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30 सितम्बर 2009
रचना दीक्षित की असह्य वेदना की कविताएँ
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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विभा रानी का व्यंग्य - आ'एम हैप्पी !
(प्रविष्टि क्रमांक - 10)
'आ'एम हैप्पी' किसी भी भाषण की बड़ी अच्छी शुरूआत है। हर समारोह में अतिथि वक्ता यह जरूर कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' । आय एम हैप्पी कि मुझे आप लोगों ने यहाँ बुलाया। आए एम हैप्पी कि मुझे आप सबसे मिलने का मौका मिला। आएम हैप्पी कि मुझे आप सबसे बातें करने का, आप सबको जानने समझने का मौका मिला।
आयोजक भी हैप्पी कि वे इतने हैप्पी थे। हैप्पी होकर बोले। हैप्पी होकर खाया, हैप्पी होकर पिया. हैप्पी हो कर आयोजक की गाड़ी से विदा हुए. समारोह खतम होने के बाद किसी ने आयोजक से पूछा कि भई, वे हैप्पी थे, यह तो दिखा ही नहीं। आयोजक बोले – “ हैप्पी दिखने के लिए नहीं, बोलने के लिए बोला जाता है। “
हैप्पी होने के कई कारण हैं। भारत समारोहों वाला देश है। भारतीय तिथि में हर दिन दो-चार अवसर के, पावन-त्यौहार के होते हैं. कैलेंडर देखें तो हर दिवस एक न एक दिवस। इन दिवसों का सरकारी दफ्तरों में बड़ा महत्व है। सभी दिवसों पर समारोह होते हैं, महत्वपूर्ण व्यक्ति बुलाए जाते हैं। वे आते हैं और कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी'। सुरक्षा दिवस, संरक्षा दिवस, उत्पादकता दिवस, हिंदी दिवस, यह दिवस, वह दिवस. सभी दिवसों पर शपथें भी ली जाती हैं। सच्चे भारतीय की तरह हम सभी दिवस पर शपथ लेते हैं और लेने के बाद तिलांजलि की तरह उसे त्याग भी देते हैं. शपथ खाने और खाकर भूल जाने के लिए होता है. यह मिठाई नहीं है कि उसका स्वाद लोग बरसों याद रखे.
उस दिन भी सुरक्षा दिवस पर सबने शपथ ली, समारोह के बाद मिले समोसे, बर्फी खाई। यह सब करते करते घर जाने का समय हो गया। सबने अपनी-अपनी दुकान जल्दी-जल्दी समेटी और फूट लिए। कुछ ने बिजली जलती छोडी, कुछ ने कम्प्यूटर। बिजली रानी भी उतनी ही नटखट और शैतान। निगोड़ी शोडषी नायिका की तरह इठलाकर बाहर निकली, बाहर निकल कर इधर उधर झांका, फिर लाँग से शार्ट हुई. शॉर्ट कुछ भी हो, निकर कि स्कर्ट, लोगों को ऐसे ही झटके देती है। सो, शॉर्ट होकर उसने भी झटका दिया और अपने सर्किट से बाहर निकल गई। जान का नुकसान तो नहीं हुआ, क्योंकि सभी सुरक्षा की शपथ को समोसे-बर्फी के स्वाद में मिला कर समय से पहले अपने अपने ठिकाने को पहुंचा कर उसे उपकृत कर रहे थे। बस माल में कुछ कम्प्यूटर जले, कुछ फाइलें। तो उससे लोगों को तकलीफ नहीं हुई. आखिर दफ्तर के नुक्सान के लिए कोई क्यों सोग मनाए? कंप्यूटर दफ्तर का, फाइलें दफ्तर की। बल्कि फाइलें जलने से सभी को बड़ी तसल्ली मिली. कोई भी फाइल मांगने पर कह दिया जाता- “ साब जी, अमुक फाइल? तमुक फाइल? वो फाइल तो आग में... ” यहां तक कि आग लगने के बाद की तारीख वाली फाइलें न मिलने पर भी कह दिया जाता – “ सर जी, याद है न वो जो आग लगी थी, उसमें... ” हां, कुर्सी जल जाने से लोगों को बडी तकलीफ हुई थी. आखिर को सारा खेल तो कुर्सी का ही है ना. कुर्सी नहीं रही तो बैठें कहां? चाय सुडकते हुए राजनीति और महंगाई जैसी सदाबहार और मुफतिया बातों पर अपने अपने अमूल्य विचारों के चंदोबे कैसे ताने जाएं? कैंटीन का नुकसान तो सबसे ज़्यादा दुखदाई था. हाय, समय पर चाय नहीं, नाश्ता नहीं. घरवाली एक बार के लिए रोटी का डब्बा पकडा देती है. उससे अधिक के लिए मांगने पर कटखनी बिल्ली की तरह कूदती है.
इन सबके बावजूद आ’ एम हैप्पी कि मुझे आपने सदभावना दिवस कि सांप्रदायिक एकता दिवस कि इस दिवस कि उस दिवस पर बुलाया। उस दफ्तरवाले को देखिए. वे तो कम्बख़्त हमें बुलाते ही नहीं। राजनीति करते हैं सब! साले, चोर, उचक्के। यहां के लिए वे हैप्पी हैं कि दूसरी जगहों जैसी राजनीति यहाँ नहीं खेली गई. इसका सुखद परिणाम यह रहा कि यहां के समारोह के लिए उन्हें यहाँ बुला लिया गया। इससे यह भी पक्का हो गया कि अगली बार वे उन्हें अपने यहाँ बुलाएंगे। और ये भी पक्का ही पक्का जानिए कि वहाँ जाने पर ये भी कहेंगे - 'आ'एम हैप्पी' कि आपने मुझे बुलाया।
सभी हैप्पी हैं। वे इसलिए हैप्पी हैं कि आपने उन्हें बुलाया, अपने लोगों से मिलने का मौका दिया, जिसमें वे केवल मंच पर बैठे लोगों से मिले। बाकियों के लिए मंच की माइक ही और उनके सद्ववाक्य कि आ एम हैप्पी कि मुझे आपसे मिलने का मौका मिला।
पूरे समारोह में दर्शक दीर्घा में बैठे किसी से भी उनकी बात नहीं होती। किसी की शकल पर नजर भी नहीं जाती, किसी का नाम भी नहीं मालूम होता, मगर वे कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' कि मुझे आप सबसे बात करने का, आप सबको जानने-समझने का मौका मिला।
वे बोलते तो हैं कि 'आ'एम हैप्पी', मगर बोलते वक्त ऐसा लगता है, जैसे बोलने से पहले उन्हें कैस्टर ऑयल पिलाया गया है या बोलने के बाद उन्हें सप्रेम नीम के जूस का भरा ग्लास पिलाया जानेवाला है। वे नहीं जानना या समझना चाहते कि हैप्पी या खुश महज शब्द नहीं, भावना की वीणा और अभिव्यक्ति की जलतरंग है। देह की भाषा, यानी बॉडी लैंग्वैज बोलने वाली भाषा से ज्यादा जानदार और प्रामाणिक होती है। इसलिए बोलने में आप कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी', और देह बताती है, जैसे शोक-सभा में आए हैं।
वैसे हर अवसर पर 'आ'एम हैप्पी' बोलने वाले भी कम नहीं हैं। एक बड़े साहित्यकार दिवंगत हो गए। उनके लिए एक शोक सभा आयोजित हुई। यही एक ऐसा सम्मान है जिसे हम लेखक एक दूसरे को देना सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं. मगर दिक्कत तो यह है कि हिंदी के लेखक और प्रकाशक में ऐसा छत्तीस का आंकडा रहता है कि प्रकाशक से मिली रायल्टी से वे शोक सभा स्थल तक भी नहीं जा सकते. बाकी का इन्तज़ाम कहां से और कैसे हो? लिहाज़ा, एक बड़े ही रसूख वाले व्यक्ति को वहाँ बुलाया गया, ताकि आयोजन का खर्चा निकल सके । जो धन देगा, वह बोलेगा भी. सो बोलने के वक़्त उन्होंने कहा – “ आ’ एम हैप्पी कि इस शोक सभा की अध्यक्षता करने के लिए मुझे बुलाया गया। “
एक अधिकारी की बॉस से खटपट हो गई, दफ्तर के एक आयोजन को लेकर। बॉस नाराज कि उन्हें 'वेल इन एडवांस' क्यों न बताया गया। छोटा अधिकारी मिमियाया - 'सर, आप नहीं थे सर, इसलिए सर ... ।' 'व्हाट आप नहीं थे? दफ्तर में फोन नहीं था कि मैं नहीं था?' इसी पर छोटे अधिकारी की पूरी लानत-मलामत हुई। बस, जी चार्जशीट नहीं मिली, मगर फर्मान मिला कि बॉस समारोह में शरीक नहीं होंगे। छोटे अधिकारी के काफी मिन्नत-चिरौरी के बाद वे गए। जाना ही था. आखिर उनकी भी तो गोपनीय रिपोर्ट लिखी जानी थी. बॉस मंच पर पहुंचे - तना चेहरा, जुड़ी भौंहें, कड़ी और रूखी निगाहें, मगर माइक थामते ही बोले -'आ एम हैपी टू बी हेयर।'
हैप्पी कहना उनकी नियति है। सचमुच की खुशी जब चेहरे पर आती है, तब शब्द भावनाओं के मुंहताज नहीं रहते। देह की भाषा उन शब्दों की पुष्टि करती हैं। हैप्पी कहने या दिखने से जरूरी है हैप्पी होना। यह हैप्पी होना अपने अंदर से आता है।
बहरहाल, कल फिर एक समारोह है.- मुझे मालूम है, वक्ता पूरी भीड़ को यही कहेंगे -'आ’ एम हैप्पी'. 'हैप्पी हैप्पी' का दौर यूँ ही चलता रहेगा, हर कोई जुमलेबाजी करते रहेंगे, इसलिए मैं भी बता दूं कि 'आ’ एम हैप्पी।'
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28 सितम्बर 2009
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : उमेश कुमार गुप्त का व्यंग्य – इंडियन टाइम
(प्रविष्टि क्रमांक - 9)
इंडियन टाइम हमारे देश में बहुत प्रसिद्ध हैं और इसका ईजाद भी हमारे ‘ सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां‘ के वासियों ने की है, इसलिए इसे इंडियन टाइम की संज्ञा दी गई है। हम दो बजे दिन की मीटिंग रखते हैं और वह शाम को पांच बजे शुरू होती है। चुनावी सभा में नेताजी का भाषण सुबह 11 बजे रखा जाता है और शाम को 5 बजे शुरू होता हैं। दुकान का उद्घाटन 2 बजे रखा जाता है, छः बजे शाम को फीता कटता है। साहित्य सम्मेलन भी आठ बजे रात को रखे जाते हैं, दस बजे शुरू होते हैं। कवि सम्मेलन नौ बजे रात को रखे जाते हैं, ग्यारह बजे शुरू होकर एक बजे रात को खत्म होते हैं। इस प्रकार ये जो समय का अंतराल है, यही अंतराल ‘इंडियन टाइम‘ कहलाता है।
हम सभी भारतवासी ‘इंडियन टाइम‘ के कायल है। सम्मेलन तब तक शुरू नहीं हो सकता हैं, जब तक अध्यक्ष नहीं आ जाते हैं और अध्यक्ष तब तक नहीं आ सकते हैं, जब तक टी.वी., कैमरामैन, आकाशवाणी वाले, फोटोग्राफर , पे्रस वाले एकत्र न हो जाये। सभी के एकत्र होने में टाइम लगता है। वह दिन सभी का रहता है। सभी अपने नखरे दिखाते हैं। सभी नाचने वालों की तरह आयोजक को नचाते हैं। पिछली उधारी की याद दिलाते हैं। चाय नाश्ता नहीं कराया , उलाहना देते हैं। कार्यक्रम में वरीयता प्रदान नहीं की, की शिकायत करते हैं। कुर्सी में आगे जगह नहीं रखी , पहले नाम नहीं दिया, आदि दुखडा रोते हैं।
दर्शकों को बताया जाता है कि अध्यक्ष महोदय, के आने की सूचना प्राप्त हुई है, चल दिये हैं। आते ही कार्यक्रम शुरू हो जायेगा। सारा दोष अध्यक्ष पर डाला जाता है। जबकि अध्यक्ष समय से पांच मिनट पूर्व आकर बंद कमरे में चुपचाप बैठा ‘स्टेज सजना‘ देखता रहता है। यदि भूल से अध्यक्ष महोदय , सही समय पर आ जाए तो आयोजक , प्रायोजक , नियोजक , संयोजक , आलोचक, उद्घोषक गायब मिलते हैं। सबके मिल जाने पर ही पूरा कुनबा जुड़ने पर, कार्यक्रम शुरू होता है और आठ की जगह दस बज जाता है।
सभी लोग राष्ट्रीय घड़ी से टाइम मिलाकर चलते हैं। सब राष्ट्रीय टाइम के कायल हैं । इसलिए किसी भी देशभक्त को समय पर न आने के कारण नहीं डांटा जा सकता है, क्योंकि वह राष्ट्र भक्ति का पालन कर राष्ट्रीय अनुशासन के अनुसार समय पर राष्ट्रीय टाइम से आया है।
हमारे देश में कुछ ऐसे लोग हैं, जो समय के पाबंद नहीं है, बल्कि समय उनका पाबंद रहता हैं ऐसे व्यक्ति पूजकों के कारण ही समय का महत्व नहीं है। ऐसे लोगों के बारे में जानबूझकर अंधे , बहरे , पागल बने लोगों द्वारा यह दर्शाने का प्रयास किया जाता है कि वे समय के पाबंद नहीं है, बल्कि समय ही उनका गुलाम है। ऐसे अंध श्रद्धालुओं की अंध पूजा के कारण ही कार्यक्रम इंडियन टाइम को भेंट चढ़ जाते हैं। दर्शक मन मारकर कुछ नहीं कर पाता है। सब अंधभक्ति , अंध-श्रद्धालुओं के बीच में कार्यक्रम शुरू होने का विरोध और बहिष्कार करने का साहस नहीं कर पाते हैं।
हमारे देश में समय की कीमत नहीं है। लोगों के पास समय ही समय है। घंटों पान, सिगरेट की दुकान पर गप्प मार सकते हैं, एस.टी.डी. बूथ में बैठी टेलीफोन बाला से पे्रमालाप कर सकते हैं , स्कूल-कालेजों के पास खडे होकर श्रृंगार रस का आनंद ले, गजगामिनी , मृगनयनी, विश्व सुंदरी, शहर सुंदरी, टॉप टेन के दर्शन कर सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए समय की कोई कीमत नहीं है। इनके पास समय ही समय है।
हममें से कई लोग दफ्तर जाते हैं, हाजरी लगाते हैं, चाय-पानी करते हैं, मेच फिक्सिंग की बात , लालू की याद , अटल जी के दर्द , ममता के इस्तीफे , पासवान की रेवडी, कर्मचारी शासित बजट की बातें कर टाइम पास करते हैं और समय पर सीधे घर पर आकर वहीं बातें सोते तक टी.वी. पर देखते हैं। हम लोगों को पता ही नहीं चलता कब एक तारीख आ गई, कब दीवाली का बोनस मिल गया। हम लोग कुछ दिन नहीं, बल्कि साल दर साल ऐसे ही टाइम पास कर के निकाल देते हैं। ऐसे लोगों के देश में समय की नई खोज न हो यह नहीं हो सकता है।
हमारे देश में यह नहीं सोचते हैं कि आज का दिन फिर नहीं आयेगा। हमारे लिए तो हर दिन एक जैसा होता है। ग्यारह से पांच काम करों, लाइन से से लोगों को बुलवाओं ,जितना निपट गया ठीक, नहीं तो कल फिर से लाइन लगवाओ। बीच -बीच में कुर्सी बचाने वी.आई.पी. लोगों का काम चुपचाप सर्कस के करतब दिखाने वालों की तरह करते जाओ। सालों कट जाएंगे , पता भी नहीं चलेगा।
हमारे देश को आजाद हुए 50 से अधिक साल हो गये हैं, लेकिन देश की गीत में कोई परिवर्तन नहीं आया है। आजादी के समय से 80 प्रतिशत लोग अंगूठा लगा रहे हैं। साक्षरता की ज्योति करोडों का ईधन खाकर, कुछ दूर तक ही चलकर साक्षरता की अलख जगा पायी है। वह भी ऐसी साक्षरता है, जो केवल नाम लिखना सिखाती है। अपने प्रति अच्छे-बुरे को पढने -समझने की सीख और प्रज्ञावान्, व्यक्ति पैदा नहीं करती।
हमारे देश में समय को चना खाने, मूंगफली छिलने, मक्खी मारने, घूइंयां छीलने से नापा-तौला गया है। जानवर भी हर काम समय पर करता है। वह ठीक समय जागता है, सोता है, और खाता है। परन्तु आदमी के समय का कोई ठिकाना नहीं है। वह समय इधर-उधर की उडान में, उखाड-पछाड में, कच्ची-पक्की बात करने में, कल्पना के घोडे दौडने में नष्ट कर देता है। जबकि सभी समय उपयुक्त होता है। समय का उचित उपयोग करके समय को बचा सकते हैं।
आचार्य चाणक्य का कहना है कि ‘ समय किसी के रूकने से नहीं रूकता है। समय अपनी गति से चलता रहता है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। इसलिए समय की कीमत को समझो, गुजरा समय कभी वापस नहीं आता, सदा इंसा नही समय की प्रतीक्षा करता है। समय मूल्यवान है। इससे लाभ उठाने वाले ही आगे बढते हैं।‘ इन सूत्रों को ध्यान रखा जाए तो ‘इंडियन टाइम‘ के मजाक से बचा जा सकता है। वैसे दम है तो बहिष्कार ही इलाज है।
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umesh kumar gupta
2nd ADJ seoni MP
SEONI COURT SEONI MP
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यशवन्त कोठारी का आलेख : भारतीय विद्याओं का पराभव क्यों?
पिछले 50-55 वर्षों में भारतीय विद्याओं के स्तर में निरन्तर ह्रास हुआ है। लम्बे गुलामी के दौर के बाद देश आजाद हुआ तो यह आशा बनी थी अब सरकारें भारतीय विद्याओं के उद्भव और विकास के प्रति प्रतिबद्ध होकर काम करेंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। भारतीय विद्याओं में विशेषकर आयुर्वेद, ज्योतिष, वेद, कर्मकाण्ड, वास्तु, योग, आध्यात्मिक आदि विषयों का समावेश होता है। इन सभी विषयों के संवर्धन, संशोधन, परिवर्धन तथा संरक्षण का काम समाज ने एक वर्ग विशेष को दिया और यह तय किया इस वर्ग का मुख्य कार्य पठन-पाठन, अध्ययन, अध्यापन तथा भारतीय विद्याओं के संरक्षण का होगा तथा इस वर्ग की वृत्ति की व्यवस्था समाज, राज्य तथा श्रेष्ठी वर्ग करेगा, लेकिन समाज का यह वर्ग भारतीय विद्याओं के उन्नयन में गतिशील नहीं हो सका। धीरे-धीरे समाज में इस वर्ग के लोग अन्यान्य कार्यों में व्यस्त होते चले गये। परिणाम स्वरूप भारतीय विद्याएं निरन्तर और नियमित रूप से पतन की और चली गई। समय समय पर कुछ लोगों ने भारतीय विद्याओं के उन्नयन हेतु व्यक्तिगत प्रयास किये, मगर ये प्रयास नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह ही रहे।
राज्याश्रय या सेठाश्रय के चक्कर में भारतीय विद्याओं का एक नये प्रकार से दोहन शुरू हुआ, हर कोई भारतीय विद्याओं को कामधेनु समझने लगा। हर व्यक्ति अधिक से अधिक दोहन करने के चक्कर में भारतीय विद्याओं के मूल स्वरूप को नष्ट करने की राह पर चलने लगा। इस कारण समाज में भारतीय विद्याओं के नीम-हकीम पैदा होने लगे। रही-सही कसर पाश्चात्य संस्कृति तथा वैश्वीकरण ने पूरी कर दी। आज से सौ पचास वर्ष पहले आयुर्वेद, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, योग, वेद, अध्यात्म आदि विषयों के गिने-चुने विशेषज्ञ थे तथा वे वाकई में विद्वान थे, मगर आज हर तरफ नये विद्वान हो गये है। वास्तुशास्त्र का उदाहरण लीजिए, हर वास्तुशास्त्री दूसरे वास्तुशास्त्री को गलत ठहरा देगा। आयुर्वेदीय विज्ञान का जो ज्ञान सौ-पचास वर्ष पहले था वो आज दुर्लभ हो गया है। वेदपाठी तो कष्टोपलब्ध हो गये है। अध्यात्म के क्षेत्र में भगवान इतने हो गये है कि पूछिये मत सब मिलकर अपना प्रचार-प्रसार तो कर रहे है, मगर भारतीय विद्याओं के विकास की तरफ सामूहिक रूप से ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
राज्याश्रय के चलते समाज में बदलते परिवेश के कारण जिन लोगों पर भारतीय विद्याओं के संरक्षण का कार्य था, उन्होंने नई वृत्तियों पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया। इन आर्थिक वृत्तियों के चक्कर में भारतीय विद्याएं बहुत पीछे रह गई। समाज इसे समय की नियति समझ कर स्वीकार कर लिया।
भारतीय न्याय, भारतीय ज्योतिष, भारतीय वास्तु, भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान, योग, कर्मकाण्ड, वैवाहिक पद्धति आदि सैकड़ों विषय धीरे-धीरे नष्ट होने लगे। पाश्यात्य संस्कृति के आने से भारतीय विद्याओं के स्तर में और भी ज्यादा गिरावट आ आई। लम्बी गुलामी के कारण भी भारतीय विद्याओं के स्तर पर विपरीत प्रभाव पड़ा।
सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक परिवेश पर नजर दौड़ाने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय विद्याओं पर चिन्तन के स्थान चिन्ता व्यक्त करने की एक लम्बी परम्परा बन गई, मगर स्थिति बिगड़ती चली गयी।
केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों को भारतीय विद्याओं के अध्ययन से कोई सरोकार नहीं है। वे तो विलायती चश्में, विलायती भाषा और विलायती विद्याओं के दीवाने हैं। भारतीय विद्याओं के विकास के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को अलग से के बिना मंत्री नियुक्त करने चाहिये, ताकि भारतीय विद्याओं के पराभव को रोका जा सके तथा विश्व में भारतीय विद्याओं की पताका फहरा सके। इसके साथ ही भारतीय विद्याओं के नीम हकीमों पर भी रोक लगाया जाना आवश्यक है। भारतीय विद्याओं को किसी धर्म, पंथ या जाति से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिये। धर्म, अध्यात्म भारतीय विद्याओं का एक प्रकार है, सम्पूर्ण भारतीय विद्याएं नहीं।
भारतीय विद्याओं के उद्भव से देश में एक सांस्कृतिक एकता का भी विकास होगा। उदारता, सहिष्णुता, क्षमा, करूणा और दया भारतीय विद्याओं में मूलभाव रहा है। उदारता से चिन्तन कर भारतीय विद्याओं के विकास में योगदान किया जाना चाहिए। सामाजिक समरसता से ही भारतीय विद्याओं का विकास होगा। सम्पूर्ण भारतीय समाज आज की सामन्ती विचारधाराओं के अन्तर्विरोध से ग्रस्त है इस कारण भी भारतीय विद्याओं का पराभव नियमित रूप से होता रहा है। कोई विदेशी मेक्समूलर आता है और भारतीय विद्याओं का अध्ययन कर विदेशों को भारत की विराट संस्कृति से परिचित कराता है।
भारतीय विद्याएं अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, अस्तित्व का यह संकट सम्पूर्ण भारतीय समाज पर भी लागू है और अस्तित्व बचाये रखना राज्य की जिम्मेदारी है। यदि विद्याओं का चरित्र नष्ट हो जायेगा तो फिर देश, समाज, संस्कृति, आदि का क्या होगा।
स्वतन्त्रता के पचपन वर्षों के बाद भी भारतीय विद्याओं के विकास के लिए अलग से कोई केन्द्रीय विभाग या मंत्री का न होना शर्मनाक है। हमें एक वैज्ञानिक दृष्टि के साथ भारतीय विद्याओं को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में समग्र रूप से काम करना चाहिये। बुद्धिजीवी सरकार, श्रेष्ठीवर्ग तथा राजनैतिक नेतृत्व को इस कार्य हेतु आगे आना चाहिये।
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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर 302002
फोन 2670596
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श्याम गुप्त की कविता : मोड़ने समय की धारा
मोड़ने समय की धारा
ह्रदय के खोल अवगुन्ठन,
अहं के छोड़ गठ्बंधन;
तोड़ कर मौन ली कारा,
मोड़ने समय की धारा।
चलें फ़िर नवल राहों पर,
बसायें प्रीति के बंधन॥
आज हर ओर छाई है,
धुन्ध कुंठा-हताशा की।
हर तरफ़ छा गया है इक,
निराशा का कुहासा भी ।
तमस आतंक का फ़ैला,
छा गये अनाचारी घन ।
आस्थायें हुईं धूमिल,
नहीं सुरभित रहा सावन ।
अगर अब भी न जागे तो,
बने विष-बिंदु, चन्दन वन॥
मीत तुम आज फ़िर कोई,
सुहाना गीत इक गाओ ।
आस्थाओं के आशा के,
नीति-संगीत स्वर गाओ।
राष्ट्र गौरव के वे सुमधुर,
सुहाने,सुखद सुरभित स्वर।
जगे सोई धरा-संस्कृति,
जगें सोये हुए तन-मन।
अनय के नाग को नथने,
हो फ़ण-फ़ण पर पुनः नर्तन॥
ज्योति आशा किरण लहरे,
मिटे आतंक-अंधियारा ।
भक्ति विश्वास श्रद्धा युत,
राष्ट्र का गीत वो प्यारा ।
सभी अब गायें जन गण मन,
बने प्रिय राष्ट्र नंदन वन ॥
---डा श्याम गुप्त ,
सुश्यानिधि, के- ३४८, आशियाना ,लखनऊ-२२६०१२
मो-०९४१५१५६४६४.
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अशोक गौतम का व्यंग्य : महाराज जी के अमृत वचन
अपने गुरूघंटाल पूरनचंद जी महाराज श्री श्री लकड़ काठ श्री परम संसारी हैं। समय-समय पर उनके तीनों बंदर उनके कुसंग में रह उपदेश ग्रहण किया करते थे।
एक दिन उनके सबसे चालाक बंदर ने महाराज के दिमाग की परीक्षा लेते हुए कि महाराज का दिमाग अपडेट है भी कि नहीं, उनसे प्रश्न किया,‘हे गुरूघंटाल! मेरा किसीसे लड़ाई करने को मन बड़ा मचल रहा है। बड़े दिन हो गए किसी से बिना लड़ाई किए। ऐसे में लड़ाई में जीत का सबसे सशक्त हथियार क्या है?'
अपने शिष्य की लंपटी पिपासा को शांत करते हुए तब गुरूघंटाल ने कहा,‘हे मेरे प्रिय शिष्य! लड़ाई में जीतने का सबसे आसान तरीका यह है कि लड़ाई में मर्द पीछे दुबका रहे और अपनी घरवाली की इज्जत की परवाह किए बिना उसे थाने में खड़ा करता रहे। इसका प्रमाण देते हुए मैं तुम्हें एक रोचक कथा सुनाता हूं ,‘ जंबू द्वीप में एक पंडितों का गांव था। उस गांव में पूरनानंद का परिवार रहता था। महादंगई! वह गांववालों से लड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढता रहता। पूरनानंद का अपनी पत्नी पर कतई भी कंट्रोल न था। जब भी गांव में उसका किसी से लड़ाई करने का मन होता, बन्ना बढ़ाने को मन होता तो वह वह अपनी औरत को आगे कर देता। वह सती सावित्री लोगों पर अपनी इज्जत हनन के झूठे आरोप जड़ देती, ऐसे आरोप कि उन्हें सुन आरोप भी पानी-पानी हो जाते। और बेचारे आरोप अपनी इज्जत लिए भाग खड़े होते। औरत जात का लाभ उसे हर बार मिल जाता। गांव के कुछ लोग शर्म के मारे ,तो कुछ उसकी बेशर्मी को देख चुप हो जाते या अपनी हार मान लेते । जिसके चेहरे पर नाक ही न हो उसे औरों की नाक उतारने में बड़ा मजा आता है, आना भी चाहिए! जीवन का असली आंनद तो यही है। पूरनानंद की औरत की तरह। देखते ही देखते वह जिस से लड़ती जीत जाती। उसका बेटा मां द्वारा जीते केसों की लिस्ट बनाने मे मग्न रहता। उसका पति ऐसी पत्नी को पा फूला न समाता। सही होते हुए भी अब गांव में उससे कोई भी पंगा न लेता। अब घर में तो पूरनानंद के पूरे आनंद थे ही,गांव भी पूर्णानंद की दशा को प्राप्त हो गया । गांव वाले पूरनानंद की घरवाली तो घरवाली ,उसकी परछाई से भी डरते ।' बोलो पूरनचंद महाराज की जय!
तब महाराज के दूसरे बंदर ने महाराज से पूछा,‘ भगवन, आज के रेलमपेल के दौर में स्वर्ग कैसे प्राप्त हो?'
महाराज ने चिलम का गहरा कश लिया,तत्पश्चात गंभीर हो बोले,‘हे मेरे प्रिय बंदर! जो संसारी औरों के हक हड़पते हैं,जो झूठ सीना चौड़ा कर खुले बाजार में खड़े हो शान से रहते हैं, जिनका अपना सिर नंगा होता है पर ,औरों की पगड़ी उछाल कर परिश्रम से चूर हुए रहते हैं,जो औरों के लिए सदा गड्ढा खोदते हैं,ऐसे सज्जनों को सदा स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो दुर्जन सत्य, अहिंसा ,त्याग,तपस्या को अपने जीवन का अंग बनाते हैं , उन्हें नरक की प्राप्ति होती है। आज के दौर में जो अपने माता पिता की सेवा करते हैं वे भी नरक के ही अधिकारी बनते हैं। जो अपने रिश्तेदारों को हमेशा परेशान करते हैं,वे स्वर्ग के अधिकारी होते हैं। अपनी घरवाली के होते हुए जो औरों की घरवालियों पर उन्हें अपनी धर्म बहन बना अपना पौरुष न्यौछावर करते हैं उन्हें स्वर्ग के द्वार आठों याम खुले रहते हैं। वे बिना वीजा के स्वर्ग में कहीं भी आ जा सकते हैं। ' कुछ देर तक लंबी सांसें भरने के बाद महाराज ने अपने प्रियों को पुनः संबोधित करते हुए कहा,‘जो दूसरों की सपने में भी सहायता नहीं करते उन्हें भी स्वर्ग प्राप्त होता है। मुंह के आगे और, और पीठ के पीछे और रहने वालों को भी स्वर्ग की प्राप्ति तय मानो । जो विशुद्ध सांसारिक आत्माएं हमेशा दूसरों की निंदा में निमग्न रहती हैं वे वैतरणी पलक झपकते पार कर लेती हैं। इसलिए जो सज्जन स्वर्ग में भी मौज करना चाहते हों वे नित्य कर्म में सभी तामसिक वृत्तियों,प्रवृत्तियों को शामिल करें तो उन्हें मोक्ष पक्का मानो।'
तब तीसरे बंदर ने अपना प्रश्न किया,‘हे मेरे परम प्रिय गुरू घंटाल! इस लोक में सबसे सुखी कौन है?'
तब गुरू घंटाल ने उसकी भी पिपासा को शांत करते हुए कहा,‘जिसके चित में संतोष है, जो आज के दौर में भरा है,जो जिओ और जिओ दो के सिद्धांत में विश्वास रखता है,वह इस लोक का सबसे बड़ा दरिद्र है। जो इच्छाओं का भक्त है, जिसकी नजरें हमेशा गिद्ध की तरह औरों की थाली पर ही जमी रहती हैं, जो हमेशा भूखा ही रहता है, वही सच्चा धनवान है। जो आत्माएं चौबीसों घंटे औरों का बुरा ही सोचती रहती हैं, सभी को धुआं देकर रखती हैं, किसी को गाली-गलौज किए बिना जिनको रोटी हज्म नहीं होती, वे आत्माएं ही इस संसार की सबसे सुखी आत्माएं हैं। ऐसी आत्माओं को मैं सुबह से शाम तक नमस्कार करता हूं।
तब सृष्टि में दूर-दूर तक फैले अपने भक्तों को टीवी के माध्यम से संबोधित करते हुए गुरू घंटाल जी महाराज ने कहा ,‘जिस दिन मनुष्य से जूतमपैजार,अपराध , पर निंदा, लूटखसूट , पर पीड़ा , असहिष्णुता जैसे सत्कर्म नहीं होते वह दिन मनुष्य का व्यर्थ जाता है।'
इस प्रकार गुरू के ज्ञान में डुबकियां लगा तीनों बंदर भव सागर पार हुए। बोलो गुरूघंटाल महाराज की जय!!
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संपर्क:
अशोक गौतम
द्वारा- संतोष गौतम, निर्माण शाखा,
डॉ․ वाय․ एस․ परमार विश्वविद्यालय, नौणी,सोलन-173230 हि․प्र․
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26 सितम्बर 2009
विजय वाते का जीवंत साक्षात्कार – रचना की एक संपूर्ण व सशक्त विधा है ‘ग़ज़ल’
और, इसी वजह से ही लोग-बाग अपने कथ्य में वज़न रखने के लिए गाहे बगाहे शेरो-शायरी का बख़ूबी प्रयोग करते हैं. यह मानना है मशहूर ग़ज़लकार विजय वाते का. नीचे दिए गए दो भागों में वीडियो में उनका जीवंत साक्षात्कार देखें -
विजय वाते का साक्षात्कार भाग 1 – ग़ज़ल क्यों और किसलिए?
विजय वाते का साक्षात्कार भाग 2 – हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य क्या?
बशीर बद्र के मुताबिक ग़ज़लों का अगला ग़ालिब हिन्दी से ही आएग… देखें कि क्यों -
और, अब आइए आनंद लें विजय वाते की ग़ज़लों से चंद चुनिंदा शेर उनकी स्वयं की जुबानी -
विजय वाते की ग़ज़लें - ग़ज़ल पाठ का जीवंत वीडियो
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25 सितम्बर 2009
रामरक्षा मिश्र विमल की कुछ कविताएँ व ग़ज़लें
1
स्वादहीन जिंदगी
लगता नहीं
कि इस साल भी पूरा हो पाएगा
पत्नी से किया जा रहा
पिछले दस सालों से
एक नया शाल खरीदने का वादा
जब घर में
माँ की आँखों से गिरते हुए पानी और
उसकी आँख दिखाने की बात स्मृत होती है
तो अपना चश्मा बेमानी लगता है
घर परिवार के संबल का तर्क
मन को संतोष नहीं देता
यह आश्वासन निरर्थक होता है
कि अबकी जाड़ा में शहर ले चलूँगा और
जरूरत पड़ने पर आपरेशन भी करा दूँगा
क्योंकि मैं जानता हूँ
इसके न होने के पीछे कुछ ठोस कारण हैं और
उन्हें नकारना मेरे वश में नहीं
अपने मित्र के साथ एक दूकान में बैठकर
कलाकंद का एक पीस मुह में डालते ही
धूप में जला हुआ भाइर् का चेहरा
सामने आ जाता है और
तब वह कागज के टुकड़े की तरह
स्थिर हो जाता है और
बेमन से चबा जाता हूँ उसे
अर्थ है मगर अर्थहीन हूँ
रस बाँटता हूँ मगर रसहीन हूँ
शायद स्वाद का अनुभव
इतना अधिक हो चुका है कि
अब जिंदगी स्वादहीन हो गइर् है।
2
दीप शत शत जल उठे क्या
बम धमाकों में प्रमुदिता खो रही है
खो रही क्या सो रही है
तिमिरनाशक पर्व की व्याकुल दशा पर
काैन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?
जब हँसी में संकुचन रच बस रहा हो
अमियवर्षी बूँद हेतु तरस रहा हो
गिडगिडाते सूर्य़ की दयनीयता पर
काैन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?
ज्योति लोचन का नहीं वाणी विषय हो
संघ की जब हार ही अपनी विजय हो
हर कदम दम तोड़ती शुभ चेतना पर
काैन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?
अग्नि कोने में ठिठुरकर काँपती है
नींद सोती ही नहीं अब जागती है
आज बेबस बिलखती स्वाधीनता पर
कौन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?
3
आँखों आँखों में छुपाए रखिए
उनको मन ही में बसाए रखिए
उनकी मासूमियत पर क्या गुस्सा
अपने ज़ज्बात बचाए रखिए
भूख अब लाइलाज लगती है
आबरू अपनी बचाए रखिए
पाक हैं मंदिर मस्जिद दोनों
खून से इनको बचाए रखिए
वे तो बेपर्द कभी होंगे ही
आप बस उँगली उठाए रखिए
क्या पता कब हो ज़रूरत अपनी
दिल में तूफान बिछाए रखिए
4
जो भी कुछ कल था वही आज नहीं
क्या हुआ आप खुशमिज़ाज नहीं
कान के पतले जरा रहम करो
हम तेरे भ्रम के हैं इलाज़ नहीं
वक्त उनका है सरेआम यहाँ
लूटने से जो आते बाज नहीं
अपने दामन में झाँक लेने का
अब तो शायद कोइर् रिवाज़ नहीं
धर्म के नाम बहे जाते हैं
खून पे आज भी क्यों नाज़ नहीं
वक्त का रुख ही पलट दे ऐसे
आज़ क्यों तेरे अल्फाज़ नहीं
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डाँ• रामरक्षा मिश्र विमल
स्ववृत्त
नाम डाँ• रामरक्षा मिश्र विमल
पिता का नाम स्व• काशीनाथ मिश्र
जन्म तिथि 28 फरवरी 1962
शिक्षा – एम•ए•( हिंदी) – स्वर्णपदक प्राप्त , बी•एड• , पी•एच–डी• ( शोध का विषय –रामचरितमानस की रचना–प्रक्रिया।)
पेशा – स्नातकोत्तर अध्यापक (हिन्दी)।वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालय , बैरकपुर ( आर्मी ) , कोलकाता – 700120 में कार्यरत।
मूल निवास – सबल पट्टी , बड़कागाँव , पो• – नगपुरा , भाया – दुल्लहपुर , जिला – बक्सर ( बिहार) पिन – 802118
लेखन –हिंदी और भोजपुरी की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं दैनिक साप्ताहिक पत्रों में कविता , कहानी , निबंध , समीक्षा , रिपोर्ताज, साक्षात्कार, परिचर्चा, यात्रा–वृत्तंात आदि विधाओं में सैकड़ो रचनाएँ प्रकाशित। 12 वर्ष की अवस्था में पहला गीत प्रकाशित।स्वयं के साथ ही कइर् प्रतिष्ठित गायकों के स्वर में चार दर्जन से अधिक भोजपुरी गीतों का ध्वनिमुद्रण।
संपादन\प्रकाशन\प्रसारण – संसृति (साहित्यिक सांस्कृतिक अनियतकालिक) का संपादन–प्रकाशन।कतिपय केन्द्रीय विद्यालयों की वार्षिक पत्रिकाओं का संपादन।आकाशवाणी पटना व भागलपुर से हिंदी और भोजपुरी कविताओं का प्रसारण ।
काैन सा उपहार दूँ प्रिय(काव्य संकलन)प्रकाशित
एक भोजपुरी काव्य–संकलन, ‘रामचरितमानस की रचना–प्रक्रिया’ एवं ‘रामचरितमानस में चरित्र–निर्माण’ प्रकाशनाधीन।
गायन – दो भोजपुरी आडियो कैसेट रिलीज्ड –माइर् के जय बोल(देवीगीत), प्यार भइल मँहगा(लोकगीत) वीडियो अल्बम ‘आ जा ए परदेशी’ में एक गीत।इर्टीवी – बिहार–झारखंड से भोजपुरी गीतों के गायन का प्रसारण।
सम्मान – साहित्य–सृजन व गायन के लिए क्रमश: डाॅ आंबेडकर फेलोशिप सम्मान व भोजपुरी दीप सम्मान।
संपर्क - ramraksha.mishra@yahoo.com
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वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में स्वैच्छिक संस्थाओं का योगदान
सरलता, बोधगम्यता एवं व्याकरण सम्बन्धी विशेषताओं के कारण हिन्दी भारत की आत्मा है, क्योंकि इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, नैतिक चिन्तन, सार्वभौमिक दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का अन्वेषी मन्थन किया जाता रहा है। हजारों वर्षों की इस भाषा परम्परा ने भारत के विभिन्न, प्रान्तों, धर्मों, सम्प्रदायों एवं भाषाई प्रयोगों की बहुरूपता को एकताबद्ध किया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् एवं इसके पूर्व हिन्दी भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक बन गई क्योंकि विदेशी भाषा अंग्रेजी को बलपूर्वक और छलपूर्वक यहां प्रतिष्ठित करके, देशवासियों को जिस प्रकार दासता के जाल में जकड़ने का प्रयास किया गया उससे जागरूक लोकचेता मनीषियों का चौकन्ना होना स्वाभाविक था।
हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में आधुनिक युग का आरम्भ सन् 1850 ई. के आसपास से माना जाता है। यद्यपि इससे पहले (एक सौ वर्ष) ईस्ट इंडिया कम्पनी के रूप में अंग्रेजों (विदेशियों) ने अपनी भाषाई कूटनीति का जाल फैलाना आरम्भ कर दिया था तथापि अनेक वर्षों तक उनका यह षडयंत्र भारतीय जनता समझ नहीं पाई। ईसाई मिशनरियों ने पहले से ही अपने प्रचार का अखिल भारतीय माध्यम हिन्दी को बनाया था। उन्होंने अनुभव किया कि जनसाधारण तक पहुंचने के लिए हिन्दी ही मात्र एक साधन है। उन्होंने हिन्दी के व्याकरण लिखे, शब्दकोष तैयार किए और अपने धार्मिक ग्रन्थों के अनुवाद किए। मिर्जापुर, सिरीरामपुर, इलाहाबाद और आगरा उनके विशिष्ट केन्द्र थे। सन् 1801 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यह घोषणा की कि प्रशासनिक सेवा में केवल उसी व्यक्ति को जिम्मेदार पद पर नियुक्त किया जाय जिसे गवर्नर जनरल द्वारा बनाए गए कानूनों को अमल में लाने के लिए हिन्दुस्तानी (अर्थात् खड़ी बोली हिन्दी) का भी ज्ञान हो। इसलिए विलियम प्राइस, फ्रेडरिक जॉन झोर, वैलंटाइन मैटकॉफ, फ्रेडरिक पिल्कॉट आदि ने हिन्दी सीखी। महत्वपूर्ण यह है कि यह सब काम भारत के एक हिन्दी भाषा क्षेत्र (कलकत्ता) में हो रहा था। दिल्ली या मध्य प्रान्त के किसी इलाके में नहीं। स्पष्ट है कि आधुनिक काल की वास्तविक शुरूआत से पहले ही, हिन्दी प्रकारान्तर से राष्ट्रभाषा के रूप में मान्य हो चुकी थी। मद्रास के लेफ्टीनेन्ट टॉमस रोबक ने हिन्दी (हिन्दुस्तानी) को हिन्दुस्तान की महाभाषा कहा और अपने शिक्षा गुरू जॉन गिलक्रिस्ट को लिखा। 29 अगस्त 1896 के रूप में लिखे पत्र का प्रारूप इस प्रकार है- ‘भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लाहौर तक, कुमांऊ के पहाड़ों से नर्मदा तक, अफगानों, मराठों राजपूतों, जाटों, सिखों और उन प्रदेशों के सभी कबीलों में जहां मैंने यात्रा की है, मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा हैं जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी थी। मैं कन्याकुमारी से कश्मीर तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएंगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते हैं।' (जे. बी. गिलक्रिस्ट ः ए वैकुबलरी हिन्दुस्तानी एण्ड इंग्लिश, इंग्लिश एण्ड हिन्दुस्तानी से अवतरित)। यहां हिन्दुस्तानी से अभिप्राय सहज-सुबोध खड़ी बोली हिन्दी से है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि अंग्रेज शासकों को सम्पूर्ण राष्ट्र भारत में जिस भाषा का अधिकतर प्रयोग, प्रसार और प्रभाव दिखाई दिया वह हिन्दी (उनके शब्दों में हिन्दुस्तानी) थी।
हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में दो तरह की संस्थाओं का योगदान है। प्रथम वर्ग में वे संस्थाएं आती हैं जिनका महत्वपूर्ण/प्रमुख लक्ष्य सामाजिक सुधार तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण था। स्वदेशी भाषा के महत्व की सहज स्वीकृति सांस्कृतिक-सामाजिक नवजागरण में होती है। दूसरी और हिन्दी प्रचार-प्रसार में स्वैच्छिक संस्थाएं भी जोर आजमाइश कर रहीं थीं। वास्तविकता यह है कि इन संस्थाओं ने प्रान्तीयता/क्षेत्रीयता को हाशिये में रखकर देशहित में हिन्दी प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य किया और आज भी उस निरन्तरता को कायम किए हुई हैं। वाराणसी में नागरी प्रचारिणी, इलाहाबाद में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, ओड़िया राष्ट्र भाषा परिषद, पुरी; कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति बेंगलूर; केरल हिन्दी प्रचार सभा, तिरूवन्तपुरम; कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति; मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद, बेंगलूर; दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास; गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद; बम्बई हिन्दी विद्यापीठ, बम्बई; हिन्दुस्तानी प्रचार सभा; महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे; हिन्दी विद्यापीठ, देवधर; हिन्दी प्रचार-सभा, हैदराबाद; असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी; प्रयाग महिला विद्यापीठ, इलाहाबाद; मिजोरम हिन्दी प्रचार सभा, आइजोल; मणिपुर हिन्दी परिषद, इम्फाल; राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा, सौराष्ट्र हिन्दी प्रचार समिति, राजकोट; हिन्दी प्रचार-प्रसार संस्थान, जयपुर; हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद; ओड़ीसा शिक्षा परिषद, कटक; बेलगांव विभागीय हिन्दी शिक्षा समिति, हुगली; अखिल भारतीय हिन्दी संस्था संघ, नई दिल्ली इत्यादि संस्थाओं ने हिन्दी भाषा को आमजन तक लाने में सृजनात्मक सेतु का कार्य किया है। भाषा और साहित्य को अपूर्व रचनाएं, संस्थाएं और व्यक्तित्व देने वाले शहर बनारस में सबसे पहले 1893 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस सभा के संस्थापक प्रारम्भिक संभ्रान्त संरक्षक गोपाल प्रसाद खत्री, रामनारायण मिश्र, बाबूश्याम सुन्दर दास थे। समय-समय पर इन लोगों ने हिन्दी की प्रगति में महान योगदान दिया। आगे चलकर मदनमोहन मालवीय, अम्बिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी, श्रीधर पाठक, बद्रीनारायण चौधरी, प्रेमधन आदि नाम महत्वपूर्ण है। यहाँ हिन्दी के लिये ऐतिहासिक महत्व के विपुल कार्य और समारोह हुये। यहाँ ‘हिन्दी शब्द सागर' तैयार किया गया और इसी शब्द सागर की भूमिका के रूप में हिन्दी साहित्य का इतिहास आचार्य शुक्ल ने लिखा। ‘सरस्वती' और ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका' सरीखी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं यहीं से शुरू हुई। इसी सभा ने हिन्दी की अनेक योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू किया जैसे पुस्तकों का सम्पादन और प्रकाशन, हिन्दी शब्द कोश निर्माण, भाषा और साहित्य लेखन एवं अनुसंधान की योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया। सभा का अपना एक समृद्ध पुस्तकालय भी है जिसमेें प्राचीन एवं नवीन प्रकार की रचनाएं सहज रूप में उपलब्ध हैं। इस सभा ने कुछ मानक ग्रन्थों (शब्द सागर, पृथ्वी राज रासो, परमाल रासो) का प्रकाशन भी कराया है। नागरी प्रचारिणी ने अपने नाम से ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका' भी प्रकाशित की है।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की स्थापना 1910-11 में की थी। राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन सम्मेलन की स्थापना के समय से ही इसके मंत्री थे, आपको ‘सम्मेलन के प्राण' नाम का विशेषण दिया गया था। हिन्दी साहित्य के समस्त अंगों को स्पष्ट करना साथ ही देवनागरी लिपि का प्रचार-प्रसार करना। नागरी लिपि को लेखन तथा मुद्रण की दृष्टि से बढ़ावा देना है। वहीं दूसरी ओर हिन्दी भाषी राज्यों में भाषा के प्रयोग का प्रचार-प्रसार करना और हिन्दी के लेखकों/विद्वानों को पदक/उपाधि/पारितोषिक से सम्मानित करना लक्ष्य रखा गया। सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विभाग परीक्षा से सम्बन्धित है। सम्मेलन के द्वारा प्रथमा एवं उत्तमा की परीक्षाएं संचालित होती हैं। हिन्दी और हिन्दीतर क्षेत्रों में अनेक केन्द्रों पर ये परीक्षायें सम्पन्न होती हैं। ‘उत्तमा' परीक्षा को बी.ए. ऑनर्स के समकक्ष दर्जा प्राप्त है। ये परीक्षा गुआना, फिजी, सूरीनाम, मॉरिशस में होती हैं। यहाँ पर शोधपरक पुस्तकों का विशाल/समृद्ध पुस्तकालय है और शोधार्थी को निःशुल्क पुस्तकें पढ़ने हेतु सहज उपलब्ध हो जाती हैं। ‘सम्मेलन पत्रिका' नाम से एक त्रैमासिक शोध पत्रिका का प्रकाशन हिन्दी साहित्य सम्मेलन से सन् 1915 से किया जा रहा है। किसी जमाने में बालकृष्ण राव के सम्पादन में ‘माध्यम' का प्रकाशन हुआ करता था, समकालीन साहित्य पर केन्द्रित इस पत्रिका का पुर्नप्रकाशन सत्य प्रकाशन मिश्र के सम्पादन में प्रारम्भ हो गया है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा की स्थापना महात्मा गाँधी के सुझाव पर सन् 1936 ई. में नागपुर में हुई। इसमें प्रारम्भ में पन्द्रह सदस्यों की एक प्रचार समिति बनाई गई। महात्मा गाँधी, टण्डन, राजेन्द्र बाबू, जवाहर लाल नेहरू, जमुनालाल बजाज, आचार्य नरेन्द्र राव, शंकरराव देव, माखनलाल चतुर्वेदी, वियोगी हरि इत्यादि इसके संस्थापक सदस्य थे। इसका कार्यालय वर्धा में रखा गया। समिति ने तीन उद्देश्य रखे। प्रथम के तहत समस्त भारत में राष्ट्रीय भावनाओं को उद्बुद्ध करना तथा उन्हें एक सूत्र में बांधना। इसका उद्घोष ‘एक हृदय हो भारत जननी' है। सम्मेलन की तरह यह समिति भी, राष्ट्रभाषा, प्राथमिक राष्ट्रभाषा प्रारम्भिक, राष्ट्रभाषा प्रवेश, राष्ट्रभाषा परिचय, राष्ट्रभाषा कोविद, राष्ट्रभाषा रत्न, राष्ट्रभाषा आचार्य आदि परीक्षाएं इसके द्वारा आयोजित होती है। यह समिति देश एवं विदेश में हिन्दी प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान कर रही हैं। वर्धा समिति के तत्वाधान में ‘राष्ट्रभाषा' नाम से एक मासिक पत्रिका प्रकाशित होती है जिसमें राष्ट्रभाषा से सम्बन्धित विचारों को प्रकाशित किया जाता है, साथ में परीक्षा से सम्बन्धित विवरण भी उपलब्ध रहता है। यहाँ पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। अनुवाद की व्यवस्था भी यहाँ की मुख्य विशेषता है। असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी की स्थापना सन् 1938 में गोपीनाथ बरलै जी के आग्रह में असम हिन्दी प्रचार समिति नामक संस्था के तत्वावधान में हुआ था। यहाँ पर छः प्रकार की परीक्षाओं (परिचय, प्रथमा, प्रवेशिका, प्रबोध, विशारद और प्रवीण) का आयोजन होता है। यहाँ पर पुस्तकों के छपने की व्यवस्था है तथा एक समृद्ध पुस्तकालय भी है। त्रैमासिक पत्रिका ‘राष्ट्रसेवक' का प्रकाशन भी होता है। ओड़िया राष्ट्रभाषा परिषद, पुरी की स्थापना अनुसूया प्रसाद पाठक तथा रामानंद शर्मा के प्रयास से हुई। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की सहायता से सन् 1954 तक कार्यरत रही। इसके बाद इसका अलग अस्तित्व हो गया। आदिवासी एवं अहिन्दी भाषी लोगों को हिन्दी सीखाना इसका प्रमुख लक्ष्य था। इसके द्वारा प्राथमिक, बोधिनी, माध्यमिक, विनोद, प्रवीण और शास्त्री परीक्षाएं ली जाती हैं। इस संस्था के माध्यम से हिन्दी विश्वविद्यालय भी चल रहे हैं। यह संस्था आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, असम आदि राज्यों में भी हिन्दी प्रचार का कार्य करती है। परिषद के अधीन कई समृद्ध बड़े-छोटे पुस्तकालय भी हैं। कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति-बेंगलूर की स्थापना सन् 1952 ई. में माता आऊबाबाई तथा शिवानंद स्वामी ने किया। इसके द्वारा परीक्षाओं का आयोजन (प्रथमा, मध्यमा, उत्तमा, हिन्दी भाषा-भूषण, हिन्दी भाषा प्रवीण) होता है। इस संस्था के अन्य आकर्षण साहित्य सृजन, प्रकाशन, हिन्दी भाषण प्रतियोगिता का आयोजन, नाटक, मंचन, कला प्रदर्शनी है। इस संस्था की एक विशेषता यह है कि यहाँ के सभी पदाधिकारी महिलाएं हैं परन्तु कार्यक्षेत्र का दायरा विस्तृत है। केरल हिन्दी प्रचार सभा, तिरुवन्तपुरम सन् 1934 ई. में के. वासुदेवन पिल्ले द्वारा की गई। यह संस्था स्वयं अपनी परीक्षाओं (हिन्दी प्रथमा, हिन्दी प्रवेश, हिन्दी भूषण, साहित्यचार्य) का आयोजन करती है। इसका प्रमुख कार्य हिन्दी की प्रगति एवं समृद्धि से है। यहाँ पर विद्यालय/महाविद्यालयों के साथ ही एक समृद्ध पुस्तकालय भी है। इस सभा की ‘केरल ज्योति पत्रिका' भी निकलती है। कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना 1949 में हुई। यह समिति परीक्षाएं (राजभाषा-हाईस्कूल, राजभाषा प्रकाश-इन्टर, राजभाषा विद्वान-
बी.ए.) भी आयोजित करती है। यहाँ पर पचास हिन्दी विद्यालय खोले गये, जिसमें प्रारम्भिक तथा उच्चतर हिन्दी शिक्षा की व्यवस्था है। कर्नाटक दर्शन, कर्नाटक साहित्य का इतिहास आदि पुस्तकों का प्रकाशन भी किया गया है। त्रैमासिक पत्रिका ‘भाषा पियूष' का प्रकाशन भी किया जाता है। मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद, बैंगलूर की स्थापना सन् 1934 ई. में हुई। इस परिषद के प्रमुख आकर्षण हिन्दी तथा प्रांतीय भाषाओं में पारस्परिक आदान-प्रदान को बढ़ाने के साथ-साथ अहिन्दी भाषियों में हिन्दी का प्रचार करना और हिन्दी साहित्य के प्रति उनमें रुचि पैदा करना है। इस परिषद के द्वारा ‘हिन्दी प्रवेश, हिन्दी उत्तमा और हिन्दी की परीक्षाएं' आयोजित होती हैं। इसकी अपनी मासिक पत्रिका भी निकलती है। मद्रास-दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना सन् 1918 ई. में (एनीबेसेन्ट और सी. पी. रामास्वामी की अध्यक्षता) की गई। सभी को पांच शाखाएं धारवाड़, दिल्ली, हैदराबाद, एरणाकुलम्, त्रिचुरापल्ली में स्थापित की गई। प्रवेशिका विशारद और प्रवीन इस संस्था की उच्चस्तरीय परीक्षाएं हैं। इस सभा के द्वारा हिन्दी प्रचार-प्रसार समाचार और मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। यहाँ पर शोध संस्थान भी हैं। बम्बई-हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की स्थापना हिन्दी-उर्दू के संघर्ष समाप्त करने के लिये महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1918 ई. में हुई। इस प्रचार सभा के द्वारा प्रवेश, लिखावट, पहली, दूसरी, तीसरी, काबिल और विद्वान आदि परीक्षाओं का आयोजन होता है। यहाँ पर ‘पर्सियन लिपि' को सिखाने की व्यवस्था भी है। यह सभा हिन्दुस्तान जबान त्रैभाषी, द्विभाषी मासिक पत्रिका भी प्रकाशित करती है। गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद की स्थापना 18 अक्टूबर, 1920 ई. को हुई। विद्यापीठ द्वारा हिन्दी तीसरी, हिन्दी विनीत एवं हिन्दी सेवक परीक्षाएं संचालित होती हैं। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे की स्थापना काका साहब कालेलकर की अध्यक्षता में सन् 1937 ई. में ‘महाराष्ट्र महासभा' के रूप में अस्तित्व में आई। इस सभा के द्वारा (प्रवेश-हाईस्कूल, प्रवीण इण्टर तथा पंडित बी. एड.) परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। बम्बई, हिन्दी विद्यापीठ, बम्बई की स्थापना 12 अक्टूबर 1938 में हुई। इसका प्रमुख आकर्षण पाठ-पुस्तकों का प्रकाशन, प्रचार परीक्षाओं के परीक्षा केन्द्रों का निर्धारण आदि से है। विद्यापीठ के द्वारा (हिन्दी उत्तमा-मैट्रिक, हिन्दी भाषा रत्न को इण्टर, साहित्य सुधारक-बी.ए.) परीक्षाओं का आयोजन भी होता है। इसका अपना प्रकाशन विभाग भी है, साथ में एक समृद्ध पुस्तकालय भी है। देवधर-हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना देवनागरी लिपि तथा हिन्दी भाषा के विकास तथा राष्ट्रीय भावनाओं के विकास हेतु सन् 1929 ई. में हुई। विद्यापीठ के विद्यालय में गणित, तेलगू, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास विषयों का समायोजन है। यहाँ शिक्षा की प्रारम्भिक से लेकर महाविद्यालय तक की व्यवस्था है। इसका अपना समृद्ध पुस्तकालय भी है। हैदराबाद हिन्दी प्रचार-सभा, हैदराबाद की स्थापना सन् 1932 ई. में हुई। इसके अपने शिक्षण संस्थान हैं। इस सभा के द्वारा विशारद, भूषण तथा विद्वान की परीक्षाओं का आयोजन होता है। इस सभा में परास्नातक स्तर के अध्ययन की सुविधा दी गई है। यहाँ अनुवाद (तेलगू, मराठी, संस्कृत एवं कन्नड़ भाषाओं की हिन्दी में और हिन्दी की पुस्तकों को प्रादेशिक भाषाओं तेलगू, उर्दू, मराठी आदि) की सुविधा भी है। अखिल भारतीय हिन्दी संस्था संघ की स्थापना सन् 1964 ई. में दिल्ली में हुई। इसका प्रमुख उद्देश्य प्रान्तों एवं क्षेत्रों में कार्यरत संस्थाओं की मदद करना है। अखिल भारतीय हिन्दी संघ के द्वारा सम्पूर्ण भारत की स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं के कार्यकलापों का अध्ययन के साथ उनकी समस्याओं का अध्ययन करना है। इसके लिये यह संघ उसका समाधान भी खोजता है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार कैसे हो, साथ ही योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु क्षेत्रीय हिन्दी प्रचारकों, कार्यकर्ताओं के शिविरों का आयोजन भी किया जाता है। इसके बाद शिविरों के माध्यम से हिन्दीकर्ताओं को अखिल भारतीय स्तर पर जोड़ा जाता है। इसके बाद यह संघ देश के सभी हिन्दी विद्वानों को भाषणों के जरिये परिचय करवाता है, साथ ही उन्हें सद्भावना यात्रा हेतु यात्राओं में सम्मिलित करवाने की व्यवस्था भी करवाता है। सभी स्वैच्छिक संस्थाओं के कार्यों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास यह संघ करता है। संघ का सबसे महत्वपूर्ण कार्य हिन्दी से इतर लेखकों की पुस्तकों की प्रदर्शनी का आयोजन कराना है। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि इन स्वैच्छिक हिन्दी संस्थानों ने राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में मील के पत्थर का कार्य किया है और हिन्दी भाषा का एक नया वातावरण भी निर्मित किया है और हिन्दी भाषा में दलित ऊर्जा/वंचित वर्ग की ऊर्जा को शामिल कर एक नया प्रतिमान हासिल किया है। आज हिन्दी की सूरत व सीरत बदली है। जनभाषा के रूप में हिन्दी का भविष्य उज्जवल है।
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श्ौक्षणिक गतिविधियों से जुड़े युवा साहित्यकार डाँ वीरेन्द्रसिंह यादव ने साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा पर्यावरर्णीय समस्याओं से सम्बन्धित गतिविधियों को केन्द्र में रखकर अपना सृजन किया है। इसके साथ ही आपने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। आपके सैकड़ों लेखों का प्रकाशन राष्ट्र्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। आपमें प्रज्ञा एवम प्रतिभा का अदभुत सामंजस्य है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी एवम पर्यावरण में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानों से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
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सम्पर्क -
-डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
वरिष्ठ प्रवक्ता ः हिन्दी विभाग दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय; उरई-जालौन (उ0प्र0)-285001 भारत
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महात्मा गांधी का आलेख : जन-समाज को शिक्षित करने वाला साहित्य
मेरे जैसे मजदूर के विचार में तो हमारा काम प्रभु को पहचानना है। प्रभु की अवज्ञा करके हम धन की पूजा करने लगे हैं, स्वार्थ साधन में निरत हो गए हैं।
मैं साहित्य रसिकों से पूछता हूँ कि आपकी कृति के सहारे मैं शीघ्र ही प्रभु के पास पहुँच सकता हूँ या नहीं ? यदि वे मुझे इसका उत्तर हां में दें, तो मैं उनकी कृति से बंध जाऊंगा। यदि मैं किसी साहित्यकार की रचना से उकता जाता हूँ, तो इसमें मेरी बुद्धि का दोष नहीं है, दोष उसकी कला का है। शक्तिवान साहित्यकार को अपनी कला को कम-से-कम इतना विकसित तो करना ही चाहिए कि पाठक उसे पढ़ने में लीन हो जाए। मुझे खेद है कि हमारे साहित्य में यह बात बहुत कम दिखाई देती है। हमारा साहित्य इस समय ऐसा है कि उसमें से जनता एकाध वस्तु भी ग्रहण नहीं कर सकती। उसमें एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिससे वह एक युग, एक वर्ष अथवा एक सप्ताह तक भी टिक सके।
अब हम यह देखें कि अनादिकाल से हमारे पास जो ग्रंथ चले आ रहे है, उनमें कितना साहित्य है ? हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों से हमें जितना संतोष मिलता है, आधुनिक साहित्य से उतना नहीं मिलता। इस साहित्य के मामूली-से-अनुवाद में भी जो रस आ सकता है, वह आज के साहित्य में नहीं आ पाता। यदि कोई कहे कि आधुनिक साहित्य में बहुत कुछ है, तो हम इसे स्वीकार कर सकते हैं, किंतु इस बहुत कुछ को खोज निकालने में मनुष्य थक जाता है। तुलसीदास और कबीर जैसा साहित्य हमें किसने दिया है ?
जा विधि भावे ता विधि रहिए।
जैसे तैसे हरि को लहिए।।
ऐसी बात तो आजकल हमें दिखाई ही नहीं देती। आज के युग में हमें जो कुछ प्राप्त हुआ, वह अब कहाँ हो सकता है ?
बीस वर्ष दक्षिण अफ्रीका में रहने के बाद में भारत आया और मैंने देखा कि हम डरे-डरे जीवन बिता रहे हैं। भयभीत होकर जीने वाला अपने भावों को निर्भयता से प्रकट ही नहीं कर सकता। यदि किसी दबाव में पड़कर हम लिखते है, तो उसमें से कवित्य की धारा नहीं फूटती और उसकी लहरों पर सत्य तिरता हुआ नहीं आ पाता। समाचार पत्रों के संबंध में भी यह बात लागू होती है। जहाँ सिर पर प्रेस अधिनियम झूल रहा हो, वहाँ संपादक बिना पशोपेश के नहीं लिख सकता। साहित्य रसिकों के सिर पर भी प्रेस अधिनियम झूल रहा है और इसलिए एक पंक्ति भी मुक्त भाव से नहीं लिखी जाती और इसी कारण सत्य को जिस तरह से प्रस्तुत करना चाहिए, वह उस तरह नहीं किया जाता।
हिन्दुस्तान में इस समय संक्रातिकाल है। करोड़ों व्यक्तियों को अनुभूति हो रही है कि हमारे यहां बड़े-बड़े परिवर्तन होने वाले हैं। हमारी दरिद्रावस्था मिट जाएगी और समृद्धि तथा वैभव का युग आएगा। हमें अब सत्ययुग की झांकी मिलेगी। मैं स्थान-स्थान पर ऐसे उद्गार सुनता हूं। कितने ही लोग यह समझे रहे है कि अब हिन्दुस्तान के इतिहास का एक नवीन पृष्ठ खुलने जा रहा है। यदि हिन्दुस्तान के इतिहास का नवीन पृष्ठ खुलने वाला है, तो हमें उस पर क्या लिखा हुआ मिलेगा ? यदि हमें सुधार लिखे मिले, तब तो यह गले में पट्टा डालने के समान होगा और जैसे हम आज बैल को हांक जाते है, वैसे ही हांके जाएँगे। इसी तरह साहित्य की सेवा करने वालों से मैं तो यही मागूँगा कि वे हमें ईश्वर से मिलाएँ, सत्य के दर्शन कराएँ। हमारे साहित्य सेवकों को यह बात सिद्ध कर देनी चाहिए कि हिन्दुस्तानी पापी नहीं है, वह धोखाधड़ी करने वाला देश नहीं है। पोप-'इलियड' के रचियता-ने दक्षिण प्रांत की जो सेवा की है, वैसी सेवा किसी मद्रासी ने भी की है। मैं तो प्रेम रंग में डूबा हुआ हूँ और प्रत्येक मनुष्य का हृदय चुरा लेना चाहता हूँ दक्षिण प्रांत के भाइयों का हृदय चुराने के लिए मुझे उनकी भाषा सीखनी पड़ी। रेबरेंड पोप ने जो रचनाएँ दी हैं, उनमें से इस समय तो मैं कुछ उदृत नहीं कर सकता, लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि तमिल में लिख गई वे रचनाएँ, जिन्हें खेत में पानी देता हुआ किसान भी दुहरा सकता है, अलौकिक है। सूर्योदय के पहले ही खेत में पानी देना प्रारंभ कर दिया जाता है।
बाजरा, गेहूँ, आदि सब पर ओस के मोती बिखरे हुए होते है। पेड़ों के पत्तों पर से झरता हुआ पानी मोती के समान लगता है। ये व्यक्ति, खेत में पानी देने वाले ये किसान, उस समय कुछ ऐसी ही गाते हैं। मैं जब कोचरब में रहता था, तब खेत में पानी देने वाले किसानों को देखता और उनकी बातें सुनता, लेकिन उनके मुँह से तो अश्लील शब्द ही निकलते थे। इसका क्या कारण है ? इसका उत्तर मैं यहीं बैठे हुए श्री नरसिंहराव तथा अध्यक्ष महोदय से पाना चाहता हूँ।
साहित्य परिषद से मैं कहूँगा कि खेतों में पानी देने वाला इन किसानों के मुँह से अपशब्दों का निकलना हटाएँ, नहीं तो हमारी अवनति की जिम्मेदारी साहित्य परिषद के सिर पर होगी। साहित्य के सेवकों से मैं पूछना चाहूँगा कि जनता का अधिकांश भाग कैसा है और आप उसके लिए क्या लिखेंगे ? साहित्य परिषद से भी यही कहूँगा कि परिषद में जो कमियां है उन्हें वह हटाए।
लुई के मन में पुस्तक लिखने का विचार आया तो उसने अपने बच्चों के लिए पुस्तकें लिखीं। उसके बच्चों ने तो उनका लाभ उठाया ही, आज के हमारे स्त्री, पुरूष तथा बालक भी उनसे लाभ उठा रहे हैं। मैं अपने साहित्य लेखकों से ऐसा ही साहित्य चाहता हूँ। मैं उनसे बाण भट्ट की 'कादम्बरी' नहीं, 'तुलसीदास की रामायण' माँगता हूँ। 'कादम्बरी' हमेशा रहेगी अथवा नहीं, इसके विषय में मुझे शंका है, लेकिन तुलसीदास का दिया हुआ साहित्य तो स्थायी है। फिलहाल साहित्य हमें रोटी, घी और दूध ही दे, बाद में हम उसमें बादाम, पिस्ते और मिलाकर 'कादम्बरी' जैसा कुछ लिखेंगे।
गुजरात की निरीह जनता, माधुर्य से ओतप्रोत जनता, जिसकी सज्जनता का पार नहीं है, जो अत्यधिक भोली है और जिसे ईश्वर में अखंड विश्वास है, उस जनता की उन्नति तभी होगी, जब साहित्य सेवक किसानों, मजदूरों तथा ऐसी ही अन्य लोगों के लिए काव्य रचना करेंगे, उनके लिए लिखेंगे।
(महात्मा गांधी का गुजरात साहित्य परिषद में दिया भाषण जो हरिजन के 4.4.1920 अंक में छपा।)
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प्रस्तुति : यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,
जयपुर-302002 फोनः-2670596
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24 सितम्बर 2009
अशोक गौतम का व्यंग्य : मोहे अंग्रेजी दीजौ!
आप हों या न हों, होने के बाद भी खुल कर कह सकते हों या न ,पर मैं सरेआम कहता हूं कि मैं साहब भक्त हूं। इस लोक में तो इस लोक में, तीनों लोकों में कोई एक भी ऐसे बंदे का नाम बता दें जो आज तक साहब भक्ति के बिना भव सागर तो भव सागर एक छोटा सा सूखा नाला भी पार कर पाया हो तो उसके जूते पानी पीऊं। क्या है न साहब कि तीनों लोकों में ईश्वर भक्ति के बिना मुक्ति संभव है पर साहब भक्ति के बिना जो मुक्ति के द्वार खुद की मेहनत से खोलने के मुगलाते में हैं उनसे बड़ा गधा शायद ही कहीं देखने को मिले।
साहब भक्ति में लीन साहब के आदेशों का पालन करते हुए कल सुबह साहब के कुत्ते के साथ सुबह की सैर पर निकला था कि सामने से भगवान आते दिखे पर मैंने कोई रीसपांस नहीं दिया। क्या करना उन्हें प्रणाम कह कर जब मेरे पास उनसे अधिक शक्तिशाली बंदा है। मैंने भगवान को प्रणाम नहीं किया तो बेचारों ने खुद ही मुझे प्रणाम करते कहा,‘ प्रणाम साहब के पट्ठे।' फिर एक हाथ अपनी कमर पर धरा।
‘हूं , कहो क्या हाल है? ठीक ठाक से तो हो न?' हालांकि साहब का टामी मुझे वहां रूकने देना नहीं चाहता था, शायद उसे अपनी प्रेमिका से मिलने की जल्दी थी। पर मैं चलते चलते वह रूक गया।
‘कहां यार! सारा दिन पुजारी द्वारा धमकाए जाने पर सोने के पानी वाली लोहे की चौकी में इकतरफा बैठ बैठ कर दर्द हो गई थी सो सोचा कि जरा घूम आऊं जब तक पुजारी मंदिर के द्वार खोलता है। पर तुम पत्नी के बदले इस कुत्ते के साथ घूमने निकले हो? आज की भाग दौड़ की जिंदगी में एक ये ही तो आज के लोगों के पास क्षण बचे हैं जब पति पत्नी आपस में बतिया लेते हैं। '
‘ यार भगवान रह गए न भगवान के भगवान ही। घरवाली के साथ इतने सालों तक घूमा, क्या मिला! आप क्या चाहते हो कि सुबह सुबह भी मेरी शांति भंग हो!'
‘ और ये कुत्ता क्या दे रहा है तुम्हें?? '
‘कम से कम किसी चीज की मांग तो नहीं कर रहा है। मेरे साथ देखो कितनी शान से इतरा रहा है। जब घर जाकर साहब को मेरी भक्ति की रिपोर्ट देगा तो साहब मुझे शाबाशी देंगे।' कह मैंने साहब की पुरानी पहनी शर्ट के कालर खड़े कर दिए।
‘ जो कुत्ते आदमी को अपने साथ घुमाने ले जाने का माद्दा रखते हों वे शान से इतराएगें नहीं तो क्या रोएंगे?' यार भगवान! पुजारी का गुस्सा मुझपर क्यों निकाल रहे हो? मैं डरा भी अगर कुत्ता सब समझ गया तो गया अपना सारा रौब पानी में। पर तभी याद आया कि साहब ने एक दिन बताया था कि टामी हिंदी नहीं समझता। अगर कोई जरूरत पड़े तो थोड़ी सी अंग्रेजी सीख लेना। उसे भी गर्व होगा कि साहब के सरकारी नौकर भी पढ़े लिखे हैं। नहीं तो उसके सामने चुप ही रहना। मैं नहीं चाहता कि टामी टामी से टुम्मु हो जाए। मैंने कुत्ते का मन रखने लिए यों ही कह दिया,‘ गुड,गुड! वैरी गुड!!' तो कुत्ता भगवान के साथ मुझे अंग्रेजी में बतियाते देख मुस्कुराया।
‘ये गुड़ गुड़ क्या कर रहा है यार?' भगवान पसोपेश में,‘ ये गुड़ गुड़ चर्च में जाकर करना। यहां तो हिंदी में बात कर। मैं भगवान हूं ईसा मसीह नहीं।'
‘ एक बात पूछूं भगवान?'
‘पूछो।'
‘मेरा भला चाहते हो?'
‘मैंने तो आजतक अपने हर भक्त का भला ही चाहा है चाहे उसने मुझे खोटा सिक्का ही क्यों न चढ़ाया हो।'
‘तो मुझे वरदान दो कि मैं वैसे ही अँग्रेजी बोलने लग जाऊं जैसे जन्मों का गूंगा हिंदी बोलने लग जाता है।'
‘पर तुम तो चार फेल हो।'
‘भगवान क्या नहीं कर सकते?'
‘ तो इससे क्या होगा?'
‘साहब के कुत्ते के साथ मुझे ही रख लिया जाएगा। क्योंकि उन्हें कुत्ते के साथ ऐसा सरकारी नौकर चाहिए जो उसके साथ अंग्रेजी बोल सके। फिर मेरे मजे ही मजे।'
‘हिंदी कह कर अपने साथ रहना नहीं चाहोगे?'
‘हिंदी के साथ तो हिंदी वाले हिंदी दिवस के दिन भी नहीं होते। तो देते हो वरदान कि... समझूं अब तुम भी असरहीन हो गए हो??' और भगवान को न चाहते हुए भी कहना ही पड़ा,‘तथास्तु!!'
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अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि0प्र0
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राजनारायण बोहरे की कहानी : विश्वास

बाबू हरकचंद का ज़िंदगी भर का विश्वास एकाएक ढह गया।
वे जब से म्युनिसपिल कमेटी की नौकरी में आये थे, ऐसा कभी नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी शान से गुजारी है। बाज़ार में कभी किसी व्यापारी ने उनकी बात नहीं टाली। लेकिन आज सेठ गहनामल ने उनके विश्वास को एक ही झटके में गहरे से तोड़ दिया।
जब उनकी म्युनिसिपिल-कमेटी के पास नाके लगाने का अधिकार हुआ करता था तब कमेटी में हरक चंद जी ऐसी कुरसी पर थे कि वे नाकेदारों के कामकाज पर सीधे निगाह रखते थे। महसूल वसूली का काम उनके ही पास था। इसी वजह से क़स्बे के सारे व्यापारी उनका ख़ास ख़्याल रखा करते थे। उनने भी इस क़स्बे के हर व्यापारी पर खूब अहसान किये हैं।
चोरी -छिपे पूरा ट्रक भरके माल ले आये दुकानदारों को फाइल से उनने वे कागज- पत्तर कई बार बताए हैं, जिनके कारण दुकानदारों पर हजारों रूपया महसूल लग सकता था। जानकारी मिल जाने पर दुकानदारों ने कागज-पत्तर में लिखी चीजें अपने यहां दर्ज करलीं। सो दुकानदारों के हजारों रूपये बच गये, पर बदले में हरक बाबू ने कभी किसी से कोई अपेक्षा नहीं की। जिसने जो दिया प्रेम से ले लिया।नहीं दिया तो भी कोई पच्चड़ नहीं की। हां , इन सब कामों की वज़ह से बाज़ार में उनका इतना सम्मान जरूर था कि वे यदा-कदा बाजार से निकलते, दुकानदार उन्हे आवाज़ देकर बुला लेता और खूब मान देता। खुद उठ के उन्हे अपनी गद्दी पर बिठाता और नाश्ता-चाय-पान के बिना आने न देता। वे जब घर-गृहस्थी की कोई चीज़ खरीदते, मुंह से मांग के कोई उनसे सामान का मोल न लेता फिर भी वे न मानते , कम-ज्यादा थोड़े बहुत दाम देकर ही उठते।
कुछ बरस पहले सरकार ने सड़क यातायात को बिना बाधा चलने देने के लिये जब कुछ सुधार किये , तो सबसे पहले म्युनिस्पिलटी के नाके बंद कर दिये। अब सरकार को क्या पता कि म्युनिसपिल कमेटी के लिए नाके कितने जरूरी है ? जरूरी क्या हरक बाबू यह मानते हैं कि वे तो प्राणवायु थे, इन कमेटीयों के लिए। नाके क्या बंद हुये, नगरपालिका वालों के दिन फिर गये। बुरे दिन आ गये - कर्मचारियों के भी और संस्थाओं के भी।
नाकेदारों और किरानीयों के सारे ज़लवे खत्म हो गये। पहले बज़ट कम होना शुरू हुआ फिर दफ्तर में दरिद्रता के नजारे प्रकट हुये-घिसे-पुराने परदे, फटे-मेजपोश ,आधा-अधूरा उज़ाला और दिन में आने वाली चाय के घटते कपों से बाहर के लोग भी अंदाज़ा लगाने लगे कि म्युनिसपिल कमेटी की माली हालत इन दिनों पतली हो चली है। फिर तनख्वाह बंटना अनियमित हुआ , और वेतन न मिलने का क्रम कई-कई माह तक चलने लगा।
भीतर-ही-भीतर हरकचंद ने अनुभव किया कि वे दुकानदार जो हरकचंद को अपना परिजन औेर आदरणीय माना करते थे , यकायक उनसे कन्नी काटने लगे हैं। चाय-पान की दुकान पर कोई व्यापारी खड़ा होता और हरकचंद वहां पहुंच जाते ,तो वहां खड़ा आदमी आंख बचा के वहां से खिसक लेता। रास्ते में आते-जाते भी व्यापारी यह कोशिश करते कि हरकचंद से दुआ-सलाम न करना पडे़ या तो मुंह फेर के खड़े हो जाते ,या वहां से दबे पांव किसी गली में खिसक लेते। जैसे नमस्कार कर लेने से कुछ घट जायेगा या लेना-देना पड़ जायेगा।
वे घर के लिए कोई ज़रूरी सामान खरीदने किसी दुकान पर अब जाते, तो दुकानदार नमस्कार तो करता , पर उनसे कभी बैठने या चाय-पानी लेने का आग्रह न करता। वे जो चीज़ ख़रीदना चाहते या तो सीधे-सीधे दुकानदार बाज़ार रेट से ज़्यादा क़ीमत बताता, या कह देता कि फलां चीज तो मेरे पास घटिया दरजे की है , आपके लायक नहीं है। मजबूर हरकचंद वह चीज़ दुकानदार के बताये ऊंचे दाम में खरीद लाते। सौदेबाजी या मोलभाव उनने जिन्दगी में कभी नहीं किया था ,दुकानदार खुद ही पहले उन्हे बाज़बी दाम लेकर चीजें देते रहे थे, सो वे अब भी उनसे मोलभाव नहीं करते थे। लेकिन चीजें महंगी आती तो घर पर पत्नी चिनमिन करने लगती थी। व्यापारियों का बदला हुआ रूप देख कर हरकचंद को बड़ा दुख हुआ-जिनके लिए वे रात दिन चिन्ता करते रहे, जिनके लिए अपने विभाग से उन्होने विश्वासघात किया, वे लोग भी इस तरह आंख फेर लेंगे,उन्हें ऐसी आशा न थी।
नगरपालिका का बज़ट घटा तो विकास कार्य प्रभावित हुए ,नेता जागे। उनने फिर से नाके खोले जाने या म्युनिस्पिल कमेटी को ज़्यादा बजट देने की मांग की। नेताओं और संस्थाओं की तमाम लिखा-पढ़ी के बाद राजधानी ने नगरपालिकाओं की फरियाद सुनी। फाइलें पहले धीमें चली , फिर दुलकी चाल चलीं, और यह खबर जब कस्बों-तहसीलों में स्थित कमेटियों तक पहुंची तो वहां से जीवनीशक्ति आना शुरू हुयी और फाइलें दौड़ने लगीं। बाद में तो ज़रूरत पड़ने पर फाइलों ने हवाई सफर भी किया। अंततः कमेटियों को दुबारा महसूल वसूलने की ताकत दे दी गयी। कमेटियों में ज़ोश जाग उठा।
हालांकि कमेटियों को सिर्फ आयात-निर्यात शुल्क वसूलने की छूट मिली थी। निर्देश आये थे, कि वे नाका लगा दें पर किसी वाहन को रोकें नहीं, व्यापारी स्वयं आकर जानकारी देगा। धीरे-धीरे काम शुरू हुआ, मंडी से बाहर जाने वाले माल की जानकारी से लेकर, फैक्ट्रीयों से भेजे गये माल की भी जानकारियां, प्रायः कमेटी में आने लगीं, और हरकचंद ने देखा कि व्यापारियों को भूले-बिसरे संबंध याद आने लगे। अब वे हरकचंद को दुबारा अपना आदमी मानने लगे। फिर वैसा ही मान-सम्मान और फिर वैसे ही संबंध दिखने लगे थे। वे फिर से आत्मीय हो गये। अब वे भूले -भटके किसी दुकान पर पहुंच जाते, तो दुकानदार उनका मांगा हुआ माल बाद में देते , चाय-पानी से सत्कार पहले करते।
हरकचंद मन के बड़े साफ थे , उनने बीच के समय में आयी दुकानदारों की बेरूख़ी और अपरिचय को भुला दिया और फिर से सामान्य हो कर जीने लगे। सबकी तरह नगरसेठ गहनामल भी जो पिछले कई दिनों से हरकचंद को भुला चुका था, अब ज्यादा आत्मीयता से हरकचंद से मिलने लगा। वे जहां भी दिख जाते, गहनामल उनके गले लग-लग जाता,उन्हे खूब सम्मान देता। हरक चंद ने अनुभव किया कि इसका कारण शायद वे कई-कई किराना ,कपड़ा , और कनफैक्शनरी की दुकानें हैं, जो अपनी जेवर दुकान के अलावा गहनामल के परिजनों ने पिछले दिनों खोली हैं , और जिनमें बिना हिसाब-किताब का अनाप-शनाप माल दूसरे प्रदेश से आता रहता है। दूसरा कारण तो गहनामल का शायद वह कारखाना भी होगा ,जो रोज के रोज ढेरों जालियां ,दरवाजे , खिड़की वगैरह लोहे का सामान उगलता है ,और जिसे प्रतिदिन मैटाडोर-टैम्पो में भर के प्रदेश के बाहर भेजा जाता है। लेकिन सब कुछ जानते-बूझते भी हरकचंद ने अपने मन में कोई बात नहीं रखी और वे पूर्ववत गहनामल समेत सबसे प्रेम से मिलने लगे।
अचानक फिर व्यवस्था बदली , और प़द्धति में परिवर्तन आया। खेत में खड़े बिजूका से वे बेजान नाके भी हट गये। योंकि अब महसूल फिर से दुकानदारों की दया पर निर्भर हो गया था सो व्यापारियों का व्यवहार भी बदलने लगा था। बस कुछ दिन पहले की ही बात है यह।
तभी यह घटना घटी।
उनके ऑफिस में कई सालों से यह परंपरा थी ,कि दीपावली के त्यौहार के उपलक्ष्य में पूरे स्टाफ को चांदी के सिक्के उपहार में दिये जाते थे। ये सिक्के पहले तो कमेटी के कमाऊ-पूत नाकेदारों से अनुदान वसूल कर बाजार से क्रय किये जाते थे , फिर नाके बन्द हुए और नाकेदार कमजोर हो गये तो उनने हाथ उठा दिये। इस कारण अभी बाद के बरसों में स्टाफ के सब लोग मिलजुलकर कुछ चन्दा इकट्ठा करने लगे थे, और उस एकत्र धन में से एकमुश्त चांदी के सिक्का खरीद लाया करते थे। इस महीने दिवाली का त्यौहार था। दीपावली की अमावस्या महीने के आखिरी सप्ताह में पड़ रही थी ,और म्युनिस्पिल-कमेटी घाटे में थी, सो किसी कर्मचारी को एक तारीख को तनख्वाह नहीं मिल सकी। अब स्थिति यह बनी, कि बीते हुए कल को यह सिक्के बंटना थे और उस दिन किसी की गांठ में फूटी-कौड़ी तक न थी , सो सब चिंतित थे। तब किसी ने सलाह दी ,कि फिलहाल गहनामल की दुकान से उधारी में सिक्के उठवा लिये जायें और उपहार समारोह संपन्न कर लिया जाये। बाद में जब तनख्वाह आ जायेगी तो उधारी चुक जायेगी। अब समस्या यह थी, कि गहनामल के पास उधारी का संदेश कौन भेजे ? सबने एक मत से निर्णय लिया कि बाबू हरकचंद ही अपने नाम से यह संदेश भेजें , तो बाबू हरक चंद ने चपरासी मुन्नालाल को सिक्के लेने गहनामल की दुकान पर भेज दिया था। हालांकि हमेशा की तरह यूनियन सेक्रेटरी सिंग बाबू ने इस बात का विरोध किया था कि कर्मचारियों के किसी सार्वजनिक काम में किसी व्यापारी का अहसान क्यों लिया जाये। लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी , और मुन्ना चपरासी को भेज दिया गया।
मुन्नालाल उल्टे पांव वापस लौटा। हैरानी से सबने पूछा-काहे मुन्ना, क्या हुआ भाई !
मुन्ना बहुत नाराज था , बोला-‘आयंदा कृपा करना। मुझे अपनी बेइज़्ज़ती कराने वहां मत भेजना। पचास ग्राहकों के सामने गहनामल ने सिक्के देने से साफ इन्कार कर दिया। बोले , हमारे यहां उधार नहीं मिलता !‘
हरकचंद को काटो तो खून नहीं। भला ऐसा कैसे संभव है ! उनने असमंजस की मानसिकता में गहनामल के यहां फोन लगाया। फोन पर गहनामल ही मिले। ताज्जुब , कि फोन पर भी उनका यही जवाब था-‘माफ करना यार ,अपन ने उधारी बंद कर दी है।‘
हरकचंद ने समझाने की कोशिश की-‘अरे यार कौन साल दो-साल के लिये उधारी करना है ,दो-तीन दिन में सारा रूपया चुका देंगे। न हो तो मेरे नाम से लिखलो तुम ये रकम। मुझ पर तो विश्वास है न !‘
पर गहनामल साफ नट गया ‘क्षमा करना भाई ,हमने तय किया है कि उधार करना ही नहीं है।‘
यह सुनकर बाबू हरकचंद को करारा झटका लगा। वे खड़े न रह सके, टेलीफोन रखके पास रखी कुरसी पर बैठ गये।
सिंग बाबू बगल में खड़े थे , वे सारा माज़रा समझ गये। उनने चपरासी से पानी मंगाया और हरक बाबू से बोले -‘छोड़ो ये उपहार-पुपहार का झमेला। मैं तो बहुत पहले से कह रहा हूँ कि इस तरह चन्दा करके आपस में सिक्के बांट लेना बिलकुल उचित नहीं है। काहे का उपहार है यह ! ये तो वो ही किस्सा हुआ कि कोई बूढ़ा शेर किसी सूखी हड्डी को चचोर के अपना खून निकाल ले और खून के खारे पन में उसी सूखी हड्डी से निकले खून के स्वाद की कल्पना करके व्यर्थ ही खुश होता रहे। और दिल छोटा मत करो, हो सकता है गहनामल तुम्हारी आवाज पहचान न पाया हो।‘
बाबू हरक चंद का मन पहले तो झटके से बुझ सा गया था ,लेकिन अब सिंग की इस बात ने उन्हे बड़ा दिलासा दिया। उनने शांति से ठण्डा पानी पिया और चुप बैठ गये।
कार्यालय के दूसरे लोग सक्रिय हुए। पता नहीं कहां से कैसे बंदोबस्त हुआ , पर शाम तक सिक्के भी आ गये और बाकायदा बांट भी दिये गये। हरकचंद शाम को घर लौटे तो उनका उदास चेहरा देख के ,पड़ोसिनों से घिरी बैठी पत्नी तत्परता से उठके उनके पास आ गयी-‘काहे विनोद के पापा ,क्या हुआ ?‘
-‘कुछ नहीं ‘वे उदास बने बोले।
-‘नहीं कुछ तो हुआ है। आप ऐसे कभी नहीं रहते। गली में घुसते ही मोहल्ले पड़ौस के लोगों से बोलते-बतियाते घर आते हो और आज सूटमंतर बने चले आये। तुम्हें हमारी सोंह, सही बताओ ! क्या हुआ ?‘
मजबूर हरकचंद ने गहनामल वाली घटना सुनाई और रूआंसे हो के बोले-मुझे गहनामल के बदल जाने का दुःख नही है ,बस तक़लीफ इत्ती-सी है कि जिस रोजी-रोटी से हमारे पेट भरते हैं, हमने इन टुच्चे व्यापारियों के लिये बिना किसी बड़े लालच के, उसी से दग़ा की।‘
-‘काहे की दगा ? अरे आपने कौन कमेटी का लाख दो-लाख का हरजाना कर
दिया ? बस, केवल हजार दो-हजार का महसूल ही तो घटा होगा। ये क्यों नहीं सोचते कि, तुम्हारी इसी कमेटी के चेयरमैन और बडे अफसर तो म्युनिस्पिल-कमेटी के लाखों रूपया डकार जाते हैं।‘
-‘अरे तुम भी , आदमी को अपना काम देखना चाहिये।‘
-‘बस अपना दी देखते रहो। दूसरों की तरफ से आंख मूंद लो।‘
-‘वो नहीं कह रहा।‘
-‘तो क्या कह रहे हो , चलो ये मन खराब करने की बातें मत करो , उठ के हाथ मुंह धोओ, चाय पियो ‘- कहती पत्नी ने उनका हाथ पकड़ के उन्हे उठा लिया था। लेकिन हरक बाबू के मुंह पर कल से मुसकान ऐसी गायब हुई कि लौटी नहीं।
आज भी वे उदास से बैठे थे।
उनकी कुरसी बड़े हॉल में है, भीतर आने वाले हरेक आदमी की सबसे पहले उन्ही पर नज़र पड़ती है। हर साल सरदियों में जड़ी-बूटी बेचने के लिये आने-वाले बड़े साफे वाले आदिवासी सरदारसिंह मोगिया ने यकायक दफ्तर में प्रवेश किया , और आते ही जोरदार स्वर में उसने हरक बाबू को संबोधित किया-‘बाबूजी, जै राम जी की !‘
फीके से स्वर में हरक बाबू ने अभिवादन का जवाब दिया। फिर जाने किस प्रेरणा से बोल उठे-‘आज तुम जाओ भैया , यहां किसी आदमी को तनख्वाह नहीं मिली है, सब पैसे-धेले को परेशान हैं। कोई तुम्हारी दवाई कहां से खरीदेगा ?‘
सरदार मोगिया ऐसे मौके कई जगह झेल चुका है , वह हंसते हुए बोला-‘आपसे रूपया कौन मांग रहा है बाबूजी ! हर बरस की तरह इस बार भी पूरी दवाई उधार दे दूंगा , आप चिन्ता क्यों करते हैं ?‘
‘हर बार सिर्फ महीने भर की बात होती थी , इस बार त्यौहार का समय है ,सो हरेक के पास ख़्ार्च ज्यादा है। अबकी बार चुकारा लम्बा खिंच जायेगा।‘
‘तो भी कोई बात नही है बाबूजी। आप लोग कहां भागे जा रहे हैं ? ‘सरदार आज दवा बेचने की क़सम खाके आया था।
‘अरे यार तुम तो पीछे ही पड़ गये।‘
‘नहीं बाबूजी , आपके बच्चे हैं हम ! आप जैसे बड़े लोगों के भरोसे ही तो हमारा सारा कारोबार चलता है। हम तो अरज कर सकते है, पीछे काहे पडेंगे !‘ कहता सरदार विनम्रता की मूर्ति बन गया था।
हरक बाबू फीकी सी हंसी हंस के बोले -‘दे दे यार जो तुझसे दवा लेना चाहे।‘
फिर तो ऑफिस के दर्जन भर से ज्यादा लोगों ने सरदार से जड़ी-बूटियां लीं , और वह प्रसन्न मन से पुड़िया बांधता चला गया। हरक बाबू ने हिसाब पूछा तो पता चला कि कुल मिला के पांच हजार रूपये की उधारी हो गयी है।
वे चौंके-गहनामल से तो सिर्फ हम सिर्फ एक हजार रूपये की उधारी मांग रहे थे , फिर भी उसे विश्वास न हुआ , और यह बेचारा ख़ानाबदोस आदमी बिना हिचक के पांच हजार की उधारी बांट रहा है।
यह छोटी सी बात कई वृत्त बनाती हुई उनके मन के ताल में फैलती जा रही थी। और उन्हे ठीक से समझ में आ रहा था कि सेठ गहनामल बाज़ार में बैठा है, वह हर चीज़ बाज़ार की नज़र से देखता है, जबकि सरदार जीवन से जुड़ा आदमी है।
मनुष्यता पर उनका यकीन जैसे फिर बहाल हो रहा था।
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राजनारायण बोहरे
एल 19 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी
दतिया मध्यप्रदेश
| रचना कैसी लगी: |
22 सितम्बर 2009
क़ैश जौनपुरी की रचनाएँ
लघुकथा.
ले कौआ... ले जा!
मैं अपने कमरे में था. तभी फर्स्ट फ्लोर से आवाज आई ”सुनिये! अपने बच्चे का खेल देख लीजिये” आवाज मेरी बीवी की थी. मेरे साहबजादे जो अभी कुल डेढ़ साल के हैं. एक छोटे से चूहे के बच्चे के साथ खेल रहे थे. मकान मालकिन के भी दो बच्चे वहीं थे. मकान मालकिन ने ही कपड़े धुलते समय उस छोटे से चूहे के बच्चे को देखा था और बच्चों को खेलने के लिये दे दिया था. उनके बच्चे बडे हैं इसलिये डर रहे थे क्योंकि उन्हें पता था कि ये चूहे का बच्चा है. मेरे बेटे को भी पता था कि ये चूहे का बच्चा है मगर वो अभी छोटा है इसलिये वो डर नहीं रहा था. वो उसे एक टिन के ड्राइंग बॉक्स के ढ़क्कन के ऊपर लेकर खेल रहा था. ये मैंने भी देखा. मकान मालकिन के बच्चे दूर भाग रहे थे जब वो उस छोटे से चूहे के बच्चे को उनकी ओर खिसका दे रहीं थीं मगर मेरा छोटा सा बच्चा वहीं बैठा हुआ हंस रहा था. मकान मालकिन ने उस चूहे के बच्चे को मेरे बच्चे के पैरों पर रख दिया वो फिर भी नहीं डरा. वो उसे हाथ से भी छू दे रहा था. तभी मैंने कहा ”आपको कहां से मिल गया ये? इसे किसी कूड़े के पास छोड़ दीजिए चला जायेगा” मैं ये भी सोच रहा था ”इसके मां-बाप ढूंढ़ रहे होंगे इसे” मगर उसके मां-बाप कहां होंगे कौन जाने? मेरे सोचने और ये फैसला करने कि ”उसे कहां छोड़ा जाये?” के पहले ही मकान मालकिन की आवाज आई ”हटो-हटो! इसे फेंक देते हैं सड़क पे किसी का आहार बनेगा” और उन्होंने उस छोटे से चूहे के बच्चे को सामने खुले मैदान में फेंक दिया. हम मियां-बीवी एक दूसरे का मुंह देखते रह गये. मेरा छोटा सा बच्चा उस चूहे के बच्चे की तरफ देख रहा था. मकान मालकिन और उनके बच्चे उस चूहे के बच्चे को मैदान में पड़ा देख रहे थे. मकान मालकिन आवाज लगा रही थीं ”आ कौआ......ले जा! ले कौआ......... ले जा!”
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कविता.
ए शंकर...किधर जा रहे हो?
ए शंकर...
किधर जा रहे हो?
ट्रैक्टर पे बैठ के मजा खा रहे हो!
ये सुबह-सुबह कहां चल दिये?
बड़ी जल्दी में लग रहे हो!
ए शंकर...
किधर जा रहे हो?
लोग तुम्हें हिमालय से
सड़कों पे ले आये हैं
क्या तुमने भी इस बात के
पैसे खाये हैं?
वैसे कुछ भी हो
तुम भी एक “स्टार“ लग रहे हो!
ए शंकर...
किधर जा रहे हो?
लोग तुम्हें
बेच रहे हैं
तुम्हारे नाम पे
पैसे खा रहे हैं
लेकिन तुम चुपचाप हो
क्या तुम भी “रॉयल्टी“ खा रहे हो?
ए शंकर...
किधर जा रहे हो?
लगता है तुम मजबूर हो
लोग तुम्हें धमकी देते हैं
“अगर मेरी बात नहीं मानी,
तो ये मत भूलना,
तुम्हारा बेटा “गणेश”
हमारे पास है
और इस बार कोई दूसरा “सिर“ भी नहीं मिलेगा“
क्या इसलिये “चुपचाप“ जा रहे हो?
ए शंकर...
किधर जा रहे हो?
अगर तो ये सब
सिर्फ “पब्लिसिटी“ के लिये है?
तो बन्द करो
ये सब “ड्रामा“
ऐसा करके तुम
इस “सोसाइटी“ को क्या दे रहे हो?
ए शंकर...
किधर जा रहे हो?
- क़ैश जौनपुरी.
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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – महेश शर्मा का व्यंग्य : बड़ी मछली छोटी मछली

(प्रविष्टि क्रमांक - 8)
हाल ही में हमारे बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री जी ने अपने मातहतों को सलाह दी कि छोटी मछली पकड़ने की बजाए बड़ी मछली पकड़कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएं। जब प्रधानमंत्री स्तर का व्यक्ति ऐसी बात कहेे तो बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लिहाज़ा गंभीरता का लबादा ओढ़े चिंतन-मनन करते हुए हमें अनायास ही याद आ गया कि एक दशक से कुछ अधिक ही हुआ होगा जब स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर एक और बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री ने लालकिले से भाषण देते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध सत्याग्रह किया जाना चाहिए। शुरु से ही हम दोनों प्रधानमंत्रियों की बुद्धिजीविता के कायल रहे हैं। यद्यपि एक विदेश मामलों के धुरंधर पंडित रहे हैं जबकि दूसरे ने विदेश संबंधी कूटनीति में अपने को सिफ़र साबित किया है। फिर भी उनकी ईमानदार छवि और लब्ध प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री होने के कारण उनके लिए अत्यधिक आदरभाव सदा से बना रहा है। बहरहाल भ्रष्टाचार संबंधी उनके कथन को गंभीरता से लिया जाना लाजिमी ही था इसीलिए सत्याग्रह का आह्वान भी याद आ गया। लगा जैसे हमने कोई गंभीर अपराध कर दिया। यदि बारह वर्ष पूर्व ही सत्याग्रह शुरु कर दिया होता तो संभवतः वर्तमान प्रधानमंत्री को बड़ी मछली पकड़ने की बात कहने की नौबत नहीं आती। खैर देर आयद दुरस्त आयद....भ्रष्टाचार के विरुद्ध सत्याग्रह करने का संकल्प लेकर हमने गंभीरता का लबादा एक ओर रखा और काम पर चल दिए।
संयोग से अगले ही दिन ‘सत्याग्रह और असहयोग' का अवसर हाथ आ गया। उज्जैन से दिल्ली की यात्रा के लिए आरक्षण कराने स्टेशन पहुंचे। चूंकि रक्षा-बन्धन का पर्व बीता ही था और जन्माष्टमी,स्वतंत्रता दिवस और रविवार लगातार होने से तीन-चार दिन की छुट्टी एक साथ मिल रही थीं इसलिए आरक्षण कार्यालय में बहुत भीड़ थी और जैसा कि देखने में आता है टिकट दलाल भी सक्रिय थे। हमारे लिए यह सदा से ही अबूझ पहेली रही है कि जब टिकट खिड़की पर मौजूद कम्प्यूटर आरक्षण अनुपलब्ध बताता है तो ये दलाल कैसे आरक्षित टिकट लाकर दे देते हैं ? मन में विचार आया कि हमेशा की तरह एजेन्ट की सेवा कर टिकट मंगा लिया जाए परंतु प्रधानमंत्री जी के भ्रष्टाचार के खिलाफ तेवर याद आते ही उन्हें सहयोग करने तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘सत्याग्रह और असहयोग' करने की भावना प्रबल हो उठी। आखिर हम लोग ही तो अपनी सुविधा के लिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। यदि सभी देशवासी भ्रष्टाचारियों से असहयोग करें तो उन्हें क्या हासिल हो सकेगा। खैर लगभग दो घण्टे लाईन में खड़े रहने के बाद टिकट हाथ में आया तो देखा प्रतीक्षा सूची में पच्चीसवां नम्बर था।
चिंतित मुद्रा में यात्रा के निर्धारित दिन स्टेशन पहुंचे और चार्ट देखा तो प्रतीक्षा सूची में कोई खास परिवर्तन नहीं दिखाई दिया। बगैर आरक्षण के लम्बा सफ़र करने के नाम पर घबराहट तो हो रही थी किन्तु ‘सत्याग्रह और असहयोग' का संकल्प याद आते ही मन में नया उत्साह आ गया। तभी पीछे की गली में रहने वाले वर्मा जी दिखाई दिए। उनसे मालूम हुआ कि जब आरक्षण कार्यालय मे हम लाईन में लगे थे तब उन्होंने एजेंट को अतिरिक्त पैसे देकर कन्फर्म टिकट हासिल कर लिया था। लिहाज़ा वे निश्चिंत थे और हम ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि इन्दौर से चलने वाली गाड़ी में कुछ बर्थ खाली हो तो परेशानी दूर हो जाए। बहरहाल इसके लिए गाड़ी आने का इंतजार था ताकि टिकट कंडक्टर से चिरौरी कर बर्थ मांगी जाए। गाड़ी आई और उसमें से कंडक्टर उतरे तो एकाएक स्टेशन पर छितराए लोग मधुमक्खी के झुंड समान एकत्रित होकर उनकी ओर लपके। उन्होंने कहा ‘‘ अभी देखते है....गाड़ी तो चलने दो। कुछ समय टिकट निरीक्षक कार्यालय में बिताकर और वहां से चार्ट लेकर कंडक्टर महोदय गाड़ी की ओर बढ़े। भीड़ पुनः उनके साथ हो गई। वह कुछ कदम एक ओर चलते,भीड़ उन्हें घेर कर चलती.....। फिर वे पलटकर कुछ कदम चलते तो भीड़ में चल रहे लोग भी उनका अनुसरण करते। इस तरह उनकी चहलकदमी स्टेशन के एक कोने से दूसरे कोने तक होती रही और भीड़ ‘एसपीजी' सुरक्षा की तरह उन्हें घेरे चलती रही। स्थान पाने की आशा में हम भी भीड़ का हिस्सा हो गए और दाएं से बाएं - बाएं से दाएं चलने लगे मानो धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग' के प्रहरी कर्तव्यपालन कर रहे हों।
अंततः कंडक्टर महोदय एक स्थान पर बैठ गए और चार्ट देखने लगे। आखिरकार खाली स्थान का आवंटन होने लगा। पूर्व नियोजित ढंग से वे पूछते ‘कितने हैं ?' और संतुष्ट होकर जेब में रखकर टिकट पर कोच तथा बर्थ नम्बर अंकित कर देते। असंतुष्ट होने पर ट्रेन में मिलने का कहकर टिकट वापस कर देते। हम सोचने लगे कि आजकल तो प्रतीक्षा सूची के टिकट के लिए भी शयनयान का पूरा पैसा लिया जाता है तो अब पैसे किस बात के दें। बहरहाल दो-तीन लोगों को बर्थ देकर वे उठ गए और ट्रेन में मिलने का कहकर एक ओर चल दिए। एक अनुभवी यात्री ने इसे भाव बढ़ाने की युक्ति बताया। भीड़ पुनः उनके पीछे चल दी। कुछ देर तक फिर चहलकदमी चलती रही...दाएं से बाएं- बाएं से दाएं। वे एक बार फिर बैठकर चार्ट देखने लगे। आरक्षण चाहने वालों की भीड़ और बर्थ की अल्प उपलब्धता के अनुमान से सत्याग्रह और असहयोग का संकल्प डिगने लगा किन्तु मन को स्थिर किया और कंडक्टर को टिकट थमाया। कोरा टिकट देखकर उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि से हमें देखा। फिर भी हमने टिकट पर वज़न रखना मुनासिब नहीं समझा। वे मानो हमारी नज़रों को ताड़ गए और टिकट लौटाकर यह कहते हुए उठ गए कि ट्रेन चलने पर देखेंगे। तभी सिगनल हो गया और कंडक्टर के साथ ही आरक्षण चाहने वाले यात्री ट्रेन में जा समाए। गाड़ी चल दी और अब एक-दूसरे से जुड़े डिब्बों में चहलकदमी होने लगी। कभी किसी डिब्बे में टिकटों की जांच करते तो कभी किसी जगह बैठकर चार्ट देखने लगते।
फिर उठते और चहलकदमी शुरु हो जाती। आखिरकार एक बार फिर स्थान आवंटन होने लगा तब देखा सामान्य टिकट वाले भी स्थान पाने में सफल हो गए। हमने अपने वेटिंग के टिकट का हवाला देते हुए बर्थ मांगी कहने लगे ‘‘ नो रुम''। फिर वे उठ गए और दूसरे कोच की ओर बढ़े। भीड़ भी उनके साथ चली और हम भी भीड़ के साथ चले। एक स्थान पर बैठकर वे चार्ट देखने लगे और भीड़ में से झांक रही हमारी गर्दन पर लगे चेहरे को पहचान कर बोले ‘‘लम्बी यात्रा है, हम आपकी परेशानी का ख्याल रखेंगे तो आपको भी तो हमारा ख्याल रखना चाहिए।'' सत्याग्रह और असहयोग के संकल्प को ध्यान में रखकर हमने उनका ख्याल रखने से इनकार कर दिया और कुछ देर में ही सभी बर्थ आवंटित हो गई और हम रातभर दरवाजे के पास बैठे-बैठे कुढ़ते रहे। प्रधानमंत्री जी का आह्वान याद आने लगा और फिर लगा कि हम ही गलत हैं ये तो छोटी मछली है। प्रधानमंत्रीजी ने तो बड़ी मछली का कहा है, इस निर्दोष पर हमें गुस्सा नहीं करना चाहिए, आखिरकार इतनी व्यस्त गाड़ी में ड्यूटी के लिए बड़ी मछलियों को दाना देना होगा। बहरहाल दिल्ली पहुंचते तक सत्याग्रह और असहयोग का साहस चूक गया था और हम तय कर चुके थे कि वापसी के टिकट के लिए एजेंट की ही शरण लेनी है।
-..........................................................-
महेश शर्मा
28, क्षपणक मार्ग फ्रीगंज उज्जैन
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के. पी. त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : ऊषा
ऊषा
दारोगा ने कड़क आवाज़ में
हवलदार को तलब किया ,
पंडित रामरतन को फ़ौरन
पकड़ने का हुकम दिया I
हुकुम मिलते ही रतनसिंह ह्ववलदार ने
पंडित जी का दरवाज़ा खटखटाया ,
उनको गिरफ़्तार करने का ,
दारोगा का फ़रमान सुनाया I
आओ! रतन बेटा क्या बात है ?
घर पर तो सब ठीक ठाक है ,
गुरु जी ! आपको लेने आया हूँ ,
मज़बूरी में फ़र्ज़ निभाने आया हूँ I
मेरा कसूर !, कसूर तो सर जी बतायेंगे
हम तो केवल , पकड़ कर ले जायेंगे ,
पंडित जी को थाने लाया गया ,
दारोगा के सामने बुलाया गया I
पंडित जी ! आपके घर
के पास से गुज़र रहे थे ,
आप वहां जोर जोर से
किसके साथ चिल्ला रहे थे ?I
आप वहां क्या करते हैं ?.
क्या कोई धंधा चलाते हैं ?
माई बाप मैं, हिन्दी टीचर हूँ
बच्चों को हिन्दी पढ़ाता हूँ ,
अच्छी तरह समझाने के लिए,
साथ साथ कविता गाता हूँ I
सुनें, ज़रा एक कविता सुनाओ,
फ़िर उसका मतलब समझाओ I
यह है ऊषा की मंजुल लाली,
जो आधे घंटे को आती है I
फ़िर और उज़ाला होता है ,
यह उसमे घुलमिल जाती है I
अच्छा! यह है ऊषा की मंजुल लाली
जिसने, करा दी कितनों की ज़ेब खाली
यह तो सरासर धंधा है
बनाया लोगों को अंधा है I
अच्छा! आगे सुनाओ
बिलकुल मत घबराओ I
उषा लाई सुन्दर प्रभात ,
डोलने लगे तरु पात पात I
यह किसका लड़का है प्रभात ?.
जिसकी सुन्दरता ने मचाया उत्पात
उसके आने से तरु पात पात हो जाती है,
वह भी शायद उज़ाले में घुलमिल जाती है I
ऊषा,मंजुल,तरु, प्रभात ऒर
पंडित जी को धर लो,
कम से कम इस महीने का
कोटा तो पूरा कर लो I
रतन सिंह बोला हूज़ूर !
गुरु जी को छोड़ दो ,
केवल दास की खातिर
अपने वसूल तोड़ दो I
नेक चलनी का सार्टिफिकेट ले लो ,
दक्षिणा ले कर इन्हें चलता कर दो I
मैं इनकी नेक चलनी का सार्टिफ़िकेट दूंगा ,
इनका शिष्य होने का फ़र्ज़ पूरा कर दूंगा I
ऊषा को मत पढ़ाइये ,
और आप चले जाइये I
क्या मैं संध्या में पढ़ा सकता हूँ ?.
पढ़ा कर घर का खर्च चला सकता हूँ I
संध्या भी फंसा रखी है ,
आपने आफ़त मचा रखी है I
जाइये! फ़िर देखेंगे
आप से फ़िर मिलेंगे
डा० कान्ति प्रकाश त्यागी
--
Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP
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21 सितम्बर 2009
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : शरद तैलंग का व्यंग्य - साक्षात्कार गाँव वालों का दूरदर्शन द्वारा

(प्रविष्टि क्रमांक - 7)
उड़ती हुई धूल, बच्चों में सबसे अधिक गंदे दिखने वाले कुछ बालक बालिकाएं जिनकी नाक के दोनों नथुनों से जमना गंगा की उच्छल जलधि तरंग बहने का आभास हो रहा था और वे बालक बालिकाएं जो यदा कदा इस सच्चाई को भी उजागर कर दिया करते थे कि यदि प्रयास किया जाये तो बहती हुई धारा को भी उसके उदगम स्थल तक वापस मोड़ा जा सकता है क्योंकि गांव वालों में अभी भी रूमाल रखने का चलन नहीं था अतः उसका काम वे लोग किसी के मकान की दीवार से या अपने शरीर के पृष्ठ भाग के उपयोग से चला लिया करते थे। जानवरों के सींग, पैर, पूंछ, खुरों तथा को दर्शाता हुआ नदी पर नहाती कुछ ग्राम्य बालाओं जिनका चीर हरण करने की आवश्यकता नहीं थी के रूप से छेड़छाड़ करता हुआ दूरदर्शन का कैमरा, गांव की एक मात्र मिठाई की दुकान ‘हनुमान मिष्ठान भंडार’ के मालिक राम प्रसाद अग्रवाल के मुख मंडल पर आ कर ठहरता है। राम प्रसाद जी के कपड़ों को देख कर यह बताना मुश्किल था कि उनके कपड़े सफेद थे जो मैल के कारण काले हो गए थे या काले थे जो मैल के कारण सफेद दिखाई दे रहे थे। कुल मिला कर मैल तथा कपडों में ‘मैं तुम में समा जाऊं तुम मुझ में समा जाओ’ की स्थिति थी।
दुकान में मात्र 3 य 4 छोटे थाल ही रखे हुए थे जो अपने आप को मिष्ठान भंडार का कैबिनेट स्तर का सदस्य मान कर इतरा रहे थे। उनमें लड्डू तथा पेड़े का भ्रम पैदा करने वाली जो मिठाईयां रखी हुई थीं उनके रंगों का शैड बड़ी से बड़ी पेन्ट बनाने वाली कम्पनी के शैड कार्ड में खोजना भी अत्यन्त दुश्कर कार्य था । थाल के चारों ओर किनारे पर मक्खियां इस तरह बैठीं थी जिस तरह किसी तालाब के जनाना घाट की दीवार पर लोग बैठे रहते है। सभी मक्खियां मिठाइयों के स्वाद के प्रति उदासीन थीं क्योंकि वर्षों से एक ही स्वाद को चखते चखते वे भी ऊब गईं थीं।
दुकान के बाहर दुकान का बोर्ड भी लगाया गया था जो प्राचीन भित्ति शैल चित्रों की लिखावट में लिखा हुआ प्रतीत होता था तथा किसी पोलिओ ग्रस्त बालक की भांति लटक रहा था। राम प्रसाद हर आने जाने वाले को बताया करते थे कि दुकान का यह बोर्ड उनके बेटे ने ही लिखा है जिसकी ड्राइंग बहुत अच्छी है तथा वह सीनरी बहुत अच्छी बनाता है। उनके बेटे द्वारा बनाई गई सीनरी में भी वही दो पहाड़ थे जिनके बीच में से सूर्य उदय हो रहा था । सूर्य और पहाड़ उस समय ऐसे लग रहे थे मानो दो पुलिस वाले किसी चोर को पकड़ कर ले जा रहे‚ हो बाद में बताया गया कि वह सूर्योदय नहीं था वरन् सूर्यास्त का नज़ारा था क्योंकि आज की पीढ़ी को तो पता ही नहीं कि सूर्योदय कैसा होता है । इसके अतिरिक्त एक नदी थी जिसमें लबालब पानी भरा था। पानी के रंग के बारे में यह मान्यता होने के बावजूद की वह रंगहीन होता है उस सीनरी में गहरे नीले रंग का पानी दिखाया गया था जो गांव की नदी के गंदे पानी की तरह ही गंदा दिख कर वास्तविकता दिखा रहा था। नदी में एक नाव थी जिसमें दो आदमी दो डण्डेनुमा पतवार लेकर आपस में झगड़ने की स्थिति में प्रतीत हो रहे थे। पहली नज़र में वे दोनों अडवानी और बाजपेयी जैसे लग रहे थे।
कैमरे की तरफ देखने के लिए मना करने के बावजूद भी राम प्रसाद जी कैमरे की तरफ देख लिया करते थे। दुकान को घेर कर खड़े हुए कुछ लोग उंगलियों से इस तरह इशारा कर रहे थे जिस तरह कालिदास ने शास्त्रार्थ के समय राजकुमारी विद्योतमा को देख कर किए थे। दूरदर्शन के प्रतिनिधि के हाथ में एक डण्डा था जिसका मुख लाला राम प्रसाद जी की ओर था । उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि यदि प्रतिनिधि के पूछे गए सवालों का राम प्रसाद जी ने सही सही उत्तर न दिया तो वो उस के मुंह में घुसेड़ देंगे ।बाद में पता चला कि वह डण्डे नुमा चीज़ माईक थी । प्रतिनिधि सब कुछ जानते बूझते भी राम प्रसाद जी से एक ऐसा प्रश्न पूछता है जिससे दुनिया का प्रत्येक वार्तालाप प्रारंभ होता है ।
‘आपका नाम क्या है ।
राम प्रसाद जी इस खतरे को भांपते हुए कि अब अगला प्रश्न उनके बाप के बारे में ही पूछेगा पहले ही सतर्क हो जबाव देते है ।
‘राम प्रसाद अग्रवाल बल्द श्यामा प्रसाद ग्राम बयाना जिला फलां फलां।
मिठाई की दुकान पर बैठे हुए देख कर भी अनजान बनते हुए प्रतिनिधि दूसरा प्रश्न पूछता है। ‘आप क्या करते हैं ।
‘ मिठाई की दुकान चलाता हूं’।
एक थाल जिसमें तथा कथित लड्डू रखे थे उनकी तरफ कैमरे को घुमाते हुए फिर अगला प्रश्न छूटता है । ‘ ये मिठाई आप कब से बना रहे है’।
‘परसो से’ राम प्रसाद जी उत्तर देते हैं।
‘नहीं मेरा मतलब है कितने वर्षों से बना रहे हैं’।
‘बचपन से ही बना रहे है’। ‘आपकी मिठाई कौन खाते हैं’।
‘आप इन मिठाईयों को ढ़ंक कर क्यों नहीं रखते जानते हैं कि इन पर जो मक्खियां भिन भिना रहीं है पता है उनसे क्या होता है ।
‘हॉ इनसे पता चलता है कि ये मिठाई है और मिठाई के अलावा और कुछ नहीं हैं इनमें मिलावट नहीं है वरन् मीठी हैं।
मक्खियों का ज़िक्र आते ही यह सोच कर कि उनका भी उल्लेख दूरदर्शन वाले कर रहे है सभी ने उड़ कर एक लम्बा चक्कर लगाया और जो मक्खियां बाहर किसी अन्य स्थान पर किसी दूसरे काम में व्यस्त थीं उनको भी यह खुश खबरी सुना कर कि वे दूरदर्शन पर दिखाईं जायेंगी वापस अपनी जगह पर बैठ गईं ।
‘इस दुकान की आमदनी से आप क्या करते हैं ।
‘अपने परिवार का गुजारा चलाते है। उनके खाने पीने की व्यवस्था करते हैं।
‘जिस दिन आपकी मिठाईंयां नहीं बिकतीं उस दिन घर का गुज़ारा कैसे चलता है।
‘उस दिन घर का गुजारा इन्हीं मिठाईयों को खा कर चलता है’।
कैमरा पुनः खेत खलियानों को रौंदता हुआ भीड़ से घिरे एक नवयुवक के ऊपर केन्द्रित होता है। उस युवक को देखकर यह अंदाज लगाया जा सकता था कि उसके चरण अवश्य किसी शहर को कुछ समय के लिए पवित्र कर चुके हैं । छींट दार बुशर्ट तथा जीन्स टाइप पेन्ट पहने देख कर उसे शहर वाले भले ही आधुनिक तथा अच्छे समाज का समझे गांव वाले उसे खेत में खड़े बिजूखा जैसा ही मानते थे इस कारण गांव में बाल विवाह का ज़ोर होने पर भी वह युवक अभी तक कुंआरा था क्योंकि कोई भी उस उजबक को अपनी कन्या नहीं देना चाहता था ।उनकी नज़र में शहर की हवा खाने वाले गांव के सभी युवक गंवारों की श्रेणी में आते थे जो शर्ट और जीन्स पहन कर गांव की परम्परा को चूना लगाने में लगे थे। उस युवक के पेन्ट की पीछे की जेब में एक छोटा कंघा तथा गले में रूमाल इस कदर शोभायमान हो रहा था कि यदि रुमाल की गांठ लगाने में ज़रा सी ओर ताकत का प्रयोग किया जाता तो वह युवक आत्म हत्या के प्रयास में पुलिस के हत्थे चढ़ गया होता। उसके आस पास खड़े नवयुवकों में आगे आने की होड़ लगी हुई थी। सभी राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत थे तथा राष्ट्रीय कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना चाह रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों सामने किसी दस्यु सुन्दरी की लाश पड़ी हो। इस देश की बहुत समृद्व परम्परा है कि कैसी भी कानी कुबड़ी असुन्दर महिला क्यों न हो चंबल की घाटियों में शरण लेते ही सुन्दरी बन जाती है । चंबल की घाटी एक बहुत ऊंचे दर्जे का ब्यूटी पार्लर बन गया है। वे महिलाएं जो अपनी असुन्दरता के कारण हीन भावना की शिकार हैं एक बार चंबल घाटी जाकर सुन्दरी बन सकतीं हैं।
‘तुम्हारा नाम’। दूरदर्शन के प्रतिनिधि ने उस नवयुवक से वही घिसा पिटा सवाल किया ।
‘रमेश कुमार यादव’। वैसे उसका नाम रम्मू यादव था किन्तु शहर की गलत संगत के कारण रम्मू से रमेश बन कर उसने यह सोच कर कि नाम के आगे कुमार लगा लिया कि कुमार लगा लेने से गांव में उसकी हैसियत भी भले ही ऋतिक रोशन, शाहरूख खान, सलमान खान, सन्नी, बॉबी, जिन्होंने अपने नामों में कुमार शब्द का प्रयोग किसी षड़यंत्र के तहत बन्द कर दिया जैसी न बन पाये कम से कम दिलीप, संजीव,अक्षय,मनोज कुमारों जैसी तो हो ही जाये।
‘आप क्या करते है’
‘पढ़ता हूं’
‘पढ़ लिख कर आप क्या बनना चाहते है’। ऐसे प्रश्न अक्सर आठवीं या दसवीं का रिजल्ट आते ही मीडिया वाले उस छात्र या छात्रा से पूछते हैं जो मेरिट में आ जाते है और जिनमें अधिकांश डॉक्टर, इंजीनियर या आई ए एस अफसर बनने की इच्छा प्रकट करते हैं क्यों कि उनके बाप दादाओं को इन तीनों ने ही जम कर लूटा था। आज कल अपने आप को थोडा मॉडर्न समझने वाले फैशन डिजायनर बनने का राग भी अलापाने लगे है। एक छात्र ने जब अपनी नेता बनने की इच्छा जताई तो उसके बाप ने बाद में उसको बहुत ड़ांट पिलाई कि मेरिट में आने के बाद भी तुम नेता बनना चाहते हो । लानत है तुम पर।
‘डॉक्टर" । उसने भी उत्तर दिया।
‘क्या आप के गांव में अस्पताल है’ ।
‘हां है’ ।
गांव में जब कोई बीमार हो जाता है तब आप गांव वाले उसे कहां ले जाते हैं।
‘हनुमान जी के मन्दिर में पुजारी जी के पास’।
‘अस्पताल नहीं ले जाते’
‘जब मरने लगता है तब ले जाते है’ । वार्ताक्रम में किंचित भी अवरोध नहीं आ रहा था।
‘क्या आप यहॉ बिकने वाली मिठाईयाँ खाते हैं। क्या आप जानते है कि इस तरह की मिठाईयां खाकर उनसे बीमारियाँ हो सकती हैं’। दूरदर्शन के प्रतिनिधि ने अपनी बचपन में ‘सरल स्वास्थ्य’ की पुस्तक में पढ़े इस ब्रह्म वाक्य को दुहराते समय ऐसा मुँह बनाया जैसे इस रहस्य की खोज उसने ही की हो।
‘हाँ जानते हैं इसीलिए तो खाते हैं’।
‘जानते हुए भी क्यों खाते हैं।
‘बीमार होने के लिए’
‘बीमार किस लिए होना चाहते हो’।प्रतिनिधि ने नौ रसों में से एक रस का किसी नृत्यांज्ञना की तरह अभिनय करते हुए पूछा ।
‘अस्पताल जाने के लिए’। नवयुवक हाज़िर जवाबी में अत्यन्त निपुण दिखाई दे रहा था।
‘अस्पताल किस लिए जाना चाहते हो’
‘बताईयेगा अस्पताल किस लिए जाना चाहते है’ । अपने प्रश्न में बताओ की जगह बताइयेगा शब्द का प्रयोग करते ही आधे लोग समझ गए कि यह जरूर बिहार का रहने वाला होगा । प्रतिनिधि के इस प्रश्न को सुनकर थोड़ा शर्माते थोड़ा सकुचाते हुए नवयुवक ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया वह ‘अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती हुई संख्या के कारण और निराकरण’ विषय पर निबंध लिखने वालों का मार्गदर्शन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता था।
युवक ने शर्माते हुए तथा इस सत्य को कि सत्य बोलने में साहस नहीं खोना चाहिए साहस के साथ स्वीकारते हुए उत्तर दिया ‘नर्स के कारण’ । आसपास खड़े हुए सब लोग जोर से हॅस पड़े।
कैमरे का अगला शिकार एक ऐसा अधेड़ युवक था जिस को देख कर लगता था कि उसकी साबुन बनाने वाली कम्पनियों से पुस्तैनी लड़ाई है इसलिए वो साबुन नामक चीज़ को न तो कभी खुद छूता था न ही अपने कपडों को छूने देता था। उसके शरीर पर विभिन्न स्थानों पर उगे हुए बाल किसी महिला की हारमोन्स की गडबडी के कारण नहीं वरन् उसके मर्द होने का सबूत दे रहे थे। पहली नज़र में देखने से ही मालूम हो जाता था कि वह किसान है।
‘आप का नाम’। प्रतिनिधि तुम से आप पर आ गया था जिस कारण उन दोनों के सम्बन्धों में कोई प्रेम सम्बन्ध स्थापित न हो सके।
‘लक्ष्मी नारायण’
‘आप क्या काम करते हैं’
‘मैं काश्तकार हूं’। पिछले कुछ समय से किसान अपने को काश्तकार कहलाना ज्यादा पसंद करने लगे हैं क्योंकि काश्तकार में साहूकार कलाकार चित्रकार जैसे प्रतिष्ठित व्यवसाय की गंध आती है। उसी गंध को आत्मसात करते हुए अगला प्रश्न फिर हवा में उछला।
‘ इस बार फसल कैसी हुई है’
‘अच्छी भी हुई और खराब भी’
‘अच्छी भी हुई और खराब भी’ इससे आपका क्या तात्पर्य है।
काश्तकार महोदय तात्पर्य का तात्पर्य समझ नहीं पाये। जब उसे बताया कि इसका मतलब मतलब है तब जवाब मिला।
‘फसल तो ठीक हुई है लेकिन सरपंच जी की भैंसे खेत में घुस जातीं है इसलिए खराब हो जाती है’।
‘अब आप क्या कर रहे हैं।’
‘हम क्या करें सरकार को ही कुछ करना चाहिए’
‘सरकार क्या भैंसे भगाए’
‘नहीं वो तो हम भगा देते हैं लेकिन जो भी नेता या अफसर यहाँ आता है वो भाषण दे जाता है कि हमें अच्छी फसल के लिए आधुनिक तरीके अपनाने चाहिए।
‘तो आपने कुछ तरीकों में बदलाव किया है।
‘हॉ किया है।
‘क्या किया’
‘हमने हल में बैल की जगह घोड़े जोतना शुरू कर दिया है।
कैमरा पुनः फूल पत्तियों को तोड़ता हुआ तथा पेड़ पर बैठे हुए बंदर तोते तथा कौओं को उड़ाता भगाता हुआ एक पक्के मकान के दरवाजे पर दस्तक देता है। अंदर सफेद धुले हुए कपड़ों में विज्ञापन के मॉडल की भाँति बगुले की तरह बैठे हुए गांव के प्रधान के ऊपर ठहरता है। वैसे आम दिनों में उनकी पोशाक जेब वाली बनियान तथा धोती होती थी जिसे वे इस तरह पहने रहते थे जिसमें से उनकी चड्डी भी आने जाने वालों को इस तरह देखा करती थी जिस तरह गांव की औरतें घूंघट की ओट से दिलवर का दीदार किया करतीं थीं परन्तु आज दूरदर्शन वालों के आने की सूचना से उनके शरीर पर कुर्ते ने भी कब्जा जमा लिया था। दूरदर्शन तथा गांव के प्रधान के बीच जो बातचीत हुई वह बड़ी उबाऊ किस्म की थी ।अतः उसे पूरी न लिख कर यहाँ कुछ शब्द दिए जा रहे हैं पाठकगण स्वयं बातचीत का अंदाज लगा सकते हैं।
गोबर गैस‚ हैण्ड पम्प‚ पंच वर्षीय योजना‚ नहर‚ सिंचाई‚ खाद‚ अमोनिया‚ तहसीलदार‚ बी डी ओ‚ प्रौढ़ शिक्षा‚ यूरिया‚ पंचायत‚ गबन‚ फसल‚ ऋण‚ चुनाव‚ खुशहाल‚ कांइयां‚ जूते मारना चाहिए‚ षडयंत्र‚ मुकदमा‚ काला मुंह‚ गधे पर बैठा कर‚ बहुत कृपा की‚ जनता के सेवक‚ धन्यवाद‚ जयहिन्द ।
| रचना कैसी लगी: |
शेर सिंह की कहानी : कृष्ण गोकुल

नगरों का नगर अहमदाबाद महानगर। महानगर के पश्चिमी भाग में नवा वाडज - राणिप इलाका। इसी इलाके में स्थित है कृष्ण गोकुल अपार्टमेंट। यानी कृष्ण गोकुल को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी। आधुनिक महानगरों की संस्कृति के अनुरूप लगभग एक सौ फ्लेटों की सोसाइटी है। फ्लेटों के मालिक, फ्लेटों के स्वामी मध्यवर्गीय लोग, मध्यवर्गीय परिवार हैं। कुछ निम्न मध्यवर्गीय परिवार भी हैं। आठ ब्लाकों में विभाजित तीन - तीन माले की बिल्डिगें हैं। दो- दो और तीन -तीन कमरे। किचन, बाथरूम और टायलेट सहित। ऐसा नहीं है कि तीन- तीन कमरों के फ्लैट वालों की आमदनी अन्यों से ज्यादा ही है। ऐसी कोई विशेष बात नहीं है। इन में से कुछ की आमदनी तो औसत ही है। लेकिन जब फ्लेट बिक रहे थे, उस समय उन्होंने तगड़ी मोटी रकम एक मुश्त बिल्डर को दे दी थी। इसीलिए अधिक आय नहीं होने पर भी उन के फ्लेट बड़े थे।
है तो यह गुजराती लोगों की हाउसिंग सोसाइटी। लेकिन सोसाइटी में दक्षिण के चैन्ने से ले कर सुदूर उत्तर भारत के हिमाचल प्रदेश तक के सभी प्रकार के लोग , उन के परिवार हैं। मिश्रित संस्कृति, मिश्रित रीति-रिवाज। निम्न जाति से ले कर सभी प्रकार, सब जाति- विरादरी के लोग हैं। लेकिन निम्न जाति के परिवारों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। और, वे लोग अधिकतर अपने में ही सिमटे रहते हैं। शायद सदियों के संस्कार, व्यवहार और आदत के कारण ! झिझक और शायद सामाजिक स्थिति, हैसियत भी इस की वजह हो सकती है। लेकिन अन्य वर्ग के लोगों, उन के परिवारों के साथ इन का आना- जाना, उठना -बैठना बहुत कम होता है। कृष्ण गोकुल में सब धर्म , जाति और तबके के लोग हैं। ब्राह्मण, राजपूत, पटेल, बनिया, जैन ,इसाई, नाई, धोबी आदि सभी रहते हैं। यह अलग बात है कि ये सभी विशेषकर औरतें हर वात में एक दूसरे से झगड़ती रहती हैं या तानाकशी करती रहती हैं। इस लिए इन में कोई एका नहीं है। बल्कि एक दूसरे की टांग खिचाई में ही उलझे रहते हैं और शायद उसी में उन को आनंद आता है।
आप सोच रहे होंगे कि इस में ऐसा क्या विशेष है ! ये सब तो सभी जगह, इसी प्रकार और इस से थोडे भिन्न रूप में कहीं भी होता है और हो सकता है। लेकिन इस कृष्ण गोकुल में ऐसे - ऐसे महारथी , ऐसे -ऐसे कलाकार और नेता हैं कि आप जानेंगे तो दंग रह जाएंगे।
ऐसे ही एक कलाकार से आप का परिचय कराते हैं। जी हां। प्रदीप शुक्ला जी ऐसे ही एक कलाकार हैं। आयु यही पैंतालीस वर्ष के आस -पास होगी। लंबा ,ऊंचा कद। लेकिन पीठ पर एक बहुत बड़ा कूबड। आंखें भेंगी। मुंह हमेशा पान या पान मसाला, गुटखे आदि से भरा रहता है। लोग शुक्ला जी को पीठ पीछे कुबडू ही कहते हैं। सामने भले ही प्रदीप भाई या शुक्ल जी कहें।
शुक्ल जी पेशे से एक को-ऑपरेटिव बैंक में प्रबंधक हैं। वैसे हैं बहुत मिलनसार। बातों ही बातों में किसी का भी दिल जीत लेने में माहिर हैं। अपने इसी कुदरती गुणों के कारण , अपने से आधी से भी कम उम्र की लड़की से शादी की है। लोग अक्सर धोखा खा जाते हैं। बेटी है या बीवी ? पर वह बेचारी बीस की उम्र में ही शुक्ला जी के बेटे की मां बन गई है। गरीब घर की लड़की। बाप का साया सिर पर न था। इस लिए शुक्ला जी ने उसे उबार लिया था।
शुक्ला जी की पत्नी का एक छोटा भाई और दो छोटी बहनें भी थी। वे अक्सर उन के घर में ही रहते। शुक्ला जी अपनी युवा सालियों पर खासे मेहरवान थे। कभी- कभी शुक्ल जी अपने घर में दिखाई नहीं देते। पता चलता, प्रदीप भाई अपनी सास के घर में हैं। सासू जी अकेली जो रहती है। उन की सास और उन की अपनी उम्र एक जैसी ही होगी। लेकिन सास उन से उम्र में बस थोड़ी सी बड़ी लगती थी। कहने वाले तो कहते हैं कि शुक्ला जी अपनी सास को भी अपनी सुदृढ़ बाहों का सहारा देते हैं। ... और वह उन के कूबड़ को सहलाने में कोई शर्म या झिझक नहीं करती। लेकिन शुक्ल जी की युवा पत्नी योवनोचित लावण्यमय, सौम्य लगने की बजाए बुढ़ाने लगी थी। जैसे बीस वर्ष की उम्र में ही बुढा गई हो !
शुक्ला जी ने सोसाइटी का भी भला करने का ठान लिया था। उन्होंने पहले सेटेलाइट टीवी चैनल शुरू किया। फिर कुछ बैंक से कुछ खालिस पठानों से भारी सूद में कर्ज ले कर अपने फ्लेट के टैरेस में केबल टीवी का डिश एंटेना लगा लिया। डिश एंटेना की तारें सोसाइटी के लगभग सभी फ्लेटों में बिछने के बाद आस-पास की अन्य फ्लेटों , टेनामेंटों और पास की
झोंपड़पट्टी में भी बिछ गई थी।
अब वे सोसाइटी में वाकई हीरो जैसे हो गए थे। चैनल पर कभी पिक्चर दिखाते कभी गाने ही गाने। आलम यह हो गया कि जब भी टीवी ऑन करो, कुछ न कुछ जरूर चलता होता। इस बीच उन्होंने एक नई कार भी खरीद ली थी। पान खाने जाना हो, तो भी कार से ही जाते। घूमने- फिरने जाना हो, तो भी कार से ही जाते। उन का वश चलता तो हगने -मूतने के लिए भी कार से ही जाते, घर के अंदर । जब कभी कार खड़ी दिखती, तो उन का साला उसे इधर - उधर दौड़ाता -घूमता। उदार ऐसे कि कोई भी कार या स्कूटर की चाबी मांगता तो बिना हील-हुज्जत के तुरंत चाबी पकड़ा देते। दस - पन्द्रह साल तक के छोकरे उन से लिपट- चिपट जाते और चैनल पर बढ़िया से बढ़िया पिक्चर दिखाने की जिद करते। और, शुक्ल जी कभी उन को निराश या नाराज नहीं करते !
इधर कई दिनों से शुक्ल जी के पास नए-नए लोग आने लगे थे। पता चला कि लोग अपने कर्ज की वसूली के लिए आते हैं। शुरू -शुरू में वे उन को बहाने बना कर टरकाने लगा। मगर कब तक ! फिर धीरे- धीरे वे अपने घर और सोसाइटी में ही दिखने बंद हो गए। पता चला, अपनी सास के साथ ही रहते हैं। बीस दिन, महीने में एकाध बार दोपहर को आते जब कोई नहीं होता। ... और आधे घंटे के भीतर ही खिसक लेते। घर में उन का साला, सालियां और कभी -कभी बीवी चैनल बदल- बदल कर पिक्चर लगाते, गाने सुनते ,सुनाते और महीना समाप्त होने पर वे लोग ही केबल कनैक्शन लिए हुए लोगों से पैसे वसूलते। सौ रूपये प्रति कनैक्शन।
लेकिन कर्ज का तकाजा करने वाले चुप बैठने वालों में नहीं थे। कभी दो सरदार जी आते , कभी सीधी। सलवार- कमीज पहने एक लंबा, तगड़ा पठान तो हाथ में मोटा डंडा लिए हर दूसरे- तीसरे दिन आने लगा। शुक्ला जी की पत्नी और संबंधी कर्ज की तकाजा करने वालों से खौफ खाने लगे थे। फिर उन की पत्नी भी दिखनी बंद हो गई। एक सप्ताह पश्चात उन का साला, सालियां भी घर के दरवाजे पर एक बड़ा सा ताला डाल, बाकी सब के पास चले गए थे शायद ? तकाजा करने वाले सुबह- शाम आते। लटकता हुआ ताला देखते, पड़ोसियों से पूछते और भुनभुनाते हुए वापस लौटते। शायद अपने आप पर ही खीजते हुए और शुक्ला जी को प्रकट, अप्रकट गालियां देते।
रूपये किसे अच्छे नहीं लगते ? और फिर आज के जमाने में रूपये- पैसे के बिना किसी चीज की कल्पना की जा सकती है ? महीने का पहला सप्ताह चल रहा था। एक रात चैनल पर बहुत अच्छी फिल्म दिखाई जाने लगी। मालूम हुआ शुक्ला जी के परिवार का कोई सदस्य उस रात अपने घर आया हुआ है। अपने ग्राहकों से कनैक्शनों के पैसे वसूलने।
लेकिन जैसा सोचा था हुआ उस से उलट ही। रात लगभग ११ बजे के आस- पास सोसाइटी में चीखने- चिल्लाने, रोने- धोने की आवाजें आने लगी। उन आवाजों को सुन कर सभी अपने फ्लेटों की बाल्कोनियों में आ जुटे थे। यह जानने के लिए कि माजरा क्या है ? फिर एक- एक कर काफी लोग कॉमन प्लॉट में इकट्ठे हो गए। पता चला, शुक्ला जी की सास उन के घर में है। फिर क्या था ! कर्ज वसूलने वालो में से कुछ ने उसे आज घर में धर लिया था। वह औरत पैसे कहां से देती ? तकाजा करने वाले शुक्ला जी की सास से धक्का- मुक्की करते हुए घर में पडी वस्तुएं उठाने लगे थे। इसी से वह चीख -चिल्ला रही थी। पर रात का मामला था। इस लिए लोगों ने अपने हाथ अघिक नहीं दिखाए। पूरी कालोनी में हंगामा मच जाने के पश्चात रात के दो बज चुके थे। शुक्ला जी की सास को शायद काफी हाथ पड़ गए थे। उस के गाल, सिर संभवतः दुखने लगे थे। क्योंकि वह अब भी बराबर रोये जा रही थी। लेकिन किसी ने उस के रोने की परवाह नहीं की।
सुबह का नजारा कुछ अलग ही था। लोग अभी अपने बिस्तरों से उठे भी नहीं थे कि कालोनी में स्कूटर, बाईक, कार और ऑटोरिक्शा आदि आने शुरू हो गए थे। वे शुक्ल जी के फ्लेट में जाते और जो भी भारी, कीमती सामान होता, उसे उठा लाते। अपने वाहन पर लादते और चलते बनते। जिन के हाथ कुछ नहीं लगा था, वे गालियां देते हुए खाली हाथ ही वापस गए। शुक्ला जी की सास केवल असहाय सी देखती ही रह गई थी। छत पर केवल डिश एंटेना भर बचा रह गया था। इस घटना के दो - तीन दिन बाद सोसाइटी के कुछ लोग आपस में बात कर रहे थे कि शुक्ला जी अपना फ्लेट बेच रहे हैं। लेकिन उन को कोई ग्राहक नहीं मिल रहा है।
कृष्ण गोकुल हाउसिंग सोसाइटी के जोशी और पाटिल के बारे आप ने नहीं जाना तो फिर क्या जाना ! दोनों के फ्लेट ई -ब्लॉक में तीसरे माले पर हैं। दोनों फ्लेटों के दरवाजे आमने- सामने खुलते हैं। दोनों फ्लेटों के मुख्य द्वार यदि गलती से भी खुले रह जाते तो बड़े आराम से देख सकते हैं कि अपने -अपने घर में कौन क्या कर रहा है ? एक यदि जोर से सांस ले तो दूसरे घर में सुन ले। इतना नजदीक !
जोशी और पाटिल दोनों मित्र हैं। एक गुजराती तो दूसरा मराठी। दोनों बैंक में काम करते हैं। दोनों क्लर्क हैं। दोनों की उम्र भी एक सी है। ३२ से ३६ के बीच की आयु। पाटिल नाटे कद का मोटा और काला है। जोशी से उम्र में थोड़ा छोटा भी लगता है। वह अपनी नजरें हमेशा जमीन में गड़ा कर ही चलता है। सुबह बैंक को जाता है। लेकिन दोपहर दो -तीन बजे तक वापस घर को आ जाता है। शाम को ६ बजे के पश्चात घर से बाहर जाता है। शायद किसी दुकान में एकांउटिंग का पार्ट टाइम काम करता है।
जोशी मझौले कद, काठी का है। दुबला -पतला जिस्म। एक स्कूटर एक्सीडेंट में उस के माथे पर एक स्थायी गड्ढा बना हुआ है। कालोनी में जोशी के मित्रों का दायरा भी अजीब है। अधिकांश छोकरे ही। यानी कि सोलह से बीस की वय के छोकरों से उस की अच्छी पटती है। कारण , बड़े और वयस्क लोग उस को कोई महत्व ही नहीं देते हैं। एक तो झूठ बोलना और उस पर हर किसी से उधार मांगना उस का शगल है जैसे। इसी से , कोई भी उसे गम्भीरता से नहीं लेता है। अपने घर का अधिकतर काम वह स्वयं ही करता है। पानी लाना, सब्जी -भाजी खरीदना, बाजार से छोटे- मोटे सामान ले आना आदि। लेकिन सुबह जो बैंक को जाता है तो शाम को ही लौटता है।
पाटिल की पत्नी प्रभा का प्रथम प्रसव काल निकट आने लगा तो पाटिल उसे बड़ौदा में अपने मां-बाप के पास छोड़ आया। अब वह अपने घर में अकेला ही था। खाने- पीने की उसे अधिक चिता नहीं थी। क्योंकि उस का मित्र जोशी उस का पड़ोसी था। उस का सहकर्मी और उस का बहुत कुछ था। खाना आदि के लिए उस ने जोशी की पत्नी को कह दिया था। वह केवल पैसे दे देता था। जो भी उचित समझता। इस तरह पाटिल को कोई असुविधा या तकलीफ नहीं थी। एक प्रकार से वह जोशी का पेइंग गेस्ट हो गया था।
जोशी की पत्नी सुंदर और तीखे नैन-नक्श की दुबली, पतली सी औरत थी। वह अधिकतर अपने फ्लेट में ही रहती। सोसाइटी की अन्य औरतों के साथ उस का किसी ने उठना-बैठना नहीं देखा था। उस का एक नौ - दस वर्ष का बेटा था। दिन के समय वह स्कूल चला जाता और जोशी जी बैंक। वह घर में निपट अकेली होती। सोसाइटी की किसी औरत के साथ वह मेल-जोल रखती नहीं थी। इस लिए कोई महिला या लड़की उस के पास नहीं जाती थी।
लेकिन गुपचुप खिचड़ी पक रही है। इसे सोसाइटी के बहुत कम लोग जानते थे। पाटिल अपनी आदत के अनुसार दिन के समय घर आता। अकेला क्या करता ! वह जोशी के घर में जाता। उस समय जोशी की पत्नी घर में अकेली होती। और फिर महीना बीतते न बीतते उन के संबंधों की चर्चा कानाफूसियों में होने लगी। उन के ब्लॉक के तीसरे माले के अन्य पड़ोसी देखते कि जब वे दोनों एक ही घर में होते तो घर के दरवाजे बंद रहते। कुछ ने उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में भी कई बार देख लिया था। लेकिन उन्हें जैसे किसी की परवाह नहीं थी। जब शाम को जोशी घर आता तब तक पाटिल अपने पार्ट टाइम काम पर निकल चुका होता।
इस बीच पाटिल की पत्नी बड़ौदा में कन्या को जन्म दे चुकी थी। पाटिल मुश्किल से पांच दिन उस के पास रह कर वापस अहमदाबाद कृष्ण गोकुल में लौट आया।
वापस आ कर वही काम, वही ताका- झांकी और वैसे ही चर्चे। जोशी इन सबसे अनभिज्ञ हो,यह असंभव था। हर कोई रस ले- ले कर इस का बखान करता ! परन्तु जोशी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। वह पहले की तरह ही अपने रोजमर्रा के काम करता। अपने छोकरे मित्रों से बातें करता, सरकार की नीतियों पर उन छोकरों के साथ बहस करता।
पर उस दिन जिस ने भी यह जाना, वह हैरान, चकित रह गया कि जोशी ने अपनी पत्नी और पाटिल को स्वयं कह कर माउंट आबू भेज दिया है। पांच दिन के लिए। जिस ने भी जाना, वह जोशी को हिजड़ा, फातड़ा आदि कह कर अपना गुस्सा और घृणा उतारने लगा। लेकिन जोशी तो किसी अलग ही मिट्टी का बना हुआ था। उस ने कोई प्रतिक्रिया ही व्यक्त नहीं की। कोई असर ही नहीं हुआ। जैसे सामान्य बात हो। पैसे का पुजारी था। और पैसे उसे पाटिल से मिल ही रहा था।
वे दोनों माउंट आबू से वापस आ गए। लेकिन किसी प्रकार की कोई हलचल ही नहीं हुई। सभी कुछ पूर्ववत चलता रहा। जैसे कुछ हुआ ही न हो। परन्तु सोसाइटी के लोगों को आपस में हंसने, मजाक करने का अच्छा विषय मिल गया था।
आठ महीने के पश्चात पाटिल की पत्नी बडौदा से वापस अपने घर आई। छः महीने की बेबी को गोद में उठाए। पर उस के आने से पाटिल के लिए व्यवधान खड़ा हो गया। जैसे किसी को ड्रग्स - अफीम की या शराब की लत लग जाती है,और वह किसी भी तरह से उस को पा कर दम लेता। कुछ ऐसा ही यत्न पाटिल अब जोशी की पत्नी से मिलने के लिए करने लगा था। पाटिल की पत्नी को जब इन सब की जानकारी हुई तो वह अपना माथा पीटने के अतिरिक्त क्या कर सकती थी ! वह वैसे ही दुबली , पतली सी थी। स्वभाव से भी डरपोक और दब्बू किस्म की औरत थी। अब तो वह अपने में ही घुट -घुट कर जैसे एक सूखी लकड़ी में बदलती जा रही थी। वह उन औरतों में से थी जो कुछ करने की बजाए केवल अपने में घुट कर, रो कर और अपने भाग्य को कोसती रहती हैं।
फिर जोशी की पत्नी का बेटा हुआ। सोसाइटी में फिर से चटखारे ले -ले कर चर्चाएं होने लगी। लोग सुनते और हंस-हंस कर लोट-पोट हो जाते। मगर इतना ही काफी नहीं था। अभी बेटा एक साल का हुआ भी नहीं था कि जोशी की पत्नी ने एक और बेटे को जन्म दे दिया। लोग मजाक - मजाक में जोशी और पाटिल दोनों को बधाई देते। जोशी मग्न था। पाटिल लगन से उस की खीसे भर रहा था। लेकिन आखिर कब तक ?
और , अप्रैल की उस सुबह अभी लोग अपने बिस्तरों से उठे भी नहीं थे। जोशी की पत्नी पूरी सोसाइटी को अपनी गर्जना से हिलाए दे रही थी। जो औरत केवल अपने घर तक ही सीमित रहती थी, जिसे किसी के साथ बात करते, ऊंचा बोलते किसी ने भी नहीं देखा, सुना था, आज रणचंडी जैसी बनी पाटिल को लानत- मलामत भेज रही थी। पाटिल अपनी पत्नी के साथ कमरे में भीतर से दरवाजा बंद कर , भीगी बिल्ली बना सुन रहा था। मालूम हुआ, पाटिल अब पहले की तरह जोशी की पत्नी के साथ हंसता- बोलता नहीं है। उस को ज्यादा समय नहीं दे पाता है। अब उस की उपेक्षा भी करने लगा है। और तो और किसी दूसरी जगह अपने लिए एक नया फ्लेट बुक कर लिया है। जोशी की पत्नी इसी से भड़क उठी थी।
फिर एक सप्ताह तक लगातार जोशी की पत्नी का हर सुबह चीखना, चिल्लाना जारी रहा। लोग सुनते और पेट पकड़ कर हंसते।
अप्रैल महीने का वह दूसरा रविवार था। सोसाइटी के लोगों- जिस ने भी देखा और सुना ... सन्न रह गया। दिन के लगभग बारह बजे जब पाटिल को दो सिपाही, उस के दोनों हाथों में रस्सी की हथकड़ी लगा कर कॉमन प्लाट से पैदल चला कर पुलिस स्टेशन ले गए।
जोशी के करीब के लोगों से पता चला कि उस ने पाटिल को गिरफ्तार कर हाथकड़ी लगा , पैदल चला कर ले जाने के लिए पुलिस को पचास हजार रूपये दिए हैं। इलजाम लगाया था, बदकारी और चार सौ बीसी का। पुलिस ने पाटिल को दो दिन तक पुलिस चौकी में रखा और फिर छोड़ दिया था। लेकिन पाटिल खुद्दार निकला। वह फिर कभी वापस अपने फ्लेट में नहीं लौटा। ऐसे विरले लोग , ऐसी हाऊसिंग सोसाइटी ! ऐसा कृष्ण गोकुल !
परन्तु कृष्ण गोकुल के नेताओं की बात न करें तो उन क े साथ नाइंसाफी होगी। सोसाइटी के मेम्बर हर वर्ष कमेटी के कुछ सदस्य, नेता आदि चुनते हैं। लेकिन चुने वही जाते जो पहले से ही किसी न किसी पद पर होते। अपने- अपने गुट के। अपने -अपने मित्र ! और कभी - कभी अपने विरोधी को भी शामिल कर लेते हैं। ये नेता हर किसी को पाटना और पटाना जानते हैं। कोई राजनीतिज्ञ भी इन का क्या मुकाबला करेगा ! लोगों को बरगलाना और उन्हें आपस में लड़ा देना इन के बाएं हाथ का खेल है। स्वयं दूर से तमाशा देखते रहेंगे। उन की लड़ाई का आनंद लेते रहेंगे। सोसाइटी के कामों के लिए हजार रूपये खर्च करेंगे और दो हजार का बिल बनवा कर एक हजार खुद डकार जाएंगे।
यह हाऊसिंग सोसाइटी, कालोनी न हो कर मानो एक छोटा- मोटा कस्बा या शहर है। प्रतिदिन कुछ न कुछ देखने , सुनने को मिलता। फटले कपड़ों का डाक्टर क्रान्ति भंगी दारू पी कर हर पांचवे- छठे दिन अपने जवान बेटों को डंडे से पीटने लगता। उन्हें फ्लेट से बाहर खदेड़ देता। रात है या दिन, ये सब नहीं देखता। वैसे भी बूढा दिन भर ऊंची आवाज में बोलता ही रहता। छोटी- छोटी बातों पर ही लड़ने के लिए उतारू हो जाता। लेकिन सोसाइटी का कोई भी आदमी उस से सीधे मुंह बात नहीं करता। कोई उसे घास नहीं डालता।
कृष्ण गोकुल के नौजवान छोकरे, छोकरियों की बात न करें , यह भला आप को अच्छा लगेगा क्या ? भेंगी आंख वाला धोबी का बेटा भरत नया -नया कालेज में दाखिल हुआ। यह उन के खानदान का पहला चिराग है जो कॉलेज का मुंह देख रहा है।
भरत सुबह कॉलेज चला जाता। दोपहर को वापस आ कर सोसाइटी के लोगों के दिए कपड़ों पर इस्त्री करता रहता। शाम को कॉमन प्लाट में अन्य छोकरों के साथ क्रिकेट खेलता। या फिर स्कूटर ले कर बाहर निकल जाता। उस के परिवार के अन्य लोग कपड़े के मिलों में कपड़ों की धुलाई, सफाई , छंटाई के लिए चले जाते हैं। मिलों में उन की पक्की नौकरी है।
इधर कुछ दिनों से भरत के व्यवहार में कुछ अनोखापन नजर आने लगा था। उस की चाल - ढाल, पहनना - ओढ़ना भी बदल गया था। कभी ट्रेक सूट में होता, तो कभी टी शर्ट और हाफ पैंट में ! कहते हैं न कि जो बात पुरूष जल्दी नहीं पकड़ पाते, उसे औरतें तुरंत समझ लेती हैं। भरत वाले ब्लाक में तीसरे माले पर १२ नंबर के फ्लेट में नये किरायेदार आए थे। फ्लेट के मालिक ने एक कमरा अपने लिए बंद कर रखा था। एक कमरा और किचन, बाथरूम, संडास आदि अपने एक पहचान वाले को भाड़े पर दे दिया था। भाडे वाले का नाम भावसर था। उस का काफी बड़ा परिवार था। पति-पत्नी ,एक युवा लड़की और तीन नौजवान बेटे। पति और दो बड़े बेटे किसी कपड़े की मिल में काम करते थे। छोटा बेटा शायद स्कूल जाता था।
दिन के समय भावसर की पत्नी और बेटी घर में दो ही होती। श्रीमती भावसर तो खा पी कर काम आदि पता कर यानी खत्म कर उंघती -उंघती सो जाती। लेकिन युवा छोकरी क्या करे ! मां के सो जाने के पश्चात वह या तो हमउम्र छोकरियों से गप्पे लड़ाती रहती या बाल्कनी में खड़ी हो कर अंदर -बाहर देखती , झांकती।
देखने में वह सुंदर थी। लंबी और आकर्षक देहयष्टि। आते -जाते कोई लड़का या छोकरा उसे देखता तो वह अपनी उभरी छाती को और उभारने की कोशिश करती। कूल्हे मटका कर चलती। वह सत्रह- अठारह वर्ष से अधिक की नहीं लगती थी। चेहरा उस का बहुत मासूम दिखता था। जैसे जापानी गुड़िया हो।
और शायद भरत उस की इसी मासूमियत पर ही मर मिटा था। दोपहर के समय जब सभी अपने घरों के अंदर होते, ये दोनों तब मिलते। वह भरत के पास उस के घर में घंटों जा कर बैठती। जाने क्या -क्या करते। रूठना, मनाना, इजहार- इकरार ! साथ- साथ, जीने -मरने की कसमें खाते। एक दूसरे पर लट्टू होते। उन के हाव -भाव ही बदल गए थे। अपने मुकाबले दुनिया उन को बौनी लगती थी।
वो क्या कहते है न कि खांसी- खुशी , इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते। सोसाइटी में उन के प्यार की चर्चे धीरे -धीरे फैलने लगी थी। पर, सीमित रूप में ही। लड़की के परिवार वालों को भी इस की जानकारी हुई। लड़की जात ! वे भला चुपचाप कैसे देखते रहते !
पहले तो उन्होंने अपनी लड़की को ही समझाया। अनेक ढंग से। उसे डराया भी। मगर जैसे बिल्ली को दूध पीने की आदत हो जाए तो दूध को कितना भी छिपा, ढक कर रखें , बिल्ली चोरी -छिपे दूध तक पहुंच ही जाती है। दूध पी ही लेती है। कुछ ऐसी ही हालत लड़की की थी। अल्हड उम्र। ... और उस के सिर से इश्क का भूत भागता ही नहीं था। यद्यपि सूरत में किसी लड़के से उस की पहले ही मंगनी हो चुकी थी। एक दिन उस के दोनों भाइयों ने भरत को अकेले में कहीं समझाया। समझाया कम। धमकाया , डराया अधिक ! भरत पर इस का कुछ अधिक ही असर हुआ था शायद।
दूसरे दिन सुबह कॉलेज जाते समय वह नजरें जमीन पर गड़ाए- गड़ाए ही चला गया। तीसरे माले पर खड़ी न लड़की की ओर देखा ही और ना ही मुस्कराया। चुपचाप सिर झुकाए निकल गया। लेकिन लड़की उस की इस बेरूखी को सह न पाई !
सुबह लगभग साढे दस बजे सोसाइटी के सब लोग अपने- अपने काम पर जा चुके थे। या जाने की तैयारी में थे कि पूरी सोसाइटी का कलेजा कांप गया ! लड़की तीसरे माले पर अपने फ्लेट की बाल्कनी की बांऊडरी पर चढ़ , नीचे कूद गई थी। किसी बड़े बंडल की तरह लुढ़कती हुई ! क्षण भर में नीचे पक्की जमीन पर पीठ के बल पड़ गई। कूल्हे की , टांग की और रीढ़ की सभी हड्डियां किसी पतली, सूखी लकड़ी की तरह तड़ -तड़ कर चटखती हुई टूट गई थी। जो जहां था, वहीं से दौड़ा। फिर टेलीफोन, ऑटोरिक्शा, भाग-दौड़, रूपये -पैसे, अस्पताल , डॉक्टर ! जोड़-तोड़, खून, ग्लूकोज ...!
... और भरत घर से फरार हो गया। लड़की पर आत्म हत्या का केस न बने ... ! उसे उकसाने का दोष न लगे। इस डर से।
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परिचय
- शेर सिंह
जमः हिमाचल प्रदेश।
आयु ः ५४ वर्ष।
शिक्षा ः एम.ए.(हिदी) पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़।
संप्रति ः एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नौकरी।
साहित्यिक अभिरूचि ः देश के विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में कहानी , लघुकथा, कविता
एवं आलेख। कई कहानी एवं काव्य संकलनों में रचनााएं शामिल।
कुछ ई - पत्रिकाओं में भी रचनाएं।
पुरस्कार ः राष्ट्र भारती अवॉर्ड सहित कई पुरस्कार, सम्मान।
अनेक वर्ष अध्यापन, अनवादक के पदों पर कार्य करने के पश्चात गत २५ वर्षों से सिडिकेट बैंक में प्रबंधक (राजभाषा)। अब तक हिमाचल प्रदेश (कुल्लू ,कांगडा) चण्डीगढ़, उडुपि (कर्नाटक), भुवनेश्वर, अहमदाबाद, भोपाल, लखनाऊ , हैदराबाद में कार्य और जून - २००८ से नागपुर में पदस्थ। लगभग संपूर्ण भारत को देखने , जानने का अवसर।
संपर्क
अनिकेत अपार्टमेंट
प्लॉट २२, गिट्टीखदान लेआउट
प्रताप नगर, नागपुर - 440 022.
E-Mail- shersingh52@gmail.com
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नौवीं से तेरहवीं शताब्दी तक बुन्देलखण्ड में चन्द्रवंशी चंदेल राजपूतों ने शासन किया। खजुराहो के शिल्प वैभव का श्रीगणेश दसवीं शताब्दी...
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1 जरा समय निकाल कर आ... तेरे मेरे दरमियान कुछ बातें , अधूरी पड़ी हैं जरा समय निकाल कर आ थोड़े मेरे "लफ्ज" ले जा ,थोड़े अपने "गम" दे जा।।...
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स्मृतियाँ..... उन प्यार करने वालों के नाम जिन्हें अपनी बीती ग़ज़ल हर रोज याद आती है, और दिल भूलना चाहता है उस परी को... पर आँखें भी.. क्...
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मेरे वतन के लोगों मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों कर रहे हो आज तुम उलटे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो...
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