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31 अक्तूबर 2009
जयंती जैन की ई-बुक – सकारात्मक कैसे बनें
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| रचना कैसी लगी: |
सुजान पंडित की व्यंग्य कविता - कुरसी हो गयी मैली
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है.
कुरसी हो गयी मैली उसको गंगाजल से धोना है..
१. तन पर होंगे खादी, बोली मिस्री सी होगी मीठी.
शुभचिंतक बन साथ रहेंगे, जब तक कुरसी नहीं मिलती..
जौहरी बनकर चुनना होगा, हमको खांटी सोना है----
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है.
२. जेपी, लोहिया, मौलाना का रूप सजाकर आयेंगे.
उनके उपदेशों की सीडी, रिमिक्स कर बजवाएंगे..
लेकिन इन बहुरूपियों पर हम सबको फ़िदा न होना है---
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है.
3. होशियारी हो अब इतनी कि, शाख पे उल्लू न बैठे.
देख चुके अंजामें गुलिस्ताँ, फिर से गुलों को न लूटे..
पाक साफ माली से अपने गुलशन को संजोना है---
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है.
--
संपर्क:
सुजान पंडित, शंकर विल्ला, कांता टोली चौक, ओल्ड एच.बी.रोड, रांची-८३४००१ (झारखण्ड)
संपर्क-९९३४३ ७०४०८
--
(चित्र – कृष्ण कुमार अजनबी का रेखांकन)
| रचना कैसी लगी: |
30 अक्तूबर 2009
रचना दीक्षित की कविता – सूर्य का संताप
सूर्य का संताप
मैंने बचपन से आज तक
हर रोज़
सूरज को सुबह औ शाम
गंगा नहाते देखा है
जैसे मानो उसने
भीष्म प्रतिज्ञा कर रखी हो
कि गंगा में डुबकी लगाये बिना
गंगा के चरण स्पर्श किये बिना
न तो मैं धरती में प्रवेश करूँगा
और न ही धरती से बाहर आऊंगा
इधर कुछ दिनों से देखती हूँ
सूरज कुछ अनमना सा है
हिम्मत जुटा पूंछ ही बैठी मैं
किन सोंचों में गुम रहते हो
बड़ा दयनीय सा चेहरा बना कर
बोला मैं सोचता हूँ
कि भगवन से प्रार्थना करूं
कि इस धरती पर पानी बरसे
रात दिन पानी बरसे
और कुछ नहीं तो केवल
सुबह शाम तो बरसे
मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गयी
आखिरकार इसे भी इन्सान का दुख समझ आ रहा है
फिर सोचा शायद स्वार्थी हो गया है
खुद इतनी लम्बी पारी खेलते -खेलते थक गया है
कुछ दिन विश्राम करना चाहता है
मेरे चेहरे की कुटिल मुस्कान
देख कर वो बोला
तुम जो समझ रहे हो वो बात नहीं है
दरअसल मैं
इस गन्दी मैली कुचैली गंगा में
और स्नान नहीं कर सकता
अवाक् रह गयी थी मैं
पूछा
अपनी माँ को गन्दा मैला कुचैला कहते
जबान न कट गयी तेरी
जवाब मिला
अपनी माँ को इस हाल में पहुँचाने वाले
हर दिन उसका चीर हरण करने वाले
हर दिन उसकी मर्यादा को
ठेस पहुँचाने वाले
तुम इंसानों को ये सब करते
कभी हाँथ पाँव कटे क्या ?
फिर मैं ही क्यों ?
इसी से चाहता हूँ की
सुबह शाम बरसात हो
तो कम से कम मैं नहाने से बच जाऊँगा
सीधा दोपहर में चमकूंगा
अपना सा मुंह ले कर
कोसती रही मैं
अपने आप को इन्सान को
| रचना कैसी लगी: |
यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : हिन्दी की आखिरी किताब
अकहानी :
अकहानी वह है जो न तो कहानी है और न ही जिसमें ‘अ' अक्षर का प्रयोग होता है । वास्तव में अकहानी असफल अकहानीकारों की आंतरिक व्यथा है ।
अकविता :
कविता के नाम पर जो कूड़ा-कचरा दिमाग से बाहर फेंका जाता है, उसे अकविता कहते हैं । वास्तव में अकविता वह है, जिसे स्वयं कवि भी नहीं समझ सकें ।
अभिनन्दन :
किसी लेखक की लेखन-क्रिया बंद कराने हेतु सबसे उपयुक्त हथियार ही अभिनन्दन कहलाता है । किसी का भी अभिनन्दन कर दो, सरेआम पता चल जाएगा कि अमुख लेखक चुक गया है । आजकल हर बड़े शहर में अभिनन्दन करने हेतु दुकानें खुली हैं, कई शहरों में एक साथ अभिनन्दन कराने पर एक छोटे कस्बे में अभिनन्दन मुफ्त किया जाता है । (बिल्कुल वैसा ही मामला कि दो बड़ी कब्रों के साथ एक छोटी कब्र मुफ्त खोदी जाती है ।)
आलोचक :
वह असफल लेखक जो किसी भी लेखक को सफल होते नहीं देखना चाहता, आलोचक कहलाता है । वैसे आलोचक खटमलों की तरह लेखक का खून चूस-चूसकर मोटाता है ।
कवि :
वह व्यक्ति जो सचमुच में बेरोजगार है, हिन्दी का कवि है । बिखरे बाल, फटे कपड़े, और कपड़ों में पड़ी जुएं हिन्दी कवि की चल-अचल सम्पत्ति मानी जाती है । कई बार कवि के पीछे ठेला भर रचनाएं भी चक्कर लगाती रहती हैं । मच्छरों और कवियों की जनगणना जारी है । आंकड़ों की तलाश है ।
कवि-सम्मेलन :
हास्यास्पद रस का ऐसा वृहद आयोजन जो क्रिकेट के खेल को भी मात करता है। मंच पर आसीन हास्यास्पद-रस-सिक्त कवि संचालक से मोटा लिफाफा प्राप्त करने हेतु गलेबाजी करते हैं, मुजरा करते हैं, फिकरेबाजी करते हैं और कई बार कवयित्रियों को साथ लाकर अपना तथा संचालक दोनों का यह लोक और परलोक सुधारते हैं ।
कहानी :
वह रचना जो प्रेमचन्द के बाद लिखी ही नहीं गई, कहानी कहलाती है । वैसे आज बेचारी कहानी की दशा और दिशा दोनों ही गायब हैं । विधवा कहानी को किसी नये प्रेमचन्द की तलाश है ।
गीत :
सुरीले गले से गाई जाने वाली गद्य रचना जो अक्सर लोकगीत से उड़ाई जाती है, गीत कहलाती है, कवि सम्मेलनों तथा फिल्मों में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है, ऐसा आलोचकों का कहना है ।
घृणा :
वह प्रक्रिया जो लेखक, लेखक से करता है घृणा कहलाती है । वास्तव में आज हर लेखक दूसरे लेखक से जितनी घृणा करता है, वह एक रिकार्ड है । कहावत भी है, घृणा का फल मीठा होता है । अक्सर लेखक सम्पादक से कहते हैं, ‘यदि अमुक की रचना इस अंक में जा रही है, तो मेरी रचना को रोक दें ।'
नई कविता :
जो न तो नई हो और न ही कविता हो, उसे यार लोग नई कविता कहते हैं । इस झण्डे का परचम इन दिनों आधा झुका हुआ है । कई बार तो नई कविता पुराने जूतों की तरह ही फटी दिखाई देती है । है कोई मोची जो इसे सी कर ठीक करे ।
नई कहानी :
जो कुछ नहीं कर पाता वह नई कहानी से दिल बहलाता है । वैसे नई कहानी आजकल वैसे ही गायब है जैसे गधे के सिर से सींग ।
प्रकाशक :
वह जन्तु जो लेखक के फटे जूतों को बुरी तरह फाड़ कर उसके हाथ में दे देता है । कभी-कदा-कभार पन्द्रह रूपये का चेक भी भेज देता है जिसे बैंक में जमा कराने और संकलन में बीस रूपये खर्च हो जाते हैं । वैसे अक्सर प्रकाशक सब्ज बागों कें बादशाह माने जाते हैं ।
पांडुलिपि :
जिसे प्रकाशक लौटाता रहे और लेखक बगल में दबाए दरियागंज के चक्कर काटता रहे, उसे सामान्य जन पांडुलिपि के नाम से जानते हैं । अक्सर पांडुलिपियां घर पर सिगड़ी जलाने के काम आती हैं । ऐसा रचनात्मक प्रयोग विदेशों में अभी शुरू नहीं हुआ है । वे हम से अभी भी बहुत कुछ सीख सकते हैं ।
पापुलर साहित्य :
जो बिके वह पापुलर साहित्य कहलाता है, हां ये बात दीगर है कि वह दुकानों पर नहीं फुटपाथ पर बिकता है । वैसे भी साहित्य और साहित्यकार दोनों ही फुटपाथ पर ही ज्यादा पाए जाते हैं सो जानना रे मेरे अज्ञानी पाठक ।
पारिश्रमिक :
प्रकाशक व सम्पादक इसे पुरस्कार कहते हैं, लेखक इसे मजदूरी कहते हैं, कुल मिलाकर स्थिति ये है कि यह मृग-मरीचिका रेगिस्तान के अलावा भी काफी मात्रा में पाई जाती है ।
पाठक :
वह गधा जिस पर हर कोई लदने की कोशिश करता है, लेकिन दुलत्ती खाकर चित्त गिरता है ।
पुरस्कार :
जो मुझे मिलना चाहिए था और दूसरों को मिल गया, वही पुरस्कार है ।
भूमिका :
जो रूपये देकर अन्य लेखकों से अपनी पुस्तक हेतु लिखवाई जाए उसे भूमिका कहते हैं । भूमिका-लेखन एक ऐसा रोजगार है, जो आजकल किराये की दुकान की तरह प्रचलित है ।
मौलिक :
जो हिस्सा अच्छा होता है, वह मौलिक कभी नहीं होता और जो मौलिक होता है, वह अच्छा कभी नहीं होता है । वैसे जो चोरी का लेखन पकड़ा नहीं जा सकता है, उसे ही मौलिक लेखन कहते हैं ऐसा शास्त्रों में लिखा है ।
यात्रावृत :
बिना विदेश गए विदेशों का विवरण लिख देना ही यात्रावृत्त कहलाता है, इसी प्रकार बिना पहाड़ों को पवित्र किए पहाड़ों का अधिकृत विवरण लिख देना यात्रावृत्त कहलाता है ।
रायल्टी :
सौ प्रतिशत की पुस्तक में से पांच प्रतिशत का भाग रायल्टी है, जिसे पाने में लेखक कापीराइट बेच देते हैं । कई बार लेखक का अंतिम संस्कार करने का कापी राईट भी प्रकाशक खरीद लेते हैं, और उसका भी मुनाफा प्राप्त करते हैं ।
रद्दीवाला :
लेखन-समुदाय की अंतिम लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी, हर लेखक कर्ज में मरता है, प्रकाशक मामूली मुनाफे में मरता है, लेकिन हर रद्दीवाला लखपति मरता है (मेरी एक पुस्तक की हजार प्रतियां एक बार एक रद्दी वाले ने इकट्ठी खरीद लीं । तब से मैं उसका शुक्रगुजार हूं ।)
लेखक :
भारतवर्ष में जीवित रूप में फटीचर और मरने के बाद महान हो उसे लेखक कहते हैं । (मरणोपरान्त महान बनने की यह परम्परा मेरे ऊपर भी लागू होगी ।)
विज्ञापन :
भूमिका, प्राक्कथन, सम्मतियां आदि ही विज्ञापन के विविध रूप हैं । कई बार इन स्थानों पर अर्धनग्न नारियों के अनावृत आकारों से भी काम चलाया जाता है ।
व्यंग्य :
जो और कुछ नहीं लिख सकता है, वह जो कुछ भी लिखता है, वही व्यंग्य है । और जो और कुछ नहीं पढ़ सकता, वह जो भी पढ़ता है वह व्यंग्य हो जाता है । वास्तव में शुद्ध व्यंग्य हेतु आरक्षण की आवश्यकता है । यदि चन्दा किया जाए तो मैं इस आन्दोलन का नेतृत्व करने को तैयार हूं ।
शोध :
इस शब्द का सही उच्चारण ‘षोथ' है । जो अक्सर विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों के चेहरे पर पाई जाती है । शोध वह है जिसे बिना किए ही पांच सौ पन्नों की पुस्तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मदद से प्रकाशित की जाती है ।
सम्पादक :
वह शख्स जो सखेद साभिवादन कई बार अपनी पत्नी को भी लौटा देते हैं । अयाचित या पूर्व स्वीकृति के अभाव में ये अपनी संतानों का भी दायित्व निर्वाह नहीं करते हैं । वैसे इनके हाथ में एक कैंची रहती है । सामान्यतया सभी सम्पादक भूतपूर्व लेखक होते हैं और कई तो अभूतपूर्व होते हैं ।
समानान्तर कहानी :
जो रेलवे की पटरियों की तरह समानान्तर चले उसे समानान्तर कहानी कहते हैं । कई बार क्षितिज पर जाकर ये मिल जाती है और ऐसी गडमड होती है कि कुछ समझ में नहीं आता है ।
साहित्य :
जो पढ़ा नहीं जाए वो साहित्य है और जो पढ़कर समझ में नहीं आए वह सत्साहित्य है । वैसे जो थोड़ा-बहुत भी समझ आ जाए वह घटिया साहित्य कहलाता है ।
सम्मतियां :
अपनी पुस्तक का ऐसा अचूक विज्ञापन जो चूरण की गोलियों के विज्ञापन को भी मात करता है । कई बार पुस्तक लेखक स्वयं ही सम्मतियां लिखकर प्रकाशित कर लेता है ।
साहित्यिक समाजवाद :
वह चीज तो चौराहे से चल चुकी है और अब मेरे घर में पहुंचने ही वाली है, साहित्यिक समाजवाद है ।
हिन्दी साहित्य की यह आखिरी किताब मैंने अपने दुरूस्त होषोहवास के साथ लिख दी सो सनद रहे और वक्त जरूरत काम आवे ।
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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर,
जयपुर 302002 फोन 2670596
| रचना कैसी लगी: |
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : रेनू'दीपक ' का व्यंग्य - मिलावट
मिलावट
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कुत्ते की वफादारी के किस्से बहुत जाने पहचाने हैं। पता नहीं कौन से कम्पोजीशन का खून कुत्ते कि रगों में भरा है। इंसान के शारीर में कुत्ते के जैसा खून क्यूँ नहीं है। काश ऐसा होता तो इंसान वफादारी करना सीख जाता। यहाँ तो किसी रिश्ते में वफादारी है ही नहीं। कोई भी रिश्ता जिन्दगी कि किसी भी किताब से उठा कर देख लो। तुम ऊपर बैठे बैठे क्या मुस्कुरा रहे हो। तुम भी तो बंधे हो रिश्ते कि डोर से। पर तुम अनोखे हो। बांध कर भी नहीं बंधते हो। हमें बाँध दिया। एक तरफ तुम्हारी डोर है जिससे तुम नचा रहे हो , और साथ ही इतने सारे रिश्तों से और बाँध दिया। अब कहाँ भाग सकते हैं हम। होगा इससे बड़ा कोई कैदखाना ! देख रहे हो न सर्कस ! हम कोई सर्कस के पात्र हैं ...? क्या समझ रखा है ...? हाँ , दुनिया सर्कस ही तो है। कोई जोकर है यहाँ तो कोई नट है। या तो दुनिया के इशारों पर नाचते हैं हम या फिर हम पर हंसती है दुनिया ... पर तुमने इंसान का खून, कुत्ते के खून जैसा क्यों नहीं बनाया ? क्या इसलिए कि फिर कोई धर्मेन्द्र आकर न कहने लगे ' कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा ' । अरे गोड जी फिर तो ऐसा वही लोग कहते, जो पागल हो जाते। और हम उनके लिए सोच लेते कि बेचारा वेक्सिनेशन नहीं करा पाया अपना ...पागल हो गया। और इस पागलपन का फायदा उठा कर चाहे संसद पर हमला करता या सांसद पर ... पागल है न बेचारा ... अफ़सोस कि बात तो ये है कि तुम्हें इत्ती सी बात समझ नहीं आई। थोड़े से खून की ही तो बात थी। काश .... काश , तुमने थोड़ी मिलावट करना भी जान लिया होता ...
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| रचना कैसी लगी: |
29 अक्तूबर 2009
अशोक गौतम का व्यंग्य : मुबारकां! मुबारकां!!
वे हाव भाव से पूरे के पूरे सरकारी बंदे ही लग रहे थे। उन पांच में से एक ने कंधे पर एक टूटी कुदाल ली थी तो दूसरे ने बिना हथ्थी का बेलचा उठाया हुआ था। तीन जनों ने पैंट में हाथ डाले हुए थे। उन्होंने गुनगुनाते हुए, कमर मटकाते हुए मुहल्ले में एंट्री मारी तो हम मुहल्ले वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। लगा सरकार के कान पर जूं रेंग गई है। हम तो मान बैठे थे कि कि सरकार के पास और तो सबकुछ होता है पर कान नहीं होते। मुहल्ले की छः महीने से इकलौती स्ट्रीट लाइट खराब है। पचास बार शिकायत दर्ज करवा चुके थे। कुछ नहीं हुआ। चार महीने से मेन सिवरेज पाइप टूटी हुई है। जो भी कोई मुहल्ले से बाजार जाता कमेटी के दफ्तर जा शिकायत कर आता। कुछ न हुआ। वैसे तो मुहल्ले के हर घर में ही सरकार ने नल लगवाया हुआ था पर पानी सार्वजनिक नल में ही आता था। पंद्रह दिन से वह नल भी बच्चे की शू शू की धार पर उतर आया था। बारीनुसार कमेटी में शिकायत करने गया तो वहां पर कुर्सी तोड़ते बंदे ने डांटते कहा,‘ यार! तुम लोगों को कोई और काम भी है या नहीं!'
‘क्या मतलब?'
‘ माडल मुहल्ले से ही हो न?'
‘हां जी!'
‘मैं तो देखते ही पहचान गया था।' कुछ देर हंसने के बाद वह आगे बोला,' कहो किस चीज की शिकायत दर्ज करवानी है बिजली की?'
‘ नहीं , वह तो चार महीने पहले करवाई थी। अब शिकायत लिखवा लिखवा कर थक गए।'
‘तो गंदगी की?'
‘ थक हार कर अब हम खुद ही मुहल्ले को साफ करने लग गए हैं।'
‘ वैरी गुड यार! लगता है समझदार हो रहे हो। अगर व्यवस्था को इसी तरह सहयोग दो तो न कठिनाई तुम्हें हो और न हमें। तो सीवरेज की․․․․․!'
‘नहीं साहब! अब हमने अपने मुहल्ले में शौच करना बंद कर दिया है।'
‘ अरे वाह! तुम तो हद से ज्यादा समझदार हो रहे हो। अब देखना! तुम भी चैन से रहोगे और हम भी। जीना इसीका नाम है मित्र।' कह उसने मुझे शादी शुदा प्रेमिका की तरह गले लगा लिया। मैं उसके गले लगते ही उसके कान में फुसुसाया,‘ पानी की शिकायत करने आया हूं।‘ मेरे कहते ही एकदम मुझसे दूर हटते बोला,‘ बस यार! कर दी न फिर वही बात! आप लोग हो ही ऐसे। नाक में दम करके रखते हो । एक शिकायत निपटती नहीं कि दूसरी लेकर आ धमकते हो। तुम्हें शिकायत करने के सिवाय कोई और काम भी हैं क्या? मालूम है, हमें तो आप लोग दम लेने नहीं दोगे पर कम से शिकायत को तो दम लेने दिया करो। जीना हो तो कुछ और भी करो दोस्त! शिकायत करने से पेट नहीं भरा करते। रजिस्टर ही भरा करते हैं। लो, दर्ज कर दी शिकायत! अब खुश??'
उन बंदों में से एक मेरे पास आया, बोला,‘ दरी होगी?'
‘हां है।'
‘ तो दीजिए।‘ मैं भीतर गया और उसका मुंह देखते हुए दरी उसे पकड़ा दी। उसने दरी ली और मुहल्ले के चबूतरे पर बिछा ताश खेलने जम गए। ग्यारह बजे․․․․बारह बजे ․․․एक बज गया․․․ दो भी बज गए․․․ वे ताश में ही मस्त रहे। हिम्मत कर मुहल्ले के प्रधान ने उनसे पूछा,‘ माफ कीजिए कहां से आए हो?'
‘कमेटी से।' उनके कहते ही यह खबर मुहल्ले में आग की तरह फैल गई।
‘नलका ठीक करने आए हो?'
‘नहीं।' एक ने बालों में उंगलियां देते कहा।
‘बिजली ठीक करने आए हो?'
‘नहीं, चाय बनेगी क्या?' दूसरे ने अलसाते हुए कहा।
‘तो फिर सीवरेज ठीक करने आए होंगे?'
‘ एक बात बताना?इस मुहल्ले में शिकायतें रहती हैं या बंदे?' तीसरे ने गुस्साए कहा। शायद ताश खेलकर कुछ ज्यादा ही थक गया था।
‘तो आप किसलिए आए हैं?' काका में पता नहीं हिम्मत कहां से आ गई थी।
‘मुहल्ले के लिए बुत सेंक्शन हुआ है। लड्डू शड्डू खिलाओ यार! बड़ी भूख लगी है। मंत्री जी के आदेश हैं कि मुहल्ले में जगह देखो कि कहां लगाना है। अगले हफ्ते वे बुत का शिलान्यास करेंगे। इस नल की जगह लगा दें बुत? वैसे भी इसमें पानी तो आ नहीं रहा। कि ये बिजली का पोल हटा दें यहां से? लाइट है इसमें?'
‘जी नहीं।'
‘बेकार की चीजें ही भरी हैं क्या यार इस मुहल्ले में?'
‘ साहब! सीवरेज भी बंद है।'
‘इस मुहल्ले के लोगों को खाने और हगने के सिवाय और भी कोई काम है क्या?? चलो यार! चलते हैं अब चार बज गए, बाकी कल देख लेंगे।'
‘ड्यूटी तो पांच बजे तक होती है न सरकार??'
‘चार के बाद पांच ही बजते हैं न? तीन तो नहीं बजते?' चारों ने बड़बड़ाते हुए एक साथ कहा और ये गए कि वो गए। जाते जाते मुए झाड़ कर दरी भी नहीं दे गए।
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अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि․प्र․
| रचना कैसी लगी: |
एस. के. पाण्डेय की बाल कविताएँ
बच्चों के लिए : चूहा और खरगोश
(१)
चूहा जी ने पिया शराब ।
इनकी आदत बड़ी खराब ।।
नशे में झूमे गिरे धड़ाम ।
मानो हो गया काम तमाम ।।
डॉक्टर जी आये खरगोश ।
देख के बोले हुआ बेहोश ।।
दिए दवाई आ गया होश ।
बोले देखूँ आये जोश ।।
पी लूँ तो कर दे खामोश ।
इसमें नहि कुछ मेरा दोष ।।
(२)
खरगोश जी बोले सुनिए आप ।
भैया पीना समझो पाप ।।
करिये राम-नाम का जाप ।
मिट जाये तेरा परिताप ।।
तुम हो दो बच्चों के बाप ।
उनको भी होता संताप ।।
स्वास्थ्य भी इससे तेरा बिगड़े ।
घर में आके तूँ नित झगड़े ।।
जो पीता उसका घर उजड़े ।
छोड़ो हो जाओ मोटे-तगड़े ।।
(३)
चूहा जी ने मानी बात ।
हो गया जीवन में प्रभात ।।
बीत गयी दुःख की सब रात ।
करते न कोई उत्पात ।।
बच्चों से अब करते बात ।
चुहिया भी मन में पुलकात ।।
दिन-दिन बढ़ती उनकी कांति ।
घर में भी रहती सुख-शांति ।।
(४)
गन्दी आदत से दुःख होता ।
समझे न जो बाद में रोता ।।
कभी नहीं वो सुख से सोता ।
पास में भी रहता वो खोता ।।
जीवन भार बने वो ढोता ।
जाये कीचड़ में वो धोता ।।
पानी में ही लगता गोता ।
काटे जग जैसा जो बोता ।।
- एस के पाण्डेय,
समशापुर (उ. प्र.) ।
URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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| रचना कैसी लगी: |
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य - भ्रष्ट व्यवस्था के लाभ
भ्रष्टाचार की जय हो ! एक और घोटाला सफलता पूर्वक संपन्न हुआ . सरकार हिल गई . स्वयं प्रधानमंत्री को एक बार फिर से भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर से कठोर कदम उठाने की घोषणायें दोहरानी पड़ी . एक और उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित की गई . सी बी आई के पास एक और फाइल बढ़ गई . भ्रष्टाचार यूं तो सारे विश्व में ही व्याप्त है , पर उन देशो में अधिक है जहां आबादी अधिक संसाधन कम , और भ्रष्टाचार के पनपने के मौके ज्यादा हैं , भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सरकारी नियम कमजोर हैं . भारत के संदर्भ में बात करे तो मै समझता हूं कि हम सदा से किसी न किसी से डर कर ही सही काम करते रहे हैं चाहे राजा से , भगवान से , या स्वयं अपने आप से . पिछले सालों मे आजादी के बाद से हमारा समाज निरंकुश होता चला गया . हर कहीं प्रगति हुई , बस आचरण का पतन हुआ . नैतिक शिक्षा को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल जरूर किया गया है पर जीवन से नैतिकता गायब होती जा रही है . धर्म निरपेक्षता के चलते धर्म का , दिखावे का सार्वजनिक स्वरूप तो बढ़ा पर धर्म के आचरण का वैयक्तिक चरित्र पराभव का शिकार हुआ . यह बात लोगो के जहन में घर कर गई कि सरकारी मुलाजिमों को खरीदा जा सकता है , कम या अधिक कीमत में . हाल के , घोटाले ने भ्रष्टाचार की इस चर्चा को पुनः सामयिक , प्रासंगिक बना दिया है . अपने इस व्यंग लेख में मैं किसी घोटाले विशेष का नाम न लिखकर इसे जनरलाइज करते हुये व्यंग लिख रहा हूं , जिससे कैलेंडर की तारीखें मेरे व्यंग को पुराना न कर सकें . घोटालों का क्या है , औसतन महीने में दो की दर से उच्च स्तरीय ऐसे घोटाले होते ही रहते हैं , जो चैनलों के लिये सनसनी खेज होते हैं , पत्र पत्रिकाओं के लिये स्कूप स्टोरी बन सकते हैं , जिनमें सरकारों को हिलाने का दम होता है , जो विरोधी पार्टी को नवजीवन और एकजुटता प्रदर्शित करने का मौका देते हैं . सो मेरा यह आलेख आर्काइव के रूप में संजोया जा सकता है , जिस संपादक को जब मन हो तब इसे प्रकाशित करे , यह सामयिक , तात्कालिक और प्रासंगिक रहेगा .
सरवाइवल आफ फिटेस्ट के सिद्धांत को ध्यान में रखे , तो हम सहज ही समझ सकते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद भी जिस तरह से भ्रष्टाचार दिन दूनी रात चौगुनी गति से फल फूल रहा है , उसे देखते हुये मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि विश्व गुरु भारत को भ्रष्टाचार के पक्ष में खुलकर सामने आ जाना चाहिये . हमें दुनियां को भ्रष्टाचार के लाभ बताना चाहिये . पारदर्शिता का समय है , विज्ञापन बालायें और फिल्मी नायिकायें पूर्ण पारदर्शी होती जा रही हैं . पारदर्शिता के ऐसे युग में भ्रष्टाचार को स्वीकारने में ही भलाई है . स्वयं हमारे प्रधानमंत्री जी स्वीकार कर चुके हैं कि दिल्ली से चला एक रुपया , गांवों में पहुंचते पहुंचते १५ पैसे में बदल जाता है ... भ्रष्टाचार करते हुये , सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार की बुराई करने की दोहरी मानसिकता के साथ अब और जीना ठीक नही . जब भ्रष्टाचार के ढ़ेर सारे लाभ हैं तो फिर उन्हें गिने गिनायें और गर्व से यह कहें कि हाँ हम भ्रष्टाचारी हैं , हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे . भ्रष्टाचार के अनंत लाभ हैं . बिना लम्बी लाइन में लगे हुये यदि घर बैठे आपका काम हो जाये तो इसमें बुरा क्या है ? अब जब ऐसा होगा तो इसके लिये कुछ सुविधा शुल्क भी आप चुकायेंगे . देने वाले राजी , लेने वाले राजी , पर आपकी इस सफलता व योग्यता को देखकर लाइन में लगे बेचारे आम आदमी इस सबको भ्रष्टाचार की संज्ञा दें , तो यह उनकी नादानी ही कही जानी चाहिये . स्कूल कालेज में एडमीशन का मसला हो , नौकरी का मामला हो , नियम कानून को पकड़कर बैठो तो बस परीक्षा और इंटरव्यू ही देते रहो . समय , पैसे सबकी बरबादी ही बरबादी होती है . बेहतर है सिफारिशी फोन करवायें , और पहले ही प्रयास में मन वांछित फल पायें . अब जब मन वांछित फल मिलेगा तो आप मूर्ख थोड़े ही हैं जो प्रसाद न चढ़ायेंगे ? इस प्रक्रिया को जो भ्रष्टाचार मानते हैं उन्हें नैतिकता का राग अलापने दें , ये समय से सामंजस्य न बैठा पाने वाले असफल लोग हैं . जो कुछ जितने में खरीदा जाना है वह तो उतने में ही आयेगा , अब यदि सप्लायर सदाशयी व्यवहार के चलते आर्डर करने वाले अधिकारी और बिल पास करने वाले बाबू साहब को कुछ भेंट करे तो समझ से परे है कि यह भ्रष्टाचार कैसे हुआ . शिकायत कर्ता को उसका समाधान मिल जाये , उसके दुख , कष्ट दूर हो जायें और वह खुशी से वर्दी वालों को कुछ दे देवे तो भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम चलाने वालों के पेट में दर्द होने लगता है , अरे भैया ! दान , दक्षिणा , भेंट , बख्शीस , आदान प्रदान , का महत्व समझिये .
भ्रष्टाचार के लाभ ही लाभ हैं . परस्पर प्रेम बना रहता है , कामों में सुगमता होती है , निश्चिंतता रहती है . सब एक दूसरे की चिंता करते हैं . सद्भाव पनपता है . भ्रष्टाचार एक जीवन शैली है . इसे अपनाना समय की जरूरत है . इस व्यवस्था में आनंद ही आनंद है . एक बार इसका हिस्सा बनकर तो देखिये , आपकी रुकी हुई फाइल दौड़ पड़ेगी , कार्यालयों के व्यर्थ चक्कर लगाने से जो समय बचे उसे परमार्थ में लगाइये , कुछ भ्रष्टाचार कीजिये किसी का भला ही करेंगे आप इस तरह . गीता का ज्ञान गांठ बांध लीजिये , साथ क्या लाये थे ? साथ क्या ले जायेंगे , अरे कुछ व्यवहार बनाइये . मिल बांटकर खाइये खिलाइये . जियो और जीने दो . जितनी ईमानदारी भ्रष्टाचार की अलिखित व्यवस्था में है उतनी स्टेम्प पेपर में नोटराइज्ड एग्रीमेंट्स में हो जाये तो अदालतों के चक्कर ही न लगाना पड़े लोगों को . भ्रष्ट व्यवस्था में कभी भी अविश्वास , संदेह , या गवाही जैसी बकवास चीजों की कोई जरुरत नही होती . यदि कभी कोई भ्रष्टाचारी विवशतावश किसी का कोई काम नहीं कर पाता तो , सामने वाला उसे सहज ही क्षमा करने का माद्दा रखता है , वह स्वयं भ्रष्टाचार कर अपने नुकसान को पूरा करने की हिम्मत रखता है , ऐसी उदारहृदय व्यवस्था , मानवीयता की वाहक है , आइये भ्रष्टाचार का खुला समर्थन करें , भ्रष्टाचार अपनायें , भ्रष्ट व्यवस्था के अभिन्न अंग बने . जब हम सब हमाम में नंगे हैं ही तो फिर शर्म कैसी ?
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परिचय
विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
जन्म २८ . ०७ . १९५९ , मंडला म . प्र .
शिक्षा सिविल इंजीनियरिंग में रायपुर से स्नातक , फाउंडेशन इंजीनियरिंग में भोपाल से स्नातकोत्तर
उपाधियां , इग्नउ से मैनेजमेंट मे डिप्लोमा , सर्टीफाइड इनर्जी मैनेजर .
पिता वरिष्ठ साहित्यकार प्रो . सी . बी . श्रीवास्तव विदग्ध
माँ शिक्षाविद् श्रीमती दयावती श्रीवास्तव
पत्नी स्वतंत्र लेखिका श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव
बच्चे इंजीनियर अनुव्रता , अनुभा , अमिताभ
संप्रति अतिरिक्त अधीक्षण इंजीनियर म . प्र . राज्य विद्युत मंडल , जबलपुर
प्रकाशित किताबें आक्रोश कविता संग्रह
रामभरोसे व्यंग संग्रह
हिंदोस्ता हमारा नाटक संग्रह
जादू शिक्षा का नाटक
कौआ कान ले गया व्यंग संग्रह
जल जंगल और जमीन
फोल्डर रानी दुर्गावती , व मण्डला परिचय
प्रकाशनाधीन किताबें
कान्हा अभयारण्य परिचायिका
कविता संग्रह आदि
आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनेक प्रसारण , रेडियो रूपक लेखन
विभिन्न सामूहिक संग्रहों में रचनायें प्रकाशित
पत्र पत्रिकाओ में नियमित लेखन
उपलब्धियाँ रेड एण्ड व्हाइट राष्टीय पुरुस्कार सामाजिक लेखन हेतु
रामभरोसे व्यंग संग्रह को राष्टीय पुरुस्कार दिव्य अलंकरण
सुरभि टीवी सीरियल में मण्डला के जीवाश्मो पर फिल्म का प्रसारण
ब्लागिंग २००५ से हिन्दी ब्लागिंग
ब्लाग http://vivekkevyang.blogspot.com
ई मेल vivekranjan.vinamra@gmail.com
संपर्क बंगला नम्बर ओ बी . ११ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
सदा साथ ०९४२५८०६२५२
vivek ranjan shrivastava
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27 अक्तूबर 2009
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : मीनू खरे का व्यंग्य - लिफ़ाफ़ाबाद का ब्लॉगर सम्मेलन और मच्छर
एक शहर था लिफाफाबाद. उस शहर में कुछ ब्लॉगर और बहुत सारे मच्छर रहते थे. ब्लॉगर बड़ी मेहनत से ब्लॉगिंग करते थे और मच्छर खून चूसने का पुश्तैनी काम किया करते थे.मच्छरों को ब्लॉगर्स के ब्लॉग पढ पढ कर बड़ी ईर्ष्या होती थी क्यों कि खून चूसने का काम कोई सरकारी नौकरी की तरह तो था नही कि ऑफ़िस पहुँचे नहीं कि ब्लॉगिंग और टिपियाना शुरू! यहाँ तो रात रात भर जाग कर कस्टमर के सिर पर घंटों लोरी गाइए तब जाकर बूँद भर खून का इंतजाम हो पाएगा. अब रात भर इतनी मेहनत के बाद कोई क्या खाक ब्लॉगिंग करेगा? यही कारण था कि क्वालिफ़िकेशन होते हुए भी एक भी मच्छर अब तक अपना ब्लॉग नहीं बना पाया था. वैसे भी ब्लॉगिंग के लिए कितनी योग्यता की ज़रूरत ही होती है?
एक दिन शहर के एक ब्लॉगर को जाने क्या सूझी कि उसने देश भर के ब्लॉगरों की मीटिंग बुलाने की सोची. क्यों कि पोस्टों के आदान प्रदान, सनाम और बेनामी टिप्पणियों,यहाँ तक कि ऐग्रीगेटर, मॉडरेशन के बावजूद काफ़ी कुछ ऐसा था जिसे आमने-सामने बैठ कर सलटाया जाना ज़रूरी लगता था.बात शहर के अन्य ब्लॉगरों तक पहुँची. सबने कहा व्हॉट ऐन आइडिया सर जी! तीन बार सबने कहा "क़ुबूल,क़ुबूल,क़ुबूल" और मीटिंग बुलानी पक्की हो गई. किसे-किसे बुलाना है, लिस्ट बनने लगी, ईमेल पते ढूँढे जाने लगे, मोबाइल बजने लगे. लकी ड्रॉ डालकर ब्लॉगर अतिथियों की लिस्ट बनाई गई. फोन किए गए. जिनके फोन बजे वो धन्य हुए जिनके नही बजे वे मोबाइल कम्पनियों को गरियाने लगे कि अनचाही कॉलें तो खूब मिलती है पर मनचाही नहीं.
निमंत्रण मोहल्लों, कॉफ़ी हाउसों में पहुँचने लगे. ब्लॉगर समझ गए कि भड़ास निकालने का मौक़ा आ गया है."लिफ़ाफ़ाबादी" अपने काम के धुरन्धर होते हैं अत: ब्लॉगर की हर प्रजाति को न्योता भेजा गया.
" भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण ब्लॉगर तुम्हे बुलाने को
हे कुंठासुर! हे भैंसासुर! भूल न जाना आने को "
मीटिंग में कुंठासुर से लेकर भैंसासुर तक, मसिजीवी से लेकर श्रमजीवी तक, अफ़लातून, खातून , रवि ,कवि,वैज्ञानिक, इंजीनियर,साहित्यकार,पत्रकार सभी चिठ्ठाकार की कैपेसिटी में पहुँचे. मच्छरों को ब्लॉगरों की यह फुरसतिया गैदरिंग देख कर बड़ी कोफ़्त हुई पर बिचारे कर क्या सकते थे! मच्छरों को बड़ा दुख हुआ कि इतने बड़े आयोजन में उन्हें नही बुलाया गया श्रमजीवी और मसिजीवी तो नही मगर परजीवी श्रेणी में तो उनकी बिरादरी आती ही है और यह किसे नहीं पता कि कुछ ब्लॉगर जन्म से ही परजीवी होते हैं (कॉपी-पेस्ट ज़िन्दाबाद!). फ़िलहाल मच्छरगण मीटिंग को लेकर बहुत उत्सुक थे. उन्होने तय किया कि भले ही बुलाया न गया हो पर वो भी सभागार में भनभनाएँगे तो ज़रूर. हो सकता है कोई दिलवाला उन्हे भी माइक सौंप दे!
खैर मीटिंग शुरू हुई.माला-फूल,दीप-बाती,भाषण कॉफ़ी के बीच उदघाटन सत्र बीता. ब्लॉगरों का रोल ताली बजाने के सिवा और कुछ नहीं था इस सत्र में. सब, बड़ी मजबूरी में गुड-ब्वाय बने बैठे रहे, सोचते रहे एक बार हमारा मौक़ा आने दो तब बताएँ! इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं. अगला सत्र शुरू होने की सीटी बजी. "खाए-पिए-अघाए लोगों" की जमात, एक साथ रिंग में उतर चुकी थी और रिंग-मास्टर का कंसेप्ट तो ब्लॉग जगत में होता ही नहीं. लोकतंत्र के पाँचवें खम्भे के इर्द-गिर्द् सब स्वतंत्र ! बात सीधी-साधी बातों से शुरू हुई पर सेंसेक्स की भाँति ही जुमले शूट करने लगे मसलन "ब्लॉग बहस का प्लेटफार्म नहीं है", "बेनामी दस कदम आकर जाकर लड़खड़ा जाएगा", "एक भी मर्द नहीं है जो स्वीकार करे कि हम अपनी पत्नी को पीटते हैं",औरत बिना दुपट्टे के चलना चाहती है जैसे जुमले। . . .(बन्द करो कोई पीछे से कुंठासुर जैसा कुछ कह रहा है।),पोर्नोग्राफ़ी जैसे जुमले पर वंस मोर के नारे लगने लगे...अपनी स्ट्रैटेजी के मुताबिक मच्छरगणों ने भनभनाना शुरू किया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के धनी ब्लॉगर्स की हुँकार के आगे मच्छर फीके पड़ने लगे. मच्छरों ने एक कहावत सुन रखी थी कि ब्लॉगर कहीं का भी हो वो जात का "मुँहनोचवा" होता है..और आज के इस कार्यक्रम में वे इस कहावत का लाइव टेलीकास्ट देख रहे थे ! आयोजकों के तय किए गए विषय धरे के धरे रह गए. आखिर ब्लॉगर् किसी के निर्देशों को क्यों माने? हर व्यक्ति ने जिस विषय पर चाहा बोला, जो चाहा बोला! किसी के कुछ समझ में आया हो, न हो गरीब मच्छरों की समझ में कुछ नही आया.
शाम हुई, रात हुई. सारे दिन के थके हारे ब्लॉगर्स खर्राटे मार कर सो गए. उनके सपनों में लिफ़ाफ़ाबाद सम्मेलन की रिपोर्टिंग सम्बन्धी दाँवपेंच भरे आइडियाज़ आने लगे.मच्छर कोई ब्लॉगर तो थे नही जो सो जाते. उन्होने अपने कस्टमरों के सिर पर रोज़ की तरह लोरी गानी शुरू कर दी. आखिर रोज़ी-रोटी का सवाल था!
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26 अक्तूबर 2009
सुजान पंडित की व्यंग्य कविता – लुट गई सब्जी की झोली…
लुट गई सब्जी की झोली --------
ऐसी खबर छपी है मौला, आज के अख़बार में.
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में..
आलू, गोभी, परबल, भिन्डी, सौ-सौ ग्राम था झोली में.
मन में ख़ुशी, आँखों में चमक, रस भरा था उसकी बोली में.
माँ खड़ी थी चूल्हा जलाये, बेटे के इंतज़ार में -----
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में-----
सारे शहर में चर्चे हो गए, सब्जियों के लुट जाने की.
बीमा वाले घर घर पहुंचे, नींद उड़ गई थाने की.
आलू प्याज हो जिनके घर, वो ताले जड़ दिए द्वार में----
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में----
सोने-चाँदी का क्या कहना, प्याज रखते लॉकर में.
रात जागकर सोते जिस दिन, सब्जी आती है घर में.
पास पड़ोस से डर लगता, कुछ मांग न ले उधार में----
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में----
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सी . बी . श्रीवास्तव " विदग्ध " की कविता
प्रभामय ओंकार हूं मैं
व्यक्ति नहीं विचार हूं मैं,
जगत का आधार हूं मैं !
एक झोंका हूं हवा का,
नहीं जिसका ठौर कोई
ज्ञान हूं ,
विज्ञान हूं , जिसको समझते लोग कोई !
नहीं जिसका रूप रंग ,
वह अमृत वर्षी प्यार हूं मैं !!
सर्व व्यापी हूं ,
है चिन्मय और जाग्रत जगत जिससे
माया के व्यामोह में हूं ,
आ फंसा हूं यहां इससे !
हूं अमित आकाश नीरव ,
जलधि पारावार हूं मैं !!
हूं स्वतः से भी अपरिचित ,
किन्तु युग का जन्मदाता
है तो सत्ता निरन्तर
फिर भी फिर भी समझ में जो न आता
तरुणी का बनता बिगड़ता ,
सामयिक अभिसार हूं मैं !!
जानने को रहस्य जिसका मनस्वी नित सोचते हैं
"नेति " " नेति " के तर्क रख सब ,
रहे अब तक खोजते हैं
नहीं कोई आकार जिसका ,
प्रभामय ओंकार हूं मैं !!
व्यक्ति नहीं विचार हूं मैं ,
व्यक्ति नहीं विचार हूं मैं !!
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कवि परिचय
प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध"
वरिष्ठ साहित्यकार , कवि , अर्थशास्त्री , शिक्षाविद्
बंगला नम्बर ओ.बी.११
विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
मो. ०९४२५४८४४५२
जन्म २३मार्च १९२७ , मण्डला म.प्र.
शिक्षा एम.ए. हिन्दी , एम.ए.अर्थशास्त्र
साहित्य रत्न , एम.एड.
सेवा शासकीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर से सेवानिवृत प्राध्यापक
आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनेक प्रसारण
प्रकाशन १९४६ में सरस्वती पत्रिका में पहली रचना प्रकाशित , निरंतर पत्र पत्रिकाओ में कविताये , लेख , छपते रहे हैं .
साहित्यिक किताबें
ईशाराधन ,
वतन को नमन
अनुगुंजन
नैतिक कथाये
आदर्श भाषण कला
कर्म भूमि के लिये बलिदान
जनसेवा
अंधा और लंगड़ा
मुक्तक संग्रह
अनुवादित पुस्तकें
मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद
रघुवंशम् पद्यानुवाद
प्रतिभा साधन
शैक्षिक किताबें
समाजोपयोगी उत्पादक कार्य
शिक्षण में नवाचार
संकलन
उद्गम , सदाबहार गुलाब , गर्जना , युगध्वनि ,जय जवान जय किसान
संपादन
अर्चना, पयस्वनी ,उन्मेष , वातास पत्रिकायें
स्थाई निवासी विवेक सदन नर्मदा गंज , मण्डला म.प्र.
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संपर्क:
प्रो. सी . बी . श्रीवास्तव " विदग्ध "
ओ बी ११
, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विनोद साव का व्यंग्य – सपनों का गांव
स्कूल और जनपद कार्यालय के भवन साफ सुथरे थे जैसे गांव में रहने वालों के उनके घर हों। सड़कें बिलकुल साफ सुथरी थीं जैसे गांव के घर के आंगन हों। सड़कों को गोबर पानी से छरा दे दिया गया था अपने आंगन की तरह। गोबर से लीप दी गई ये पतली पतली मनोहारी गलियां घरों में ऐसे घुस गई थीं जैसे नई नवेली बहुएं हों।
घर से बाहर गांव में हर कोई कहीं भी ऐसे बैठा था जैसे अपने घर में बैठा हो। चौपाल में हर कोई दूसरे से ऐसे बतिया रहा था जैसे वह चौपाल में नहीं अपने घर की डेहरी पर बैठा बतिया रहा हो। बच्चे नाच नाच कर बोरिंग से पानी निकालकर पी रहे थे जैसे बोरिंग गांव का नहीं उनके घर का हो। कुल मिलाकर गांव के भीतर घर था और घर के भीतर गांव था।
यहां एक अकेली कोलतार की पक्की सड़क थी जो कहीं से आती थी और कहीं चली जाती थी। सड़क पर चलते उस राहगीर की तरह जो इस गांव में कहीं से आता है और कहीं चला जाता है।
इस सड़क पर कभी कोई सरकारी जीप, इतवार की छुट्टी में गांव की नदी के किनारे पिकनिक मनाने आए किसी समूह की कार, किसी बड़े किसान का ट्रैक्टर और किसी छोटे किसान की लूना दिख जाती थी जिनके सायलेंसर की फटफट की निकलती आवाज गांव में गूंज जाती थी। तब गांव के सारे लोग उस पक्की सड़क की ओर उस वाहन और उसमें सवार लोगों को तब तक देखते रहते जब तक कि वह ओझल नहीं हो जाता। उनके ओझल हो जाने के बाद भी उस गाड़ी की फटफहाट मीलों दूर से गांव को सुनाई देती रहती थी।
शाम के घरियाते अन्धेरे में इस तरह की फटफटाहट भरी आवाज किसी एक ओर से मद्धिम सुर में आती थी फिर धीरे धीरे आवाज बढ़ती चली जाती थी तब मिनटों बाद वह वाहन गांव की उस एकमात्र पक्की सड़क पर दीख जाता था किसी खम्भे में लगे बिजली की पीली रोशनी में। गांव के लोग उन वाहनों को अब बिना किसी भाव भंगिमा के देखने लगे थे उन वन्य प्राणियों की तरह जो अभयारण्य में आए पर्यटकों को देखते हैं।
हमारे सपनों का गांव 'हमारा गांव'। यह पहली बार था जब किसी गांव में उस गांव की नामपट्टी लगा कहीं देखा हो। उस पक्की सड़क के किनारे पीपल का एक पुराना वृक्ष था जिसमें लोहे की घुमावदार रींग से उस गांव का नाम लिखा था और जिसे नोकदार खीलों के सहारे पेड़ में खोंच दिया गया था। सड़क पर जो भी वाहन गुजरता उसे बांयी ओर खड़े इस पीपल के पेड़ में यह लगा दिखता - हमारे सपनों का गांव 'हमारा गांव'। लहलहलहाते चमचमाते पीपल के मुलायम मुलायम से हरे पत्ते झूमते रहते थे जिनके पास जाने से एक मीठी सरसराहट सुनाई देती थी मानों उसके सारे पत्ते समवेत स्वरों में कह रहे हों - हमारे सपनों का गांव 'हमारा गांव'।
पेड़ के नीचे खड़े बच्चों की रैली निकलने वाली थी। सबके हाथ में पुटठों पर लगे सफेद कागज की बनी तख्तियां थीं जिसे पतली कमानी से बांध कर वे अपने हाथ में उठाए हुए थे। इनमें वे सारे सपने थे जो किसी गांव को एक आदर्श गांव में बदल सकते हैं।
नन्ही आँखों में ये सपने तिर रहे थे पर केवल नन्हे हाथों में होने से इन्हें नन्हा सपना नहीं कहा जा सकता था क्योंकि सपनों के आकार को देखने वाले की आयु पर निर्भर नहीं किया जा सकता। सपनों का आकार स्वप्नदर्शी की इच्छाशक्ति पर निर्भर होता है।
'वृक्ष माटी के मितान हैं, जीवन का नव विहान है।' उनकी धीमी लेकिन किलकारी भरी आवाजें गूंजी थीं। जिसमें नव विहान यानी नई सुबह की आशा चमकती थी। इनमें स्कूल ड्रेस के भीतर सिमटी हुई कुछ मिट्टी की बनी गुड़ियानुमा लड़कियां थीं जिन्हें आँखों की चमक और मद्धिम
स्वरों ने जीवन्त कर रखा था, जो भ्रूण हत्या से बचकर खुशी के मारे चहक रही थीं। एकबारगी इनके समूह को देखकर किसी चमन में होने का अहसास होता था। वीथिकाओं के किनारे विहंसते हों जैसे किंशुक कुसुम। अबकी बार इन कुसमलताओं ने राग दिया था 'चांद तारे हैं गगन में, फूल प्यारे हैं चमन में।'
साथ में घूमते गुरुजन थे 'हमारे समय में ना पर्यावरण था ना प्रदूषण था। वातावरण था जो कभी दूषित हो उठता था। हमारे समय में वातावरण दूषित होता था तो आज पर्यावरण प्रदूषित होता है।' एक गुरु ने अपना ज्ञान जताया जिसे सामान्य विज्ञान की किताब से उन्होंने अर्जित किया होगा।
यह निषादों का गांव था जिनके पूर्वजों ने कभी कृपासिन्धु को पार लगाया था। उन संकरी गलियों के बीच कोई कोई मकान ऐसे दिख जाता था जिनमें उनकी गौरव गाथा का चित्रांकन था। मिट्टी की दीवारों पर टेहर्रा (नीले) रंग से कुछ आढ़ी तिरछी रेखाएं खींची गई थीं जिनमें राम सीता, लक्ष्मण को पार लगाते निषादराज उभर कर आते थे।
'वन पुरखे, नदियां पुरखौती जान लो, पेड़ ही हैं अपने अब तो मान लो।' अगला नारा बुलन्द हुआ था। नदी के किनारे पेड़ तो थे पर नदी गुम हो गई थी। इसे नदी की रेत ने नहीं सोखा था। थोड़ी दूर पर बसे शहर की विकराल आबादी की प्यास ने इसकी जलराशि को गटक लिया था। गांव के हिस्से में रेत थी। रेत की नदी। अगर आज कृपासिन्धु इस गांव में आ जाएं तो यहां के निषादराज उन्हें अपने कंधों पर लादकर नदी की रेत को लांघते हुए ही उस पार छोड़ पाएंगे।
गलियां उतनी ही संकरी थी जितने में गांव का आदमी आ जा सके। कभी कोई गाय-भैंस आ जाए तो गली के इस पार खड़े होकर उनके निकलने का इंतजार करना पड़ता था। भैंस तो भैंस होती है पर गाय बड़ी शर्मीली और संवेदनशील होती है। अपनी जगह पर खड़ी हो जाती है सिर झुकाकर और तिरछी आँखों से आगंतुक के निकल जाने की प्रतीक्षा करती है गांव की किसी रुपसी की तरह। अगर उसे जल्दी निकलना हो तो आगंतुक के पास से गुजरते समय अपने पेट सिकोड़ लेती है ताकि अपने और आगंतुक के बीच यथेष्ट दूरी उसकी बनी रहे किसी शीलवती की तरह। इनमें कुछ गायें थीं जिनके पेट फूले हुए थे। रैली का नारा सुनाई दिया 'पॉलीथिन मिटाना होगा, गाय को बचाना होगा।'
जोश में ये नारे कभी उलटे पड़ जाते हैं 'पॉलीथिन बचाना होगा, गाय को मिटाना होगा।' ऐसी चूकों से बचाने के लिए गुरुजन कहते थे कि 'शब्दों को मत पकड़ो, उसके भाव को पकड़ो। बस्स.. भावना सच्ची होनी चाहिए।' गांव भी इस मान्यता पर जोर देता है 'जग भूखे भावना के गा।'
रैली के साथ चलने वाले एक गुरु ने अपने सामान्य ज्ञान का परिचय दिया 'अखबार में छपा था कि एक गाय का पेट चीरकर उसमें से पैंतालीस हजार झिल्लियॉ निकाली गई थीं!'
नारे केवल लोग ही नहीं गुंजा रहे थे इस गांव की दीवारें भी गूंजा रही थीं। दीवारों के केवल कान भर नहीं होते उनके मुंह भी होते हैं। विज्ञापन के इस युग में तो आजकल दीवारें खूब बोल रही हैं। इतनी ज्यादा कि गांव के सन्नाटे में शोर पैदा कर रही हैं।
एक तरफ गुड़ाखू, नस, मंजन और हर किसम के गुटके व तम्बाखू को आजमाने का शोर था तो दूसरी ओर इनसे होने वाले विनाश से बचाने पर जोर था। इनमें महिला सशक्तिकरण किए जाने और बाल विकास के लिए बहुकौशल कला शिविरों के लगाए जाने की सूचना थी।
आजकल हर योजना कॉरपोरेट लेवल पर है और हर कहीं एन.जी.ओ.की पैठ है। सरकार की समाज सेवाएं अब ठेकेदारी पर चल रही है। पंचायत एवं समाजसेवा का बंजर इलाका अब सी.एस.आर. एक्टीविटीज की चकाचौंध से भरता जा रहा है। किसी कॉर्नीवाल की तरह सुनियोजित विलेज बनाए जाने का दावा है। यहां भी रिलायंस वाले पब्लिक सेक्टरों को पछाड़ने में लगे हैं।
गुरु ने क्रोध में पूछा कहाँ हैं एनजीओ वाले? स्साले.. रैली निकलवाकर भाग गए। अब बाकी काम मास्टर करें। एक मास्टर ही तो है कोल्हू का बैल जिसे जब मर्जी चाहे जहां जोत दो।'
रैली जहाँ से शुरु हुई थी वहां लौट आई थी उस पीपल के पेड़ के पास जिस पर गांव का नाम लिखा था 'हमारा गांव'। बच्चों की अंतिम और थकी थकी आवाज गूंजी थी 'चहुं दिशा छाई पीपल की छांव, बनाएंगे हम सपनों का गांव।'
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विनोद साव, मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001
csr.bsp@gmail.com
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देवी नागरानी की पुस्तक समीक्षा : बेघर आँखें – संवेदनशील हृदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति
बेघर आँखें ( कहानी संग्रह ) ॰॰
कहानीकार – तेजेंद्र शर्मा
संवेदनशील ह्रदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति
लेखन की हर विधा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधी है मानव मन , जिसके भावों से असकी सशक्ता टपकती है , उसकी भावपूर्ण भाषा के अधिकार से संसार भर के अनुभव और अपने निजी जिये गये यर्थाय को व्यक्त कर पाते हैं।
रचना की कोई भी विधा हो , कोई भी शिल्प हो , प्रस्तुतीकरण के बाद रचयिता और पाठक के बीच का सेतु बन जाए तो वह कामयाब रचना हो जाती है। साहित्य की इस कहानी लेखन विधा को स्थाई तत्व तेजेंद्र जी की कहानियों में सहजता के साथ अपने आप को प्रकट कर रहे हैं। सहज प्रवृत्ति , अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल सी होकर प्रवाह बनकर कलम की नोक से अपना कथ्य और शिल्प ज़ाहिर कर रही है। इस माहिरता की एक नहीं अनेक झलकियां इस बात की ज़ामिन है कि तेजेंद्र जी ने जो देखा महसूस किया और भोगा उसी को रचनाबद्ध किया।
उनकी कहानियों की भूमिकाएं जीवन की सच्चाईयों से ओत प्रोत है और पात्रों के माध्यम से तेजेंद्र जी अपने खट्ठे मीठे तजुर्बो को बखूबी प्रदर्शित करते हैं - जहां पर दिखाई देता है अशाओं - निराशाओं का लहलहाता झुरमुट , कहीं संघर्ष की चौखट पर घुटने टेकते हुए बेबस कहीं मजबूर लोग जो लाचारी का भार अपने कंधों पर ढोते हैं। सृजनता अपने शिखर पर बोलती दिखाई देती है उनकी कहानी ' नरक की आग ' में . जैसे ही जिंदगी पर्दाहीन होती है तो एक असहाय पल उस जिंदगी का प्रभावशाली नजरिये से प्रस्तुत है , जहां पात्र का मनोबल यह स्वीकार चुका है कि वह एक संपू्र्ण व्यक्तित्व के मालिक नरेश , अपने समक्ष कहानी के पात्र को बुद्धविहिन घोषित करने से नहीं हिचकिचाता। स्पष्टीकरण के लिए एक अंश जिससे कहानी का आगाज हुआ जाता है , सुनिये तोलिय़े और फिर उस पस्त मन की अवस्था के कारण को परखियेः
" यहां भी नरेश मुझे मात दे गया ..... क्या मेरा जन्म इसलिए हुआ है कि मैं पग पग नरेश से मात खाता रहूं ....." जब जब नरेश दुखी होता है मैं स्वयं दुखी हो जाता हूं , क्यों होप जाता हूँ ? जीवन के हर क्षेत्र में उससे परास्त होते होने को मैं क्यों अभिशप्त हूँ . अब तो लगने लगता है , नरेश बलि और मैं सुग्रीव ! उसके सामने आते ही मेरा आधा व्यक्तित्व उसकी ओर खिंच जाता है , और मैं अधूरा सा हो जाता है। "
पात्र पूरी सच्चाई के साथ खुद को समीक्षित करते हुए जाने अपनी किन कमजोरियों के एवज अपने आप को झंझोड़ता रहता है और अनेकों प्रसंगों में अपने इस छोटेपन के भाव से और बौना हो जाता है अपनी ही नजरों में। कहानीकार अपनी सृजनशीलता द्वारा कहानी के पात्रों के साथ तभी द्वारा कहानी के पात्रों के साथ तभी न्याय कर पाता है जब वह खुद अपनी सोच की धार में उन्हें मोतियों की तरह पिरो जाता है , जहां देखने को मिलती है लयात्मक प्रवाहित शब्दों की धारा , सोच के अनेकों पड़ाव जो कभी शिखा पर , तो कभी धरातल की गहराइयों में थाह पाती है। मानव मन को टटोलने में एक कलात्मक संयम व भाव भूमि के निर्माण की भव्यता दिखायी देती है। विविधता , संकल्पशीलता और प्रस्तुतीकरण छलकता है कहानीकार तेजेंद्र जी की कलम से।
कहानी " बेघर आंखें " एक चलचित्र की तरह आजकल के माहौल का सही सरमाया है। आंखे , हाँ आँखे ही तो दिखाती हैं ये चमत्कारिक व्यहवार , आचरण , अपने परायेपन के बीच का फासला , अच्छाई , बुराई की परतें , यह जमीरों की कशमकश की पेशकश से गुजरते , भगवान और इंसान के नाते , आदम आदम का लुटेरा , आदमीयत का सौदागर जहां अकलमंदी हुनरमंदी सब की सब डह जाती है। उस तिजारत की चौखट पर जहां इंसानियत घुटने टेक देती है बिना किसी भी प्रश्न के वहां है हर प्रश्न टंगा हुआ . तेजेंद्र जी का यह प्रकाशन सामूहिक प्रयास बेघर आंखे , एक दायित्व का कार्य है जिसका निर्वाह पूर्णता से हुआ है . यह कहानी संग्रह इन मानवी आंखों से झांकता हुआ जिंदगी का हर रूप भांप लेता है। एक कलात्मक संयम के माध्यम से रचना अपने अस्तित्व की पहचान पा रही है , मानवता के अंतरमन में झांक कर मानव मूल्यों की विशेषताओं को रेखांकित किया गया है . यह सफल प्रयास की एक अनुभूति है।
मैं इसी संदर्भ में अपनी शुभकामनाएं प्रस्तुत करती हूं और यही मंगल कामना करती हूँ कि जन - मानव अपनी खुली आंखों से उन बेघर आंखों के अंदर समाये सारे दृश्य देखें , महसूस करे और सार्थकता का साथ दें .
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समीक्षक : देवी नागरानी , ९ कार्नर व्यू सोसाइटी , 15/33 रोड , बाँद्रा , मुंबई ४०००५०
कहानी संग्रहः बेघर आँखें, कहानी संग्रह , पृष्ठ संख्याः 168 , कीमतः 200 रुपये , , प्रकाशकः अरु पब्लिकेशन्स प्रा . लि . दरिया गंज , नई दिल्ली -110002 , फोनः ०११ ६४१४०००१
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24 अक्तूबर 2009
व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य : आतंकवाद अमर हो
प्रत्येक वस्तु को देखने के दो दृष्टिकोण होते हैं . आधे भरे गिलास को देखकर नकारात्मक विचारों वाले लोग कहते हैं कि गिलास आधा खाली है , पर मेरे तरह के लोग कहते हैं कि गिलास आधा भरा हुआ है . मनोवैज्ञानिक इस दृष्टिकोण को सकारात्मक विचारधारा कहते हैं . आज सारी दुनिया आतंकवाद और आतंकवादियों के विरुद्ध दुराग्रह , और ॠणात्मक दृष्टिकोण के साथ नहा धोकर पीछे पड़ी हुई है . आतंकवाद के विरोध में बयान देना फैशन हो गया है . जब दो राष्ट्राध्यक्ष मिलें और घोषणा पत्र जारी करने के लिये कुछ भी न हो तो आतंकवाद के विरोध में साथ काम करने की विज्ञप्ति सहज ही जारी कर दी जाती है .
कभी सोचकर तो देखिये कि आतंकवाद के कितने लाभ हैं . आतंकवादियों के डर से दिन रात चौबीसों घंटे हमारी सुरक्षा व्यवस्था और सैनिक चाक चौबंद रहते हैं , अनेक दुर्घटनाएं घटने से पहले ही निपट जाती हैं . सोचिये यदि आतंक का हौआ न होता तो क्या कमांडो फोर्स गठित होती ? क्या हमारे नेताओं का स्टेटस सिंबल , उनकी जेड सुरक्षा उन्हें मिलती ? जिस तेजी से सुरक्षा बलों में नये पद सृजित हुये है आतंकवाद का बेरोजगारी मिटाने में अपूरणीय योगदान है . हर छोटा बड़ा देश जिस मात्रा में आतंकवाद के विरोध में बजट बढ़ा रहा है , और इस सबसे जो विकास हो रहा है उसे देखते हुये मेरा सोचना है कि हमें तो आतंकवाद की अमरता की कामना करनी चाहिये . नयी-नयी वैज्ञानिक तकनीकी संसाधनों के अन्वेषण का श्रेय आतंकवाद को ही जाता है . सारी दुनिया में अनेक वैश्विक संगठन , शांति स्थापना हेतु विचार गोष्ठियां कर रहे है , आतंक के विरोध में धुरविरोधी देश भी एक जुटता प्रदर्शित कर रहे हैं , यह सब आतंकवाद की बदौलत ही संभव हुआ है . शांति के नोबल पुरस्कार का महत्व बढ़ा है . यह सब आतंकवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप ही हुआ है , क्या यह सच नहीं है ? अमेरिका की वैश्विक दादागिरी और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति , आतंकवाद के विरोध पर ही आधारित है . प्रत्यक्ष या परोक्ष आतंकवाद हर किसी को प्रभावित कर रहा है , कोई उससे डरकर अपने चारों ओर कंटीले तारों की बाड़ लगा रहा है तो कोई फैलते आतंक को ओढ़ बिछा रहा है . लोगों में आत्म विश्वास बढ़ा है , न्यूयार्क हो मुम्बई या लाहौर हर आतंकी गतिविधि के बाद नये हौसले के साथ लोग जिस तरह से फिर से उठ खड़े हुये हैं , जनमानस में वैसा आत्मविश्वास जगाना अन्यथा सरल नही था , इसके लिये समाज को आतंकवाद का आभार मानना चाहिये . मेरी स्पष्ट धारणा है कि आतंकवाद एक अति-लाभदायक क्रिया कलाप है , अब समय आ चुका है कि कम से कम हम सब व्यंगकारों को आतंकवाद के इस रचनात्मक पहलू पर एकजुट होकर दुनिया का ध्यान आकृष्ट करना चाहिये .
कभी बेचारे आतंकवादियों के दृष्टिकोण से भी तो सोचिये , कितनी मुश्किलों में रहते हैं वे , गुमनामी के अंधेरों में , संपूर्ण डेडीकेशन के साथ , अपने मकसद के लिये जान हथेली पर रखकर , घर परिवार छोड़ जंगलों में प्रशिक्षण प्राप्त कर जुगाड़ करके श्रेष्ठतम अस्त्र शस्त्र जुटाना सरल काम नही है . पल दो पल के धमाके के लिये सारा जीवन होम कर देना कोई इन जांबाजों से सीखे . आत्मघात का जो उदाहरण हमारे आतंकवादी भाई प्रस्तुत कर रहे हैं , वह अन्यत्र दुर्लभ है . जीवन से निराश , पलायनवादी , या प्रेम में असफल जो लोग आत्महत्या करते है वह बेहद कायराना होती है , पर अपने मिशन के पक्के ढ़ृढ़प्रतिज्ञ हमारे आतंकी भाई जो हरकतें कर रहे है वह वीरता के उदाहरण बन सकते हैं जरूरत बस इतनी है कि कोई मेरे जैसा लेखक उन पर अपनी कलम चला दे .
हमारे आतंकवादी भाई जाने कितनों के प्रेरणा स्रोत हैं , अनेकों फिल्मकार बिना रायल्टी दिये उनसे अपनी कहानियां बना चुके हैं , कई चैनल्स सनसनीखेज समाचारों के लाईव टेलीकास्ट कर अपनी टी आर पी बढ़ा चुके हैं , ढ़ेरों खोजी पत्रकारों को उनके खतरनाक कवरेज के लिये पुरस्कार मिल चुका है , और तो और बच्चों के खिलौने बनाने वाली कंपनियां बढ़ते आतंक को पिस्तौल और अन्य खिलौनों की शक्ल में इनकैश भी कर चुकी हैं .
मेरी समझ में किसी न किसी शक्ल सूरत में आतंक सदा से दुनियां में रहा है , और हमेशा रहेगा . मां की गोद में मचलता हुआ बच्चा देखा है ना आपने , अपनी आतंकी वृत्ति से ही वह मां से उसकी मांग पूरी करवा लेता है . पत्नी के आतंक पर भी प्यार आता है . हम सब के भीतर बहुत भीतर थोड़ा सा गांधी और एक टुकड़ा लादेन प्रकृति प्रदत्त है . और तय है कि प्रकृति कुछ भी अनावश्यक नही करती . आवश्यकता मात्र इतनी सी है कि सकारात्मक तरीके से उसका सदुपयोग किया जाये . सांप के विष से भी चिकित्सा की जाती है . अतः मेरी तो आतंकी भाइयों से फिर-फिर अपील है कि आओ मेरा खून बहाओ, यदि इससे उनका मकसद हल हो जाये , पर तय है कि इससे कुछ होने वाला नही है . लाखों को तो मार डाला आतंकवाद ने , हजारों आतंकवादी मर भी गये , क्या मिला किसी को ? इसलिये बेहतर है कि अपनी आतंक को समर्पित उर्जा को , सकारात्मक सोच के साथ , रचनात्मक कार्यो में लगायें , हमारे आतंकी भाई बहन और उनके संगठन , जिससे मेरे जैसे व्यंगकार ही नही , सारी दुनिया चिल्ला-चिल्ला कर कह सके आतंकवाद अमर हो , और आतंकी भाइयों के किस्से किताबों में सजिल्द छपें तथा गर्व से पढ़े जायें.
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विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११
, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
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20 अक्तूबर 2009
वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख – मीरा : सामंती अभिजात्य की विद्रोही प्रवक्ता
बदलते परम्परा के प्रतिमानों में मध्यकाल की कवयित्री मीरा अपनी लोकप्रियता में बेमिसाल हैं। इनका महत्व उस विद्रोही चेतना की अभिव्यक्ति में है जो उस समय सामन्तवाद के विरुद्ध पनप रहा था। मीरा अपनी जीवनचर्या और कविता दोनों से परम्परावादी, सनातनी व्यवस्था की जड़ता, थोथी कुल मर्यादा और जाति-पाँति की जकड़बन्दी को तोड़ती हैं। सामन्ती आभिजात्य को ठोकर मारकर विद्वतजनों का सत्संग करती है और जनसाधारण के बीच बेधड़क विचरण करती हैं। मीरा की असाधारण लोकप्रियता का रहस्य जनसाधारण से तादात्म्य में है। जनसामान्य मीरा के गीतों में अपनी भावनाओं की सीधी-सच्ची अभिव्यक्ति पाता है। मीरा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके नाम पर हजारों पद भक्तों ने रच डाले हैं। निर्गुण पंथ के अनुयायियों ने क्षेपक डालकर अपने सम्प्रदाय के अनुकूल अर्थापन करने की कोशिश की है, जबकि मीरा साम्प्रदायिक आग्रहों से एकदम मुक्त हैं। उनकी विद्रोही चेतना को अपने साम्प्रदायिक घेरे में बाँधने की कोशिश निर्गुणमार्गी रैदास और नाथपंथी योगी ही नहीं करते, चैतन्य महाप्रभु के भक्त उनको ‘गौरांग कृष्ण की दासी' बनाने की कोशिश करते हैं तो बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी पुष्टिमार्ग पर लाने और महाप्रभु की सेविका बनाने का प्रयत्न करते हैं और असफल होकर ‘वार्त्ता साहित्य' में ऊलजलूल बातें उनके खिलाफ लिखते हैं। मीरा सफलतापूर्वक इन साम्प्रदायिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं। उनकी विद्रोही चेतना किसी ढ़ांचे में नहीं बँधती। भक्ति के मार्ग में मीरा कुल मर्यादा और अभिमान को काई की तरह चीरकर प्रेम की निर्मल गंगा बहाती है जिसमें पूरी जातीय अस्मिता सराबोर हो जाती है। सन्त-सम्प्रदाय विश्व-सम्प्रदाय है और उसका धर्म विश्व धर्म है। इस विश्व धर्म का मूलाधार है, हृदय की पवित्रता। पवित्रता-सम्मत स्वाभाविक और सात्त्विक आचरण ने ही यहाँ धर्म का बृहत रूप गृहण किया। समस्त वासनाओं, इच्छाओं एवं द्वेषों से रहित हृदय की निःसीमाओं में विशाल धर्म का प्रवेश और समावेश सम्भव है।''
सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मीरा की भूमिका का जब हम मूल्यांकन करते हैं तो मीरा की पहली टकराहट सामाजिक रूढ़ियों से होती है। वे सती प्रथा का वैयक्तिक स्तर पर विरोध करती हैं। इससे पूरा परिवार उनके खिलाफ हो जाता है। पारिवारिक प्रताड़नाओं से तंग आकर मीरा वृन्दावन चली जाती हैं। वहाँ विपत्तियाँ और बढ़ जाती हैं। वहाँ राणा के आदमी पीछे पड़े रहे और उनको सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते रहे। चैतन्य महाप्रभु और बल्लभाचार्य के शिष्य अपने-अपने सम्प्रदायों में खींचने की जबर्दस्त कोशिश करते हैं। मध्यकाल में स्त्री की दयनीय स्थिति और निरीहता मीरा में साकार है। राणा सामंती दंभ और अहंकार का प्रतीक है, महाप्रभुओं के सेवक साम्प्रदायिक पाखंड और संकीर्णता के प्रतीक हैं। मीरा के पदों में विह्वल भाव से गिरधर नागर की पुकार सांसारिक विपत्तियों से उन्मोचन के लिए है। मीरा की जीवनगाथा भारतीय स्त्री पर होने वाले अत्याचारों की जीवन्त करुण कथा है। जीव गोस्वामी का स्त्रीमात्र को न देखने का प्रण छुड़वाना, कई अर्थों का संकेत करता है। ‘नारी महाविकार' वाली दृष्टि अधूरी, एकांगी और नारी जाति का अपमान करने वाली है। किसी कृष्ण भक्त का ऐसा कहना तो और ज्यादा अनुचित है। मीरा के जीवन का यह प्रकरण जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखने का आग्रह करता है तथा साधु-सन्यासियों और विरक्तों के मानसिक स्तर का भी बोध कराता है।
मीरा को वापस राजमहल लौटा लाने की कोशिशों में किसी प्रकार लगाव-जुड़ाव नहीं, झूठी मान मर्यादा की सामंती रूढ़िवादी जकड़न है। अंतिम समय में रणछोड़ जी में समा जाने का संकेत आत्महत्या का है जिस पर आध्यात्मिकता का रंग चढ़ाया गया है। मीरा के विद्रोह की करुण परिणति भारतीय जीवन में स्त्री की दुखद, हीन और दयनीय स्थिति को भरपूर प्रमाणित एवं प्रकाशित करता है।
निर्गुण भक्ति के संतों का सबसे महत्वपूर्ण आयाम एकत्व की भावना थी जिसमें ‘‘मानव को एक ऐसे विश्वव्यापी धर्म के सूत्रों में निबद्ध करना जहाँ जाति, वर्ग और वर्ण सम्बन्धी भेद न हो। साधना का यह द्वार सब के लिए उन्मुक्त था, इस क्षेत्र में हिन्दू-मुसलमान का भेद भी विलुप्त हो गया और भक्ति के क्षेत्र में सब समान प्रभावित हुए। निर्गुण भक्ति का पंच तत्व है-सहज साधना। सन्तों की भक्ति-प्रणाली आनन्द और शान्ति में संयुक्त शुद्ध अन्तः करण की वह स्वाभाविक शक्ति है जहाँ कृत्रिमता स्वतः विलीन हो जाती है सहज साधना का यह मार्ग सर्वथा अभिनव और क्रान्तिकारी था-इसने धार्मिक-जीवन की दुरुहताओं को सदैव के लिए हटा दिया।
मीरा ने भक्ति को एक नया अर्थ दिया। समूचे भक्तिकाल में उनका व्यक्तित्व सबसे विलक्षण है। केवल चैतन्य महाप्रभु से उनकी तुलना हो सकती है। भाव विभोर होकर कीर्त्तन करना, नाचते हुए होशो-हवास खो देना। भक्तिकाल मीरा से एक नया अर्थ पाता है। उनके काव्य में जहाँ कृष्ण का रसमय प्रेम है परम्परा से हटकर देखें तो मीरा के काव्य में वही सांसारिक विपत्तियों और विडम्बनाओं से मुक्ति के लिए व्याकुल, भयातुर पुकार भी है। जैसे मीरा की भक्ति वैयक्तिक है, पीड़ाएँ और कष्ट भी वैयक्तिक हैं। उनकी अपार लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि जनसाधारण उनकी वैयक्तिक पीड़ाओं और कष्टों से आसानी से जुड़ जाता है और उसे अपने कष्टों से मुक्ति का रास्ता भी उनके पदों में दिखता है।
मीरा ने अपने काव्य और आचरण के द्वारा पारम्परिक सामाजिक ढ़ाँचे और सामन्ती मूल्यों को जबर्दस्त चुनौती दी। परम्परावादी पुरुषतंत्रात्मक समाज और खोखला सामंती अहंकार कितना क्रूर और अमानवीय हो सकता है, यह मीरा की दारुण शारीरिक-मानसिक पीड़ा के चीत्कार में समाहित है। आध्यात्मिक तड़प के समानान्तरण सांसारिक ताप उनको दग्ध करता रहा और मीरा गिरधर नागर की पुकार लगाती रहीं। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर मीरा द्वारा रूढ़ियों को दी गयी चुनौती सामाजिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। मेवाड़ के राणाओं के प्रशस्तिगीत गाने के प्रति हिन्दी कवियों की उपेक्षा और उदासीनता का एक यह भी कारण हो सकता है। साम्प्रदायिक कट्टरता और सामंती क्रूरता का सफल प्रतिरोध करते हुए मीरा ने जीवन की अर्थवेत्ता मानवीय प्रेम और कृष्ण भक्ति में तलाशा। दुनियावी चकाचौंध की निस्सारता का संकेत उनकी कविताएँ करती हैं। उसमें आध्यात्मिक संकेत के साथ सामाजिक संदर्भ भी गुँथे हैं। यह दुनिया झूठी मान-मर्यादा और आदर्शों को लेकर चल रही है जिससे अपना तथा दूसरों का जीवन नरक हो गया है। सांसारिक चकाचौंध में खोये हुए व्यक्ति की समझ में केवल संसार की बात आती है। मनुष्य धरती पर विचरण करता है जिसे मूलाधार चक्र कहा गया है। सहस्त्रदल कमल वाला चक्र सातवाँ है जो गगन मंडल है। ये साधना की गूढ़ और रहस्यात्मक बातें है। चेतना के चतुर्थ आयाम में प्रविष्ट होने पर इनकी प्रतीत होती है। वैसे मीरा की साधना सगुण परम्परा ही है पर संत मन की पारिभाषिक शब्दावली का उन्होंने बेहिचक प्रयोग किया है। इस संसार के सारे नाते-रिश्ते झूठे हैं, मिट जाने वाले हैं। केवल कृष्ण जीवन-मरण का साथ निभाने वाला सच्चा साथी है।
संसार दुनियादारी और दुनियावी रिश्तों में नहीं, इस आशा में है कि कल सुख मिलेगा। यह संसार का विज्ञान है। मनुष्य निरंतर इसी के कारण द्वन्द्व की स्थिति में है। यह दुविधा ही माया है। यही भीतर तनाव और शोर पैदा करती है, जिसमें परमात्मा खो जाता है। साधना निर्द्वन्द्व होने का नाम है तभी भीतर परमात्मा प्रकट होता है, मीरा के गीतों में भक्ति का पूरा शास्त्र छिपा है। हृदय के माध्यम से प्रवेश करने पर इन पदों के अर्थ खुलते हैं। एक अन्य पद में मीरा कहती हैं-मुझे नींद नहीं आती। यह सामान्य नींद नहीं है। न तो यह कामवासना की विकलता है। यह जागरण है। ‘तलफै बिन बालम मोर जिया' जब कबीर कहते हैं तो वह इसी तरफ संकेत करते हैं। जो जाग गया है उसकी समझ में संसार का विज्ञान आ गया। यह संसार आकांक्षाओं से भरा है। मनुष्य सपनों और आकांक्षाओं की मृगमरीचिका के पीछे निरंतर दौड़ रहा है। यही वास्तविक नींद है। इस नींद से जाग जाना असाधारण है। गीता में श्रीकृष्ण का कथन ‘या निशा सर्व भूतायां तस्य जागर्ति संयमी' का संकेत इसी तरफ है। मीरा कहती हैं-‘मैंने इस संसार के मर्म को उसकी वास्तविकता में पहचान लिया है। अब सोना मेरे लिए संभव नहीं है। प्रियतम का रास्ता देखते-देखते रात का अंधेरा छंट गया-सवेरा हो गया। जैसे मछली जल के बिना तड़पती है वैसे ही उस कृष्ण के लिए मैं तड़प रही हूँ।
वैसे देखा जाए तो सभी संत मूर्तिपूजा एवं अवतारवाद के विरोधी थे, परन्तु जाने-अनजाने रूप से इनमें कुछ की रचनाओं में सगुण तत्वों का समावेश हो गया है। कबीर जैसे अद्वैतवादी और निर्गुण-दर्शन के सबल प्रतिपादक कवि के काव्य में भी कहीं-कहीं सगुण-तत्व के दर्शन होते हैं। रैदास, मलूकदास जैसे सन्तों की रचनाओं में यह तत्व बहुलता से पाये जाते हैं। सगुणोपासक की प्रवृत्ति इनकी इतर-उतर कई रूपों में स्पष्ट दिखती है, जैसे लगभग हर सम्प्रदाय में सद्गुरु को अवतार की श्रेणी में रखा गया है, जिसमें पूजा-पाठ एवं उपासना माला, तिलक आदि उपकरणों का प्रारम्भ में सभी निर्गुण सन्त निन्दा करते हैं, परन्तु गैर परम्परा आगे चलकर कहीं न कहीं इन तत्चों की स्तुति करते प्रतीत होते हैं। परम्परा की इस प्रासंगिकता में निर्गुण वादी एवं कालान्तर में सगुण-तत्व की ओर उन्मुख नजर आते हैं। डॉ0 वीरेन्द्र सिंह यादव की टिप्पणी है कि भक्ति आन्दोलन ने भी दलितवर्गीय चेतना को जागृत किया था। भक्ति समुदाय में वर्ण व्यवस्था तथा जाति-पांति को कोई स्थान नहीं दिया था। दक्षिण के आलवारों द्वारा प्रवर्तित भक्तिधारा रामानुजाचार्य तथा रामानंद के तात्विक विवेचन से परिपुष्ट होकर वर्ण जाति, ऊँच-नीच के बंधनों को तोड़ती हुई प्रखरता के साथ मध्यकालीन भक्ति काव्य में प्रवाहित हुई। दलित चेतना के विकास में मध्यकालीन साहित्य का सबसे अधिक योगदान है। कबीर, नानक, दादूदयाल, मलूकदास, हरदास, निरंजन, धर्मदास, रज्जब, बाबरी साहिब, सदना, पीपा, सेन, धन्ना, श्ोखफरीद आदि संत कवियों में अधिकांश दलित वर्ग के थे। इन संतकवियों ने धार्मिक रूढ़िवाद बाह्य आडम्बर, सामाजिक संकीर्णता का तीव्र विरोध किया।
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श्ौक्षणिक गतिविधियों से जुड़े युवा साहित्यकार डाँ वीरेन्द्रसिंह यादव ने साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिर्क, राजनीतिक, सामाजिक तथा पर्यावरर्णीय समस्याओं से सम्बन्धित गतिविधियों को केन्द्र में रखकर अपना सृजन किया है। इसके साथ ही आपने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। आपके सैकड़ों लेखों का प्रकाशन राष्ट्र्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। आपमें प्रज्ञा एवमृ प्रतिभा का अदृभुत सामंजस्य है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी एवमृ पर्यावरण में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
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सम्पर्क -वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग
डी. वी. कालेज, उरई (जालौन) 285001 उ. प्र.
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18 अक्तूबर 2009
वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख – लोक कवि रहीम : जातीय लोक जीवन के प्रहरी
रहीम की कविता में जातीय जीवन और लोक की समानता पर बल मिलता है। आपने कविता की पवित्रता बनाये रखी, उस पर दरबार की कालिख नहीं लगने दी। उनके काव्य में राजसी जीवन के अनुभव नहीं, आम आदमियों की मनः स्थितियों का सघन चित्रण हुआ है। विदेहराज जनक की तरह राजवैभव के बीच रहते हुए भी कमलवत् निर्लिप्त, साक्षी भाव से जीवन के उतार चढ़ाव को देखते रहे। जीवन-सुरंग पर सवार होकर वे आग के दरिया को सजह, अंकुठ भाव से पार करते हैं। सुख या दुःख कहीं भी उद्वेलन का भाव नहीं है। साक्षी भाव से वे जीवन के सारे अनुभवों को जीते हैं जिसका निचोड़ उनकी कविता में प्रकट है। यही उनकी कविता को महत्वपूर्ण बनाता है। शुक्ल जी जिस ‘सेक्यूलर' कविता की बात उठाते हैं, वह अपने सही रूप में रहीम में मिलती है। पर पता नहीं क्यों शुक्ल जी चूक गए। हजारी प्रसाद द्विवेदी को भी ‘सेक्यूलर' साहित्य रीतिकाल में दिखाई देता है, रहीम उनकी नजरों से ओझल रहते हैं। विजयदेव नारायण साही ने रहीम के बहुमुखी, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की तरफ संकेत तो किया है पर केवल चर्चा के स्तर पर। रहीम काव्य का विशद विवेचन उपेक्षित है। दरअसल साहित्य को हिन्दू-मुसलमान, स्त्री-पुरुष, संत-भक्त, सूफ़ी आदि खानों में बांटकर देखने से दृष्टि एकांगी बनती है। साहित्य में प्रवाहित सांस्कृतिक नैरन्तर्य की धारा में योगदान की दृष्टि से अब्दुर्रहीम खानखाना का काव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह साहित्य की मुख्यधारा का काव्य है उसे हाशिए पर धकेलना या एक कोने में फुटकल खाते में डाल देना-वस्तुतः उनके काव्य के जातीय सांस्कृतिक सन्दर्भों की उपेक्षा है।
इस काल में रहीम की सबसे अधिक महत्ता वैचारिक दृष्टि से है जो मध्यकाल के धार्मिक कुहासे को चीरकर वे प्रकट कर रहे थे। साहित्य को जीवन और समाज से जोड़ने का जो उपक्रम सिद्धों और नाथों के साहित्य में है, वही प्रयास रहीम ने अपने काव्य में किया है और उसको केवल नीतिपरक कहकर विवेचित करना-उस पूरी इहलौकिक चेतना की उपेक्षा है जो बड़े वेग से उनके काव्य में विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। जीवन का समग्र रूप उनकी कविताओं में अपनी विविधता में अंकित है। इहलौकिक और पारलौकिक का भेद भी कृत्रिम है, पूरा लोक जीवन उनकी कविताओं में झाँक रहा है। जीवन रसमयता को जनसाधारण के जीवन में अंकित किया है। रहीम के काव्य में लोकचेतना का रंग अत्यंत गाढ़ा है। जीवन के विविध पक्षों के अनेक चित्र उनकी कविता में मिलते हैं। बैंगन की तरह काली-कुंजड़िन सोआ-साग बेचती है और निद्वन्द्व होकर फाग खेलती है। विभिन्न व्यवसायों की नाना स्त्रियों का मनोहर अंकन किया हैः-
भटा बदन सुकाजरी, बेचै सोवा साग।
निलज भई खेलत सदा, गारी दै दै फाग॥
रहीम ने जीवन को एक बड़ी व्यापक दृष्टि से देखा है और जिंदगी के यथार्थ को कई कोणों से चित्रित किया है। जीवन के निथरे अनुभव को सुंदर दृष्टांतों से बोधगम्य बनाया है। रहीम का काव्य समाजशास्त्रीय दृष्टि से अपने युग के सामान्य जन जीवन पर भरपूर प्रकाश डालता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि कैसे कविता सामान्य मानवीय सरोकारों से जुड़कर सामंती युग में उपेक्षा का शिकार होती है। ये कविताएँ अगर यथार्थ के धरातल पर न खड़ी होकर आदर्श और कल्पना की रूमानी दुनिया में भटकती होती तो शायद ज्यादा प्रशंसा और वाहवाही उस युग में और आज भी पातीं।
कहा करौं बैकुंठ लै, कल्पवृक्ष की छाँह।
रहिमन ढ़ाक सुहावनो, जो गल प्रीतम बाँह॥
वस्तुतः रीतिकाल की परम्परा विद्यापति और सूरदास से नहीं, रहीम से शुरू होती है। रीतिकाल का मूल उत्स रहीम में मिलता है। लोक जीवन मुक्तक काव्य परम्परा के वे प्रवर्त्तक हैं। �ाृंगार की धारा रहीम से फूटती है जो रीतिकाल में अत्यंत वेग ग्रहण कर लेती है। आलोचकों ने रहीम को उतना महत्व नहीं दिया है जितने कि वे अधिकारी हैं। लोकमानस की अद्भुत पकड़ और जातीय जीवन की सशक्त अभिव्यक्ति उनको महत्वपूर्ण बनाती है।
दूसरी परम्परा को ठीक से न पहचानने के कारण सरहपा आदि सिद्धों और नाथों की रचनाओं को साहित्य की मुख्यधारा से बाहर हाशिए पर फेंक दिया गया। यद्यपि राहुल सांकृत्यायन ने सिद्धों-नाथों के साहित्य की क्राँतिकारिता को रेखांकित किया पर आचार्य शुक्ल के विराट व्यक्तित्व से आक्रान्त होने के कारण वे उनके सहज मार्ग की सही व्याख्या नहीं कर पाये। उसका परिणाम यह हुआ कि आज तक उसे हाशिए का साहित्य मानकर विवेचन हो रहा है। उसके मूल्यांकन, प्रासंगिकता और महत्व की चर्चा नहीं हुई। कभी विचारधारा के आधार पर, कभी वेदों और ब्राह्मणों की निंदा के आधार पर सिद्ध-नाथ साहित्य उपेक्षित होता रहा है। वस्तुतः यह साहित्य की मूलधारा है, जिसे हाशिए पर फेंक दिया गया है। इसको स्वीकार किये बिना आदिकाल से भक्तिकाल तक के विकास में हमेशा गाँठ सी दिखाई पड़ेगी, प्रवाह समरस नहीं होगा।'' आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की पूरी आलोचना-ऊर्जा संतकाव्य, विश्ोषतः कबीर को स्थापित करने में लगी रही। उसी के संदर्भ में उन्होंने नाथ साहित्य का विवेचन किया है। सिद्धों-नाथों के साहित्य में उनका मन रमा नहीं। इनके बारे में उनके विचार, थोड़े संशोधन के साथ शुक्ल जी वैसे ही रहे। यह वह साहित्य है जिसमें उस काल के पूरे हिन्दी क्षेत्र की धड़कन है, जिसे विद्वानों ने स्वीकार किया है पर उपेक्षित करने के लिए तर्क दिया कि वे साधु थे, चारों तरफ घूमते थे, इसलिए उनकी रचनाओं का प्रचार था। यह राज्याश्रय में लिखा जाने वाला चारणों और भाटों के अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णनों वाला साहित्य नहीं है-आम जनता का साहित्य है, उसकी भावनाओं और विचारों का साहित्य है, परम्परा को पोषित करने वाला नहीं-रूढ़ियों और कठमुल्लापन के खिलाफ विद्रोह का साहित्य है। इसकी परम्परा कृष्ण और बुद्ध की परम्परा के वैचारिक संघात से ऊर्जा ग्रहण करती है और मध्यकाल में कबीर, नानक, दादूदयाल तथा चंडीदास के रूप में दो विभिन्न धाराओं और रूपों में प्रकट होती है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी विकास-प्रक्रिया में लोक को केन्द्र में रखते हैं, इसलिए विदेशी प्रभावों की सत्ता और सक्रियता उनकी दृष्टि से ओझल हो जाती है। समूची जनता की दृष्टि सामने रखते हुए रामचन्द्र शुक्ल इस्लामी प्रभाव की क्रिया-प्रतिक्रिया का महत्व समझते हैं, जबकि हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक-चिंता की अपेक्षा में सबकुछ को मापते हुए लोक और उसकी जातीय परम्परा के विकास को ही केन्द्र में रखते हैं। जनता और लोक के ये प्रयोग इन इतिहासकारों की दृष्टि का अंतर भली-भांति परिभाषित करते हैं।
‘‘दूसरी परम्परा से सत्य तथ्य को स्वीकार कर उसके ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन आवश्यक है। इसके लिए दलित साहित्य को आलोचना का नया शास्त्र गढ़ना होगा और लोकप्रियता के मानदंड को स्वीकार करना पड़ेगा। पवित्रतावादी, अभिजात आलोचना परम्परा से नाता तोड़कर उसे सर्वग्राही बनाना पड़ेगा। जनता से जुड़े साहित्य को उप साहित्य कहकर उपेक्षित करने से साहित्य की मुख्यधारा धुंधलाती है और उसका एकरस प्रवाह बाधित होता है। डॉ0 नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो यह भी एक विरोधाभाष ही है कि शास्त्र संवलित होकर साहित्य जिस मात्रा में सामाजिक दृष्टि से लोक-विमुक्त तथा लोक-विरोधी विचारों की ओर विचलित हो गया, काव्य-भाषा तथा काव्य-कला की दृष्टि से उसी मात्रा में समृद्धतर होता गया। कबीर से चलकर क्रमशः जायसी; सूर और तुलसी तक के विकास का मूल्यांकन इस दृष्टि से रोचक हो सकता है।''
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श्ौक्षणिक गतिविधियों से जुड़े युवा साहित्यकार डाँ वीरेन्द्रसिंह यादव ने साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिर्क, राजनीतिक, सामाजिक तथा पर्यावरर्णीय समस्याओं से सम्बन्धित गतिविधियों को केन्द्र में रखकर अपना सृजन किया है। इसके साथ ही आपने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। आपके सैकड़ों लेखों का प्रकाशन राष्ट्र्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। आपमें प्रज्ञा एवमृ प्रतिभा का अदृभुत सामंजस्य है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी एवमृ पर्यावरण में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
सम्पर्क -वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग
डी. वी. कालेज, उरई (जालौन) 285001 उ. प्र.
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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन - श्याम बाबू शर्मा का व्यंग्य : हमारी धर्मनिरपेक्षता
(प्रविष्टि क्रमांक - 16 - A)
मिश्रीलाल हमारे मित्रों में सबसे बुध्दिमान व्यक्ति हैं। वे कुछ न कुछ नये विषयों से हमारा ज्ञानवर्धन करते रहते हैं। हमारी मित्र-मंडली अकसर शाम को रंगीलाल जी के घर पर मिलती है। दिनभर की थकान मिटाने के लिए बतकही से बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।
ऐसी ही बतकही की एक शाम मिश्रीलाल आते ही धमाका करते हुए बड़े ही आक्रोशित अंदाज में कहने लगे- आज जिसे देखो वही धर्मनिरपेक्ष बनता जा रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन हमारा देश फिर से गुलामी की जंजीर में बंध जाएगा। हम लोगों ने भाभीजी को आवाज देते हुए पहले मिश्रीलाल जी को ठंडा करने के उद्देश्य से फ्रिज का पानी लाने के लिए कहा। ठंडा पानी पीने के पश्चात मिश्रीलाल जी थोड़े ठंडे हुए और कहने लगे- आज जमाने को क्या हो गया है। सभी अपने-अपने कर्तव्य के प्रति विमुख होते जा रहे हैं। जिसे देखो उसने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ रखा है। हमने पूछा- क्यों भाई! आज कहां फंस गए और यह अनाप-शनाप क्या बके जा रे हो। धर्मनिरपेक्ष होना क्या बुरा है। हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या यह बुरा है?
वे कहने लगे- नहीं भाई! जिस धर्मनिरपेक्षता की बात आप कर रहे हैं। वह कतई बुरी नहीं है। मगर मैं दूसरे धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहा हूं। हम सब समझ गए आज मिश्रीलाल जी कोई दूर की कौड़ी लाए हैं तभी हमसे दूसरी धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहे हैं। हम सब पहले से ही उनके ज्ञान के कायल थे, जिज्ञासु विद्यार्थियों की तरह उनके और समीप सरक आए और एकस्वर में निवेदन किया- बताइए ना।
वे बोले- जानते हैं आज देर क्यों हो गई। बाजार में एक महिला के गले से उचक्कों ने सोने की चेन छीन ली। कुछ दूर ही चौकी है। उचक्कों को उनका भी कोई खौफ नहीं था। वे जानते है वहां तैनात कर्मी अपने स्वकर्तव्य पालन के प्रति तटस्थभाव रखते हैं। इसीलिए उचक्कों की इतनी हिम्मत पड़ गई। मैं भी वहीं खड़ा था। सारी घटना मेरे ही आंखों के समक्ष घटी थी। इसलिए जब मैंने महिला के साथ चौकी पर जाकर शिकायत दर्ज करानी चाही तो वे धर्मनिरपेक्ष कर्मी बोले कि क्या आपको और कोई काम नही है। आप संप्रदायिकता फैलाना चाहते हैं। जानते है ना कि इस आरोप में आपको बंद भी किया जा सकता है।
पहले तो उस महिला के कारण अपनी बात पर डटा रहा परन्तु जब मैंने देखा कि वह महिला स्वयं ही इस लफड़े में पड़ना नही चाहती तो मैंने भी अपने को किसी तरह इस झंझट से बचाया और धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर यहां चला आया। हमने कहा- परन्तु आप तो हमें दूसरी धर्मनिरपेक्षता के बारे में बताने वाले थे। क्या यह कहानी लेकर बैठ गए। वे बोले- अब भी आप नहीं समझे तो आप लोगों से बढ़कर मूढ़ कोई नहीं होगा। अरे भाई! धर्मनिरपेक्षता में "धर्म" का अर्थ है- "स्वकर्तव्य पालन" और "र्र्निरपेक्ष" का अर्थ है- "लगाव न रखने वाला या तटस्थ रहने वाला"। मतलब जो स्वकर्तव्य पालन से लगाव न रखे अथवा तटस्थ रहे। वही तो सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष है। इसी प्रकार जो व्यक्ति या समाज परंपरा से चला आया हुआ सिध्दांत या मत या रीति या प्रथा का अनुसरण करे वह संप्रदायिक है। वाकई हम सभी मिश्रीलाल जी की धर्मनिरपेक्षता की इस व्याख्या के कायल हो गए।
मिश्रीलाल जी की व्याख्या का मनन करने पर हमें पूरी शासन-प्रशासन व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष दिखाई देने लगी1 शासन-प्रशासन व्यवस्था ही नहीं घरद्वार की व्यवस्था भी धर्मनिरपेक्ष दिख रही थी। जिधर भी देख रहे थे धर ही लोग धर्मनिरपेक्ष दिख रहे थे।
आज सरकार खुलेआम अपने को धर्मनिरपेक्ष कह रही है। नेताजी हो या पुलिस हो, शिक्षक हो या विद्यार्थी हो, सरकारी अफसर हो या कर्मचारी हो और तो और घर की पत्नी हो या पुत्र-पुत्री सब के सब धर्मनिरपेक्षता के पक्के अनुयायी हो चले हैं। शिक्षक अपना शिक्षण कार्य छोड़कर चुनाव लड़ रहे हैं। छात्र नेता गैगस्टर में निरूध्द हो रहे हैं। जघन्य अपराधों में निर्लिप्त अपराधियों के हाथों में देश की बागडोर जा रही है। इसके विपरीत हम जैसे अभी भी कुछ संप्रदायिक तत्व बचे हुए हैं, जिन्हें या तो इस सामाजिक व्यवस्था पर मन मसोस कर रह जाना पड़ता है या जब कभी कुछ आक्रोशित होते हैं तो यह जानते हुए भी कि इस व्यवस्था पर हमारे शब्दबाण चलाने पर उनकी कुंभकर्णी नींद नहीं ख्ुलेगी। फिर भी उन्हें जगाने के उपक्रम में कुछ न कुछ लिख ही मारते हैं। परन्तु यहां भी धर्मनिरपेक्षता का वर्चस्व है। वह या तो उसे कहीं छपने नहीं देती या विवाद होने का हौवा खड़ा करके उसके प्रभाव को निष्प्रभावी बनाने के उद्देश्य से उसके मूल तत्व को काट-छांट देती है।
आज घर में हमारी पत्नी जी ने भी मायके जाने के लिए धर्मनिरपेक्षता का व्रत धारण कर लिया है इसलिए घर जाकर पत्नी के धर्म का पालन मुझे ही करना होगा। शेष चर्चा अगले दिन के लिए छोड़कर हम लोगों ने अपने-अपने घर की राह पकड़ ली।
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श्याम बाबू शर्मा
729, गड़ेरिया टोला,
बशारतपुर, गोरखपुर-273004
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16 अक्तूबर 2009
मनसा आनन्द ‘मानस’ की कहानी : गे-युग
गाँव की शांति में अचानक तूफान आ गया, कहाँ दबी पडी थी यह अशांति जंगली घास की तरह दो बूंद पडी नहीं की उग आई। मनुष्य, औरतें, बच्चे ही नहीं, पेड़, पौघे, पशु-पक्षी सभी आश्चर्य और शौक मे भर गये थे। औरतें गली चौराहों पर खड़ी धूधंट मे ही खुसर-फुसर करती हुई जगह-जगह खडी दिखाई दे रही थी। कैसी कुंभकरणी नींद से एक दम जाग गया था पूरा गाँव। सबसे ज्यादा रौनक चाचा चुन्नी की चाय की दुकान पर थी । दुकान क्या गाँव का तोरण ही समझो, जो गाँव की कथा, पटकथा, रौनक, मेला यहीं से शुरू और यहीं खत्म। गाँव के ब्रह्मांड का केंद्र बिन्दु समझो। चुन्नी चाचा की चुटकी में कुछ ऐसा जस था, अगर उनके हाथ की कोई चाय पी लेता तो फिर हो जाता कायल चाचा की चाय का। बात यहां तक सुनने मे आती है, चुन्नी चाचा की शान मे, किसी ने उनके हाथ की चाय न पी तो समझो जीवन बेकार, नाहक ही आया दुनियाँ में सर खपाई करने के लिए। आज की खुसर-फुसर ने दुकान का सारे कायदे कानून ताक पर रख दिये थे। चाचा का पहले ही पारा सातवें आसमान पर रहता था, आज जो गिनना ही मुश्किल है...अनन्त आसमान ही समझो। कितनी ही क्रोध भरी वाणी चाचा की जबान से निकल रही हो, आप चेहरे पर फैला क्रोध का कोई चिन्ह तक नहीं पाओगे। चेहरा कैसे सपाट रेगिस्तानी रेत की तरह, जहाँ मीलों तक कोई झाड-झुक्कड नहीं सफाचट मैदान, कोरा, निर्मल, भाव रहित। गजब कलाकार थे हमारे चुन्नी चाचा, कोई नाटक-नौटंकी वाले की निगाह में आ जाते तो फिर छुट्टी थी तुम्हारे दिलीप, शाहरूख को कोई घास भी नहीं डालता बेचारों को। चलो जो भी होता है, अच्छा ही होता है, वरना तो हमारे गाँव का रौनक मेला तो उठ चुका होता अब तक। अरे नाम होता, अब कोई कम नाम है गाँव का, ये सब किसके दम से है। चाचा चुन्नी चाय वाले कह लो या‘‘दसघरे वाले‘‘ दोनो पर्यायवाची वन गये है।
घटना यूँ घटी गाँव के प्रधान रतन चौधरी की बेटी ने मनखू धानक के लड़के से कोर्ट मे विवाहा कर लिया। अब बोलो बचा कुछ कहने को, अनहोनी बात हो गई। दादा बुलाकि, रामसरूप, महाशय जिले सिंह, होलदर कबूल...। चारों चौकडी लम्बा धुटनों तक मुँह लटकाये, आग बबूला हो, चिन्तित बैठे सर धुन रहे थे।
दादा बुलाकि--‘‘इब तै बहन-भाई के ब्याहा की कमी रहगी‘‘
महाशय जिले सिहं सर पर दयानन्द स्टाईल साफा बान्धे, कली का बंगाली कुर्ता पहने, हाथ मे मोटा-सोटा लिए हुऐ कहाँ--‘‘कलजुग आग्या भाई शामी जी (दयानन्द जी ) ने पहला ही कै दी थी या बात, या तै सरूआत से भाई बुलाकि।‘
होलदार कबूल--‘‘मेरा तै इशा मन कर सै साले न झांगड दे गेर के, सारी डिमाग की आशकि-वासकि की गरमी झड जागी‘‘
चाचा चुन्नी--‘‘ तम क्यू थूमकबिलौन लाग रे हो, इब कुछ ना हो सकता, पंचात की बैलु इब कै रेहरी से। इस कोट कचैरीयाँ के साम्ही निरा बावला से कबूल तू तै। ध्रनि चबरचबर करी ना तै हाँन्डो गै घले-घले, कान बौच के पडे रहो दडबो मै। इब हरि जना का टैम आरहा सै, भौत सता लिया तमनै जाती कै नाम तै।‘‘
मैं बीच में फसा अखबार पढ़ना तो भूल गया, बस किसी तरह मुंह छुपाये हुये था उससे। सोच रहा था निकल भागूं यहां से किसी तरह।
दादा बुलाकि--‘‘अर छौरे तु किसका सै।‘‘
मैं--‘‘राम दरस का, पाटन का पोता।‘‘
--‘‘भाई कोथी मे पडै सै।‘‘
--‘‘दादा १६वीं मे।‘‘
--‘‘भौत आच्छा तु भी गाम का नाम रोशन करियों,एक बात मेरी समझ में कौन्या आती यों पढ-पढ के थारै डिमाग में गौबर भर जा सै। देख मारे गाम की भी कोये खबर आई से इस अखबार में।‘‘
--‘‘ कौन सी खबर दादा मुझे पता नहीं है।‘‘( जबकि मुझे पता था )
--‘‘अरै किसा बावला से यो छोरा, रत्तन की छौरी और मनखू घानक के छोरे की‘‘
--‘‘नहीं दादा इसमें ऐसी कोई खबर नहीं आई हे।‘‘
--‘‘ चौखा यो भी ठीक रही, अरै चुन्नी चार कप चा ते प्या दे यार कितनी देर होगी मगज खपाई करते। इज्जत ते गाम कि गइ, पर बचै इस देस की भी ना।‘‘
मैंने देखा गाँव में एक मौत जैसा मातम था, चारों तरफ मायूसी छाई थी। सबका दुख अपना दुख था,
किसी एक घर की घटना ना हो कर पुरे गा*व पर छा गए घने काले बादल की तरह, अब बरसा की तब बरसा। कैसी सरलता, अपना पन फैला रहता था गाँव के लोगो में, जबान से क्रोध कितना ही झरता परन्तु मन में कोई मैल, वैमनस्य, ईर्ष्या का भाव रंच मात्र भी नहीं होता था। चाचा चुन्नी की कथा तो पूर्ण कथा ही समझो, जिसका न आदि है अन्त, चराचर एक नदी के बहाव की तरह जो बीना रुके अपनी सीतलता से किनारों को छूता चलता जाए। एक बार आप ने चाय पी कर दोबारा माँग ली तो आपकी शामत आ गई--‘‘सारे दिन चा-चा भाग याडे ते फूक देगी तेरे कलेजे ने।‘‘ आर ब्लाक राजेन्द्र नगर में थी हमारे चाचा चुन्नी की चाय की दुकान, बडे-बडे गाडियों वाले जब चाय की चुसकी भरते तो दंग रह जाते, भूल जाते चाचा की कटु वाणी, चाय के मिठाय में कटुता कहाँ खो जाती थी पता ही नहीं चलता था। एक दिन एक सरदार जी सुबह जल्दी आ गये चाय पीने के लिए, सरदी की ठिठुरन थी, चाचा अभी अंगीठी सुलगा ही रहे थे । अरे बाबा एक कप चाय पिलाऔ, चाचा का माथा एक दम गर्म अंगीठी से भी पहले, परन्तु कोई शुभ घड़ी ही थी, या सुबह की ताजगी छाई होगी चाचा के दिमाग़ में, कुछ नहीं बोले बस एक बार देखा सरदार जी को अपने चिर प्ररिचित अन्दाज मे और चाय चढा दी अंगीठी पर, सरदार जी भी अपने तरीके के एक ही थे। ‘‘अरे बाबा चाय में थोड़ी पत्ती तेज रखना‘‘, चाचा ने फिर देखा हलके से मुस्काये शायद बचपन लोट आया होगा, अरे बाबा थोड़ी चीनी तेज रखना, थोड़ा नमक डाल देना, गले में दर्द हो रहा हैं। जब सरदार जी ने पहला घूंट भरा चाय का तो लगे थू..थू..करने अरे ये क्या किया बाबा तू पागल हो गया है। ‘‘ फूफा जिब सारी चीज घनी तै फिर नून थोडा क्युं यो भी छिक के ले, कहे ते तेरे आठ आने भी इसमें डाल दूं।‘‘ चाचा खिलखिला कर हंस दिए, सरदार जी बुड-बुड करते चले गये। १९७५ में झुग्गियाँ टूटी सब ने कहा पर्ची ले लो ‘‘सुलतानपुरी‘‘ दुकान मिल जायेगी, नहीं माने --‘‘कौन इतनी दूर जागा अपने ही धर के रोड़े ना संभाले जाते।‘‘
एक हमारे यहाँ का एम० एल० ए० श्री मान लाल जी पधारे, करेला वो भी नीम चढ़ा, नेता तो नेता ही होते हे। गाँव में धुसते ही खुले चौक के बीच चाचा की दुकान नजर आई, इका-दुका ग्राहक थे, नेता जी ने आव देखा न ताव चला दिया नेता गिरी का रोब ‘‘अरे बाबा जरा भाग के जा और बुला के ला रमेश कौशिक जी को।‘‘
चाचा ने उठा लिया अपना सोटा तेरे बाप का नौकर लागु सू, आया चाल के हुकम चलाने वाला।‘‘ पकडा चाचा को, नेता जी पूँछ दबा कर भागे, अरे बाबा बहुत गुसैल हो तुम तो। होली के दिनों मे छोटे-बडे लड़के छुपा-छुपी खेलते, फिर देर रात होली पर लकड़ियाँ इक्कठी करते, चोरी से जब सब सो जाते। चाचा चुन्नी की दुकान के सामने कीकर का बहुत बड़ा तना पडा था। सभी ने सलाह मिलाई, इसे एक दिन पहले होली पर डालेंगे, सो पहुँच गये चाचा की दुकान के पास रात के २ बजे। सब निश्चित थे अब वहाँ कौन होगा, परन्तु चाचा चुन्नी तो भूत बने पहरे पर बैठे थे। उम्मीद के अनुसार काम नहीं बना, समझे बात फैल गई इससे चाचा चुन्नी चौक्कना हो इन्तजार मे बैठे है, कोई कुछ बोले बिना खजले कुत्ते की तरह पूँछ दब कर चल दिऐ खाली हाथ वापस। चाचा ने आवाज लगाई ‘‘अर छौरो उलटे क्यूं चाल पड़े, कै लैन आये थे।‘‘ किसी ने हिम्मत कर के कहा कुछ नहीं चाचा घर जाते हैं।
‘‘होली की ताही लाकडी लेन आये थे, अरय यार डरों मत ठा लौ कुछ ना कहूँ पुन्न का काम से आ जाओ मैं भी हाथ लगा थारी मदद कर दू भौत भारी सै।‘‘
हम डरे-सहमे उस कुत्ते की हालत में आगे बढ़े जिसके सामने दूध का भरा बरतन हो और हाथ में मोटा सोटा, कई देर पु..च..पु..च ..का लाड़ सुन कर हम आगे बढ़े। सब यहीं सोच रहे थे कब हुआ चाचा का हमला, बच्चे तो फिर भी पास नहीं आये। चाचा ने खुद अपने हाथों से लकड़ी उठवाई, पूरी रात सोये नहीं हमारा इन्तजार करते रहे थे। शायद हमारे खेल मे शामिल होने के लिए, ताकि हमारे मन में चोरी का भाव न कुरेदे। कैसे विरोधा-भाषी चरित्र, कितना कड़वा बोलते थे, पर थे कितने ‘‘मिठबोले‘‘ ऐसे थे हमारे चाचा चुन्नी चाय वाले।
परन्तु आज चाचा क्या सभी गाँव के लोग परेशान है, सब समय की गति को पढ़ना चाहते हैं, परन्तु समय बिना ध्वनि किये तेज चाल से चला जाता है। जीवन के इस चौराहे पर जब मनुष्य पहुँचता है, तब खो चुका होता हे अपनी संर्घष समता, पुराने संस्कार सूख कर दीमक खाई लकड़ी हो चुके होते हैं, आपने जरा छुआ नहीं की भुर-भुरा कर गिर पडेंगे पल भर में। चाय पीते हुए गहरी साँस ले मेरी तरफ देख चाचा चुन्नी कहने लगे। ‘‘ छौरे राम दरस के तम जवानों का कोई देन नहीं से इस गाम-देस, इस माट्टी के प्रति, आजादी फिरी मे थ्यागी इब तोड़ो अपने ही झुकड़े ते अपने सिगंडा तै।‘‘
मैंने हिम्मत कर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की कोशिश की--‘‘ दादा सालों से फिल्मों मे टी वी मे एक ही कहानी दिखाते हैं, उसी गाँव का लड़की-लड़का साथ खेलते हैं, लडते हे, फिर प्रेम करते हे शादी करके उसी गाँव में रहते हैं, कोई विरोध नहीं करता आप भी कहते थे,‘‘गंगा-जमुना‘‘ दिलीप कुमार की बहुत अच्छी फिल्म है। एक नहीं सभी भारतीय फिल्मों की यही कहानी होती है। कहीं यहीं बच्चों के दिमाग में गलत असर छोड़ती हो, फिल्म ही आज समाज का चरित्र निर्माण करती है, बाल कोमल मन उन्हें ही अपना आदर्श मान वैसा ही होना करना और बनना चाहते, अब आज लोगों की मानसिकता बदल रही है, पैसे ने समाज में आदर्श, सिद्धान्तों से कहीं उपर अपना स्थान बना लिया है। नैतिकता सिसक रही है विकास के किसी कोने में पडी-पडी इसको रोक पाना असम्भव है।
चाचा चुन्नी--‘‘ अरै छौरे पाटन के पौते एक बात ध्यान तै सुन लै, इन फिल्म वालो और नेताओ में त कीडी कितना भी डमाग़ ना हो सै, अरै देश की लगाम इब इनके हाथ में आगी। गन्जें के हाथ में नाखून आगे इब टाट की खैर कोना। इब आन वाले टैम मै ये ही भगवान होगे थारे, राम,किशन, दयानन्द शामी जी की जगहा, इन नेताओ और फिल्मी हीरो की फौटु लागगी धर-धर। अर आज तुं मांरी वात गांठ बान्ध ले,२०० साल राज किया अंग्रेजा ने मारे तोर तरीके रहन सहन कौन्या छिन पाये। दैख लिया आजादी के २५ साल में थारी लगोंटी छिन ये सुतनी पन्हा दी। अरै यो भारत देश केवल भारत रतन की माला मे ही लिखा रह जा गा। इन मल्लेछो की एक-एक गंदी बात थारे डिमाग में गीता, पुराण बन के बैठ जा गी। अरृय जिले सिह मैं तै मर जा गां जीब तक तू जिन्दा रहे तै पुछिये इस छौरे तै-- अगर छौरे-छौरे व्याहा ना करे आपस में ते थूं से मारी जिन्दगीं पै। पहाड़ तै गिरन के बाद केवल गिरना ही हो से, रूकण की सम्भावना कौना होती। जो आज तम सोचो सो वोही थारे सामने बुया पावगा कल काटना भी वोही पडेगा। नाहक गाँधी, भगत सिंह, बिसमिल, आजाद, सुभाष ने देस आजाद करवाया। कै पत्ता था उनने थारे बाद कुते मलाई खागे, आजादी की तै बात छौड्डो इसने तम सम्भाल के भी रख लो ते थारी बड़ी मेहर बानी होगी।‘
३०-३५ साल पहले जब ये बात कही थी, जब तो मैंने सोचा जोश में बोल रहे हैं चाचा चुन्नी। शायद आज गाँव में ऐसी घटना घटी है इससे उत्तेजित हो क्रोध के आवेग में बोल रहे है। परन्तु अभी दिल्ली कोर्ट का फैसले की खबर आई फिर इसपे चर्चा चली तब कहीं यादों की दबी परतों में दबी-भूली वो बात, नास्तरादमो की भविष्य वाणी की तरह सटीक और सत्य महसूस हो निकल आई। समय के चलने की कोई आहट, ध्वनि, कोई भाषा भी होती है, जो समस्त अस्तित्व में केवल है, वो शब्द-ध्वनि के पार शून्य में। उसके लिये कान नहीं ह्रदय की विह्वलता ही उस सम्प्रेषण को महसूस कर सकती हैं। उसका विस्तार अनन्त है, परन्तु हम उसे सुकेड-समेट कर कैद करना चाहते हैं, एक परिवार तक ही नहीं केवल अपने घर के कोने तक। कितने सरल ह्रदय थे, अनपढ़ गंवार से कहलाने वाले वो लोग.....उनको मेरा नमन।
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मनसा आनन्द ‘मानस’29- गॉव दसघरा, पो आ पूसा, नई दिल्ली – 110012मो – 9810057527फोन – 65398369
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मनसा आनन्द ‘मानस’ की कहानी : फूल वाला
फजलु मियां की पान की दुकान मोहल्ले की नाक थी। उसी के सामने एक बड़ा सा खुला चौक पसरा पड़ा था। जो भविष्य के सचिन, गावस्कर, कपिल देव तैयार होने की नर्सरी का काम करता था। अब इस नर्सरी से चाहे सारा मोहल्ला परेशान क्यो न हो परन्तु मजाल क्या कोई उन्हे ड़ाटे-डप्टे या कुछ कहे, ये मोहल्ले के ही नहीं, देश के साथ भी गद्दारी समझी जाती। किस को पता है कल कोई निकल जाये सहवाग, गम्भीर, जो दूर दराज मोहल्ले का नाम रौशन करे, परन्तु ये तीसरी पीढ़ी चल रही है, नवाब पाटोदी से लेकर धोनी जी सम्हाल चुके है बाग डोर भारत की पर मजाल है आज तक ये साध पूरी हुई हो, पर एक आस है भविष्य के इन दुलारों से आज नवाब रजवाड़ों से क्रिकेट निकल कर गली मोहल्ले में तो आ गई है। सो भविष्य के इन जुगनुओं से उम्मीद है एक दिन मोहल्ले का नाम चमकायेगें। इस लिए वो कितना भी शोर मचाये, कैसा ही चौका-छक्का मारे, बीच में खुदा ना खोसता आप आ गये और बाल ने आपकी मुहँ पीठ या गाल तक की भी चुम्बन ले ली तो आपने केवल मुस्कराना है, किसी किस्म का कोई प्रतिरोध नहीं करना है। भले ही मोना लिसा जैसी मुस्कान न हो आप के हंसने की, इसके अलावा शाबाशी के लिए अगर आप ने ताली भी बजा दी तो ये हुई न सोने पे सुहागे वाली बात पुरी, ‘गुड़ शाँट .... बैल प्लेयड़ सर’। ये तो भला हो फटा-फट क्रिकेट का जो टेनिस के बाल से बच्चे खेलते है, वरना तो न किसी का सर हेाता न खिड़कियों पर कॉंच। फजलु मियां अपनी पान की दुकान पर बैठे पान की गिलोरियां बनाते, बीच-बीच में विशेषज्ञ की भाति विशेष टीका-टीपणी भी देते नहीं थकते थे। फिर कौन सचिन कि तरह शाँट मारता है, या सोलकर की तरह कैच लपकता है, ये सब टीका-टिप्पणी मुतु स्वामी तक पहुँचा ही देते।
मोहल्ले का थोड़ा परिचय क्या पूरा भारत दर्शन ही समझो, गली के दायें खन्ड़ेलवाल जी, उसके आगे खन्ना जी, नीम का पेड़ जिस घर के सामने है वो बाड़ कर जी का मकान, पान की दुकान के सामने भट्टाचार्य जी, चोक के दूसरे कोन पर जहां दीवार पर क्रिकेट का विकट बना है, बहीं मोट-मोटे अक्षरों में लिखा है, एम सी सी (मुतु स्वामी क्रिकेट क्लब ) गाहे बगाहे वो ही बच्चों को क्रिकेट के महीन राज बताते है। बही एक पंडित थे क्रिकेट के हमारे मोहल्ले में। खंडेलवाल जी की परचून की दुकान थी , उससे कोई फरलांग भर आगे जहां गली खत्म हो चौड़ा रोड़ लाल किले कि तरफ जाता है। बही रामचंद्र हलवाई की मशहूर दुकान थी, जलेबी, समोसे, कचोरी सब लाजवाब। तीस साल से रामचंद्र जी दुकान चलाते है, दुकान के आगे मजाल आप एक दोना, कागज तक पा जाओ, मुहँ में बीड़ी हाथ में झाडु सफाई का जुनून है उन्हें, यही वजह है, इस गली के अन्दर भी रामचंद्र की दुकान चल ही नही रही दौड रही है। मंगल के दिन तो सुबह से ही बुन्दी बनने लग जाती थी, उस दिन समोसे कचोरी वालो को तो आधे पेट ही रह जाना पड़ता था। उस दिन दुकान की रौनक देखने जैसी होती थी। चारों तरफ से ग्राहकों की मारा मारी , राम चन्द्र जी का काम केवल पैसे इक्कठा करके गल्ले में जगह बनाना होता था। सब बातों की एक बात हमारा मोहल्ला बहु-जातीयता, बहु-सामाजिकता का आदर्श नमूना था। अगर कभी सरकार के मन में खेल रत्न, भारत रत्न के साथ मोहल्ला रत्न की घोषणा की तो आप ये समझिये ये इनाम तो गया हमारी झोली में। काश गांधी जी जिन्दा होते तो उनका सीना चौड़ा हो जाता फ़ूल कर, देख लेते आप अगर वो ‘साबरमती’ छोड़ हमारे मोहल्ले में रहने के लिए नहीं आ जाते, हाय होनी को मन्जूर नहीं था ये सब, जब चने नहीं थे तब दांत थे, अब चने हुए तो दांत नहीं है। मोहल्ला क्या है गुणों की खान है, एक-एक के गुणों का जिक्र करूं तो पुरा एक मेघ दूत सा ग्रंथ बन जायेगा, फिर वो धूल चाटता पड़ा रहता पुस्तकालयों में, सो भलाई इसी में है, इसे कहानी तक ही सीमित रखे।
फजलु मियां का पूरा नाम फजलु रहमान कुरैशी था, इनकी बेगम के खानदान में कोई बेगम हजरत महल के हुजूर में पान की गिलोरियॉं लगाया करती थी। अब यहीं एक प्रशस्ति-पत्र है फजलु मियां के पास वो भी केवल जबानी। फजलु मियां का पान आपने नौशा नहीं फर्माया तो नाहक आए आप दिल्ली। अरे अगर गली कूचे की बजाये कहीं होती फजलु मियां की दुकान कनाट प्लेस में तो देखना अमरीका तक फजलु मियां के पान निर्यात नहीं होते तो हमारा नाम बदल देते। मियां मुहँ में पान की गिलौरी रखी नहीं की लगी मक्खन की तरह पिघलने, अपने आप सुपारी मुहँ घुलने लग जाती, दाँतों को पता ही नही चलता कि कब पान चबाया, जनाब दूसरों के पान की सुपारी दांतों से तोड़ते-तोड़ते कब सुपारी दाँत को भी अपना हम सफर बना लेगी ये ड़र हमेशा लगा रहता था, पान न खाना हो गया जनाब दांतों की कोई कसरत हो रही हो। सामने मुतु स्वामी के यहां कोई नया किराये दार आया है, फूल बेचने बाला, मोहल्ला इसी एक सौगात के बिना अधूरा था। सो वो साध भी पुरी हुई, वरना तो दरीबे कला से जा कर फूल लाना न हो एक सजा मिल गई, चप्पलें चटकाते एक तो इतनी दूर जाओ उपर से पुरा मोहल्ला ऐसे देखेगी की आप चिड़ियों घर के कोई प्राणी हो। कितने दिनो की ये साध पुरी हुई सब ने एक दूसरे को बधाईयाँ दी मुतु स्वामी की चप्पल बुद्धि के क़सीदे पढ़े गये। परन्तु फजलु मियां को वो आदमी फूटी आंख नहीं भाया, फजलु मियां की बात पर किसी ने गोर भी किया। बात आई गई हो गई दिन बीते महीने भर के अन्दर फूल वाले का परिवार भी आ गया। परिवार क्या भानमती का कुनबा समझो, आठ फूल से बच्चे, पूरी टीम में मात्र तीन कम मोना मुतु स्वामी ने कोई किराये दार न रख कर एक क्लब को निमन्त्रण दिया हो।
सारा दिन बच्चे गली मोहल्ले की घन्टियाँ बजाते फिरते, किसी के आंगन में खेलने चले जाते तो रौनक मेला सा लग जाता, खाना खाने बैठते तो एक छोटा मोटा लंगर ही खुल जाता। चावल परोसते जब कोई आगे चलता तो पीछे-पीछे दाल, अचार, पापड़, लिए दूसरी बहन चल रही होती थी। अचानक एक रात नौ बजे मोहल्ले की शान्ति को श्राप लग गया, जोर-जोर से कोई गालियां बकने लगा, दरो दीवारों पर जो शान्ति इतने दिनो से पलास्टर की तरह चिपकी थी। आज अचानक भूर-भूरा कर गिर गई, घटना इतनी अनहोनी थी, मोहल्ले के लोगो ने खिड़कियाँ खोल के देखा कि क्या हो रहा है। देखा तो फूल वाला दारू के नशे में अन्ट–शन्ट गालियां बक रहा था। फूल वाले की आमदनी बढ़ने लगी थी, आधा मैदान उसके फूलों की रेहड़ी की भेंट चढ़ गया था। फिर अगर बच्चों की बाल आठ रतनों में से किसी को छू गई तो वो तांडव शुरू होता कि बच्चों को खेल खत्म कर घर जाना ही पड़ता। फिर रही सही कसर फूल बाला रात को आकर करता, सबकी माँ बहन एक कर देता, ऐसी-ऐसी गलियों का उच्चारण किया जाता कि भोला नाथ की पर्यायवाची कोश भी फेल हो जाता, आप पूरा दिन सर खपाई करते रहो शब्द कोश में, मजाल वो शब्द आप को मिल जाये।
मोहल्ले की खुशी को ग्रहण लग गया, फजलु मियां ने तो पूत के पैर पहले ही देख लिये थे। परन्तु उसके अनुभव का मोहल्ले ने फायदा नहीं उठाया सो अब पछताने से क्या होता है, बात गई दो साल के लिए। दो साल का एग्रिमेन्ट किया था, मुतु स्वामी ने, फूल वाले के साथ। पहाड़ से ये दो साल क्या आज ही खत्म होने वाले है, सबको यही चिन्ता थी। क्रिकेट का ग्राउंड सुनसान पड़ा रहने लगा, बच्चे डरे सहमें किताबों में सर घुसाये उदास बैठे होते थे। दूध का गिलास रो झिक के पिलाया जाता, जो फ्रिज कल तक खाली मुहँ ताकता रहता था, आज फलों से भरा रहता, कोई उसे छूता भी नहीं। फजलु मियां का जब पान लगाते हुए सामने मैदान की तरफ ध्यान जाता वहां फूल वाले के बच्चे मस्त खेल रहे होते या एक दो चिड़ियाँ दाना चुग रही होती थी। फूल वाला तो सुबह ही पिन्नक में सवार हो जाता, फूलों पे पानी छिड़कते हुए दो चार बुन्दे शायद सोम रस की भी गिर जाती थी। राम चन्द्र हलवाई के सामने ही तो वो पुराना शिव मन्दिर था, जो शायद पांच सो साल पुराना अवश्य होगा। सालों पहले मन्दिर के एक कोने में पीपल के पेड़ के नीचे हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की थी जब मन्दिर का नया नाम करण करना पड़ा था, ‘प्रचीन शिव हनुमान मन्दिर, अभी दो साल पहले लोगो के मन में श्लाधा उठी की सिर्डी के सॉंई बाबा की मूर्ति लाई जाये, सो पास ही रेलवे रोड़ की दुकानों में से छांट कर सुन्दर मूर्ति ला स्थापित कर दी गई। अब नाम करण संस्कार भी पुण्य करना पड़ा सर्व सम्मति से नाम रखा गया,’ प्रचीन शिव हनुमान सॉंई मन्दिर’ अब आगे की राम जाने या आने वाली नसलें ।
फूल वाला अपनी लड़की के साथ खड़ा हो फूल बेचता, नाजुक बेचारी सारा दिन धूप में खड़ी रहती थी। फूल वाला सार दिन नशे में धुत्त रहता, लड़की जब घर चली जाती तो उसे न फूलों का होश रहता न सामने वाले का कौन खड़ा है। कभी तो किसी महिला के हाथ की उंगली को भी छू लेता था। अब तो फूलों के नीचे ही अपना पव्वा दब के रखता था, जब मन करता फूलों के नीचे से निकालता जय सोम रस। मुहँ से इतनी बू आती मन्दिर जाने से पहले मानो नरक के फाटक पर हाज़री देना अनिवार्य हो गया। कोई उसके मुहँ माथे नहीं लगता, कौन यहां घर बसाने आये है, फूल लिए और मन्दिर में। राम चन्द्र हलवाई शोर मचाता ‘’ हमारे जमाने में चाय पीते भी ग्राहक अगर आ भी जाता तो पहले हाथ धोते फिर ग्राहक को सामान देते थे। दुकान शिव जी का थड़ा है, इसे पवित्र पूजा भाव से करना चाहिए। परन्तु इस पापी फूल वाले ने तो सार कायदे कानून ताक पर रख दिए है।‘’फूल बाला एक बार राम चन्द्र हलवाई की तरफ देखता, उसे लगता ये सब बक झक करते रहेंगे पैसे जोड़ कर मर जायेंगे, बनेंगे मरने के बाद सांप उसकी रखवाली करने के लिए। क्या जीवन है इन लोगों का घास फूस खाते हैं, जानवरों की तरह और पानी पी कर राम नाम सत्य हो जायेंगे। वो इन फजुल की बातों पर ध्यान ही नही देता था। धीरे-धीरे मन्दिर के साथ मोहल्ले की साख भी मिटटी मिलने लगी। दूसरे मोहल्ले की बहु-बेटियाँ मन्दिर आने के लिए गली से न आ कर पूरा चक्कर लगा कर आना मन्जूर करती थी। मोहल्ले वालो ने पुलिस से सहायता ली, इतना काम जरूर कर दिया फूल वाला मन्दिर के सामने फूल नहीं लगता । कुआँ वापस अपने ठिकाने सरक गया, जाना पड़ा फिर भी लोगो को फूल वाले के पास।
एक समस्या हो तो कहें, जो मैदान कभी शीशे की तरह साफ सुथरा रहता था। अब कूड़े के ढ़ेर लगे रहते, भंगन भी रोज झिक-झिक करके हार गई, तेल चुपड़े मटके पर पानी की एक बून्द रुके तब तो कोई बात फूल वाले के भेजे में घूसे। फूल वाले की बीवी का रंग एक दम शाह काला, परन्तु जब गली में बैठ पैरो की ऐड़ियाँ रगड़ती तब लगता अब खून निकला की तब खून निकला, नहाने की राम जाने अन्दर ही कही हरी ओम हरी ओम कर लेती होगी। बच्चों के बाल चिड़ियों के घोसले हुए रहते, जब किसी का नहाने का नम्बर आता तो पूरे मोहल्ले में हाहाकार मच जाता था।
मोहल्ले का गुण धर्म ही बदल गया, फजलु की दुकान पर मायूसी फैली रहती, क्रिकेट के बादशाह दूर से ही अपने प्रिय ग्राऊंड को निहार कर तृप्त हो जाते । फूल वाले का एक छत्र राज हो गया पूरे मोहल्ले पर। गांधी, बुद्ध, महावीर का अहिंसक मोहल्ला था। हिंसा तो यहां के शब्द कोश में भी नहीं थी। हां किसी फिल्म में ये दृश्य जरूर देखा होगा। अब कहां सें पैदा करे ‘’भैराम डाकू’’ को जो इस मोहल्ले को फूल वाले से मुक्ति दिलाये। अब भगवान भी मानो फूल वाले से प्रसन्न है, क्यों न हों इसके फूल जो भगवान जी के चरणों में चढ़ते हैं। होली आई फूल वाले के नाते रिसते दार भी आ पधारे, क्या होली का हुड़दंग मचा रात के नौ बज गये, जो होली सालों से 2-3 बजे खत्म हो जाती थी मानो उसकी रील ही अटक गई खत्म हो फिर शुरू, ऐसी होली मोहल्ले ने देखी न सुनी थी। अरे ‘’बरसाने’’ बाले भी आ जाते तो यहां आ के हार मान लेते। नाच गाना ढोल मंजीरा, गाली-गलौज मोहल्ले वालो ने खिड़कियाँ बंद कर टी वी की आवाज तेज कर के इस शोर को अपने घर से दूर रखने की लाख कोशिश की। फिर भी कोई पंचम सुर इन अवरोधों को तोड़ कर अन्दर पहुँच ही जाता था। रात 12बजे जब ये नौटंकी खत्म हुई तब जा के मोहल्ले ने शान्ति की सांस ली।
खन्ड़ेलवाल जी सुबह तीन बजे उठ दो घण्टे नित नियम से पूजा पाठ करते थे। घर के बीच खुला आंगन जिसमें एक भेल पत्र, अमरूद, नींबू, के साथ मौसमी फूल भी लगवाते थे, पूजा के लिए अपने घर के फूलों की क्या बिसात, एकदम शुद्ध न किसी की गन्दी छुअन न किसी की झूठ-कुठ, आज तो जमाना ही नहीं रहा, फूल क्या सब्जी क्या जब गाड़ियों में लाद कर लाते है तो जूतों समेत, वहीं पान तम्बाकू खा थूकते रहते है। लोग है कि संवेदन हीन हो गये है, हमारे जमाने में चारा काट कर जब खेत से लाते हुए आप गट्ठे पर बैठ गये तो मजाल क्या जो भैंस उसमें से एक तिनका भी मुँह में डाल ले। राम..राम समय ने कितनी जल्दी रंग बदल लिया, ये फूल वाला तौबा..तौबा, चारों तरफ गहन शान्ति का राज्य था, शायद कृष्ण पक्ष था, चांद कि अनुपस्थिति में तारा मँडल पूर्ण आभा छाई हुई थी। एक-आध बादल का टुकड़ा तारों के झुण्ड के साथ आँख मिचौली खेल रहा था। खन्ड़ेलवाल जी के पूजा के बर्तन साफ हो गये थे, लाल और सफेद चंदन घिसने कि तैयारी कर रहे थे। अचानक एक छोटी सी बदली जो अभी-अभी तारों के साथ आंख मिचौली खेल रही थी, मानो झुंझला के उसके आंसू निकल गये। बूंदा-बांदी के साथ अचानक गली जो अभी तक शान्त थी, शोर से थरथराहा गई, खन्ड़ेलवाल जी ने खिड़की से झाँक कर देखा तो वहीं फूल बाला ऊपर की तरफ हाथ उठा कर गालियां दे रहा था। खन्ड़ेलवाल जी ने देखा क्या ये पागल हो गया है क्या, न आदमी न आदमी की जात फिर किसको ये गालियां दे रहा है। किस घड़ी में मुतु स्वामी इस निछत्र को मोहल्ले में लें आया जीना दूभर कर रखा है। पूजा की तैयारी कर ही रहे थे लो हो गई पूजा। इतनी देर में एक काली सी परछाई दिखाई दी, उसकी आवज तो खन्डेलवाल जी के कानों में नहीं पड़ी परन्तु वो हाथ हिला कर कुछ इशारे कर रही थी। जिसका जवाब नशेडी फूल वाला इतने जोर से दे रहा था, वो खन्ड़ेलवाल जी के कानों को भी फाड़े डाल रहे थे।
‘’देखो ये हराम खोर मोहल्ले वाले मुझे रात को सोने भी नही देते, छत पर खड़े हो कर मेरे ऊपर पानी फेंक रहे है। मेरा जीना हराम कर रखा है, इस मोहल्ले में या नरक में आ गया हूँ, थू है इस मोहल्ले को’’...........।
इतनी देर में परछाई का हाथ घूमा च.टा..क...बड़ी जोर से एक आवाज आई, फूल बाला चारों खाने चित। परछाई ने हाथ हिला का कुछ निर्देश दिये और अचानक अंधेरे में गायब। ये सब इतनी जल्दी हुआ की खन्ड़ेवाल जी को यकीन ही नहीं आता, अगर फूल वाले को नीचे गिरा नहीं देखता। पुजा का समय बीता जा रहा था। कितनी देर पूजा करते रहे आज पूजा में भी ध्यान नहीं लग रहा था, बार-बार फूल वाले की तरफ जाता था। कितनी देर से बाहर का भी कोई शोर नहीं आया, कैसी निभ्रर्म शान्ति फैली रही घण्टों तक मानो ये अपना वो मोहल्ला ही नही है, जहां कुछ देर पहले महातांड़व हो रहा था। काली अंधेरी रात बीत गई, गली में भी मानो शुक्ल पक्ष का उजियारा फैलने लगा था। फिर मोहल्ला दोबारा अपनी चिर परिचित गति में लौटने लगा था। फूल वाले की चिडि़या एक दम चुप जैसे उसकी जबान को लकवा मार गया हो। सुबह सवेरे मोहल्ले का चौक एक दम साफ सुथरा। किसी को भी यकीन नहीं आया रात तो इतनी मूसलाधार बारिश हो रही थी, अचानक ये सूरज भगवान कैसे निकल आया। खन्ड़ेलवाल जी जब श्याम को पूजा के लिए पान सुपारी लेने गये तो फजलु मिया को रात की परछाई वाली बात का जिक्र किया ‘’ फजलु मिया मेरी बात का यकीन करो या मत करो परन्तु मैने सुबह-सुबह एक चमत्कार देखा’’
फजलु मिया ने गर्दन हिलाते हुये कहा ‘’क्या देखा लाला जी’’
‘’ये जो अपना फूल वाला है इसकी चिड़िया चुप भोले बाबा के गणों ने की है, एक काली सी परछाई इस पर कोई मन्त्र मार गई नहीं ये शैतान आदमी के बस में आने वाला नहीं था। लोग कछ भी कहे भोले बाबा अपने भगतों की सुनता है, धन्य हुई मेरी आंखें जो भगवान न सही उसके गण की एक झलक तो पाई।‘’
फजलु मिया ने पान सुपारी पत्ते मे लपेटते हुए, एक हलकी सी मुस्कान बिखेरी, और आसमान की तरफ देखते हुए कहां अल्ला सब पे करम फ़रमा। ‘’ शिव-शिव जय भोले’’
‘’भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं, जय सिया राम’’फूल बाला मोहल्ला छोड़ कर चला गया, एम0 सी0 सी0 क्लब फिर आबाद होने लगा। परन्तु किसी की बात समझ में नहीं आई ये अचानक फ़ूल वाले को हो क्या गया। जाते हुए भी फजलु मिया से हाथ जोड़ कर माफी भी मांग रहा था। मुतु स्वामी को सबने हिदायत दे दी थी, अगर दोबारा कोई किराये दार रखे तो पुरी तरह छान बीन कर ले। फिर मुतु स्वामी ने वो कमरा कभी किराये पर नहीं दिया, भविष्य के सहवाग और धोनी...... के लिए खाली छोड़ दिया कि जब कोई खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करेगा वो ही इसकी भरपाई करेगा। देखो कब साध पूरी होती है मोहल्ले कि या मुतु स्वामी की, फजलु मिया की पान कि गिलोरीयों के साथ अब भी रीले केमेस्ट्री या आँखो देखा हाल जारी है। पान के साथ एक शरारती मुस्कुराहट भी परोसने लगे थे फजलु मिया जिसे कोई समझने की कोशिश भी नहीं करना चाहता था, सोचते है ये फजलु का कोई नया स्टाइल है।
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मनसा आनन्द ‘मानस’29- गॉव दसघरा, पो आ पूसा,नई दिल्ली – 110012 मो – 9810057527फोन – 65398369
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