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September, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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रचना दीक्षित की असह्य वेदना की कविताएँ

मौत से बातें
आज फिर मेरी मौत हो गयी                            अपनों से बिछुड़ने का ग़म क्या कम था    जो सारी दुनिया खफा हो गयी   आज फिर मेरी मौत हो गयी कब से पड़ा था मेरा जनाज़ा कोई कांधा देने  को   न था  एक बची थी में अकेली आज फिर मेरी मौत हो गयी अपना जनाज़ा अपने कांधों पर ले के जो निकली  एक अजनबी की बददुआ लग गयी   आज फिर मेरी मौत हो गयी  यूँ तिल तिल जीना,यूँ तिल तिल मरना  आज मौत इतनी बेखौफ हो गयी  आज फिर मेरी मौत हो गयी यूँ चिंदा चिंदा जिंदगी यूँ लम्हा लम्हा मौत  आज मौत जिंदगी से बड़ी हो गयी  आज मेरी आखिरी मौत हो गयी _______________________________________________________________  ग़म एक ग़म जो तुमसे मिला उसके मिलने का अब क्या गिला  एक रहबर जो मुझे मिला  उसके बिन अब क्या काफिला  अब तो यूँ ही चलेगा गम का सिलसिला  सुकून मिला,मिला,न मिला न मिला  उसके न  मिलने का भी अब क्या गिला  अब तो है यह सिर्फ ग़मों का काफिला  इसमें  फिर एक ग़मगीन फूल खिला   एक ग़म जो तुमसे मिला  उसके मिलने का अब क्या गिला   ________________________________________ पर तुम न आये  होंठों ने कितने ही गीत  गाये  आँखों ने सपने सजाये कितने ही मौसम …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विभा रानी का व्यंग्य - आ'एम हैप्पी !

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(प्रविष्टि क्रमांक - 10)'आ'एम हैप्पी' किसी भी भाषण की बड़ी अच्छी शुरूआत है। हर समारोह में अतिथि वक्ता यह जरूर कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' । आय एम हैप्पी कि मुझे आप लोगों ने यहाँ बुलाया। आए एम हैप्पी कि मुझे आप सबसे मिलने का मौका मिला। आएम हैप्पी कि मुझे आप सबसे बातें करने का, आप सबको जानने समझने का मौका मिला।
आयोजक भी हैप्पी कि वे इतने हैप्पी थे। हैप्पी होकर बोले। हैप्पी होकर खाया, हैप्पी होकर पिया. हैप्पी हो कर आयोजक की गाड़ी से विदा हुए. समारोह खतम होने के बाद किसी ने आयोजक से पूछा कि भई, वे हैप्पी थे, यह तो दिखा ही नहीं। आयोजक बोले – “ हैप्पी दिखने के लिए नहीं, बोलने के लिए बोला जाता है। “
हैप्पी होने के कई कारण हैं। भारत समारोहों वाला देश है। भारतीय तिथि में हर दिन दो-चार अवसर के, पावन-त्यौहार के होते हैं. कैलेंडर देखें तो हर दिवस एक न एक दिवस। इन दिवसों का सरकारी दफ्तरों में बड़ा महत्व है। सभी दिवसों पर समारोह होते हैं, महत्वपूर्ण व्यक्ति बुलाए जाते हैं। वे आते हैं और कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी'। सुरक्षा दिवस, संरक्षा दिवस, उत्पादकता दिवस, हिंदी दिवस, …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : उमेश कुमार गुप्त का व्यंग्य – इंडियन टाइम

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(प्रविष्टि क्रमांक - 9)इंडियन टाइम हमारे देश में बहुत प्रसिद्ध हैं और इसका ईजाद भी हमारे ‘ सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां‘ के वासियों ने की है, इसलिए इसे इंडियन टाइम की संज्ञा दी गई है। हम दो बजे दिन की मीटिंग रखते हैं और वह शाम को पांच बजे शुरू होती है। चुनावी सभा में नेताजी का भाषण सुबह 11 बजे रखा जाता है और शाम को 5 बजे शुरू होता हैं। दुकान का उद्‌घाटन 2 बजे रखा जाता है, छः बजे शाम को फीता कटता है। साहित्‍य सम्‍मेलन भी आठ बजे रात को रखे जाते हैं, दस बजे शुरू होते हैं। कवि सम्‍मेलन नौ बजे रात को रखे जाते हैं, ग्‍यारह बजे शुरू होकर एक बजे रात को खत्‍म होते हैं। इस प्रकार ये जो समय का अंतराल है, यही अंतराल ‘इंडियन टाइम‘ कहलाता है।हम सभी भारतवासी ‘इंडियन टाइम‘ के कायल है। सम्‍मेलन तब तक शुरू नहीं हो सकता हैं, जब तक अध्‍यक्ष नहीं आ जाते हैं और अध्‍यक्ष तब तक नहीं आ सकते हैं, जब तक टी.वी., कैमरामैन, आकाशवाणी वाले, फोटोग्राफर , पे्रस वाले एकत्र न हो जाये। सभी के एकत्र होने में टाइम लगता है। वह दिन सभी का रहता है। सभी अपने नखरे दिखाते हैं। सभी नाचने वालों की तरह आयोजक को नचाते हैं। पिछल…

यशवन्त कोठारी का आलेख : भारतीय विद्याओं का पराभव क्यों?

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पिछले 50-55 वर्षों में भारतीय विद्याओं के स्‍तर में निरन्‍तर ह्रास हुआ है। लम्‍बे गुलामी के दौर के बाद देश आजाद हुआ तो यह आशा बनी थी अब सरकारें भारतीय विद्याओं के उद्‌भव और विकास के प्रति प्रतिबद्ध होकर काम करेंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। भारतीय विद्याओं में विशेषकर आयुर्वेद, ज्‍योतिष, वेद, कर्मकाण्‍ड, वास्‍तु, योग, आध्‍यात्‍मिक आदि विषयों का समावेश होता है। इन सभी विषयों के संवर्धन, संशोधन, परिवर्धन तथा संरक्षण का काम समाज ने एक वर्ग विशेष को दिया और यह तय किया इस वर्ग का मुख्‍य कार्य पठन-पाठन, अध्‍ययन, अध्‍यापन तथा भारतीय विद्याओं के संरक्षण का होगा तथा इस वर्ग की वृत्ति की व्‍यवस्‍था समाज, राज्‍य तथा श्रेष्‍ठी वर्ग करेगा, लेकिन समाज का यह वर्ग भारतीय विद्याओं के उन्‍नयन में गतिशील नहीं हो सका। धीरे-धीरे समाज में इस वर्ग के लोग अन्‍यान्‍य कार्यों में व्‍यस्‍त होते चले गये। परिणाम स्‍वरूप भारतीय विद्याएं निरन्‍तर और नियमित रूप से पतन की और चली गई। समय समय पर कुछ लोगों ने भारतीय विद्याओं के उन्‍नयन हेतु व्‍यक्तिगत प्रयास किये, मगर ये प्रयास नक्‍कारखाने में तूती की आवाज की तरह ही रहे।राज्‍या…

श्याम गुप्त की कविता : मोड़ने समय की धारा

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मोड़ने समय की धारा ह्रदय के खोल अवगुन्ठन,
अहं के छोड़ गठ्बंधन;
तोड़ कर मौन ली कारा,
मोड़ने समय की धारा। चलें फ़िर नवल राहों पर,
बसायें प्रीति के बंधन॥ आज हर ओर छाई है,
धुन्ध कुंठा-हताशा की।
हर तरफ़ छा गया है इक,
निराशा का कुहासा भी । तमस आतंक का फ़ैला,
छा गये अनाचारी घन ।
आस्थायें हुईं धूमिल,
नहीं सुरभित रहा सावन । अगर अब भी न जागे तो,
बने विष-बिंदु, चन्दन वन॥ मीत तुम आज फ़िर कोई,
सुहाना गीत इक गाओ ।
आस्थाओं के आशा के,
नीति-संगीत स्वर गाओ। राष्ट्र गौरव के वे सुमधुर,
सुहाने,सुखद सुरभित स्वर।
जगे सोई धरा-संस्कृति,
जगें सोये हुए तन-मन। अनय के नाग को नथने,
हो फ़ण-फ़ण पर पुनः नर्तन॥ ज्योति आशा किरण लहरे,
मिटे आतंक-अंधियारा ।
भक्ति विश्वास श्रद्धा युत,
राष्ट्र का गीत वो प्यारा । सभी अब गायें जन गण मन,
बने प्रिय राष्ट्र नंदन वन ॥            ---डा श्याम गुप्त ,
                सुश्यानिधि, के- ३४८, आशियाना ,लखनऊ-२२६०१२
                  मो-०९४१५१५६४६४.

अशोक गौतम का व्यंग्य : महाराज जी के अमृत वचन

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अपने गुरूघंटाल पूरनचंद जी महाराज श्री श्री लकड़ काठ श्री परम संसारी हैं। समय-समय पर उनके तीनों बंदर उनके कुसंग में रह उपदेश ग्रहण किया करते थे। एक दिन उनके सबसे चालाक बंदर ने महाराज के दिमाग की परीक्षा लेते हुए कि महाराज का दिमाग अपडेट है भी कि नहीं, उनसे प्रश्‍न किया,‘हे गुरूघंटाल! मेरा किसीसे लड़ाई करने को मन बड़ा मचल रहा है। बड़े दिन हो गए किसी से बिना लड़ाई किए। ऐसे में लड़ाई में जीत का सबसे सशक्‍त हथियार क्‍या है?' अपने शिष्‍य की लंपटी पिपासा को शांत करते हुए तब गुरूघंटाल ने कहा,‘हे मेरे प्रिय शिष्‍य! लड़ाई में जीतने का सबसे आसान तरीका यह है कि लड़ाई में मर्द पीछे दुबका रहे और अपनी घरवाली की इज्‍जत की परवाह किए बिना उसे थाने में खड़ा करता रहे। इसका प्रमाण देते हुए मैं तुम्‍हें एक रोचक कथा सुनाता हूं ,‘ जंबू द्‌वीप में एक पंडितों का गांव था। उस गांव में पूरनानंद का परिवार रहता था। महादंगई! वह गांववालों से लड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढता रहता। पूरनानंद का अपनी पत्‍नी पर कतई भी कंट्रोल न था। जब भी गांव में उसका किसी से लड़ाई करने का मन होता, बन्‍ना बढ़ाने को मन होता तो वह वह अपन…

विजय वाते का जीवंत साक्षात्कार – रचना की एक संपूर्ण व सशक्त विधा है ‘ग़ज़ल’

और, इसी वजह से ही लोग-बाग अपने कथ्य में वज़न रखने के लिए गाहे बगाहे शेरो-शायरी का बख़ूबी प्रयोग करते हैं. यह मानना है मशहूर ग़ज़लकार विजय वाते का. नीचे दिए गए दो भागों में वीडियो में उनका जीवंत साक्षात्कार देखें -विजय वाते का साक्षात्कार भाग 1 – ग़ज़ल क्यों और किसलिए?विजय वाते का साक्षात्कार भाग 2 – हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य क्या?बशीर बद्र के मुताबिक ग़ज़लों का अगला ग़ालिब हिन्दी से ही आएग… देखें कि क्यों -और, अब आइए आनंद लें विजय वाते की ग़ज़लों से चंद चुनिंदा शेर उनकी स्वयं की जुबानी -विजय वाते की ग़ज़लें  - ग़ज़ल पाठ का जीवंत वीडियो-

रामरक्षा मिश्र विमल की कुछ कविताएँ व ग़ज़लें

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1 स्वादहीन जिंदगी लगता नहीं
कि इस साल भी पूरा हो पाएगा
पत्‍नी से किया जा रहा
पिछले दस सालों से
एक नया शाल खरीदने का वादा जब घर में
माँ की आँखों से गिरते हुए पानी और
उसकी आँख दिखाने की बात स्मृत होती है
तो अपना चश्मा बेमानी लगता है
घर परिवार के संबल का तर्क
मन को संतोष नहीं देता
यह आश्वासन निरर्थक होता है
कि अबकी जाड़ा में शहर ले चलूँगा और
जरूरत पड़ने पर आपरेशन भी करा दूँगा
क्‍योंकि मैं जानता हूँ
इसके न होने के पीछे कुछ ठोस कारण हैं और
उन्हें नकारना मेरे वश में नहीं
अपने मित्र के साथ एक दूकान में बैठकर
कलाकंद का एक पीस मुह में डालते ही
धूप में जला हुआ भाइर् का चेहरा
सामने आ जाता है और
तब वह कागज के टुकड़े की तरह
स्थिर हो जाता है और
बेमन से चबा जाता हूँ उसे अर्थ है मगर अर्थहीन हूँ
रस बाँटता हूँ मगर रसहीन हूँ
शायद स्वाद का अनुभव
इतना अधिक हो चुका है कि
अब जिंदगी स्वादहीन हो गइर् है। 2
दीप   शत शत जल  उठे  क्‍या
     बम धमाकों में प्रमुदिता खो रही है
         खो  रही  क्‍या   सो  रही  है
तिमिरना…

वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : राष्‍ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में स्‍वैच्‍छिक संस्‍थाओं का योगदान

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सरलता, बोधगम्‍यता एवं व्‍याकरण सम्‍बन्‍धी विशेषताओं के कारण हिन्‍दी भारत की आत्‍मा है, क्‍योंकि इसके माध्‍यम से भारतीय संस्‍कृति, आध्‍यात्‍मिकता, नैतिक चिन्‍तन, सार्वभौमिक दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का अन्‍वेषी मन्‍थन किया जाता रहा है। हजारों वर्षों की इस भाषा परम्‍परा ने भारत के विभिन्‍न, प्रान्‍तों, धर्मों, सम्‍प्रदायों एवं भाषाई प्रयोगों की बहुरूपता को एकताबद्ध किया है। स्‍वतन्‍त्रता प्राप्‍ति के पश्‍चात्‌ एवं इसके पूर्व हिन्‍दी भारत की राष्‍ट्रीय अस्‍मिता की प्रतीक बन गई क्‍योंकि विदेशी भाषा अंग्रेजी को बलपूर्वक और छलपूर्वक यहां प्रतिष्‍ठित करके, देशवासियों को जिस प्रकार दासता के जाल में जकड़ने का प्रयास किया गया उससे जागरूक लोकचेता मनीषियों का चौकन्‍ना होना स्‍वाभाविक था।हिन्‍दी भाषा और हिन्‍दी साहित्‍य के सन्‍दर्भ में आधुनिक युग का आरम्‍भ सन्‌ 1850 ई. के आसपास से माना जाता है। यद्यपि इससे पहले (एक सौ वर्ष) ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी के रूप में अंग्रेजों (विदेशियों) ने अपनी भाषाई कूटनीति का जाल फैलाना आरम्‍भ कर दिया था तथापि अनेक वर्षों तक उनका यह षडयंत्र भारतीय जनता समझ नहीं पाई। ईसाई मिशनर…

महात्मा गांधी का आलेख : जन-समाज को शिक्षित करने वाला साहित्य

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आइए, अब हम इस विषय पर विचार करें कि जन-समाज को शिक्षित करने के लिए कैसा साहित्य लिखा जाना चाहिए। कवि श्री ने आज हमारे सम्मुख इस विषय में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उन्होंने कलकत्ते का उदाहरण देकर चतुराई से काम लिया। उन्होंने देखा कि जैसा कलकत्ता है, अहमदाबाद भी वैसा ही है। उन्होंने यदि शब्द प्रहार किया है, तो वह हमारे हित में ही है। एडनी स्मिथ व्यंग्योक्ति की कला में बहुत निपुण था। वह हमारे शब्द का प्रयोग करके प्रहार की तीव्रता को कम कर देता था। कवि श्री ने 'हम' शब्द का प्रयोग अपने नगर के लोगों के लिए किया है, फिर भी हमें तो यही समझना चाहिए कि वह हमारे लिए किया गया है। कलकत्ते का चित्रण करते हुए कवि श्री कहते है कि गंगा तट के किनारे-किनारे बड़ी-बड़ी इमारतें बना दी गई हैं और इससे आंखों को अच्छा लग सकने वाला प्राकृतिक दृश्य आंखों को खटकने वाली चीज बन गई है। होना तो यह चाहिए कि ऐसे स्थान पर हमारा मन प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत हो जाए, किंतु होता यह है कि जब वह कलकत्ते का विचार करते हैं, तो उनकी आंखों से आँसू बहने लगते हैं।
मेरे जैसे मजदूर के विचार में तो हमारा काम प्रभु को पह…

अशोक गौतम का व्यंग्य : मोहे अंग्रेजी दीजौ!

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आप हों या न हों, होने के बाद भी खुल कर कह सकते हों या न ,पर मैं सरेआम कहता हूं कि मैं साहब भक्‍त हूं। इस लोक में तो इस लोक में, तीनों लोकों में कोई एक भी ऐसे बंदे का नाम बता दें जो आज तक साहब भक्‍ति के बिना भव सागर तो भव सागर एक छोटा सा सूखा नाला भी पार कर पाया हो तो उसके जूते पानी पीऊं। क्‍या है न साहब कि तीनों लोकों में ईश्वर भक्‍ति के बिना मुक्‍ति संभव है पर साहब भक्‍ति के बिना जो मुक्‍ति के द्वार खुद की मेहनत से खोलने के मुगलाते में हैं उनसे बड़ा गधा शायद ही कहीं देखने को मिले।साहब भक्‍ति में लीन साहब के आदेशों का पालन करते हुए कल सुबह साहब के कुत्‍ते के साथ सुबह की सैर पर निकला था कि सामने से भगवान आते दिखे पर मैंने कोई रीसपांस नहीं दिया। क्‍या करना उन्‍हें प्रणाम कह कर जब मेरे पास उनसे अधिक शक्तिशाली बंदा है। मैंने भगवान को प्रणाम नहीं किया तो बेचारों ने खुद ही मुझे प्रणाम करते कहा,‘ प्रणाम साहब के पट्‌ठे।' फिर एक हाथ अपनी कमर पर धरा।‘हूं , कहो क्‍या हाल है? ठीक ठाक से तो हो न?' हालांकि साहब का टामी मुझे वहां रूकने देना नहीं चाहता था, शायद उसे अपनी प्रेमिका से मिलने की ज…

राजनारायण बोहरे की कहानी : विश्वास

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बाबू हरकचंद का ज़िंदगी भर का विश्‍वास एकाएक ढह गया।वे जब से म्‍युनिसपिल कमेटी की नौकरी में आये थे, ऐसा कभी नहीं हुआ था। उन्‍होंने अपनी सारी ज़िंदगी शान से गुजारी है। बाज़ार में कभी किसी व्‍यापारी ने उनकी बात नहीं टाली। लेकिन आज सेठ गहनामल ने उनके विश्‍वास को एक ही झटके में गहरे से तोड़ दिया।जब उनकी म्‍युनिसिपिल-कमेटी के पास नाके लगाने का अधिकार हुआ करता था तब कमेटी में हरक चंद जी ऐसी कुरसी पर थे कि वे नाकेदारों के कामकाज पर सीधे निगाह रखते थे। महसूल वसूली का काम उनके ही पास था। इसी वजह से क़स्‍बे के सारे व्‍यापारी उनका ख़ास ख्‍़याल रखा करते थे। उनने भी इस क़स्‍बे के हर व्‍यापारी पर खूब अहसान किये हैं। चोरी -छिपे पूरा ट्रक भरके माल ले आये दुकानदारों को फाइल से उनने वे कागज- पत्‍तर कई बार बताए हैं, जिनके कारण दुकानदारों पर हजारों रूपया महसूल लग सकता था। जानकारी मिल जाने पर दुकानदारों ने कागज-पत्‍तर में लिखी चीजें अपने यहां दर्ज करलीं। सो दुकानदारों के हजारों रूपये बच गये, पर बदले में हरक बाबू ने कभी किसी से कोई अपेक्षा नहीं की। जिसने जो दिया प्रेम से ले लिया।नहीं दिया तो भी कोई पच्‍चड़…

क़ैश जौनपुरी की रचनाएँ

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लघुकथा.ले कौआ... ले जा!मैं अपने कमरे में था. तभी फर्स्‍ट फ्‍लोर से आवाज आई ”सुनिये! अपने बच्‍चे का खेल देख लीजिये” आवाज मेरी बीवी की थी. मेरे साहबजादे जो अभी कुल डेढ़ साल के हैं. एक छोटे से चूहे के बच्‍चे के साथ खेल रहे थे. मकान मालकिन के भी दो बच्‍चे वहीं थे. मकान मालकिन ने ही कपड़े धुलते समय उस छोटे से चूहे के बच्‍चे को देखा था और बच्‍चों को खेलने के लिये दे दिया था. उनके बच्‍चे बडे हैं इसलिये डर रहे थे क्‍योंकि उन्‍हें पता था कि ये चूहे का बच्‍चा है. मेरे बेटे को भी पता था कि ये चूहे का बच्‍चा है मगर वो अभी छोटा है इसलिये वो डर नहीं रहा था. वो उसे एक टिन के ड्राइंग बॉक्‍स के ढ़क्‍कन के ऊपर लेकर खेल रहा था. ये मैंने भी देखा. मकान मालकिन के बच्‍चे दूर भाग रहे थे जब वो उस छोटे से चूहे के बच्‍चे को उनकी ओर खिसका दे रहीं थीं मगर मेरा छोटा सा बच्‍चा वहीं बैठा हुआ हंस रहा था. मकान मालकिन ने उस चूहे के बच्‍चे को मेरे बच्‍चे के पैरों पर रख दिया वो फिर भी नहीं डरा. वो उसे हाथ से भी छू दे रहा था. तभी मैंने कहा ”आपको कहां से मिल गया ये? इसे किसी कूड़े के पास छोड़ दीजिए चला जायेगा” मैं ये भी सो…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – महेश शर्मा का व्यंग्य : बड़ी मछली छोटी मछली

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(प्रविष्टि क्रमांक - 8)
हाल ही में हमारे बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री जी ने अपने मातहतों को सलाह दी कि छोटी मछली पकड़ने की बजाए बड़ी मछली पकड़कर भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगाएं। जब प्रधानमंत्री स्‍तर का व्‍यक्‍ति ऐसी बात कहेे तो बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लिहाज़ा गंभीरता का लबादा ओढ़े चिंतन-मनन करते हुए हमें अनायास ही याद आ गया कि एक दशक से कुछ अधिक ही हुआ होगा जब स्‍वतंत्रता की स्‍वर्ण जयंती पर एक और बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री ने लालकिले से भाषण देते हुए कहा था कि भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध सत्‍याग्रह किया जाना चाहिए। शुरु से ही हम दोनों प्रधानमंत्रियों की बुद्धिजीविता के कायल रहे हैं। यद्यपि एक विदेश मामलों के धुरंधर पंडित रहे हैं जबकि दूसरे ने विदेश संबंधी कूटनीति में अपने को सिफ़र साबित किया है। फिर भी उनकी ईमानदार छवि और लब्‍ध प्रतिष्‍ठित अर्थशास्‍त्री होने के कारण उनके लिए अत्‍यधिक आदरभाव सदा से बना रहा है। बहरहाल भ्रष्‍टाचार संबंधी उनके कथन को गंभीरता से लिया जाना लाजिमी ही था इसीलिए सत्‍याग्रह का आह्वान भी याद आ गया। लगा जैसे हमने कोई गंभीर अपराध कर दिया। यदि बारह वर्ष पूर्व ही सत्‍या…

के. पी. त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : ऊषा

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ऊषा दारोगा ने कड़क आवाज़ में
हवलदार को तलब किया ,
पंडित रामरतन को फ़ौरन
पकड़ने का हुकम दिया I हुकुम मिलते ही रतनसिंह ह्ववलदार ने
पंडित जी का दरवाज़ा खटखटाया ,
उनको  गिरफ़्तार करने का ,
दारोगा का फ़रमान सुनाया I आओ! रतन बेटा क्या बात है ?
घर पर तो सब ठीक ठाक है ,
गुरु जी ! आपको लेने आया हूँ ,
मज़बूरी में फ़र्ज़ निभाने आया हूँ I मेरा कसूर !, कसूर तो सर जी बतायेंगे
हम तो केवल , पकड़ कर ले जायेंगे ,
पंडित जी को थाने लाया गया ,
दारोगा के सामने बुलाया गया I पंडित जी ! आपके घर
के पास से गुज़र रहे थे ,
आप वहां जोर जोर से
किसके साथ चिल्ला रहे थे ?I आप वहां क्या करते हैं ?.
क्या कोई धंधा चलाते हैं ? माई बाप मैं, हिन्दी टीचर  हूँ
बच्चों को हिन्दी पढ़ाता हूँ ,
अच्छी तरह समझाने के लिए,
साथ साथ कविता गाता हूँ I सुनें, ज़रा एक कविता सुनाओ,
फ़िर उसका मतलब समझाओ I यह है ऊषा की मंजुल लाली,
जो आधे घंटे को आती है I
फ़िर और उज़ाला होता है ,
यह उसमे घुलमिल जाती है I अच्छा! यह है ऊषा की मंजुल लाली
जिसने, करा दी कितनों की ज़ेब खाली यह तो सरासर धंधा है
बनाया ल…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : शरद तैलंग का व्यंग्य - साक्षात्कार गाँव वालों का दूरदर्शन द्वारा

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(प्रविष्टि क्रमांक - 7)

उड़ती हुई धूल, बच्चों में सबसे अधिक गंदे दिखने वाले कुछ बालक बालिकाएं जिनकी नाक के दोनों नथुनों से जमना गंगा की उच्छल जलधि तरंग बहने का आभास हो रहा था और वे बालक बालिकाएं जो यदा कदा इस सच्चाई को भी उजागर कर दिया करते थे कि यदि प्रयास किया जाये तो बहती हुई धारा को भी उसके उदगम स्थल तक वापस मोड़ा जा सकता है क्योंकि गांव वालों में अभी भी रूमाल रखने का चलन नहीं था अतः उसका काम वे लोग किसी के मकान की दीवार से या अपने शरीर के पृष्ठ भाग के उपयोग से चला लिया करते थे। जानवरों के सींग, पैर, पूंछ, खुरों तथा को दर्शाता हुआ नदी पर नहाती कुछ ग्राम्य बालाओं जिनका चीर हरण करने की आवश्यकता नहीं थी के रूप से छेड़छाड़ करता हुआ दूरदर्शन का कैमरा, गांव की एक मात्र मिठाई की दुकान ‘हनुमान मिष्ठान भंडार’ के मालिक राम प्रसाद अग्रवाल के मुख मंडल पर आ कर ठहरता है। राम प्रसाद जी के कपड़ों को देख कर यह बताना मुश्किल था कि उनके कपड़े सफेद थे जो मैल के कारण काले हो गए थे या काले थे जो मैल के कारण सफेद दिखाई दे रहे थे। कुल मिला कर मैल तथा कपडों में ‘मैं तुम में समा जाऊं तुम मुझ में समा जाओ’ की स्थ…

शेर सिंह की कहानी : कृष्ण गोकुल

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नगरों का नगर अहमदाबाद महानगर। महानगर के पश्चिमी भाग में नवा वाडज - राणिप इलाका। इसी इलाके में स्थित है कृष्ण गोकुल अपार्टमेंट। यानी कृष्ण गोकुल को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी। आधुनिक महानगरों की संस्कृति के अनुरूप लगभग एक सौ फ्लेटों की सोसाइटी है। फ्लेटों के मालिक, फ्लेटों के स्वामी मध्यवर्गीय लोग, मध्यवर्गीय परिवार हैं। कुछ निम्न मध्यवर्गीय परिवार भी हैं। आठ ब्लाकों में विभाजित तीन - तीन माले की बिल्डिगें हैं। दो- दो और तीन -तीन कमरे। किचन, बाथरूम और टायलेट सहित। ऐसा नहीं है कि तीन- तीन कमरों के फ्लैट वालों की आमदनी अन्यों से ज्यादा ही है। ऐसी कोई विशेष बात नहीं है। इन में से कुछ की आमदनी तो औसत ही है। लेकिन जब फ्लेट बिक रहे थे, उस समय उन्होंने तगड़ी मोटी रकम एक मुश्त बिल्डर को दे दी थी। इसीलिए अधिक आय नहीं होने पर भी उन के फ्लेट बड़े थे। है तो यह गुजराती लोगों की हाउसिंग सोसाइटी। लेकिन सोसाइटी में दक्षिण के चैन्ने से ले कर सुदूर उत्तर भारत के हिमाचल प्रदेश तक के सभी प्रकार के लोग , उन के परिवार हैं। मिश्रित संस्कृति, मिश्रित रीति-रिवाज। निम्न जाति से ले कर सभी प्रकार, सब जाति- विरादरी क…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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