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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

रत्नकुमार सांभरिया की विवेचना : कफ़न का सच

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कफ़न मुंशी प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित कहानी मानी जाती है। वर्षों तक यह कहानी विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में भी रही। इस सच को भी नहीं नकारा जा सकता कि 20वीं सदी की सबसे विवादित कहानी का श्रेय भी कफ़न को ही जाता है। चर्चा और विवाद के अन्तर्द्वन्द्व पर दृष्टि डाले और कहानी को ब्राह्मणवादी नजरिये से देखें तो कहानी उत्कृष्ट है, क्योंकि धर्मशास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुए कहानी में शूद्रों का चाण्डाल रूप प्रस्तुत हुआ है। प्रगतिशील दृष्टि से देखें तो कहानी निकृष्ट है, क्योंकि कहानी में अकल्पनीय अमानवीयता का बोध है।यहां कहानी के बारे में भी थोड़ा जान लेना समीचीन होगा। 'कफ़न' प्रेमचंद की अन्तिम कहानी है, जो चांद हिन्दी पत्रिका के अप्रेल, 1936 के अंक में प्रकाशित हुई थी। प्रेमचंद ने पहले इसे उर्दू में लिखा था और उर्दू पत्रिका के 'जामियां' के दिसम्बर, 1935 के अंक में छपी थी। कुछ आलोचकों का ऐसा मत है कि कफ़न हिन्दी की मौलिक कहानी नहीं है, बल्कि उर्दू का तर्जुमा है। कफ़न हिन्दी साहित्य जगत की एक मात्र ऐसी कहानी है, जिसके प्रकाशन की स्वर्ण जयंती 1986 में वर्ष भर मनाई गई। बुद्धिज…

सरोजिनी साहू की (ओड़िया) कहानी (का हिन्दी रूपांतर) : बलात्कृता

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ओड़िया कहानीबलात्कृतामूल ओड़िया कहानी: सरोजिनी साहूहिंदी अनुवाद: दिनेश कुमार मालीयह कहानीकार की सद्यतम प्रकाशित कहानियों में से है, जो न तो किसी दूसरी भाषा में अनुदित हुई है, न किसी कहानी संग्रह में संकलित हुई है.  यह कहानी 'टाईम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप'  की ओड़िया पत्रिका 'आमो समय' के जून , २००९ अंक में प्रकाशित हुई है. कहानी का मूल शीर्षक 'धर्षिता' था , पर 'धर्षिता'  शब्द हिंदी में न होने के कारण मैंने उस कहानी का शीर्षक  'बलात्कृता' रखना उचित समझा. कहानीकार की सद्यतम कहानी का प्रथम हिंदी अनुवाद पेश करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है.बलात्कृताक्या सभी आकस्मिक घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती है? अगर कोई आकस्मिक घटना घटती है तो अचानक अपने आप यूँ ही घट जाती है; जिसका कार्यकरण से कोई सम्बन्ध है? बहुत ही ज्यादा आस्तिक नहीं थी सुसी, न बहुत ज्यादा नास्तिक थी वह. कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि ये सब बातें मन को सांत्वना देने के लिए केवल कुछ मनगढ़ंत दार्शनिक मुहावरें जैसे है.सुबह से बहुत लोगों का ताँता लगने लगा था घर में. एक के बाद एक लोग पहुँच रहे थे या तो कौतुहल-…

गिरिराजशरण अग्रवाल का व्यंग्य : अर्थों का दिवंगत होना

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बाबू चंडीप्रसाद अपने ज़माने के बड़े ही अद्भुत आदमी थे। और सब तो अपनी माई के लाल होते हैं, वह रज़ाई के लाल थे। 'रज़ाई' शब्द हमने जानबूझकर प्रयोग किया है, क्योंकि चंडीप्रसाद स्वयं भी प्रचलित शब्दों और मुहावरों के कट्टर विरोधी थे। फिर चंडीप्रसाद जैसे माई के लाल पर 'रज़ाई का लाल' मुहावरा ही फिट बैठता है, 'गुदड़ी का लाल' नहीं। इस बात को आप जानते ही हैं कि रज़ाई यदि अपने-आपमें मध्यम वर्ग की द्योतक है तो गुदड़ी निम्न वर्ग की। साथ ही यह बात भी आप भली-भाँति जानते हैं कि गुदड़ीवाला निम्नवर्ग राजनीतिक खिलाड़ियों की खेल-प्रतियोगिता में फुटबाल का काम करता है। एक पक्ष के खिलाड़ियों द्वारा किक मारी गई तो इधर, दूसरे खिलाड़ियों के द्वारा ठोकर मारी गई तो उधर। भारी गुत्थम-गुत्था के बाद अगर कोई पक्ष गोल दागने में सफल हो जाए तो सफल पक्ष सत्ताधारी, असफल रह जाने वाली टीम विपक्ष की मारा-मारी। रह गई फुटबाल तो अगली प्रतियोगिता तक उसका कोई काम, कोई महत्व नहीं। वह या तो क्रीड़ा-सामग्री के भंडार में चुपचाप पड़ी रहेगी अथवा समय-समय पर फूँक भरने के काम आएगी। फुटबाल और जनता फूँक भरने के लिए और…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : किसी के आदमी बनने का सुख

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ज्योंही मैं उनके कमरे में घुसा, उन्होने पूछा-''तुम किसके आदमी हो ?'' मैंने भी तुरत-फुरत जवाब दिया- ''हजूर मैं तो आपका ही आदमी हूँ।''
   उन्होंने फिर कहा-''झूठ क्यों बोलते हो ? मेरी तो तुमने ऊपर शिकायत की है और इसी कारण तुम्हें मैनें बुलाया है, सच सच बताओ तुम किसके आदमी हो ?''
   मैंने इस बार सच सच बता दिया- ''मैं मुख्यमंत्री का आदमी हूँ।''
   ''अफसर जी की हवा निकल गई। मुझे कुर्सी पर बैठने को कहा। मंत्री जी आपका ट्रांसफर नहीं चाहते थे, और इसी कारण मैंने आपके आवेदन पर विचार नहीं किया था। ''
   अक्सर दैनिक जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब कोई न कोई आप से पूछ बैठता है-आप किसके आदमी हो ? मोहल्ले में दादा तक पूछता है-आप किसके आदमी हैं, और यदि आप थानेदार के आदमी हो तो दादा आपको कुछ नहीं कहता।
   इसी प्रकार कॉलेज में एक बार मैंने एक बिगडैल छात्र से पूछा- ''तुम किसके आदमी हो ? वो तुरन्त बोल पड़ा-''पापा पूलिस में एसपी हैं।'   
   मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। वह होनहार छात्र आगे जा…

यशवन्त कोठारी का आलेख : व्यंग्य – दशा और दिशा

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व्यंग्य - दशा और दिशाहिन्दी साहित्य में लम्बे समय से व्यंग्य लिखा जा रहा है, मगर आज भी व्यंग्य का दर्जा अछूत का ही है इधर कुछ समय से व्यंग्य के बारे में चला आ रहा मौन टूटा है, और कुछ स्वस्थ किस्म की बहसों की शुरूआत हुई हैं। आज व्यंग्य मनोरंजन से ऊपर उठकर सार्थक और समर्थ हो गया हैं। आज व्यंग्य-लेखक को अपने नाम के साथ किसी अजीबो-गरीब विशेषण की आवश्यकता नहीं रह गई हैं।मगर स्थिति अभी इतनी सुखद नहीं है, आज भी कई बार लगता है, व्यंग्यकार छुरी से पानी काट रहा हैं। आवश्यकता व्यंग्य को समझने की हैं। बदली हुई परिस्थितियों में साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में व्यंग्य को शायद प्राथमिकता मिले, ऐसी स्थिति में व्यंग्य, और व्यंग्यकारों से यह मुलाकात वातावरण पर छाये कुहरे को दूर करने में मदद देगी। प्रश्नों की झोली में निम्न प्रश्न रखे गये।1. व्यंग्य-एक विधा के रूप में कहां तक प्रतिष्ठित हो पाया हैं ?2. हिन्दी आलोचक, व्यंग्यकार और पाठक के बीच का त्रिकोण ?3. व्यंग्य की सार्थकता क्या हैं ?4. व्यंग्य-लेखन अपेक्षाकृत जोखिम का कार्य है, क्या आप सहमत हैं ?5. यदि हैं तो आप के अनुभव कैसे हैं ?6. व्यंग्य की श…

राकेश भ्रमर की कहानी : सूखा

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आषाढ़ बीत गया. आसमान में बादल का टुकड़ा तक न दिखा. धरती पर पानी की बूंद भी न गिरी. हवाएं आग बरसा रही थीं. जमीन तवे की तरह तप रही थी. आसमान तकते-तकते लोगों की आंखें पथरा गयीं. मौसम विभाग की भविष्‍यवाणियां गलत साबित होती रहीं. बिजली विभाग अपनी मनमानी करता रहा. अघोषित बिजली कटौती ने लोगों को बेहाल कर रखा था.प्रदेश सरकार ने स्‍मारकों और मूर्तियों पर खरबों रुपया खर्च कर दिया. जनहित की कोई योजना लागू नहीं हुई. केन्‍द्र सरकार की योजना से सड़कें, नालियां-नाले और तालाब खोदे जा रहे हैं. लोगों के जॉब कार्ड बने हुए हैं. सौ रुपये प्रति मजदूर मिल रहा है, लेकिन गर्मी ने जो हाल कर रखा है, उससे जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई है. समय पर बरसात न हुई तो फसल नष्‍ट हो जाएगी. किसानों की दुर्दशा हो जायेगी.प्रदेश की नदियों पर कई बांध हैं. नहरों का जाल बिछा हुआ है, परन्‍तु सभी रेगिस्‍तान की तरह सूखी हुई हैं. दूर-दूर तक फटी हुई धरती बेवा औरत की तरह सफेद चादर ओढे. नजर आती है.पूरा गांव ही नहीं, आसपास के गांव के तमाम लोग नरेगा की योजनाओं में काम कर रहे हैं. परन्‍तु सभी काम कम, बातें ज्‍यादा करते हैं. घड़ी-घड़ी छाया…

आर. जयचन्द्रन का आलेख : सृजनात्मक समीक्षा के बदलते परिदृश्य

अक्षर विद्वेषी हमेशा साहित्य जगत में विद्यमान है, आगे भी रहेंगे । वे कवि, कथाकार व नाटककार के रूप में सामने आ सकते हैं, लेकिन अक्षरों पर विश्वास रखनेवाले अक्षर प्रेमियों के लिए यही बेहतर है कि वे इस बात को लेकर क्षोभ व निराशा न प्रकट करें । वे अपने स्नेह एवं विश्वास के बल पर आगे बढ़ते रहें । दर असल प्रेम एवं विश्वास ही उनकी रक्षा कर सकते हैं पर इस ओर भी अवश्य ध्यान रखना है कि कहीं नकली सिक्कों की खोज की व्यस्तता में असली निकालने का मौलिक फर्ज भूल न जाय ।सभ्य मानव की दुनिया से पुस्तकों को हटाना असंभव है । आदिकाल में यहाँ सिर्फ प्रकृति एवं मानव ही थे । बाद में भौतिक संस्कार के साधन तथा ज्ञान विज्ञान के संचय ग्रन्थों की संख्या बढ़ती गई इसलिए ही समकालीन दौर में इनकी उत्कृष्टता बढ़ी है , आगे इनकी जनप्रियता और भी बढ़ेगी। पुस्तक सभ्य मानव के समस्त जीवन का अनिवार्य अंग है। जीवन के दूसरे तथ्यों के समान यह गंभीर अध्ययन एवं आलोचना का विषय है ,इसका संबंध सिर्फ साहित्य से नहीं अपितु समस्त जिंदगी से भी है।कहा जाता है कि शल्य चिकित्सक ( सर्जन) जिन्दगी की व्याख्या करता है तो आलोचक साहित्य की व्याख्या…

वीरेन्‍द्र सिंह यादव का आलेख : दरकती-चटकती परम्‍पराओं का अक्‍स और दलित आत्‍मकथाओं का सच

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दलित चिंतकों की दृष्‍टि में अतीत एक स्‍याह पृष्‍ठ है, जहां सिर्फ घृणा है, द्वेष है, उदात्त मानवीय सम्‍बन्‍धों की गरिमा का विखंडन है। हर एक प्रसंग, घटना, दैहिक वासना बनकर रह गई है। दलित साहित्‍य अतीत के इस खोखलेपन से परिचित है। अतीत के आदर्श उसे झूठे और छद्‌म दिखाई पड़ते हैं। जिसे वह उतारकर फेंक देना चाहता है ताकि भारतीयता की सच्‍ची और सजीव पहचान उभरे। दलित साहित्‍य ने इस उदात्त भाव को मुखरता से अभिव्‍यक्‍त किया है। इस परिप्रेक्ष्‍य में ओमप्रकाश बाल्‍मीकि की टिप्‍पणी सटीक है- ‘‘युगों-युगों से प्रताड़ित, शोषित, साहित्‍यिक, संस्‍कृति से वंचित मानव जब स्‍वयं को साहित्‍य के साथ जोड़ता है तो दलित साहित्‍य उसकी निजता को पहचानने की अभिव्‍यक्‍ति बन जाता है। हाशिए पर कर दिए गए इस समूह की पीड़ा जब शब्‍द बनकर सामने आती है तो सामाजिकता की पराकाष्‍टा होती है। सदियों से दबा आक्रोश शब्‍द की आग बनकर फूटता है। तब भाषा और कला की परिस्‍थितियाँ उसे सीमाबद्ध करने में असमर्थ हो जाती हैं क्‍योंकि-पारम्‍परिक साहित्‍य के छद्‌म और नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण के प्रति वह निर्मम है। दलित रचनाकार लुक-छिपकर या घुमा-फिराक…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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