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July 2009
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कफ़न मुंशी प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित कहानी मानी जाती है। वर्षों तक यह कहानी विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में भी रही। इस सच को भी नहीं नकारा जा सकता कि 20वीं सदी की सबसे विवादित कहानी का श्रेय भी कफ़न को ही जाता है। चर्चा और विवाद के अन्तर्द्वन्द्व पर दृष्टि डाले और कहानी को ब्राह्मणवादी नजरिये से देखें तो कहानी उत्कृष्ट है, क्योंकि धर्मशास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुए कहानी में शूद्रों का चाण्डाल रूप प्रस्तुत हुआ है। प्रगतिशील दृष्टि से देखें तो कहानी निकृष्ट है, क्योंकि कहानी में अकल्पनीय अमानवीयता का बोध है।

यहां कहानी के बारे में भी थोड़ा जान लेना समीचीन होगा। 'कफ़न' प्रेमचंद की अन्तिम कहानी है, जो चांद हिन्दी पत्रिका के अप्रेल, 1936 के अंक में प्रकाशित हुई थी। प्रेमचंद ने पहले इसे उर्दू में लिखा था और उर्दू पत्रिका के 'जामियां' के दिसम्बर, 1935 के अंक में छपी थी। कुछ आलोचकों का ऐसा मत है कि कफ़न हिन्दी की मौलिक कहानी नहीं है, बल्कि उर्दू का तर्जुमा है।

कफ़न हिन्दी साहित्य जगत की एक मात्र ऐसी कहानी है, जिसके प्रकाशन की स्वर्ण जयंती 1986 में वर्ष भर मनाई गई। बुद्धिजीवियों और कथा विशेषज्ञों तथा सुधी श्रोताओं के बीच कहानी पर गोष्ठियों, संगोष्ठियों और सेमीनारों का दौर खूब चला। साहित्यिक पत्रिकाओं में विशेष लेख छपे और पूरे साल कफ़न का जश्न रहा। क्योंकि यह कहानी दलितों का मानमर्दन करती है, अतः इस आयोजन पर लाखों रूपये व्यय हुए।

कफ़न के प्रशंसकों में बहुधा वे लोग थे, जिनके पूर्वज कफ़न कहानी के पात्र नहीं थे। कहानी पाठक मन को न केवल घायल ही कर डालती है, बल्कि उसे लहूलुहान भी कर देती है।

कथ्य में व्यावहारिकता उसकी भौतिक सच्चाई की कसौटी होती है। इस भौतिक सच्चाई के बगैर कहानी बिन पंखों के पक्षी के सदृश होगी, जिसके लिए उड़ान भरना तो दूर, छटपटा कर दम तोड़ना नियति है। अपनी व्यावहारिकता के अभाव में कफन कहानी किस कदर बेदम होती जाती है, एक सिहांवलोकन।

जन्म और मृत्यु दो ऐसे शाश्वत सत्य हैं, जब मानव जाति, धर्म, वर्ग का भेदभाव भूल कर संवेदनशील और मानवीय हो जाती है, अगर कोई प्राकृतिक आपदा आड़े नहीं आए।

कहानी के अनुसार रात के समय माधव की पत्नी बुधिया अपनी झोंपड़ी में पड़ी प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी। दर्द के मारे जोर-जोर से कराह रही थी। असहनीय पीड़ा से पांव पटक रही थी। घीसू और माधव दोनों बाप-बेटे अर्थात् बुधिया के ससुर और पति किसानों के खेतों से चुरा कर लाये आलू झोंपड़ी के बाहर अलाव में भून कर खा रहे थे।

औरत, औरत की चाहे कितनी बड़ी दुश्मन हो, वह पिछले सभी द्वेषभाव, मनमुटाव भूल कर प्रसवपीड़ा के वक्त उसे सुलझाने जरूर पहुंचती हैं। प्रायः होता यह कि बिरादरी की बड़ी बूढ़ियां, देवरानी, जेठानी ऐसे अवसर पर गर्भवती महिला की बराबर निगरानी रखती हैं।

प्रसव का ऐसा ही एक प्रसंग 'गोदाम' के 27वें भाग में आता है। गोबर झुनिया को ले कर लखनऊ आ जाता है और खुर्शेद मिर्जा की कोठरी में रहता है। गर्भवती झुनिया को वहां कोई देखने वाला नहीं है। झुनिया पूरे दिनों है, लेकिन दाई-माई का कहीं ठौर नहीं है। पूरा पेट झुनिया पर उसी मोहल्ले की चुहिया नामक एक अनजान महिला की बराबर नजर थी। वह स्त्री धर्म निभाती है-

''चुहिया गोबर से कहती है 'मैं देख लूंगी। बारह बच्चों की मां यों ही नहीं हो गई हूं। तुम बाहर आ जाओ गोबरधन, मैं सब कर लूंगी। बखत पड़़ने पर आदमी ही आदमी के काम आता है।

वह झुनिया के पास जा बैठी और उसका सिर अपनी जांघ पर रख कर उसका पेट सहलाती हुई बोली - मैं तो आज तुम्हें देखते ही समझ गई थी। सच पूछो, तो इसी घड़के में आज मुझे नींद नहींे आई।'

चुहिया स्नेह से उसके केस सहलाती हुई बोली-'धीरज धर बेटी, धीरज धर। अभी छन भर में कष्ट कटा जाता है।'

और चुहिया ने झुनिया को प्रसव पीड़ा से मुक्ति दिला दी। भारी विरोधाभास है। जहां गांव बस्ती है, बिरादरी है, परिवार है वहां तो एक दलित महिला बुधिया को प्रसव के दौरान तड़प-तड़प कर मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। जहां शहर है, अपना कोई नहीं है, एक हमदर्द महिला को फरिश्ते के रूप में प्रस्तुत कर गैर दलित महिला झुनिया को बचा लिया जाता है। बस इसलिये न कि अपने पूर्वाग्रहों के चलते प्रेमचंद को कफन में संपूर्ण दलित जाति को जलील, काहिल और संवेदनहीन दिखाना था। घीसू और माधव सौ निखट्टू, नीच और निकम्मे थे, परन्तु बुधिया तो गांव बस्ती में आदरभावी और व्यवहार कुशल थी।

कितना दारूण है कि बुधिया प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी और मोहल्ले की औरतें उसके पास नहीं आई। यह बात निहायत बेजा है, और साक्षी है, कहानी की ये पंक्तियां- 'घीसू कहता है - मेरे नौ लड़के हुए, घर में कुछ नहीं था, मगर भगवान ने किसी न किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।'

बेड़ा पार लगाने वाली बात घीसू की स्वाभाविक दीनता हैं, ध्यातव्य है, घीसू की पत्नी के नौ लड़के हुए। उन नौ लड़कों के जन्म के वक्त घीसू की पत्नी को मोहल्ले की दाइयों या समझदार औरतों के अनुभवी हाथों ने ही प्रसव से निवृत कराया होगा। गांव में जो औरत ज्यादा बच्चे जन लेती है, उसे बच्चा जनाने के लिए 'सयानी' मान लिए जाने का विश्वास आज भी कायम है। नामुमकिन है, बुधिया के प्रसव के समय घर परिवार मोहल्ले की सयानी औरतें नहीं आएं। बुधिया के मरने के बाद उसे रोने के लिये मोहल्ले की औरतों सहित सभी लोग आ गये और घीसू-माधव के आंसू पोछने लगे।

अपनी अव्यावहारिकता के कारण कहानी की यहां सांसे टूटने लगी हैं और डायलेसिस पर आ गई है।

प्रेमचंद की अगली चूक बड़ी चुभती है। प्रेमचंद का जन्म बनारस के लमही गांव में जरूर हुआ। वे गांव में रहे भी जरूर। लेकिन उनको पढ़ते आभास होता है कि गांव की रीति-रिवाजों, परंपराओं और लोकरीतों से उनका कोई सरोकार नहीं रहा। गांव का बुनियादी ज्ञान तो दूर, उन्हें गावों के बारे में सतही बोध भी नहीं था। यही कारण है कि अपनी सधी बुनावट के कारण ग्रामीण परिवेश से अनभिज्ञ शहरी लोगों को उनकी कहानियां आश्चर्य का चौध पैदा करती है, वहीं ग्रामीण लोगों को बिन सिर-पैर की लगती है। कैसे ?

प्रेमचंद घीसू और माधव पिता-पुत्र दोनों को मृत बुधिया के लिये कफन लाने भेजते है। मृृत्यु जैसे अवसरों पर भाई-बन्धु, सगे-संबंधी मृतक के परिजनों को सांत्वना देते हैं। उनको ढांढ़स बंधाते हैं। शोक संतप्त की पीड़ा से आत्मसात करते उनकी भी आंखें रोने लगती हैं। अगर ऐसे गमगीन अवसर पर मृतक के परिजन कफन लाने के लिये जाना भी चाहें तो उन्हें बिल्कुल भी नहीं जाने दिया जाता है। कफ़न लाने का काम रिश्तेदार या खून का रिश्ता रखने वाले करते हैं। प्रायः उस समय कफन के पैसे भी नहीं मांगे जाते। फिर घीसू और माधव का फाका सर्वज्ञात था।

प्रेमचंद ने घीसू और माधव को कफ़न के लिये भेज कर लोक की खिल्ली तो उड़ाई ही है, गांव की चमार जाति को निष्ठुर, निर्दयी और नाकारा साबित करने का दुःसाहस भी किया है। बाप-बेटे को गांव के जमींदार के यहां बुधिया के कफन के लिये चंदा करने भिजवाते हैं। जहां अन्य साहित्यकार जमींदारों को शोषक का पर्याय मान रहे थे, वहीं प्रेमचंद उन्हें दयालु प्रवृत्ति का होना सिद्ध कर रहे थे। यहां प्रेमचंद ने जमींदारी का बड़ी श्रद्धा से यशोगान किया है। जमींदार घीसू की ओर दो रूपये फेंक देते हैं। चंदा बटोरते-बटोरते दोनों के पास पांच रूपये इकट्ठा हो जाते हैं, कहना होगा कि 70 वर्ष पहले यह एक बहुत बड़ी रकम थी।

घीसू और माधव कफ़न के लिये मांगी गई इस रकम को लेकर बाजार गये। बाजार में वे कफन नहीं खरीदने के मन में यूं ही इधर-उधर टटपोले मारते फिरते हैं, खाते-पीते हैं और रात होने का इंतजार करते हैं, ताकि सस्ते से सस्ता कफन खरीद सकें। उनके चेहरे पर इस बात की रंज भी नहीं है कि घर में दो लाशें (बुधिया और उसके पेट का बच्चा) पड़ी हैं। लोकव्यवार में कफ़न खोर को मांसखोर से ज्यादा पतित माना जाता है।

यहां रात होना कहानी का आधारभूत ढांचा है। कहानी में एक त्रासद संवाद है -

माधव बोला- 'हां, लकडी तो बहुत हैं, अब कफन चाहिये।'

'तो चलो, कोई हल्का सा कफन लें।''

'हां और क्या? लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है।'

कहानी की प्राणवायु है- 'लाश उठते-उठते रात हो जाएगी।' रात के इस शरूर से ही कहानी में क्रूरता आई है। इसी रात में घीसू और माधव कफ़न के पैसे की दारू पीते हैं और जी भर जश्न मनाते हैं। वे धर्मनिष्ठ हैं। भाग्य भगवान में उनकी आस्था है। स्वर्ग, नरक, बैकुण्ठ का उन्हें भान है। लेकिन रात के कारण निश्चित हैं।, 'लाश उठते-उठते रात हो जाएगी।'

कहानी का यही चरमोत्कर्ष है, जिसकी नींव हवा पर खड़ी है। प्रचलित लोकरीत के अनुसार मुर्दा चाहे जिसी भी धर्म, जाति, समुदाय अथवा वर्ग का हो, उसे रात में जलाया ही नहीं जाता है। अगर किसी की मृत्यु दिन छिपने पर हो जाती है, लाश को रात भर रखा जाता है और दूसरे दिन मृतक का दाह संस्कार किया जाता है। इसके दो व्यावहारिक पहलू है। धर्म की दृष्टि से यह पाप है और अनिष्ट की श्रेणी में आता है। व्यवहार की दृष्टि से रात में दाह संस्कार करने से दिवंगत का क्रियाकर्म ठीक से नहीं हो पाता है।

'लाश उठते-उठते रात हो जायगी' कहानी की जान है और यह जान इस अटल सत्य से निकल जाती है कि 'रात में लाश उठती ही नहीं है।' अब देते रहो शब्द ज्ञान और भाषा शैली के महंगे इंजेक्शन। विड़म्बना यह है कि कफ़न कहानी तक आते-आते प्रेमचंद 54-55 के वृद्ध हो गये थे, उन्हें इतना तक मालूम नहीं, रात में लाश उठती ही नहीं है। कफ़न लिख बैठे।

सारिका अक्टूबर, 1986 कें अंक में प्रो रामेश्वर शर्मा लिखते हैं - ''घीसू और माधव प्रेमचंदीय ब्राह्मण हैं। महाब्राह्मण का मृतक से रागात्मक संबंध तो नहीं होता, यहां तो मानवीय राग चेतना के संपूर्ण मूल्य को ध्वस्त कर प्रेमचंद घीसू-माधव का समर्थन करते नज़र आते हैं और उस पर तुर्रा प्रगतिशीलता का। इस कहानी में प्रेमचंद का पतन मरणोन्मुख प्रेमचंद की बुद्धि का विनष्ट हो जाना है।''

(संदर्भ- आधुनिक हिन्दी, कालजयी साहित्य पृष्ठ-67)

सवाल उठता है कि इनती गलीज कहानी लिखने के लिये प्रेमचंद ने दलितों (चमारों) को ही क्यों चुना? क्या इसकी पृष्टभूमि में किसी अन्य बड़ी जाति के गरीब पात्र नहीं हो सकते थे?

राष्ट्रीय सहारा के 8 अगस्त, 2004 के अंक में विचारक और वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस अपने लेख 'प्रेमचंद पुनर्पाठ क्यों नहीं ? में लिखते हैं - प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में शूद्र जाति के अनेक चरित्रों को लिया है और उनकी दर्दनाक गाथाएं कहीं हैं। यह अलग बात है कि कफ़न तक पहुंच कर उन्होंने उनके प्रति जरूरत से ज्यादा अनुकंपा कर दी। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार 'दरिद्र शूद्र ही नहीं, ब्राह्मण भी होता है। क्या स्थिति बनती अगर कफन के पैसे से दारू और पूड़ी खाने-पीने वाले शूद्र नहीं, बा्रह्मण बाप-बेटे होते ? यह स्थिति प्रेमचंद को स्वीकार नहीं हो सकती थी। बहू के कफन की दारू वे ब्राह्मण बाप को नहीं पिला सकते थे, क्योंकि प्रेमचंद की मानसिकता के अनुसार हिन्दू दो तरह के रहे हैं। 'शुद्ध पवित्र सवर्ण और अशुद्ध गंदे शूद्र।'

प्रेमचंद की कहानियों में सार कम और अव्यावहारिकता ज्यादा है। वे ऐसे कथ्य उठाते हैं, जो निपट नाटकीय और अविश्वासी हैं और जीवन जीती जिंदगियों से मेल नहीं खाते। उनकी कोई भी कहानी अनुभव की कमी अभाव और अव्यावहारिकता की छूत से नहीं बच पाई है। शूद्रों के मामलों में उन्होंने मनुस्मृति में वर्णित सूक्तों का पूरा ध्यान रखा है। कफ़न अति है। चमार जाति कितनी निकृष्ट हो सकती है, कहानी में बस एकमात्र यही संदेश निहित है।

आप प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं, प्रेमचंद जी की कफ़न को जरा इस एंगल से पढ़ कर देखें।

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संक्षिप्त परिचय

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रत्नकुमार सांभरिया

जन्म - 06.01.1956 (छः जनवरी, सन् उन्नीस सौ छप्पन) गांव - भाड़ावास, जिला - रेवाड़ी (हरियाणा) पिछले 30 वर्षों से राजस्थान में।

शिक्षा - एम.ए.बी.एड., बी.जे.एम.सी. (पत्रकारिता में डिप्लोमा)

कृतियां - 1) समाज की नाक - एकांकी संग्रह

2) बांग और अन्य लघुकथाएं - लघुकथा संग्रह

3) हुकम की दुग्गी - कहानी संग्रह

4) काल तथा अन्य कहानियां - कहानी संग्रह

5) बिपर सूदर एक कीने - कहानी संग्रह (शीघ्र प्रकाश्य)

सृजन - हंस, कथादेश, वागर्थ, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती, अक्षरा, शेष जनसत्ता सबरंग अन्यथा अक्षरपर्व, साक्षात्कार, इन्द्रप्रस्थ भारती, सरिता, युद्धरत आमआदमी, जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के अतिरिक्त समाचार पत्रों में कहानियां, लघुकथाएं, पुस्तक समीक्षाएं और फीचर प्रकाशित।

''मै जीती'' कहानी पर टेलीफिपम ।

कहानियों एवं लघुकथाओं का रेडियो नाट्य रूपान्तर प्रसारित।

शोधकार्य - ''बांग और अन्य लघुकथाएं'' लघु संग्रह पर कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय हरियाणा और गुरूघासीदास वश्विविद्यालय बिलासपुर छत्तीसगढ़ से शोधकार्य (एम फिल) कहानियों पर मदुरै कामराज विश्वविद्यालय सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों से 12 शोधार्थी शोधरत।

सम्मान - नवज्योति कथा सम्मान।

- सहारा समय कथा चयन प्रतियोगिता, 2006 में पुरस्कृत, ''चपड़ासन'' कहानी के लिए उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित।

- कथादेश अखिल भारतीय हिन्दी कहानी प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार ''बिपर सूदर एक कीने'' कहानी पर

- राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक पुरस्कार-2007 ''खेत'' कहानी पर

 

संपर्क - भाड़ावास हाउस, सी-137, महेश नगर, जयपुर-302015, फोन- 0141-2502035, मो0- 09460474465

 

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ओड़िया कहानी

 

बलात्कृता

 

मूल ओड़िया कहानी: सरोजिनी साहू

 

हिंदी अनुवाद: दिनेश कुमार माली

 

यह कहानीकार की सद्यतम प्रकाशित कहानियों में से है, जो न तो किसी दूसरी भाषा में अनुदित हुई है, न किसी कहानी संग्रह में संकलित हुई है.  यह कहानी 'टाईम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप'  की ओड़िया पत्रिका 'आमो समय' के जून , २००९ अंक में प्रकाशित हुई है. कहानी का मूल शीर्षक 'धर्षिता' था , पर 'धर्षिता'  शब्द हिंदी में न होने के कारण मैंने उस कहानी का शीर्षक  'बलात्कृता' रखना उचित समझा. कहानीकार की सद्यतम कहानी का प्रथम हिंदी अनुवाद पेश करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है.

बलात्कृता

क्या सभी आकस्मिक घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती है? अगर कोई आकस्मिक घटना घटती है तो अचानक अपने आप यूँ ही घट जाती है; जिसका कार्यकरण से कोई सम्बन्ध है?

बहुत ही ज्यादा आस्तिक नहीं थी सुसी, न बहुत ज्यादा नास्तिक थी वह. कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि ये सब बातें मन को सांत्वना देने के लिए केवल कुछ मनगढ़ंत दार्शनिक मुहावरें जैसे है.

सुबह से बहुत लोगों का ताँता लगने लगा था घर में. एक के बाद एक लोग पहुँच रहे थे या तो कौतुहल-वश देखने के लिए या फिर अपनी सहानुभूति प्रकट करने के लिए. घर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था. जीवन तो और भी अस्त-व्यस्त था! दस दिन हो गए थे, इधर-उधर घुमने-फिरने में, आज ही ये लोग अपने घर लौटे थे. रास्ते भर यही सोच-सोचकर आ रहे थे, घर पहुंचकर शांति से गहरी नींद में सो जायेंगे.  रात के तीन बजे उनकी ट्रेन अपने स्टेशन पर आनेवाली थी. इसलिए मोबाईल फ़ोन में  'अलार्म' सेट करने के बाद भी, आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. पलकें एक मिनट के लिए भी नहीं झपकी थी. थोडी-थोडी देर बाद नींद टूट जाती थी. ट्रेन से उतरकर घर लौटकर देखा था, कि घर अब और कोई आश्रय-स्थल नहीं रहा था.

सुबह से ही घर में लोग जुटने लगे थे. कभी-कभी तीन-चार मिलकर आ रहे थे तो कभी-कभी कोई अकेला ही. सभी को शुरू से उस बात का वर्णन करना पड़ता था, कि यह घटना कैसे घटी होगी.यहाँ तक कि डेमोंस्ट्रेशन करके भी दिखाना पड़ता था. सब कुछ देखने व सुन लेने के बाद, वे लोग यही कहते थे कि आप लोगों को इतना बड़ा खतरा नहीं उठाना चाहिए था. अगर कोई एक आदमी भी घर में रुक जाता तो, शायद आज यह घटना नहीं घटती . ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि अपराधी को हर हालत में अपराध करने का पूरा-पूरा हक़ है. और सुसी के परिवार वालों की भूल है कि उन्होंने कोई सावधानी नहीं बरती.  

इन्हीं 'सावधानी' व 'सतर्कता' की बातें सुनने से सुसी को लगता था, कि बारिश के लिए छतरी, सांप के लिए लाठी, अँधेरे के लिए टॉर्च का प्रयोग कर जैसे उसकी सारी जिंदगी बीत जायेगी!  ऐसा कभी होता है क्या? चारों-दिशायें, चारों-कोनें, ऊपर-नीचे देख-देखकर साबुत जिन्दगी जीना संभव है?

:" आप इंश्योरेंस करवाए थे क्या?"

:" इंश्योरेंस, नहीं, नहीं."

:" करवाना चाहिए था ना!"

सुसी और क्या जबाव देती?इस संसार में सब कुछ क्षणभंगुर और अस्थायी है. जो आज है,कल वह नहीं रहेगा. किस-किस चीज का इंश्योरेंस करवाएगी वह? और किस-किस का नहीं ! घर, गाड़ी, जीवन, आँखें, कान, नाक, ह्रदय, यकृत और वृक्क? इंश्योरेंस कर देने के बाद, 'पाने और खोने' का खेल बंद हो जायेगा? किसी भी रास्ते से तब भी आ पहुँचेगी दुःख और यंत्रणा, तक्षक सांप की तरह!

:"कितना गया?"

:" क्या -क्या गया ? "

धीरे-धीरे, कुछ -कुछ याद कर पा रही थी सुसी . एक के बाद एक चीजें याद आ रही थी उसको . क्या बोल पाती वह ? आते समय , जिस हालत में उसने अपने घर को देखा था बस उसी बात को दुहरा रही थी सभी के सामने .

उस दिन जब उन्होंने अपने घर की खिड़की के टूटे हुए शीशे के छेद में झाँककर देखा , तो दिखाई पड़ी थी अन्धेरें आँगन में चांदनी की तरह फैली हुई रोशनी. आश्चर्य से सुसी ने पूछा था ," अरे ! बेबी के कमरे की लाइट कैसे जल रही है ?" जब कभी वे लोग बाहर जाते थे , तो घर की लाइट बंद करना और ताला लगाने का काम अजितेश का होता था . इसलिए यह प्रश्न अजितेश के लिए था . " आप क्या बेबी के कमरे की लाइट बुझाना भूल गए थे ?" गाडी से सूटकेस व अन्य सामान उतार रहा था अजितेश. कहने लगा था ," मैंने तो स्विच ऑफ किया था ." बेबी बोली थी :-" पापा , आप भूल गए होगे . याद कीजिये जाते समय लोड-शेडिंग हुआ था ना ? ." 

ग्रिल का ताला खोल दी थी सुसी . इसके बाद वह मुख्य -द्वार का ताल खोलने लगी थी . ताला खोलकर ,धक्का देने लगी थी .पर जितना भी धक्का दे पर दरवाजा नहीं खुल रहा था . "अरे ! देखो , "चिल्लाकर बोली थी सुसी ,"पता नहीं क्यों ,दरवाजा नहीं खुल रहा है . लगता है किसी ने भीतर से बंद किया है ? कौन है अंदर ? " .सुसी का दिल धड़कने लगा था . वह कांपने लगी थी . " दरवाजा क्यों नहीं खुल रहा है ? " भागकर आया था अजितेश , पीछे -पीछे वह ड्राईवर भी . सुसी ग्रिल के दरवाजे के पास आकर ,टूटे शीशे से बने छेद में से झाँककर देखने लगी वह दृश्य . बड़ा ही ह्रदय विदारक था वह दृश्य!  उसकी अलमीरा चित्त सोयी पड़ी थी. दोनों तरफ बाजू फैलाते हुए. खुले पड़े थे अलमीरा के दोनों पट. सुसी की छाती धक्-धक् कांपने लगी थी जोर जोर से.रुआंसी होकर बोली थी,-"हे,देखो!"

:" ऐसा क्यों कर रही हो?" बौखलाकर अजितेश बोला था. इसके बाद उसने बड़े ही धैर्य के साथ पडौसियों को जगाया था. ड्राईवर और पडौसियों को साथ लेकर पीछे वाले दरवाजे की तरफ गया था अजितेश. पीछे का दरवाजा खुला था. पर किसी ने बड़ी सावधानी के साथ, उस दरवाजा को चौखट से सटा दिया था. दूर से ऐसा लग रहा था जैसे दरवाजा वास्तव में बंद है.

ड्राईवर कहने लगा-"चलिए,सर! पुलिस स्टेशन चलेंगे." पडौसी सहानुभूति जता रहे थे. कह रहे थे,-" दो-चार दिन पहले, आधी रात को,  धड-धड की आवाजें आ रही थी आपके घर की तरफ से. हम तो सोच रहे थे कि शायद कोई पेड़ काट रहा होगा."

अजितेश ड्राईवर को लेकर पुलिस स्टेशन जाते समय यह कहते हुए गया था-" किसी भी चीजों को इधर-उधर मत करना. छूना भी मत. थाने में एफ.आई.आर देकर आ रहा हूँ." अजितेश के जाने के बाद पडौसी भी आपस में चलो चलो कहते हुए अपने घर को लौट गये.

सुसी ने देखा था कि उसका पूरा घर बिखरा-बिखरा , अस्त-व्यस्त पडा था. जो चीज जहाँ होनी चाहिए थी, वहां पर नहीं थी. किसी ने सभी तकियों को फर्श पर बिछा कर, उसके उपर सुला दिया था उसकी अलमीरा को. पास में मूक-दर्शक बनकर खड़ी हुई थी बेबी की वह अलमीरा. जमीन पर बिखरी हुई थी बाज़ार से खरीदी हुई इमिटेशन ज्वैलरी जैसे कान के झुमके,बालियाँ और गले का हार.यहाँ तक कि, भगवान के पूजा-स्थल को भी किसी ने छेड़ दिया था.

सुसी ने सभी कमरों में जाकर देखा था. टीवी अपनी जगह पर ज्यों का त्यों था, कंप्यूटर भी वैसे का वैसे ही पड़ा था. माइक्रो-ओवेन रसोई घर में झपकी लगाकर सोयी हुई थी. और बाकी सभी वस्तुयें अपनी-अपनी जगह पर सुरक्षित थी. पर चोर ने नोकिया का पुराना मोबाइल सेट और एक पुराने कैमरा को अनुपयोगी समझकर बेबी के बिस्तर में फेंक दिया था.

परन्तु जब सुसी ने बेड रूम के बाहर का पर्दा हटाकर देखा, तो वह आर्श्चय-चकित रह गयी यह देखकर कि उस रूम का ताला ज्यों का त्यों लगा हुआ था.अरे! किसीने उस कक्षा को छुआ तक नहीं, उसे ज्यों का त्यों अक्षत छोड़ दिया.

बेबी ने आवाज लगायी, "मम्मी, देखो,देखो."

"क्या हुआ," बेबी के कमरे में घुसते हुए सुसी ने पूछा.

"जिस चोर ने तुम्हारी अलमीरा को तोडा, उसने मेरी अलमीरा को क्यों नहीं तोडा?"

आस-पास ही थी दोनों अलमीरा, बेबी के कमरे में. एक सुसी की अलमीरा, तो दूसरी बेबी की.बेबी की अलमीरा में बेबी की हरेक चीज तथा कपडा रखा जाता था. सुसी की अलमीरा में लॉकर को छोड़ बची हुई जगह में साडी का इतना अधिक्य था कि और साडी रखने से उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता था.

देखते ही देखते सुबह हो गयी.ड्राईवर और अजितेश, पुलिस स्टेशन में थानेदार को न पाकर , उसके घर चले गए थे.थानेदार की किडनी में स्टोन था. वह वेल्लोर से कुछ दिन हुए लौटा था.  "मैं सुबह नौ बजे से पहले नहीं आ पाउँगा " बड़े ही कटु आवाज में बोला था थानेदार, " आप लोग जाइये, सब कुछ सजा कर रख दीजिये, मैं नौ बजे तक पहुँचता हूँ."

ड्राईवर की सहायता से नीचे मूर्छित पड़ी अलमीरा को उठाकर खडा किया था अजितेश ने. अब, दोनों अलमीरा पास पास खड़ी हुई थीं.

ड्राईवर ने जाने की इजाज़त मांगी, " तो, मैं जा रहा हूँ ,सर." अजितेश को थानेदार के ऊपर पहले से ही काफी असंतोष था, और ड्राईवर से कहने लगा,"ठीक है, तुम जाओ, और रूककर करोगे भी क्या?" ड्राईवर रात दो बजे से प्रतीक्षा कर रहा था स्टेशन पर. अजितेश का अनुमति पाते ही वह तुरंत रवाना हो गया. किस रस्ते से चोरी हुई होगी, छान-बीन करने के लिए सुसी और अजितेश इधर-उधर देखने लगे. पता चला कि बाथरूम के रोशन दान में लगा हुआ शीशा टूट कर नीचे गिरा हुआ था. चोर जरुर उसी इसी रास्ते से होकर अंदर घुसा होगा, जिसका वह प्रमाण छोड़कर गया कोमोड़ के ऊपर रखा हुआ था फूलदान. आरी-पत्ती की मदद से सब ताले टूटे हुए थे.

सूटकेस, एयर बैग, तब तक ड्राइंग रूम में रखा जा चुका था. इतनी देर तक हाथ-मुहं धोने की भी फुरसत नहीं थी सुसी की. सवेरे-सवेरे टहलते हुए लोग बाहर चारदीवारी का दरवाजा खोलकर घर के भीतर आ गये थे. पता नहीं, इतनी सुबह-सुबह इस घटना की जानकारी लोगों को कैसे मिल गयी? 

:" अरे,ये सब कैसे हो गया?"

:" आप लोग कहाँ गये थे?"

:" चार दिन पहले, मोर्निंग-वाक में जाते समय मैंने देखा था की आपके कमरे की एक लाइट जल रही थी. मैंने सोचा कि आप लोग बंद करना भूल गये होंगे."

:" दस दिन के लिए बाहर गये थे? किसी को तो बताकर जाना चाहिए था."

:" आपको पता नहीं है, ये जो जगह है, यहाँ चोरों की भरमार है."

उस समय तक पूरा शरीर थक कर चूर-चूर हो चूका था. एक, उपर से लम्बी यात्रा की थकान;  दूसरी, रात भर की अनिद्रा. ऐसा लग रहा था मानो शरीर का पुर्जा-पुर्जा ढीला हो गया हो. लेकिन लोगों का आना-जाना जारी था. जल्दी-जल्दी, घर साफ़ कर पहले जैसी साफ-सुथरी अवस्था में लाने की कोशिश कर रही थी सुसी.

उसने हाथ घुमा कर भीतर से देखा था कि लॉकर के भीतर फूटी कौडी भी नहीं थी और लॉकर बाहर से टूटकर टेढा हो गया था. सोना चांदी के गहने और अब कहाँ होंगे? घर सजाते-सजाते, बाद में सुसी को यह भी पता चला कि पीतल का एक बड़ा शो-पीस, कांसे की लक्ष्मी की मूर्ति, चांदी का कोणार्क-चक्र भी शो-केस में से गायब हैं.

यह सब देखकर बेबी को तो मानो रोना आ गया हो. अजितेश डांटते हुए बोला था," रो क्यों रही हो? ऐसा क्या हो गया है?"

:" मम्मी, देख रही हो, मेरे कान के दो जोड़ी झुमके भी चोर ले गया. चोर मर क्यों नहीं गया? मैं उसको, श्राप देती हूँ कि उसको सात जन्मों तक कोई खाना नहीं मिलेगा?"  

:" चुप हो जा, पागल जैसे क्यों हो रही हो?"

सुसी डांटने लगी थी. बेबी को कान के झुमकों के लिए रोते देखकर सुसी को याद आने लगा था अपने सारे गहनों के बारे में.

:" तुम्हारी सोने की एक चेन , मेरा मगल सूत्र, दो चूड़ियाँ इतना ही तो घर में था न?" पूछने लगी थी सुसी बेबी से.

:"और मेरी अंगूठी?" पूछने लगी थी बेबी.

:" हाँ, हाँ, वह अंगूठी भी चली गयी."

:" पापा की गोल्डन पट्टे वाली घड़ी?"

:" ठीक बोल रही हो, वह भी."

:" और याद करो तो बेबी और किस-किस चीज की चोरी हुई होगी?"

:" आप के सोने का हार, उसको आपने कहाँ रखा था?"

:" इमिटेशन डिब्बे में ही तो था. क्रिस्टल के साथ गूँथकर रखा हुआ था." सुसी बेबी के नकली गहनों के सब डिब्बे खोल-कर देखने लगी थी.

:" नहीं, नहीं, यहाँ तो कहीं भी नहीं है." बेबी कह रही थी.

:" एक और बात, अगर आपको पता चल जायेगा तो आपका मन बहुत दुखी हो जायेगा, इसलिए मैं आपको नहीं बता रही हूँ."

सुसी की आँखों में आंसू देखने से जैसे उसको ख़ुशी मिलेगी, उसी लहजे में चिढाते हुए बोली थी बेबी, " बोलूं?"

:" ज्यादा नाटक मत कर, गुस्सा मत दिला.बोल रही हूँ,ऐसे भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा है. तुम्हारे कह देने से और क्या ज्यादा हो जायेगा?"

:" वह बहुमूल्य पत्थरों से जडित चौकोर पेंडेंट, जो आपके बचपन की स्मृति थी, कहाँ गया ? "

बेबी ठीक बोल रही थी,पुराना पेंडेंट चेन से कटकर बाहर निकल आ रहा था, इसीलिए चेन से निकाल कर अलग से रख दी थी सुसी. क्या , किसी ज़माने की एक अनमोल धरोहर थी वह? जब वह हाई-स्कूल में पढ़ती थी तब माँ उसके लिए बनवाई थी बहुमूल्य पत्थर जड़ित अंगूठी, कान के झूमके तथा पेंडेंट के साथ एक सोने की चेन. अब तो माँ भी मर चुकी है., और वह सोनार भी. उस समय तो वह सोनार जवान था.  अगर उसको एक अच्छा शिल्पी कहें , तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. नए-नए डिजाईन के चित्र बनाकर, नई-नई डिजाईन के गहनें गढ़ना उसकी एक अजीज अभिरुचि हुआ करती थी. छोटे-छोटे छब्बीस नग, बीच में एक बड़ा सा सफ़ेद नग लगा हुआ चौकोर आकार का था वह पेंडेंट. सबसे ज्यादा सुन्दर था वह. सभी बहनें बराबर शिकायत करती रहती थीं उस सोनार ने उनके लिए इतनी सुन्दर डिजाईन क्यों नहीं बनाई? कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थी उस पेंडेंट से. इतने दिनों तक पेंडेंट था उसके साथ. माँ ने अपनी बचत किये हुए पैसों से बनवाई थी उसको. उसकी याद आते ही माँ की बहुत याद आने लगी थी. जब माँ जिन्दा थी, वह उसके महत्त्व को नहीं समझ पाई थी . अभी समझ में आ रहा था कि किस प्रकार एक मध्यम-वर्गीय परिवार की माँ अपने जीवन में पैसा-पैसा जोड़कर बच्चों के लिए बहुत कुछ कर ली थी. आखिर, उसे भी चोर ले गया ?

:" आप दुखी हो गयी हो क्या?माँ, मेरी भी तो चेन और कान की बालियाँ चोरी हो गयी है."

:" बेबी,तुम्हारी माँ तो अभी जिंदा है.तुम्हारे लिए फिर से बनवा देगी. पर, वह पेंडेंट तो मेरे शरीर पर बहुत दिनों तक साथ-साथ था, इसलिए लगाव हो गया था, जैसे कि शरीर का कोई अंग हो."

बेबी फिर एक बार किसी गवांर औरत की भांति चोर को गाली देना शुरू कर दी थी.

:"तू ज्यादा बक-बक मत कर, बहुत काम पडा हुआ है, उसमें मेरा हाथ बटा." कहते हुए बाहर से लाये हुए सूटकेस को खोली थी सुसी.

एक घंटे के बाद अजितेश लौट कर आ गया था.साथ में पुलिस वाले और मटन कि थैली.ऐसे समय में मटन देख कर सुसी का मन आश्चर्य और विरक्ति भाव से भर गयी थी. पुलिस के सामने अजितेश को कुछ भी न बोलते हुए, चुपचाप मटन की थैली को भीतर रख दी थी सुसी.  

बाथरूम के रोशनदान के पास जाकर थानेदार अनुमान लगाने लगा था कि एक फुट चौडे रास्ते से तो केवल सात-आठ साल का लड़का ही पार हो सकता है. लेकिन आठ साल का लड़का आरी-पत्ती से सब ताले कैसे खोल पायेगा? इतने बड़े अलमीरा को कैसे सुला पायेगा? ऐसी बहुत सारी अनर्गल बकवास करने के बाद अजितेश, सुसी और बेबी का पूरा नाम, उम्र आदि लिखकर वापस चला गया था. जाते समय यह कहते हुए गया था, अगर मेरी तक़दीर में लिखा होगा, तो आपको आपका सामान वापस मिल जायेगा.

'थानेदार की तक़दीर?' पहले पहले तो कुछ भी समझ नहीं पाई थी सुसी.तभी अजितेश झुंझलाकर बोला,-"पहले जाओ, गेट पर ताला लगाकर आओ, जल्दी-जल्दी खाना बनाओ ,फिर खाना खाकर सोया जाय."

:" जल्दी-जल्दी कैसे खाना पकाऊंगी? क्या सोचकर अपने साथ मटन लेकर आ गए? लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे> इधर तो इनके घर में चोरी हुई है,  और उधर ये असभ्य लोग मटन खाकर ख़ुशी मना रहे हैं."

:" लोगों का और कुछ काम नहीं है, जो तुम्हारे घर में क्या प़क रहा है देखने के लिए आएंगे?"

तपाक से बेबी बोल उठी,:" पापा, मुझे आश्चर्य हो रहा है, आपको तनिक भी दुख नहीं लगा?"

अजितेश सुलझे हुए शब्दों में कहने लगा,:"जो गया, सो गया. क्या इन चीजों के लिए हम अपना जीवन जीना छोड़ देंगे? मेरी बड़ी दीदी की शादी के पहले दिन, चोर घर में सेंध मारकर शादी के सभी सामान लेकर फरार हो गया. सवेरे-सवेरे जब लोगों ने देखा, तो जोर-जोर से रोना धोना शुरू कर दिए. परन्तु मेरे पिताजी तो ऐसे बैठे थे जैसे उन पर कोई फर्क नहीं पडा हो, एकदम निर्विकार. भोज का सामान फिर से ख़रीदा गया. तथा स्व-जातीय बंधु-बांधवों के सामने वर के पिता को हाथ जोड़कर उन्होंने निवेदन किया था कि एक हफ्ते के अन्दर दहेज़ का सभी सामान खरीदकर पहुंचा देंगे.  

प्रेशर-कुकर की सिटी बज रही थी. भांप से मीट पकने की खुशबू भी चारों तरफ फैलने लगी थी. फिर एक बार, ' कालिंग-बेल' बजने लगी थी. कौन आ गया इस दोपहर के समय? रसोई घर से सुसी चिल्लाई,-" बेबी,  दरवाजा खोलो तो."

: " माँ, आंटी लोग आये है?" बेबी ने कहा था.

संकोचवश जड़वत हो गयी थी सुसी.कालोनी के सात-आठ औरतें. इधर रसोई घरसे मटन पकने की सुवास चारों तरफ फ़ैल रही थी. कोशिश करने से भी वह छुपा नहीं पायेगी. देखो,कितना पराधीन है इंसान? अपनी मर्जी से वह जी भी नहीं सकता.

फिर एकबार दिखाना पडा सबको वह टूटी हुई अलमीरा को खोलकर.

:"हाँ, देख रहे हैं न?"

:"अन्दर का लॉकर भी."

:"हाँ, उसको तो पीट-पीटकर टेढ़ा कर दिए हैं."

फिर एकबार बाथरूम का टूटा हुआ रोशनदान, फिर एकबार शो-केस की वह खाली जगह,फिर एकबार कितना गया की रट.   फट से बेबी बोली,:" ६ जोड़ी कान के झुमके, मेरी चेन, माँ का मंगल सूत्र---"

": इतना सारा सामान आप घर में छोड़कर बाहर चले गए थे? फिर भी मोटा-मोटी कितने का होगा?"

": सत्तर या अस्सी हजार के आस-पास ."

:" लाख बोलिए न, जो रेट बढ़ा है आजकल सोने का.चोर के लिए छोड़कर गए थे जैसे. चोर की तो चांदनी हो गयी."

फिर एक बार प्रेशर-कुकर की सिटी बजने लगी. अब सुसी का चेहरा गंभीर होने लगा. ये औरतें जा क्यों नहीं रही हैं? दोपहर में भी इनका कोई काम-धन्धा नहीं है क्या? घूम-घूमकर सारे कोनों को देख रही हैं. घर की बहुत सारी जगहों पर मकडी के जाले झूल रहे थे, धूल-धन्गड़ जमा था.ये सब उनकी नजरों में आयेगा. और जब ये घर से बाहर जायेंगे, तो इन्हीं बातों की चर्चा भी करेंगे. फिर, उपर से आ रही थी पके हुए मटन की महक.धीरे-धीरे सुसी उनसे हट कर चुप-चाप रहने लगी.ये सब औरतें गप हांक रही थीं.  कब, किसके घर कैसे चोरी हुई. इन्हीं सब बातों को लेकर वे रम गयी थीं.

अजितेश कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे खों-खों कर खांसने लगा था .नहीं तो पता नहीं, कितनी देर तक वे औरतें बातें करती?

उस समय तक सुसी को ज्यादा दुःख नहीं हुआ था. लोग आ रहे थे, देख रहे थे, सहानुभूति जता रहे थे. सबको टूटी-फूटी अलमीरा, चोर के घुसने का रास्ता दिखा रही थी. पर जब सुसी पूजा करने गयी, तो मानो उसके धीरज का बांध टूट गया हो.भगवन की छोटी-छोटी मूर्तियाँ, अपने-अपने निश्चित स्थान से गिरी हुई थीं. डिब्बे में से प्रसाद नीचे गिर गया था . धुप, अगरबत्ती,  सब बिखरा हुआ था इधर उधर. सिंदूर की डिब्बिया भी गिरी हुई थी.  होम की लकड़ियां भी बिखरी हुई थी इधर-उधर.चोर उपवास-व्रत वाली किताबों की पोटली खोलकर लगभग तीस चांदी के सिक्कों को भी ले गया था.कितने सालों से धन-तेरस पर खरीद कर इकट्ठी की थी सुसी ने. एक ही झटके में सारी स्मृतियाँ विलीन सी हो गयी.

भगवान की मूर्ति को किसी गंदे हाथों ने जरुर छुआ होगा.उनकी अनुपस्थिति में चोर ने जरुर इधर-उधर स्पर्श किया होगा. मन के अन्दर से उठते हुए विचार, तुरन्त ही असहायता में बदल गए हो जैसे. सुसी के घर में और कुछ छुपी हुई चीज बाकी नहीं थी.चोर को तो जैसे हरेक जगह का पता चल गया था. उसका घर अब उसे घर जैसा नहीं लगा.फटे-पुराने कपड़ों से लेकर, कीमती सिल्क की साड़ी कहाँ रखती थी सुसी, मानो चोर को सब मालूम हो गया था. दीवार की छोटी से छोटी दरार से लेकर घर की बड़ी से बड़ी, गुप्त से गुप्त जगह की जानकारी भी थी चोर के पास.

तुरन्त ही सुसी को याद आ गया टूटे हुए शीशे के अन्दर से दिखा हुआ अलमीरा का वह ह्रदय-विदारक दृश्य. ऐसे चित्त सोयी पड़ी थी वह अलमीरा, जैसे किसी ने उसे जमीन पर लिटाकर जबरदस्ती उसके साथ बलात्कार कर दिया हो. खुले हुए दोनों पट ऐसे लग रहे थे, मानो उस नारी ने अपनी कमजोर बाहें विवश होकर फैला दी हो. पूरे शरीर पर दाग ही दाग., मानो शैतान के नाखूनों से लहू-लुहान होकर हवश का शिकार बन गयी हो. रंग की परत हटकर प्राइमर तो ऐसे दिख रहा था मानो लाल-लाल खून के धब्बे दिख रहे हो. दुखी मन से सुसी की छाती भर आयी थी . फिर अपने-आपको संभालते हुए बोली थी ,-"अरे, सुन रहे हो?"

खाने का इंतज़ार करते-करते नींद से बोझिल सा हो रहा था अजितेश. सुसी की आवाज सुनकर नींद में ही बड़बड़ाने लगा,: " क्या हुआ ?"

क्या बोल पाती सूसी? उसके अन्दर तो फूट रही थी एक अजीब से अनुभव की ज्वालामुखी!  कैसे बखान कर पायेगी किसी को?चुप हो गयी थी सुसी.

:" क्या हो गया? क्यों बुला रही थी?"

फिर से अजितेश ने पूछा, "जल्दी पूजा खत्म करो, मुझे जोरों की नींद लग रही है. खाना खाते ही सो जाऊंगा."

भगवान की मूर्तियाँ अब उसे अछूत लगने लगी थीं. चोर ने उन सबको बच्चों के खिलौनों के भांति लुढ़का दिया था. उसके कठोर, गंदे हाथों ने स्पर्श किया होगा उन मूर्तियों को . उसने संक्षिप्त में ही सारी पूजा समाप्त कर दी.

खाना परोसते समय और एक बार अनमने ढंग से बोलने लगी थी सुसी,:" सुन रहे हो ?"

:" क्या हुआ ?" इस बार गुस्से से बोला था अजितेश,"क्या बोलना है , बोल क्यों नहीं रही हो ? एक घंटा हो गया सिर्फ 'सुनते हो' 'सुनते हो'  बोल रही हो."

:" मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है." बोली थी सुसी.

:" कौन सी बड़ी बात है? यह तो स्वाभाविक है. चोरी हुई है, मन को तो जरुर ख़राब लग रहा होगा."

:" नहीं ऐसी बात नहीं,:

:" फिर , क्या बात है?"

:" मुझे ऐसा लग रहा है हमारे घर का कुछ भी गोपनीय नहीं बचा है. किसी ने अपने गंदे हाथ से सब कुछ छू लिया है. ऐसा कुछ बचा नहीं जो अन-देखा हो"

अजितेश आश्चर्य-चकित हो कर देखने लगा था सुसी को. ऐसा लग रहा था , जैसे सुसी के सभी दुखों का बाँध ढहकर भी अजितेश के ह्रदय को छू नहीं पा रहा हो.       

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Giriraj sharan agrwal

बाबू चंडीप्रसाद अपने ज़माने के बड़े ही अद्भुत आदमी थे। और सब तो अपनी माई के लाल होते हैं, वह रज़ाई के लाल थे। 'रज़ाई' शब्द हमने जानबूझकर प्रयोग किया है, क्योंकि चंडीप्रसाद स्वयं भी प्रचलित शब्दों और मुहावरों के कट्टर विरोधी थे। फिर चंडीप्रसाद जैसे माई के लाल पर 'रज़ाई का लाल' मुहावरा ही फिट बैठता है, 'गुदड़ी का लाल' नहीं। इस बात को आप जानते ही हैं कि रज़ाई यदि अपने-आपमें मध्यम वर्ग की द्योतक है तो गुदड़ी निम्न वर्ग की। साथ ही यह बात भी आप भली-भाँति जानते हैं कि गुदड़ीवाला निम्नवर्ग राजनीतिक खिलाड़ियों की खेल-प्रतियोगिता में फुटबाल का काम करता है। एक पक्ष के खिलाड़ियों द्वारा किक मारी गई तो इधर, दूसरे खिलाड़ियों के द्वारा ठोकर मारी गई तो उधर। भारी गुत्थम-गुत्था के बाद अगर कोई पक्ष गोल दागने में सफल हो जाए तो सफल पक्ष सत्ताधारी, असफल रह जाने वाली टीम विपक्ष की मारा-मारी। रह गई फुटबाल तो अगली प्रतियोगिता तक उसका कोई काम, कोई महत्व नहीं। वह या तो क्रीड़ा-सामग्री के भंडार में चुपचाप पड़ी रहेगी अथवा समय-समय पर फूँक भरने के काम आएगी। फुटबाल और जनता फूँक भरने के लिए और खेल-प्रतियोगिता के दौरान किक मारने के लिए ही होती है।

क्षमा कीजिए, हमने जनता बनाम फुटबाल की यह व्याख्या अपनी बुद्धि से नहीं की है। चंडीप्रसाद जी की बुद्धि सक्रिय रही है इस कार्य में। चंडीप्रसाद बेचारे अपने अंतिम दिनों में एक नया शब्दकोश संकलित कर रहे थे कि समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो गए। आपको यह बात भी याद दिलाना अच्छा रहेगा कि ऐसे 'रज़ाई के लाल', जिन्हें समाज दिखावे के लिए भी प्यार नहीं करता, समय से पहले ही भगवान् को प्यारे हो जाते हैं। यह बात अलग है कि प्यार तो उन्हें भगवान भी नहीं करता, पर वे वन-वे वाला इश्क़ करते हुए भगवान् की झोली या उसकी खोली में पहुँच ही जाते हैं।

अब आपको यह जानकर दुख या आश्चर्य नहीं होगा कि चंडीप्रसाद जी ने शब्दकोश लिखते-लिखते अचानक आत्महत्या कर ली और धींगामुस्ती करके ज़बरन भगवान् को प्यारे हो गए।

जब तक चंडीप्रसाद जीते रहे, ट्यूशन पढ़ाकर गुज़ारा करते रहे। लेकिन हमें अंत तक यह आश्चर्य रहा कि चंडीप्रसाद जी को ट्यूशन मिल कैसे जाते थे? यह आश्चर्य उस वक्त भी है, जब चंडीप्रसाद धाँधली से भगवान् को प्यारे हो चुके हैं। यह भी अजीब बात है कि आदमी लोक से परलोक चला जाता है लेकिन आश्चर्य छोड़ जाता है। बाबू चंडीप्रसाद भी विरासत में दो चीज़ें छोड़ गए। एक तो आश्चर्यचकित कर देनेवाला अपना अधूरा शब्दकोश और दूसरा हाफ़ कोट यानी बंडी। चंडीप्रसाद जब तक जीवित रहे, बंडी जुड़वाँ बच्चों की तरह उनके साथ चिपकी रही। सच कहें तो चंडी और बंडी एक-दूसरे के पूरक थे, बंडी के बग़ैर चंडीप्रसाद चंडीप्रसाद नहीं लगते थे। ऐसा लगता था जैसे वह चंडीप्रसाद होकर भी चंडीप्रसाद होने का ढोंग कर रहे हों। यही कारण था कि लोग चंडीप्रसाद की जगह उन्हें बंडीप्रसाद कहने लगे थे। लेकिन सामने नहीं, पीछे-पीछे। क्योंकि हमारे यहाँ सच्ची बात सिर्फ़ पीठ-पीछे कही जाती है, सामने सच्ची बात कहने वाले या तो पागल होते हैं या मूर्ख अथवा दोनों का मिश्रण।

चंडीप्रसाद जी पागल थे या मूर्ख या दोनों का मिश्रण, यह तो हम नहीं कह सकते पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि और बहुत सों की तरह चूँकि वह भी मुँह-दर-मुँह होकर सच नहीं बोल सकते थे, इसलिए लिखकर सच बोलते थे। इस सच बोलने में चंडीप्रसाद की बंडी हमेशा उनकी सहायक बनी रही। बंडी की बग़ली ज़ेबों से काग़ज़ों का जो पुलंदा प्राप्त हुआ, वह दो बातें सिद्ध करता है, एक तो यह कि घाघ टाइप के लोग सच को बग़ल में दबाकर रखते हैं और उनके मरने पर सच का जो पुलंदा सामने आता है, वह भयंकर विस्फोट करने के लिए काफ़ी होता है।

उदाहरण के लिए चंडीप्रसाद जी ने अपने अपूर्ण शब्दकोश की भूमिका बाँधते हुए लिखा था कि अब समय आ गया है कि हिंदी का पूरा शब्दकोश संशोधित करके दोबारा लिखा जाए। संशोधित करने की बात को सिद्ध करते हुए चंडीप्रसाद ने लिखा कि जब भारत का संविधान एक बार नहीं दर्जनों बार संशोधित किया जा सकता है तो शब्दकोश में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं हो सकते? चंडीप्रसाद जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि मातृभूमि के अतिरिक्त कभी कोई और भूमि मेरे पास नहीं रही, इसलिए सदा भूमिकाओं पर ही संतोष करना पड़ा। चंडीप्रसाद जी ने लिखा है कि मैंने जीवन-भर कभी कोई किताब पूरी तरह नहीं पढ़ी, किताबों की भूमिकाएँ पढ़कर ही अपनी भूमिहीनता की संतुष्टि करता रहा। पर जीवन के अंतिम चरण में मैंने इस रहस्य को समझा कि भूमि अपनी हो तो जैसी भी हो, जोतनेवाले को फ़सल मिल ही जाती है। किंतु यह जो भूमि का पॉकिट एडीशन भूमिका है, इससे तो भ्रम और भटकाव के अतिरिक्त कोई और फ़सल मिलती ही नहीं। हमारा विचार है कि चंडीप्रसाद को भूमिकाएँ पढ़ते-पढ़ते ही एक नया शब्दकोश लिखने का विचार आया था। लेकिन उन्हें इस खतरे का भी पूरी तरह अनुमान था कि उनके द्वारा लिखे जा रहे शब्दकोश को देश के धनकोश वाले महापुरुष स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि प्रचलित अर्थों वाले शब्दों से उनके स्वार्थ जुड़े हैं।

चंडीप्रसाद ने अपनी भूमिका में यह भी लिखा है कि प्रचलित शब्दों की नई व्याख्या इसलिए भी ज़रूरी हो गई है कि शब्द अब सच को छिपाने अथवा सुननेवालों को भ्रमित करने अथवा धोखा देने के लिए प्रयुक्त होने लगे हैं। उनके अनुसार यह त्रासदी गुदड़ी वाले यानी जनसाधारण अधिक झेल रहे हैं। वे अपनी अज्ञानता और अज्ञानता से भी अधिक सरलता के कारण शब्दों के आज भी ठीक वही अर्थ लेते हैं, जो पुराने शब्दकोशों में लिखे हैं। इसलिए पछताते हैं और उस समय पछतावे से कुछ होता नहीं, जब चिड़ियाँ खेत चुगकर चली जाती हैं। चंडीप्रसाद ने चिड़ियों का खुलासा नहीं किया। चिड़ियों से शायद उनका अभिप्राय बिना पंख के उड़नेवाले उन जंतुओं से है, जो उड़ते तो हैं, किंतु उड़ते हुए दिखाई नहीं देते।

लंबी भूमिका के अतिरिक्त चंडीप्रसाद जी की जेब से जो एक छोटा-सा पुर्जा बरामद हुआ, उसमें पुराने शब्दों की नई लेकिन विस्तृत व्याख्या की गई है। उदाहरण के रूप में कुछ शब्दों के सच्चे-सही अर्थ आप भी देखिए-

प्रेम : व्यक्तिगत स्वार्थ का एक अटपटा शब्द, जिसमें दोनों ही अपना-अपना सुख लाभ एक-दूसरे के जीवन में खोजने और प्राप्त करने के लिए सदैव एक- दूसरे को भ्रमित करते रहते हैं। ब्रैकिट में चंडीप्रसाद ने लिखा है, मानव-जाति के पास इससे ज़्यादा दिखावटी और बनावटी शब्द और कोई नहीं है।

धर्म : विधि-विधान की एक ऐसी व्यवस्था, जिसे अपने सामयिक हितों के लिए मन-मरज़ी के अनुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सकता हो। यह धर्मात्माओं, समाज-सुधारकों, राजनेताओं के हाथ की लाठी भी है, जिसके द्वारा वे हम सबको हाँकने का सफल प्रयास करते हैं। यह मानव-प्रेम के नाम से दानव-प्रेम की ओर ले जाता है, लेकिन इसके प्रेमी-प्रेमिकाएँ समझते यही हैं कि वे धर्म-प्रेम का प्रचार कर रहे हैं। इसे सरल भाषा में हाथी के दाँत भी कहा जा सकता है, जो खाने के और होते हैं, दिखाने के और।

राजनीति : नीति शब्द इसमें केवल सुंदरता बढ़ाने के लिए जोड़ दिया गया है। जैसे अँगूठी में लाल-नीला नग जोड़ दिया जाता है। वैसे यह राज+काज ही है, नीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि नीति क्षण-क्षण बदलती रहती है, जबकि राज स्थायी रूप से सदा चलता रहता है। इसलिए नीतिविहीन राज का अर्थ होता है- निराज। कुल मिलाकर राजनीति को संशोधित कर निराजनीति कर दिया जाना चाहिए। यह अति आवश्यक है।

देशप्रेम : निर्वस्त्र होकर देश को नंगा करना। वैसे भी प्रेम की वासना अपने अंतिम चरण में एक-दूसरे को निर्वस्त्र करने पर उतारू हो जाती है, इसी अनिवार्यता पर चलते हुए अधिकतर देशप्रेमी देश के कपड़े उतारकर अंत में स्वयं भी निर्वस्त्र होकर नृत्य करते दिखाई देते हैं।

लोकतंत्र : आधुनिक दुनिया का सबसे लोकप्रिय खिलौना, जो कई देशों को खूून की भेंट देकर प्राप्त हुआ। यह बच्चों को दिए जाने वाले झुनझुने से अलग प्रकार का एक झुनझुना है। टीन से बने झुनझुने से बच्चे तथा शब्दों से बने इस झुनझुने से सभी प्रौढ़ पुरुष-नारियाँ एवं वृद्ध लोग खेलते हैं और मदारी के इशारे पर जमूरों की तरह नाचते हैं। इसमें समस्याएँ उत्पन्न की जाती हैं, हल नहीं की जातीं। सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र वह होता है, जिसमें लोगों को गाली देने और गोली खाने की आज़ादी है। फिर भी लोग झुनझुना बजाते रहें और खेलकर दिल बहलाते रहें।

मानव-अधिकार : अधिकारहीन लोगों द्वारा खड़ा किया गया ऐसा बखेड़ा, जिसका वास्तव में कोई अर्थ नहीं है। पिछले लंबे समय से इस शब्द को नया अर्थ देने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन यह अर्थ को ग्रहण नहीं कर पा रहा है। इसलिए मानव-अधिकार का मतलब है चीख़-पुकार, शोर-शराबा, हाहाकार।

मंत्रिमंडल : राजा-महाराजाओं का संग्रह। सामंतशाही में राजा एक होता था, लोकशाही में अनेक राजा होते हैं। पहले एक अकेला राजा खाता था, अब मिल-बैठकर खाते हैं। खाने की क्रिया एक-जैसी है। बस खानेवालों की संख्या बढ़ गई है।

विपक्ष : सिर्फ़ ग़लत को ही ग़लत नहीं, सही को भी ग़लत सिद्ध करके अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला महा अनुभवियों का वह गिरोह, जिसका अपना कोई चूल्हा नहीं होता। वह हमेशा दूसरों के चूल्हों पर अपनी रोटियाँ सेंकता है। अगर देश में कहीं कोई और बढ़िया चूल्हा उपलब्ध न हो तो वह सीता मैया की रसोई में भी घुसने से नहीं चूकता।

स्पष्टवादिता : चापलूसी की एक अद्भुत प्रणाली। कहा जाता है कि एक सज्जन किसी बहुत बड़े धन्नासेठ के पास कोई आवश्यक काम लेकर पहुँचे। वह जानते थे कि सेठ जी बहुत कट्टर सिद्धांतवादी आदमी हैं, मक्खनबाज़ी से चिढ़ते हैं और दुत्कारकर निकाल देते हैं। यह सज्जन ठहरे एक काइयाँ आदमी, आए और अभिवादन के उपरांत तुरंत बोले- सेठ जी, ये गुण तो लाख टके का है आपमें कि आप खुशामदियों को पास नहीं फटकने देते। आप दूर से ही उन्हें फटकार देते हैं। सेठ जी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो गदगद् हो उठे और आगंतुक का कार्य चुटकी बजाते कर दिया। स्पष्टवादिता की यह प्रणाली लाभदायक भी है और सम्मानजनक भी।

नमूने के इन शब्दों और उनके नवीनतम अर्थों को देखते हुए अब हम आपको यह बताना चाहेंगे कि बाबू चंडीप्रसाद ने अपने शब्दकोश की चर्चा करते हुए यह भी लिखा था कि मानवजाति के उपयोग में आनेवाले सारे ही शब्द पिछली एक शताब्दी से झूठ की लंबी खूँटी पर उलटे लटके हुए थे, जैसे आपने देखा होगा कि पुराने घरों में चिमगादड़ें उलटी लटकी रहती हैं। मैंने और कुछ नहीं किया, बस शब्दों के अर्थों को उनकी खूँटियों पर सीधा लटका दिया है। चंडीप्रसाद ने यह भी लिखा है कि झूठ को एकदम सच की तरह बोलने की प्रयोगात्मक कला, जो वर्तमान आदमी की अद्भुत विशेषता बन गई है, गहरी शोध और अनुसंधान का विषय है। अगर यह अनुसंधान न किया गया तो शब्दों के असली अर्थ इसी तरह दिवंगत हो जाएँगे, जिस तरह मृत आदमी की आत्मा दिवंगत हो जाती है।

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डा. गिरिराजशरण अग्रवाल

16 साहित्य विहार

बिजनौर (उ.प्र.)

Giriraj3100@gmail.com

ज्योंही मैं उनके कमरे में घुसा, उन्होने पूछा-''तुम किसके आदमी हो ?'' मैंने भी तुरत-फुरत जवाब दिया- ''हजूर मैं तो आपका ही आदमी हूँ।''
   उन्होंने फिर कहा-''झूठ क्यों बोलते हो ? मेरी तो तुमने ऊपर शिकायत की है और इसी कारण तुम्हें मैनें बुलाया है, सच सच बताओ तुम किसके आदमी हो ?''
   मैंने इस बार सच सच बता दिया- ''मैं मुख्यमंत्री का आदमी हूँ।''
   ''अफसर जी की हवा निकल गई। मुझे कुर्सी पर बैठने को कहा। मंत्री जी आपका ट्रांसफर नहीं चाहते थे, और इसी कारण मैंने आपके आवेदन पर विचार नहीं किया था। ''
   अक्सर दैनिक जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब कोई न कोई आप से पूछ बैठता है-आप किसके आदमी हो ? मोहल्ले में दादा तक पूछता है-आप किसके आदमी हैं, और यदि आप थानेदार के आदमी हो तो दादा आपको कुछ नहीं कहता।
   इसी प्रकार कॉलेज में एक बार मैंने एक बिगडैल छात्र से पूछा- ''तुम किसके आदमी हो ? वो तुरन्त बोल पड़ा-''पापा पूलिस में एसपी हैं।'   
   मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। वह होनहार छात्र आगे जाकर प्रथम श्रेणी में पास हुआ और विश्वविधालय छात्रसंघ का अध्यक्ष बना।
   एक पी.एच. डी. छात्रा से मैनें यही प्रश्न पूछा- ''तुम्हारे पास किसका जैक है ?'' छात्रा ने विभाग के कबीना मंत्री का नाम लिया। मैं चुप हो गया । उस सुन्दर छात्रा की थीसिस मैंने ही लिखकर दी और विश्व विधालय से पास कराई।
  यदि आप किसी बड़े आदमी के आदमी हैं तो आपके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं हैं। मुन्ना भाई एम. बी. बी. एस. ही नहीं एम. डी. भी हो सकते हैं। विश्वविधालयों में, संस्थानों में, सरकारों में, यहां तक कि एन.जी.ओ मे भी ऐसे आदमी भरे है जो किसी न किसी के आदमी हैं। वे स्वतंत्र नहीं है, बस किसी के पिछल्लगू है और इसी कारण वे पावरफुल हैं। यदि आप डाक्टर हैं और किसी मंत्री के आदमी हैं तो आपको ये अधिकार है कि आप मरीज की बांयी टांग के बजाए दांयी टांग का ऑपरेशन कर दें। आप प्रसूति के बाद बच्चा भी बदल सकते हैं, आपका बाल भी बांका नहीं होगा क्योंकि आप चिकित्सा मंत्री के आदमी है। छोटे पदों पर काम करने वाले बड़े लोगों के क्या कहने। विभागाध्यक्ष का चपरासी विभागाध्यक्ष के अलावा किसी को कुछ समझता ही नहीं है। कई आर. ए. एस. मुख्य सचिव या कबीना सचिव के आदमी हो कर रहते हैं।
   यदि आप सम्पादक के आदमी है तो क्या कहने। आपकी तीसरे दर्जे की घाटिया रचना भी छप जाती है, पारिश्रमिक भी डबल मिलता है सो अलग। यदि आप डाकू गब्बर सिंह के आदमी हैं या थानेदार के आदमी हैं तो पूरा कस्बा आपके हवाले है कहीं से भी लूटपाट शुरू कर सकते हैं। यदि आप मुम्बई के किसी भाई के आदमी हैं तो सब खून माफ है, जितनी चाहिये उतनी सुपारी लीजिये। समीक्षकों का आदमी होना भी साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में काफी मायने रखता है आप रातों रात बड़े लेखक, कलाकार या नाटककार बन जाते हैं। किसी को भी बाप बना लीजिये।
   किसी बड़े आदमी की पूंछ पकड़ लीजिये और ट्रांसफर, पोस्टिंग, नौकरी दिलाने जैसे महान कार्यों में दोनों हाथों से सूंतिये।
   यदि आपने अनाचार, हत्या, अपहरण कर लिया है तो किसी बड़े आदमी की शरण में चले जाईये, वह आपको अपना आदमी घोषित कर दे तो मजाल है कोई आपको हाथ भी लगा सके। किसी का आदमी बन जाईये। बस फिर आपके सौ खून माफ हे। बाप पुलिस में है तो बेटा अपराधी हो सकता है। बाप काबीना मंत्री है तो बेटे को हत्या, बलात्कार का हक स्वयं मिल जाता है। सामाजिक सरोकार बदल जाते हैं। मीडिया के सुर बदल जाते हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन सबको चाहिये।
   यदि आत अभी तक आम आदमी हैं और किसी के आदमी नहीं बन सके हैं तो यह आपका, समाज का और देश का दुर्भाग्य है, तुरन्त किसी पावरफुल सत्ताधारी का आदमी बन जाईये। या स्वय को उसका आदमी घोषित कर दिजिये और यदि वो ना-नुकर करे तो विपक्षी खेमे की और रूख करने की धमकी दे दीजिये। आपका काम तुरन्त हो जायेगा, आपको बचाने की गारण्टी उस बड़े आदमी की स्वतः हो जाएगी। आपका बाल भी बांका नहीं होगा। बस बाप बदल लीजिये। बाप बदलते ही आपके लिए सब रास्ते स्वतः खुल जाते हैं। आजकल बापों का जमाना है। एक बाप से काम नहीं चलता। बस बदलते रहिये जब तक सफलता नहीं मिलती है।
   आपको लोन लेना है, मैनेजर घास नहीं डाल रहा है, तुरन्त बैंक में अफवाह फैला दीजिये, कि आप वित्त मंत्री के आदमी है, आप का काम चुटकियों में हो जायेगा। आपको शास्त्रीय संगीत या पुरस्कार सामारोह का कार्ड नहीं मिला है, तुरन्त स्वयं को कलाकार या अध्यक्ष का रिश्तेदार घोषित कर दीजिए। दस कार्ड आपकी सेवा में उपस्थित हो जायेंगे। मैं ऐसे सैकड़ो लोगों को जानता हूँ जो इसी प्रकार आदमियों के सहारे स्वयं बड़े बन गये। इतिहास गवाह है कई मंत्रियों के पी. ए. स्वयं मंत्री बन गये। कई वैज्ञानिकों के चमचे बड़े वैज्ञानिक बन गये । कई अफसरों के पी. ए. आगे जाकर स्वयं अफसर बन गए। इस कार्य हेतु नियम बदल दिये गये। यदि आप किसी बड़े आदमी से जुड़ी हुई हैं तो क्या कहने, फिर तो बस आप ही आप हैं। चरित्र की चाट चटनी का चमत्कार देखते ही बनता है। चरित्र का इस देश में इतना ही उपयोग हैं। आप प्रमोशन की सीढ़ियां चढ़ना चाहती हैं। तुरन्त बास को अपना बना लीजिये स्वयं को बास का आदमी या औरत घोषित कर दीजिये।
   आप अयोग्य हैं, कमजोर हैं समय पर नहीं आते, काम नहीं करना चाहते ? चिन्ता की कोई बात ही नहीं है। स्वयं को कार्यालयाध्यक्ष का विश्वस्त आदमी घोषित कर दीजिये। अब कोई आपका क्या कर लेगा । पूर्व लेखक हैं या पूर्व कवि हैं, अपने आपको सम्पादक का आदमी घोषित कर दीजिये। सम्पादक न माने आपकी बला से मगर आप साहित्य की सड़क पर धुंआ देते रहिये। प्रदूषण फैलाते रहिये।
   राजधानी में काम करने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी बड़े आदमी का आदमी होता है। राजधानी की पूँछ ही यह आदमी होता है। कस्बे का छुठभैया नेता इसी छोटे आदमी की पूँछ पकड़ कर राजधानी के काम करवाते हैं।
   लेकिन कभी-कभी आप जिसके आदमी होते हैं, सामने वाला उससे भी बड़े आदमी का आदमी होता है, ऐसी स्थिति में आप अपने बड़े आदमी को छोड़िये और उससे भी बड़े आदमी का पल्ला पकड़ लीजिये। सफलता के लिए इतना तो करना ही पड़ता है। जो लोग भवसागर को पार करने के लिए ईश्वर पर आश्रित हैं वे अपने मामले पर पुनर्विचार करें और किसी बड़े आदमी के आदमी बन जाएं ताकि भौतिक संसार में प्रगति होती रहे और आध्यात्मिक संसार किसने देखा है ?


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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर 302002
फोन 2670596

व्यंग्य - दशा और दिशा

हिन्दी साहित्य में लम्बे समय से व्यंग्य लिखा जा रहा है, मगर आज भी व्यंग्य का दर्जा अछूत का ही है इधर कुछ समय से व्यंग्य के बारे में चला आ रहा मौन टूटा है, और कुछ स्वस्थ किस्म की बहसों की शुरूआत हुई हैं। आज व्यंग्य मनोरंजन से ऊपर उठकर सार्थक और समर्थ हो गया हैं। आज व्यंग्य-लेखक को अपने नाम के साथ किसी अजीबो-गरीब विशेषण की आवश्यकता नहीं रह गई हैं।

मगर स्थिति अभी इतनी सुखद नहीं है, आज भी कई बार लगता है, व्यंग्यकार छुरी से पानी काट रहा हैं। आवश्यकता व्यंग्य को समझने की हैं। बदली हुई परिस्थितियों में साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में व्यंग्य को शायद प्राथमिकता मिले, ऐसी स्थिति में व्यंग्य, और व्यंग्यकारों से यह मुलाकात वातावरण पर छाये कुहरे को दूर करने में मदद देगी। प्रश्नों की झोली में निम्न प्रश्न रखे गये।

1. व्यंग्य-एक विधा के रूप में कहां तक प्रतिष्ठित हो पाया हैं ?

2. हिन्दी आलोचक, व्यंग्यकार और पाठक के बीच का त्रिकोण ?

3. व्यंग्य की सार्थकता क्या हैं ?

4. व्यंग्य-लेखन अपेक्षाकृत जोखिम का कार्य है, क्या आप सहमत हैं ?

5. यदि हैं तो आप के अनुभव कैसे हैं ?

6. व्यंग्य की शैली, कथानक तथा भविष्य के बारे में आपके विचार ?

के. पी. सक्सेना

व्यंग्य को मूल रूप से मैं अलग विधा नहीं मानता। इसे अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम कह सकते हैं। इस माध्यम से कविता, कहानी, निबन्ध नाटक किसी का भी सृजन हो सकता हैं।

व्यंग्य के लेखक और पाठक के बीच एक सीधा रिश्ता होता हैं। कोई त्रिकोण नहीं। आलोचक इन दोनों से अलग चीज हैं।

व्यंग्य की सार्थकता कहानी-कविता आदि से कहीं अधिक हैं। इसका पैनापन शब्दों और कथानक के मोहजाल में न फंसकर सीधा दिलो दिमाग से टकराता है और पाठक के अन्दर एक लहर सी पैदा करके सोचने पर मजबूर कर देता हैं।

मैं व्यंग्य में कोई जोखिम नहीं मानता। यदि व्यंग्य के साथ हास्य की हल्की सी चाशनी हो और किसी व्यक्ति विशेष पर सीधा प्रहार न किया जाये, तो व्यंग्य सर्वप्रिय हैं। मुझे आज तक व्यंग्य से कोई जोखिम नहीं मिला। उल्टे मैं तो यह कहूंगा कि एक कहानीकार तथा नाटककार से भी अधिक मेरे पाठकों ने मुझे व्यंग्यकार के रूप में ग्रहण किया है और अपना स्नेह दिया हैं। व्यंग्य जोखिम तभी बनता है जब यह किसी व्यक्ति विशेष या सम्प्रदाय पर सीधा कटु प्रहार हो।

व्यंग्य की शैली सीधी सरल हो और कथानक आज के परिवेश का आईना हो यही उत्तम हैं। ठेठ और ठोस भाषा में लिखे गए व्यंग्य एक वर्ग विशेष भले ही ग्रहण कर ले, पर जन साधारण की अच्छी प्रतिक्रिया नहीं अतः हम अपने आसपास जो जिन्दगी जी रहे है और जिन अभावों से त्रस्त हैं उन्हें सीधे सरल शब्दों में लपेट कर पेश करें, यही जरूरी हैं।

निशिकांत

इस बात से, साहित्य से जरा भी परिचित व्यक्ति, इन्कार नहीं कर सकता कि व्यंग्य एक स्वतन्त्र विधा है, मात्र विधा ही नहीं, साहित्य की सबसे सशक्त विधा हैं। एक व्यंग्यकार होने के नाते मैं यह बात पूरे दावे के साथ कह सकता हूं व्यंग्य पूरी तरह से प्रतिष्ठित हो चुका हैं। कोई जरूरी नहीं कि जब तक कोई नामवर समीक्षक बांग न दे, तब तक व्यंग्य को विधा के रूप में प्रतिष्ठित माना ही न जाए। वैसे परिष्कार तो हर विधा का चलता रहता हैं।

रही बात आलोचक, व्यंग्यकार पाठक के बीच त्रिकोण की तो यही कहा, जा सकता है कि व्यंग्यकार के निकट आलोचक से ज्यादा पाठक हैं। पाठक अब व्यंग्य ज्यादा पसन्द करते हैं, ज्यादा समझते हैं, और चाहते हैं कि व्यंग्य अधिक से अधिक लिखा जाए। मुझे शिकायत पाठकों से नहीं आलोचकों से है। लिखने की बात तो दूर, अगर कभी लिखना ही पड़ा तो लिख देते हैं - "लोग व्यंग्य भी लिखते हैं।"

लेकिन इधर यह उदासीनता टूट रहीं हैं। कुछ एक शोध ग्रन्थ व्यंग्य पर आए हैं, कुछ अच्छी पत्रिकाओं ने भी बहस शुरू की हैं। देर आयद, दुरूस्त आयद। चलिए बहस शुरू तो हुई। इससे व्यंग्यकार और आलोचक के बीच की दूरी कम होगी आज नहंी तो कल।

व्यंग्य की सार्थकता इसी में है कि वह समाज के अंदर की विसंगतियों पर चोट करे, मुखौटों को बेनकाब करे, और लोगों के अंदर तिलमिलाहट पैदा करे। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। व्यंग्य सुधार की ओर भी प्रेरित करता हैं। जिस रचना में ऊपर वाले गुण न हों, उसे व्यंग्य की कोटि में नहीं रखा जा सकता। वैसे व्यंग्य सीधा-सादा, सरल और छोटा होना चाहिए, तभी वह असरदार होता हैं-यानी कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक मीठी मार। और यह सब व्यंग्यकार पर निर्भर करता हैं। जितना ही वह समाज के प्रति सजग रहेगा, उसका व्यंग्य उतना ही सजग होगा।

मैं आपकी इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि व्यंग्य लेखन जोखिम का काम है-क्योंकि व्यंग्यकार किसी का लिहाज नहीं करता। यही लिहाज न करना उसके व्यक्तित्व के लिए नुकसानदायक हो सकता हैं। वैसे अगर वह लिहाज करे तो व्यंग्य क्या लिखेगा ? अमुक अगर मेरे निकट हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं उनके दोहरेपन पर चोट न करूं ? जोखिम तो है ही। फिर जोखिम के बिना मजा ही क्या हैं दो चार लोग गालियां दे, कुढ़ें और कहें कि यह क्या लिख डाला तो मुझे खुशी होती है कि मैं जो कुछ कहना चाहता था, ठीक से कह पाया हूं।

अपना व्यक्तिगत अनुभव बस यही है कि कुछेक लोगों की नाराजगी जबानी सहनी पड़ी हैं।

व्यंग्य की शैली, कथानक तथा शिल्प में विविधता हैं। हर व्यंग्यकार की शैली अगल होती हैं। एक ही कथानक पर कई लोग, कई ढंग से लिखेंगे और कई बातें कह जायेंगे। आज का व्यंग्यकार नए से नए कथ्य को लेकर चल रहा हैं, वह पुराने प्रतीकों के माध्यम से नई विद्रूपताएं पर चोट कर रहा हैं। कहानी, कविता में इतने प्रयोग नहीं हुए हैं, जितने कि व्यंग्य में। वैसे यह प्रश्न आचार्यों के लिए हैं। मैं तो मात्र एक अदना-सा व्यंग्यकार हूं, क्या कहूं ? छोटी मुंह बड़ी बात करने का इस समय मूड नहीं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं आचार्यों के आचार्ययत्व से त्रस्त हूं।

श्रीकांत चौधरी

व्यंग्य एक विधा के रूप में कहां तक प्रतिष्ठित हो पाया है, इसका निर्णायक उत्तर कम से कम एक व्यंग्यकार का देना मुश्किल है क्योंकि बगैर इसकी चिन्ता किये कि मूर्धन्य समीक्षक, संपादक और लेखक इसे विधा मान रहे हैंं या नहीं, अपने लेखन की ईमानदारी निभाते जाना ही नये लेखक का धर्म है और उसके लिये श्रेयस्कर भी है, अन्यथा आज कल लेखक ही समीक्षक होने लगे हैं, शेष समीक्षक उपन्यासों, कहानियों, नाटकों और कविताओं के लिए टेंडर भरे बैठे हैं बकौल परसाईंजी, व्यंग्य में समीक्षकों के पास समीक्षा की भाषा का अभाव है, और यह कथन सच है क्योंकि व्यंग्य के वजनदार हस्ताक्षरों की उपेक्षा कठिन जान पड़ने की त्रासदी ढोने से बचने के लिए कुछ समीक्षकों ने व्यंग्य को कहानी मानकर बाकायदा समीक्षा की हैं। मेरी विनम्र राय में व्यंग्य-विधा के रास्ते पर है, व्यंग्य की उपेक्षा, व्यंग्य पर तत्संबंधी विवाद इसका प्रमाण है- और वैसे भी समीक्षा के नये मापदंडों पर ही इस विधा का निर्धारण होगा इस बारे में व्यंग्यकारों (बड़े लोग खासकर) की स्वयं की लापरवाही भी-नजर अन्दाज नहीं की जा सकती। मैं तो नहीं कर रहा।

आलोचक, खासकर व्यंग्य का, है ही कहां ? व्यंग्यकार का सीधा रिश्ता और सबसे गहरा भी - पाठक से ही है, उस सामान्य पाठक से जो अपने समय के सारे आर्थिक, नैतिक सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक घात-प्रतिघात को झेलता हैं। आलोचक का काम तो अभी हाल में, व्यंग्य को ललित निबंध और निजी कुंठा से उपजा विस्फोट सिद्ध करना भर हैं। आगे शूद्र-व्यंग्य के दिन फिरे।

व्यंग्य की सार्थकता का सवाल तो ऐसा ही है कि मरीजों की दुनियां में सर्जन की सार्थकता का सवाल तो ऐसा ही है कि मरीजों की दुनियां में सर्जन की सार्थकता क्या है ? अब तो व्यंग्यमात्र ही ऐसी कड़वी औषधी है जो व्यवस्था और व्यक्ति की सडांध और और आडंबर को अपने तेजाब से गलाने में सीधे प्रयुक्त होती है कई लोगों को तो इस बात का बड़ा सदमा है कि व्यंग्य में गीता और बाईबल के से शाश्वत् मूल्यों को अभाव हैं।

अन्य विधाओं के मुकाबले तो व्यंग्य लेखन निश्चय ही जोखिम का काम हैं। गत गतवर्षों में परसाईं जी, तेदुलंकर जी आदि पर अधकचरी, फासिस्ट मनोवृत्ति के लोगों द्वारा किए गए हमले इसका बहुत बड़ा प्रमाण हैं। इस युग में सच बोलने से अधिक जोखिम भरा कार्य दूसरा है भी कौन सा ? गनीमत है कि यहां के लोग साहित्य के मामले में अभी भी नौसिखिये है और मोटी चमड़ी से लैस हैं फिर भी कुछ गैरत वाले निकल ही आते हैं, पर वे इतने भले मानुष हैं कि मुझे पीटकर मेरा व्यंग्य लेखन अथवा मुझे 'आफ बीट' नहीं होने देना चाहते।

व्यंग्य की शैली, कथानक या शिल्प पर भला मैं नया खिलाड़ी क्या कहूं ? हां इतना जरूर है कि व्यंग्य में शैली के कारण लेखक अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हो जाता है श्री परसाईं, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी, राधाकृष्ण, फ्रिक तौंसवी आदि अनेक व्यंग्यकार इसके अच्छे उदाहरण हैं कहानी या कविता की तरह व्यंग्य में भी नये प्रयोगों की काफी गुन्जाइश हैं ? लेकिन कार्य और कारण की परख और वैज्ञानिक बुद्धि से सम्पन्न दृष्टि और सामर्थ्य मेरे ख्याल से अच्छे ऊंचे व्यंग्य की पहली शर्त हैं। सच बात तो यह कि इन सब बातों के लिए अभी कुछ और समय अपेक्षित हैं।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर - 302002

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आषाढ़ बीत गया. आसमान में बादल का टुकड़ा तक न दिखा. धरती पर पानी की बूंद भी न गिरी. हवाएं आग बरसा रही थीं. जमीन तवे की तरह तप रही थी. आसमान तकते-तकते लोगों की आंखें पथरा गयीं. मौसम विभाग की भविष्‍यवाणियां गलत साबित होती रहीं. बिजली विभाग अपनी मनमानी करता रहा. अघोषित बिजली कटौती ने लोगों को बेहाल कर रखा था.

प्रदेश सरकार ने स्‍मारकों और मूर्तियों पर खरबों रुपया खर्च कर दिया. जनहित की कोई योजना लागू नहीं हुई. केन्‍द्र सरकार की योजना से सड़कें, नालियां-नाले और तालाब खोदे जा रहे हैं. लोगों के जॉब कार्ड बने हुए हैं. सौ रुपये प्रति मजदूर मिल रहा है, लेकिन गर्मी ने जो हाल कर रखा है, उससे जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई है. समय पर बरसात न हुई तो फसल नष्‍ट हो जाएगी. किसानों की दुर्दशा हो जायेगी.

प्रदेश की नदियों पर कई बांध हैं. नहरों का जाल बिछा हुआ है, परन्‍तु सभी रेगिस्‍तान की तरह सूखी हुई हैं. दूर-दूर तक फटी हुई धरती बेवा औरत की तरह सफेद चादर ओढे. नजर आती है.

पूरा गांव ही नहीं, आसपास के गांव के तमाम लोग नरेगा की योजनाओं में काम कर रहे हैं. परन्‍तु सभी काम कम, बातें ज्‍यादा करते हैं. घड़ी-घड़ी छाया की तरफ भागते हैं. नल से पानी भरकर लाते हैं. वह भी पीते-पीते खौलने लगता है.

कच्‍ची सड़क पर मिट्‌टी डालने का काम चल रहा था. दूर-दूर तक धूप की कड़ी चादर बिखरी हुई थी. लोगों का काम में मन नहीं लग रहा था, परन्‍तु अभी तो दस भी नहीं बजे थे. छुट्‌टी कैसे मिलती ? मेट साथ रहकर काम करवा रहा था. बड़ा काइयां है, किसी को हिलने नहीं देता. लेकिन वह भी आदमी था. धूप में तपने लगता तो किसी पेड़ की छाया के नीचे जा बैठता. उसकी देखा-देखी मजदूर भी जा बैठते.

आसपास ज्‍यादा पेड़ नहीं थे. इक्‍का-दुक्‍का महुए के पेड़ थे. कुछ बबूल के भी... जो बेवजह उग आए थे. उनकी छाया के नीचे बैठा भी नहीं जा सकता था. चारों तरफ कांटे बिखरे पड़े थे. महुए के एक पेड़ की छाया के नीचे सड़क पर काम करने वाले बैठे हुए थे. साथ में मेट रामशरण भी था. वह लोग आपस में बातचीत कर रहे थे.

गंगाराम माथे का पसीना गमछे से पोंछता हुआ बोला, ‘‘भैया, अब तो सहन नहीं होता. धरती के अन्‍दर पानी नहीं होगा, खेतों में हरियाली नहीं होगी, घर में अन्‍न का दाना नहीं होगा, तो यह रुपया किस काम आएगा.''

वह नवीं तक पढ़ा था. कुछ समझदार था. परन्‍तु पढ़ाई पूरी न कर सका. जवान हो चुका था. पढ़ने में मन ही नहीं लगता था. घूमने-फिरने और लड़कियां ताकने में मन रमने लगा था. गांव का माहौल था. कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था.

हाई स्‍कूल की परीक्षा बोर्ड से होनी थी. परीक्षा में बैठने की हिम्‍मत नहीं बांध पाया. नवीं तक तो स्‍कूल मास्‍टर बिना परीक्षा के ही पास कर देते हैं. बोर्ड की परीक्षा में कौन पास करता, सो परीक्षा में बैठा ही नहीं. बाप खीझकर रह गया. उसे पता था कि बेटे का मन पढ़ाई में क्‍यों नहीं लगता.

गंगाराम रात-दिन लड़कियों के सपनों में डूबा रहने लगा था. गांव में इधर-उधर मुंह मारता फिरता था. नाते-रिश्‍तेदारी में भी जहां कोई लड़की देखी, वहीं डेरा डाल दिया. हफ्‍तों घर नहीं लौटता था. बाप परेशान हो गया. काम-धाम भी कुछ नहीं करता था. मजबूरन शादी कर दी कि जिम्‍मेदारी पड़ने पर कुछ संभल जाएगा.

शादी के बाद संभल भी गया. बीवी आई तो पैसे की जरूरत महसूस हुई. बाप कहां तक खर्च पूरे करता ? मजूदरी करने लगा. यहां तक तो सब ठीक था, परन्‍तु लुगाइयों के पीछे भागने की आदत अभी तक न गई थी. जवान लड़की हो या औरत... देखते ही लार टपकाने लगता था.

गंगाराम की बात पर मेट रामशरण बोला, ‘‘क्‍या फरक पड़ता है ? सरकार के पास पैसा है. देश में अनाज नहीं होगा, तो अमेरिका से आ जाएगा. राशन कार्ड से अब भी लेते हैं, तब भी लेंगे. नरेगा से कमाई हो ही रही है. जेब में पैसा रहेगा, तो दुकान से भी खरीद सकते हैं.''

‘‘हां, बाबू, तुमको तो फरक नहीं पड़ेगा. दस लोग काम करते हैं, बीस की हाजिरी दिखाते हो. फालतू पैसा जेब में हो तो कुछ भी किया जा सकता है.'' छोटेलाल ने व्‍यंग्‍य से कहा. वह थोड़ा बुजुर्ग था. काम में हीला-हवाली करता था. मेट बात-बात पर उसे डांटता रहता था. लेकिन जवान लड़कियों को कुछ नहीं कहता था. उन पर बुरी नजर रखता था. प्रधान का चहेता था, इसलिए खुलकर कोई कुछ नहीं कह पाता था. आज मौका मिला तो छोटेलाल ने मन की भड़ास निकाल ली. मेट पर बातों से हल्‍का प्रहार कर दिया.

रामशरण के चेहरे पर नाराजगी के भाव प्रकट हुए. वह कुछ कहने के लिए उद्यत ही हुआ था कि गंगाराम ने टोंक दिया, ‘‘ हां, मेट बाबू की तो चांदी ही चांदी है. प्रधान के साथ मिलकर सरकारी खजाना लूट रहे है.'' वह भी मन ही मन मेट से जलता था. वह रंग रसिया था, परन्‍तु मेट के रहते वह अपनी गोटी नहीं फिट कर पाता था. उसे लड़कियों से बात करने का मौका ही नहीं मिलता था. मेट तुरन्‍त टोंक देता था. उसके डर से लड़कियां भी उससे कतराती थीं. जब तक काम चलता, मेट साथ ही रहता था. शाम को ही सब अलग-अलग होते थे, परन्‍तु तब सबको घर जाने की जल्‍दी होती थी.

प्रधान कभी-कभार ही काम देखने आता था. रामशरण उसका चहेता था. सब कुछ उसके ऊपर डाल रखा था. वैसे भी काम किसे करवाना था ? बस खानापूर्ति होती थी. मात्र दिखाने के लिए काम होता था. सरकार का पैसा बांटना था, इसलिए कुछ काम दिखाकर कागज बनाए जाते थे. फर्जी हाजिरी लगाकर मजदूरी हड़प करने के प्रपंच किए जाते थे. जो मजदूर वास्‍तव में काम करते थे, उनसे थोड़ा-बहुत काम लिया जाता था. उनसे भी ज्‍यादा डांट-डपट नहीं की जाती थी, ताकि आवाज न उठा सकें. दिन के ग्‍यारह बजते ही सारे मजदूर घर चले आते थे. शाम को चार बजे के बाद लौटते थे. इतने समय में कितना काम कर सकते थे. बस मिट्‌टी इधर से उधर करते रहते थे.

रामशरण ने चिढ़कर कहा, ‘‘तुम सभी साले कामचोर... बिना काम किए मजदूरी लेते हो और मुझ पर इल्‍जाम लगाते हो. कल से तुम्‍हारा नाम काट दूंगा रजिस्‍टर से... जॉब कार्ड हाथ में लिए घूमते रहे जाओगे.'' गुस्‍से में वह उठकर खड़ा हो गया और हवा में इधर-उधर हाथ झटकने लगा.

मजदूरों ने देखा, बात बिगड़ रही है. सभी चुप एक दूसरे का मुंह देखने लगे. उनमें एक प्रौढ़ महिला बुधिया थी. कम बोलने वाली, परन्‍तु समझदार. वह सबकी बातें सुन रही थी. बात बिगड़ती देख वह बोली, ‘‘बचुवा, तुम क्‍यों इनकी बातों पर उलझ रहे हो. ये दोनों तो पागल हैं. हम नहीं जानते क्‍या कि तुम हमारा कितना ख्‍याल रखते हो ? इनकी बातों पर मत जाओ. तुम समझदार हो. देखो तो कितनी गर्मी पड़ रही है. हर चीज उबल रही है. ऐसे में किसी का दिमाग सही रह सकता है ? परन्‍तु तुम हमारे अन्‍नदाता हो, अपना दिमाग सही रखो. दुनिया का काम ही है, दूसरों को बुरा-भला कहना.''

सबने बुधिया की बात से सहमति जताई और रामशरण का गुस्‍सा शांत हो गया.

नरेगा की योजनाओं से भले ही सबको रोजगार मिल रहा था. प्रधान के साथ-साथ योजनाओं से जुड़े अधिकारियों की जेबें गर्म हो रही थीं, परन्‍तु मौसम में जो गर्मी थी, उससे मनुष्‍य ही नहीं, पशु-पक्षी भी बेहाल थे. गांव व जिला ही नहीं, पूरा प्रदेश गर्मी और सूखे की मार झेल रहा था.

गांव के छप्‍पर वाले घरों में आग लगने की घटनाएं आम हो चुकी थीं. जान-माल का नुकसान हो रहा था. प्रतिदिन लू लगने से दो-चार लोगों की मौत की खबर से अखबार रंगे रहते थे. कई लोग हैजा की चपेट में आ चुके थे.

सड़क में काम करते-करते एक दिन तारा को चक्‍कर सा आ गया. वह सिर पकड़कर जमीन पर बैठ गई. लोग काम छोड़कर उसकी तरफ दौड़े, ‘‘क्‍या हुआ ? क्‍या हुआ ?'' लोग पूछ रहे थे. वह कुछ बोलने का प्रयास कर रही थी कि उसे उल्‍टी होने लगी. लोग डर गए. कहीं हैजा न हो. जल्‍दी से पेड़ के नीचे लाया गया. रामशरण के पास मोटर सायकिल थी. किसी तरह उसे बीच में बिठाया गया. पीछे से एक जवान औरत उसे पकड़कर बैठी. तेजी से गांव की तरफ भागे. घर पहुंचते-पहुंचते उसे दो बार और उल्‍टी हो चुकी थी. हैजा ही था.

तारा रामसजीवन की बीवी थी. वह पंजाब में एक ईंट-भटठे में काम करता था. घर में केवल सास और ससुर थे. अभी कोई बच्‍चा नहीं हुआ था. गरीबी ने उसे सड़क पर मजदूरी करने के लिए मजबूर कर दिया था. गांव में कॉलरा यानी हैजा और लू लगने का जो इलाज संभव था, वही किया गया. गांव की एकमात्र दूकान में अमृतधारा की शीशी नहीं मिली तो उसे प्‍याज पीसकर उसका रस पिलाया गया, परन्‍तु कोई फायदा नहीं हुआ.

पूरे गांव में खबर फैल चुकी थी कि सजीवन की बीवी को हैजा हो गया था. प्रधान भी आये. उनके पास मार्शल जीप थी. लोगों ने सलाह दी, तो उनकी जीप में तारा को लादकर कस्‍बे के अस्‍पताल लाया गया. वहां उसे भर्ती करवाना पड़ा. साथ में उसके सास-ससुर, मेट रामशरण और गंगाराम भी आये थे.

गंगराम का अपना स्‍वार्थ था. जब से तारा सड़क पर काम करने लगी थी, उसके चेहरे की झलक उसने देख ली थी. वह एक खूबसूरत और गठे बदन की युवती थी. गंगाराम का मन उस पर आ गया था. मौका मिलते ही उससे हंसी-मजाक कर लेता था. रिश्‍ते में भाभी लगती थी, इसलिए वह बुरा नहीं मानती थी. परन्‍तु ऐसा कोई मौका नहीं मिला था कि वह अपने दिल की बात उससे कह सकता.

उसके बीमार होने से गंगाराम को हार्दिक तकलीफ हुई थी. भगवान से दुआ कर रहा था कि उसे कुछ न हो. जल्‍दी ठीक हो जाए. गांव में हैजा से कई मौतें हो चुकी थीं. वह डरा हुआ था, जैसे उसकी ही बीवी हो.

प्रधानजी तारा को अस्‍पताल में भर्ती करवाकर चले गए. अस्‍पताल में गंगाराम और रामशरण रह गए. तारा के सास-ससुर बाहर बैठे थे. उसको ग्‍लूकोज चढ़ाया जाना था. कम्‍पाउन्‍डर ने ग्‍लूकोज लाने के लिए कहा तो दोनों एक दूसरे का मुंह देखने लगे. रामशरण थोड़ा दूर हट गया. सोच रहा था, कहीं उसे ही न खरीदना पड़. जाए. गंगाराम को अस्‍पताल और मेडिकल स्‍कूल की मिलीभगत पता थी. गांवों में लू लगने और हैजा से बहुत लोग बीमार पड़ते हैं. इस सबका इलाज ग्‍लूकोज से ही किया जाता है.

निजी डॉक्‍टरों और अस्‍पताल में अस्‍पतालों में मरीजों का तांता लग जाता है. बड़ी मुश्‍किल से ग्‍लूकोज उपलब्‍ध हो पाता है. कई बार तो दूसरे कस्‍बे से लाना पड़ता है. अस्‍पताल में दवाई ही नहीं मिलती, ग्‍लूकोज कहां से मिलेगा. डॉक्‍टर और कम्‍पाउन्‍डर पहले ही बेच देते हैं. वही बाद में मरीजों को मेडिकल स्‍टोर वालों से खरीदना पड़ता है. मेडिकल स्‍टोर वाले बढ़ी कीमत पर ग्‍लूकोज बेचते हैं. अस्‍पताल के डॉक्‍टर से मिले रहते हैं. मुनाफा आपस में बांट लेते हैं.

तारा के सास-ससुर के पास तो दमड़ी भी नहीं थी. मेट रामशरण चुट्‌ट और कंजूस आदमी था. हारकर गंगाराम को ही जेब ढीली करनी पड़ी. प्रेमिका के लिए इतना करना बुरा नहीं था. प्रेम में पापड़ तो बेलने ही पड़ते हैं. उधर तारा को ग्‍लूकोज चढ़ना शुरू हुआ, इधर दोनों फिर बाहर आ गये और एक पेड़ की छाया के नीचे खड़े हो गए.

थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद मेट ने कहा, ‘‘भाई, मेरे घर में कोई नहीं है. रात में रुक नहीं सकता. तुम भी अपने घर चले जाओ. यहां तारा के सास-ससुर तो हैं ही, देखभाल कर लेंगे.''

गंगाराम ने रूखे स्‍वर में कहा, ‘‘तुमको जाना हो तो जाओ. मैं तो रुकूंगा. तारा के ससुर बूढे. हैं. सास को कुछ पता नहीं... रात-बिरात किसी दवा की जरूरत पड़ी तो... अस्‍पताल में तो कुछ मिलता नहीं. बुखार की दवाई तक नहीं... कहने को सरकारी अस्‍पताल है और गरीबों का मुफ्‍त इलाज होता है. फोकट में तो कुछ भी नहीं मिलता यहां. सब कहने की बातें हैं.'' उसके स्‍वर में घृणा और तिरस्‍कार के भाव थे.

रामशरण चुप लगा गया. कहीं गंगाराम पैसे न मांग ले. उसके चेहरे के भाव देखकर गंगाराम हंसा, ‘‘फिकर न करो मेट बाबू ! तुमसे पैसे नहीं मांगूंगा. मुझे तुम्‍हारी फितरत पता है. बीड़ी भी मांगकर पीते हो. तुम्‍हारी जेब से पैसा क्‍या मुंह से थूक तक नहीं निकल सकता. देख रहा हूं.... मौसम में ही सूखा नहीं पड़ा है, तुम लोगों के दिलों में भी भयंकर सूखा पड़ा है. तुम्‍हारे जैसे लोग चाहे जितना पैसा कमा लें, प्‍यार, स्‍नेह और ममता दिल में कभी नहीं आ सकती. धरती का सूखापन तो मिट सकता है... बारिश होने पर धरती गीली हो सकती है, परन्‍तु तुम लोगों के मन का सूखा और अकाल कभी खत्‍म नहीं हो सकता.''

गंगाराम के व्‍यंग्‍य बाणों से रामशरण तिलमिला गया. कसमसाते हुए बोला, ‘‘अच्‍छा, मैं चलता हूं. तुम देख लेना. सुबह आऊंगा.'' और वह तेजी से चलता बना. उसे डर था कि गंगाराम और कुछ न कह दे.

गंगाराम उसे जाते हुए देखता रहा. फिर पच्‍च से जमीन पर थूक दिया. हूं... कल सुबह आएगा. पाजी कहीं का. नहीं आएगा तो क्‍या तारा का इलाज नहीं होगा.

अस्‍पताल परिसर और बरामदे में मरीजों के परिजनों और हितैषियों की भीड़ थी. कुछ बैठे थे तो कुछ खड़े. सभी आपस में बातें कर रहे थे. वह जाकर तारा के सास-ससुर के पास बरामदे में खड़ा हो गया. वह दोनों गुमसुम और उदास से बैठे थे. गंगाराम ने उन्‍हें सांत्वना दी, ‘‘चिन्ता न करो चाचा, तारा ठीक हो जाएगी.''

उन दोनों के मुंह से आवाज न निकली. असहाय और कातर नजरों से उसे देखा. जिस तरह कष्‍ट पड़ने पर भक्‍त भगवान की शरण में जाकर याचक नजरों से देखता है, कुछ वैसे ही भाव उनकी आंखों में थे.

गंगाराम कुछ दूर हटकर एक खंभे के सहारे खड़ा हो गया. इधर-उधर देखा. पास में दो पढ़े-लिखे व्‍यक्‍ति खड़े आपस में बात कर रहे थे. कान उनकी बातों की तरफ अनायास चले गये. एक कह रहा था, ‘‘सरकार की ऐसी की तैसी. एकदम निकम्‍मी सरकार है. जनता की भलाई के लिए तो कुछ कर ही नहीं रही.''

‘‘हां यार, देखो न, तीन महीने से वेतन नहीं मिला है. इधर बच्‍चा बीमार हो गया. लगन के दिन चल रहे हैं. रिश्‍तेदारी में कई शादियां हैं. हर शादी में हजार-पांच सौ खर्च हो जाते हैं. ऊपर से अस्‍पताल का खर्च... समझ में नहीं आता, क्‍या करें ?''

‘‘साली ....(सरकार को एक भद्‌दी गाली)....तुमने पढ़ा है, आज के अखबार में लिखा है कि राज्‍य सरकार ने पार्क और स्‍मारक बनवाने तथा उनमें सैकड़ों मूर्तियां लगवाने में लगभग 2000 करोड़ रुपया खर्च कर दिया है.''

‘‘क्‍यों नहीं करेगी ? मुख्‍यमंत्री के बाप का पैसा है न ! कर्मचारी भूख से मर रहे हैं. वेतन मिल नहीं रहा है और मुख्‍यमंत्री पत्‍थर के स्‍मारक, पार्क और मूर्तियां लगवाकर उद्‌घाटन कर रही हैं. जिस राज्‍य में जनता भूखी मरे, उसका पतन निश्‍चित है.''

‘‘बिलकुल सही कहा. इससे अच्‍छी तो पिछली सरकार थी. मंहगाई भी कम थी. इस सरकार ने तो अति कर दी. मुख्‍यमंत्री केवल पैसा बटोरने में लगी है. सुना है, अपने गांव के आसपास की सैकड़ों एकड़ जमीन खरीद ली है. गांव में किले जैसा मकान बनवाया हे. दिल्‍ली में दो कोठियों करोड़ों की लागत से खरीदी हैं.''

‘‘हां, बिलकुल सही बात है. अखबार वाले झूठ थोड़े लिखेंगे.''

गंगाराम का मन घृणा और वितृष्‍णा से भर गया. यह वहीं सरकार है, जिसे वह अपनी कहता था. इसे ही उसने अपना कीमती वोट दिया था. पार्टी के नेता तो करोड़पति और अरबपति बन गये. मुख्‍यमंत्री जीते जी अमर होने के लिए अपनी मूर्तियों का उद्‌घाटन कर चुकी हैं. बादशाहों की तरह जनता का पैसा बटोरकर अपनी जेब ही नहीं भर रहीं, अंधाधुंध गैरजरूरी कार्यों में खर्च कर रही हैं. जनता को क्‍या मिला... भूख और बीमारी.

गंगाराम को लगा कि जनता के लिए हर तरफ सूखा पड़ा है. केवल नेताओं के लिए सूखा नहीं है. उनके लिए हर तरफ हरियाली है...पैसे की हरियाली. सरकार जनता के लिए कुछ नहीं कर रही. बादल रूठे हैं, सरकार भी रूठी है.

लेकिन गरीब जनता की आंखों में सूखा नहीं है. उसकी आंखें नम हैं. उनमें बेथाह पानी भरा हुआ है. उनकी आंखों का पानी कभी नहीं चुकता, जिन्‍दगी भर रोते रहने के बाद भी... लेकिन जनता हताश नहीं है. सरकार जनता के लिए सूखी हो सकती है, बादल नहीं ... कभी न कभी जरूर बरसेंगे. धरती की प्‍यास बुझेगी. हर तरफ हरियाली होगी. फसलें लहलहाएंगी और किसान मुस्‍कराएगा. मजदूरों के कंधे पर फावड़े और हल होंगे. उनके होंठों पर मेहनत के गीत होंगे.

तारा भी ठीक होकर घर आ जाएगी... गंगाराम ने सोचा... हमारे लिए दिन इतने बुरे नहीं हो सकते. सूखा शाश्‍वत नहीं हो सकता.

उसने आसमान की तरफ देखा, बादल के कुछ सफेद टुकड़े धुनी हुई रुई की तरह टिके हुए थे. इन बादलों में पानी की बूंदे नहीं थी. यह तो सजावटी बादल थे जो आसमान में इसलिए छा गये थे कि आसमान सूखा न दिखे.

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(राकेश भ्रमर)

संपादक प्रज्ञा मासिक,

24, जगदीशपुरम्‌, लखनऊ मार्ग,

निकट त्रिपुला चौराहा, रायबरेली-229316

अक्षर विद्वेषी हमेशा साहित्य जगत में विद्यमान है, आगे भी रहेंगे । वे कवि, कथाकार व नाटककार के रूप में सामने आ सकते हैं, लेकिन अक्षरों पर विश्वास रखनेवाले अक्षर प्रेमियों के लिए यही बेहतर है कि वे इस बात को लेकर क्षोभ व निराशा न प्रकट करें । वे अपने स्नेह एवं विश्वास के बल पर आगे बढ़ते रहें । दर असल प्रेम एवं विश्वास ही उनकी रक्षा कर सकते हैं पर इस ओर भी अवश्य ध्यान रखना है कि कहीं नकली सिक्कों की खोज की व्यस्तता में असली निकालने का मौलिक फर्ज भूल न जाय ।

सभ्य मानव की दुनिया से पुस्तकों को हटाना असंभव है । आदिकाल में यहाँ सिर्फ प्रकृति एवं मानव ही थे । बाद में भौतिक संस्कार के साधन तथा ज्ञान विज्ञान के संचय ग्रन्थों की संख्या बढ़ती गई इसलिए ही समकालीन दौर में इनकी उत्कृष्टता बढ़ी है , आगे इनकी जनप्रियता और भी बढ़ेगी। पुस्तक सभ्य मानव के समस्त जीवन का अनिवार्य अंग है। जीवन के दूसरे तथ्यों के समान यह गंभीर अध्ययन एवं आलोचना का विषय है ,इसका संबंध सिर्फ साहित्य से नहीं अपितु समस्त जिंदगी से भी है।

कहा जाता है कि शल्य चिकित्सक ( सर्जन) जिन्दगी की व्याख्या करता है तो आलोचक साहित्य की व्याख्या देता है। कवि ,कहानीकार एवं नाटककार के लिए प्रेरणा उनके जीवनानुभव है ,लेकिन समीक्षकों के लिए तो प्रेरणा का स्रोत जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्त करती कथा,कविता या नाटक रूपी पुस्तक है। पुस्तकों का अध्ययन जीवनानुभव का एक घटना होने के कारण एक हद तक समीक्षक भी जिन्दगी के व्याख्याता है । लेकिन जब सर्जनात्मक साहित्य भावना की राह स्वीकारता है तो आलोचना युक्ति एवं विश्लेषण की राह अपनाती है।

जब आलोचना, समग्र अनुभूतियों को संजोकर भावनात्मक आविष्कार के रूप में प्रस्तुत होती है दरअसल यही आस्वादन है तब वह भी सृजनात्मक साहित्य की हैसियत प्राप्त करती है। फिर भी इस बात को लेकर आस्वादकों के बीच शंका शेष रह जाते हैं कि आलोचना मौलिक रूप में सृजनात्मक साहित्य से भिन्न वैज्ञानिक साहित्यिक शाखा के अंतर्गत आती है या पूर्णतः सृजानात्मक साहित्य ही है ।

पश्चिमी साहित्य *जगत में इस बात पर लंबी बहस हुई है कि आलोचना की वास्तविक भूमिका और महत्ता क्या है? ‘ लेविस नामक पाश्चात्य विद्वान ने जब अपनी पुस्तक ऐन एक्सपेरिमेंट इन कि्रटिसिज्म्लिखी थी, तो उनके सामने मुख्य रूप से दो प्रश्न उपस्थित थेः

१.क्या यह आरोप सही है कि आलोचक एक नितांत परजीवी (पैरासाइट) व्यक्ति हुआ करता है और उसके आलोचना-कर्म का महत्व प्राथमिक नहीं हो सकता ?

२.क्या आलोचना की भी कोई प्रविधि या सिस्टेम हो सकता है?

इन दोनों प्रश्नों के उत्तर खोजते*खोजते लेविस इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि आलोचना कर्म न द्वैतीयक महत्व का होता है और न ही यह प्रविधि-विहीन हो सकता है ।

लेविसने घोषणा की थी कि आलोचना एक गैर-साहित्यक रचना कर्म तब होती है ,जब वह साहित्य की आलोचना हुआ करती है, साहित्य में निहित कला की आलोचना नहीं । उनकी मान्यता थी कि यह आलोचना रचना में अंतर्निहित कला की आलोचना तभी कर सकती है जब वह प्रविधि-भरी (सिस्टेमैटिक) हो, अविचारित, पूर्व निर्धारित , लक्ष्याभिगामी तथा स्वेच्छाचारी न हो । इसलिए रचना की ठीक-ठीक और सही पहचान कराना ही उसका परम अभीष्ट हो जाता है ।

किसी आलोचना की सार्थकता इस बात में निहित रहती है कि वह किसी रचना की बनावट या बुनावट को यथासंभव निस्संगता के साथ इस प्रकार निरूपित कर दें कि रचना का अंतरंग और बहिरंग इस प्रकार उद्भासित हो उठें और उनका सामंजस्य उसके कलामर्म की स्वतः ही समझ देने लगे। इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए जिस निस्संगता और विवेक की आवश्यकता होती है, उसकी संभाव्यता प्रविधि के अंतर्गत ही हो सकती है।

प्रविधि न केवल कृति की समझ के लिए एक क्रमबद्ध वैज्ञानिकता देती है ,वरन् आलोचक के निराधार बात पर रोक लगाती भी है।

सूर-सूर ,तुलसी-ससि जैसी उक्तियाँ प्रविधि विहीन आलोचना का ही उदाहरण है ,वैसे ही एक आलोचक के द्वारा अज्ञेय को हिन्दी कथा साहित्य में गुलशन नंदा के समतुल्य प्रतिष्ठित किये जाने में इसी प्रविधिहीनता का आभास होता है या उनके द्वारा यह कहे जाने पर कि अज्ञेय ने भाषा का व्यावसायीकरण कर दिया है,इस प्राविधिक असंपृक्ति से उत्पन्न आलोचना की विद्रूपता का आभास पाया जा सकता है । स्वयं अज्ञेय ने एक स्थान पर लिखा है कि उनको अपने समकालीन लोगों में से आलोचक नहीं मिला, इसलिए उनको रचनाकर्म तथा आलोचन कर्म दोनों का ही निर्वाह करना पडा ।

मित्रता के नाम पर आलोचक ऐसी कृतियों की भी आलोचना कर दिया करते है जिन पर लिखना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता । आचार्य मम्मट के विषय में प्रसिद्धि है कि उन्होने अपने भांजे की कृति पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था। आज की हिन्दी आलोचना में कृति-विषयक चयन विवेक पूरी तरह अनुपस्थित है ,जो रचना ही नहीं बन पाती है उस पर भी लिखने के लिए टीका-टिप्पणी करने के लिए आलोचक सुलभ हो जाते हैं ।

आलोचना की सफलता *असफलता इतिहास और दर्शन की अंतः संगति की पहचान पर निर्भर रहती है। निराला और पंत जैसे कवियों की रचनाओं की पहचान या संवेदना तभी हो सकती है जब हम उस कालखंड के सामाजिक राजनैतिक इतिहास से पूरी तरह अवगत हो । इतिहास और दर्शन को आमने सामने रखकर ही तमस’, रागदरबारी’, महाभोज आदि रचनाओं की संवेदना को आत्मसात् किया जा सकता है ।

पुस्तक समीक्षा के कई भाव और रूप है । कभी इनमें से एक ही प्रकट होता है तो कभी अनेकों का समन्वित रूप भी आलोचना में निहित रहता है। कभी-कभी तो पुस्तकास्वादन रूपी अनुभूति को काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करती समीक्षा भी नजर आती है । उस अनुभूति के स्रोत को स्पष्ट करती विश्लेषणात्मक आस्वादन रीति भी प्रचलित है । इन दोनों के समन्वय से ही प्रायः ग्रंथ समीक्षा संभव होती है । पूर्ण सहानुभूति के साथ जो रचना का मूल्यांकन करता है वह उसके ज्ञान सौन्दर्य क्षेत्र के सूक्ष्म भावों की ओर हमारा ध्यान अवश्य आकृष्ट करता है ,साथ ही साथ उन सौन्दर्य भावों एवं क्षेत्रों की व्याख्या भी करता है । यहाँ आलोचक एक हद तक रचना के साथ तादात्म्य की स्थिति में है । यहाँ आलोचक का उद्देश्य अपनी अनुभूति दूसरों के साथ बाँटना है। आत्मनिष्ठ आलोचक ,कवि या कहानीकार का आराधक होता है और पाठकों के सखा भी ।

समीक्षा की एक और रीति है उसका आधार गुण दोष विवेचन है जो वस्तुनिष्ठ भी रहता है । वस्तुनिष्ठता के आधार पर कहानी या कविता का विश्लेषण करनेवाले आलोचक की हैसियत एक न्यायाधीश या पथ प्रदर्शक की होती है । उस वक्त आलोचक को एक मान्यता प्राप्त साहित्यिक मीमांसा का मानदंड स्वीकारना पड*ता है। प्रारंभ में हमारे आलोचक संस्कृत काव्य मीमांसा को आधार के रूप में स्वीकारते थे , बाद में पाश्चात्य समीक्षा पद्धति के आधार पर समीक्षा करने की प्रथा भी उद्भूत हुई; आजकल अपने ही साहित्य दर्शन के आधार पर रचनाओं का मूल्यांकन करनेवाले आलोचक भी मौजूद है । कभी-कभी आलोचक समान स्तर की अन्य रचनाओं तथा प्रतिष्ठित मानक ग्रन्थों की तुलना करके तुलनात्मक अध्ययन रीति भी अपनाता है ।

साधारणतः समीक्षा में आस्वादन एवं मूल्यांकन का समन्वय ही द्रष्टव्य होता है ।कभी किसी एक अंश का उतार या चढ़ाव कहीं नजर आना भी स्वाभाविक मात्र ही है । लेकिन आस्वादन एवं मूल्यांकन के अलावा अन्य समीक्षा पद्धति भी पाश्चात्य देशों में प्रचलित है । मनोविज्ञान की सहायता से साहित्यकार के अवचेतन मन में उतरना, साहित्यकार की भावना ,शब्द संपदा आदि का बारीकी से विश्लेषण करना जैसे आलोचना की नई पाश्चात्य रीतियाँ आस्वादन एवं मूल्यांकन की सहायता तो करेगी लेकिन एक दायरे से बाहर खतरनाक भी है ।

रचना की सामाजिक एवं भाषा वैज्ञानिक पृष्ठभूमि तथा रचनाकार की जिन्दगी के आधार पर समीक्षा करने की प्रथा हमारे देश में भी संक्रमित होने लगी है । इस प्रकार साहित्यकार की जिन्दगी रचनाओं के आंतरिक अर्थों के विभिन्न पहलुओं को उन्मीलित करने योग्य भी हो सकती है । लेकिन साहित्यकार के जीवन और सामाजिक पृष्ठभूमि को ज्यादातर महत्व देने पर साहित्येतर बातें आलोचना में परिलक्षित होगी परंतु आलोचक के लिए यह बात अत्यंत वांछनीय है कि रूप और भाव के उचित सामंजस्य से उद्भूत रचनाकार का विशेष व्यक्तित्व ही आलोच्य विषय है ।

कुछ समय पहले रचना की साहित्यिक विशिष्टताओं के बदले उनसे भिन्न विशेषकर सामाजिक हित को तरजीह देती समीक्षात्मक पद्धति हमारे यहाँ जबरदस्त प्रतिष्ठित थी । आज भी ऐसी शैली ज्यादातर विद्यमान है । कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि इससे मुक्ति का समय बीत चुका है । किसी एक नाटक , कविता या कहानी का मर्म उसका साहित्यिक मूल्य है । उसका परम उपयोग भी उन साहित्यिक मूल्यों पर अधिष्ठित है ।

आलोचक के लिए एक समदर्शी दृष्टिकोण अपेक्षित है । समदर्शी से तात्पर्य यह नहीं कि आलोचना में लेखक की वैयक्तिक पसंद नापसंद का स्पर्श नहीं ,लेकिन ये पसंद और खासियतें गैर साहित्यिक न हो क्योंकि साहित्यिक रचना के प्रति आलोचक की प्रतिक्रिया ही आलोचना है। आलोचना कितना भी वस्तुनिष्ठ हो,उसमें लेखकीय व्यक्तित्व की झलक अवश्य पड़ेगी । लेकिन आलोचक की ईमानदारी पर तब संदेह उत्पन्न हो सकता है जब साहित्यकार के साथ उसका रिश्ता समीक्षा को विकल बनाने लगे । रही बात आलोचक की आस्वादन क्षमता की तो सभी विधाओं की साहित्यिक रचनाओं का समान आस्वादन आलोचक के लिए असंभव है । वैसे और भी कई सीमाऍं हो सकती है । इनसे आलोचक को खुद बेफिक्र होना है जहाँ तक हो सके अपनी आस्वादन क्षमता से परे की रचनाओं को यों ही छोड़ देना ही बेहतर है । जिसे कविता पसन्द नहीं है उसे कविता की आलोचना नहीं करनी चाहिए । यह दुखद बात है कि अपने आस्वादन से परे के एक काव्य को इस कोटि के एक समीक्षक द्वारा निम्नस्तरीय कहना और भी त्रासद होगा । इसलिए आलोचक को फक्कड़पन से बचना चाहिए,उसे विनम्र और सहिष्णु होना ही है।

समीक्षक का नींवाधार गुण सहृदयता है,असाधारण सहृदयता के अभाव में समीक्षा करना दुस्साहस है। सहृदयता के अभाव में समीक्षा के क्षेत्र में प्रविष्ट होना और सहज प्रतिभा के बिना सृजन करना दोनों समान है। यह भी द्रष्टव्य है कि सिर्फ सहृदयता से ही काम नहीं चलेगा,आलोचना के लिए ग्रंथों का परिचय ,जीवन की अवधारणा तथा साहित्यिक आलोचना का गहरा ज्ञान भी अनिवार्य है ।

साहित्यिक धारायें प्रांतीय सीमाओं से बाहर बहने तथा सृजन की पृष्ठभूमि अत्यंत जटिल होने की वजह से समीक्षकों के लिए अपेक्षित ज्ञानार्जन एक दुष्कर काम है ।

एक आलोचक के बारे में दूसरे एक आलोचक ने कहा है कि उन्होने एक किताब पढ़ी ,समझ में कुछ भी नहीं आया इसलिए उन्होंने सोचा कि इसकी समीक्षा की जाय । कई उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई अतिरंजित बात नहीं है । सृजनात्मक साहित्यकार का रवैया भी इससे बेहतर नहीं है । हमारा साहित्य ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ साहित्यकार अप्राप्य को वरदान समझता है एवं आलोचक अज्ञान को आभूषण मानता है और बुद्धिजीवी केवल अपनी तुच्छता के घमंड को अपनी निजी पूंजी महसूस करता है । इससे ऐसा तात्पर्य नहीं है कि सभी साहित्यकार एवं आलोचक मूढ़ स्वर्ग में जी रहे हैं , उद्देश्य सिर्फ यही है कि प्रायः यही लोग अग्रणी होते हैं। हमें उन लोगों की जरूरत है जो इनके लिए समय बर्बाद किये बिना उत्कृष्ट साहित्य एवं समीक्षा में दृष्टि अडिग रखकर अग्रसर हो ।

अच्छी आस्वादन क्षमता एवं स्तरीय ज्ञान से युक्त सहृदय दल आज हमारे देश में है। इन सहृदय पाठकों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने योग्य साहित्य और समीक्षा की रचना हमारे यहाँ पर्याप्त मात्रा में होती नहीं है । अच्छे साहित्य एवं शुद्ध समीक्षा में विश्वास रखनेवाले एक साथ मिलकर इस समस्या पर विचार करें। समीक्षा एवं सृजनात्मक साहित्य में कोई आपसी प्रतियोगिता नहीं है ,उसकी आवश्यकता भी नहीं है । यदि कोई उसकी उपस्थिति महसूस करता है तो वह गलतफहमी ही है । ऐसी हालत न आ जाय कि हमारे आम पाठक ,साहित्यकारों एवं समीक्षकों को क ख गसिखाने लगें ।

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संपर्क:

डॉ. आर.जयचन्द्रन

रीडर, हिन्दी विभाग,

मनोन्मणियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय

तिरुनेलवेली,तमिलनाडु ,भारत.

दलित चिंतकों की दृष्‍टि में अतीत एक स्‍याह पृष्‍ठ है, जहां सिर्फ घृणा है, द्वेष है, उदात्त मानवीय सम्‍बन्‍धों की गरिमा का विखंडन है। हर एक प्रसंग, घटना, दैहिक वासना बनकर रह गई है। दलित साहित्‍य अतीत के इस खोखलेपन से परिचित है। अतीत के आदर्श उसे झूठे और छद्‌म दिखाई पड़ते हैं। जिसे वह उतारकर फेंक देना चाहता है ताकि भारतीयता की सच्‍ची और सजीव पहचान उभरे। दलित साहित्‍य ने इस उदात्त भाव को मुखरता से अभिव्‍यक्‍त किया है। इस परिप्रेक्ष्‍य में ओमप्रकाश बाल्‍मीकि की टिप्‍पणी सटीक है- ‘‘युगों-युगों से प्रताड़ित, शोषित, साहित्‍यिक, संस्‍कृति से वंचित मानव जब स्‍वयं को साहित्‍य के साथ जोड़ता है तो दलित साहित्‍य उसकी निजता को पहचानने की अभिव्‍यक्‍ति बन जाता है। हाशिए पर कर दिए गए इस समूह की पीड़ा जब शब्‍द बनकर सामने आती है तो सामाजिकता की पराकाष्‍टा होती है। सदियों से दबा आक्रोश शब्‍द की आग बनकर फूटता है। तब भाषा और कला की परिस्‍थितियाँ उसे सीमाबद्ध करने में असमर्थ हो जाती हैं क्‍योंकि-पारम्‍परिक साहित्‍य के छद्‌म और नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण के प्रति वह निर्मम है। दलित रचनाकार लुक-छिपकर या घुमा-फिराकर बात करने का पक्षधर नहीं है। उनके लिए कल्‍पना और धोखों पर आधारित पद्धति और उसके मापदंड त्‍याज्‍य हैं। अन्‍तर्सम्‍बन्‍धों और परिवेश की वस्‍तुपरक व्‍याख्‍या दलित साहित्‍य में आरोपित नहीं है। बल्‍कि सहज और स्‍वाभाविक है।''1 इसलिए दलित लेखकों के इस कथन में दम है कि केवल दलित ही दलित लेखन कर सकता है। दलित का लेखन ही दलित की स्‍वानुभूति का लेखन है श्‍ोष गैर दलित का लेखन दलित के बारे में स्‍वानुभूति का नहीं, सहानुभूति का हो सकता है और यह सहानुभूति जातीय, वर्गीय और सांस्‍कारिक हितों की भिन्नता के कारण बहुत दूर तक नहीं रहती। कभी-कभी तो यह सहानुभूति तदनुभूति से भी अधिक खतरनाक होती है। ऐसा अक्‍सर देखने को मिल जाता है। आत्‍म कथाओं के परिप्रेक्ष्‍य में यह टिप्‍पणी सटीक बैठती है।

हिन्‍दी साहित्‍य के परम्‍परावादी समीक्षकों की समझ में दलित चिंतकों/दलित लेखकों तथा दलितों का दर्द नहीं आ सकता, क्‍योंकि जिस लदोई (मैली) को सवर्णों के लोग जानवरों को खिलाते थे, वही लदोई श्‍यौराजसिंह बेचैन जैसे दलितों का भोजन हैं और जिस जूठन को पशु और कुत्‍ते खाते उसी जूठन को ओमप्रकाश बाल्‍मीकि जैसे कितने दलित खाकर आज यहाँ तक पहुँचे हैं। इस लदोई और जूठन को कितने गैर दलितों ने खाया और लेखक हैं बने? क्‍या लदोई और जूठन खाया गैर दलित लिख सकता है उसी अनुभूति के साथ जिस अनुभूति के साथ इसके भोक्‍ता रहे दलित लेखक? जो बात दलित आत्‍मकथा और अन्‍य आत्‍मकथा में फर्क करती है, वह यह है कि दलित लेखक स्‍वयं और अपने परिवार के द्वारा भोगें गये यथार्थ के चित्रण करने में नहीं हिचकता। यदि दलित लेखक के परिवार की महिला को मजबूरीवश, भयवश, बलवश अथवा किसी अन्‍य कारणों से भी शारीरिक और यौन शोषण झेलना पड़ता है तो वह उसको अपनी आत्‍मकथा में अपने अनुभव और सोच के अनुसार स्‍थान देने में नहीं हिचकता। इतना ही नहीं यदि किसी दलित लेखक ने बदले की भावना या प्रतिक्रिया स्‍वरूप अथवा आक्रोश में आकर सवर्ण की महिला के साथ ऐसा कुछ कर दिया है तो वह उसको अपनी आत्‍मकथा में स्‍थान दे देगा। दलित की आत्‍मकथा ‘गुह्यं च गुह्यति' का पालन करते हुए अपने अनुभव और विचारों को ज्‍यों का त्‍यों प्रकट कर देगी, परन्‍तु दलित के अतिरिक्‍त अन्‍य आत्‍मकथाकारों में इतना साहस देखने को नहीं मिलता कि वह इन दोनों परिस्‍थितियों या कारनामों को न छुपाए।‘‘दलित आत्‍मकथा इसीलिए बेबाक आत्‍मकथा होती है। लागलपेट के सहारे इसे कलात्‍मकता के आवरण में लपेटकर अविश्‍वसनीय नहीं बनाया जाता।''2

आत्‍मकथाएँ पहले से ही लिखी जा रही हैं। कई साहित्‍यकार हैं जिन्‍होंने सक्रियता के साथ आत्‍मथाएँ लिखी हैं। परन्‍तु उनकी आत्‍मकथाएँ और दलित साहित्‍यकारों द्वारा लिखित आत्‍मकथाओं में मूलभूत अन्‍तर होता है। यह प्रश्‍न भी अनेक बार उठ चुका है कि दलित लोग सोच-समझकर आत्‍मकथा ही क्‍यों लिख रहे हैं? क्‍या ये दलित साहित्‍यकार किसी दबाव में आत्‍मकथाएं नहीं लिख रहे हैं? ऐसे सवालों का उत्‍तर देते हुए श्‍यौराज सिंह ‘बेचैन' का कहना है,कि ‘रही बात दबाव में लिखने की तो यह काम वही लोग कर सकते हैं, जिनको लिखने से जबरन रोका गया।' सोच-समझ कर लिखने का प्रश्‍न कोई प्रश्‍न नहीं है। ऐसा कौन सा लेखन है जो बिन-सोचे समझे हो जाता है। अपितु सोच-समझ कर किया गया काम तो और भी अच्‍छा होता है। वैसे शोषित लोगों को जब भी शिक्षा प्राप्‍त करने का अवसर मिला, उसने उसे प्राप्‍त करने का अवसर नहीं गंवाया और पढ़-लिखकर उसने जब अपनी व्‍यथाओं को लिपिबद्ध करना आरम्‍भ किया तो उसने सबसे पहले आत्‍मवृत्तांत ही लिखना आरम्‍भ किया। ‘‘अमेरिका के अश्‍वेतों और रेड-इंडियन ने जब लेखन के द्वारा आन्‍दोलन में जागरूकता लानी आरम्‍भ की तब सबसे पहले उनमें से नब्‍बे प्रतिशत ने आत्‍मकथाएँ ही लिखीं। विश्‍वभर में ऐसे लोगों ने अपनी समस्‍याओं की वैचारिक शुरुआत आत्‍मकथा लेखन से ही की, क्‍योंकि आत्‍मकथा एक प्रामाणिक अभिलेख के रूप में सामने आती है। इस प्रामाणिक अभिलेख की विश्‍वसनीयता से शोषक हमेशा घबराता रहा है। साथ ही-साथ आत्‍मकथा भुक्‍तभोगी समुदाय में एक विश्‍ोष प्रकार की जागृति का कार्य करती है, जो उस समाज में वैचारिक उत्त्ोजना का संचार करती है।''3

आत्‍मचरित्र आधुनिक मराठी साहित्‍य की एक समृद्ध विधा रही है। विश्‍ोषतः सन्‌ 1960 के बाद जीवन के विविध क्षेत्रों में कार्यरत व्‍यक्‍तियों ने अपनी आत्‍मकथाएँ बड़ी बेवाक भाषा में लिखना शुरू कर दिया। दलितों की विभिन्न जातियों के शिक्षित लेखकों ने भी अपनी आत्‍मकथाएँ लिखनी शुरू कर दीं। इनकी आत्‍मकथाओं की यह विश्‍ोषता रही है कि इसमें वे अपने बहाने अपनी जाति की भयावह स्‍थिति का, प्रस्‍थापितों और सवर्णों की शोषण-वृत्ति का, जातिगत संस्‍कृति, संस्‍कार अन्‍धश्रृद्धाएँ, खान-पान आदि का बड़ा ही तीखा और यथार्थ चित्रण करते हैं। यह आत्‍मकथाएँ समाज की सबसे निचली श्रेणी के दुखों को शिक्षित समाज तक पहुँचाने में सफल हो गयीं। कहानी की अपेक्षा ये आत्‍मकथाएँ अधिक सशक्‍त रहीं। पारम्‍परिक आत्‍मकथाओं में व्‍यक्‍ति अपने जन्‍म से लेकर वृद्धावस्‍था तक की प्रमुख घटनाओं, अनुभवों और सम्‍पर्क में आये हुए व्‍यक्‍तियों को उभारता चलता है। परन्‍तु दलित-आत्‍मकथाओं के लेखकों की औसत उम्र 25-40 तक के बीच की रही है। कुछ प्रमुख दलित आत्‍मकथाएं इस प्रकार हैं- (1) हजारी कृत आई वाज एन आउट कास्‍ट (अंग्रेजी में 1951), (2) श्‍यामलाल की ‘‘अनटोल्‍ड स्‍टोरी अॉफ ए भंगी वाइस चान्‍सलर (अंग्रेजी), (3) डॉ0 डी0आर0 जाटव की ‘‘मेरा सफर मेरी मंजिल'' (अंग्रेजी में), (4) दया पवार की आत्‍मकथा ‘‘अछूत'' (मराठी में), (5) बेबी कावले की ‘‘जीवन हमारा'' (मराठी), (6) सान्‍ताबाई कृष्‍ण जी कांवले की मा ज्‍या जल माची चित्‍यूर कथा (मराठी),(7) शरण कुमार लिम्‍बले की ‘‘अक्‍करमाशी'' (मराठी), (8) लक्ष्‍मण गायकवाड़ की ''उठाईगीर'' (मराठी), (9) प्रा0 ई. सोन कांवले की ‘‘यादों का पंछी'' आदि।

हिन्‍दी में मराठी की प्रेरणा से सत्तर-अस्‍सी के दशक में दलित लेखन आरम्‍भ हुआ। हिन्‍दी में प्रमुख आत्‍मकथाएं हैं- 1. ओमप्रकाश बाल्‍मीकि ‘‘जूठन'', 2. मोहनदास नैमिशराय की ‘‘अपने-अपने पिंजरे'', 3. कौशल्‍या वैसंत्री की ‘‘दोहरा अभिशाप'', इन रचनाओं में जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं-जातिवाद, रोटी कपड़ा और मकान का व्‍यापक उल्‍लेख हुआ है। यही नहीं इन आत्‍मकथाओं में अपने समाज का सम्‍पूर्ण दैन्‍य, दारिद्रय, अज्ञान, संस्‍कृति-विकृति, धर्म, मनोरंजन आदि बातों को भी रेखांकित किया है। इसका यह कदापि अर्थ नहीं कि ये आत्‍मकथाएँ समाजशास्‍त्र की पुस्‍तकें मात्र हैं बल्‍कि कलात्‍मक स्‍तर तक ये पहुँची हुई हैं। एक परिसंवाद में लक्ष्‍मण माने ने कहा है कि ‘हमारे समाज में एक जाति के दुख का पता दूसरी जाति को नहीं होता। संवेदनाओं का आदान-प्रदान भी यहाँ नहीं हुआ है। साढ़े तीन प्रतिशत लोगों द्वारा लिखे गये मराठी साहित्‍य में समाज के दुर्बल वर्ग का चित्रण नहीं हुआ है।' कम-अधिक मात्रा में यही स्‍थिति हिन्‍दी तथा अन्‍य भारतीय भाषाओं के साहित्‍य की है 4 अत्‍यन्‍त प्रतिकूल परिस्‍थितियों, दरिद्रता और संघर्ष की स्‍थिति से इनका व्‍यक्‍तित्‍व विकसित होता गया है। इस कारण इन आत्‍मकथाओं का मूल्‍यांकन सामाजिक और आर्थिक स्‍थिति के सन्‍दर्भ में करना पड़ता है। इन आत्‍मकथाओं का शिल्‍पगत ढ़ाँचा कहानी के शिल्‍प के अधिक निकट है। प्रत्‍येक प्रकरण अपने-आपमें अर्थपूर्ण और स्‍वायत्त होता है। यूँ तो वह एक-दूसरे के साथ जुड़ा हुआ भी होता है, लेकिन उसकी स्‍वतन्‍त्र सत्ता के कारण ही उसके किसी अंश को कहानी विधा के अन्‍तर्गत रखा जा सकता है। आत्‍मकथा के लेखन पर परम्‍परावादी लेखकों द्वारा उठाये गये प्रश्‍नों का उत्‍तर देते हुए हरपाल सिंह अरूप का मानना है कि ‘‘जिनके सामने शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, रोजगार और आर्थिक प्रगति के प्रश्‍नों से पहले मानवीय गरिमा के साथ जीने का प्रश्‍न प्रमुख है, जिनके सामने बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के दोहन स्‍वरूप जमीन, जंगल और मकान से उखड़ जाने का दुर्भाग्‍य राक्षस की तरह मुंह बाये खड़ा है, जिनको अपने मूल स्‍थानों से विस्‍थापन झेलने की लाचारी से दो-चार होना पड़ रहा है, जिनको महानगरों की झुग्‍गी झोपड़ियों में नारकीय जीवन जीने की तिक्‍तता झेलनी पड़ रही है, जिनको पर्यावरण-क्षरण और प्रदूषण की मार झेलती जिन्‍दगी को जीवन मानने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, वे अपनी व्‍यथा-कथा को यदि व्‍यक्‍त करना चाहते हैं तो उन्‍हें साहित्‍य की किसी ऐसी विधा की दरकार तो होगी ही जो उनके अनुभवों और सोचों को पूरी शिद्दत के साथ सामने ला सके। दलितों के जीवन के यथार्थ को अभिव्‍यक्‍ति देने के लिए सामाजिक, आर्थिक विदू्रपताओं और असंगतियों को झेलने वाले की भीतरी कशमश को सामने लाने की आवश्‍यकताओं को जो विश्‍वसनीयता से वहन कर सके, किसी ऐसी विधा की आवश्‍यकता दलित साहित्‍यकारों के द्वारा महसूस की ही जानी चाहिए। व्‍यष्‍टिगत अनुभवों की समष्‍टिगतता प्रदान करने के लिए परिवेश के यथार्थ को झेलते, देखते, अनुभव करते केन्‍द्रीय पात्र के लिए आत्‍मकथा लिखने से बढ़कर और कोई उपाय नहीं हो सकता।''5

दलित आत्‍मकथाओं का आरम्‍भ डॉ0 बाबा साहब अम्‍बेडकर द्वारा लिखित ‘मी कसा झालो' (मैं कैसे बना) से होता है। इसके बाद प्र0ई0 सोनकांबले द्वारा लिखित ‘यादों के पंछी' एक उत्‍कृष्‍ट आत्‍मकथा है। इसमें महार समाज की यातना को अत्‍यन्‍त प्रखरता और जीवन्‍तता के साथ व्‍यक्‍त किया गया है।

दया पवार की ‘बलुंत' (‘अछूत' नाम से हिन्‍दी में प्रकाशित) भी इसी परम्‍परा की कृति है। सोनकांबले की आत्‍मकथा का केन्‍द्र अंचल और वहाँ की मानसिकता है तो दया पवार की आत्‍मकथा का आरम्‍भ अंचल से होता है; परन्‍तु सम्‍पूर्ण आत्‍मकथा में बम्‍बई, वहाँ की झुग्‍गियों में रहती अछूत जातियाँ, उनके सुख-दुख, संस्‍कृति-विकृति आदि केन्‍द्र में है। मराठी दलित महिलाएं भी आत्‍मकथा लेखन में आगे आई हैं। बेबी काँवले, शांता बाई, मुक्‍तासवा गौड़ आदि''।6

माधव कोंडविलकर की आत्‍मकथा ‘मुक्‍काम पोस्‍ट गोठणे- में भी अनुभूति के नये आयाम उद्‌घाटित हुए हैं। शिक्षित चमार व्‍यक्‍ति को शिक्षकी पेशा करते समय किस भयावह मानसिकता से गुजरना पड़ता है इसका बड़ा सशक्‍त चित्रण इसमें किया गया है।

शरण कुमार लिम्‍बाले की आत्‍मकथा अक्‍करमाशी में शोषण एवं अमानवीयता तथा गरीबी का यथार्थ चित्रण हुआ है। आत्‍मकथाओं पर उठाये गये पराम्‍परावादी साहित्‍यकारों के प्रश्‍नों का उत्‍तर देते हुए दलित साहित्‍यकारों का मानना है कि यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। परम्‍परावादी समाज पर टिप्‍पणी करते हुए मुद्राराक्षस कहते हैं कि, ‘इनकी दरिद्रता का अर्थ सिर्फ इतना होता है कि हमने तीन रोज मुर्गा नहीं खाया, दो दिन विलायती शराब नहीं पी, एक जगह से दूसरी जगह पैदल चले। पंचसितारा होटलों में नहीं जा सके। गरीबी का स्‍वरूप यह कि बैंक या विश्‍वविद्यालय में नौकरी नहीं मिली, गवर्नर या एम्‍बेसडर नहीं बन सके, कितनी गरीबी झेली', कितनी सटीक उक्‍ति है। जरा सोचकर देखो, कहां ‘अक्‍करमाशी' का नायक जिसकी मां किसी जमींदार की रखैल है, बहनों की दशाा भी इतनी ही दर्द भरी है। सब नायक को अपने सामने झेलना-सुनाना और सुनना पड़ रहा है। सोचकर देखिए, ‘अक्‍करमाशी' में गरीबी मात्र ही नहीं झेली जा रही, अपितु जो झेला जा रहा है वह इन हिन्‍दी के आत्‍मकथाकारों की जीवनी में दूर-दूर तक भी कहीं नहीं रहा होगा।''7

कैकाड़ी समाज (विमुक्‍ति जनजाति) के लक्ष्‍मण माने की ‘उपरा' (पराया) आठवें दशक की उत्‍कृष्‍ट आत्‍मकथा है। माने की उम्र केवल 30-32 वर्ष की है। कैकाड़ी समाज घोर अज्ञानी, अन्‍धश्रृद्धालु, दरिद्री, अछूत और घुमक्‍कड़ी वृत्ति का है। ऐसे समाज में जन्‍म लेकर स्‍नातक स्‍तर तक की शिक्षा पाना विश्‍ोष बात है। इन प्रमुख लेखकों के अलावा प्रा0 केशव मेश्राम, प्रा0 कुमुद पावडे, दिनकर गोस्‍वामी, आत्‍माराम राठौड़, ना0मा0 निमगडे, डॉ0 गंगाधर पानतावणे आदि लेखकों ने भी अपनी-अपनी आत्‍मकथाएँ लिखी हैं।

मराठी साहित्‍य के समांतर हिन्‍दी साहित्‍य में भी पिछले वर्षों में कुछ दलित आत्‍मकथाएं आई हैं और इन्‍होंने साहित्‍य की जड़ता को अपने ढ़ंग से तोड़ा है। हिन्‍दी दलित साहित्‍य के क्षेत्र में भी भगवान दास ने ‘‘मैं भंगी हूँ'' नाम से एक भंगी मेहतर जाति के इतिहास से सम्‍बन्‍धित समाज की आत्‍मकथा लिखी थी। यह सम्‍भवतः सन्‌ 1950 के दशक में प्रकाशित हुई थी। आत्‍मकथा विधा में दलित साहित्‍य की यह पहली रचना थी, जिसमें एक आत्‍मविस्‍मृति दलित जाति के इतिहास का गम्‍भीर गवेष्‍णा है। इसके काफी समय बाद हिन्‍दी दलित साहित्‍य में व्‍यक्‍तिगत आत्‍मकथा के लेखन का दौर आरम्‍भ हुआ। 9वें दशक में हिन्‍दी दलित आत्‍मकथा लिखने की शुरुआत पत्रकार राजकिशोर द्वारा सम्‍पादित ‘हरिजन से दलित' में दलित लेखक ओमप्रकाश बाल्‍मीकि का आत्‍कथांश से मानी जा सकती है। हिन्‍दी पाठकों व साहित्‍यकारों में दलित आत्‍मकथाओं के प्रति रुझान बढ़ी है और यह साहित्‍य की प्रमुख विधा बन रही है। इसी की प्रेरणा स्‍वरूप 1995 में मोहदनदास नैमिशराय की आत्‍मकथा ‘अपने-अपने पिंजरे' दूसरी आत्‍मकथा ओमप्रकाश बाल्‍मीकि की ‘जूठन' 1996 में प्रकाशित हुई।''8 मोहनदास नैमिशराय और ओमप्रकाश बाल्‍मीकि की आत्‍मकथाएं इनमें प्रमुख हैं। नैमिशराय की ‘‘अपने-अपने पिंजरे'' और बाल्‍मीकि की ‘‘जूठन'' श्‍यौराज सिंह बेचैन की अस्‍थियों को अक्षर, एक लदोई, जयप्रकाश कर्दम की ‘मेरी जात', एन0आर0 सागर ‘जब मुझे चोर कहा', सूरज पाल चौहान की ‘घूंट के अपमान', बुद्धशरण हंस की ‘टुकड़े-टुकड़े आइना', हिन्‍दी पट्‌टी में लगभग उन्‍हीं जीवन अनुभवों को व्‍यक्‍त करती हैं जो मराठी दलित आत्‍मकथाओं से उजागर होती हैं। कुछ परम्‍परावादी आलोचक दलित आत्‍माकथाकारों पर जल्‍दबाजी के लेखन पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा रहे हैं उनका मानना है कि दलित साहित्‍यकारों में एक प्रकार की जल्‍दबाजी देखी जा रही है। लगभग सभी दलित साहित्‍यकारों ने इतनी जल्‍दी अपनी-अपनी आत्‍मकथाएं भी लिख डाली हैं, कहीं ऐसा न हो जाए कि कुछ दिनों के उपरान्‍त उनके पास विषय की ही कमी हो जाय? सदियों तक धीरज और यंत्रणा के साथ प्रतीक्षा करने के बाद, अन्‍याय और शोषण का लगातार निर्मम शिकार होने के बाद अगर उनमें अपना स्‍थान और मानवीय गरिमा पाने की कुछ अधीरता लगती है तो यह सर्वथा उचित और सामयिक है। उन्‍होंने अगर जल्‍दी-जल्‍दी अपनी आत्‍मकथाएं लिख डाली हैं तो इसका एक कारण तो यह होगा कि वे अपने सीधे अनुभवों पर अपना ध्‍यान एकाग्र करना चाहते हैं। इस बहाने उन्‍होंने आत्‍मकथा जैसी हिन्‍दी में विपन्न विधा को कुछ समृद्ध करने की चेष्‍टा भी की है। यह खतरा भले हो लेकिन अभी यह मानने का कारण नहीं जान पड़ता कि आत्‍मकथा से उनका जीवनानुभव चुक जाएगा। उनकी जिजीविषा और सिसृक्षा बनी रहेगी ऐसी आशा करनी चाहिए। दलित संसार स्‍वयं में बेहद जटिल और विशाल है और कई हजार लेखकों के लिए उपजीव्‍य बना रह सकता है। दूसरे, दलित के अलावा बहुत बड़ा संसार है जिस पर लिखने का दलित लेखकों को समान अधिकार है।9

दलित आत्‍मकथाओं पर अपनी टिप्‍पणी करते हुए डॉ0 श्‍यौराज सिंह बेचैन लिखते हैं ‘‘इनमें दलित छवि एक सचेतन आत्‍मसंघर्षरत स्‍वाभिमानी व्‍यक्‍ति की छवि के रूप में उभरकर आई है। दलित आत्‍मकथाकार अतीत की भद्‌दी तस्‍वीरें देखते हैं। साथ-साथ उन हाथों को भी पकड़ते हैं जिन्‍होंने कई, सौन्‍दर्य से भरी जीवन झांकियों पर ईर्ष्‍यावश कालिख पोत दी है। कई कारणों से दलित साहित्‍य में आत्‍मकथाओं का बड़ा महत्त्व है। ये आत्‍मकथाएं इतिहास विहीन दलित समाज में सूचनाओं, तथ्‍यों और स्‍थितियों के ऐसे प्रमाण जुटाती हैं जिनके बगैर हिन्‍दी समाज का अध्‍ययन अधूरा है। दलितों के दुखों पर गौर करते हुए दलित चेतना के पक्षधर डॉ0 अमरसिंह बार-बार इतिहास के सबक दोहराते हैं। दलित आत्‍मकथाएं सत्‍य के जरूरी दस्‍तावेज हैं, इन्‍हें ब्राह्मणों को प्राथमिकता से पढ़ना चाहिए। यदि वे नहीं पढ़ पा रहे हैं तो वे खुद को नहीं समझ पाएंगे। ज्ञान व्‍यवस्‍था के सर्वेसर्वा होने के कारण अतीत में दलितों की जीवन भूमि में ब्राह्मणों ने दुःख बोये हैं, तो दलितों को सुख भी उन्‍हीं से प्राप्‍त करना है। ‘‘मुद्राराक्षस का इस बारे में विचार है, ‘दुनिया में जो भी दलित समस्‍या रही उसकी वैचारिक शुरुआत अपनी कहानी से ही हुई। जैसा कि पिछले बीस वर्षों में रचनात्‍मक हिन्‍दी में चूंकि दलित प्रश्‍न निर्णायक सिद्ध हो गया है, इसलिए सवर्णों को दलित रचनाकारों के आत्‍मवृत्तान्‍तों से खौफ महसूस होने लगा। उन्‍हें महसूस हुआ कि ये जीवनियां ऐसा प्रमाणिक दस्‍तावेज हैं जो दलित समुदाय को जागृति और वैचारिक उत्त्ोजना देगी। उनमें विजेता की कल्‍पना पैदा होगी।'10

अमेरिकी ब्‍लैक पैन्‍थर (1966) की तर्ज पर भारत में 1972 में दलित पैन्‍थर की स्‍थापना महाराष्‍ट्र में राजा ढ़ाले और नामदेव ढ़साल ने की। उसके बाद देश भर में कला, साहित्‍य सम्‍बन्‍धी सैकड़ों संस्‍थायें खड़ी हो गयीं। छिपाकर रखी एवं भोगी हुई यातनाएं आत्‍मकथाओं के जरिए सार्वजनिक कर दी गयीं। दलितों को आत्‍मकथा लिखने के खतरे भी बहुत हैं। तब सवाल उठता है कि ऐसे जोखिमपूर्ण कार्य को ये लोग क्‍यों कर रहे हैं? शरण कुमार लिम्‍बाले की पत्‍नी यह प्रश्‍न करती हैं ‘‘कि यह सब लिखने से क्‍या फायदा? तुम क्‍यों लिखते हो? कौन अपनाएगा हमारे बच्‍चों को? या ओमप्रकाश बाल्‍मीकि की पत्‍नी उनके ‘सरनेम' को लेकर कहती हैं ‘कि हमारे कोई बच्‍चा होता तो मैं इनका सरनेम जरूर बदलवा देती।'' जब ये समस्‍या इतनी गम्‍भीर है तब इस पर सोचने की जरूरत है? लिम्‍बाले जी कहते हैं ‘‘फिर भी मैं लिखता हूँ, यह सोचकर कि जो जीवन मैंने जिया वह सिर्फ मेरा नहीं है। मेरे जैसे हजारों, लाखों का जीवन है। मुख्‍य प्रेरणा यहां यह मिलती है कि अमानवीय जीवन को जिया, लाखों यंत्रणाओं का सामना करना पड़ा, फिर भी यहां तक पहुंचा। इसलिए आत्‍मकथाएं दलित लेखकों के अदम्‍य जीवन संघर्ष के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती हैं, क्‍योंकि दलित आत्‍मकथाकार बताना चाहते हैं कि जो नारकीय जीवन हमें मिला, उसमें व्‍यक्‍ति विश्‍ोष का अपराध नहीं है। शिक्षा, साहित्‍य, भूमि आदि उत्‍पादन के साधनों से वंचित और सामाजिक गतिविधियों से अलग-थलग कर हमें मजबूर बना दिया, यह हमारे पूर्वजन्‍मों के कारण नहीं है बल्‍कि पक्षपातपूर्ण सामाजिक व्‍यवस्‍था की नियत के कारण हैं।11 डॉ0 अम्‍बेडकर ने भी अपनी आत्‍मकथा ‘मी कसा झाला' (मैं कैसे बना) शीर्षक से लिखी, जिसमें आत्‍मकथा की उपयोगिता व प्रकृति का आभास होता है। ‘‘मेरा विकास किसी अद्‌भुत शक्‍ति के कारण नहीं हुआ बल्‍कि मेरे जीवन निर्माण में परिश्रम और संघर्ष मुख्‍य बिन्‍दु रहे हैं।'' ऐसा मत प्रतिपादित करने वाले डॉ0 अम्‍बेडकर से दलित लेखकों ने क्‍या प्रेरणा ली है? ‘‘अपने जीवन की सांघातिक परिस्‍थितियों को झेलना, सहना और प्रतिकार की सन्‍नद्धता संजोना इन सभी को सही अभिव्‍यक्‍ति देने के लिए आत्‍मकथा से अच्‍छी विधा दूसरी कैसे हो सकती है? उपन्‍यास या कहानी में इतना खुलापन नहीं आ सकता कि विश्‍वसनीय तरीके से झेले गये संघातों को सीधे-सीधे बयान किया जा सके। कटुता और अन्‍यमनस्‍कता जब क्षोभ उत्‍पन्न करते हैं तब एक ऊर्जावान दलित मन में सभी दबावों को झेलने के उपरान्‍त जो संभावनाशीलता जन्‍म लेती है, उसको शाब्‍दिक रूप में आत्‍मकथा से बेहतर ढ़ालने का और कोई तरीका हाथ नहीं लगता। अन्‍तर्मन की कुंठा और खामोश प्रतिक्रिया को मुक्‍ति चेतना में ढ़लते हुए दिखाना इसी विधा की सामर्थ्‍य में है। जीवन में घटी घटनाओं को जैसा भोगा, जैसा महसूस किया वैसा ही कह देना कला का हिस्‍सा न हो, कोई बात नहीं, परन्‍तु घटना के पीछे का विचार-मंथन तो अपना कुछ अर्थ रखता है, यही ‘कुछ' तो है जो उद्देश्‍य के हिस्‍से में आता है।''12 ये आत्‍कथाएं दलितों की जीवन-श्‍ौली, जीवन-प्रक्रिया और जीवन-अनुभवों की यथार्थाभिव्‍यक्‍ति कराती हैं, और दलित साहित्‍य की लोकप्रिय विधा भी हैं। इतना ही नहीं, यह एक मूर्त्त विधा भी हैं, जो क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, द्वन्‍द्वों, कुण्‍ठाओं, प्रतिरोधों, विडम्‍बनाओं, का ऐसा इतिवृत्त प्रस्‍तुत करती हैं, अनुरंजन और काल्‍पनिक सुख के बरक्‍स सार्थक जीवन-दृष्‍टि भी जिसमें उपलब्‍ध होती है। जो व्‍यावहारिक जीवन में काम आती है। अतः परम्‍परागत मानदण्‍डों के अतिरिक्‍त भी बहुत कुछ है जो मापा जाना चाहिए। अब प्रश्‍न यह उठ रहा है, वैचारिकता, सार्थक जीवन दृष्‍टि, अनुभव की सहज निष्‍कर्षबद्धता क्‍या आत्‍मकथा की विधागत स्‍वाभाविकता के भीतर उसकी सहजात प्रवृत्ति के रूप में अन्‍तर्लिप्‍त नहीं है। यदि आप दूसरे की पीड़ा का एहसास नहीं कर सकते तो आप मनुष्‍यता से कोसों दूर हैं। दलित साहित्‍य के लेखक इसी एहसास को जगाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि समाज उनकी पीड़ा को समझे। उनके भोगे हुए दर्द को समझकर श्‍ोष, समाज उनको बराबरी का दर्जा देना और उसका हकदार होना, दोनों को स्‍वीकार कर सके। यह साहित्‍य एक प्रकार से चेतावनी का साहित्‍य भी बनता जा रहा है, इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता जा रहा है। एक प्रकार से कहें तो दलित लेखकों की आत्‍मकथाओं ने दलित और अन्‍य दोनों समाजों पर अपने-अपने तरीके से सोचने का दबाव बनाया है। इस दृष्‍टि से आत्‍मकथा दलित साहित्‍य लेखन की प्रमुख विधा के रूप में उभर कर सामने आ रही है।''13

इधर हाल में कुछ दलित आत्‍मकथाओं ने हिन्‍दी साहित्‍य जगत में बेचैनी पैदा कर दी है। आलोचक इसे एक फैशन मान रहे हैं। दलित आत्‍माभिव्‍यक्‍ति की प्रमाणिकता पर उन्‍हें संदेह है। हिन्‍दी क्षेत्रों में इन आत्‍मकथाओं को बाकायदा उपन्‍यास के रूप में प्रोजेक्‍ट किया जा रहा है। हिन्‍दी में दो प्रमुख दलित आत्‍मकथाएं प्रकाशित हुई हैं-मोहनदास नैमिशराय को ‘अपने-अपने पिंजरे' और ओमप्रकाश बाल्‍मीकि की ‘जूठन'। मराठी से हिन्‍दी में अनूदित दो दलित आत्‍मकथाएं चर्चा के केन्‍द्र बिन्‍दु में रही हैं- दया पवार की ‘अछूत' और शरण कुमार लिंबाले की ‘अक्‍करमाशी'। गिरिराज किशोर इस पर टिप्‍पणी करते हुए कहते हैं ‘‘अम्‍बेडकर ने अनेक युवा दलित लेखकों को रास्‍ता दिखाया, उन्‍होंने उन रचनाकारों से अपने को अलग करते हुए अपने परिवेश से सम्‍बन्‍धित क्रांन्‍तिकारी रचनायें लिखीं। खासतौर से आत्‍मकथाएं, कविताएं और गद्य रचनाएं भी लिखी गईं। पाठकों पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा। आत्‍मकथायें खासतौर से एक ऐसे यथार्थ को सामने लाती हैं जो था तो, लोग उसे देखाना नहीं चाहते थे। वे आँखें खोलने वाली रचनायें हैं। उपन्‍यास और आत्‍मकथाओं में अंतर होता है। आत्‍मकथायें व्‍यक्‍तिपरक होती हैं। मनुष्‍य जितना अपने बारे में जानता है उतना एक गद्य लेखक अपने पात्रों के बारे में प्रथम पुरुष के रूप में नहीं जानता। उसे अपने पात्रों को जानने के लिए अतिरिक्‍त उद्यम करना पड़ता है। लेखक के साथ-साथ पात्रों की भी सीमायें होती हैं। साथ ही तत्‍कालीन समाज भी समकालीन सोच में अंतर डालने का काम करता है। वह लेखक को उतनी आजादी नहीं देता जितनी आत्‍माथाओं में मिल सकती है।''14 परम्‍परावादी आलोचकों को दलितों की व्‍यथा पर संदेह क्‍यों है? उसकी पीड़ागत प्रामाणिकता पर वे विश्‍वास क्‍यों नहीं कर पा रहे हैं? हिन्‍दू समाज के जुल्‍मों का दस्‍तावेज प्रामाणित न बन सके क्‍या इसीलिए आत्‍मकथाओं को उपन्‍यास के रूप में प्रोजेक्‍ट किया जा रहा है? ये सभी सवाल दलित चिंतकों को चिंतित या विचलित नहीं करते, क्‍योंकि दलित साहित्‍य या दलित आत्‍माभिव्‍यक्‍ति किसी की विश्‍वसनीयता की मोहताज नहीं है, न ही गैर दलितों के द्वारा प्रामाणिकता के स्‍टैम्‍प की जरूरत है। फिर भी इन सभी सवालों से टकराने की जरूरत है, आज इसमें शोध और बहस की पर्याप्‍त गुंजाईश है।

आत्‍मकथा लिखने के लिए साहस और ईमानदारी होनी चाहिए; रचनाशीलता का अपना खुद का तेवर होना चाहिए- ये सारी चीजें एक दलित आत्‍मकथा में विद्यमान हैं। समाज की कुरीतियों और खौफनाक चेहरे को उजागर करने के लिए आत्‍मकथा के अलावा और कोई प्रामाणिक माध्‍यम नहीं हो सकता। दलित आत्‍मकथाओं ने समाज के ‘एलिट वर्ग' के चिंंतन को झकझोर दिया है। व्‍यवस्‍था के चरमराने और वर्चस्‍व के टूटने का खतरा पैदा हो गया है। आत्‍मकथाओं ने गैर दलितों के सामाजिक चिंतन पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा दिया है।

गैर दलित चिंतकों को दलित आत्‍मकथा में अभिव्‍यक्‍त अपमान, पीड़ा और जहालत पर विश्‍वास नहीं है। इनकी प्रामाणिकता की वे परीक्षा लेना चाहते हैं। हिन्‍दू व्‍यवस्‍था के घावों को बदन खोलकर दिखाना पड़ेगा क्‍या? जीवन में कभी यातना से वास्‍ता पड़ा होता तो शायद उन्‍हें समझ में आता भी। फुले के शब्‍दों में कहें तो राख ही बता सकती है जलने की पीड़ा क्‍या है? कोई परम्‍परावादी लेखक जो हिन्‍दू समाज की दी हुई अछूत पहचान को अपने से जोड़ सके? अपने को भंगी, चमार और पासी कह सके? डोम, चमार नाम सुनते ही चेहरे की रंगत बदल जाती है। मुंह का सारा जायका ही बिगड़ जाता है। सारी संवेदनशीलता पल-भर में उड़न छू हो जाती है। यह साहस सिर्फ दलित लेखकों में ही है, जिन्‍होंने अपनी अस्‍मिता और अपने होने के एहसास को जताया है। यह सब गैर दलितों के बूते का नहीं है। दलित कथाओं में जहाँ तक विषय और वस्‍तु का प्रश्‍न है तो यह सदियों से चली आ रही दलितों की उपेक्षा और तिरस्‍कार को केन्‍द्रित करके ही लिखी जा रही हैं। दलितों द्वारा शोषण का विरोध, सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष, प्रताड़ना के बावजूद कार्य करने की इच्‍छा शक्‍ति आदि का प्रदर्शन दलित कथाओं में प्रतिपाद्य के रूप में सामने आ रहा है। कुल मिलाकर अगर कहें तो हम यह कह सकते हैं कि दलित आत्‍मकथा तथा साहित्‍य दलितों के सार्वभौमिक शोषण का विरोध करते हुए साहित्‍य में गतिशील हो रहा है।15

यदि साहित्‍य में आत्‍मकथा नामक विधा है तो आत्‍मकथा लिखना गुनाह है क्‍या? और यदि आत्‍मकथा दर्द बयानी का माध्‍यम नहीं है तो दलित साहित्‍य उन सारी परिभाषाओं और मानदण्‍डों को ध्‍वस्‍त कर आत्‍मकथा के मानदण्‍डों और शर्तों को खुद ही विकसित और निर्धारित करेगा। हिन्‍दी साहित्‍य के बने-बनाए ढ़र्रे पर चलने को मोहताज या बाध्‍य नहीं है दलित साहित्‍य।

दलित आत्‍मकथाओं को उपन्‍यास कहना पीड़ा, दर्द और यातना के संत्रास को तथा अभिव्‍यक्‍ति के तेवर को कम करना है, मजाक उड़ाना है। दलित आत्‍मकथाओं पर जो प्रश्‍न उठाए जा रहे हैं वे तिलमिलाहट के प्रतिरूप हैं या एक सकारात्‍मक दिशा देने की कोशिश इस पर गम्‍भीरता से सोचने, विचारने की जरूरत है। जब कोई दलित लेखक अपने को दोगली संतान कहता है, जब अपने परिवार और समाज की सच्‍चाइयों को उकेरता है तो क्‍या उसमें ईमानदारी नहीं है? जीते-जी अपने जीवन की कड़वी सच्‍चाईयों को बयान करना, कोई मजाक की बात नहीं है। और किसी में इतना साहस, ईमानदारी और सच कहने का माद्‌दा भी नहीं।

अभी तक हिन्‍दी में, सिर्फ दो-चार ही दलित आत्‍मकथाएं आई हैं, जिनमें जीवन के दग्‍ध अनुभव एवं शोषण की लम्‍बी दास्‍तान है। शीघ्र ही डॉ0 धर्मवीर और डॉ0 श्‍यौराज सिंह ‘बेचैन' की आत्‍मकथा प्रकाशित होने वाली हैं। ‘हंस' में प्रकाशित अस्‍थियों के अक्षर ‘युद्धरत आम आदमी' में ‘चमार' का और साहित्‍य अकादमी की पत्रिका-समकालीन भारतीय साहित्‍य के जुलाई-अगस्‍त 2000 के अंक में ‘बचपन कंधों पर' शीर्षक से छपे कुछ अंश झकझोरते हैं। इनसे प्रेरित होकर अभी और भी आत्‍मकथाएं आने की आशा दलित साहित्‍य को है।इसमें कोई दो राय नहीं कि दलित आत्‍मकथाएं दलित चेतना के लिए उत्‍प्रेरक का कार्य कर रही हैं, थोपी गई हीनता-ग्रन्‍थि को आत्‍मकथाएं तोड़ रही हैं और आत्‍मसम्‍मान की जिंदगी जीने का मार्ग प्रशस्‍त कर रही हैं। दलित मानसिकता को जकड़न से बहार निकालने का एक प्रयास है आत्‍मकथा। आने वाली पीढ़ी के लिए दलित आत्‍मकथाएं एक विस्‍तृत फलक तैयार करने का काम कर रही हैं। नई दलित पीढ़ी के लिए दलित आत्‍मकथाओं का महत्‍व ज्‍यादा है। आत्‍मकथाओं में एक खास विजन है। इसी विजन के जरिए आने वाली पीढ़ी रचनाशीलता को पर्याप्‍त विस्‍तार देगी।

आने वाली पीढ़ी के लिए दलित आत्‍मकथाएं एक विस्‍तृत फलक तैयार करने का काम कर रही हैं। विजन के जरिए गैर दलितों द्वारा दलित आत्‍मकथाओं के बारें में प्रामाणिकता की मांग करना दुःख ही नहीं, बल्‍कि बेहद शर्मनाक बात है। इससे साफ जाहिर होता है कि वे दलित संवेदनशीलता से कोसों दूर हैं। दलित आत्‍मकथाओं में उन्‍हें सब कुछ झूठा लगता है। समाज के खौफनाक पंजों से कभी वास्‍ता पड़ा होता तो शायद उन्‍हें हकीकत का पता चलता। एक दलित को आत्‍मकथाएं सच्‍ची क्‍यों लगती हैं? क्‍या सिर्फ इसलिए कि वह दलित है या उसने हिन्‍दू व्‍यवस्‍था के अत्‍याचारों को झेला और महसूस किया है? यही कारण है कि दलित चिंतन गैर दलितों की संवेदनशीलता और लेखन पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा रहा है।(16) हालांकि गैर दलित चिंतकों, लेखकों, आलोचकों के बीच से एक ऐसा वर्ग उभर कर आ रहा है, जो दलित चिंतन और आक्रोश को विश्‍लेषित कर रहा है। दलित साहित्‍य को स्‍वीकारते हुए बड़ी संजीदगी से उसकी मीमांसा कर रहा है, जो कि स्‍वागत योग्‍य है। फुले-पेरियार-नारायण गुरू-अम्‍बेडकर ने आत्‍म सम्‍मान और सामाजिक अस्‍मिता की जो भावभूमि तैयार की थी तथा संघर्ष का जो दीप प्रज्‍ज्‍वलित किया था, आज वह और भी तेजी से प्रदीप्‍त हो उठा है। वेदना, आक्रोश और आमूल परिवर्तन की आकांक्षा से दलितों ने अस्‍मिता के संघर्ष को एक आकार देना शुरू कर दिया है। सदियों से जिसे साहित्‍य और समाज के हाशिए पर फेंक दिया गया था तथा जिसे अछूत, अतिशूद्र, अन्‍त्‍यज, चाण्‍डाल, अवर्ण, पंचम तथा हरिजन आदि नामों से विहित करके घृणा, हिकारत और दया का पात्र बना दिया गया था, वही आज प्रखर आत्‍मबोध के साथ इन सारी शब्‍दावलियों और विश्‍ोषणों को ठुकराकर स्‍वयं दलित के रूप में अपनी अस्‍मिता का बोध साहित्‍य, समाज और राजनीति तीनों ही स्‍तरों पर अपनी सार्थक उपस्‍थिति दर्ज करा कर जबर्दस्‍त दस्‍तर दे रहा है और अपने अधिकारों के लिए स्‍वयं संघर्ष कर रहा है।

दलित साहित्‍य और साहित्‍यकारों के सामने आज चुनौतियां हैं। अभी बहुत सारे अवरोधों को उन्‍हें तोड़ना श्‍ोष है। अपनी अस्‍मिता को सशक्‍तता से स्‍थापित करना है तथा आने वाली पीढ़ी को एक दिशा भी देनी है। अतः छोटे-मोटे दुराग्रहों से बचते हुए पूरी सामूहिकता और सहयोगवृत्‍ति के साथ इस आन्‍दोलन को उन्‍हें शिद्दत से गति देनी होगी। इसके साथ ही गै़र दलित साहित्‍यकारों के अन्‍दर दलित साहित्‍य की स्‍वीकृति को लेकर एक अन्‍तर्विरोध है। इस जकड़न और अन्‍तर्विरोध से जितनी जल्‍दी वे मुक्‍त हो जाएं, उतनी ही समरसता आएगी।

दलित लेखकों को दया से घृणा है। उन्‍हें दया और सहानुभूति नहीं अधिकार चाहिए। आत्‍मसम्‍मान और अस्‍मिता की पदचाप मराठी, गुजराती और अन्‍य भाषा-साहित्‍यों के साथ-साथ हिन्‍दी में नकार, वेदना और आक्रोश के रूप में दलित साहित्‍य में अभिव्‍यक्‍त हो रही है। मोहक शब्‍दावलियों, आकर्षक अवधारणाओं -दार्शनिक उपपत्‍तियों की असलियत क्रमशः उघाड़ी जाने लगी है। खुद की बनाई हुई भीति से रहस्‍य की चादर दरकने तथा चटखने लगी हैं। गर्व से महिमामंडित करने वाले साहित्‍य के ठेकेदारों की साहित्‍यिकता और सौन्‍दर्यशास्‍त्र उन्‍हें ही मुंह चिढ़ाने को आतुर हैं।

सन्‍दर्भ ग्रन्‍थ सूची

1..दलित साहित्‍य का सौन्‍दर्यशास्‍त्र, ओम प्रकाश बाल्‍मीकि, पृ0-104.

2. कथाक्रम, जनवरी-मार्च, 2005, पृ0-63.

3.कथाक्रम, जनवरी-मार्च, 2004, पृ0-53.

4.दलित कहानियाँ, रणसुभे, गंगावणे, पृ0-21.

5.कथाक्रम, जनवरी-मार्च, पृ0-48.

6.चिन्‍तन की परम्‍परा और दलित साहित्‍य, आत्‍मकथा की परम्‍परा और दलित आत्‍मकथाएं -रजतरानी मीनू, पृ0-156.

7.कथाक्रम, जनवरी-मार्च, 2004, पृ0-53.

8.चिंतन की परम्‍परा और दलित साहित्‍य- आत्‍मकथा की परम्‍परा और दलित आत्‍मकथाएं -रजतरानी मीनू, पृ0-156-157.

9.हंस, अगस्‍त-2004, पृ0-222- 223.

10.हंस, अगस्‍त-2004, पृ0-228.

11.कथाक्रम, जनवरी-मार्च, 2004, पृ0-50.

12.चिंतन की परम्‍परा और दलित साहित्‍य, आत्‍मकथा की परम्‍परा और दलित आत्‍मकथाएं -रजतरानी मीनू, पृ0-157.

13.कथाक्रम, जनवरी-मार्च, 2004, पृ0-50.

14.कथाक्रम, जनवरी-मार्च, 2004, पृ0-51.

15.दलित विमर्श ः सन्‍दर्भ गाँधी, गिरिराज किशोर, पृ0-40.

16.दलित विमर्श ः चिंतन एवं परम्‍परा, नवम्‍बर-2005, सम्‍पादक-डॉ0 वीरेन्‍द्र सिंह यादव, पृ0-57.

परिचय:

 

clip_image002 श्‍ौक्षणिक गतिविधियों से जुड़े युवा साहित्‍यकार डाँ वीरेन्‍द्रसिंह यादव ने साहित्‍यिक, सांस्‍कृतिक, धार्मिर्क, राजनीतिक, सामाजिक तथा पर्यावरर्णीय समस्‍याओं से सम्‍बन्‍धित गतिविधियों को केन्‍द्र में रखकर अपना सृजन किया है। इसके साथ ही आपने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्‍त किया है। आपके सैकड़ों लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। आपमें प्रज्ञा एवमृ प्रतिभा का अदृभुत सामंजस्‍य है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी एवमृ पर्यावरण में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानो से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

सम्‍पर्क -वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग

डी. वी. कालेज, उरई (जालौन) 285001 उ. प्र.

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