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वीरेन्‍द्र सिंह यादव का आलेख : शिक्षा में भारतीय मुसलमानों की दशा एवं दिशा

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शिक्षा में भारतीय मुसलमानों की दशा एवं दिशाडॉ0 वीरेन्‍द्र सिंह यादवकिसी भी सम्‍प्रदाय के विकास में शिक्षा की अहम भूमिका होती है क्‍योंकि शिक्षा व्‍यक्‍ति को सुसंस्‍कृत एवं सभ्‍य बनाकर एक सुन्‍दर, मनोहर आदर्श समाज का सृजन करती है। सच्‍ची शिक्षा व्‍यक्‍ति को निर्माण की प्रक्रिया की ओर प्रेरित कर उसमें व्‍यवहार के परिष्‍कार, दृष्‍टिकोण को तो विकसित करती ही है साथ ही व्‍यक्‍ति के चरित्र का निर्माण और व्‍यवहार का निरूपण भी करती है। शिक्षा संविधान, प्रतिष्‍ठान, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र के आदर्श मूल्‍यों की प्राप्‍ति में मार्ग दर्शन कर सहायता करती है। अर्थात्‌ बौद्धिक सम्‍पन्‍नता एवं राष्‍ट्रीय आत्‍म निर्भरता की जड़ शिक्षा है। शिक्षा वास्‍तविक मायनों में प्रवृत्‍ति और आन्‍तरिक शोध की प्रक्रिया में प्रत्‍यक्ष सुधार उत्‍पन्‍न करती है। शिक्षा मानव को अधिक तार्किक और उदार बनाती है और पढ़ा लिखा व्‍यक्‍ति अपनी धार्मिक पहचान के प्रति संकुचित दृष्‍टिकोण नहीं रखता। यदि व्‍यक्‍ति या समुदाय को उचित ढ़ंग से शिक्षित किया जाये तो प्रत्‍येक नागरिक एकता की क्षमता को विकसित करता है जिसका परिणाम एक शक्‍तिशाली…

अशोक गौतम का व्यंग्य : लो भैया, एक और पंगा

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इस लोक में लोक की दो नहीं, तीन नस्‍लें रही हैं। एक नस्‍ल जीओ और जीने दो में विश्‍वास करती है तो दूसरी नस्‍ल खुद जीओ पर दूसरों को बिल्‍कुल भी न जीने दो में। और तीसरी नस्‍ल वो नस्‍ल है जो न खुद जीती है और न औरों को ही जीने देती है। अब आप सोच रहें होंगे कि मैं किस नस्‍ल में फाल करता हूं। असल में मैं उस नस्‍ल का प्राणी हूं जो जीओ और जीओ जीने दो में ही विश्‍वास करती है पर हां, वक्‍त के हिसाब से मैंने अपनी नस्‍ल में थोड़ा सुधार लिया है ,मतलब! मैं रिश्‍वत दो और काम लो की नस्‍ल का आदमी हूं। अब आप को क्‍या बता भाई साहब! यहां पर तो कई ऐसे ऐसे बंदे भी हैं जो रिश्‍वत दस बार लेकर भी काम नहीं करते। नेता जी ने नारा दिया था खून दो आजादी लो! तो एक नारायण सेवक होने के नाते मैंने भी समाज को नारा दिया है, रिश्‍वत दो, काम लो।असल में अपने समाज में आज की डेट में समाज सुधार की बात करने का मौलिक हक केवल भ्रष्‍टाचारियों को ही है, जो जितना बड़ा भ्रष्‍टाचारी वह उतना ही चर्चित समाज सुधारक। ईमानदार तो बेचारे सारा दिन दो रोटी के लिए खटते खटते रात को भूखे पेट ही टूटी खाट पर पकवानों के सपने लेते लेते सुबह बिन सोए ही …

अशोक गौतम का व्यंग्य : डोंट वरी, बी हैप्‍पी होरी!

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हालांकि होरी के पास अब कतई जगह न बची थी किसानी का काम करने के लिए। कुछ जगह बेचारे को थोड़ी थोड़ी करके बच्‍चों के विवाह के समय बेचनी पड़ी तो कुछ बिल्‍डर माफिया ने डरा धमका कर उससे मार ली। जो कुछ खेत बचे थे वे सरकार ने सेज के नाम पर देश हित में उससे ले लिए।होरी तब उदास बैठा था अपने अतीत को याद करता। कुत्‍ता पास ही बंधा गुनगुना रहा था। उसे गुनगुनाते हुए देख होरी को गुस्‍सा आया तो उसने कुत्‍ते से अधिक अपने पर गुस्‍से होते कहा,‘ यार कुत्‍ते यहां अपना सबकुछ लुट गया और एक तू है कि गुनगुना रहा है।'कुत्‍ते ने कुछ देर के लिए गुनगुनाना बंद कर कहा,‘ देखो मालिक! व्‍यवस्‍था जो करती है ठीक ही करती है। भगवान जो करता है वह ठीक करे या न! '‘ तू तो बड़ा नमक हराम कुत्‍ता निकला यार! मैंने तो सोचा था कि इस लोक में सब नमक हराम हो सकते हैं पर कुत्‍ते नहीं। पर नमक हरामी में तो तू सबका बाप निकला। अब तू ही बता मैं इस किसान पास बुक का क्‍या करूं? अब मेरे पास किसान के नाम पर केवल और केवल यह किसान पास बुक ही रह गई है या फिर यह जंग लगा हल।'‘ मालिक मुझे इस बात की खुशी हो रही है कि अबके पूस की रात में हम द…

अशोक गौतम का व्यंग्य : आइए, आदर्श पड़ोसी बनें

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जबसे नए पड़ोस में आया था, पड़ोसी से बेहद परेशान था। उसने नाक में ऐसा धुआं दे रखा था कि आपको क्‍या बताऊं! बताते हुए शर्म आ रही है। पड़ोसी की परेशानियों का मारा सिर में हाथ दे दिन-रात बैठा रहता ․․․कि तभी एक दोपहर पहुंचे हुए बाबा आ धमके। मेरी परेशानी को एक दम भांप बोले,‘क्‍यों बेटा !परेशान हो?'हां बाबा!'किससे? पत्‍नी से?'नहीं।'प्रेमिका से?'बाबा आप भी न कमाल करते हो! मारधाड़ के इस दौर में मरने की फुर्सत नहीं और आप हो कि प्रेमिका की बात करते हो! महंगाई में एक ठो पत्‍नी का भार ही उठ जाए तो लाखों पाए समझो!' तो पड़ोसी से परेशान हो!'हां प्रभु! ऐसा परेशान हूं कि मत पूछो। कई बार तो पड़ोसी की कारगुजारियों से इतना परेशान हो जाता हूं कि सुसाइड करने को मन होता है, पर जब सामने जवान बीबी दिखती है तो वापिस लौटना पड़ता है। 'बस!इतनी सी बात! बाबा के पास पड़ोसी तो पड़ोसी, अगर कोई भगवान की ओर से भी परेशान हो तो उसका भी स्‍टांप पेपर पर लिखकर गारंटिड इलाज है।'तो मेरी परेशानी का समाधान कीजिए प्रभु! पड़ोसी के आतंक के कारण मैं आदर्श कालोनी का वाशिंदा होकर नहीं बल्‍कि …

राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी हेतु आमंत्रण

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़संपर्कः सी-2/15, न्यू शांति नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़, 492001,मान्यवर, मुक्तिबोध, परसाई एवं श्रीकांत वर्मा के सहपाठी, देश के महत्वपूर्ण कवि-आलोचक-नाटककार एवं विचारक स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति में गठित “ प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान ” द्वारा आगामी 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर (स्थल-निरंजन धर्मशाला, माना एयरपोर्ट मार्ग) में दो दिवसीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह का आयोजन किया गया है । समारोह में प्रमोद वर्मा समग्र के विमोचन, प्रमोद रंग (प्रमोद वर्मा की कविताओं का नाट्य मंचन), राष्ट्रीय कविता पाठ, पुस्तक प्रदर्शनी, रेखाचित्र प्रदर्शनी, राष्ट्रीय आलोचना सम्मान कार्यक्रम के अलावा 3 सत्रों में संगोष्ठी आयोजित की गई है । संगोष्ठी के विषय हैं – 1 समकालीन आलोचना के हाव-भाव, 2 आलोचना का प्रजातंत्र और 3 आलोचना के परिसर । इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में अब तक प्रतिभागिता की स्वीकृति प्रदान करने वाले प्रमुख देश के प्रमुख साहित्यकारों में हैं – सर्वश्री अशोक बाजपेयी-दिल्ली, प्रभाकर श्रोत्रिय-गाजियाबाद, अरविंदाक्षन-कालीकट, केदारनाथ सिंह-दिल्ली, प्रभात त्रिपाठी-रायगढ़, नं…

अशोक गौतम का व्यंग्य – यों फंसे गुलफाम

अपने चुनाव क्षेत्र को मिट्‌टी मे विलीन करने के बाद वे आखिर विलीन हुए। उनका दस नंबरी तो बहुत पहले चाहता था कि वे राजनीति से उठें तो उसके भविष्‍य के द्वार खुलें। हर बाप अपने बेटे के लिए हर द्वार खोल सकता है पर अपने चलते राजनीति के द्वार नहीं। सो वे भी बेटे के लाख अनुरोध करने के बाद भी उसके राजनीतिक करिअर के लिए निरोध बने रहे। जिस दिन वे अचानक सिधारे, विपक्ष वालों ने तो विपक्ष वालों ने , उनकी अपनी पार्टी वालों ने तो पार्टी वालों ने, बेटे ने भी घी के दीए जलाए। वाह रे चमड़ी के रिश्तों!सिधारे नेता जब हफ्‌ते बाद भी यमलोक में नहीं पहुंचे तो यमराज ने उस बीट के यमदूतों को संबोधित करते हुए कहा,‘ मित्रों! हफ्‌ता हो गया उस नेता को गुजरे हुए, पर वह अभी तक नहीं आया। देखो तो सही, आखिर माजरा क्‍या है? चुनाव आयोग से मिली सूचना के अनुसार कहीं चुनाव भी नहीं।' तब उन यमदूतों में से एक यमदूत ने विनम्र हो कहा,‘ प्रभु! जंबूद्वीपीय नेता है। वहां के नेताओं को हर जगह लेट पहुंचने में ही आनन्‍द आता है। ये आदत से मजबूर होता है। चिंता की कोई बात नहीं। देर सबेर खुद चला आएगा।' सुन यमराज चुप हो पाकिस्‍तान बम हा…

यशवन्त कोठारी की हास्य-व्यंग्य कविताएँ : एक किसान रो बेटो कवि हो ग्यो

चमचा§ कभी राहू तो कभी केतु है चमचा,बिखर जाये तो उखड़ी सभा है चमचा,कभी नेता तो कभी अभिनेता है चमचा,फटे में अड़ाये टांग वो चीज है चमचा,कभी दिल्‍ली तो कभी जयपुर है चमचा,बेपेन्‍दे का लोटा है ये चमचा,कभी स्‍याह तो कभी सफेद है चमचा,फ्‌लाप फिल्‍म सा अड़ा है ये चमचा,क्‍भी लड़की तो कभी कड़की है चमचा,फिसल जाये तो टूटी टाँग है चमचा,कभी जंगल तो कभी शहर है चमचा,अड़ जाये तो टट्‌टू है चमचा,कभी षायर तो कभी कायर है चमचा,पँचर टायर है आजकल ये चमचा,कभी कुवाँरा तो कभी ब्‌याहता है चमचा,दुनिया में यह अजीब गोल माल है चमचा,कभी हीरा तो कभी काँच है चमचा,सूरदास का चश्मा है ये चमचा,कभी कुत्ता तो कभी दुम है ये चमचा,मोहल्‍ले की नाक है ये चमचा,कभी गुलाल तो कभी अबीर है चमचा,फंसा ले तो कीचड़ है चमचा,कभी महल तो कभी झोंपड़ी है चमचा,फटा हुआ बांस है ये चमचा,कभी आंसू तो कभी हंसी है चमचा,सड़ा हुआ अण्‍डा है ये चमचा,कभी आशिक तो कभी माशूक़ है चमचा,सर पर चढ़ कर बोले वो जादू है चमचा,कभी लफन्‍दर तो कभी बन्‍दर है चमचा,मुकद्‌दर का सिकन्‍दर है चमचा,कभी हाथी तो कभी हाथी-दांत है चमचा,गुम हो जाये तो गधे का सींग है चमचा,कभी गम तो कभी गम…

यशवन्त कोठारी की कविता : पिताजी के जाने पर

चले गये पिताजी भी,माताजी की राह पर,सौंप कर अपनी विरासत,मुकदमें, लेनदारियां,देनदारियां,वकील, फाइलें और घर बार,नहीं मिला उन्‍हें सन्‍तोष, न्‍याय,छोड़ गये दुखों का एक जखीरा,सब के नाम।सब के लिए।माँ के चले जाने के बाद,बहुत उदास थे पिता,लेकिन चुपचाप,रहते थे।नहीं कहते थे किसी को भी कुछ,बस चुपचाप खो जाते,फाइलों, कागजों में,उदासी के साथ ही चले गये पिता भी।छोड़ गये।भरा,पूरा परिवार।धर्मग्रन्‍थ, पुस्‍तकें औरसुखी भवितव्‍य हेतुआशीर्वाद। आशीर्वाद॥ आशीर्वाद॥।बहुत सोचता हूं,इस तरह क्‍यों हुआ।अचानक चलते फिरते ही चले गये।नहीं दी किसी को तकलीफ, बसचुपचाप, चुपचाप चले गये।आज वे होते तो ये होताये होता तो वो होताऐसा कहते। वैसा कहते।ऐसा करते। वैसा करते।ऐसे समझाते। वैसे समझाते।वे बरगद की ठण्‍ड़ी छांव थे।वे नहीं हैं तो सब कुछ उदास है।उदास छत, उदास दीवारें घर नहीं होता,वे थे तो घर घर था।अब कुछ भी नहींवे थे तो मिलने गांव जाते, पूरे गांव से मिलते,गर्मियों में बच्‍चे दादा के पास ही रहते,अब गांव ही बेगाना हो गया।पिता के साये तले हम सब एक थे।चलें गये वे मां से मिलने,हमेशा हमेशा के लिए,बहुत उदास है हम सब,मगर जीवन तो चल…

कविता शर्मा का आलेख : संगीत के क्षेत्र में व्‍यवसायिक सम्भावनाएँ

संगीत कला को ललित कलाओं में सर्वश्रेष्‍ठ होने का गौरव प्राप्‍त है। मन को एकाग्र कर मोक्ष द्वार तक ले जाने वाला संगीत के अतिरिक्‍त संगम व सरल मार्ग और कोई नहीं है। यही इसकी सर्वश्रेष्‍ठता का प्रमुख कारण है। जीवन यात्रा के प्रत्‍येक क्षेत्र में संगीत का योग होने के कारण मानव सहज ही इससे सम्‍बद्ध हो जाता है। संगीत आदिकालीन कला है, जिसका प्रादुर्भाव सृष्‍टि रचना के साथ ही हो चुका था। ऐतिहासिक दृष्‍टि से देखा जाए तो भारतीय संगीत का इतिहास आरम्‍भ से ही उपलब्‍धियों का इतिहास रहा है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक की लंबी यात्रा करते हुए भारतीय संगीत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं जिसका एक विशाल रूप हमारे सामने प्रस्‍तुत है।स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति के पश्‍चात अनेक राजनैतिक, सामाजिक परिवर्तन हुए। संगीत सामान्‍य जनता के बीच शिक्षण-संस्‍थाओं तथा संगीत सम्‍मेलनों के रूप में प्रतिष्‍ठित हो गया और संगीत का विकास अत्‍यधिक तेजी से होने लगा। आज मनुष्‍य के जीवन का हर एक क्षेत्र संगीत से प्रभावित है यही कारण है कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों की रुचि संगीत के प्रति बढ़ती जा रही है परन्‍तु संगीत की उच्‍च श…

कविता शर्मा का आलेख : सफल व्‍यवसायी संगीतज्ञ बनने के लिए मूल मंत्र

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भूलोक पर जन्‍मे समस्‍त जीव धारियों में मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण उसे उदर शान्‍ति के अतिरिक्‍त आवास, वस्‍त्रादि व आस पास के परिवेश में हो रहे नित नए परिवर्तनों के अनुरूप स्‍वयं को परिवर्तित करना भी आवश्‍यक होता है जिससे वह समाज की धारा में प्रवाहमान हो पाए। इन आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु मानव कुछ न कुछ क्रियाकलाप करता है परन्‍तु वह जितने भी यत्‍न प्रयत्‍न कर ले अपनी समस्‍त सामाजिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु उसे आदान-प्रदान की आवश्‍यकता पड़ती है। उदाहरण के लिए एक किसान अनाज उगाकर अपनी उदर अग्‍नि को शान्‍त करने की व्‍यवस्था कर लेता है परन्‍तु समाज में रहने के लिए उसे अन्‍य वस्‍तुएँ भी चाहिए जैसे वस्‍त्र की आवश्‍यकता उसे जुलाहे के पास ले जाएगी, निवास स्‍थान की आवश्‍यकता उसे ग्रह निर्णायकों के पास ले जाएगी और इसी प्रकार जुलाहे को वस्‍त्र के अतिरिक्‍त अन्‍य वस्‍तुओं का अभाव उसे अनेक उत्‍पादकों के पास ले जाता है।इन सभी कारणों के परिणाम स्‍वरूप ही ‘व्‍यवसाय' का जन्‍म हुआ प्रतीत होता है। आधुनिक युग में ‘व्‍यवसाय' मनुष्‍य के जीवन का आवश्‍यक अंग है, तथा व्‍यवसाय जीवन की गति भ…

कविता शर्मा का आलेख : वर्तमान संदर्भ में संगीत चिकित्सा में व्यवसाय की संभावनाएँ

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कला एवं विज्ञान के समन्‍वय से संगीत चिकित्‍सा का प्रचलन प्रारम्‍भ होता है। संगीत एक कला है और चिकित्‍सा एक विज्ञान है। यह एक वैकल्‍पिक चिकित्‍सा पद्धति है जिसमें किसी भी व्‍यक्‍ति के रोगों की चिकित्‍सा संगीत के माध्‍यम से की जाती है।संगीत में निहित ध्‍वनि के विभिन्‍न स्‍वरूपों में आकर्षक ध्‍वनियों से रचित संगीत का सीधा संबंध मानव मन के सूक्ष्‍म एवम्‌ कोमल संवेगों से है। ध्‍वनि तरंगें संवेगात्‍मक रूप से अपने प्रभाव से पीड़ित व्‍यक्‍ति के विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। ध्‍वनि का विशेष रूप से किया गया संघात रासायनिक परिवर्तन पैदा करता है। इस प्रकार विशिष्‍ट ध्‍वनियों के मिश्रण से निर्मित संगीत विभिन्‍न प्रकार के भावों का निर्माण कर मानव मन व शरीर पर गहरा असर करता है। इस प्रभावोत्‍पादक क्षमता का प्रयोग जब चिकित्‍सा के रूप में शारीरिक एवम्‌ मानसिक संतुलन को व्‍यवस्‍थित करने के उद्देश्‍य से किया जाता है तो यह प्रभावात्‍मक प्रक्रिया 'Music Therapy' अथवा संगीत चिकित्‍सा के नाम से जानी जाती है।संगीत जहां मनुष्‍य को मानसिक शांति प्रदान करता है, उसे तनाव मुक्‍त कर उसके अनेक रोगों को दूर …

बसंत आर्य की रपट : मुम्बई हास्योत्सव 2009

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(तस्वीर में है माइक पर आशकरण अटल ,बाय़ें से असीम चेतन, मुकेश गौतम , बसंत आर्य, देवमणि पांडेय, गोविन्द राठी , कपिल जैन और रजनीकांत)आज जब बाजार हमारे घर में घुस गया है और हर एक चीज सिर्फ मुनाफ़े के नजरिये से देखी जाती है वैसे में पिछले दिनों मुम्बई में हास्योत्सव 2009 का आयोजन एक सुखद बयार का झोंका लेकर आया. हालाँकि विभिन्न चैनलों ने आज हास्य को लाफ्टर में तबदील कर दिया है और इसे एक रस के बजाय व्यवसाय बना कर रख दिया है. फिर भी रंग चकल्लस द्वारा पिछले 40 सालों से अनवरत आयोजित होते आ रहे हास्योत्सव जैसे शुद्ध और शिष्ट हास्य से लबरेज कार्यक्रमों का इंतजार न सिर्फ मुम्बई के रसिक श्रोताओं को होता है बल्कि देश भर के कवियों को भी रहता है. इस मंच से कभी काका हाथरसीशरद जोशी, शैल चतुर्वेदी जैसे ख्याति लब्ध कवियों ने श्रोताओं को गुदगुदाया तो कभी अशोक चक्रधर ने ये कहकर आयोजक को भाव विह्वल कर दिया कि जिन्दगी में कभी उनकी तमन्ना हुआ करती थी कि वे रंगचकल्लस के इस आयोजन में कविता पढ़ें. यही वजह है कि आज भी देश भर से आयोजक को कवियों के फोन आते है कि वे एक बार इस मंच पर उन्हे भी मौका दें. गौरतलब है कि शरद…

अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य : जय हे! वेलेंटाइन डे!!

फाल्‍गुन की गुनगुनी धूप में हिनहिनाता हुआ फागुनी धूप का आनंद ले झक सफेद सिर, दाढ़ी- मूछों सहित छाती के बालों को काली मेहँदी से लिबेड़ रहा था कि अबके चाहे कुछ भी हो , पत्‍नी से आई लव यू कह कर ही खांसूंगा कि गुंजार करता हुआ एक भौंरा आ टपका। आते ही उसने शिकायत की,‘ देखो न! बूढ़े घोड़े, काले बाल! कबसे गुंजार कर रहा हूं पर वसंत है कि अभी तक नहीं आया। कहां रह गया होगा, कुछ बता दो तो अहसानमंद रहूंगा।' कह वह मेरे कान के पास आ गुंजार करने लगा तो मैंने उसे परे धकेलते हुए कहा,‘ चल यार परे! मेरे कान मत खा। वेलेंटाइन डे की तैयारी करने दे। बड़ी मुश्‍किल से तो गृहस्‍थी से तनिक निजात पा साठ साल बाद अबके मन में पत्‍नी के लिए जबरदस्‍ती प्‍यार जगाया है।'‘ तो इससे पहले क्‍या करते रहे? झक मारते रहे?' भौंरे को अपने रंग से भी ज्‍यादा गुस्‍सा।उसे गुस्‍से होते देख मैं नरम पड़ गया। बुढ़ापे में गुस्‍सा करके क्‍यों अपना बीपी हाई करना। मैंने नमकीन की कटोरी में घोली काली मेहँदी का आखिरी लबेड़ा दांत साफ करने के ब्रश से छाती के श्‍ोष बचे सफेद बालों पर मारा,‘ मत पूछ यार! क्‍या करता रहा? उस वक्‍त पत्‍नी से…

अशोक गौतम का व्यंग्य : स्‍लम सबॉर्डिनेट मिलियनेयर

जिस तरह से हलवाई तीज त्‍योहारों के लिए मिठाइयों में खुद को मल कर साल भर के लिए हल्‍का करते हैं, अबके आप सबों की तरह मैं भी शिवरात्रि को नख से लेकर शिख तक हल्‍का हुआ, यह सोच कर कि चलो मैं भी अपने साल भर के पाप शिव के चरणों में समर्पित कर अगले साल भर के लिए निश्‍चिंत हो हल्‍का हो जाऊं। तब मैं कमेटी के सड़े जल का लोटा ले जा पहुंचा था शिव के चरणों में। शिव के चरणों में ज्‍यों ही शीश रखा कि शिवलिंग में से आवाज आई,‘ और भक्‍त! क्‍या हाल हैं? मिल गई आज तुम्‍हें फुर्सत?' अरे शिव तो सच्‍ची को पल में अपने भक्‍त से खुश होने वाले निकले।‘ हे महाराज! अगर शिवरात्रि न होती तो शायद मैं आज भी नहीं आ पाता।' मन ने पता नहीं कैसे सच कह दिया। मेरे सच कहने से शिव इतने प्रसन्‍न हुए कि... वे भगवान से दोस्‍त के पद पर आसीन हो गए। अपने हाथों से मेरे मुंह में केला छील कर डालते बोले,‘खा लो, शरम नहीं करो। शरम करनी है तो आदर्शों से करो, मानवीय मूल्‍य से करो।'उनके मुंह से यह सुन मन ने पूछा,‘ यार! ये शिव के भीतर अशिव कहां से आ गया?'सच कहूं , सदा मन को मार कर जीने वाला, उस वक्‍त पता नहीं कैसे औरों को शरम …

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - आटे पर बैंक लोन !

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बैंक वाली बाला का फोन था। रिसीव किया ,तो मधुर आवाज गूंजी - ‘सर ! आपके लिए खुशखबरी !! हमारी बैंक ने आटे और गेहूं खरीदने के लिए भी लोन देना शुरू कर दिया है । आप जैसे गरीब लेखकों को ईएमआई की सुविधा देने का निर्णय किया गया है। सर ,आप बैंक आएं और अनाज के लिए लोन ले लें तथा आसान ईएमआई से चुका दें । ऐसे सुनहरे अवसर बार -बार नहीं आते । आप यह मौका हाथ से न जाने दें । हमारे बैंक से आटा खरीदने के लिए लोन ले लें । आटा खाते रहें और ईएमआई चुकाते रहें । यह सुनकर मन मयूर नाच उठा हिये में उमंगें हिलोरें लेने लगीं । पहली बार फीलगुड का अहसास हुआ । सोचा ,वाकई हम अर्थिक उदारीकरण के युग में जी रहे हैं । देखिए ना ! बैंक भी कितने उदार हो गए । कहां तो लोन के लिए चक्‍कर काटते-काटते कई जोड़ी जूते घिस जाते थे और अब तो गरीबों का भी पूरा खयाल रखा जाने लगा है । मैं बाला के मीठे स्‍वर से खुश था कि चलो कहीं से तो बैंक लोन का डोल जमा । आटा खाने के बाद लोन चुकाना पड़ेगा । यह भी एक अच्‍छी खबर थी , क्‍योंकि औसत भारतीय खाना खाने के बाद जुगाली करने लग जाता है । मैं भी लोन चुकाने की जुगाली करूंगा । लोन के जुगाड़ से भी ज्‍या…

वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : सहस्त्राब्दी का पर्यावरण आकलन

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सहस्‍त्राब्‍दी का पर्यावरण आकलन (संयुक्‍तराष्‍ट्र की पर्यावरण सम्‍बन्‍धी विशेष रिपोर्ट)-डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव(युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फ़ेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानों से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-1…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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