
हिन्दी साहित्य की राष्ट्रीय कविता-धारा में निराला कवि गुरू हैं। इनके व्यापक व्यक्तित्व की गरिमा इस अर्थ में निहित है कि इस कवि ने कविता को मानवीय सत्ता सौंपकर इसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। निराला जी निश्चित अर्थ में युग पुरूष थे। यही कारण है कि इनकी कविताओं को प्रवृत्तियों के आधार पर तो किसी वाद विशेष से जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन किसी वाद से पूर्णतया सम्पृक्त इनका व्यक्तित्व कदापि नहीं रहा। आपका जीवन और साहित्य, कर्म और ज्ञान साधना और कल्पना, विचार और व्यवहार जगत की एकरूपता में ही अर्थ-विस्तार पाता रहा। डॉ. दूधनाथ सिंह ने निराला को ‘आत्महंन्ता आस्था' की संज्ञा दी है। वे अपने इस नामकरण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देते हुये लिखते हैं -
दरअसल, सच्चा रचनाकार-घनी, सुनहली, अयालों वाला एक सिंह होता है, जिसकी जीभ पर उसके स्वयं के भीतर निहित रचनात्मकता का खून लगा होता है। अपनी सिंह वृत्ति के कारण वह कभी भी इस खून का स्वाद नहीं भूलता और हर वक्त अपने शिकार की ताक में सजग रहता है - चारों ओर से अपनी नजरें समेटे एकाग्र चित्त, आत्म-सुख, एकाकी और कोलाहलपूर्ण शान्ति में जूझने और झपटने को तैयार। इसी तरह की एकाग्रचितता और आत्ममुखता में सिंह को मचान पर बैठे हुये शिकारी का ध्यान नहीं रहता। यहीं से एक भयंकर अपमान, यंत्रणा और दुःखांत की सृष्टि होती है, जिससे वह अपनी सारी गर्जनाओं के बाद भी मुक्त नहीं हो पाता और मारा जाता है। महान और मौलिक कलाकारों का यही विम्ब बार-बार मेरे दिमाग में बनता है। कला के प्रति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण उसे बाहरी दुनिया से बेखबर कर देता है। वह इन दोनों दुनियाओं में सामंजस्य नहीं स्थापित कर पाता। वह कोशिश करता है, जैसे सिंह भी कभी-कभी मचान की ओर झपटता है (और निराला ने भी शायद बहुत कोशिश की होगी) लेकिन उसकी सघन आत्ममुखता इसमें बाधक होती है। इस तरह यह एकांत समर्पण एक प्रकार का आत्मभोज होता है, कला रचना के प्रति यह अनन्त आस्था एक प्रकार के आत्म हनन का पर्याय होती है, जिससे किसी मौलिक रचनाकार की मुक्ति नहीं है। जो जितना ही अपने को खाता जाता है - बाहर उतना ही रचता है। लेकिन दुनियावी तौर पर वह धीरे-धीरे विनष्ट, समाप्त, तिरोहित तो होता ही चलता है। महान और मौलिक सर्जना के लिये यह आत्म बलि शायद अनिवार्य है।
दूधनाथ जी के उपर्युक्त कथन से यह बात स्पष्ट होत है कि हर महान रचनाकार निराला की तरह अन्तर्मुख होता है, दुनियादार नहीं होता। वह सत्तासुख (मचान) की ओर झपटता तो है लेकिन अपने निहित संस्कारों के कारण उसमें सफल नहीं हो पाता। इसका यह तात्पर्य नहीं कि वह मारा जाता है। प्रत्येक रचनाकार जो महान हैं अपनी असफलताओं को उदात्त करता है और महान रचना देता है। वह आजीवन मचान की ओर झपट्टा मारकर ही महान बनता है। जो रचनाकार झपट्टा मारने में सफल हो जाता है, वह महान नहीं रह जाता। सुविधा-भोगी होकर सत्ता का गुलाम हो जाता है। अतः इस वाक्य को इस तरह से भी कहा जा सकता है कि हर महान रचनाकार आत्म-भोग में जन-भोग का सुख अनुभव करता है, यही उसकी नियति है। निराला ने भी यही किया है। आपने झपट्टे की चिन्ता से अलग अपनी पीड़ाओं, असफलताओं और विवशताओं को उदात्त करके समाज के लिये ऐसी कालजयी रचनायें दी हैं, जो झपट्टाबाज रचनाकार कई जन्म लेकर भी नहीं दे सकते। यह सच है कि रचनाकार भी मनुष्य होता है, उसे भी समाज में रहना पड़ता है, उसे भी सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षण होता है उसमें भी मनुष्य की सामान्य कमजोरियाँ होती हैं। पर हर महान रचनाकार या महापुरूष बिना सुख सुविधाओं को त्यागे महान नहीं बनता। वह इस सुख को विवशता से, और स्वेच्छा से भी वरण करता है। इसके लिये उसके संस्कार उत्तरदायी होते हैं। निराला के साथ भी ऐसा ही हुआ है। उन्होंने परिस्थितियों के साथ कभी समझौता नहीं किया और आत्महनन का सुख मजबूरी से अधिक स्वेच्छा से वरण किया।
निराला की राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव से परिपूर्ण आध्यात्मिकता से समृद्ध और उज्जवल भविष्य की आकांक्षा से युक्त एक व्यापक और गतिशील चेतना है। आपकी राष्ट्रीयता न तो भारतेन्दु युगीन राष्ट्रीयता की तरह हिन्दुत्व की परिधि तक सीमित है और न द्विवेदी युगीन राष्ट्रीयता की भाँति जाति, समाज और देश तक। वह एक विस्तृत मानवीय धरातल पर प्रस्तुत होने वाली राष्ट्रीयता है। निराला जी की राष्ट्रीयता में सांस्कृतिक जागरण के स्वर हैं, स्वामी विवेकानन्द और टैगोर के सम्पर्क से उपजी आध्यात्म की गहराई है और दूसरी ओर लोकमान्य तिलक के वैचारिक विद्रोह से उत्प्रेरित ओजमयी वाणी है। उनके राष्ट्रीय गीतों में भारत के अतीत के गौरवपूर्ण चित्र, वर्तमान का सामाजिक-आर्थिक वैषम्य तथा आदर्श और उज्जवल भविष्य की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है।
निराला जी ने जिन राष्ट्रीय-गीतों का निर्माण किया है, उनमें भारत-जय-विजय का अत्यन्त प्रसिद्ध गीत है और देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय समारोहों में गाया जाता है। आचार्य नन्द दुलारे बाजपेयी ने लिखा है कि - ‘‘राष्ट्रीय गीतों के अनुरूप राष्ट्रीय उत्कर्ष और गौरव की भावना तथा उनके सौन्दर्य और ऐश्वर्य का प्राचीन सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से आलेखन किया गया है। राष्ट्र गीत के सभी मूलतत्व इन्हीं गीतों में प्राप्त होते हैं। राष्ट्रीय गीतों में निराला की दृष्टि केवल राष्ट्रीय जीवन के उत्कर्ष से सम्बन्धित नहीं है बल्कि उनमें राष्ट्र की अधोगति, विषमता आदि के भाव व्यक्त किये गये हैं।''
निराला ने अपने काव्य में अतीत की गरिमा और आदर्श चरित्रों का भव्य चित्रांकन किया है। गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई, हीन भावना से ग्रस्त जन चेतना को उदबुद्ध करने के लिये आपने अपना प्रसिद्ध उद्बोधन गीत ‘‘जागो फिर एक बार'' लिखा। प्रस्तुत कविता में निराला ने आधुनिक भारतीय जनमानस की प्रेरणा, स्फूर्ति, ओज एवं गौरव की भावना से प्रभावित कर उद्बुद्ध करने की विराट चेष्टा की है -
पशु नहीं, वीर तुम, समर शूर, क्रूर नहीं,
काल चक्र में हो दबे आज तुम राजकुंवर,
समर सरताज ? मुक्त हो सदा ही तुम
बाधा विहीन-बन्धन चन्द ज्यों।
निराला के इस उद्बोधन गीत में कवि की जिस ओजमयी वाणी की झंकार सुनाई पड़ती है उससे लगता है कि बूढ़ी शिराओं का भी खून उबल पड़ेगा -
समर में अमर कर प्राण गान गाये महासिन्धु से
सिन्धु-नद-तीरवासी ?
सैन्धव तुरंगों पर चतुरंग-चमू-संग,
‘‘सवा सवा लाख पर एक को चढाऊँगा,
गोविन्द सिंह निज नाम तब कहाऊँगा।
निराला जी की सांस्कृतिक चेतना एक विशिष्ट आध्यात्मिक गरिमा से ओतप्रोत है। जीव और ब्रह्म के अमिट सम्बन्धों को कितनी सुन्दर व्यंजना इन पंक्तियों में दिखती है -
तुम दिनकर के खर किरण जाल, मैं सरसिज की मुस्कान।
तुम वर्षों के बीते वियोग, मैं हूँ पिछली पहचान।
तुम योग और मैं सिद्धि, तुम हो रागानुग निश्चय लय
मैं शुचिता सरल समृद्धि।
निरला ने अपनी कविता ‘‘छत्रपति शिवाजी का पत्र'' में शिवाजी के आदर्श चरित्र और ओजमयी वाणी के प्रस्तुतीकरण द्वारा कवि ने व्यंजना से गुलाम भारतीयों को ही उद्बुद्ध किया है। छत्रपति शिवाजी जिस प्रकार जय सिंह को धिक्कारते और समझाते हैं उसे पढ़कर कौन जड़ उद्बुद्ध नहीं होगा -
शत्रुओं के खून से धो सके यदि एक भी तुम माँ का दाग,
कितना अनुराग देशवासियों को पाओगे। निर्जन हो जाओगे अमर कहलाओगे।
इसी प्रकार अपनी अन्य कविताओं (यमुना के प्रति, राम की शक्ति पूजा, दिल्ली और खण्डहर आदि) में भी पुरातन वैभव, आदर्श और गौरव को उपस्थित कर जीवन्त करने का सफल प्रयास किया है।
निराला जी का युग बोध बहुत गहरा था। यही कारण है कि उन्होंने देश की सामाजिक विभीषिका आर्थिक शोषण की प्रवृत्ति धर्मान्धता और अमानवीयता पर गहरा क्षोभ प्रकट किया है। उनकी कविता में तिलमिला देने वाले व्यंग्य भरे पड़े हैं। देश की दयनीय अवस्था और भग्न संस्कृति का जो चित्र ‘तुलसीदास जी' ने रेखांकित किया है, वह दुर्लभ है। निराला इस सांस्कृतिक पतन पर व्यंग्य करते हुये मानव को यह निश्चय करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं कि -
करना होगा यह तिमिर पार, देखना सत्य का मिहिर द्वार,
बहना जीवन के प्रमुख ज्वार में निश्चय।
दलित शोषित, कुलियों और मजदूर वर्ग के जितने मर्मस्पर्शी चित्र निराला ने दिये हैं, वह अनुपम हैं। भिक्षुक ‘वह तोड़ती पत्थर' जैसी सशक्त कविताएं एक तरफ जहाँ उनकी दुरवस्था और विवशता को अंकित करती हैं, दूसरी तरफ ‘मानव जहाँ बैल-घोड़ा है, कैसा तन-तन का जोड़ा है,' के द्वारा मानवीय विद्रूपताओं पर व्यंग्य किया गया है।
‘नये पत्ते', ‘बेला' और कुकुरमुत्ता में न जाने कितने ऐसे चित्र मिलेंगे जो इस देश की सामाजिक-आर्थिक विषमता और सांस्कृतिक गिरावट की सूचना देते हैं और इसके साथ ही इन कविताओं में न केवल वैषम्य के प्रति कवि का गहरा आक्रोश है बल्कि अमानवीय शोषण और अराजनीति पर गहरे व्यंग्य भी हैं -
‘इनके साथ और अफसरान हैं
जैसे दरोगा जी
बीस सेर दूध दोनों घड़ों में जल्द भर।'' (नये पत्ते)
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट। (कुकुरमुत्ता)
इतना ही नहीं निराला जी अमीर वर्ग को चेतावनी देते हुये घोषणा करते हैं -
आज अमीरों की हवेली, किसानों की होगी पाठशाला।
धोबी, पासी, चमार, तेली, खोलेंगे अंधेरे का ताला। (बेला)
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बालों के नीचे पड़ी जनता बल तोड़ हुई
माल के दलाल ये वैश्य हुए देश के
सागर भरा हुआ
लहरों से बहले रहे
किरनें समन्दर पर पड़ती कैसे दिखीं
लहरों के झूले-झूले
कितना विहार किया कानूनी पानी पर (नये पत्ते)
निराला जी की कविताओं में जहाँ अतीत के गौरवमय चित्र हैं, मानवता का आदर्श है। वर्तमान का वैषम्यपूर्ण बोध है। वहीं उसमें उज्जवल भविष्य की प्रबल आकांक्षा भी है। उन्होंने सुखी स्वाधीन समाज की परिकल्पना की है। भारत के सामाजिक वैषम्य, अमानवीय कुकृत्यों और अराजनीति पर क्षोभ व्यक्त करते हुये कवि जहाँ तोड़ने और उनमें संघर्ष करने की बात करता है, वहीं उसमें भविष्य में उगने वाले सूर्य का सुन्दर आलोक भी है -
लड़ना विरोध से द्वन्द्व-समर,
रह सत्य-मार्ग पर निर्भर
करने को ज्ञानोद्धत प्रहार
तोड़ने को विषम वज्र द्वार,
उमड़े भारत का भ्रम अपार हरने को।
जागा दिशा ज्ञान,
उगा रवि पूर्ण का गगन में नवगान,
हारे हुये सकल सैन्य दलमल चले
जीते हुये लगे हुये गले
बन्द वह विश्व में गूंजा विजय गान।
क्रांति का आहवान निराला जी का प्रमुख ध्येय है आपके अनुसार नव-समाज-निर्माण की स्थापना का बीज क्रांति और विद्रोह में ही निहित है। निराला जी की ‘जागो फिर एक बार' कविता में क्रांति के बीज ही पूर्णरूपेण प्रस्फुटित हुये हैं -
‘‘योग्य जन जीता है
पश्चिम की उक्ति नहीं
गीता है, गीता है
स्मरण करो बार-बार
जागो फिर एक बार।''
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि निराला जी के राष्ट्रीय गीतों में केवल राष्ट्रीय जीवन का उत्कर्ष ही चित्रित नहीं है, बल्कि उनमें राष्ट्र की अधोगति उसकी भौतिक दरिद्रता एवं विषम परिस्थितियों आदि के भाव भी व्यक्त किये गये हैं। इसके साथ ही इन गीतों में उज्जवल भविष्य की आकांक्षा और कल्पना भी वर्तमान है।
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युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डाँ वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्र्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की स्तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
सम्पर्क:
- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
वरिष्ठ प्रवक्ता, हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई