्‍ट्र की अखंडित मानसिकता है। अनेकता में एकता' तथा एकता में अनेकता' की विशिष्‍टता के कारण भारत को विश्‍व में अद्वितीय सांस्‍कृतिक लोक माना जाता है। भाषिक दृष्‍टि से भारत बहुभाषी देश है। यहॉ मातृभाषाओं की संख्‍या 1500 से अधिक है (दे0 जनगणना 1991, रजिस्‍ट्रार जनरल ऑफ इण्‍डिया) । इसी जनगणना के अनुसार 10,000 से अधिक लोगो द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की संख्‍या 114 है। (जम्‍मू और कश्‍मीर की जनगणना न हो पाने के कारण इस रिपोर्ट में लददाखी का नाम नहीं है। इसी प्रकार इस जनगणना में मैथिली को हिन्‍दी के अन्‍तर…

महावीर सरन जैन का आलेख : भविष्‍य का धर्म

धर्म पर जब जब भी बात होती है, विवाद होते रहे हैं. मेरा धर्म अच्छा तेरा धर्म घटिया. पर, क्या भविष्य का धर्म वास्तविक रूप में सर्व-धर्म-समभाव युक्त वैज्ञानिक धर्म होगा? पड़ताल कर रहे हैं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व निर्देशक महावीर सरन जैनभविष्य का धर्म और दर्शन : स्वरूप एवं प्रतिमानप्रोफेसर महावीर सरन जैनएम0ए0, डी0फिल, डी0लिट्‌0विज्ञान की उपलब्‍धियों एवं अनुसंधानों ने मनुष्‍य को चमत्‍कृत कर दिया है। प्रतिक्षण अनुसंधान हो रहे हैं। जिन घटनाओं को न समझ पाने के कारण उन्‍हें अगम्‍य रहस्‍य मान लिया गया था वे आज अनुसंधेय हो गयी हैं। तत्‍वचिन्‍तकों ने सृष्‍टि की बहुत-सी गुत्‍थियों की व्‍याख्‍या परमात्‍मा एवं माया के आधार पर की। इस कारण उनकी व्‍याख्‍या इस लोक का यथार्थ न रहकर परलोक का रहस्‍य बन गयी। आज का व्‍यक्‍ति उनके बारे में भी जानना चाहता है। अन्‍वेषण की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है। भौतिकवादी प्रगति एवं विकास का पथ प्रशस्त हो रहा है। भौतिकवादी प्रगति एवं विकास के बावजूद मनुष्‍य संतुष्ट नहीं है। वह मकान तो आलीशान बना पा रहा है मगर घर नहीं बसा पा रहा है। परिवार के सदस्‍यों के बीच प्‍यार एव…

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