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कौशल पंवार की कविताएँ

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1 घुटनघुटती हूं मैंजब-जब याद आते हैं वो लम्हे !चलती राह परसाइकिल लिये जा रही थीअचानक लगाकोई पीछा कर रहा हैउसने अपनी साइकिलमेरे आगे की ओर कहाफिल्म देखने चलोगीमैंने अनदेखा, अनसुना कियाथोड़ी दूरी पाटने के बादफिर वही हरकतमैंने साइकिल आगे निकालीफूल स्पीड के साथटांगें कांप रही थीहैंडल कस कर पकड़ामानो सडक परमैं अकेली चली जा रहीं होंलेकिन उतनी ही स्पीड के साथपीछा होता रहाकब तक आगे निकलती ?फिर वही हरकतसाइकिल बराबरी पर थीचलती रहीअंदर एक आग लिएआग से जलन पैदा हुईसहन कब तक करती ?सीधा तमाचा मुंह पर !नाउम्मीद थीहड़बड़ाकर, सीधा सडक पर गिरादाई और मेन सडक परगुजर रही तूफानी कार नेतुरन्त ब्रेक लगायेटायर चरमरा गयेएक अनहोनी टल गयीदोनों ओर से आवाजें आईंलेकिन दम घुट गयासड़क पर जमा भीड़ को देखकरबच गया, बच गयामर ही गया होताभगवान का शुक्र हैदूसरा व्हीकल नहीं आ रहा थाबीबी बच्चे बर्बाद होने से बच गएबेचारा बाल-बाल बचा ।मैंने भीड़ को देखकर कहा-बीबी, बच्चों का पेट भरने के लिएपैसे नहीं होतेराह चलती को फिल्म दिखा रहा हैजवाब मिला-'तुम्हारा इससे क्या बिगड़ गयाफिल्म दिखाने के लिए ही पूछा था'तुमने तो इसकी जान ही ल…

रत्नकुमार सांभरिया का आलेख : प्रेमचंद, ‘मंदिर’ और दलित

सन् 1928 से लेकर 1935 के दस वर्ष के अछूतोद्धार आंदोलन का आकलन करें तो पुष्टि होगी कि यह आंदोलन दलितों के मंदिर प्रवेश तक केन्द्रित रहा। हिन्दू महासभा धर्म के नाम पर, गांधी जी राजनीति के प्लेटफार्म पर तथा मुंशी प्रेमचंद अपनी कहानियों, उपन्यासों और विचारों के माध्यम से अछूतों के लिए मंदिर प्रवेश की मुहिम छेड़े थे। इनका एक मात्र ध्येय यह था कि दलित अपनी दरिद्रता के बावजूद हिन्दू बने रहें। हिन्दू संस्कारों से सराबोर प्रेमचंद मंदिर मूर्ति को हिन्दुत्व का सच और सत मानते हैं।प्रेमचन्द की 'मंत्र' 'सौभाग्य के कोड़े', 'मंदिर' जैसी कहानियाँ आईना हैं।रंगभूमि उपन्यास तथा उनके मूल विचार भी इसी सूझ के संवाहक है। रंगभूमि में वे सूरदास नामक पात्र से अपनी मंशा प्रकट कराते हैं - ''यही अभिलाषा थी कि यहां एक कुआं और छोटा सा मंदिर बनवा देता, मरने के पीछे अपनी कुछ निशानी रहती।'' (रंगभूमि-भाग-7) उन दिनों शिक्षा का प्रसार-प्रचार बहुत तेजी से हो रहा था, प्रेमचंद की प्रगतिशीलता यह थी कि वे मंदिर की बजाय शालाएं बनवाते। कहना होगा की मंदिर बनवा कर भी सूरदास का उस पर हक नहीं रह…

राकेश भ्रमर की कविता : वीर हो तुम!

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तुम हवाओं से लड़े होवीर हो तुम!थक गए होगेजरा विश्राम कर लोवृक्ष की छायातुम्‍हें शीतल लगेगीइस नदी का जलतुम्‍हें मीठा लगेगाक्रोध को तुम शांत कर लोफिर जरा सोचो-विचारो,क्‍यों लड़े हो वायु से तुम ?पेड़ तुमने काट डालेनीर में क्‍यों विष उड़ेला ?कोई इनमें जन्‍मदाताकोई है जीवन-प्रदाताक्‍यों तुम्‍हारे शत्रु हैं फिर ?वायुमंडल में धुआं हैवृक्ष के बस ठूंठ बाकीऔर नदियों मेंप्रवाहित हो रहा हैमल हमारा और विष्‍ठाक्‍यों ․․․․․जरा सोचो –विचारों,वीर हो तुम!इसलिए ही लड़ रहे होउन सभी सेजो तुम्‍हारी सांस में हैंऔर तन मन में बसे हैंहां, यही सच है तुम्‍हारा,हम उन्‍हीं से जीत पातेजो सगे होते हमारेये विरासत की लड़ाईचल रही उनसे यहांजो हैं हमारे बंधु-भाई․धर्मयुद्ध में लिप्‍त हो तुमजीत भी होगी तुम्‍हारीयुद्ध का जब अंत होगा,गर्व से होगे खड़े तुमपर तुम्‍हारे पास क्‍याहोगी मधुर-शीतल पवन,और जब तुम मृत्‍यु-शैया पर पड़े होगेकहां से लायेंगे वशंज तुम्‍हारे शुद्ध गंगाजलबताओ․․․․․या जरा सोचो-विचारो․---(राकेश भ्रमर)सी․बी․आई․कैराव्‍स कामर्शियल काम्‍प्‍लेक्‍स,ए विंग, दूसरा माला, 15, सिविल लाइन्‍स,जबलपुर- 482001․

अशोक गौतम का व्यंग्य – मेरा बॉस, मेरा बाप

ईमानदारों का साथ भगवान देता है । सच्‍चों का साथ भगवान देता है , इसी बूते पर पिछले महीने साहब से पंगा ले लिया । तय माना था कि भगवान निर्बल का साथ देंगे । पर अफसोस , भगवान ने अबके भी बास का ही साथ दिया और मुझे मरवा दिया। मेरी रातों की नींद ,दिन की चैन जो थोड़ा बहुत बचा था वह भी गायब । फिर परम मित्र की शरण में जा बेईमानी ,मक्‍कारी को साक्षी मानकर कसम खाई कि मर जाए जो ईमानदारी ,सच के मामले में खुद के साथ भगवान के खड़ा होने पर विश्‍वास करे ।अब जब-जब देह धारण करुंगा बास तो क्‍या , बास के कुत्‍ते से भी पंगा नहीं लूंगा । वह पत्‍नी को झांसा दे पीए के साथ मटरगश्‍ती करता है तो करता रहे । मैं कौन होता हूं किसी पर बदचलनी का आरोप लगाने वाला ? जब बास की मेहरबानी होगी तो अपुन भी..... बड़ी मुश्‍किल से बास के कारकूनों को पटा साहब के निकट पहुंचा । जान में जान आई ! सुबह का भूला महीने बाद बाद घर लौटा ! घर में खुशियों के दीप जले । घी बाती सब बास की दया से जनता के ।अपनी तो बस माचिस ! जिधर चाहा ,लगा दी ।असीम पीड़ा भोगने के बाद मैं तो इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचा हूं कि बास को बाप कहिए ,आठों याम मलाई चाटते रहिए । …

रचना दीक्षित के कुछ मुक्तक

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एक बेबस सी औरत जो खड़ी है ऐसे मंज़र पर एक हाथ में कलम दूसरे में दस्तरखान है एक तरफ लज़ीज़ पकवान हैं दूसरी तरफ दुःख की दास्तान है----लोग बन्दों को खुदा बनाते हैंमैंने खुदा को बन्दा बनाने कीहिमाकत की हैवो जो बोलता नहींसमय से पहले अपनी गठरी खोलता नहींलोग कहते हैंवही खुदा हैपर हर बन्दा जो हमको मिलाखुदा हो गयाखुदा की तरह न बोला न मुस्करायाबस फना हो गया_________________आज हवा में कुछ हरारत सी हैकोई हया से पिघल गया होगाआज हवा में शरारत सी हैकोई शरीर दिल मचल गया होगाआज हवा में कुछ नमी सी हैकोई आंख भिगो गया होगाआज हवा में कुछ कमी सी हैकोई रुखसत हो गया होगा_____________________________लोगों ने चिरागों को जलायारोशनी के लिए.हमने तो चरागों से अपने हीहाथों को जलाया है.हमने जब-जब रोशनी को सजाना चाहाअंधेरों को और बढ़ाया हैलोग तो मोहब्बत की खातिर दिलों को जलाते हैंहमने तो मोहब्बत में ही जख्म पाया हैलोग तो दिलों को सजाते है दिलदार के लिएहमने तो दिलदार से ही धोखा खाया है_________________________________वो जो जा रहा है शबे गम गुजार करकेकोई रहगुजर नहीं है मेरा हमसफ़र नहीं हैमेरी जिन्दगी को इसने जख्मों जहर दिए…

राकेश भ्रमर की कहानी : उस गांव का चांद

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उसका नाम ड्रीमलेट था. पहाड़ी गांव की एक निश्‍छल, चंचल लड़की... पहाड़ी झरनों सी जंगल में भटकती थी. अपने गांव के अलावा उसे बाकी दुनिया के बारे में पता नहीं था. उसे बस चीड़ के पेड़ों, जंगल में उगी ऊंची-ऊंची घास ... सरसराती हुई ठण्‍डी हवा और पहाड़ी फूलों के बारे में पता था... और अगर पता था तो अपनी बकरियों, मुर्गियों और बत्त्‍ाकों का... हां उसने सुना था कि दक्षिण में जहां और भी ऊंचे पहाड़ हैं, एक शहर शिलांग है, जहां उसका बाप कभी-कभी खरीददारी के लिए जाता था.
हरी-भरी वादियों में खेलते-कूदते और बकरियां चराते वह जवान हो गई. खासी परम्‍परा के अनुसार उसके मां-बाप ने उसे पूरी छूट दे रखी थी कि वह अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ले. फिर भी लेसमन लिण्‍डो का लड़का एल्‍विस लिण्‍डो खास पसंद था. वह मेहनती था, शराब का सेवन केवल विशेष अवसरों पर ही करता था. ज्‍यादा बातचीत करने का आदी नहीं था. ड्रीमलेट के मां-बाप का आदर भी करता था. अतः वे जब-तब एल्‍विस को अपने घर बुलाते रहते थे, ताकि ड्रीमलेट का झुकाव उसकी तरफ बढ़ सके. वरना क्‍या पता, जंगल में भटकते-भटकते वह किसी और लड़के के सपने न देखना शुरू कर दे. लड़किय…

शोभना चौरे की कहानी : आनन्द

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आज आठ साल बाद, सरिता की सास उसके पास आई थी। सरिता यश की नई नई शादी हुई थी जब वे लोग ऊपर के फ्लैट में रहने आए थे। दोनों का लव मैरिज़ था साथ ही अन्तर जातीय विवाह भी। सरिता के मम्मी पापा की तो सहर्ष स्वीकृति मिल गई थी ,उनके प्यार को शादी के रूप में परिवर्तित होने की क्यूंकि सरिता के परिवार में उसकी दोनों बड़ी बहनों ने भी अन्तर जातीय विवाह किया था। बिना दहेज़ दिये ही भार्गव जी ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह सादगी से कर दिया था ओर अब दोनों के परिवार वालो को भी कोई आपत्ति नहीं थी। उन दोनों के ससुराल वाले ,काफी सुलझे विचारों के थे। बेटों की पसंद को ही अपनी पसंद बना कर ,उन्होंने संतोष कर लिया थाकिंतु सरिता का मामला टेढ़ा था। यश की मम्मी के बहुत सपने थे यश की शादी को लेकर किंतु वो जानती थी ,यश ओर उसके पापा के आगे उसका विरोध ज़्यादा दिन तक नहीं रह पायेगा। फिर उन्होंने अनमने मन से स्वीकृति दे दी थी लेकिन उनका विरोध सरिता के साथ बर्ताव में हमेशा ही झलकता था। दो चार दिन निकले ,तभी मैंने सोचा चलो आज यश की मम्मी से मिल कर आती हूँ इतने सालों बाद हैं , क्या वे पहचानती हैं या भूल गई। वैसे सरिता हर साल दी…

लक्ष्मण व्यास का आलेख : नए दौर में अतीत का संघर्ष

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सामंती मूल्‍य दृष्‍टि और पुरुष प्रधान पितृसत्तात्‍मक समाज के पुरजोर प्रयासों के बावजूद मीरा लोक स्‍मृति में बची रही इसका क्‍या कारण है ? हाल में आई पुस्‍तक 'मीरा ः एक पुनर्मूल्‍यांकन' इन सवालों के गिर्द मीरा के साहित्‍य और व्‍यक्‍तित्‍व का नया विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करती है। पल्‍लव के संपादन में इस पुस्‍तक के अधिकांश लेख समकालीन विमर्शों की रोशनी में तत्‍कालीन राजनैतिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक व आर्थिक परिस्‍थितियों में एक स्‍वतंत्र चेता नारी के संघर्ष के विभिन्‍न पहलूओं से देखने का प्रयास करते हैं। यह पुस्‍तक भक्‍तों के जैकारा (जयकारा) साहित्‍य से बिल्‍कुल अलग सामंती ढांचे की निरंकुशता, सामाजिक जकड़बन्‍दियों पितृसत्तात्‍मक समाज की कैद में छुटकारा पाने और अपना मुकाम हासिल करने की मीरा की संघर्ष गाथा को समझने और परखने का उपक्रम करती है।मीरा पर उपलब्‍ध ढेर सारी सामग्री के बीच एक और पुस्‍तक की क्‍या जरूरत है ? इस संबंध में संपादक पल्‍लव का कहना है- ' बावजूद छोटी बड़ी पुस्‍तकों के मीरा की कविता का सही महत्त्व अभी पहचाना नहीं जा सकता है। प्रयत्‍न रहा है कि मीरा के व्‍यक्‍तित्‍व और उन…

गजेन्द्र कुमार मीणा का आलेख : राजकमल चौधरी की कविताओं में राजनीतिक चेतना

13 दिसम्‍बर 1929 को रामपुर हवेली, जिला सहरसा (बिहार) में राजकमल चौधरी का जन्‍म हुआ। उनका वास्‍तविक नाम मणीन्‍द्र चौधरी था, राजकमल उनके साहित्‍य जगत का नाम है। राजकमल चौधरी ने कविता, उपन्‍यास और कहानी विधा में रुचि दिखाई। उनके द्वारा लिखित कथा-साहित्‍य में ‘नदी बहती थी', ‘देहगाथा' एवं ‘मछली मरी हुई' काफी चर्चित उपन्‍यास हैंं। ‘शहर था या नहीं था', ‘अग्‍निस्‍नान', ‘एक अनार एक बीमार', ‘बीस रानियों का बाईस्‍कोप' और ‘अरण्‍यक' उनके अन्‍य उपन्‍यास हैंं। राजकमल ने लगभग एक सौ कहानियां भी लिखी, लेकिन उनकी प्रिय विधा कविता ही थी। राजकमल के ‘स्‍वरगंधा', ‘कंकावती', ‘मुक्‍तिप्रसंग', ‘इस अकाल वेला में' और ‘विचित्रा' नामक काव्‍य संकलन है। इसके पश्‍चात 2006 में देवशंकर नवीन के संपादन में ‘अॉडिट रिपोर्ट' नामक कविता संकलन प्रकाशित हुआ। इस संकलन में राजकमल की अधिकांश कविताएँ संकलित हैं। पर अभी भी यह कहने का साहस नहीं किया जा सकता कि राजकमल की सारी कविताएँ आ गई। फिर भी पूर्व प्रकाशित सभी कविता संग्रह की महत्त्वपूर्ण कविताओं को इस संग्रह में देखा जा सक…

संजय भारद्वाज का आलेख : दोपाया लोक – चौपाया तंत्र

(संजय भारद्वाज का यर आलेख पंद्रह अगस्त को स्वाधीनता दिवस विशेष रूप में प्रकाशनार्थ प्रेषित किया गया था, मगर स्पैम हो जाने के कारण यह इनबॉक्स में नहीं आ पाया. यह आलेख न सिर्फ भारत की तथाकथित नकली आजादी के सच को नंगा करता है, बल्कि एक बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा करता है कि आम जनता क्या वास्तव में आजाद हुई है? – अत्यंत पठनीय व अनुशंसित आलेख)15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे शासकों ने गणतांत्रिक लोकतंत्र की व्यवस्था स्वीकार की। इसका अर्थ था कि ऐसी व्यवस्था जिसमें शासन बहुमत के आधार पर हो और देश के सर्वोच्च पद का चुनाव भी हर वयस्क नागरिक लड़ने का अधिकारी हो। लोकतंत्र के तीन मुख्य प्रकारों में से प्रतिनिधि लोकतंत्र चुनते समय ब्रिटिश शासन व्यवस्था का रोल मॉडेल हमारे सामने था। उसका प्रभाव सर्वाधिक होता, ये स्वाभाविक था। पर साथ में गणतंत्र चुनकर हमने समानता के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। ब्रिटेन में लोकतंत्र तो था पर गणतंत्र वहाँ आज तक नहीं स्वीकृत हो पाया है। ब्रिटिश रानी आज भी सरकार की औपचारिक प्रमुख है। लेकिन संविधान तैयार करते समय, व्यवस्था की विभिन्न धाराएं तैयार करते …

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रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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