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जयंती जैन की ई-बुक – सकारात्मक कैसे बनें

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सुजान पंडित की व्यंग्य कविता - कुरसी हो गयी मैली

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यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है.
कुरसी हो गयी मैली उसको गंगाजल से धोना है.. १. तन पर होंगे खादी, बोली मिस्री सी होगी मीठी.
शुभचिंतक बन साथ रहेंगे, जब तक कुरसी नहीं मिलती..
जौहरी बनकर चुनना होगा, हमको खांटी सोना है----
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है. २. जेपी, लोहिया, मौलाना का रूप सजाकर आयेंगे.
उनके उपदेशों की सीडी, रिमिक्स कर बजवाएंगे..
लेकिन इन बहुरूपियों पर हम सबको फ़िदा न होना है---
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है. 3. होशियारी हो अब इतनी कि, शाख पे उल्लू न बैठे.
देख चुके अंजामें गुलिस्ताँ, फिर से गुलों को न लूटे..
पाक साफ माली से अपने गुलशन को संजोना है---
यारों फिर से सावन आया, सोच समझ कर बोना है. --संपर्क:सुजान पंडित, शंकर विल्ला, कांता टोली चौक, ओल्ड एच.बी.रोड, रांची-८३४००१ (झारखण्ड)
संपर्क-९९३४३ ७०४०८ --(चित्र – कृष्ण कुमार अजनबी का रेखांकन)

रचना दीक्षित की कविता – सूर्य का संताप

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सूर्य का संताप      
मैंने बचपन से आज तक
हर रोज़
सूरज को सुबह औ  शाम
गंगा नहाते देखा है 
जैसे मानो उसने
भीष्म प्रतिज्ञा कर रखी हो 
कि गंगा में डुबकी लगाये बिना 
गंगा के चरण स्पर्श किये बिना 
न तो मैं धरती में प्रवेश करूँगा 
और न ही धरती से बाहर आऊंगा इधर कुछ दिनों से देखती हूँ 
सूरज कुछ अनमना सा है 
हिम्मत जुटा पूंछ  ही बैठी मैं 
किन सोंचों में गुम रहते हो 
बड़ा दयनीय सा चेहरा बना कर 
बोला मैं सोचता हूँ 
कि भगवन से प्रार्थना करूं 
कि इस धरती पर पानी बरसे
रात दिन पानी बरसे 
और कुछ नहीं तो केवल  
सुबह शाम तो बरसे मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गयी 
आखिरकार इसे भी इन्सान का दुख समझ आ रहा है
फिर सोचा शायद स्वार्थी हो गया है 
खुद  इतनी लम्बी पारी खेलते -खेलते थक गया है 
कुछ दिन विश्राम करना चाहता है 
मेरे चेहरे की कुटिल मुस्कान
देख कर वो बोला 
तुम जो समझ रहे हो वो बात नहीं है 
दरअसल मैं
इस गन्दी मैली कुचैली  गंगा में 
और स्नान नहीं कर सकता अवाक् रह गयी थी मैं 
पूछा 
अपनी माँ को गन्दा मैला कुचैला कहते 
जबान न कट गयी तेरी 
जवाब मिला 
अपनी माँ को इस हाल में पहुँचाने …

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : हिन्दी की आखिरी किताब

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अकहानी :अकहानी वह है जो न तो कहानी है और न ही जिसमें ‘अ' अक्षर का प्रयोग होता है । वास्‍तव में अकहानी असफल अकहानीकारों की आंतरिक व्‍यथा है ।अकविता :कविता के नाम पर जो कूड़ा-कचरा दिमाग से बाहर फेंका जाता है, उसे अकविता कहते हैं । वास्‍तव में अकविता वह है, जिसे स्‍वयं कवि भी नहीं समझ सकें ।अभिनन्‍दन :किसी लेखक की लेखन-क्रिया बंद कराने हेतु सबसे उपयुक्‍त हथियार ही अभिनन्‍दन कहलाता है । किसी का भी अभिनन्‍दन कर दो, सरेआम पता चल जाएगा कि अमुख लेखक चुक गया है । आजकल हर बड़े शहर में अभिनन्‍दन करने हेतु दुकानें खुली हैं, कई शहरों में एक साथ अभिनन्‍दन कराने पर एक छोटे कस्‍बे में अभिनन्‍दन मुफ्‍त किया जाता है । (बिल्‍कुल वैसा ही मामला कि दो बड़ी कब्रों के साथ एक छोटी कब्र मुफ्‍त खोदी जाती है ।)आलोचक :वह असफल लेखक जो किसी भी लेखक को सफल होते नहीं देखना चाहता, आलोचक कहलाता है । वैसे आलोचक खटमलों की तरह लेखक का खून चूस-चूसकर मोटाता है ।कवि :वह व्‍यक्‍ति जो सचमुच में बेरोजगार है, हिन्‍दी का कवि है । बिखरे बाल, फटे कपड़े, और कपड़ों में पड़ी जुएं हिन्‍दी कवि की चल-अचल सम्‍पत्ति मानी जाती है । कई ब…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : रेनू'दीपक ' का व्यंग्य - मिलावट

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(प्रविष्टि क्रमांक - 21)मिलावट ___________ कुत्ते की वफादारी के किस्से बहुत जाने पहचाने हैं। पता नहीं कौन से कम्पोजीशन का खून कुत्ते कि रगों में भरा है। इंसान के शारीर में कुत्ते के जैसा खून क्यूँ नहीं है। काश ऐसा होता तो इंसान वफादारी करना सीख जाता। यहाँ तो किसी रिश्ते में वफादारी है ही नहीं। कोई भी रिश्ता जिन्दगी कि किसी भी किताब से उठा कर देख लो। तुम ऊपर बैठे बैठे क्या मुस्कुरा रहे हो। तुम भी तो बंधे हो रिश्ते कि डोर से। पर तुम अनोखे हो। बांध कर भी नहीं बंधते हो। हमें बाँध दिया। एक तरफ तुम्हारी डोर है जिससे तुम नचा रहे हो , और साथ ही इतने सारे रिश्तों से और बाँध दिया। अब कहाँ भाग सकते हैं हम। होगा इससे बड़ा कोई कैदखाना ! देख रहे हो न सर्कस ! हम कोई सर्कस के पात्र हैं ...? क्या समझ रखा है ...? हाँ , दुनिया सर्कस ही तो है। कोई जोकर है यहाँ तो कोई नट है। या तो दुनिया के इशारों पर नाचते हैं हम या फिर हम पर हंसती है दुनिया ... पर तुमने इंसान का खून, कुत्ते के खून जैसा क्यों नहीं बनाया ? क्या इसलिए कि फिर कोई धर्मेन्द्र आकर न कहने लगे ' कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा ' । अरे गोड ज…

अशोक गौतम का व्यंग्य : मुबारकां! मुबारकां!!

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वे हाव भाव से पूरे के पूरे सरकारी बंदे ही लग रहे थे। उन पांच में से एक ने कंधे पर एक टूटी कुदाल ली थी तो दूसरे ने बिना हथ्‍थी का बेलचा उठाया हुआ था। तीन जनों ने पैंट में हाथ डाले हुए थे। उन्‍होंने गुनगुनाते हुए, कमर मटकाते हुए मुहल्‍ले में एंट्री मारी तो हम मुहल्‍ले वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। लगा सरकार के कान पर जूं रेंग गई है। हम तो मान बैठे थे कि कि सरकार के पास और तो सबकुछ होता है पर कान नहीं होते। मुहल्‍ले की छः महीने से इकलौती स्‍ट्रीट लाइट खराब है। पचास बार शिकायत दर्ज करवा चुके थे। कुछ नहीं हुआ। चार महीने से मेन सिवरेज पाइप टूटी हुई है। जो भी कोई मुहल्‍ले से बाजार जाता कमेटी के दफ्‌तर जा शिकायत कर आता। कुछ न हुआ। वैसे तो मुहल्‍ले के हर घर में ही सरकार ने नल लगवाया हुआ था पर पानी सार्वजनिक नल में ही आता था। पंद्रह दिन से वह नल भी बच्‍चे की शू शू की धार पर उतर आया था। बारीनुसार कमेटी में शिकायत करने गया तो वहां पर कुर्सी तोड़ते बंदे ने डांटते कहा,‘ यार! तुम लोगों को कोई और काम भी है या नहीं!'‘क्‍या मतलब?'‘ माडल मुहल्‍ले से ही हो न?'‘हां जी!'‘मैं तो देखते ही पह…

एस. के. पाण्डेय की बाल कविताएँ

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बच्चोंके लिए :  चूहाऔरखरगोश                (१)चूहा जी ने पिया शराब ।इनकी आदत बड़ी खराब ।।नशे में झूमे गिरे धड़ाम ।मानो हो गया काम तमाम ।।डॉक्टर जी आये खरगोश ।देख के बोले हुआ बेहोश ।।दिए दवाई आ गया होश ।बोले देखूँ आये जोश ।।पी लूँ तो कर दे खामोश ।इसमें नहि कुछ मेरा दोष ।।           (२)खरगोश जी बोले सुनिए आप ।भैया पीना समझो पाप ।।करिये राम-नाम का जाप ।मिट जाये तेरा परिताप ।।तुम हो दो बच्चों के बाप ।उनको भी होता संताप ।।स्वास्थ्य भी इससे तेरा बिगड़े ।घर में आके तूँ नित झगड़े ।।जो पीता उसका घर उजड़े ।छोड़ो हो जाओ मोटे-तगड़े ।।            (३)चूहा जी ने मानी बात ।हो गया जीवन में प्रभात ।।बीत गयी दुःख की सब रात ।करते न कोई उत्पात ।।बच्चों से अब करते बात ।चुहिया भी मन में पुलकात ।।दिन-दिन बढ़ती उनकी कांति ।घर में भी रहती सुख-शांति ।।            (४)गन्दी आदत से दुःख होता ।समझे न जो बाद में रोता ।।कभी नहीं वो सुख से सोता ।पास में भी  रहता वो खोता ।।जीवन भार बने वो ढोता ।जाये कीचड़ में वो धोता ।।पानी में ही लगता गोता ।काटे जग जैसा जो बोता ।।        - एस के पाण्डेय,समशापुर (उ. प्र.) । URL:  http://sites…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य - भ्रष्ट व्यवस्था के लाभ

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(प्रविष्टि क्रमांक - 20)भ्रष्टाचार की जय हो ! एक और घोटाला सफलता पूर्वक संपन्न हुआ . सरकार हिल गई . स्वयं प्रधानमंत्री को एक बार फिर से भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर से कठोर कदम उठाने की घोषणायें दोहरानी पड़ी . एक और उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित की गई . सी बी आई के पास एक और फाइल बढ़ गई . भ्रष्टाचार यूं तो सारे विश्व में ही व्याप्त है , पर उन देशो में अधिक है जहां आबादी अधिक संसाधन कम , और भ्रष्टाचार के पनपने के मौके ज्यादा हैं , भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सरकारी नियम कमजोर हैं . भारत के संदर्भ में बात करे तो मै समझता हूं कि हम सदा से किसी न किसी से डर कर ही सही काम करते रहे हैं चाहे राजा से , भगवान से , या स्वयं अपने आप से . पिछले सालों मे आजादी के बाद से हमारा समाज निरंकुश होता चला गया . हर कहीं प्रगति हुई , बस आचरण का पतन हुआ . नैतिक शिक्षा को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल जरूर किया गया है पर जीवन से नैतिकता गायब होती जा रही है . धर्म निरपेक्षता के चलते धर्म का , दिखावे का सार्वजनिक स्वरूप तो बढ़ा पर धर्म के आचरण का वैयक्तिक चरित्र पराभव का शिकार हुआ . यह बात लोगो के जहन में घर कर गई कि स…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : मीनू खरे का व्यंग्य - लिफ़ाफ़ाबाद का ब्लॉगर सम्मेलन और मच्छर

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(प्रविष्टि क्रमांक - 19)एक शहर था लिफाफाबाद. उस शहर में कुछ ब्लॉगर और बहुत सारे मच्छर रहते थे. ब्लॉगर बड़ी मेहनत से ब्लॉगिंग करते थे और मच्छर खून चूसने का पुश्तैनी काम किया करते थे.मच्छरों को ब्लॉगर्स के ब्लॉग पढ पढ कर बड़ी ईर्ष्या होती थी क्यों कि खून चूसने का काम कोई सरकारी नौकरी की तरह तो था नही कि ऑफ़िस पहुँचे नहीं कि ब्लॉगिंग और टिपियाना शुरू! यहाँ तो रात रात भर जाग कर कस्टमर के सिर पर घंटों लोरी गाइए तब जाकर बूँद भर खून का इंतजाम हो पाएगा. अब रात भर  इतनी मेहनत के बाद कोई क्या खाक ब्लॉगिंग करेगा? यही कारण था कि क्वालिफ़िकेशन होते हुए भी एक भी मच्छर अब तक अपना ब्लॉग नहीं बना पाया था. वैसे भी ब्लॉगिंग के लिए कितनी योग्यता की ज़रूरत ही होती है?             एक दिन शहर के एक ब्लॉगर को जाने क्या सूझी कि उसने देश भर के ब्लॉगरों की मीटिंग बुलाने की सोची. क्यों कि पोस्टों के आदान प्रदान, सनाम और बेनामी टिप्पणियों,यहाँ तक कि ऐग्रीगेटर, मॉडरेशन के बावजूद काफ़ी कुछ ऐसा था जिसे आमने-सामने बैठ कर सलटाया जाना ज़रूरी लगता था.बात शहर के अन्य ब्लॉगरों तक पहुँची. सबने कहा व्हॉट ऐन आइडिया सर जी! तीन बार स…

सुजान पंडित की व्यंग्य कविता – लुट गई सब्जी की झोली…

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लुट गई सब्जी की झोली -------- ऐसी खबर छपी है मौला, आज के अख़बार में.
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में.. आलू, गोभी, परबल, भिन्डी, सौ-सौ ग्राम था झोली में.
मन में ख़ुशी, आँखों में चमक, रस भरा था उसकी बोली में.
माँ खड़ी थी चूल्हा जलाये, बेटे के इंतज़ार में -----
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में----- सारे शहर में चर्चे हो गए, सब्जियों के लुट जाने की.
बीमा वाले घर घर पहुंचे, नींद उड़ गई थाने की.
आलू प्याज हो जिनके घर, वो ताले जड़ दिए द्वार में----
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में---- सोने-चाँदी का क्या कहना, प्याज रखते लॉकर में.
रात जागकर सोते जिस दिन, सब्जी आती है घर में.
पास पड़ोस से डर लगता, कुछ मांग न ले उधार में----
लुट गई सब्जी की झोली, एक बच्चे की बाज़ार में----

सी . बी . श्रीवास्तव " विदग्ध " की कविता

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प्रभामय ओंकार हूं मैंव्यक्ति नहीं विचार हूं मैं,जगत का आधार हूं मैं !एक झोंका हूं हवा का,नहीं जिसका ठौर कोईज्ञान हूं ,विज्ञान हूं , जिसको समझते लोग कोई !नहीं जिसका रूप रंग ,वह अमृत वर्षी प्यार हूं मैं !!सर्व व्यापी हूं ,है चिन्मय और जाग्रत जगत जिससेमाया के व्यामोह में हूं ,आ फंसा हूं यहां इससे !हूं अमित आकाश नीरव ,जलधि पारावार हूं मैं !!हूं स्वतः से भी अपरिचित ,किन्तु युग का जन्मदाताहै तो सत्ता निरन्तरफिर भी फिर भी समझ में जो न आतातरुणी का बनता बिगड़ता ,सामयिक अभिसार हूं मैं !!जानने को रहस्य जिसका मनस्वी नित सोचते हैं"नेति " " नेति " के तर्क रख सब ,रहे अब तक खोजते हैंनहीं कोई आकार जिसका ,प्रभामय ओंकार हूं मैं !!व्यक्ति नहीं विचार हूं मैं ,व्यक्ति नहीं विचार हूं मैं !!---कवि परिचय प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध"वरिष्ठ साहित्यकार , कवि , अर्थशास्त्री , शिक्षाविद् बंगला नम्बर ओ.बी.११ विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.मो. ०९४२५४८४४५२जन्म २३मार्च १९२७ , मण्डला म.प्र.शिक्षा एम.ए. हिन्दी , एम.ए.अर्थशास्त्र साहित्य रत्न , एम.एड.सेवा शासकीय शिक्षण महाविद्य…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : विनोद साव का व्यंग्य – सपनों का गांव

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(प्रविष्टि क्रमांक - 18)स्‍कूल और जनपद कार्यालय के भवन साफ सुथरे थे जैसे गांव में रहने वालों के उनके घर हों। सड़कें बिलकुल साफ सुथरी थीं जैसे गांव के घर के आंगन हों। सड़कों को गोबर पानी से छरा दे दिया गया था अपने आंगन की तरह। गोबर से लीप दी गई ये पतली पतली मनोहारी गलियां घरों में ऐसे घुस गई थीं जैसे नई नवेली बहुएं हों। घर से बाहर गांव में हर कोई कहीं भी ऐसे बैठा था जैसे अपने घर में बैठा हो। चौपाल में हर कोई दूसरे से ऐसे बतिया रहा था जैसे वह चौपाल में नहीं अपने घर की डेहरी पर बैठा बतिया रहा हो। बच्‍चे नाच नाच कर बोरिंग से पानी निकालकर पी रहे थे जैसे बोरिंग गांव का नहीं उनके घर का हो। कुल मिलाकर गांव के भीतर घर था और घर के भीतर गांव था। यहां एक अकेली कोलतार की पक्‍की सड़क थी जो कहीं से आती थी और कहीं चली जाती थी। सड़क पर चलते उस राहगीर की तरह जो इस गांव में कहीं से आता है और कहीं चला जाता है।इस सड़क पर कभी कोई सरकारी जीप, इतवार की छुट्‌टी में गांव की नदी के किनारे पिकनिक मनाने आए किसी समूह की कार, किसी बड़े किसान का ट्रैक्‍टर और किसी छोटे किसान की लूना दिख जाती थी जिनके सायलेंसर की फटफट…

देवी नागरानी की पुस्तक समीक्षा : बेघर आँखें – संवेदनशील हृदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति

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बेघर आँखें ( कहानी संग्रह ) ॰॰ कहानीकार – तेजेंद्र शर्मासंवेदनशील ह्रदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति लेखन की हर विधा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधी है मानव मन , जिसके भावों से असकी सशक्ता टपकती है , उसकी भावपूर्ण भाषा के अधिकार से संसार भर के अनुभव और अपने निजी जिये गये यर्थाय को व्यक्त कर पाते हैं। रचना की कोई भी विधा हो , कोई भी शिल्प हो , प्रस्तुतीकरण के बाद रचयिता और पाठक के बीच का सेतु बन जाए तो वह कामयाब रचना हो जाती है। साहित्य की इस कहानी लेखन विधा को स्थाई तत्व तेजेंद्र जी की कहानियों में सहजता के साथ अपने आप को प्रकट कर रहे हैं। सहज प्रवृत्ति , अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल सी होकर प्रवाह बनकर कलम की नोक से अपना कथ्य और शिल्प ज़ाहिर कर रही है। इस माहिरता की एक नहीं अनेक झलकियां इस बात की ज़ामिन है कि तेजेंद्र जी ने जो देखा महसूस किया और भोगा उसी को रचनाबद्ध किया। उनकी कहानियों की भूमिकाएं जीवन की सच्चाईयों से ओत प्रोत है और पात्रों के माध्यम से तेजेंद्र जी अपने खट्ठे मीठे तजुर्बो को बखूबी प्रदर्शित करते हैं - जहां पर दिखाई देता है अशाओं - निराशाओं का लहलहाता झुरमुट , कहीं संघर्ष की चौखट पर …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य : आतंकवाद अमर हो

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(प्रविष्टि क्रमांक - 17)प्रत्येक वस्तु को देखने के दो दृष्टिकोण होते हैं . आधे भरे गिलास को देखकर नकारात्मक विचारों वाले लोग कहते हैं कि गिलास आधा खाली है , पर मेरे तरह के लोग कहते हैं कि गिलास आधा भरा हुआ है . मनोवैज्ञानिक इस दृष्टिकोण को सकारात्मक विचारधारा कहते हैं . आज सारी दुनिया आतंकवाद और आतंकवादियों के विरुद्ध दुराग्रह , और ॠणात्मक दृष्टिकोण के साथ नहा धोकर पीछे पड़ी हुई है . आतंकवाद के विरोध में बयान देना फैशन हो गया है . जब दो राष्ट्राध्यक्ष मिलें और घोषणा पत्र जारी करने के लिये कुछ भी न हो तो आतंकवाद के विरोध में साथ काम करने की विज्ञप्ति सहज ही जारी कर दी जाती है .कभी सोचकर तो देखिये कि आतंकवाद के कितने लाभ हैं . आतंकवादियों के डर से दिन रात चौबीसों घंटे हमारी सुरक्षा व्यवस्था और सैनिक चाक चौबंद रहते हैं , अनेक दुर्घटनाएं घटने से पहले ही निपट जाती हैं . सोचिये यदि आतंक का हौआ न होता तो क्या कमांडो फोर्स गठित होती ? क्या हमारे नेताओं का स्टेटस सिंबल , उनकी जेड सुरक्षा उन्हें मिलती ? जिस तेजी से सुरक्षा बलों में नये पद सृजित हुये है आतंकवाद का बेरोजगारी मिटाने में अपूरणीय योग…

वीरेन्‍द्र सिंह यादव का आलेख – मीरा : सामंती अभिजात्‍य की विद्रोही प्रवक्‍ता

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बदलते परम्‍परा के प्रतिमानों में मध्‍यकाल की कवयित्री मीरा अपनी लोकप्रियता में बेमिसाल हैं। इनका महत्‍व उस विद्रोही चेतना की अभिव्‍यक्‍ति में है जो उस समय सामन्‍तवाद के विरुद्ध पनप रहा था। मीरा अपनी जीवनचर्या और कविता दोनों से परम्‍परावादी, सनातनी व्‍यवस्‍था की जड़ता, थोथी कुल मर्यादा और जाति-पाँति की जकड़बन्‍दी को तोड़ती हैं। सामन्‍ती आभिजात्‍य को ठोकर मारकर विद्वतजनों का सत्‍संग करती है और जनसाधारण के बीच बेधड़क विचरण करती हैं। मीरा की असाधारण लोकप्रियता का रहस्‍य जनसाधारण से तादात्‍म्‍य में है। जनसामान्‍य मीरा के गीतों में अपनी भावनाओं की सीधी-सच्‍ची अभिव्‍यक्‍ति पाता है। मीरा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनके नाम पर हजारों पद भक्‍तों ने रच डाले हैं। निर्गुण पंथ के अनुयायियों ने क्षेपक डालकर अपने सम्‍प्रदाय के अनुकूल अर्थापन करने की कोशिश की है, जबकि मीरा साम्‍प्रदायिक आग्रहों से एकदम मुक्‍त हैं। उनकी विद्रोही चेतना को अपने साम्‍प्रदायिक घेरे में बाँधने की कोशिश निर्गुणमार्गी रैदास और नाथपंथी योगी ही नहीं करते, चैतन्‍य महाप्रभु के भक्‍त उनको ‘गौरांग कृष्‍ण की दासी' बनाने की को…

वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख – लोक कवि रहीम : जातीय लोक जीवन के प्रहरी

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रहीम की कविता में जातीय जीवन और लोक की समानता पर बल मिलता है। आपने कविता की पवित्रता बनाये रखी, उस पर दरबार की कालिख नहीं लगने दी। उनके काव्‍य में राजसी जीवन के अनुभव नहीं, आम आदमियों की मनः स्‍थितियों का सघन चित्रण हुआ है। विदेहराज जनक की तरह राजवैभव के बीच रहते हुए भी कमलवत्‌ निर्लिप्‍त, साक्षी भाव से जीवन के उतार चढ़ाव को देखते रहे। जीवन-सुरंग पर सवार होकर वे आग के दरिया को सजह, अंकुठ भाव से पार करते हैं। सुख या दुःख कहीं भी उद्वेलन का भाव नहीं है। साक्षी भाव से वे जीवन के सारे अनुभवों को जीते हैं जिसका निचोड़ उनकी कविता में प्रकट है। यही उनकी कविता को महत्‍वपूर्ण बनाता है। शुक्‍ल जी जिस ‘सेक्‍यूलर' कविता की बात उठाते हैं, वह अपने सही रूप में रहीम में मिलती है। पर पता नहीं क्‍यों शुक्‍ल जी चूक गए। हजारी प्रसाद द्विवेदी को भी ‘सेक्‍यूलर' साहित्‍य रीतिकाल में दिखाई देता है, रहीम उनकी नजरों से ओझल रहते हैं। विजयदेव नारायण साही ने रहीम के बहुमुखी, प्रतिभाशाली व्‍यक्‍तित्‍व की तरफ संकेत तो किया है पर केवल चर्चा के स्‍तर पर। रहीम काव्‍य का विशद विवेचन उपेक्षित है। दरअसल साहित्‍य …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन - श्याम बाबू शर्मा का व्यंग्य : हमारी धर्मनिरपेक्षता

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(प्रविष्टि क्रमांक - 16 - A)
मिश्रीलाल हमारे मित्रों में सबसे बुध्दिमान व्यक्ति हैं। वे कुछ न कुछ नये विषयों से हमारा ज्ञानवर्धन करते रहते हैं। हमारी मित्र-मंडली अकसर शाम को रंगीलाल जी के घर पर मिलती है। दिनभर की थकान मिटाने के लिए बतकही से बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।
ऐसी ही बतकही की एक शाम मिश्रीलाल आते ही धमाका करते हुए बड़े ही आक्रोशित अंदाज में कहने लगे- आज जिसे देखो वही धर्मनिरपेक्ष बनता जा रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन हमारा देश फिर से गुलामी की जंजीर में बंध जाएगा। हम लोगों ने भाभीजी को आवाज देते हुए पहले मिश्रीलाल जी को ठंडा करने के उद्देश्य से फ्रिज का पानी लाने के लिए कहा। ठंडा पानी पीने के पश्चात मिश्रीलाल जी थोड़े ठंडे हुए और कहने लगे- आज जमाने को क्या हो गया है। सभी अपने-अपने कर्तव्य के प्रति विमुख होते जा रहे हैं। जिसे देखो उसने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ रखा है। हमने पूछा- क्यों भाई! आज कहां फंस गए और यह अनाप-शनाप क्या बके जा रे हो। धर्मनिरपेक्ष होना क्या बुरा है। हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या यह बुरा है?
वे कहने लगे- नहीं भाई! जिस धर्मनिरपेक्षता की बा…

मनसा आनन्‍द ‘मानस’ की कहानी : गे-युग

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गाँव की शांति में अचानक तूफान आ गया, कहाँ दबी पडी थी यह अशांति जंगली घास की तरह दो बूंद पडी नहीं की उग आई। मनुष्य, औरतें, बच्चे ही नहीं, पेड़, पौघे, पशु-पक्षी सभी आश्चर्य और शौक मे भर गये थे। औरतें गली चौराहों पर खड़ी धूधंट मे ही खुसर-फुसर करती हुई जगह-जगह खडी दिखाई दे रही थी। कैसी कुंभकरणी नींद से एक दम जाग गया था पूरा गाँव। सबसे ज्यादा रौनक चाचा चुन्नी की चाय की दुकान पर थी । दुकान क्या गाँव का तोरण ही समझो, जो गाँव की कथा, पटकथा, रौनक, मेला यहीं से शुरू और यहीं खत्म। गाँव के ब्रह्मांड का केंद्र बिन्दु समझो। चुन्नी चाचा की चुटकी में कुछ ऐसा जस था, अगर उनके हाथ की कोई चाय पी लेता तो फिर हो जाता कायल चाचा की चाय का। बात यहां तक सुनने मे आती है, चुन्नी चाचा की शान मे, किसी ने उनके हाथ की चाय न पी तो समझो जीवन बेकार, नाहक ही आया दुनियाँ में सर खपाई करने के लिए। आज की खुसर-फुसर ने दुकान का सारे कायदे कानून ताक पर रख दिये थे। चाचा का पहले ही पारा सातवें आसमान पर रहता था, आज जो गिनना ही मुश्किल है...अनन्त आसमान ही समझो। कितनी ही क्रोध भरी वाणी चाचा की जबान से निकल रही हो, आप चेहरे पर फैला …

मनसा आनन्‍द ‘मानस’ की कहानी : फूल वाला

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फजलु मियां की पान की दुकान मोहल्‍ले की नाक थी। उसी के सामने एक बड़ा सा खुला चौक पसरा पड़ा था। जो भविष्‍य के सचिन, गावस्‍कर, कपि‍ल देव तैयार होने की नर्सरी का काम करता था। अब इस नर्सरी से चाहे सारा मोहल्‍ला परेशान क्‍यो न हो परन्‍तु मजाल क्‍या कोई उन्‍हे ड़ाटे-डप्‍टे या कुछ कहे, ये मोहल्‍ले के ही नहीं, देश के साथ भी गद्दारी समझी जाती। किस को पता है कल कोई निकल जाये सहवाग, गम्भीर, जो दूर दराज मोहल्‍ले का नाम रौशन करे, परन्‍तु ये तीसरी पीढ़ी चल रही है, नवाब पाटोदी से लेकर धोनी जी सम्हाल चुके है बाग डोर भारत की पर मजाल है आज तक ये साध पूरी हुई हो, पर एक आस है भविष्‍य के इन दुलारों से आज नवाब रजवाड़ों से क्रिकेट निकल कर गली मोहल्‍ले में तो आ गई है। सो भविष्‍य के इन जुगनुओं से उम्‍मीद है एक दिन मोहल्‍ले का नाम चमकायेगें। इस लिए वो कितना भी शोर मचाये, कैसा ही चौका-छक्‍का मारे, बीच में खुदा ना खोसता आप आ गये और बाल ने आपकी मुहँ पीठ या गाल तक की भी चुम्बन ले ली तो आपने केवल मुस्कराना है, किसी किस्‍म का कोई प्रतिरोध नहीं करना है। भले ही मोना लिसा जैसी मुस्‍कान न हो आप के हंसने की, इसके अलावा शा…

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