शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

रत्नकुमार सांभरिया की विवेचना : कफ़न का सच

कफ़न मुंशी प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित कहानी मानी जाती है। वर्षों तक यह कहानी विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में भी रही। इस सच को भी नहीं नका...

सरोजिनी साहू की (ओड़िया) कहानी (का हिन्दी रूपांतर) : बलात्कृता

  ओड़िया कहानी   बलात्कृता   मूल ओड़िया कहानी: सरोजिनी साहू   हिंदी अनुवाद: दिनेश कुमार माली   यह कहानीकार की सद्यतम...

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

गिरिराजशरण अग्रवाल का व्यंग्य : अर्थों का दिवंगत होना

बाबू चंडीप्रसाद अपने ज़माने के बड़े ही अद्भुत आदमी थे। और सब तो अपनी माई के लाल होते हैं, वह रज़ाई के लाल थे। 'रज़ाई' शब्द हमने ज...

बुधवार, 29 जुलाई 2009

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : किसी के आदमी बनने का सुख

ज्योंही मैं उनके कमरे में घुसा, उन्होने पूछा-''तुम किसके आदमी हो ?'' मैंने भी तुरत-फुरत जवाब दिया- ''हजूर मैं तो ...

यशवन्त कोठारी का आलेख : व्यंग्य – दशा और दिशा

व्यंग्य - दशा और दिशा हिन्दी साहित्य में लम्बे समय से व्यंग्य लिखा जा रहा है, मगर आज भी व्यंग्य का दर्जा अछूत का ही है इधर कुछ समय से ...

राकेश भ्रमर की कहानी : सूखा

आषाढ़ बीत गया. आसमान में बादल का टुकड़ा तक न दिखा. धरती पर पानी की बूंद भी न गिरी. हवाएं आग बरसा रही थीं. जमीन तवे की तरह तप रही थी. आस...

आर. जयचन्द्रन का आलेख : सृजनात्मक समीक्षा के बदलते परिदृश्य

अक्षर विद्वेषी हमेशा साहित्य जगत में विद्यमान है , आगे भी रहेंगे । वे कवि , कथाकार व नाटककार के रूप में सामने आ सकते हैं , लेकिन अक्षरों पर...

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

वीरेन्‍द्र सिंह यादव का आलेख : दरकती-चटकती परम्‍पराओं का अक्‍स और दलित आत्‍मकथाओं का सच

दलित चिंतकों की दृष्‍टि में अतीत एक स्‍याह पृष्‍ठ है, जहां सिर्फ घृणा है, द्वेष है, उदात्त मानवीय सम्‍बन्‍धों की गरिमा का विखंडन है। हर एक ...

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