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June 2009
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शिक्षा में भारतीय मुसलमानों की दशा एवं दिशा

डॉ0 वीरेन्‍द्र सिंह यादव

 

किसी भी सम्‍प्रदाय के विकास में शिक्षा की अहम भूमिका होती है क्‍योंकि शिक्षा व्‍यक्‍ति को सुसंस्‍कृत एवं सभ्‍य बनाकर एक सुन्‍दर, मनोहर आदर्श समाज का सृजन करती है। सच्‍ची शिक्षा व्‍यक्‍ति को निर्माण की प्रक्रिया की ओर प्रेरित कर उसमें व्‍यवहार के परिष्‍कार, दृष्‍टिकोण को तो विकसित करती ही है साथ ही व्‍यक्‍ति के चरित्र का निर्माण और व्‍यवहार का निरूपण भी करती है। शिक्षा संविधान, प्रतिष्‍ठान, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र के आदर्श मूल्‍यों की प्राप्‍ति में मार्ग दर्शन कर सहायता करती है। अर्थात्‌ बौद्धिक सम्‍पन्‍नता एवं राष्‍ट्रीय आत्‍म निर्भरता की जड़ शिक्षा है। शिक्षा वास्‍तविक मायनों में प्रवृत्‍ति और आन्‍तरिक शोध की प्रक्रिया में प्रत्‍यक्ष सुधार उत्‍पन्‍न करती है। शिक्षा मानव को अधिक तार्किक और उदार बनाती है और पढ़ा लिखा व्‍यक्‍ति अपनी धार्मिक पहचान के प्रति संकुचित दृष्‍टिकोण नहीं रखता। यदि व्‍यक्‍ति या समुदाय को उचित ढ़ंग से शिक्षित किया जाये तो प्रत्‍येक नागरिक एकता की क्षमता को विकसित करता है जिसका परिणाम एक शक्‍तिशाली राष्‍ट्र के रूप में सामने आता है। वास्‍तविकता यह है कि व्‍यक्‍ति और किसी भी समुदाय के चतुर्मुखी विकास के लिए शिक्षा एक अति महत्‍वपूर्ण घटक के रूप में कार्य करती है।

दुनिया का सबसे शक्‍तिशाली लोकतंत्र अपनी अनेक ख़ामियों के बावजूद विश्‍व में सदैव आकर्षण का केन्‍द्र रहा है, क्‍योंकि इसने (भारत) समाज के हाशिए पर पड़े समूहों समेत विभिन्‍न वर्गों वाली शक्‍तियों को जीवंत/संजीदा और मजबूत किया है। अंतर-लोकतंत्रीकरण (समाज में समान दर्जे की अनुभूति) एवं लोकतंत्रीकरण (सामाजिक और श्‍ौक्षिक स्थिति में सुधार) की इस प्रकिया ने दलितों, पिछड़ों एवं महिलाओं में नयी जान डाल दी है परन्‍तु इस प्रक्रिया नें भारतीय मुसलमानों को खास प्रभावित नहीं किया है क्‍योंकि मुस्‍लिम समुदाय के अंदर जितनी व्‍यापक सामाजिक और श्‍ौक्षिक सुधार की पहल होनी चाहिए वह नहीं हो पा रही है। भारतीय संविधान पर दृष्‍टि डालें तो यह धर्म-निरपेक्षता की स्‍पष्‍ट घोषणा करता है। अर्थात्‌ ऐसा राष्‍ट्र जिसका अपना कोई मजहब नहीं होता और वह किसी समुदाय के साथ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। भारतीय संविधान का अनुच्‍छेद 25 प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को लोक व्‍यवस्‍था एवं स्‍वास्‍थ्‍य तथा नैतिकता के अधीन रहते हुए केवल ऐसा धर्म ग्रहण करने की स्‍वतंत्रता नहीं देता, बल्‍कि अपने विचारों का प्रचार व प्रसार करने के लिए अपने विश्‍वास को ऐसे बाहरी कार्यों में भी प्रदर्शित करने की स्‍वतंत्रता देता है। जैसा कि वह व्‍यक्‍ति उचित समझता है साथ ही उसके निर्णय एवं अन्‍तःकरण द्वारा अनुमोदित हो। धर्म की स्‍वतंत्रता पर राज्‍य द्वारा कतिपय पाबन्‍दी लगाने की व्‍यवस्‍था भी संविधान में है। भारतीय संविधान का अनुच्‍छेद-30 अल्‍पसंख्‍यक वर्गों को अपनी पसंद की श्‍ौक्षिक संस्‍थानों को स्‍थापित करने और प्रबन्‍ध करने का अधिकार देता है। यहाँ अल्‍पसंख्‍यक से तात्‍पर्य मुस्‍लिम, सिख, बौद्ध, ईसाई तथा फारसी समुदायों से है।

भारतीय मुसलमान शिक्षा में देश के अन्‍य समूहों से बहुत पीछे हैं यह एक स्‍थापित सत्‍य है। और इसके पीछे मुसलमानों का पिछड़ापन बताया जाता है यहाँ यक्ष प्रश्‍न यह है कि मुस्‍लिम समुदाय का आर्थिक रूप से पिछड़ापन होना, उनके श्‍ौक्षिक पिछड़े पन के लिए जिम्‍मेदार है या यूं कहा जाये कि शिक्षा में पीछे होने के कारण ही ये आर्थिक व सामाजिक रूप से पीछे रह जाते हैं। कुल मिलाकर मुस्‍लिम समुदाय की स्थिति भारत में श्‍ौक्षिक स्‍तर पर दयनीय है। मुस्‍लिम समुदाय की इस दशा को रेखांकित करने के लिए हमें कुछ वर्ष पीछे जाना पड़ेगा। देखा जाये तो वास्‍तव में देश विभाजन एवं देश की स्‍वाधीनता हमें दोनों एक साथ प्राप्‍त हुई। जहाँ एक ओर हम देश की स्‍वतंत्रता से प्रफुल्‍लित थे वहीं दूसरी तरफ हम देश के विभाजन से दुःखी भी थे। विश्‍ोषकर जिसमें मुस्‍लिम समुदाय को साम्‍प्रदायिक हिंसा का शिकार होना पड़ा। जिनके पास जो सम्‍पत्‍ति थी उसे या तो उनको वहीं छोड़ना पड़ा था और ऐसी स्थिति में पाकिस्‍तान भी जाना पड़ा। अर्थात्‌ अधिकतर मुस्‍लिम समुदाय के लोगों को शरणार्थी के रूप में यहाँ रहना पड़ा। स्‍वतंत्रता पश्‍चात मुसलमानों का लखनऊ में मौलाना अबुल कलाम आजाद की पहल पर एक अधिवेशन हुआ इसके द्वारा तय किया गया कि मुसलमान अपना कोई स्‍वतंत्र राजनीतिक दल नहीं बनायेंगे और इसमें उन्‍हें काफी हद तक सफलता भी मिली, लेकिन मुस्‍लिम समुदाय की यह समस्‍या बनी रही कि भारतीय राष्‍ट्रीयता से जुड़ जाने के बाद भी साम्‍प्रदायिक दंगो से परेशान रहे, मुस्‍लिम समुदाय की वह पीढ़ी, जो भारत में 1947 के आसपास पैदा हुई थी, छठवें दशक तक आते-आते युवा हो गयी तब भी ये राजनीति की धारा में अलग-थलग बनें रहे। प्रारम्‍भ में कांग्रेस का दामन थामने पर इस समुदाय की बहुत ठोस जगह मुकम्‍मल नहीं हो पायी। पाकिस्‍तान के साथ बढ़ती शत्रुता और युद्धों ने साम्‍प्रदायिकता को बढ़ावा दिया। कांग्रेस के पास मुद्दों का अभाव होने की वजह से उसने अपने वोट बैंक खिसकने की वजह से धर्म का सहारा लिया। वामपंथी एवं किसान, संगठन की मूलधारा से न जुड़ने से साम्‍प्रदायिकता को बल मिला। फलतः मुस्‍लिम समुदाय में जो सामाजिक, सांस्‍कृतिक, श्‍ौक्षिक विकास होना चाहिए था वह नहीं हो पाया और इसके परिणाम स्‍वरूप धर्मांध मुस्‍लिम नेताओं की एक नयी जमात तैयार हो गयी, क्‍योंकि जहाँ हिन्‍दुओं की शक्‍तियां एक होकर संस्‍थायें बना रही थीं (विश्‍व हिन्‍दू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना, भाजपा), वहीं मुस्‍लिम समुदाय के भी धार्मिक संगठन बनाये जा रहे थे। साम्प्रदायिक घृणा की यह दीवार दिनों-दिन बढ़ती गयी फलतः श्‍ौक्षिक विकास जो इस वर्ग में होना चाहिए वह नहीं हो पाया। हालाँकि इसके लिए कुछ मुस्‍लिम भाई भारतीय समाज को दोषी ठहराते हैं कि हिन्‍दू समाज मुस्‍लिम समुदाय की अपेक्षा अधिक कट्टर है। परन्‍तु भारत एवं विश्‍व सहित अनेक शोध रिपोर्टों से यह साबित होता है कि ‘भारतीय समाज किसी भी देश के समाज से अधिक उन्‍नत समाज है इसलिए आप एक पिछड़े समाज की तुलना किसी उन्‍नत समाज से नहीं कर सकते और यह नहीं कह सकते कि पिछड़े समाज के मूल्‍य उन्‍नत समाज पर थोप दिये जायें।' लोगों के मस्‍तिष्‍क में चाहे जो पूर्वाग्रह हों परन्‍तु स्‍वतंत्रता के पश्‍चात भारत में मुस्‍लिम समुदाय को बहुत सी ऐसी स्‍वतंत्रताएं हासिल हैं। जो अन्‍य मुस्‍लिम देशों में उन्‍हें कहीं नहीं मिलती हैं। धर्मनिरपेक्ष, व्‍यवस्‍था चाहे कितनी ही दोषपूर्ण, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था चाहे जितनी ही गैर प्रतिनिधिक हो, भारत के मुस्‍लिम समुदाय को जो खास सहूलियतें मिली हुई हैं, वे बहुत से मुसलमानों ,यहाँ तक कि इस्‍लामी राष्ट्रों को भी हासिल नहीं हैं, उदाहरण के लिए अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता, संगठन और राजनैतिक प्रक्रिया में हिस्‍सेदारी की स्‍वतंत्रता। हालांकि ऐतिहासिक कारणों से उन्‍हें साम्‍प्रदायिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है जो बराबर मुस्‍लिम समुदाय को तनाव/अवसाद में डालें रखता है और कभी-कभी इसका इतना विकराल/विस्‍फोटक रूप हो जाता है कि उसका वर्णन नहीं किया जाता है। वास्‍तविकता यह है कि मुसलमानों ने जिंदगी, सम्‍पत्‍ति और सम्‍मान की क्षति झेली है, कुछ त्रासदी पूर्व भयानक घटनाओं ने आम लोगों के मस्‍तिष्‍क पर बहुत गहरे घाव छोड़े हैं, पर इतना क्‍या कम है कि मुसलमान अपने अस्‍तित्व में बने रहे और बढ़ते रहे। कुल मिलाकर यह मुस्‍लिम समुदाय आजादी और क्षति के साथ जीता रहा, पर एक बात है जैसा न्‍याय, अधिकार एवं बराबरी एवं शिक्षा इस समुदाय को मिलनी चाहिए। वह मुसलमानों को आज भी मुकम्‍मल नहीं हो पायी हैं। इसलिए इनका श्‍ौक्षिक स्‍तर अधिक नहीं बढ़ पाया है।

भारतीय मुसलमानों का श्‍ौक्षिक स्‍तर कम होने का दूसरा पहलू इनका रहन-सहन का वातावरण भी है। भारतीय मुसलमानों का रहन-सहन अपनी विशिष्‍ट पहचान रखता है और इसी पहचान के लिए इस समुदाय का श्‍ौक्षिक वातावरण (तालीमी) भी अलग रहा है। इतिहास से हमें ज्ञात होता है कि मदरसों ने मुस्‍लिम समुदाय को साक्षरता के क्षेत्र में अति महत्‍वपूर्ण मुकाम पर पहुंचाया है। सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि मदरसे उन क्षेत्रों में छात्रों को साक्षर बनाते हैं, जहाँ औपचारिक शिक्षण संस्‍थाएं नहीं हैं शायद इसके पीछे यह कारण भी महत्‍वपूर्ण हो सकता है कि इन क्षेत्रों के लोगों की आर्थिक स्‍थिति इतनी बेहतर नहीं है कि अच्‍छे स्‍कूलों में जाकर अध्‍ययन कर सकें इससे स्‍पष्‍ट है कि एक तो गरीबी में अधिक से अधिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार मदरसों ने किया साथ ही दूर -दराज तक साक्षरता का मिशन भी पूरा किया, परन्‍तु आज सैकड़ों साल पुरानी विशिष्‍ट मदरसा शिक्षा की भव्‍य इमारतों की शानदार (सुनहरी) यात्रा कर आये मदरसों को जहाँ एक खास विचारधारा के लोग आतंकवाद या धार्मिक उग्रवाद का उत्‍पादन केन्‍द्र घोषित कर रहे हैं इसके साथ ही एक धारणा यह भी जोड़ दी जाती है कि मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा बच्‍चों , किशोरों को धर्मांध, रूढ़िवादी , प्रचीनतावादी तथा आधुनिकता का विरोधी बनाने का काम करती है। इधर कुछ वर्षों में मदरसों के पाठ्‌यक्रम और शिक्षा पद्धति को लेकर भारत में बहुत सार्थक और उपयोगी काम हुए हैं। यहाँ पर कम्‍प्‍यूटर की शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी एवं व्‍यावसायिक शिक्षा भी दी जा रही है इसके लिए उ0 प्र0 सरकार के अरबी-फारसी परीक्षा बोर्ड ने मान्‍यता दे दी है।

मदरसा शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ वर्तमान में मुस्‍लिम नवजवान शिक्षा की सभी संस्‍थाओं में अपने आपको अध्‍ययन के लिए उत्‍सुक हैं। आज मुस्‍लिम समुदाय के समक्ष जीविकोपार्जन एक चुनौती के रूप में है इसके लिए इनके समक्ष अब नैतिकता बौनी हो गयी है अर्थात्‌ नैतिक शिक्षा का बल कम हो गया है। उ0 प्र0 में मकातबे इस्‍लामियाँ, शिक्षा को आधुनिकता का मोड़ देकर अति महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अर्थात्‌ स्‍पष्‍ट है कि भारत में अरबी के मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ सेक्‍यूलर शिक्षा पर भी जोर (अनिवार्यता) दिया जा रहा है।

भारत में मुस्‍लिम समुदाय उच्‍च शिक्षा में उतना आगे नहीं है जितना होना चाहिए परन्‍तु इसके लिए भारत सरकार अपने स्‍तर से पूरी छूट दिये हुए है। अलीगढ़ मुस्‍लिम विश्‍वविद्यालय इस दिशा में एक महत्‍वपूर्ण काम कर रहा है और शिक्षा की जितनी आधुनिक प्रणालियाँ हैं वह सब यहाँ उपलब्‍ध हैं। सबसे अहम बात मुस्‍लिम समुदाय के लिए यह है कि इस वर्ग की महिलाएं शिक्षा एवं रोजगार के क्षेत्र में किसी भी वर्ग से बहुत पीछे हैं, फिलहाल कुछ भी हो आज स्‍कूली शिक्षा (मदरसा) के साथ-साथ मुस्‍लिम समुदाय को अपने नौनिहालों को माध्‍यमिक शिक्षा एवं उच्‍च शिक्षा को बढ़ाने की जरूरत है। सर सैय्‍यद अहमद साहब के अलीगढ़ मूवमेंट से लेकर अभी तक तमाम श्‍ौक्षिक सुधार अभियानों के पीछे (सच्‍चर समिति की रिपोर्ट को छोड़कर)बहुत सीमित मंशा काम करती रही है। इससे सबको शिक्षित करने का सवाल नहीं होता यह सामाजिक रूप से मौजूद बुराइयों को मजबूत करने वाला है और सिर्फ मुस्‍लिम कुलीन जमात की जरूरत को पूरा करने के ख्‍याल से चलाये जाते हैं। इसके लिए आज आवश्‍यकता है कि सरकार मुस्‍लिम समुदाय के लिए अन्‍य वर्गों की भाँति ( अनु0 जाति-अनु0 जनजाति/पिछड़े वर्ग) ठोस श्‍ौक्षिक नीति बनाएँ जिसमें मुस्‍लिमों के लिए शिक्षा पर विश्‍ोष बल दिये जाने की बात हो। जिससे प्राथमिक एवं माध्‍यमिक तथा उच्‍च शिक्षा के साथ-साथ व्‍यावसायिक शिक्षा के महत्‍व पर बल दिया जाये इसके साथ ही मुस्‍लिम बच्‍चों को विश्‍ोष रूप से ट्रेनिंग एवं कोचिंग की व्‍यवस्‍था पर भी जोर दिया जाये।

यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि मुस्‍लिम समुदाय के शिक्षा में पिछड़ने के पहलुओं पर पिछली एवम्‌ वर्तमान सरकार की गलत नीतियों के साथ-साथ मुस्‍लिम समुदाय की रूढ़ियां एवं आर्थिक पिछड़ापन भी कम दोषी नहीं हैं। आज वास्‍तविकता यह है कि मुस्‍लिम समुदाय इनके भंवर जाल के रूप में फंस गया है जिससे वह आज तक नहीं निकल पाया है फिलहाल आज के इस गलाकाट प्रतिस्‍पर्धा वाले युग में मुसलमान अपने को कितना आगे (श्‍ौक्षिक स्‍तर पर) ले जायेंगे यह भविष्‍य के गर्भ में छिपा हुआ है?

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श्‍ौक्षणिक गतिविधियों से जुड़े युवा साहित्‍यकार डाँ वीरेन्‍द्रसिंह यादव ने साहित्‍यिक, सांस्‍कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा पर्यावर्णीय समस्‍याओं से सम्‍बन्‍धित गतिविधियों को केन्‍द्र में रखकर अपना सृजन किया है। इसके साथ ही आपने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्‍त किया है। आपके सैकड़ों लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। आपमें प्रज्ञा एवम प्रतिभा का अदभुत सामंजस्‍य है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी एवम पर्यावरण में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानों से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

 

सम्‍पर्क-वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग, डी0 वी0 (पी0जी0) कालेज उरई (जालौन) उ0प्र0-285001,भारत

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इस लोक में लोक की दो नहीं, तीन नस्‍लें रही हैं। एक नस्‍ल जीओ और जीने दो में विश्‍वास करती है तो दूसरी नस्‍ल खुद जीओ पर दूसरों को बिल्‍कुल भी न जीने दो में। और तीसरी नस्‍ल वो नस्‍ल है जो न खुद जीती है और न औरों को ही जीने देती है।

अब आप सोच रहें होंगे कि मैं किस नस्‍ल में फाल करता हूं। असल में मैं उस नस्‍ल का प्राणी हूं जो जीओ और जीओ जीने दो में ही विश्‍वास करती है पर हां, वक्‍त के हिसाब से मैंने अपनी नस्‍ल में थोड़ा सुधार लिया है ,मतलब! मैं रिश्‍वत दो और काम लो की नस्‍ल का आदमी हूं। अब आप को क्‍या बता भाई साहब! यहां पर तो कई ऐसे ऐसे बंदे भी हैं जो रिश्‍वत दस बार लेकर भी काम नहीं करते। नेता जी ने नारा दिया था खून दो आजादी लो! तो एक नारायण सेवक होने के नाते मैंने भी समाज को नारा दिया है, रिश्‍वत दो, काम लो।

असल में अपने समाज में आज की डेट में समाज सुधार की बात करने का मौलिक हक केवल भ्रष्‍टाचारियों को ही है, जो जितना बड़ा भ्रष्‍टाचारी वह उतना ही चर्चित समाज सुधारक। ईमानदार तो बेचारे सारा दिन दो रोटी के लिए खटते खटते रात को भूखे पेट ही टूटी खाट पर पकवानों के सपने लेते लेते सुबह बिन सोए ही जाग कर रोटी के लिए मशक्‍कत शुरू देते हैं, इस लालच में कि आने वाला दिन उन्‍हें कुछ दे या न दे कम से कम दो रोटी तो देगा।

किसी के साथ मैं ईमानदार रहा या न पर भगवान के साथ मैं सदा ईमानदार रहा। कारण , भगवान की ही कृपा से मैं आज तब एक बार भी रिश्‍वत लेता हुआ पकड़ा नहीं गया। भगवान की इसी कृपा के कारण अब मैंने मिली रिश्‍वत में भगवान का हिस्‍सा ट्‌वेंटी परसेंट से बढ़ा कर फिफ्‌टी कर दिया है। यह दीगर बात है कि भगवान इन दिनों पहले से भी कमजोर चल रहें हैं।

कल बिना किसी लागलपेट के भगवान का हिस्‍सा लेकर उनके पास सारे काम छोड़ कर जा रहा था कि वे रास्‍ते में ही मिल गए। परेशान से भी दिखे। पर भाई साहब! आज के मारधाड़ के जमाने में परेशान कौन नहीं ? सो मैंने उनकी परेशानी को रूटीन की परेशानी ले नकार दिया। आज तो हम उस दौर में जी रहे हैं जहां कमबख्‍त परेशानी भी परेशान है।

‘ और रिश्‍वतखोर ! कहां जा रहे हो?'

‘ और कहां जाऊंगा भगवन्‌! अब तो मेरे पास दो ही ठिकाने बचे हैं, एक दफ्‌तर और दूसरा आपका मंदिर। पर आज आप कुछ अधिक ही दुबले लग रहे हो।'

'यार क्‍या बताऊं! चार दिन से कुछ खाया ही नहीं।' कह वे उदास हो गए।

‘पर मंदिर में तो आपके भीड़ लगी रहती है।'

‘वो पुजारी हद किए बैठा है। अब तो मेरे मुंह में टुकड़ा भी नहीं पड़ने दे रहा। बस,वायु के सहारे चल रहा हूं। मेरा हाल तो मदारी की बंदरिया जैसा हो रखा है।' कहते कहते उन्‍हें चक्‍कर आ गया। अगर मैं न संभालता तो गिर पड़ते।

‘तो?? उसे अभिशाप दे दो।'

‘ आज तो यार मैं ही अभिशापित हो गया हूं। अब एक और पंगा खड़ा हो गया है।' कह उन्‍होंने सिर में हाथ दिया।

‘क्‍या??'

‘ शाम को नेता जी के कुछ वर्कर आए थे।'

‘किसी दलित का बलात्‍कार कर क्षमा मांगने आए होंगे!'

‘नहीं। मंदिर खाली करवाने आए थे। कह रहे थे कि मैं अपनी मूरत यहां से उठा कहीं और चला जाऊं वरन्‌ उठा कर बाहर फेंक देंगे।'

‘क्‍यों??'

‘वहां नेता जी की मूरत लगेगी। अब तुम ही कहो, सैंकड़ों सालों से यहां रह रहा हूं। किसी का बुरा किया? पुजारी की पचासियों पीढ़ियां मेरे पेट पर पल गईं, पर मैंने कभी चूं तक न की। प्रेमी मेरे बहाने यहां मिल लिया करते थे, तो क्‍या बुरा था! घर से भाग कर जात बिरादरी के मारे मेरे सामने आकर विवाह कर लेते थे, क्‍या बुरा होता था! जो मेरे पास आया उसको हिम्‍मत ही दी,पर अब.................देख, मैंने तुझे रिश्‍वत लेते कभी पकड़ने दिया?'

‘नहीं।'

मामला सच्‍ची को नाजुक था।

‘तो, मेरी सहायता कर न प्‍लीज! मेरे साथ यह अन्‍याय क्‍यों?' भूखा सच्‍ची को कई बार बहुत खूंख्‍वार हो जाता है।

‘इसलिए कि वैसे तो नेता जी के दर्शन जनता को सालों साल नहीं होते ,इस बहाने रोज तो हो जाया करेंगे।'

‘तो मैं कहां जाऊं?'

‘जनता की राय जान लेते हैं। लोकतंत्र है।'

‘ छी, फुसलाहट में मिले झूठे वादों की बैसाखियों के सहारे खड़ा होने वाला।' कह वे आगे हो लिए। अब मैं रिश्‍वत का फिफ्टी परसेंट किसको दूंगा भाई साहब!

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डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास,अप्‍पर सेरी रोड

नजदीक मेन वाटर टैंक सोलन-173212 हि.प्र.

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(चित्र – साभार गौहर महल लोक चित्रकला प्रदर्शनी)

krishna kumar ajnabi tantra

हालांकि होरी के पास अब कतई जगह न बची थी किसानी का काम करने के लिए। कुछ जगह बेचारे को थोड़ी थोड़ी करके बच्‍चों के विवाह के समय बेचनी पड़ी तो कुछ बिल्‍डर माफिया ने डरा धमका कर उससे मार ली। जो कुछ खेत बचे थे वे सरकार ने सेज के नाम पर देश हित में उससे ले लिए।

होरी तब उदास बैठा था अपने अतीत को याद करता। कुत्‍ता पास ही बंधा गुनगुना रहा था। उसे गुनगुनाते हुए देख होरी को गुस्‍सा आया तो उसने कुत्‍ते से अधिक अपने पर गुस्‍से होते कहा,‘ यार कुत्‍ते यहां अपना सबकुछ लुट गया और एक तू है कि गुनगुना रहा है।'

कुत्‍ते ने कुछ देर के लिए गुनगुनाना बंद कर कहा,‘ देखो मालिक! व्‍यवस्‍था जो करती है ठीक ही करती है। भगवान जो करता है वह ठीक करे या न! '

‘ तू तो बड़ा नमक हराम कुत्‍ता निकला यार! मैंने तो सोचा था कि इस लोक में सब नमक हराम हो सकते हैं पर कुत्‍ते नहीं। पर नमक हरामी में तो तू सबका बाप निकला। अब तू ही बता मैं इस किसान पास बुक का क्‍या करूं? अब मेरे पास किसान के नाम पर केवल और केवल यह किसान पास बुक ही रह गई है या फिर यह जंग लगा हल।'

‘ मालिक मुझे इस बात की खुशी हो रही है कि अबके पूस की रात में हम दोनों को कम से कम ठंड में मरना तो नहीं पड़ेगा। सदियाँ हो गई थीं पूस की रात में तुम्‍हारे साथ फसल की जुगाली करते पर बाद में मिलता क्‍या था? भूसी तक तो साहूकार उठा कर ले जाता रहा। अब कम से कम घर में तो पड़े रहेंगे खींदडों के बीच।'

‘यार! अब तक अपने को किसान तो समझता था। अब खाएंगे क्‍या?'

‘सरकारी राशन की दुकान जो है।'

‘ एक किसान सरकारी राशन की दुकान से आटा दाल खरीद कर खाए इससे बड़ी लानत उसको और क्‍या होगी?'

‘ छोड़ो मालिक ये मिथ्‍या दंभ! लानत की बात अगर कोई देश में सोचने लग जाए तो एक भी देश में न रहे। ये देश खाली हो जाए। इसलिए जैसे भी जो भी मिले, अक्‍ल को मार कर खाए जाओ, कलजुग के गुण गाए जाओ। जीना इसी का नाम है।'

गोबर तो पहले ही घर से भाग चुका था, ड्राइवर होने के शौक में। उसकी घरवाली की उससे न बनी तो उसने अपनी चुनरी उठाई और अपने मायके चली गई। शादी विवाह अब कौन से जनम जनम के बंधन रह गए भैया! जब मर्जी की बिना तीन बार तलाक बोलने से पहले ही हो जाए तलाक।

होरी ने अपने घर की देहरी पर माथा टेका और अपने कुत्‍ते को वहीं छोड़ , कांधे पर हल उठाए शहर आ गया। कुत्‍ते ने बहुत मिन्‍नतें की,‘ मालिक अपने साथ ही ले चलो न मुझे। तुम्‍हारा और धनिया का साथ भले ही जनम जनम का न हो पर मेरा और तुम्‍हारा साथ तो जनम जनम का है। जितनी बार तुम जनम लोगे उतनी ही बार मैं जनम लूंगा । मोक्ष न कभी किसान को मिलेगा न कुत्‍ते को।'

पर होरी न जाने क्‍यों कुत्‍ते को शहर लाने से डर गया।

अचानक शहर में एक दिन ठेला ढोते ढोते एक साम्‍यवादी नेता जी की मेहरबानी हुई तो उन्‍होंने अपने पचास बीघा का फार्म हाउस उसको बटाई पर दे दिया यह कह कर कि बटाई पर हल भी चला ले और रात को मेरे फार्म हाउस की चौकीदारी भी कर ले। धनिया को फार्म हाउस में झाड़ू पोंछे को काम मिल गया। तब उसे बहुत गुस्‍सा आया था अपनी बहू पर । क्‍या जरूरत थी मायके जाने की।

नेता जी का आशीर्वाद मिलते ही होरी ने बरसों से बेकार पड़े हल को ठीक किया, सड़कों से आवारा छोड़े बैलों में से एक जोड़ी बैल छांट कर फार्म हाउस ले आया।

बीज के लिए सरकार की दुकान पर गया तो वहां सस्‍ता बीज न मिला। पता चला कि वह तो बाजार में खुले भाव बिकने के लिए पहले ही बिक चुका है सो होरी के पास बीज खरीदने के लिए पैसे तो न तब थे जब देश आजाद नहीं था, न अब हैं जब देश आजाद हो चुका है। वह हार कर फिर शहर के लाला के पास गया, उसके आगे गिड़गिड़ाया,‘ मालिक, बीज खरीदने के लिए उधार चाहिए!'

‘सरकारी बैंक से ले। कुछ है तेरे पास गिरवी रखने के लिए?' लाला ने पहले से भी सीधी बात की।'

‘धनिया है। और तो सब खत्‍म हो लिया।'

बीज का इंतजाम हो गया पर मानसून न आया। सरकार बराबर कह रही थी कि अबके मानसून समय पर आएगा। होरी को आस बंधी थी कि अबके मानसून ठीक रहा तो उपज अच्‍छी होगी। फसल आते ही वह गांव जाकर गिरवी रखी गाय भी शहर ले आएगा, फिर धनिया को।

और वह हुक्‍का गुड़गुड़ाता सुनहले सपनों में खो गया। पर एक कमबख्त आंखें थीं कि सपने देख ही नहीं पा रही थीं।

मानसून समय पर तो क्‍या लाख इंतजार करवाने के बाद भी नहीं आया। फार्म हाउस में डाले बीज जलने लगे।

वह सरकार के पास गया। दोनों हाथ जोड़े,‘ सरकार आपने तो कहा था मानसून समय पर आएगा।'

‘ मानसून और नेता का भरोसा कौन करे? वो करे जो मूर्ख हो।'पता नहीं किसने कहा।

‘पर सरकार, अब किसानों का क्‍या होगा?'

‘जो हर साल होता है। देखो होरी, परेशान मत हो। तुम किसानों के साथ यही तो पंगा है कि तुम परेशान बहुत जल्‍दी हो जाते हो। समय पर मानसून आ जाए तो परेशान, समय पर मानसून न आए तो परेशान। बारिश हो गई तो परेशान, सूखा पड़ गया तो परेशान। रही बात समय पर न आने की। वह कौन सा हमारा नौकर है? होता भी तो कौन सा समय पर आने के लिए बाध्‍य होता। समय पर देश में हो क्‍या रहा है?चपरासी तक तो यहां पर समय पर आते नहीं, औरों की तो छोड़ो। सरकार मानसून से संपर्क बराबर बनाए हुए है। हमने मानसून से संवाद करने के लिए कृषक सचिवों की जो समिति बनाई है वह भी मानसून से बराबर तालमेल बनाए हुए है। उन्‍होंने कहा है कि वे कुछ ले देकर मानसून को पटा रहे हैं। मानसून को मनाने की भरपूर कोशिश सरकार कर रही है। पर ये विपक्ष है न! हमारी हर कोशिश को बेकार करने में डटा है। हौसला रखो! इस देश में किसान हौसला नहीं रखेगा तो और कौन रखेगा!'

‘ तो मानसून आएगा न सरकार!'

‘ कमाल है यार! आएगा कैसे नहीं। हम बहुमत में हैं। अल्‍पमत में होते फिर भी उसकी दादागिरी सहन कर लेते। सरकार सबकुछ सहन कर सकती है पर किसी की दादागिरी नहीं। मानसून की भी नहीं। वह विपक्ष की हर चाल को पानी पिलाकर ही रहेगी होरी।'

‘स्‍थिति नियंत्रण में तो है न हजूर!'

‘ डांट वरी, बी हैप्‍पी ! सरकार तनाव पर तो नियंत्रण रख नहीं सकती पर नियंत्रण पर सदा उसका पूरा नियंत्रण रहा है।'

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डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास ,अप्‍पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक

सोलन-173212 हि.प्र.

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(चित्र – कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)

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जबसे नए पड़ोस में आया था, पड़ोसी से बेहद परेशान था। उसने नाक में ऐसा धुआं दे रखा था कि आपको क्‍या बताऊं! बताते हुए शर्म आ रही है। पड़ोसी की परेशानियों का मारा सिर में हाथ दे दिन-रात बैठा रहता ․․․ कि तभी एक दोपहर पहुंचे हुए बाबा आ धमके। मेरी परेशानी को एक दम भांप बोले,‘क्‍यों बेटा !परेशान हो?'

हां बाबा!'

किससे? पत्‍नी से?'

नहीं।'

प्रेमिका से?'

बाबा आप भी न कमाल करते हो! मारधाड़ के इस दौर में मरने की फुर्सत नहीं और आप हो कि प्रेमिका की बात करते हो! महंगाई में एक ठो पत्‍नी का भार ही उठ जाए तो लाखों पाए समझो!'

तो पड़ोसी से परेशान हो!'

हां प्रभु! ऐसा परेशान हूं कि मत पूछो। कई बार तो पड़ोसी की कारगुजारियों से इतना परेशान हो जाता हूं कि सुसाइड करने को मन होता है, पर जब सामने जवान बीबी दिखती है तो वापिस लौटना पड़ता है। '

बस!इतनी सी बात! बाबा के पास पड़ोसी तो पड़ोसी, अगर कोई भगवान की ओर से भी परेशान हो तो उसका भी स्‍टांप पेपर पर लिखकर गारंटिड इलाज है।'

तो मेरी परेशानी का समाधान कीजिए प्रभु! पड़ोसी के आतंक के कारण मैं आदर्श कालोनी का वाशिंदा होकर नहीं बल्‍कि नरक का होकर जी रहा हूं।' मैं उनकेे चरणों मे यों लोट-पोट होने लगा जैसे मेरी पालतू बिल्‍ली दूध लेने के लिए मेरे पैरों में लोटती है।

भक्‍त, संसार में सीना चौड़ा करके जीना हो तो बुरा इंसान होने के साथ-साथ बुरा पड़ोसी होना भी बेहद जरूरी है। अगर भक्‍त, तू बुरा होकर अपने पड़ोसी पर हावी नहीं होएगा तो वह तुझ पर हावी हो जाएगा। पहल जो करता है जीत उसी की होती है।'

तो इसके लिए क्‍या आदेश हैं मेरे आका!'

बेटा! इसके लिए सबसे पहले आवश्‍यक है कि पड़ोसी के सुख में तो पक्‍का काम आ, पर उसके दुःख में भूले से काम न आ। जब-जब लगे कि पड़ोसी दुःखी है तो मुहल्‍ले में निःसंकोच लड्‌डू बांट और भगवान से दिन-रात यही दुआ कर कि जब तक तू उस पड़ोसी के पड़ोस में रहे, वह परेशान ही रहे। उसके जन्‍म दिन,उसकी शादी की साल गिरह पर उसे भूले से भी शुभकामना न दे। उसके परिवार का कोई सदस्‍य बीमार पड़ जाए तो उसका हाल-चाल कतई भी पूछने न जा। ऐसा होने पर वह तुझसे बहुत डरेगा।'सच कहूं, उस वक्‍त वह बाबा मुझे बाबा कम गृहस्‍थी अधिक लगा। रोटी के लिए इन दिनों राम जाने बंधुओ गृहस्‍थी किस -किस भेस में घूमते हैं।

और प्रभु!'

अपने घर का सारा कूड़ा-कचरा पूरे रौब के साथ पड़ोसी के घर के आगे फैंक। ऐसा करने पर पड़ोसी तुझसे पूरी तरह डरा रहेगा। हमेशा याद रखना कि जहां तू कूड़ा-कचरा फैंक रहा हां वह जगह पड़ोसी की ही हो। यदि तू भक्‍त ऐसा नहीं करेगो तो पड़ोसी यह सब करके तुझे परेशानी में डाल देगा। कूड़े को तो हर हाल में किसी के न किसी के घर के आगे पड़ना ही है। अक्‍सर देखा गया है कि कूड़ा पड़ोसी को डराने कर सबसे सशक्‍त हथियार होता है।'

और प्रभु!' मेरी बांछें खिलनी शुरू हुईं तो खिलती ही चली गईं। हे प्रभु! कहां थे इतने दिन!!

मनुष्‍य अनादि काल से ही लड़ाका जानवर रहा है। यही कारण है कि हजारों बार नाखून काटने के बाद भी वे पहले से पैने होकर आते हैं। इसलिए पड़ोसी की परेशानी से बचने के लिए उससे मित्रवत व्‍यवहार गलती से भी न करना। किसी और के प्रति गुस्‍सा प्रदर्शित करने की हिम्‍मत हो या न, पर पड़ोसी के सामने सदैव तपा हुआ लोहा बने रहना। तेरा बच्‍चा अगर पड़ोसी के बच्‍चे से खेले तो उसे पड़ोसी के बच्‍चे पर भारी पड़ना सिखा। भविष्‍य में बच्‍चे के लिए सुविधा रहेगी। पड़ोसी और अपने बच्‍चे के झगड़े में सारे काम छोड़ कर जरूर पड़। दोष चाहे तेरे बच्‍चे का हो ,इससे पहले कि तेरा पड़ोसी तेरे बच्‍चे को दोषी ठहराए तू उसके बच्‍चे को सीना तान कर दोषी करार दे दे। पड़ोसी से लड़ाई के मामले में हमेशा आपा खोकर रख। सदैव पत्‍नी की खीझ पड़ोसी पर निकाल। बड़ा चैन मिलेगा। पड़ोसी के साथ लड़ते हुए धैर्य कतई न रख। अपने को पड़ोसी के सामने पूरे रौब- दाब से सजाए रख, भले ही इसके लिए तुझे बैंक से लोन लेना पड़े। पड़ोसी को हमेशा अपने से हीन समझ।'

और कुछ आदेश मेरे बाबा!'

पड़ोसी की हत्‍या करनी है क्‍या?'

बंधुओ! अब पड़ोसी मुझसे बुरी तरह डरता है। अगर आप भी सगर्व पड़ोसी का सिर नीचा करवा अकड़ कर पड़ोस इंज्‍वाय करना चाहते हो तो․․․सच कहूं, पड़ोसी को चौबीसों घंटे सूली पर चढ़ा कर जीने में जो आनंद आता है वैसा आनंद तो स्‍वर्ग में भी क्‍या ही आता होगा!!

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डॉ अशोक गौतम

राजकीय महाविद्यालय,संजौली,

शिमला-171006 हिप्र

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़

संपर्कः सी-2/15, न्यू शांति नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़, 492001,

मान्यवर,

मुक्तिबोध, परसाई एवं श्रीकांत वर्मा के सहपाठी, देश के महत्वपूर्ण कवि-आलोचक-नाटककार एवं विचारक स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति में गठित “ प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान ” द्वारा आगामी 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर (स्थल-निरंजन धर्मशाला, माना एयरपोर्ट मार्ग) में दो दिवसीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह का आयोजन किया गया है । समारोह में प्रमोद वर्मा समग्र के विमोचन, प्रमोद रंग (प्रमोद वर्मा की कविताओं का नाट्य मंचन), राष्ट्रीय कविता पाठ, पुस्तक प्रदर्शनी, रेखाचित्र प्रदर्शनी, राष्ट्रीय आलोचना सम्मान कार्यक्रम के अलावा 3 सत्रों में संगोष्ठी आयोजित की गई है । संगोष्ठी के विषय हैं – 1 समकालीन आलोचना के हाव-भाव, 2 आलोचना का प्रजातंत्र और 3 आलोचना के परिसर ।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में अब तक प्रतिभागिता की स्वीकृति प्रदान करने वाले प्रमुख देश के प्रमुख साहित्यकारों में हैं – सर्वश्री अशोक बाजपेयी-दिल्ली, प्रभाकर श्रोत्रिय-गाजियाबाद, अरविंदाक्षन-कालीकट, केदारनाथ सिंह-दिल्ली, प्रभात त्रिपाठी-रायगढ़, नंदकिशोर आचार्य-जयपुर, विजय बहादुर सिंह-कोलकाता, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी-गोरखपुर, डॉ. धनंजय वर्मा-भोपाल, अरुण कमल-पटना, एकान्त श्रीवास्तव-कोलकाता, खगेन्द्र ठाकुर-पटना, श्रकिशन कालजयी-दिल्ली, कर्मेन्दु शिशिर-पटना, रमेश दवे-भोपाल, कमला प्रसाद-भोपाल, पंकज चतुर्वेदी-कानपुर, रमेश दत्त दुबे-सागर, डॉ. श्रीराम परिहार-खंडवा, राजेश जोशी-भोपाल, भगवान सिंह-भागलपुर, कृष्णमोहन-वाराणसी, मिथिलेश्वर-आरा, उदय प्रकाश-गाजियाबाद, कैलाश बाजपेयी-दिल्ली, शिवकुमार मिश्र-आनंद, मधुरेश-कानपुर, अष्टभुजा शुक्ल-बस्ती, देवेन्द्र दीपक-भोपाल, दिविक रमेश-दिल्ली, मुक्ता-वाराणसी, अशोक माहेश्वरी-दिल्ली, राजुरकर राज-भोपाल, डॉ. बृजबाला सिंह-वाराणसी, विजय देव-भोपाल राजेन्द्र परदेसी-लखनऊ एवं छत्तीसगढ़ से सर्वश्री विनोद कुमार शुक्ल, रमाकांत श्रीवास्तव, गिरीश पंकज, सुशील त्रिवेदी, राजेन्द्र मिश्र, रमैश नैयर, ललित सुरजन, अशोक सिंघई, कमलेश्वर, नासिर अहमद सिंकदर, बी.एल.पाल, हरप्रसाद, डॉ. बलदेव, डॉ. चित्तरंजन कर, नंदकिशोर तिवारी डॉ. बिहारीलाल साहू, डॉ. उर्मिला शुक्ला, डॉ. कल्याणी वर्मा, शरद कोकास, रजत कृष्ण, विजय सिंह, विजय गुप्त, आनंद बहादुर सिंह, आनंद हर्षुल, आदि ।

इस अवसर पर देश के महत्वपूर्ण कलाकारों को व्यापक तौर पर प्रोत्साहित और प्रतिष्ठित करने के लिए विशेष तौर पर राष्ट्रीय रेखाचित्र प्रतियोगिता-प्रदर्शनी का दो दिवसीय आयोजन भी किया गया है जिसमें चयनित 3 कलाकारों को संस्थान की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जायेगा । सम्मान स्वरूप प्रथम 3 कलाकारों को 7, 5, 3 हजार नगद, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, शाल एवं श्री फल से 11 जुलाई, 2009 को पुरस्कृत किया जायेगा । आप चुनिंदे 25 रेखाचित्रों के साथ उक्त प्रतियोगिता-प्रदर्शनी में भाग लेने हेतु सादर आमंत्रित हैं । आपके आवास, भोजन, स्वल्पाहार की समुचित व्यवस्था संस्थान द्वारा की गई है । प्रविष्टि आप किसी विशेष जानकारी के लिए हमारे सेल नं. से संपर्क कर सकते हैं ।

संस्था द्वारा आपकी गरिमा के अनुकूल समुचित आवास (एसी), भोजन एवं स्वल्पाहार, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था की गई है ।
हमें विश्वास है - आयोजन में भागीदारी हेतु आपका स्वीकृति पत्र (संबंधित रेलगाड़ी एवं समय सहित)  5 जुलाई के पूर्व तक डाक, ई-मेल, मोबाइल, फ़ैक्स से मिल सकेगा और हम आयोजन को अंतिम रूप दे सकें। हमारे पदाधिकारी रेलवे स्टेशन, रायपुर में आपके स्वागतार्थ मिलेंगे ताकि आपको कार्यक्रम स्थल तक आवागमन में बाधाओं का सामना न करना पड़े ।

 

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संपर्क-

जयप्रकाश मानस

कार्यकारी निदेशक

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान

रायपुर, छत्तीसगढ़

मो- 094241-82664

फ़ैक्स  - 0771-4240077

अपने चुनाव क्षेत्र को मिट्‌टी मे विलीन करने के बाद वे आखिर विलीन हुए। उनका दस नंबरी तो बहुत पहले चाहता था कि वे राजनीति से उठें तो उसके भविष्‍य के द्वार खुलें। हर बाप अपने बेटे के लिए हर द्वार खोल सकता है पर अपने चलते राजनीति के द्वार नहीं। सो वे भी बेटे के लाख अनुरोध करने के बाद भी उसके राजनीतिक करिअर के लिए निरोध बने रहे। जिस दिन वे अचानक सिधारे, विपक्ष वालों ने तो विपक्ष वालों ने , उनकी अपनी पार्टी वालों ने तो पार्टी वालों ने, बेटे ने भी घी के दीए जलाए। वाह रे चमड़ी के रिश्तों!

सिधारे नेता जब हफ्‌ते बाद भी यमलोक में नहीं पहुंचे तो यमराज ने उस बीट के यमदूतों को संबोधित करते हुए कहा,‘ मित्रों! हफ्‌ता हो गया उस नेता को गुजरे हुए, पर वह अभी तक नहीं आया। देखो तो सही, आखिर माजरा क्‍या है? चुनाव आयोग से मिली सूचना के अनुसार कहीं चुनाव भी नहीं।' तब उन यमदूतों में से एक यमदूत ने विनम्र हो कहा,‘ प्रभु! जंबूद्वीपीय नेता है। वहां के नेताओं को हर जगह लेट पहुंचने में ही आनन्‍द आता है। ये आदत से मजबूर होता है। चिंता की कोई बात नहीं। देर सबेर खुद चला आएगा।' सुन यमराज चुप हो पाकिस्‍तान बम हादसों में समय से पहली आयों का हिसाब किताब निपटाने लग गए।

यों ही दस दिन और बीत गए।

पर नेता यमलोक नहीं पहुंचे। आखिर परेशान होकर यमराज ने यमदूतों को आदेश दिया,‘ देखो यारों! वह नेता अभी तक यमलोक में नहीं पहुंचा। अगर ये लोग इसी तरह लेट होते रहे तो देश का बेड़ा गर्क हो या न पर यमलोक का सिस्‍टम जरूर गड़बड़ा जाएगा। इसलिए जाओ और उस नेता को जितनी जल्‍दी हो सके यमलोक में लाओ। हमारे पास एक नेता का ही काम नहीं है, जनता भी तो देखनी है जो इन नेताओं के कारण समय से पहले ही चली आ रही है। ' आदेश पा चार यमदूत नेता को लेने मृत्‍युलोक में आ धमके। सबसे पहले वे गुजरे नेता के घर पहुंचे। वहां उनका बेटा मुस्‍कुराते हुए उनका क्रिया कर्म कर रहा था। जाहिर था कि वे वहां नहीं थे। वहां होते तो बेटे को ऐसा करने से रोकते। फिर वे उन सब संभावित ठिकानों पर गए जहां अकसर नेता घर छोड़ कर रहते हैं, पर वे वहां पर भी नहीं मिले। उन्‍होंने उनके चुनाव क्षेत्र का चप्‍पा-चप्‍पा छान मारा ,पर वे वहां भी नहीं मिले। वे परेशान हो उठे। यमलोक से बार- बार मोबाइल आ रहा था कि जल्‍दी करो, और जगह भी जाना है। आतंकवादी संगठनों ने कई जगह मौत का तांडव करने की धमकी दी है। हर जगह दीवारों से सिर टकराने के बाद वे गुजरे नेता के विपक्षी के घर जा पहुंचे, उसका दरवाजा खटखटाया तो वे घर में जश्न मना रहे थे। यमदूतों को देख वे इतने डरे इतने डरे कि... दोनों हाथ जोड़ उनसे बोले,‘ बंधुओ! बड़ी मुश्किल से अब तो खाने का मौका मिला था और एक आप हो कि... खुदा के लिए एक बार, बस, एक बार चुनाव जीत जाने दीजिए। उसके बाद आपके कहे बिना ही आपके पास चला आऊंगा।'

तब उन चारों में एक ने कहा,‘ हे जनसेवक ! आप को गलत फहमी हुई है। हमें पता है कि अभी आपने कुछ भी खाया नहीं है। भूखा नेता और भूखा शेर कहीं का भी हो हर जगह तबाही मचाता है। हम तो आपके विपक्षी को ढूंढते - ढूंढते आपके पास आए हैं।'

‘क्‍या वह कमबख्त अभी तक यमलोक नहीं पहुंचा!!' उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएं कुकरमुत्‍तों की तरह उगने लगीं।

‘नहीं।' चारों ने एक साथ कहा ।

‘तो???'

‘ तो क्‍या! चैन से जीना चाहते हो तो उसको ढूंढने में हमारी मदद करो।' विपक्षी ने फटाफट आधे कपड़े पहने और यमदूतों के साथ हो लिए। संसद में गुजरे नेता को ढूंढा, पर नहीं मिला। राज्‍य सभा में गुजरे नेता को ढूंढा,पर नहीं मिला। पार्टी दफ्‌तर गुजरे नेता को ढूंढा ,पर नहीं मिला। प्रेस क्‍लब में गुजरे नेता को ढूंढा, पर नहीं मिला। सबकी चिंता चिता समान। अचानक विपक्षी के चेहरे पर उम्‍मीद की किरण झलकी। वह उछलता बोला,‘ गुजरा नेता मिल सकता है । एक आइडिया है!' उसकी उछल को देख उनके पसीना हुए चेहरे एकाएक खिल उठे। चारों एक साथ बोले,‘कैसे??'

एक काम करो। यमलोक में उसको एक भारी जन सभा को संबोधित कर सम्‍मानित करने, वहां पर किसी शौचालय का शिलान्यास रखवाने या किसी शौचालय का उद्‌घाटन उसके हाथों करवाने का अखबारों में विज्ञापन दो।'

‘तो उससे क्‍या होगा!'चौथे ने मुंह लटकाए पूछा।

‘ होगा वही जो अभी तक आप लोग नहीं कर पाए। वह दौड़ा - दौड़ा, नंगे पांव जहां भी होगा अखबार में यह पढ़ खुद ब खुद चला आएगा।'

‘ मतलब!!!' चारों ने एक साथ पूछा।

‘ मतलब ये कि नेता कहीं जाए या न जाए, इन तीनों में से कुछ भी करने वह कब्र में से भी आ सकता है।'

‘तो??'

‘ तो क्‍या , जैसे ही वह वहां उपस्‍थित होगा आप उसे मजे से पकड़ लेना। आप का काम भी हो जाएगा और मेरा भी।' चारों ने उस नेता के पांव छुए, अगले ही पल उन्‍होंने देश के लीडिंग अखबारों और सबसे तेज टीवी चैनलों में यमलोक में दो दिन बाद गुजरे नेता जी द्वारा भारी जनसभा को संबोधन के बाद शौचालय का उद्‌घाटन कर उन्‍हें सम्‍मानित करने के विज्ञापन दिए और गुनगुनाते हुए अपने लोक लौट गए।

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अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड

नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि0प्र0

ईमेल a_gautamindia@rediffmail.com

 

चमचा

  • §

कभी राहू तो कभी केतु है चमचा,

बिखर जाये तो उखड़ी सभा है चमचा,

कभी नेता तो कभी अभिनेता है चमचा,

फटे में अड़ाये टांग वो चीज है चमचा,

कभी दिल्‍ली तो कभी जयपुर है चमचा,

बेपेन्‍दे का लोटा है ये चमचा,

कभी स्‍याह तो कभी सफेद है चमचा,

फ्‌लाप फिल्‍म सा अड़ा है ये चमचा,

क्‍भी लड़की तो कभी कड़की है चमचा,

फिसल जाये तो टूटी टाँग है चमचा,

कभी जंगल तो कभी शहर है चमचा,

अड़ जाये तो टट्‌टू है चमचा,

कभी षायर तो कभी कायर है चमचा,

पँचर टायर है आजकल ये चमचा,

कभी कुवाँरा तो कभी ब्‌याहता है चमचा,

दुनिया में यह अजीब गोल माल है चमचा,

कभी हीरा तो कभी काँच है चमचा,

सूरदास का चश्मा है ये चमचा,

कभी कुत्ता तो कभी दुम है ये चमचा,

मोहल्‍ले की नाक है ये चमचा,

कभी गुलाल तो कभी अबीर है चमचा,

फंसा ले तो कीचड़ है चमचा,

कभी महल तो कभी झोंपड़ी है चमचा,

फटा हुआ बांस है ये चमचा,

कभी आंसू तो कभी हंसी है चमचा,

सड़ा हुआ अण्‍डा है ये चमचा,

कभी आशिक तो कभी माशूक़ है चमचा,

सर पर चढ़ कर बोले वो जादू है चमचा,

कभी लफन्‍दर तो कभी बन्‍दर है चमचा,

मुकद्‌दर का सिकन्‍दर है चमचा,

कभी हाथी तो कभी हाथी-दांत है चमचा,

गुम हो जाये तो गधे का सींग है चमचा,

कभी गम तो कभी गम का जाम है चमचा,

औकात पर आ जाये तो नमक हराम है चमचा,

कभी बलबन्‍त तो कभी यशवन्त है चमचा,

आस्‍तीन का सांप है ये चमचा।

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चमचा-फरोश

  • §

जी हां जनाब, मैं चमचे बेचता हूं

तरह-तरह के, रंग-रंग के, अंग-अंगे के

ढंग-ढंग के

मैं चमचे बेचता हूं।

जी इनकी शक्ल देखिये,

फिर अकल देखिये

इन्‍हें पाया मैंने डिनर पर,

इन्‍हें पटाया मैंने प्‍लेटफार्म पर,

ये स्‍टेन-लेस-स्‍टील के हैं,

ये पूरे सिल्‍वर-स्‍पून हैं,

देख-भाल कर भरती करता हूं,

जी हां जनाब मैं चमचे बेचता हूं,

ये कल तक मेरा विरोधी था,

आज चरण चूमता है,

दल-बदल कर आया है,

आपके लिये नया सँदेसा लाया है,

ये खास मुरादाबादी है,

कभी आपके यहां,

कभी विरोधी के यहां,

घूम-घूम कर आते हैं,

हर बार नया सँदेसा लाते हैं।

जी सस्‍ते मैं इन्‍हें बेच रहा है,

जी हां, जनाब मैं चमचे बेचता हूं,

ये श्रीमान्‌ लखनवी हैं,

तीन सरकारें गिरा चुके हैं,

ये खास देहलवी है,

चुनाव की वैतरणी पार करा देंगे

आपको भव सागर की सैर करा देंगे

वह मुख्‍यमंत्री का चमचा रह चुका है,

यह हिन्‍दुस्‍तानी जमूरे का नमूना है,

वो चार दल बदल चुका है,

यह बिखरी सभा जमाता है

जी हां, सभी तरह के चमचे बेचता हूं,

जी हां जनाब मैं चमचे बेचता हूं,

यह बिगड़ी बात बनाता है,

यह गधे को बाप बनाता है,

यह विरोधी को पिटवाता है,

यह जमा हुआ अखाड़ेबाज है

जी हां जनाब मैं चमचे बेचता हूं

नहीं पसन्‍द आये,

जाने दीजिये, छोड़िये,

अच्‍छा, अच्‍छा मैं समझ गया,

आप चमचे नहीं चमचियां चाहते हैं,

ये बिल्‍कुल नई नवेली है,

अभी बिल्‍कुल अछूती है

कल तक कालेज मैं पढ़ती थी,

अब जाकर मार्केट मैं आई है,

चुनाव की नाव पार लगा देगी,

आपको भव-सागर की सैर करा देगी,

कहिये, कितनों का आर्डर बुक कर दूं,

जी हां, जनाब मैं चमचे बेचता हूं।

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एक किसान रो बेटो

  • §

एक किसान रो बेटो कवि हुइग्‍यो,

किसान समझग्‍यो

बेटो बेकार वेइग्‍यो।

बिचारो गयो काम सूं।

बेटो कई कई-काज नी करें। अब किसान काईं करें।

पण किसान हिम्‍मत नी हारी

और घरवाली सूं राय करी,

घरवाली ने राजी कर

किसान बेटा रो ब्‍याह कर दीनो

एक कविता नाम री लड़की सू,ं

बिचारो किसान रो बेटो बेमौत मरग्‍यो।

क्‍यूंकि कविता रा ब्‍याव के पाछे

किसान रो बेटो खेतीबाड़ी, खाद बीज

सब भूल ग्‍यो,

और कविता के पाछे हाथ धोर पडग्‍यो।

बेचारी कविता रो जीवन

बर्बाद हो ग्‍यो।

एक किसान रो बेटो कवि हो ग्‍यो।

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यषवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,जयपुर-302002 फोनः-2670596

 

 

चले गये पिताजी भी,

माताजी की राह पर,

सौंप कर अपनी विरासत,

मुकदमें, लेनदारियां,

देनदारियां,

वकील, फाइलें और घर बार,

नहीं मिला उन्‍हें सन्‍तोष, न्‍याय,

छोड़ गये दुखों का एक जखीरा,

सब के नाम।

सब के लिए।

माँ के चले जाने के बाद,

बहुत उदास थे पिता,

लेकिन चुपचाप,

रहते थे।

नहीं कहते थे किसी को भी कुछ,

बस चुपचाप खो जाते,

फाइलों, कागजों में,

उदासी के साथ ही चले गये पिता भी।

छोड़ गये।

भरा,पूरा परिवार।

धर्मग्रन्‍थ, पुस्‍तकें और

सुखी भवितव्‍य हेतु

आशीर्वाद। आशीर्वाद॥ आशीर्वाद॥।

बहुत सोचता हूं,

इस तरह क्‍यों हुआ।

अचानक चलते फिरते ही चले गये।

नहीं दी किसी को तकलीफ, बस

चुपचाप, चुपचाप चले गये।

आज वे होते तो ये होता

ये होता तो वो होता

ऐसा कहते। वैसा कहते।

ऐसा करते। वैसा करते।

ऐसे समझाते। वैसे समझाते।

वे बरगद की ठण्‍ड़ी छांव थे।

वे नहीं हैं तो सब कुछ उदास है।

उदास छत, उदास दीवारें घर नहीं होता,

वे थे तो घर घर था।

अब कुछ भी नहीं

वे थे तो मिलने गांव जाते, पूरे गांव से मिलते,

गर्मियों में बच्‍चे दादा के पास ही रहते,

अब गांव ही बेगाना हो गया।

पिता के साये तले हम सब एक थे।

चलें गये वे मां से मिलने,

हमेशा हमेशा के लिए,

बहुत उदास है हम सब,

मगर जीवन तो चलने का नाम,

अनन्‍त यात्रा पर चले गये पिता,

चले गये पिता भी।

 

 

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यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्‍मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर,जयपुर-302002

फोनः-0141-2670596

संगीत कला को ललित कलाओं में सर्वश्रेष्‍ठ होने का गौरव प्राप्‍त है। मन को एकाग्र कर मोक्ष द्वार तक ले जाने वाला संगीत के अतिरिक्‍त संगम व सरल मार्ग और कोई नहीं है। यही इसकी सर्वश्रेष्‍ठता का प्रमुख कारण है। जीवन यात्रा के प्रत्‍येक क्षेत्र में संगीत का योग होने के कारण मानव सहज ही इससे सम्‍बद्ध हो जाता है। संगीत आदिकालीन कला है, जिसका प्रादुर्भाव सृष्‍टि रचना के साथ ही हो चुका था। ऐतिहासिक दृष्‍टि से देखा जाए तो भारतीय संगीत का इतिहास आरम्‍भ से ही उपलब्‍धियों का इतिहास रहा है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक की लंबी यात्रा करते हुए भारतीय संगीत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं जिसका एक विशाल रूप हमारे सामने प्रस्‍तुत है।

स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति के पश्‍चात अनेक राजनैतिक, सामाजिक परिवर्तन हुए। संगीत सामान्‍य जनता के बीच शिक्षण-संस्‍थाओं तथा संगीत सम्‍मेलनों के रूप में प्रतिष्‍ठित हो गया और संगीत का विकास अत्‍यधिक तेजी से होने लगा। आज मनुष्‍य के जीवन का हर एक क्षेत्र संगीत से प्रभावित है यही कारण है कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों की रुचि संगीत के प्रति बढ़ती जा रही है परन्‍तु संगीत की उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करने के पश्‍चात तथा उपाधि और प्रमाण पत्र एवं शोध आदि प्राप्‍त करने के बाद भी समस्‍या होती है कि वह अपने जीवन को किस राह पर लेकर जाए। शिक्षा पूर्ण होने के तुरन्‍त बाद वह अपनी नौकरी या व्‍यवसाय के प्रति चिंतित हो जाता है।

आज व्‍यवसाय मनुष्‍य का आवश्‍यक अंग है। व्‍यवसाय अर्थात्‌ समाज में रहने के लिए मनुष्‍य जीवन यापन का जो सहारा लेता है उसे व्‍यवसाय कहते हैं। मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी है और समाज की मर्यादाओं का पालन करने हेतु व समाज की धारा में प्रवाहमान होने हेतु मनुष्‍य को कोई व्‍यवसाय अवश्‍य अपनाना पड़ता है और संगीत अन्‍य विषयों की भांति समाज को व्‍यवसाय प्रदान करने का एक सबल माध्‍यम सिद्ध हुआ है। इससे स्‍पष्‍ट होता है कि संगीत जहां एक ओर हमें रंजकता व आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करता है वहीं संगीत हमें अर्थ प्राप्‍ति भी कराता है और इस अर्थ की प्राप्‍ति हमें संगीत को व्‍यवसाय के रूप में अपनाने से होती है। जीवन के अनेक क्षेत्रों में संगीत की विशेषताओं का व्‍यापक रूप सामने आया है। जीविका, अर्थोपार्जन तथा विशेष योग्‍यता की दृष्‍टि से संगीत के अनेक आयाम दृष्‍टिगत होते हैं जैसे संगीत, हाई स्‍कूल से लेकर स्‍नातकोत्तर एवं शोध स्‍तर तक के पाठ्‌यक्रम में संगीत को विषय के रूप में मान्‍यता, आकाशवाणी केन्‍द्रों का देश भर में संजाल, संगीत सम्‍मेलनों की परम्‍परा, सांस्‍कृतिक केन्‍द्र, दूरदर्शन, कैसेट्‌स एवं कैसेट प्‍लेयर के रूप में संगीत की सहज उपलब्‍धता, संगीतज्ञों की जीविका के लिये बहुआयामी माध्‍यम है परन्‍तु संगीत में परोक्षतः सकारात्‍मक परिस्‍थितियों के बावजूद वर्तमान संगीत एवं संगीतज्ञ के लिए समस्‍यायें बढ़ी हैं और नयी चुनौतियां सामने आ रही हैं। बदलते सामाजिक सांस्‍कृतिक परिवेश में संगीत की नई सम्भावनाएँ दृष्‍टिगोचर होती है। ऐसे में अनेक क्षेत्र हैं, जिनमें संगीत के माध्‍यम से विशेष योग्‍यता द्वारा मात्र मनोरंजन अथवा संगीत शिक्षक की अपेक्षा आर्थिक दृष्‍टि से कैरियर के लिए अनेक आकर्षक अवसर उपलब्‍ध हो सकते हैं जैसे -

1- शिक्षक - वर्तमान समय में विद्यालयों, शिक्षण-संस्‍थाओं तथा विश्‍वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में अनेक पदों पर कार्य कर सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त आजकल व्‍यक्‍तिगत शिक्षण अर्थात्‌ प्राइवेट ट्यूशन के द्वारा भी व्‍यवसाय किया जा सकता है।

2- मंच प्रदर्शक - मंच प्रदर्शन का व्‍यवसाय अत्‍यंत चकाचौंध पूर्ण व चित्ताकर्षक व्‍यवसाय है। मंच प्रदर्शन से जहां एक और कलाकार अपनी कला के माध्‍यम से श्रोताओं को आनन्‍दित करता है वहीं दूसरी ओर कला के माध्‍यम से जीविका को भी प्राप्‍त करता है। मंच प्रदर्शन द्वारा अनेक सामाजिक, धार्मिक व सांस्‍कृतिक समारोहों, मेलों आदि पर गज़ल़, भजन व गीतों आदि के गायक, वाद्य वादक व नर्तक अपनी कला कौशल का प्रदर्शन कर अपनी जीविकोपार्जन कर सकते हैं।

3- शास्‍त्रकार एवं प्रकाशक ः- संगीत शास्‍त्रकारों का संगीत कला के क्षेत्र में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। वर्तमान समय में अनेक संगीत शास्‍त्री, अपने ग्रंथों के प्रकाशन द्वारा धन अर्जित कर सकते हैं। ग्रंथों के प्रकाशन से लेखकों के अतिरिक्‍त प्रकाशक भी अच्‍छी आय अर्जित कर सकते हैं। संगीत की सौम्‍यता व माधुर्य में शास्‍त्रबद्धता का उत्‍कृष्‍ट व उचित समन्‍वय ये शास्‍त्रकार कुशलतापूर्वक कर सकते हैं।

4- पार्श्‍वसंगीत ः- पार्श्‍व संगीत का प्रयोग करने वाले स्‍थलों में चित्रपट व दूरदर्शन सबसे अधिक प्रचार में है। इसके अतिरिक्‍त अन्‍य कई स्‍थलों जैसे - दैनिक कार्यक्रमों के प्रारम्‍भ होने की धुन, समाचार प्रारम्‍भ होने से पूर्व की धुन व अनेक मनोरंजक कार्यक्रम, सिनेमा, नाटक, विभिन्‍न सांस्‍कृतिक आयोजनों में संगीत की व्‍यवसायिक सम्भावनाएँ प्रदर्शित होती हैं जिनमें अपनी क्षमता के अनुसार कार्य किया जा सकता है।

5- संगीत निर्देशन ः- संगीत निर्देशन का कार्यक्षेत्र अत्‍यंत विशाल है। संगीत की प्रत्‍येक विद्या में संगीतकार के लिए व्‍यवसाय की नयी राहें नज़र आती हैं। देशभक्‍ति गीत, वन्‍दना, पर्वोत्‍सव गीत, बाल-गीत, बंदिशें, सांस्‍कृतिक आयोजनों के गीत आदि सभी में संगीतकार की आवश्‍यकता अनुभव की जाती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो पैसा और प्रसिद्धि दोनों देता है। अतः इस कार्यक्षेत्र का चयन कर जीविकोपार्जन किया जा सकता है।

6- विज्ञापन संगीत ः- इस आधुनिक व्‍यावसायिक युग में विज्ञापन उद्योग आकाशवाणी केन्‍द्रों, दूरदर्शन व टेलीविजन के विभिन्‍न चैनलों में अपनी चरम सीमा पर पहुंचा हुआ है, जहां विज्ञापन के स्वरूप व स्‍वभाव के अनुसार संगीत का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हो रहा है। संगीत के विद्यार्थी भी उसमें अपनी सेवाएं दे सकते हैं। जिंगल, ऐनीमेटेड फिल्‍म कार्टून आदि में भी युवा संगीतकार अपना करियर बना सकते हं।

7- संगीत पत्रकार, समीक्षक व संपादक ः- कोई भी संगीतकार अपने कला कौशल के प्रदर्शन के पश्‍चात उसके लिए जन साधारण की प्रतिक्रिया अवश्‍य जानना चाहता है। इसके अतिरिक्‍त यदि कलाकारों के आलोचक भी हों तो उन्‍हें अपनी त्रुटियों का आभास भी हो जाता है। इन सब कार्यों की निष्‍पत्ति एक पत्रकार ही कर सकता है। आजकल स्‍थान-स्‍थान पर हो रहे कार्यक्रमों का अवलोकन करके उसकी आलोचनात्‍मक व्‍याख्‍या विभिन्‍न समाचारपत्रों, साप्‍ताहिक, पाक्षिक, मासिक, वार्षिक पत्रिकाओं में करके एक पत्रकार के रूप में जीविकोपार्जन किया जा सकता है। संगीत सम्‍मेलन, संगीत गोष्‍ठियां, विभिन्‍न संस्‍थाओं द्वारा आयोजित संगीत कार्यक्रमों के आयोजकों में संगीत समीक्षक के रूप में कार्य कर सकते हैं। ये पत्रकार, समीक्षक, आलोचक व सम्‍पादक आदि अर्थोपार्जन के साथ-साथ जन-कल्‍याण के विरुद्ध यदि कोई कार्य हो रहा हो तो उस पर तुरन्‍त अंकुश लगाने का कार्य भी कर सकते हैं।

8- वाद्य निर्माण व मरम्‍मत ः- वाद्यों के निर्माण के अभाव में सांगीतिक कार्यक्रमों की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती। असंख्‍य वाद्य निर्माता सांगीतिक वाद्यों के निर्माण द्वारा अर्थोपार्जन कर रहे हैं। आधुनिक समय में इलैक्ट्रॉनिक वाद्य जैसे इलेक्ट्रिक तानपुरा, इलेक्‍ट्रानिक लहरा इलेक्‍ट्रानिक तबला आदि का अत्‍यधिक प्रचलन है। इसके अतिरिक्‍त विदेशी यंत्र सिंथेसाइजर, इलेक्‍ट्रानिक ड्रम आदि विदेशी वाद्य यंत्र भी विशेष रूप से उल्‍लेखनीय है। इनके प्रचार से इनके निर्माताओं व वितरकों को अच्‍छे व्‍यवसाय के साधन उपलब्‍ध हुए हैं तथा आगे और भी साधन उपलब्‍ध हो सकते हैं।

9- आकाशवाणी (रेडियो)- आकाशवाणी में प्रदर्शन द्वारा आजीविका प्राप्‍ति के सशक्‍त माध्‍यम है। आकाशवाणी में वह आर्टिस्‍ट तथा स्‍टाफ आर्टिस्‍ट के रूप में रोज़गार प्राप्‍त कर सकता है। आजकल रेडियो में एएफ़.एम. का एक ऐसा नया दौर आया है जिसमें अनेक चैनल पर सांगीतिक कार्यक्रम दिए जाते हैं। इसमें DJ (Disc Jockey), RJ(Radio Jockey), VJ (Video Jockey) के पद पर कार्य किया जा सकता है। इसमें कलाकारों के साक्षात्‍कार, मंच प्रदर्शन, नई-नई एलबम आदि इन सबके बारे में जानकारी भी दी जाती है।

10- ध्‍वनि मुद्रण (रेकॉर्डिस्‍ट)- आज संगीत के क्षेत्र में तकनीक विकसित हो गयी है। संगीत के विभिन्न क्षेत्रों में इस नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। फलस्वरूप रेकॉर्डिंग के नये-नये तंत्र, नये-नये साधन उपलब्‍ध हैं। ऐसी तकनीक आत्‍मसात करना उपयुक्‍त हो सकता है। अपना निजी (Sound Recording Studio) हो तो वह आर्थिक प्राप्‍ति का अच्‍छा साधन है। संगीत के साथ विद्यार्थी अगर ये तकनीक सीख सकेगा, तो दुनिया में उसे बहुत सारे अवसर उपलब्‍ध होंगे।

11- संगीत विपणन ः- संगीत विपणन पक्ष आज सबसे आवश्‍यक है क्‍योंकि किसी भी बात की लोकप्रियता उसके मार्केटिंग पर ही आधारित होती है। आज चाहे शास्‍त्रीय संगीत, लोक संगीत, सुगम संगीत, सूफी संगीत या भक्‍ति रचनायें हो, सभी कुछ बहुत लोकप्रिय हो रहा है, हजारों की संख्‍या में लोग इस संगीत को सुनने के लिए पहुंचते हैं। हमारे मेधावी विद्यार्थी इस क्षेत्र की सम्‍भावनाओं को समझकर अपने संगीत कौशल का प्रयोग कर सकते हैं और इसे जीविकोपार्जन का मार्ग बना सकते हैं।

12- वेबसाइट ः- वेबसाइट हमारे पारम्‍परिक संगीत में शिक्षित युवा वर्ग की जीविका का एक अपूर्व साधन बन सकता है। विश्‍व भर में भारतीय संगीत के प्रति रुझान बढ़ रहा है, इसे सीखने व समझने की उत्‍सुकता बढ़ रही है। वेबसाइट के माध्‍यम से भारतीय संगीत की सम्‍पूर्ण जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है तथा विदेशों तक भी पहुंचायी जा सकती है। इस प्रकार इस क्षेत्र को भी व्‍यवसाय के रूप में अपनाया जा सकता है।

13- संगीत चिकित्‍सा ः- संगीत को आरोग्‍य दायिनी शक्‍ति कहा गया है। संगीत जहां मनुष्‍य को मानसिक शांति प्रदान करता है, उसे तनावमुक्‍त करता है वहीं उसे इस क्षेत्र में व्‍यवसाय की राह भी दिखाता है। विदेशों में म्‍यूजिक थैरेपी की बहुत दिशाएं खुली हुई हैं परन्‍तु हमारे यहां इस क्षेत्र में संकुचित दायरा है । आज को युवा पीढ़ी इस क्षेत्र में अपनी किस्‍मत को आजमा सकती है। वर्तमान में संगीत चिकित्‍सा से सम्‍बन्‍धित शिक्षा ग्रहण करके विद्यार्थी Hospitals, general, Psychiatric schools, outpatient clinics, mental health centers, Nursing homes स्‍थानों पर नियुक्‍त होकर संगीत व्‍यवसाय कर सकते हैं।

उपर्युक्‍त कार्यों के अलावा संगीत के क्षेत्र में और भी व्‍यवसायिक सम्भावनाएँ हो सकती हैं जैसे संगीत नाटिका, ऑपेरा, सहगान, समूहगान, संगीत प्रेक्षागृह, तकनीक, ध्‍वन्‍यांकन प्राविधिक अभियान्‍त्रिक, कम्‍प्‍यूटर, उच्‍चानुशीलन, उद्‌घोषक, फ्‍यूजन म्‍यूजिक, बच्‍चों की शिक्षा में संगीत का प्रयोग, गीत-बन्‍दिशों का स्‍वरों मं बांधना (कम्‍पोजीशन), संगीत द्वारा श्रमिकों की कार्यक्षमता, उत्‍पादन में वृद्धि आदि के रूप में संगीत की नवीन व्‍यवसायिक सम्‍भावनाएं सामने आ रही हैं। संगीत सुनने, सीखने, सुरक्षित रखने की तकनीक में बड़ा सुधार हुआ है, सुविधायें सुलभ हो गयी है। ऐसा परिवेश निर्मित हो चुका कि नये परिवेश, नयी सम्‍भावनाओं के कारण भारतीय संगीत अनेकानेक विशेषताओं से समृद्ध होता जायेगा तथा अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण भारतीय संगीत न केवल अद्वितीय बल्‍कि शाश्‍वत रहेगा।

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भूलोक पर जन्‍मे समस्‍त जीव धारियों में मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण उसे उदर शान्‍ति के अतिरिक्‍त आवास, वस्‍त्रादि व आस पास के परिवेश में हो रहे नित नए परिवर्तनों के अनुरूप स्‍वयं को परिवर्तित करना भी आवश्‍यक होता है जिससे वह समाज की धारा में प्रवाहमान हो पाए। इन आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु मानव कुछ न कुछ क्रियाकलाप करता है परन्‍तु वह जितने भी यत्‍न प्रयत्‍न कर ले अपनी समस्‍त सामाजिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु उसे आदान-प्रदान की आवश्‍यकता पड़ती है। उदाहरण के लिए एक किसान अनाज उगाकर अपनी उदर अग्‍नि को शान्‍त करने की व्‍यवस्था कर लेता है परन्‍तु समाज में रहने के लिए उसे अन्‍य वस्‍तुएँ भी चाहिए जैसे वस्‍त्र की आवश्‍यकता उसे जुलाहे के पास ले जाएगी, निवास स्‍थान की आवश्‍यकता उसे ग्रह निर्णायकों के पास ले जाएगी और इसी प्रकार जुलाहे को वस्‍त्र के अतिरिक्‍त अन्‍य वस्‍तुओं का अभाव उसे अनेक उत्‍पादकों के पास ले जाता है।

इन सभी कारणों के परिणाम स्‍वरूप ही ‘व्‍यवसाय' का जन्‍म हुआ प्रतीत होता है। आधुनिक युग में ‘व्‍यवसाय' मनुष्‍य के जीवन का आवश्‍यक अंग है, तथा व्‍यवसाय जीवन की गति भी है। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के साथ वह स्‍वभाविक रूप से जुड़ा हुआ है प्रयत्‍नपूर्वक भी उसे जीवन से विलंग नहीं किया जा सकता।

भारतीय आद्य चिन्‍तकों ने जीवन के प्रत्‍येक क्रम व गति को ‘व्‍यवसाय' कहा है अर्थात जीवन का व्‍यवहार व्‍यवसाय से रहित नहीं हो सकता। इस सृष्‍टि की जड़-चेतना व सत्ता व्‍यवसाय के अवलम्‍ब पर ही एक-दूसरे से ग्रन्‍थित है व सृष्‍टि क्रम को एकरूपता प्रदान किए हुए है व्‍यवसाय को कर्म की संज्ञा भी इसीलिए दी जा सकती है क्‍योंकि बिना व्‍यवसाय के मनुष्‍य जीवित नहीं रह सकता। हम जगत में जो कुछ भी कर्म करते हैं। वह सब ‘व्‍यवसाय' ही है चाहे कला हो, समाज हो, सेवा हो, राजनीतिक क्रिया कलाप अथवा धनोपार्जन ... ये सभी व्‍यवसाय के ही रूप हैं।[1] व्‍यवसायों की दुनिया बहुत जटिल है। इनके क्षेत्र में लगभग 80 हजार व्‍यवसाय आते हैं और प्रत्‍येक व्‍यवसाय के अन्‍तर्गत अनेक कार्य आते हैं।

आधुनिक समय में सामान्‍य जीवन इस सीमा तक जटिल हो चुका है कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को समाज में रहते हुए अपने दैनिक जीवन की आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु कोई न कोई व्‍यवसाय अवश्‍य अपनाना पड़ता है। इसीलिए संगीत साधना में लीन व्‍यक्‍ति भी इन नैतिक कठोरताओं के व्‍यास से बाहर पग नहीं रख सकता अर्थात्‌ उसके लिए भी न्‍यूनाधिक रूप में जीविकोपार्जन करना अति आवश्‍यक होता है।

Witness thefact that in lords prayer the first petition is for daily bread no one can covership God or love his neighbour on an empty stomach.[2]

इसी कारण संगीत जैसी पवित्रा संवेदात्‍मक व अलौकिक आनन्‍द प्रदान करने वाली ललित कला को भी व्‍यवसायों की श्रृंखला में सम्‍मिलित होना पड़ा।

संगीत जिस प्रकार आध्‍यात्‍मिकता व रंजकता के क्षेत्र में अपना लक्ष्‍य व उपादेयता रखता है उसी प्रकार व्‍यवसायिक क्षेत्र में भी इसका अपना महत्‍व है। कहने का तात्‍पर्य है कि संगीत जहां एक ओर हमें रंजकता व आध्‍यात्‍मिकता की ओर अग्रसर करता है वहीं संगीत हमें अर्थ प्राप्‍ति भी कराता है और इस अर्थ की प्राप्‍ति हमें संगीत को ‘व्‍यवसाय' के रूप में अपनाने से होती है। व्‍यक्‍ति विशेष के व्‍यवसाय का उसके जीवन में महत्‍व केवल इसीलिए नही होता कि उसके जीवन का अधिकांश समय उसके व्‍यवसाय संबंधी क्रिया-कलापों में व्‍यतीत होता है बल्‍कि उसका महत्‍व सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से भी उसके जीवन में होता है क्‍योंकि व्‍यवसाय केवल जीविका उपार्जित करने का साधन ही नहीं है अपितु व्‍यक्‍ति विशेष के जीने का ढंग एवं उसके द्वारा समाज के लिए दिए गए योगदान का प्रतीक भी होता है। व्‍यवसाय मानव विशेष के विचार, प्रवृत्तियों, कौशल, जीवन शैली, जीवन स्‍तर व समाज में उसके योगदान को दर्शाता है उदाहरण के लिए यदि किसी व्‍यक्‍ति से किसी बाह्य स्‍थल पर उसका नाम उसके पिता का नाम और पिता का व्‍यवसाय जान लिया जाए तो उसकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक स्‍थिति तथा उसके सामर्थ्‍य का अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार व्‍यवसाय सीधे ही व्‍यक्‍ति की सामाजिक स्‍तर से संबंधित होता है। व्‍यक्‍ति को अपनी पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक स्‍थिति, शारीरिक, मानसिक सामर्थ्‍य व रुचि के अनुरूप ही व्‍यवसाय अपनाना चाहिए इस कारण संगीत प्रेमी, संगीत के विद्यार्थी आदि के लिए इसे ही व्‍यवसाय के रूप में अपनाना उचित भी है।[3] केवल व्‍यवसाय विशेष के प्रति इच्‍छा रखना ही पर्याप्‍त नहींं होता। जब महान वैज्ञानिक जगदीश चन्‍द्र बोस से उनकी सफलता का रहस्‍य पूछा गया तो उन्‍होंने कहा कि -

"The success depends 99% on persuasion and only 1% on inspiration."[4]

आज विश्‍व में संगीत व्‍यवसाय का अधिकाधिक विकास ही नहीं हो रहा अपितु वह धीरे-धीरे जटिल भी होता जा रहा है। संगीत व्‍यवसाय को सफलता के साथ चलाना एक आसान कार्य नहीं है। इसे सफलता के साथ चलाने के लिए निम्‍नलिखित मूल मंत्रों का ध्‍यान में रखना अति आवश्‍यक है ः-

1. साहस ः व्‍यवसाय एक अत्‍यंत साहस का कार्य है। प्रत्‍येक संगीत के व्‍यक्‍ति में वे सब गुण विद्यमान नहीं होते जो किसी कुशल व्‍यवसायी संगीतज्ञ में होने चाहिए। संगीत एक ऐसा विषय है जिसके व्‍यवसाय में अत्‍यधिक रूप से पूंजी खर्च होती है। केवल वे ही लोग व्यवसाय को प्रारम्‍भ करने की चेष्‍टा करते हैं जो अपनी पूंजी को दांव पर लगा सकते हैं। साहसी में यही गुण होता है कि वह भविष्‍य में आने वाली परिस्‍थितियों को पहले से ही अनुमानित कर लेता है।[5]

2- सुपरिभाषित उद्देश्‍य ः- किसी भी व्‍यवसाय को सफलता के साथ चलाने के लिए यह परम आवश्‍यक है कि उसके उद्देश्‍यों को स्‍पष्‍ट एवं निश्‍चित रूप से निर्धारित किया जाए बिना सुनिश्‍चित उद्देश्‍य के किसी भी व्‍यवसाय को सफलता के साथ नहीं चलाया जा सकता।[6] सर्वप्रथम व्‍यक्‍ति को अपनी अभिरुचि के अनुसार अपना शिक्षण पूर्ण करना चाहिए। कोई भी व्‍यवसाय करने से पहले उसे यह ध्‍यान रखना चाहिए कि वह किस क्षेत्र में समर्थ है उसका क्‍या उद्देश्‍य है जैसे ः-संगीतज्ञ, शिक्षक, नृतक, Music Arranger, शास्‍त्रकार, पत्रकार, मार्केटिंग, संगीत चिकित्‍सक, पार्श्‍व संगीत आदि जिस दिशा में भी वह कदम रखे उसके उद्देश्‍य सुपरिभाषित होने चाहिए।

3- उचित योजना ः- उद्देश्‍यों को सुनिश्‍चित करने के उपरान्‍त उन उद्देश्‍यों की पूर्ति हेतु उचित योजना तैयार की जानी चाहिए। योजना का तात्‍पर्य भविष्‍य के बारे में विचार करना, घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना, उनके अनुसार कार्यक्रम तैयार करना जैसे कोई संगीत संस्‍था खोलना, संगीत विद्यालय कोई निजी संस्‍था खोलना आदि उनमें कितने विद्यार्थी हों, कितने वाद्य, विद्यार्थियों के लिए क्‍या-क्‍या सुविधाएं होनी चाहिए आदि सभी मामलों के लिए एक उचित योजना तैयार करना और उसके अनुरूप व्‍यवसाय चलाना उसकी सफलता के लिए अति आवश्‍यक है।[7]

4- सुदृढ़ संगठन ः- संगीत व्‍यवसाय की सफलता इसके संगठनों के ऊपर भी बहुत कुछ निर्भर करती है। प्रत्‍येक व्‍यवसाय में आवश्‍यक व्‍यक्‍तियों की नियुक्‍ति करना उन्‍हें उचित स्‍थानों पर नियुक्‍त करना, उनमें कार्यों का समुचित वितरण करना, उनके अधिकारों को निश्‍चित करके सौंपना, संगीत के प्रत्‍येक क्षेत्र में आवश्‍यक व्‍यक्‍तियों की नियुक्‍ति करना जैसे - गायक, वादक, नर्तक उन्‍हें उचित स्‍थानों पर नियुक्‍त करके उनके आपसी सम्‍बन्‍धों को परिभाषित करना, उनमें आपस में परस्‍पर समन्‍वय तथा संतुलन स्‍थापित करना अति आवश्‍यक है।

5- व्‍यवसाय का स्‍थानीकरण ः- संगीत के किसी भी व्‍यवसाय की सफलता के लिए यह भी आवश्‍यक है कि उसे ऐसी जगह पर स्‍थापित किया जाए कि वहां से उसे सफलतापूर्वक संचालित किया जा सके। अनेक व्‍यवसायिक संस्‍थाएं या तो असफल हो जाती हैं या अधिक उन्‍नति नहीं कर पाती क्‍योंकि वे स्‍थानीकरण पर विशेष ध्‍यान नहीं देती। यदि व्‍यवसाय का स्‍थान (location) उचित नहीं है तो ग्राहकों को आकर्षित करने में कठिनाई होगी। इसलिए इन बातों पर समुचित ढंग से विचार करके ही उचित निर्णय लेना चाहिए।

6- ग्राहक संतुष्‍टि ः-

किसी भी व्‍यवसाय का मुख्‍य उद्देश्‍य लाभ कमाना है, लेकिन इसे ग्राहकों की संतुष्‍टि के बिना प्राप्‍त नहीं किया जा सकता। इसीलिए व्‍यवसायी को अपने ग्राहकों की रुचि, पसन्‍द और आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखकर ही सेवाओं का उत्‍पादन करना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि कोई व्‍यक्‍ति सुगम संगीत में रुचि रखता है तो उसे भजन, गीत, गज़ल़ आदि की शिक्षा देनी चाहिए। यदि शास्‍त्रीय संगीत में रुचि है तो शास्‍त्रीय संगीत से सम्‍बन्‍धित शिक्षा देनी चाहिए क्‍योंकि इस तरह से ग्राहक की संतुष्‍टि तो होगी ही साथ ही ग्राहक की संगीत के प्रति रुचि और अधिक बढ़ जाएगी।

7- व्‍यवसाय में निरंतरता ः- व्‍यवसाय नियमित रूप से निरन्‍तर सम्‍पादित होने वाला कार्य है। क्षणिक लाभ की भावना से प्रेरित होकर किया गया कोई कार्य व्‍यवसाय के अध्‍ययन के क्षेत्र से बाहर माना जाएगा उदाहरणार्थ यदि किसी व्‍यक्‍ति के पास कोई पुराना वाद्य है और उसे बेचकर वह लाभ अर्जित कर लेता है तो उसके इस कार्य को व्‍यवसाय की संज्ञा कदापि नहीं दी जा सकती किन्‍तु यदि वही व्‍यक्‍ति उन्‍हीं वाद्यों को नियमित रूप से क्रय कर बेचने का कार्य प्रारम्‍भ कर दे तो उसे हम व्‍यवसाय कहेंगे।

8- पर्याप्‍त वित्त ः- वित्त किसी भी व्‍यवसाय का निःसंदेह जीवन रक्‍त है। बिना पर्याप्‍त वित्त अथवा पूंजी के कोई भी व्‍यवसाय अपने उद्देश्‍य की पूर्ति नहीं कर सकता यदि पूंजी कम होगी तो भी कठिनाई होगी और यदि पूंजी अधिक होगी तो भी यह उचित नहीं है। वित्त के बिना किसी भी व्‍यवस्‍था को संचालित करना असम्‍भव है। वित्त की मात्रा निर्धारित करते समय व्‍यवसाय के थोड़े समय तथा लम्‍बे समय के दोनों ही उद्देश्‍यों को ध्‍यान में रखना चाहिए और उसी के अनुसार स्‍थायी पूंजी (Fixed Capital) तथा चालू पूंजी (Working Capital) की मात्रा निश्‍चित करनी चाहिए।

9- कुशल प्रबन्‍ध और नेतृत्‍व ः- व्‍यवसाय की सफलता के लिए आवश्‍यक यदि उपरोक्‍त सभी तत्‍व विद्यमान हों किन्‍तु उसका प्रबन्‍धक अकुशल हो तो व्‍यवसाय कभी भी सफल नहीं हो सकता। कभी-कभी प्रबन्‍धक संगीत की थोड़ी बहुत शिक्षा लेकर अपने विद्यार्थी को वही रागों की कुछ अथवा सीमित शिक्षा देते हैं। उन्‍हें विषय की गहराई ना समझाते हुए केवल व्‍यवसायिक दृष्‍टि से ही सिखाते हैं जिससे विद्यार्थी सम्‍पूर्णता से विषय का अध्‍ययन नहीं कर पाते। इसलिए व्‍यवसाय छोटा हो या बड़ा उसकी सफलता बहुत कुछ उसके प्रबन्‍धक की कुशलता पर निर्भर करती है यदि प्रबन्‍धक कुशल है तो वह एक असफल व्‍यवसायिक संस्‍था को सफल व्‍यवसायिक संस्‍था में आसानी से बदल सकता है।[8]

10- अनुसंधान और विकास की गतिविधियां ः- आज संगीत के प्रतिस्‍पर्द्धात्‍मक व्‍यवसायिक युग में यह अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है कि संगीत के विभिन्‍न क्षेत्रों में शोध करने की समुचित व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए। कोई भी व्‍यवसाय तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि निरन्‍तर अनुसंधान और विकास द्वारा उसे पहले से श्रेष्‍ठतर बनाने का प्रयास न किया जाए। संगीत व्‍यवसायी को यह प्रयत्‍न करना चाहिए कि संगीत कला में श्रेष्‍ठता का विकास हो और ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं में सुधार हो। संगीत व्‍यवसाय की अधिकतम सफलता के लिए हर सम्‍भव क्षेत्र में अभिनव परिवर्तन की आवश्‍यकता होती है और यह शोध के द्वारा ही सम्‍भव है।

निःसंदेह यह कटु सत्‍य है कि एक संगीत साधक को समाज की कठोरताओं का सामना करते हुए अर्थोपार्जन के प्रश्‍न को स्‍मृति में रखना पड़ता है परन्‍तु इस क्रिया में अर्थात्‌ अपने कला कौशल का व्‍यवसाय करते हुए कला के आदर्शों व गरिमा के स्‍तर को सदैव दृष्‍टिगत रखना चाहिए।[9] कहने का तात्‍पर्य यह है कि यदि कोई संगीतकार अपनी कला का प्रयोग जीविकोपार्जन के उद्देश्‍य से करता है तो कला के नैतिक मूल्‍यों, मर्यादाओं, मान, प्रतिष्‍ठा व गौरव आदि के स्‍तर को गगनोमुखी रखना अर्थात्‌ संगीत कला का उत्तरोत्तर विकास करना उसका परम कर्त्तव्‍य है।


[1] संगीत मासिक पत्रिका, अप्रैल 1968, पृ. 41

[2] व्‍यवसायिक व औद्योगिक संगठन,एस.सी सक्‍सेना, अध्‍याय-1, पृ. 2

[3] भारतीय संगीत ः शिक्षा और उद्देेश्‍य, डॉ. पूनम दत्ता, पृ. 163

[4] भारतीय संगीत ः शिक्षा और उद्देश्‍य, डॉ. पूनम दत्ता, पृ. 163

[5] व्‍यवसायिक संगठन, मुकेश तरहन, पृ. 3

[6] व्‍यवसाय संगठन एवं प्रबन्‍ध, जगदीश प्रकाश, पृ. 11

[7] व्‍यवसायिक संगठन, मुकेश तरहन, पृ. 19

[8] व्‍यवसायिक व औद्योगिक संगठन, एस.सी. सक्‍सेना, पृ. 14

[9] संगीत मासिक पत्रिका, अप्रैल 1968, पृ. 41

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चित्र – साभार – एबीसी न्यूज

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कला एवं विज्ञान के समन्‍वय से संगीत चिकित्‍सा का प्रचलन प्रारम्‍भ होता है। संगीत एक कला है और चिकित्‍सा एक विज्ञान है। यह एक वैकल्‍पिक चिकित्‍सा पद्धति है जिसमें किसी भी व्‍यक्‍ति के रोगों की चिकित्‍सा संगीत के माध्‍यम से की जाती है।

संगीत में निहित ध्‍वनि के विभिन्‍न स्‍वरूपों में आकर्षक ध्‍वनियों से रचित संगीत का सीधा संबंध मानव मन के सूक्ष्‍म एवम्‌ कोमल संवेगों से है। ध्‍वनि तरंगें संवेगात्‍मक रूप से अपने प्रभाव से पीड़ित व्‍यक्‍ति के विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। ध्‍वनि का विशेष रूप से किया गया संघात रासायनिक परिवर्तन पैदा करता है। इस प्रकार विशिष्‍ट ध्‍वनियों के मिश्रण से निर्मित संगीत विभिन्‍न प्रकार के भावों का निर्माण कर मानव मन व शरीर पर गहरा असर करता है। इस प्रभावोत्‍पादक क्षमता का प्रयोग जब चिकित्‍सा के रूप में शारीरिक एवम्‌ मानसिक संतुलन को व्‍यवस्‍थित करने के उद्देश्‍य से किया जाता है तो यह प्रभावात्‍मक प्रक्रिया 'Music Therapy' अथवा संगीत चिकित्‍सा के नाम से जानी जाती है।

संगीत जहां मनुष्‍य को मानसिक शांति प्रदान करता है, उसे तनाव मुक्‍त कर उसके अनेक रोगों को दूर करता है वहीं उसे व्‍यवसाय की भी नई राह दिखाता है। भारतीय संस्‍कृति में रोग निवारण की दृष्‍टि से संगीत के प्रयोग की प्राचीनता यह सिद्ध करती है कि संगीत की अपरिमित प्रयोगात्‍मक शक्‍ति, उसकी व्‍यापकता एवम्‌ प्रभावोत्‍पादकता की नींव जितनी सुदृढ़ है उतनी ही व्‍यवसाय की सम्‍भावनाओं से परिपूरित है। चिकित्‍सा एवं संगीत दोनों ज्ञान प्रणालियों को समन्‍वित कर व्‍यवसाय करने की अनेक सम्‍भावनाएं हैं। भारतवर्ष में संगीत चिकित्‍सा से संबंधित कोई विशेष साहित्‍य पुस्‍तकें आदि उपलब्‍ध नहीं हैं। केवल अनुभवों पर आधारित लेख ही पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलते हैं जोकि संगीत चिकित्‍सा का प्रचार-प्रसार करने में सक्षम नहीं हैं जबकि जन साधारण ‘संगीत चिकित्‍सा' विषय का ज्ञान प्राप्‍त कर अपने-अपने रोगानुसार स्‍वयं अपनी सांगीतिक चिकित्‍सा कर सकता है तथा संगीत चिकित्‍सा को व्‍यवसाय के रूप में अपना कर दूसरों को भी रोगों से मुक्‍त कर सकता है। क्‍योंकि यह चिकित्‍सा पद्धति बिना किसी दुष्‍परिणाम के समस्‍त प्राणियों जीव-जन्‍तुओं, पेड़-पौधों पर अपना स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक प्रभाव उत्‍पन्‍न कर स्‍वास्‍थ्‍य लाभ प्रदान करती है। इतनी विशेषताओं को आत्‍मसात करने के बावजूद भी संगीत चिकित्‍सा को व्‍यवसाय के क्षेत्र में स्‍वतंत्र रूप से सफलता प्राप्‍त नहीं हुई है क्‍योंकि संगीत चिकित्‍सा को लेने वाले तथा अन्‍य चिकित्‍सक इसे एक स्‍वतंत्रता व्‍यवसाय रूप देने के लिए प्रयासरत नहीं है। संगीत चिकित्‍सा को व्‍यवसाय के क्षेत्र में सफलता दिलाने के लिए सबल प्रयास करने होंगे यदि संगीत चिकित्‍सा को एक अदम्‍य शक्‍ति मानकर कार्य किया जाए तथा इसके व्‍यवसायिक पक्ष पर अधिक कार्य किया जाए तो निश्‍चय ही सफलता प्राप्‍त होगी।

भारतीय संगीत चिकित्‍सा ही मुख्‍य रूप से संगीत चिकित्‍सा विषय की जनक है। वर्तमान काल में सन्‌ 1993 से प्रारम्‍भ हुई ‘‘भारतीय संगीत चिकित्‍सा एवं अनुसंधान परिषद'' में संगीत चिकित्‍सा विभिन्‍न वैज्ञानिक दृष्‍टिकोणों को ध्‍यान में रखकर संगीत के माध्‍यम से विभिन्‍न रोगों के मरीजों पर जो प्रयोग किए जा रहे हैं वे बहुत ही चमत्‍कारी तथा सम्‍भावनाओं से परिपूर्ण हैं।[1]

आजकल प्रायः सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में और अन्‍य प्रचार माध्‍यमों में संगीत चिकित्‍सा विषय में हो रहे शोधकार्य एवं प्रयोगों के समाचार और लेख पढ़ने को मिलते हैं लेकिन ये सभी विदेशों में हो रहे प्रयोग और शोधकार्य के उदाहरण देते हुए नहीं थकते।

डॉ. भास्‍कर खांडेकर जी के अनुसार - ‘‘संगीत चिकित्‍सा सिर्फ लेख लिखने के तौर पर अपनाने का विषय ही नहीं है। विदेशों में तो संगीत चिकित्‍सा को सहर्ष अपनाया जा चुका है। हमारे देश में थोड़ी जागरूकता की कमी है। संगीत चिकित्‍सा में संगीत के विद्यार्थियों के लिए स्‍वरोजगार की पूर्ण सम्भावनाएँ हैं।''[2]

विदेशों में संगीत चिकित्‍सा द्वारा व्‍यवसाय हमारे देश की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध है एवम्‌ वहां इसे अन्‍य चिकित्‍सा पद्धतियों के बराबर का स्‍तर भी प्राप्‍त है। साथ ही साथ वहां संगीत चिकित्‍सक पृथक-पृथक होते हैं जो संगीत द्वारा चिकित्‍सा करते हैं हमारे देश में भी इस दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए। विभिन्‍न आयुवर्ग के लोगों के लिए भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के संगीत तैयार करने चाहिए। इस संबंध में किए गए प्रयोग संगीत चिकित्‍सा के व्‍यवसाय में काफी लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। जैसे कि ‘चीन में एक नई म्‍यूजिक इलैक्‍ट्रोथेरेपी' (संगीत विद्युतीय चिकित्‍सा पद्धति) का प्रयोग आरम्‍भ हो चुका है। इस पद्धति द्वारा कुछ विशेष रोगों को दूर करने में उच्‍च सफलता प्राप्‍त हुई। इस पद्धति में एक्‍यूप्रेशर बिंदुओं के बीच विद्युत प्रवाहित की जाती है तथा साथ ही साथ उसे संगीत भी सुनाया जाता है ... उपरोक्‍त प्रयोगों के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि संगीत चिकित्‍सा को किसी भी अन्‍य चिकित्‍सा पद्धति के साथ उपयोग करने पर रोगी को जल्‍द रोग मुक्‍त किया जा सकता है। इस प्रकार विभिन्‍न चिकित्‍सा पद्धतियों को संगीत के साथ जोड़कर रोगों का उपचार और भी अधिक प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता है।[3]

संगीत का सम्‍बन्‍ध मनोभावों से है तथा मनुष्‍य की समस्‍त शारीरिक क्रियाएं मन से जुड़ी हैं। संगीत न केवल मनुष्‍य अपितु प्रत्‍येक जगत प्राणी के स्‍वास्‍थ्‍य को सुप्रभावित करता है। आज संगीत की आरोग्‍य दायिनी शक्‍ति पर निरन्‍तर शोध किए जा रहे हैं व इसके लाभकारी परिणाम भी हमारे समक्ष आए हैं। डॉ. कविता चक्रवर्ती के अनुसार - ‘‘मनोवैज्ञानिकों का ऐसा विश्‍वास है कि संगीत में अच्‍छी औषधियों के मुकाबले रोग-विनाशक गुण हैं। अमेरिका के लगभग पांच सौ से अधिक डाक्‍टर अपने रोगियों की चिकित्‍सा संगीत द्वारा करने का प्रयास कर रहे हैं। इस सम्‍बन्‍ध में सफलता भी मिली है। उन्‍होंने पता लगाया है कि खास तरह की लय-ध्‍वनि तथा वाद्ययंत्र रोगों के नियंत्रण में सहायक होते हैं।[4] संगीत द्वारा हिस्‍टीरिया जैसे भयानक रोगों के उन्‍मूलन के उदाहरण भी हमारे समक्ष आए हैं। ‘पागलों के अस्‍पताल' (Mental Hospital) में संगीत चिकित्‍सा पद्धति (Musical Therapy) काम में लाते हैं। असामान्‍य व्‍यक्‍ति में मानसिक बीमारियां अधिकतर काल्‍पनिक होती हैं। जिन व्‍यक्‍तियों में ये बीमारियां अधिक हैं उन्‍हें व्‍यवसायिक उपचार (Occupational Therapy) दी जाती है। इस चिकित्‍सा में व्‍यक्‍ति का ध्‍यान दूसरी तरफ किया जाता है। यह नृत्‍य व गीत सीख सकता है।[5]

इस प्रकार संगीत चिकित्‍सा पद्धति से अनेक रोगों का उपचार संभव है जैसे- डायबिटीज, ब्‍लड-प्रेशर, हायपरटेंशन, अनिद्रा, अस्‍थमा, सिरदर्द, कुछ अंशों में माइग्रेन, अपचन, कब्‍ज, हृदय रोग नियंत्रण, यौन मनोरोग, मनःस्‍ताप, मद्यपान और नशीले पदार्थों की आदत से मुक्‍ति मनोरोग, मानसिक भेदता आदि तथा व्‍यक्‍ति में एकाग्रता, इच्‍छाशक्‍ति बढ़ाने, मानसिक संतुलन, कार्यकुशलता, स्‍मरणशक्‍ति एवं अन्‍य दिमागी शक्‍तियों को बढ़ाने के लिए भी संगीत चिकित्‍सा के प्रयोग लाभदायक सिद्ध हुए हैं।[6]

गर्भवती महिलाओं पर भी संगीत के प्रभाव से संबंधित अनेक अनुसंधान किए गए है। इस दिशा में अभी और भी कार्य किया जा कसता है। डॉ. भास्‍कर खांडेकर के अनुसार - ‘‘गर्भवती महिलाओं के लिए पूरे नौ माह का कोर्स तैयार करके करीब 26 महिलाओं पर किया गया परीक्षण सफल रहा और अन्‍य रोगों के अनेक मरीजों पर भी संगीत चिकित्‍सा का प्रयोग परीक्षण जारी है अतः इस प्रकार के कोर्स तैयार करके भी संगीत चिकित्‍सा द्वारा व्‍यवसाय संभव है।

ऐसी भी मान्‍यता है कि संगीत से स्‍वभाव को परिष्‍कृत करने की शक्‍ति होती है। इससे कल्‍पना, सृजनशक्‍ति तथा रचनात्‍मकता बढ़ती है। जीवन का दृष्‍टिकोण परिवर्तित हो जाता है। व्‍यक्‍ति का एकाकीपन दूर होकर आत्‍मविश्‍वास बढ़ता है तनाव, भय, घबराहट, थकान आदि दूर होते हैं। धैर्य और सहिष्‍णुता का संचार होता है।

ऐसी अलौकिक अद्‌भुत क्षमता सम्‍पन्‍न संगीत को जीवन का अभिन्‍न अंग बना लेने पर हम तन मन से स्‍वस्‍थ रह सकेंगे। पर यहां भी ध्‍यान देना जरूरी है कि कौन सा संगीत किस रोगी को और कितनी मात्रा में प्रभावशाली रहेगा।[7] भारतीय शास्‍त्रीय संगीत में अनेक प्रकार के राग होते हैं तथा प्रत्‍येक राग की अपनी अलग-अलग प्रकृति होती है। किसी भी रोग के लिए, किसी एक राग का निर्धारण नहीं किया जा सकता। किसी एक ही रोग के लिए अलग-अलग व्‍यक्‍तियों पर अलग-अलग रागों का प्रयोग हो सकता है। चिकित्‍सीय संगीत या राग का निर्धारण सिर्फ व्‍यक्‍ति परीक्षण करने के बाद ही निश्‍चित किया जाता है, अतः किसी भी राग या संगीत का प्रयोग चिकित्‍सक के निर्देशानुसार ही करें।

इसके अतिरिक्‍त संगीत चिकित्‍सा का महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि यह अन्‍य किसी उपचार प्रक्रिया में बाधक नहीं होती। संगीत चिकित्‍सा का प्रयोग किसी भी पद्धति के साथ भली प्रकार हो सकता है। यह एक सहायक (Supportive Treatment) के रूप में महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखती है।[8] दवाइयों के साइड इफेक्‍ट्‌स से बचने के लिए भी इसका प्रयोग किया जा सकता है।

आजकल बाजार में ‘संगीत चिकित्‍सा' या ‘‘म्‍यूजिक थैरेपी' या ‘‘मेडिटेशन म्‍यूजिक' के कैसेट भी उपलब्‍ध हैं। जिनका प्रयोग संगीत चिकित्‍सक के परामर्श करने के बाद ही करना चाहिए क्‍योंकि यह जरूरी नहीं कि इस तरह के कैसेट प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को लाभप्रद हो। इससे ज्ञात होता है कि संगीत चिकित्‍सा के व्‍यवसाय को सूक्ष्‍म रूप से अपनाया जा रहा है।[9]

संगीत द्वारा स्‍वास्‍थ्‍य वर्धन के क्षेत्र में अनेक शोध प्रयोग व परीक्षण किए जा रहे हैं परन्‍तु इसे व्‍यवहार में चिकित्‍सा के रूप में अपनाने हेतु जागरूकता अभी शैशवकाल में ही दिखाई देती है। हरिद्वार उ.प्र. में स्‍थित शान्‍तिकुंज के ब्रह्मवर्चस्‍व संस्‍थान सांगीतिक चिकित्‍सा के विषय में शोधकार्य कर रही है। इसके अतिरिक्‍त जर्मनी के डॉ. राल्‍क स्‍पिटगें के दर्द निवारक चिकित्‍सालय में नई दिल्‍ली में स्‍थित ‘शक्‍ति विकास प्रकल्‍प' के संस्‍थापक व अध्‍यक्ष ई. कुमार नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्‍थ एण्‍ड की डॉ. वी.एन. मंजुला आदि जैसे और अधिक संस्‍थान स्‍थापित किए जाए अर्थात संगीत द्वारा उपचार के संदर्भ में अधिक जागरूकता दिखाई जाए तो बिना किसी दुष्‍प्रभाव के असाध्‍य व्याधियों का निवारण हो सकता है।[10] तथा संगीत चिकित्‍सा को व्‍यावसायिक रूप से भी अपनाया जा सकता है।

इस विषय पर जबलपुर विश्‍वविद्यालय से सम्‍बन्‍धित डॉ. वि.वि. गोर कहते हैं - ‘‘स्‍वर चिकित्‍सा से रोग भी हटाये जा सकते हैं। इस कार्य में अब कलाकार और सरकार दोनों ‘कारों' को आगे बढ़ना चाहिए।[11]

संगीत चिकित्‍सा में व्‍यवसाय की अपार सम्भावनाएँ हैं। बशर्ते संगीत चिकित्‍सा का ज्ञान हो सिर्फ व्‍यवसाय की दृष्‍टि से ही कोई प्रयोग नहीं करना चाहिए। संगीत चिकित्‍सा की शिक्षा के लिए देश के विभिन्‍न कालेज महाविद्यालयों और विश्‍वविद्यालयों में संगीत चिकित्‍सा को विषय के रूप में रखा जाना चाहिए जिसमें संगीत चिकित्‍सा से सम्‍बन्‍धित कोर्स करवाए जाए जिनमें संगीत चिकित्‍सा से सम्‍बन्‍धित शिक्षकों व अध्‍यापकों की नियुक्‍ति की जा सकें।

मद्रास के अपोलो अस्‍पताल में संगीत चिकित्‍सा विभाग है जिसमें संगीत चिकित्‍सा की शिक्षा दी जाती है। यह Under Graduate Course तीन साल का होता है जिसमें 6 सेमेस्‍टर होते हैं। एक साल में दो सेमेस्‍टर देने होते हैं तथा अंतिम सेमेस्‍टर में एक प्रोजेक्‍ट वर्क होता है जो 12 हफ्‍ते एक अस्‍पताल में रहकर पूरा किया जाता है। इस कोर्स की फीस 12,500 रुपये प्रति सेमेस्‍टर होती है।

इसके अतिरिक्‍त एक और कोर्स है जिसे Advanced Level Music Therapy Course कहते हैं। यह एक साल का होता है इसमें भी दो सेमेस्‍टर होते हैं तथा छः महीने में एक सेमेस्‍टर देना आवश्‍यक होता है। इसकी पात्रता मनोविज्ञान और शास्‍त्रीय संगीत में एम.ए. होनी चाहिए। इन दोनों विषयों के 4+4 थ्‍योरी पेपर होते हैं तथा दूसरे सेमेस्‍टर में एक प्रोजेक्‍ट वर्क होता है। इस कोर्स की फीस 30,000 रुपये प्रति सेमेस्‍टर है।[12] संगीत की उच्‍च शिक्षण पूर्ण करने पर कोई न कोई व्‍यवसाय अपनाना आवश्‍यक हो जाता है। व्‍यवसाय अर्थात्‌ उदर निर्वाह के साथ अन्‍य आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु किया जाने वाला ऐसा कार्य, जिससे धन प्राप्‍त किया जा सके।[13] संगीत चिकित्‍सा की विकास यात्रा का अवलोकन करने पर हम समझते हैं कि संगीत चिकित्‍सा में भी व्‍यवसाय के विभिन्‍न क्षेत्र खुले हो गये हैं।

1- Hospital : general, Psychiatric

2- Schools, special schools

3- Outpatient clinics

4- Mental health center

5- Nursing homes

6- Day centers

7- Correctional facilities

8- The Community

9- Hospices[14]

उपर्युक्‍त कार्यों के अलावा और भी कार्यक्षेत्रों की सम्भावनाएँ हो सकती हैं। स्‍वयं के संगीत चिकित्‍सा केन्‍द्र भी चलाये जा सकते हैं। इन सभी क्षेत्रों में व्‍यक्‍ति अपनी व्‍यक्‍तिगत कुशलता व चातुर्य समावेश कर अपनी रुचि अनुसार व्‍यवसाय प्राप्‍त कर सकते हैं।


[1] डॉ. भास्‍कर खांडेकर, संगीत चिकित्‍सा महत्‍वपूर्ण जानकारी, उद्‌ध्‍ृत -संगीत कला विहार,
मई 2005, पृष्‍ठ 38

[2] डॉ. भास्‍कर खांडेकर, संगीत चिकित्‍सा महत्‍वपूर्ण जानकारी, उद्‌ध्‍ृत -संगीत कला विहार,
मई 2005, पृष्‍ठ 38

[3] डॉ. सतीश वर्मा, संगीत चिकित्‍सा (एक शास्‍त्रीय अध्‍ययन), पृष्‍ठ 419

[4] भारतीय संगीत की मनोवैज्ञानिक पृष्‍ठभूमि, डॉ. कविता चक्रवर्ती, पृष्‍ठ 169

[5] वही, पृष्‍ठ 190

[6] संगीत ः रस. परंपरा और विचार, सं. ओमप्रकाश चौरसिया, पृष्‍ठ 284

[7] प्रोफेसर माया टांक, संगीत संकल्‍प, कितना सक्षम है संगीत रोगों के उपचार में, 2009
पृष्‍ठ 27

[8] प्रोफेसर माया टांक, कितना सक्षम है संगीत रोगों के उपचार में, उद्‌ध्‍ृत - संगीत
संकल्‍प, (जयपुर शाखा) 2009, पृष्‍ठ 27

[9] ओम प्रकाश चौरसिया, संगीत ः रस परंपरा और विचार, पृष्‍ठ 284

[10] भारतीय संगीत, शिक्षा और उद्देश्‍य, पूनम दत्ता, पृष्‍ठ 122

[11] वही पृष्‍ठ 122

[12] इंटरनेट से मिली जानकारी द्वारा प्राप्‍त

[13] डॉ. श्री मिलिया छापेकर, व्‍यवसाय के रूप में समाज, संगीत कला विहार, 2005, पृष्‍ठ
25

[14] इंटरनेट से मिली जानकारी द्वारा प्राप्‍त

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(चित्र – इमेजशेयर.वेब से साभार)

hasyotsav 2009

(तस्वीर में है माइक पर आशकरण अटल ,बाय़ें से असीम चेतन, मुकेश गौतम , बसंत आर्य, देवमणि पांडेय, गोविन्द राठी , कपिल जैन और रजनीकांत)

आज जब बाजार हमारे घर में घुस गया है और हर एक चीज सिर्फ मुनाफ़े के नजरिये से देखी जाती है वैसे में पिछले दिनों मुम्बई में हास्योत्सव 2009 का आयोजन एक सुखद बयार का झोंका लेकर आया. हालाँकि विभिन्न चैनलों ने आज हास्य को लाफ्टर में तबदील कर दिया है और इसे एक रस के बजाय व्यवसाय बना कर रख दिया है. फिर भी रंग चकल्लस द्वारा पिछले 40 सालों से अनवरत आयोजित होते आ रहे हास्योत्सव जैसे शुद्ध और शिष्ट हास्य से लबरेज कार्यक्रमों का इंतजार न सिर्फ मुम्बई के रसिक श्रोताओं को होता है बल्कि देश भर के कवियों को भी रहता है. इस मंच से कभी काका हाथरसी शरद जोशी, शैल चतुर्वेदी जैसे ख्याति लब्ध कवियों ने श्रोताओं को गुदगुदाया तो कभी अशोक चक्रधर ने ये कहकर आयोजक को भाव विह्वल कर दिया कि जिन्दगी में कभी उनकी तमन्ना हुआ करती थी कि वे रंगचकल्लस के इस आयोजन में कविता पढ़ें.

यही वजह है कि आज भी देश भर से आयोजक को कवियों के फोन आते है कि वे एक बार इस मंच पर उन्हे भी मौका दें. गौरतलब है कि शरद जोशी ने अपने जीवन का अंतिम रचना पाठ भी इसी मंच से किया था . बल्कि वे हर साल इस कार्यक्रम के लिए एक नयी रचना जरूर लिख कर लाते थे .

मुम्बई के पाटकर सभागार में आयोजित हास्योत्सव 2009 के मंच पर इस बार जिन हास्यकारों ने डॉ मुकेश गौतम के संचालन में हास्य और व्यंग्य के रंग बरसाये वे थे लम्बे समय से काव्य मंच पर मौजूद और विवाह फिल्म के संवाद लिखने से विशेष चर्चित हुए आशकरण अटल , शुजालपुर (म.प्र.) से आये गोविन्द राठी, यवतमाल से पधारे कपिल जैन, मुम्बई के देवमणि पान्डेय , बसंत आर्य तथा रजनी कांत .

रसिक श्रोताओं से भरे सभागार में आशकरण अटल ने समाज के बदलते रंग पर व्यंग्य करते हुए कहा

गाँव में संस्कार था

शहर में रोजगार था

रोजगार के लिये गाँव छूटा

तो आँखों की शर्म रही जाती

वहाँ पगड़ी उतारने में आती थी शर्म

यहाँ कपड़े उतारने में नहीं आती

बसंत आर्य ने बिग बी अमिताभ बच्चन पर छींटाकशी करते हुए कहा

नई बहू जब घर में आई गये पिता को भूल

ऐश्वर्या के नाम से खोला बिग बी ने स्कूल

आगे उन्होने कहा –

हरिवंश राय की याद न आई नाहीं तेजीजी की

कजरारे के आगे अब मधुशाला हो गई फीकी

देवमणि पांडेय ने बसंत आर्य की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा-

सिक्कों की खनक जिन्दगी को ऐसे भा गई

बूढे भी नाच गाकर पसे कमा रहे हैं

बिग बी का इस उम्र में जलवा तो देखिए

बेटे बहू के साथ में ठुमके लगा रहे है-

गोविन्द राठी ने औरत की सनातन व्यथा और पीड़ा को धारदार शैली में कुछ इस तरह बयान किया -

हर युग में सियासत के अपनी अपनी

व्यवस्थायें होती है

पहले द्रौपदियों की इज्जत सभाओं में लुटती थी

आजकल इज्जत लुटने के बाद

सभायें होती है.

व्यंग्यकारों ने बाबा रामदेव को भी नहीं बख्शा और कपिल जैन ने उन्हे योग को उद्योग में परिवर्तित करने के लिए कुछ इस तरह लपेटा –

योग से ठीक ना हो ऐसा कोई रोग नहीं है

मगर योग नियम है, योग उद्योग नहीं है..

डाँ मुकेश गौतम ने चुटकी भरे संचालन से पूरे कार्यक्रम के दौरान माहौल को जिन्दा बनाये रखा और श्रोताओं की काफी सराहना प्राप्त की. उन्होने राजनीति में बढ रहे अपराधीकरण की विडम्बना को इस तरह उजागर किया

चम्बल में डाकू कहीं नजर नहीं आये

तो हमने एक आदमी से पूछा

वो बोला

अब डाकुओं की पदोन्नति हो गई है

उनकी जगह अब चम्बल में नहीं

संसद में हो गई है

अंत में संयोजक श्री असीम चेतन ने हँसते खिलखिलाते चेहरों को अगले साल फिर मिलने का वादा करते हुए विदा किया

फाल्‍गुन की गुनगुनी धूप में हिनहिनाता हुआ फागुनी धूप का आनंद ले झक सफेद सिर, दाढ़ी- मूछों सहित छाती के बालों को काली मेहँदी से लिबेड़ रहा था कि अबके चाहे कुछ भी हो , पत्‍नी से आई लव यू कह कर ही खांसूंगा कि गुंजार करता हुआ एक भौंरा आ टपका। आते ही उसने शिकायत की,‘ देखो न! बूढ़े घोड़े, काले बाल! कबसे गुंजार कर रहा हूं पर वसंत है कि अभी तक नहीं आया। कहां रह गया होगा, कुछ बता दो तो अहसानमंद रहूंगा।' कह वह मेरे कान के पास आ गुंजार करने लगा तो मैंने उसे परे धकेलते हुए कहा,‘ चल यार परे! मेरे कान मत खा। वेलेंटाइन डे की तैयारी करने दे। बड़ी मुश्‍किल से तो गृहस्‍थी से तनिक निजात पा साठ साल बाद अबके मन में पत्‍नी के लिए जबरदस्‍ती प्‍यार जगाया है।'

‘ तो इससे पहले क्‍या करते रहे? झक मारते रहे?' भौंरे को अपने रंग से भी ज्‍यादा गुस्‍सा।

उसे गुस्‍से होते देख मैं नरम पड़ गया। बुढ़ापे में गुस्‍सा करके क्‍यों अपना बीपी हाई करना। मैंने नमकीन की कटोरी में घोली काली मेहँदी का आखिरी लबेड़ा दांत साफ करने के ब्रश से छाती के श्‍ोष बचे सफेद बालों पर मारा,‘ मत पूछ यार! क्‍या करता रहा? उस वक्‍त पत्‍नी से विवाह का ही रिवाज ही था, प्रेम का नहीं। तब से लेकर आज तक विवाह के बाद कमबख्‍त प्रेम करने का मौका मिला ही कहां। जितने को प्रेम करने की सोचता, उतने को कोई न कोई पंगा पड़ जाता और मैं सोचता कि यह पंगा निपट जाए तो पत्‍नी से प्रेम करूं। एक पंगा निबटता तो दूसरा सीना चौड़ा किए खड़ा हो जाता। बस, इसी तरह जिंदगी कट गई।' कहते कहते मेरा रोना निकल आया।

अपने समाज की परंपरा का स्‍मरण आते ही उसका सारा का सारा गुस्‍सा उड़न छू हो गया और वह मुझसे हमदर्दी जताते बोला,‘ होता है यार, ऐसा ही होता है। मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है, भले ही तुम्‍हारी पत्‍नी को हो या न हो! पर एक बात बताओ, वसंत अभी तक क्‍यों नहीं आया?'

‘इस देश में कबसे गुंजार कर रहे हो?'

‘जबसे देश आजाद हुआ है।'

‘तबसे लेकर यहां पर कोई समय पर आया है क्‍या?'

‘क्‍या मतलब तुम्‍हारा?'

‘ अरे भैया! आजादी के बाद से यहां सभी अपनी मर्जी के मालिक हो गए हैं। जब मर्जी की आए, जब मर्जी की चले गए।'

‘मतलब!!' वह मेरा मुंह ताकता रहा।

‘मतलब ये कि दफ्‌तर में चपरासी के आने का टाइम क्‍या है वैसे?'

‘ नौ बजे।'

‘ और वह आता कितने बजे है?'

‘ जब मन किया।' भौंरे ने मेरा सिर खुजलाते कहा। मुए ने बड़े प्‍यार से लगाई मेहँदी ही खराब कर दी।

‘दफ्‌तर में साहब के आने का टाइम क्‍या तय है वैसे?'

‘दस बजे।'शुक्र है अबकी बार उसने मेरा सिर नहीं खुजलाया।

‘और वह जनाब आते कब हैं?'

‘जब मन करे।'

‘ अरे यार, जब ये ही वक्‍त के पाबंद नहीं तो उससे वक्‍त की पाबंदी की उम्‍मीद क्‍यों?' वह तो ऋतुओं का राजा है। और राजा टाइम का आए, ये किस कानून की किताब में लिखा है? यहां तो एमएलए भी कहता है कि बरसात को आऊंगा तो पहुंचता सर्दियों में है।'

भौंरे ने आगे कुछ नहीं कहा और नौ दो ग्‍यारह हो लिया। साहब ! ये बाल धूप में ही थोड़े सफेद हुए हैं। पर क्‍या करें अब इन्‍हें काले करना जरा मजबूरी है। जमाने के साथ भी तो चलना चाहिए न भाई साहब! वो भी कमबख्‍त ज़ीने का क्‍या मजा की ज़माना कहीं और आप कहीं। भौंरा गया कि खाँसता हुआ जट्‌टू मियां आ धमका। शुक्र है कटोरी की मेहँदी खत्‍म हो चुकी थी। वरना अपने मुंह को काला करके ही दम लेता। मुझे काली मेहँदी से लिबड़ा देख बोला,‘ और भई साठ साल के दूल्‍हे! कहां बारात ले जाने की तैयारियां हो रही हैं? पर पता है अबके हमारे शहर के बिगाड़वादियों ने ऐलान किया है कि वेलेंटाइन डे के आस पास अगर किसी भी उम्र का कोई प्रेम करता पकड़ा गया तो....' कह वह कटोरी के भीतर झांकने लगा।

‘ तो??' काली मेहँदी बालों से टपक कर मुंह में आ गिरने लगी।

‘ तो क्‍या! उसका विवाह करवा दिया जाएगा।' सत्‍यानाश हो इन बिगाड़वादियों का भी। बड़ी मुश्‍किल से अबकी बार हिम्‍मत की थी और एक ये हैं कि...' मुझे काली मेहँदी से तन से लेकर मन तक में खारिश होने लगी। मैंने खजूर पर अटके दिल में प्‍यार की हज़ारों पिक्‍चरें दबाए कहा,‘पर जिन्‍होंने प्रेम किया ही नहीं, सीधा विवाह ही किया हो, उनके साथ यह ज्‍यादती क्‍यों? क्‍या जिंदगी में कम से कम एक बार प्रेम करने का उनका हक नहीं?'

‘देख तेरा लंगोटिया होने के नाते बिगाड़वादियों के फैसले से तुझे अवगत करवाना था, सो करवा दिया, अब मेरी नैतिक जिम्‍मेदारी खत्‍म और तेरी शुरू। मैं नहीं चाहता कि इस उम्र में तेरे ऊपर कीचड़ उछले। एक बार ही विवाह करके मर मरके जी रहा है दूसरी बार फिर कहीं....' कह जट्‌टू मियां वो गया कि वो गया।

वैसे भाई साहब! एक बात बताना, बस वैसे ही पूछ रहा हूं, अपनी तसल्‍ली के लिए कि कोरा प्रेम करने वालों के लिए तो ये रूल ठीक है पर उनके साथ यह ज्‍यादती नहीं है जिन बेचारों ने जिंदगी में विवाह तो किया पर उन्‍हें कभी प्‍यार करने का अवसर ही नहीं मिला। और जब गृहस्‍थी की भाग दौड़ से दो पल प्‍यार के चुराने के लिए आलू- प्‍याज को हाशिए पर छोड़ते हुए उन पैसों की काली मेहंदी लाए तो....पर चलो खुदा! इस बहाने ज़िंदगी में एक बुरा काम करने से तो बच गया।

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अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड

नजदीक मेन वाटर टैंक सोलन-173212 हि.प्र.

a_gautamindia@rediffmail.com

जिस तरह से हलवाई तीज त्‍योहारों के लिए मिठाइयों में खुद को मल कर साल भर के लिए हल्‍का करते हैं, अबके आप सबों की तरह मैं भी शिवरात्रि को नख से लेकर शिख तक हल्‍का हुआ, यह सोच कर कि चलो मैं भी अपने साल भर के पाप शिव के चरणों में समर्पित कर अगले साल भर के लिए निश्‍चिंत हो हल्‍का हो जाऊं। तब मैं कमेटी के सड़े जल का लोटा ले जा पहुंचा था शिव के चरणों में। शिव के चरणों में ज्‍यों ही शीश रखा कि शिवलिंग में से आवाज आई,‘ और भक्‍त! क्‍या हाल हैं? मिल गई आज तुम्‍हें फुर्सत?' अरे शिव तो सच्‍ची को पल में अपने भक्‍त से खुश होने वाले निकले।

‘ हे महाराज! अगर शिवरात्रि न होती तो शायद मैं आज भी नहीं आ पाता।' मन ने पता नहीं कैसे सच कह दिया। मेरे सच कहने से शिव इतने प्रसन्‍न हुए कि... वे भगवान से दोस्‍त के पद पर आसीन हो गए। अपने हाथों से मेरे मुंह में केला छील कर डालते बोले,‘खा लो, शरम नहीं करो। शरम करनी है तो आदर्शों से करो, मानवीय मूल्‍य से करो।'उनके मुंह से यह सुन मन ने पूछा,‘ यार! ये शिव के भीतर अशिव कहां से आ गया?'

सच कहूं , सदा मन को मार कर जीने वाला, उस वक्‍त पता नहीं कैसे औरों को शरम से पानी पानी करने वाला खुद ही शरम से पानी पानी हो गया। मेरा हमेशा सोए हुए भी खुला रहने वाला मुंह अबके बहुत जोर लगाने के बाद भी नहीं खुला तो वे सहजता से बोले,‘ शरम नहीं करते , मुंह सादर खोलो जिस तरह से दफ्‌तर में चौबीसों घंटे खोले रहते हो।' पता नहीं ये किस चीज का असर था? आत्‍मा तो मुझमें थी ही नहीं। उसे तो मैं कभी का मार चुका था।

‘मैं तुमसे बहुत खुश हूं! बोलो, जो मांगना चाहते हा निसंकोच मांगो!' कह वे मंद मंद मुस्‍कुराए। बिलकुल ठीक वैसे ही जिस तरह से दफ्‌तर में मेरे साथ वाली मुस्‍कुरा कर अपनी सीट का काम मेरी ओर सरका कर हर मौसम में स्वेटर बुनती रहती है और मैं तब लाख चाह कर भी इनकार नहीं कर पाता,‘प्रभु अगर मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो मेरे भीतर के तामसिक गुण को ले लो!' कह मैं उनके चरणों में गिर पड़ा ठीक वैसे ही जैसे साहब के चरणों में गिर पड़ता हूं।

‘अरे ये क्‍या करते हो? तुम्‍हारी जगह मेरे चरणों में नहीं मेरे दिल में है। मैं तुम्‍हारा साहब नहीं, में तो शिव हूं। पर ये तुमने मांग क्‍या लिया नादान! लगता है तुम्‍हारे बाल सच्‍ची को धूप में सफेद हुए हैं!'

‘बस प्रभु! बहुत हो लिया ये गला काटने का खेल। ये तामसिक गुण कमबख्‍त सात्‍विक करना तो दूर ,सोचने भी नहीं देते। अब मैं आदमी होकर जीना चाहता हूं।'

‘पर ऑस्‍कर तो स्लम डॉग को ही मिलता है।' कह वे एक टक मेरी ओर देखने लगे तो मैं उनकी तरफ। बड़ी देर तक वे मेरी बेवकूफी पर हंसते से रहे उसके बाद मुझे समझाते बोले,‘ देखो! तुम मेरे अपने हो। जो चाहो मुझसे मांगो, पर सात्‍विकता मत मांगो। आज जो मांगोगे तुम्‍हें देकर रहूंगा। मांगो कि दफ्‌तर में रिश्‍वत लेते हुए मेरी एक भी पीढ़ी न पकड़ी जाए। मैं तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि तुम्‍हारा जो पड़ोसन से इश्‍क का चक्‍कर रुक रुक कर चला है वह 160 की स्‍पीड से चले पर शक का एक कण भी न उड़े। मैं तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि तुम्‍हारा लाडला जो दस साल से दसवीं से चिपका बैठा है, उसे अबके लीक हुए पेपर मिल जाएं। मैं तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि तुम्‍हारी बीवी सदा जवान रहे। मैं तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि साहब तुम्‍हारी मुट्‌ठी में हो । मैं तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि तुम एमपी हो जाओ। मैं पलक झपकते तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि मैं पी एम हो जाऊं। मैं पलक झपकते तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि वीजिलेंस वाले मेरा नाम भी भूल जाएं। मैं खिला खिलाकर तथास्‍तु कह दूंगा। मांगो कि तुम्‍हारे बिना देश में पत्‍ता भी न हिले। मैं मजे से तथास्‍तु कह दूंगा। जो मांगना है निःसंकोच मांगो भक्‍त। पर शिव के लिए सात्‍विकता न मांगो प्‍लीज! तुम भी क्‍या याद करोगे कि किसी शिव से तुम्‍हारा कभी पाला पड़ा था। शिव ने डिमांड के इतने ऑप्शन दे दिए कि मैं पागल सा हो गया।

‘ नहीं भगवान! मुझे देना ही है तो तामसिक गुणों से मुक्‍ति दे दो बस।'

‘पागल हो गए हो क्‍या! सात्‍विक हो गए तो संसार में जिओगे कैसे? रोज मटर पनीर मटन नहीं खाना है क्‍या! रोज दारू के नश्‍ो में नहीं रहना है क्‍या! रोज छुप छुप कर पड़ोसन से आंख मटक्का नहीं करना है क्‍या! कोरी पगार में परिवार का पालन पोषण करने निकलोगे तो चौथे दिन भगवान को नहीं मौत को प्‍यारे हो जाओगे।

और चिता को मुखाग्‍नि देने में बेटा भी शरम महसूस करेगा। बरसों से कटार से सजी बगल सूनी हो गई तो कुत्‍ता भी नहीं पूछेगा। जिस तरह जीने के लिए रोटी आवश्‍यक है ठीक उसी तरह से इस संसार में रहने के लिए तामसिकता अति आवश्‍यक है, शक हो तो बड़े बड़े मठाधीशों से पूछ लो। उनका चोलों के सिवाय और कुछ भी सात्‍विक नहीं। अब आगे तुम्‍हारी मर्जी। पर जो भी मांगना है जल्‍दी मांगो, और भी मांगने वाले आने वाले हैं।'

‘ तो मुझे स्लम सबॉर्डिनेट मिलियनेयर बना दो।'

‘ झोपड़पट्टी मातहत करोड़पति क्‍यों नहीं?'

‘ हिंदी में वह दम कहां प्रभु जो अंग्रेजी में है। शायद कोई ऑस्‍कर - वॉस्‍कर मुझे भी मिल जाए।'

‘ तथास्‍तु!

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डॉ.अशोक गौतम

गौतम निवास,अप्‍पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212

हि.प्र.

a_gautamindia@rediffmail.com

बैंक वाली बाला का फोन था। रिसीव किया ,तो मधुर आवाज गूंजी - ‘सर ! आपके लिए खुशखबरी !! हमारी बैंक ने आटे और गेहूं खरीदने के लिए भी लोन देना शुरू कर दिया है । आप जैसे गरीब लेखकों को ईएमआई की सुविधा देने का निर्णय किया गया है। सर ,आप बैंक आएं और अनाज के लिए लोन ले लें तथा आसान ईएमआई से चुका दें । ऐसे सुनहरे अवसर बार -बार नहीं आते । आप यह मौका हाथ से न जाने दें । हमारे बैंक से आटा खरीदने के लिए लोन ले लें । आटा खाते रहें और ईएमआई चुकाते रहें ।

यह सुनकर मन मयूर नाच उठा हिये में उमंगें हिलोरें लेने लगीं । पहली बार फीलगुड का अहसास हुआ । सोचा ,वाकई हम अर्थिक उदारीकरण के युग में जी रहे हैं । देखिए ना ! बैंक भी कितने उदार हो गए । कहां तो लोन के लिए चक्‍कर काटते-काटते कई जोड़ी जूते घिस जाते थे और अब तो गरीबों का भी पूरा खयाल रखा जाने लगा है । मैं बाला के मीठे स्‍वर से खुश था कि चलो कहीं से तो बैंक लोन का डोल जमा । आटा खाने के बाद लोन चुकाना पड़ेगा । यह भी एक अच्‍छी खबर थी , क्‍योंकि औसत भारतीय खाना खाने के बाद जुगाली करने लग जाता है । मैं भी लोन चुकाने की जुगाली करूंगा । लोन के जुगाड़ से भी ज्‍यादा खुशी मोबाइल की फिजूलखर्ची के पत्‍नी के आरोपों का सटीक जवाब मिल जाने की थी । अब पत्‍नी से कह दूंगा कि देख मोबाइल का कमाल , इसने सारी समस्‍याएं चुटकियों में सुलझा दी।

मैं प्रफुल्‍लित मन से बैंक पहुंचा । शानदार दफ्तर । शानदार कालीन । शानदार फर्नीचर । जानदार बालाएं ! सुन्‍दर स्‍वस्‍थ युवा । अच्‍छी अंग्रेजी में लोन -देने को तत्‍पर । मैंने उन्‍हें बड़ी प्रसन्‍नता से बताया कि आटा खरीदने के लिए लोन लेने आया हूं और बैंक से मुझे फोन भी आया था । ये सुनते ही उस सुंदर बाला ने हिक़ारत से मुझे देखा और कहा - सर , मैं तो कार लोन को डील करती हूं। आप रमा के पास जाएं ।

रमा कहां हैं ? मेरे सवाल का जवाब मिला - वे जो महंगे फोन पर बतिया रही हैं , वे रमा जी हैं । रमा जी की टेबल पर कई फोन थे । सभी रह-रह कर बजते थे । रमाजी एक फोन रखती ,दूसरा उठाती । दूसरा फोन रखती ,तीसरा उठाती । इस बीच उनका मोबाइल बजने लगता , वो मोबाइल उठाती और सुर मिलाती । मैं उनके सामने जाकर खड़ा हो गया । कभी उन्‍हे देखता ,तो उनकी नजर पड़ने पर उनके फोन को घूरने लगता । रमा जी की बॉडी लैंग्‍वेज देख कर मुझे लग रहा था कि फोन रखते ही वे मुझ से बात करने वाली है ,लेकिन वे मेरी तरफ मुस्‍कान फेंकते हुए दूसरे फोन पर लग जाती । काफी देर तक मुझे इस तरह खड़ा देखकर रमाजी ने मेरी तरफ नजर घुमाई , फोन पर बतियाते हुए ही बोली - ‘कहिए सर ! मैं और यह बैंक आपके लिए क्‍या कर सकते हैं ? आपकी सेवा में हम तत्‍पर है । '

मैंने सोचा ,अब तो अपना काम हो जाएगा । मैं मुस्‍कुराते हुए बोला - ‘ आप चाहें तो मुझे आटा खरीदने के लिए लोन दे सकती हैं । ' देखिए बैंक ने वित्‍त मंत्री के आदेश से अपनी पॉलिसी बदल दी है । पिछले वर्ष हमने कुछ लोगों को आटे के लिए लोन दे दिया था । सबके सब आटा खाकर चित्‍त हो गए । अब हम केवल गेहूं के लिए लोन दे रहे हैं । ,मैंने कहा - ‘ कोई बात नहीं पॉलिसी बदल गई तो , मुझे गेहूं के लिए ही लोन दे दीजिए । ,

‘ देखिए क्‍या आप ईएमआई भर सकेंगे ?' उनका सवाल सुनकर मैं झेंप गया । फिर साहस जुटाकर बोला- ‘ क्‍यो नहीं ! आप मेरा और मेरे परिवार का पेट भर रही हैं ,तो मैं ईएमआई क्‍यों नहीं भर सकता ?'वैसे यह ईएमआई है क्‍या बला । वे बोली - ‘सर इक्‍वल मंथली इन्‍स्‍टालमेंट ही ईएमआई है । ' ‘ अच्‍छा यह कितनी राशि होगी , ‘ मैंने जिज्ञासावश पूछा । ‘ यह तो लोन राशि पर निर्भर करेगा । ' ‘ लोन कितना मिलेगा ? ' ‘यह आपकी इन्‍कम पर निर्भर करेगा । ' ‘ मैं तो लेखक हूं आय तो कम ज्‍यादा हेाती रहती है । ' ‘ तो फिर आपको गारंटी देनी होगी । ' ‘ वो तो नहीं है । ' ‘ तो फिर लोन मिलना भी मुश्‍किल है । '

रमा जी का फोन फिर बजने लगा । वे किसी उद्योगपति को आटा फैक्टरी के लिए लोन देने में लग गई । मैंने फिर सोचा ,आटा , गेहूं ,दाल और सब्‍जी के लिए किस बैंक से लोन लूं । हर बैंक ने मुझे निराश किया । आप लोन की ईएमआई की गारंटी ले सकें , तो सूचना दे । देखिए निराश न कीजिएगा । प्रयास करते रहने से कामयाबी मिलेगी और कोई न कोई बैंक मुझे आटे के लिए लोन दे देगा ।

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0 0 0 यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002, फोनः-2670596

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सहस्‍त्राब्‍दी का पर्यावरण आकलन

(संयुक्‍तराष्‍ट्र की पर्यावरण सम्‍बन्‍धी विशेष रिपोर्ट)

-डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव

clip_image002(युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फ़ेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानों से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।)

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पर्यावरण की वर्तमान समस्‍या को देखते हुए आज सम्‍पूर्ण विश्‍व के लोग चिंतित हैं इस चिंता के लक्ष्‍य एवं कारण भी आज चारों तरफ स्‍पष्‍ट दिखने लगे हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में पिछले कुछ वर्षों से बेमौसम बरसात, आँधी, चक्रवात, ओलावृष्‍टि, बिजली और अक्‍सर सूखे की स्‍थिति ने अचानक लोगों को परेशान कर दिया है। मौसम का यह बदलता मिजाज मध्‍य एशियाई क्षेत्र में वातावरण अत्‍यधिक गर्म हो जाने के कारण माना जाता है। क्‍योंकि ताजिकिस्‍तान, उजबेकिस्‍तान, कजाकिस्‍तान, किर्गिस्‍तान, अफ़गानिस्तान, पाकिस्‍तान और आस-पास के इलाकों में आतंकी गतिविधियाँ चल रही हैं और उसके कारण स्‍थिति युद्ध जैसी है। इस अफगान युद्ध ने वातावरण में बारूद के बारीक कण बिखेर दिए हैं। इनकी वजह से वातावरण अत्‍यधिक गर्म हो उठा है इसके साथ ही अफगान-पाक सीमा पर कम दबाव का क्षेत्र बन गया है। इस वर्ष से इस इलाके में बमबारी हो रही है और उच्‍च शक्‍ति के हथियार इस्‍तेमाल होने के कारण इन सबसे पैदा हुई गर्मी का असर दिख रहा है। ईरान, इराक और अफ़गानिस्तान के बिगड़े मौसम का असर भी विश्‍व के अन्‍य देशों में पड़ा है। अपने निजी फायदे की वजह से पश्‍चिमी देश वातावरण में जहर घोल रहे हैं और इससे सबसे अधिक प्रभावित एशियाई देश हो रहे हैं जिसने यहाँ की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास की गाड़ी को उल्‍टी तरफ मोड़ दिया है। पर्यावरण के इस त्रासद खतरे को देखते हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम ने पिछले दिनों जिस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है, उसमें इन्‍हीं समस्‍याओं को रखा गया है जिसके लिए पर्यावरणविद्‌ काफी समय से संघर्षरत थे।

संयुक्‍त राष्‍ट्र की पहल पर बनी इस पहली सहस्‍त्राब्‍दी पारिस्‍थितिकीय आकलन, 2005 रिपोर्ट जारी की गयी। पच्‍चानवे देशों के 1360 वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गयी इस रिपोर्ट में ढाई हजार पेजी दस्‍तावेज मौजूद हैं। इस रिपोर्ट को तैयार होने में लगभग चार वर्ष लगे हैं। रिपोर्ट में भविष्‍य के लिए नयी पीढ़ी को सतर्क होने एवं अपने अस्‍तित्‍व के प्रति चिन्‍तित होने का आगाह किया है। सहस्‍त्राब्‍दी पारिस्‍थितिकीय आकलन रिपोर्ट में स्‍पष्‍ट लिखा है कि विकास की अंधाधुंध दौड़ में हमने धरती का कोना-कोना तहस-नहस कर डाला है। नदी, नाले, जंगल, पहाड़, महासागर यहाँ तक कि वीरान ध्रुव प्रदेश भी बेहाल है। धरती पर जीवन को संचालित करने वाले लगभग दो तिहाई कुदरती घटक छिन्‍न-भिन्‍न हो चुके हैं। दरअसल, कुदरत का जर्रा-जर्रा हवा, पानी और जीवन के लिए जरूरी पोषक तत्‍वों को लगातार चलायमान बनाये रखता है। इन्‍हें फिर से इस्‍तेमाल करने लायक बनाकर जीवन को संचालित करता है, लेकिन अब दिक्‍कत यह है कि मानव की दखलंदाजी के कारण ये प्रजातियाँ बर्बादी की कगार पर आ खड़ी हुई हैं। धरती की कुल 24 पारिस्‍थितिकी प्रजातियों में से 15 पूरी तरह क्षतिग्रस्‍त पायी गईं। इनमें शायद सबसे बुरा हाल जमीन का है। खेती के लिए पिछले साठ वर्षों में जितना जमीन पर कब्‍जा किया गया उतना अठारहवीं और उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में मिलाकर भी नहीं किया गया था। नतीजा आज धरती की 24 फीसदी से ज्‍यादा जमीन पर खेती हो रही है। यानी फ़सलों का उत्‍पादन बढ़ाने के लिए पहले से कहीं ज्‍यादा रासायनिक खादों और पानी का इस्‍तेमाल हो रहा है। इसलिए पिछले 40 वर्षों में नदियों और झीलों से पानी निकालने की मात्रा दुगुनी हो गयी है। आज धरती पर मौजूद मीठे पानी की 40 से 50 फीसदी मात्रा मानव द्वारा इस्‍तेमाल की जा रही है। पानी की लगातार बढ़ती माँग के कारण धरती में छिपा भूजल का अनमोल खजाना भी बड़ी तेजी से खाली होता जा रहा है। पानी के अंधाधुंध इस्‍तेमाल ने कुदरती जल चक्र का संतुलन बिगाड़ दिया है। जल का इस्‍तेमाल ज्‍यादा है और प्राप्‍ति कम। कुल मिलाकर रपट कहती है कि जल्‍दी ही धरती पर पानी के लिए हाहाकार मचने वाला है।

सहस्‍त्राब्‍दी पारिस्‍थितिकीय आकलन रिपोर्ट में बताया गया है कि पारिस्‍थितिकी तंत्र का 60 प्रतिशत हिस्‍सा प्रदूषित हो गया है। इस स्‍थिति में अगले पचास वर्षों में मानव अस्‍तित्‍व पर संकट, आ सकता है। ‘दुनिया की प्रमुख नदियों में पानी की मात्रा लगातार घटती जा रही है। चीन की यलोरिवर अफ्रीका की नाइल नदी और उत्तरी अमेरिका की कोलो राडो नदी साल के तीन महीनों के दौरान सागर में मिलने से पहले ही सूख जाती है। नदियों को पानी से लबालब भरने वाले ग्‍लेशियर बढ़ते तापमान के कारण लगातार पिघलते जा रहे हैं। इसलिए भविष्‍य में यदि कभी सदानीरा नदियाँ सूखी पगडंडी की तरह दिखाई देने लगें तो ताज्‍जुब नहीं होना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार यदि धरती का औसत तापमान केवल दो तीन डिग्री सेल्‍सियस बढ़ जाता है तो दुनिया की लगभग आधी आबादी पानी की कमी से त्रस्‍त हो जाएगी जब कि दस करोड़ लोग समुद्री बाढ़ में जूझ रहे होंगे। आबोहवा की उथल-पुथल धरती को फिर से वीरान बनाने की कोशिश करेगी।'' वास्‍तविकता यह है कि हमारी पृथ्‍वी की जलवायु में महानगरों की अहम भूमिका होती है और सबसे अधिक संकट आज महासागरों पर है। इसमें निवास करने वाले जीवों का भविष्‍य खतरे में पड़ गया है। इस अध्‍ययन रिपोर्ट की मानें तो, 12 फीसदी पक्षी, 25 फीसदी स्‍तनपायी प्राणी और 30 फीसदी से ज्‍यादा मेंढक जैसे प्राणी धरती से कूच करने की तैयारी में हैं।

सहस्‍त्राब्‍दी के इस पर्यावरण अध्‍ययन में अब तक पहली बार पर्यावरण विनाश को आर्थिक नजरिये यानि नफा-नुकसान की कसौटी पर आंकने की कोशिश की गयी है। इसके पहले सन्‌ 1997 ई. में जीव वैज्ञानिकों और अर्थशास्‍त्रियों ने कुदरत की अनमोल सेवाओं की कीमत तय करने की कोशिश की थी। उस समय अनुमान लगाया गया था कि जंगली पेड़-पौधों द्वारा हवा को ठंडी करने, कीड़ों-मकोड़ों द्वारा फसलों का परागण करने, सागरों द्वारा पोषण पदार्थों का पुर्नचक्रण करने की कीमत लगभग 33 खरब डालर सालाना बैठती है जो दुनिया के सकल राष्‍ट्रीय उत्‍पाद से लगभग दुगुनी है। रपट में जल, जंगल और जमीन का मूल्‍य उसकी कुदरती सेवा और महत्ता के आधार पर आंका गया है। मसलन पानी भरी भूमि (तकनीकी भाषा में वेटलैण्‍ड) जीव जन्‍तुओं और जलीय वनस्‍पतियों को आवास मुहैया कराती है, पानी को प्राकृतिक ढंग से प्रदूषित करती है और जल भंडारण की सुविधा भी उपलब्‍ध कराती है। इस आधार पर कनाडा की एक हेक्‍टेयर जल भूमि की कीमत छह हजार डालर आंकी गयी है। इसी तरह थाईलैण्‍ड के तटों पर मैंग्रूव वनों की कीमत एक हजार डालर प्रति हेक्‍टेयर आंकी गयी है, लेकिन आज इनका सफाया करके झींगा पालन शुरू कर दिया जाये तो इसकी पर्यावरणीय कीमत घटकर केवल 200 डॉलर रह जाती है। कुल मिलाकर यह अध्‍ययन यह कहना चाहता है कि प्राकृतिक संसाधनों का लोगों ने इतना ज्‍यादा शोषण दोहन किया है जिससे पारिस्‍थितिकी का ताना-बाना बिगड़ गया है। और इसका एक विस्‍तृत उदाहरण हाल में सुनामी लहरों से हुए महाविनाश से भी हमारे समक्ष है।

वनों के विनाश पर प्रस्‍तुत सहस्‍त्राब्‍दी अध्‍ययन रिपोर्ट में चिन्‍ता व्‍यक्‍त की गयी है, इसमें स्‍पष्‍ट कहा गया है कि ‘सन्‌ 90 के दशक में इंडोनेशिया में एक करोड़ हेक्‍टेयर क्षेत्र में फैले वनों का सफाया कर दिया गया। आर्थिक नजरिये से इस नुकसान की कीमत नौ अरब डालर आंकी गयी है, क्‍योंकि इससे वनों से होने वाले उत्‍पादन से हाथ धोना पड़ा, पर्यटन उद्योग को घाटा हुआ और सबसे बड़ी बात यह है कि वनों के विनाश ने बीमारियों को न्‍यौता देकर स्‍वास्‍थ्‍य पर होने वाला खर्च बढ़ा दिया। 90 के दशक के अन्‍त में इंग्‍लैण्‍ड और वेल्‍स में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्‍तेमाल से मीठा पानी बर्बाद हुआ, जिसकी सालाना कीमत अदा करनी पड़ी 16 करोड़ डालर। सन्‌ 1990 से 1999 के बीच आई बाढ़ों में एक लाख से ज्‍यादा लोग जान गंवा चुके हैं। इससे हुए नुकसान की कुल कीमत 243 अरब डालर आंकी गयी है। अध्‍ययन रिपोर्ट की मानें तो पर्यावरण विनाश और दुनिया में बढ़ती भूख और गरीबी के बीच सीधा रिश्‍ता है। बिगड़ता पर्यावरण न केवल रोजी-रोटी के साधन छीन रहा है, बल्‍कि बीमारियों के रूप में लोगों की सेहत भी चौपट कर रहा है। जहाँ एक ओर पुराने रोग जड़ पकड़ रहे है, वही नये-नये मर्ज भी उभर रहे हैं। वनों के विनाश के कारण मलेरिया और हैजे का प्रकोप बढ़ता है तथा नये रोगों के पनपने का खतरा भी बढ़ जाता है। अफ्रीका में रोगों के प्रकोप के रूप में मलेरिया की हिस्‍सेदारी 11 फीसदी है। अगर अफ्रीका में 35 साल पहले मलेरिया पर काबू पा लिया गया होता तो महाद्वीप का सकल घरेलू उत्‍पाद 100 अरब डालर ज्‍यादा होता। गरीबी और पर्यावरण के इस चोली दामन वाले साथ को देखते हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र ने माना है कि सन्‌ 2015 तक दुनिया में गरीबी और भूख को आधा करने का लक्ष्‍य शायद अब भी पूरा हो पाये। यहाँ तक कि 2050 में भी कुपोषण दुनिया की एक प्रमुख समस्‍या होगी और इसके मूल में होगी गरीबी। वर्तमान की बात करें तो आज भी दुनिया के एक अरब से ज्‍यादा लोग केवल एक डालर हर रोज की आमदनी पर गुजर-बसर कर रहे हैं - जबकि एक से दो अरब लोग पानी के अभाव से जूझ रहे हैं। यह समस्‍या विकासशील देशों की ही नहीं होगी इससे विकसित देश भी प्रभावित होंगे।

भारतीय परिप्रेक्ष्‍य की सहस्‍त्राब्‍दी पारिस्‍थितिकीय आकलन रिपोर्ट का अपना अलग महत्‍व है। भारतीय परिवेश में निवास करने वाली साठ से पैंसठ प्रतिशत जनता प्रकृति के सहारे अपना जीवन यापन कर रही है। इतने बड़े समूह का ढांचा जमीन, जल और वायु ही है। अध्‍ययन रिपोर्ट के अनुसार ये ही तत्‍व सभी से ज्‍यादा प्रभावित हुए है।'' साथ में भारतीय जनसंख्‍या वृद्धि को देखते हुए आने वाले समय में अनेक तरह की कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं। आज हम उपभोक्‍तावादी समाज में पनप रहे हैं और इस संस्‍कृति को पनपाने में दुनिया भर की बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों और कार्पोरेट हाउस के साथ-साथ विभिन्‍न देशों की सरकारों का भी योगदान रहा है। पहले यह था कि बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों और सरकारों के बीच हितों के टकराने की वजह से मतभेद रहा करते थे। इस कारण सरकारों का रूख आम लोगों के हितों की तरह होता था लेकिन आर्थिक उदारीकरण ने इसे बदलकर रख दिया है। भारतीय संदर्भ में यह साफ-साफ दिख रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारें बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों की पैरोकार बन गयी हैं। एक खास बात भारत को इस रिपोर्ट से हो सकती है वह यह कि ‘इसके सहारे पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक वैश्‍विक नीति बनाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है लेकिन इसके लिए निश्‍चित तौर पर दुनिया के प्रमुख देशों की सरकारों को पहल करनी होगी। वरना इस रिपोर्ट के प्रकाशन मात्र से कोई बदलाव नहीं हो सकता। सरकारों को इस बात पर ध्‍यान देना होगा कि पर्यावरण पर राजनीति न होने पाये, बल्‍कि राजनीति में पर्यावरण को अहमियत दी जाये। इसके साथ ही आमजनों को भी इस पर शिद्‌दत के साथ विचार करना होगा और इसके लिए पहली जरूरत यह है कि प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्‍तेमाल के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए। इसके लिए दुनिया भर की सरकारों को अपने यहाँ की पर्यावरणीय परिस्‍थितियों को ध्‍यान में रखते हुए ठोस नीतियों को बनाना होगा। सरकार की इन नीतियों में कई विश्‍व के गैर सरकारी संगठन इस दिशा में उचित सहयोग कर सकते हैं। दुनिया के देशों को यह भी समझना होगा कि वर्तमान की भूमंडलीय आर्थिक नीतियों और बढ़ती हुई उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति के कारण समूचा तंत्र प्रभावित हो रहा है, इसलिए इन परिस्‍थितियों को ध्‍यान में रखते हुए आम आदमी की सोच और व्‍यवहार में बदलाव के साथ सरकारों को भी इसे गम्‍भीरता से समझना होगा।

निष्‍कर्ष रूप में संयुक्‍त राष्‍ट्र की इस पर्यावरणीय ‘सहस्‍त्राब्‍दी पारिस्‍थितिकीय आकलन रिपोर्ट में पर्यावरण में बदलावों के भविष्‍य और विभिन्‍न परिकल्‍पनाओं में बेहतर मानवीय जीवन की निर्धारक शक्‍तियों के आधार पर सहस्‍त्राब्‍दी आकलन रिपोर्ट में निम्‍न चार स्‍थितियों पर विस्‍तार दिखाई देता है - हस्‍तक्षेप सहारा समय 23 अप्रैल, 2005 के अनुसार

- एक वैश्‍विक समाज बनेगा जो विश्‍व व्‍यापार और आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ पर्यावरण संबंधी समस्‍याओं को सुलझाने में अपनी सक्रियता दिखाएगा। वैश्‍विक समाज में गरीबी और असमानता को कम करने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। इसके लिए जनहित में आधारभूत ढांचे और शिक्षा पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। इस हालात में बाकी की चारों स्‍थितियों की तुलना में आर्थिक विकास कहीं ज्‍यादा होगा। उम्‍मीद है कि इस स्‍थिति में 2050 तक जनसंख्‍या सबसे कम होगी।

- इस हालात में राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों का केन्‍द्र क्षेत्रीय जल वितरण होगा तथा स्‍थानीय संस्‍थाएं मजबूत होंगी। पर्यावरण प्रबंधन को लेकर समाज ज्‍यादा सजग होगा। आर्थिक विकास दर शुरू में धीमी रहेगी लेकिन आगे चलकर बढ़ती जाएगी। जहां तक जनसंख्‍या का सवाल है सन्‌ 2050 तक यह थमने का नाम नहीं लेगी।

- इस परिदृश्‍य में पर्यावरण तकनीकी के मामले में दुनिया मजबूती से एक हो जाएगी जिसमें पर्यावरण संबंधी सुविधाएं बेहतर प्रबंधन के साथ मिल सकेंगी और इस प्रक्रिया में समस्‍याएं पैदा न हों, इस लिहाज से पर्यावरण प्रबंधन का विकास होगा। आर्थिक विकास तुलनात्‍मक रूप से ज्‍यादा होगा अगर 2050 तक जनसंख्‍या मध्‍यम स्‍थिति में रहे।

- इस परिदृश्‍य में क्षेत्रीयता हावी होगी जिससे एक खंडित दुनिया की तस्‍वीर बनती है। सुरक्षा पर विशेष ध्‍यान होगा खासकर क्षेत्रीय बाजारों को लेकर। पर्यावरण संबंधी समस्‍याओं को लेकर सक्रिय रूख होगा लेकिन आर्थिक विकास खासकर विकासशील देशों में अपेक्षाकृत कम होगा। जनसंख्‍या के विकास के साथ-साथ इस परिदृश्‍य में आर्थिक विकास और घटेगा।

भावी वैश्‍विक परिदृश्‍य की ये परिकल्‍पनाएं महज अटकल या भविष्‍यवाणी नहीं हैं बल्‍कि ये परिवर्तनकारी पारिस्थितिकीय शक्‍तियों के विकास के धुंधले दृश्‍य हैं। इन्‍हें हम आज के हालात और रुझान के आधार पर भविष्‍य का नक्‍शा कह सकते हैं। पहले तीनों परिदृश्‍यों का आधार वे नीतियां हैं जो विकास की चुनौतियों को ध्‍यान में रखकर बनाई जा रही हैं। उम्‍मीद है कि पहले परिदृश्‍य में व्‍यापार बाधाएं समाप्‍त हो जाएंगी, सब्‍सिडी खत्‍म होगी तथा गरीबी और भुखमरी को खत्‍म करने पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। दूसरे परिदृश्‍य में 2010 तक लगभग सभी देश सकल घरेलू उत्‍पाद का 13 फीसदी शिक्षा पर खर्च करने लगेंगे और एक जगह से दूसरी जगह योग्‍यता और ज्ञान का प्रवाह संस्‍थागत रूप से बढ़ेगा जबकि तीसरे परिदृश्‍य में पर्यावरण की देखभाल के कारण सेवाओं का उत्‍पादन बढ़ेगा, विकल्‍प बढ़ेंगे और हानिकारक व्‍यापार में कमी आएगी।

वैश्‍विक तापमान को कम करने का वैश्‍विक प्रयास ः क्‍योटो प्रोटोकॉल

वैश्‍विक गरमाहट की समस्‍या पृथ्‍वी के समक्ष एक आसन्‍न संकट है जिससे समग्र जैव समष्‍टि का भविष्‍य जुड़ा हुआ है क्‍योंकि हमारी पृथ्‍वी का तापमान निरन्‍तर बढ़ता जा रहा है और यह बढ़ता तापमान सम्‍पूर्ण विश्‍व के लिये एक ऐसी चुनौती बन गया है जिसका सामना यदि सभी देश मिलकर नहीं करेंगे तो यह तापमान सभी को एक दिन विनाश की कगार पर ला देगा। पृथ्‍वी के इस बढ़ते तापमान का कारण ‘ग्रीन हाउस प्रभाव' है। ग्रीन हाउस प्रभाव उत्‍पन्‍न करने वाली गैसें - कार्बन-डाई-आक्‍साइड, मीथेन, ओज़ोन, कार्बन, क्‍लोरो फ्‍लोरो, नाइट्रस आक्‍साइड तथा सल्‍फर-डाई-आक्‍साइड हैं। वायुमण्‍डल में इन गैसों का अनुपात अधिक हो जाने के कारण तापमान में अधिक वृद्धि हो रही है। जिससे जल वाष्‍प का संघनन न हो पाने के कारण वर्षा का स्‍तर गिरता जा रहा है तथा तापमान वृद्धि के कारण पर्वतीय हिमनदों तथा ध्रुव प्रदेशों की बर्फ पिघलने की सम्‍भावना बढ़ रही है, फलतः सागर तल ऊपर उठेगा जिससे तटवर्ती क्षेत्र जलमग्‍न हो जायेंगे।

हरित गृह गैसों की मात्रा वायुमंडल में जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वायुमंडलीय परत और मोटी होती जा रही है वायुमंडल में इन हरित गैसों की मात्रा बढ़ने से धरती का तापमान बढ़ना स्‍वाभाविक है। मानव की जीवन शैली और मानवीय क्रियाकलापों से ये गैसें निरंतर बढ़ती जा रही हैं। धरती का ताप बढ़ाने में सबसे महत्‍वपूर्ण भूमिका कार्बन-डाई-आक्‍साइड की हो गयी है। एक आकलन के अनुसार -‘‘सन्‌ 1930 में इसकी सान्‍द्रता 315 पी. पी. एम. थी जो विगत सदी के अन्‍त 360 पी. पी. एम. तक पहुँच चुकी है। आई पी. सी. सी. संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के वैज्ञानिकों का आंकलन है कि वर्तमान सदी के मध्‍य तक ब्‍व्‍2 की सान्‍द्रता बढ़कर 450 पी. पी. एम. तक पहुँच जाएगी और तब धरती के ताप में 1-30 से की वृद्धि अवश्‍य भावी है। ऐसे में समुद्री जल स्‍तर का प्रसार होगा और मालद्वीप, मारीशस, बंग्‍लादेश सरीखे टापूनुमा देश जलमग्‍न हो जाएंगे। रेगिस्‍तानी क्षेत्र और गर्म हो जाएंगे जिससे वहाँ की जैव जातियाँ नष्‍ट होने लगेगी। जंगलों पर पायी जाने वाली प्रजातियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। सागरीय जीवन में भी उथल-पुथल मच जाएगी क्‍योंकि सागरीय जल की क्षारीयता बढ़ जाएगी जो सागरों में रहने वाली जैव समष्‍टि के लिए घातक होगी।

जलवायु परिवर्तन की समस्‍या जो कि एक वैश्‍विक चुनौती है, का हल भी वैश्‍विक स्‍तर पर आवश्‍यक है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍सर्जन का प्रभाव सभी देशों में समान है ये गैसें जितना लंदन को प्रभावित करती हैं उतना वाशिंगटन, बीजिंग तथा भारत को भी प्रभावित करती हैं। अतः किसी एक देश द्वारा इन गैसों के उत्‍सर्जन को कम करने का प्रयास तब तक निरर्थक साबित होगा जब तक सभी देश मिलकर कोई ठोस कदम नहीं उठाते। इसी पहल के तहत संयुक्‍त रूप से विभिन्‍न देशों द्वारा हरित गृह प्रभाव वाली गैसों के उत्‍सर्जन में ह्रास लाने के वचनबद्ध प्रयास का नाम है - क्‍योटो प्रोटोकॉल। क्‍योटो प्रोटोकॉल 1997 में अस्‍तित्‍व में आया तथा इस समझौते में 2008-2012 तक की अवधि में हरित गृह प्रभाव वाली गैसों को 1990 के स्‍तर से 5.2 प्रतिशत कम करने का निर्णय लिया गया। यह समझौता वैश्‍विक स्‍तर पर ‘ग्‍लोबल वार्मिंग' की समस्‍या को हल करने का एक सराहनीय प्रयास है। यह समझौता एक या दो वर्षों के प्रयास से अस्‍तित्‍व में नहीं आया बल्‍कि कई सम्‍मेलनों एवं समझौतों की असफलता के फलस्‍वरूप उदय हुआ। अतः इस समझौते से सम्‍बन्‍धित महत्‍वपूर्ण सम्‍मेलनों एवं तिथियों को जानना आवश्‍यक है -

क्‍योटो प्रोटोकॉल समझौते से सम्‍बन्‍धित महत्‍वपूर्ण सम्‍मेलन एवं तिथियाँ -

- विश्‍व की इस परिवर्तित होती जलवायु पर सर्वप्रथम चिन्‍ता 1992 में पृथ्‍वी सम्‍मेलन में UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) नामक विचार गोष्‍ठी आयोजित की गयी जिसमें सन्‌ 2000 तक कार्बन-डाई-आक्‍साइड को 1990 के स्‍तर तक कम करने के लिये कहा गया जो कि 1990 के स्‍तर से 13 प्रतिशत अधिक थी। परन्‍तु यह सम्‍मेलन असफल रहा। किसी भी देश ने इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के प्रयास नहीं किये।

- UNFCCC ‍ द्वारा प्रस्‍तावित समझौते को कानूनी बाध्‍यता के रूप में परिवर्तित करने के लिये 1995 में बर्लिन मेंडेट सम्‍मेलन आयोजित किया गया। UNFCCC ‍ ने इस सिंध पर समझौता करने के लिये 1997, अन्‍तिम समय सीमा निर्धारित कर दी गयी।

- 1997 में 165 देशों ने क्‍योटो प्रोटोकॉल (क्‍योटो प्रोटोकॉल एक समझौते की रूपरेखा है जिसमें तापमान कम करने के लक्ष्‍य तथा समय निर्धारित है।) पर सहमति बनाई। इस समझौते में 2008 से 2012 तक की अवधि में हरित गृह प्रभाव वाली गैसों को 1990 के स्‍तर से 5.2 प्रतिशत कम करने का निर्णय लिया गया (अमेरिका ने इस समझौते को स्‍वीकार नहीं किया)।

- सन्‌ 2000 में हेग में क्‍योटो प्रोटोकॉल के सभी नियमों को लागू करने के लिये सम्‍मेलन बुलाया गया परन्‍तु किसी अन्‍तिम निष्‍कर्ष पर न पहुँच पाने के कारण यह सम्‍मेलन असफल रहा।

- 16-28 जुलाई 2001 में जर्मनी में फिर से एक सम्‍मेलन बुलाया गया और फिर से कोई आम सहमति न बन पाने के कारण असफल हो गया।

- नवम्‍बर 2001 में 160 देशों ने क्‍योटो प्रोटोकॉल के समझौते के अनुसार निर्धारित किये गये लक्ष्‍य को पूरा करने के लिये बताये गये नियमों, निर्देशों तथा तकनीक को स्‍वीकार किया।

- 16 फरवरी 2005 में यह समझौता अन्‍तिम रूप से लागू हो गया। जिसके तहत 129 देशों ने इसकी तरफदारी की है। रूसी अनुसमर्थन से अमेरिका और अन्‍य विकसित देशों पर दवाब निर्मित हुआ है फलता इसके सार्थक परिणाम आने की आशा है।

- अभी हाल ही में 11 सितम्‍बर, 2006 में यूरोप तथा एशियाई देशों ने फिनलैण्‍ड में सम्‍मेलन आयोजित किया। ASEM (Asia-Europe Summit) में इस बात पर चिंता व्‍यक्‍त की गयी कि क्‍योटो प्रोटोकॉल की अवधि समाप्‍त होने के बाद हरित गृह प्रभाव की गैसों के उत्‍सर्जन के बारे में क्‍या किया जायेगा। ।ैम्‍ड जिसमें 25 यूरोपीय देश तथा 13 एशियाई देश शामिल थे, में जलवायु परिवर्तन में होने वाले परिवर्तन को नियंत्रित करने के अधिकतम सम्‍भावित सहयोग के लिये कहा गया तथा 2012 की अवधि के बाद भी ग्रीन हाउस गैसों को नियंत्रित रखने पर सहमति बनायी गयी।

विकसित देशों को इस समझौते द्वारा अपने देश की औद्योगीकरण प्रक्रिया में ह्रास होने का खतरा महसूस हो रहा है। इसी कारण अमेरिका ने क्‍योटो प्रोटोकॉल समझौते पर हस्‍ताक्षर नहीं किये। परन्‍तु यह समझौता भविष्‍य में होने वाले बहुत ही बड़े पतन से बचाने का प्रयास है जिसे अमेरिका जैसा देश नजर अन्दाज़ कर रहा है।

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सम्‍पर्क ः वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता ः हिन्‍दी विभाग दयानन्‍द वैदिक स्‍नातकोत्तर महाविद्यालय उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001 भारत

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