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December 2009
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(प्रविष्टि क्रमांक - 51)

स्कूल के दिनों में मेरा एक मित्र था-संता सिँह 'हट के'। नाम तो उसका संता सिँह ही था, 'हट के' तो हम मित्र उसे प्यार से बुलाते थे। वास्तव में उसे किसी ने समझा दिया था कि दुनिया में आगे निकलने के लिए ज़रा हट के सोचना पड़ता है, दुनिया में जो भी महान लोग हुए हैं, वे इसीलिए महान हैं कि वो ज़रा हट के थे। इसलिए उसे ज़रा हट के सोचने का भूत चढ़ गया। ऐसा भी नहीं कि वह हर बार हट के सोच ही पाता हो, लेकिन वह अपनी हर सोच को ज़रा हट के मानता ज़रूर था। हट के सोचने के कारण तो कई बार उसे समस्याओं का सामना भी करना पड़ता था। गणित के टीचर ने एक बार एक प्रश्न पूछा कि यदि एक हाथी एक बार में पाँच बच्चों को पार्क का चक्कर लगवाता है तो पच्चीस बच्चों को चक्कर लगवाने के लिए हाथी को कितने चक्कर लगाने पड़ेंगे? उत्तर में संता ने गणित की जगह दर्शन शास्त्र का सहारा लिया। लिखा- माना कि हाथी बहुत बलवान होता है, किन्तु उसके बल की भी एक सीमा है। पच्चीस बच्चों को एक ही साथ उठा पाना उसके बस की बात नहीं। अतः उसे एक से अधिक चक्कर लगाने पड़ेंगे। गुरुजी उसके इस अलग तरह के उत्तर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दो ज़बरदस्त झन्नाटेदार थप्पड़ इनाम स्वरूप उसे उसी समय नकद भेंट कर दिए। लेकिन सन्ता सिँह ऐसी घटनाओं से निराश नहीं होता था, क्योंकि महान लोग न तो रास्ते के प्रलोभनों से विचलित होते हैं और न ही कठिनाइयों से।

महानता का कोई भी नुस्खा उसे कहीं से भी मिलता तो वह उसे अपनाए बिना नहीं रहता था। महानता के बहुत सारे नुस्खों में से एक है-नववर्ष संकल्प। अतः इस स्वर्णिम नियम का पालन भी सन्ता सिँह पूरी निष्ठा से करता था। हर नववर्ष की पूर्वसंध्या पर वह एक संकल्प-पत्र बनाता और अपने कमरे में दीवार पर चिपकाता। रातभर में ही संकल्प-पत्र के पीछे की गोंद सूख जाती और नववर्ष की पहली सुबह वह ज़मीन पर गिर पड़ता और झाड़ू पर सवार होकर कचरे के साथ घर से निकल पड़ता-कभी वापस न आने के लिए। कई सालों तक मैं संता सिँह के नववर्ष संकल्पों के विषय में सुनता रहा किन्तु उनके दर्शन का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। एक जिज्ञासा मन में बनी ही रही। एक वर्ष मैं इसी जिज्ञासा के वशीभूत होकर नववर्ष की पूर्वसंध्या पर ही उसके घर जा धमका। संकल्प-पत्र तैयार हो चुका था, उसके पीछे गोंद लगाई जा रही थी। मैंने संता को हैलो कहा और उसके पास बैठ गया। पाँच मिनट की कड़ी मेहनत के बाद जब संकल्प-पत्र दीवार की शोभा बन गया, तब मेरी हैलो का जवाब आया। मैं कुछ पूछता इससे पहले ही वह बोल उठा, नए साल के लिए कुछ संकल्प लिए हैं। देखो तो।

मैंने ध्यान से देखा, कुछ लिखा तो था, लेकिन क्या? यह पढ़ने में मैं असमर्थ था। बहुत पुरानी जिज्ञासा थी, इसलिए बहुत मेहनत करके मैंने उन संकल्पों को पढ़ा। पढ़ने से जिज्ञासा शांत नहीं हुई, उल्टी और भड़क उठी। जैसे प्यासे को बर्फ़ीला ठंडा पानी पिलाने से उसकी प्यास भड़क उठती है। कुल छः संकल्प थे।

१. कोई संकल्प नहीं लूँगा, यदि ले लिया तो उसका पालन नहीं करूँगा, यदि पालन कर लिया तो पछताऊँगा नहीं।

२. सुबह जल्दी उठना शुरु करूँगा।

३. रिश्वत नहीं लूँगा।

४. दिल लगाकर पढ़ूँगा।

५. सड़क पर केला नहीं खाऊँगा।

६. रात को माईकल जैक्सन का गाना नहीं गाऊँगा।

मैंने उन संकल्पों को दो-तीन बार पढ़ा। कुछ तो समझ में आए, लेकिन बाकी मेरी बुद्धि से ऊपर की बातें थीं। प्रश्नवाचक चिह्न जैसी शक्ल बना कर मैंने संता की तरफ़ देखा। वह इतराकर बोला, मेरे संकल्प ज़रा हट के हैं। देखो- पहला संकल्प तो यही है कि इस साल कोई संकल्प नहीं लूँगा। यदि ले लिया तो उसका पालन नहीं करूँगा। यदि पालन कर लिया तो पछताऊँगा नहीं।

यानी?

यानी कुछ भी हो जाए, पछताना नहीं है।

और संकल्प न लेने वाली बात?

देखो मैंने पहले ही बता दिया कि ज़रा हट के है। इस संकल्प की मुख्य बात तो न पछताने में है, बाकी तो उसकी भूमिका है। कोई भी महान बात बिना भूमिका के जमती नहीं है। तुमने बड़े लेखकों की किताबें नहीं देखीं? सौ पन्ने की किताब में तीस पन्ने तो भूमिका के ही होते हैं। जितनी बड़ी भूमिका, समझो उतनी ही महान किताब है।

मैंने अभिनय किया कि मुझे सब समझ में आ गया है। तब उसने आगे शुरू किया। दूसरा संकल्प तो बहुत सरल है कि इस साल मैं सुबह जल्दी उठना शुरु करूँगा।

कितने बजे?

सात पच्चीस पर।

सात तीस पर तो स्कूल लगता है। और तुम सात पच्चीस को जल्दी कह रहे हो?

सात तीस से तो जल्दी है न। अभी तो मैं सात तीस पर ही उठता हूँ।

लेकिन पाँच मिनट पहले उठने से क्या. . .?

ए जर्नी ऑफ़ थाउजैंड माइल्स बिगिन्स विद अ सिंगल स्टेप। उसने बड़े विश्वास से कहा।

लेकिन इतने छोटे स्टेप में चलोगे तो सूर्योदय से पहले उठने में पच्चीस साल लगेंगे।.. वैसे एक बात बताओ। पिछले साल सात पैंतीस पर उठते थे क्या?

सात पच्चीस पर। संकल्प लिया था कि सात बीस पर उठा करूँगा और उठने लगा सात तीस पर। सभी संकल्प पूरे तो नहीं हो पाते न। इसीलिए मैंने इस बार एक ऐसा संकल्प भी लिया है, जिसे पूरा होने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।

कौन सा?

रिश्वत न लेने का। इस साल मैं रिश्वत नहीं लूँगा।

लेकिन हम स्टूडेंट्स को रिश्वत देगा कौन?

इसीलिए तो इस संकल्प के टूटने की कोई संभावना नहीं है।

वो तो ठीक है, लेकिन यदि बाद में सरकारी ऑफ़िसर बन गए तो?

ये संकल्प इसी साल के लिए हैं, सारी उम्र के लिए नहीं।

बाक़ी तो ठीक है, लेकिन तुम्हारे इस चौथे संकल्प की तुम्हें सचमुच ज़रूरत है। दिल लगाकर पढ़ना तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी है। विशेषतः गणित और विज्ञान में।

गणित और विज्ञान? इन्हें कौन पढ़ेगा?

तो क्या पढ़ोगे?

जो वह लिखेगी।

कौन लिखेगी?

जिससे दिल लगाऊँगा। और कौन?

ओह ठीक.. ठीक। वैसे वो लिखेगी क्या? किसी लेखिका से दिल लगा रहे हो क्या?

लेखिका तो नहीं है। लेकिन प्यार में प्रेम पत्र तो लिखेगी ही न।

प्रेम पत्र तुम नहीं लिखोगे?

लिख सकता हूँ, लेकिन लिखने का कोई लाभ नहीं।

क्यों?

अपनी लिखाई को मैं ख़ुद बड़ी मुश्क़िल से समझ पाता हूँ। वो क्या समझेगी?.. पिछले साल मैंने एक लड़की को प्रेम-पत्र लिख कर दिया था। उसने पढ़ने की कोशिश की, सहेलियों की सहायता भी ली, लेकिन सब व्यर्थ। किसी ने सलाह दी कि कैमिस्ट हर तरह की लिखाई पढ़ सकते हैं। वह पत्र लेकर एक कैमिस्ट के पास गई। कैमिस्ट ने साढ़े तीन सौ रुपए की दवाएँ हाथ में पकड़ा दीं। बड़ी मुश्क़िल से उसने कैमिस्ट को समझाया कि यह पत्र है, डॉक्टर की पर्ची नहीं। अंत में वह पत्र लेकर मेरे ही पास आई और बोली कि भैया तुम्ही बताओ कि इस काग़ज़ पर आख़िर तुमने लिखा क्या था? मुझे उस पर बहुत दया आई। मैंने ख़ुद उसे पढ़ने का बहुत प्रयास किया, लेकिन पढ़ नहीं पाया। बहुत फ़ज़ीहत हुई। उसके बाद मैंने लव-लैटर लिखने का आइडिया छोड़ ही दिया। पढ़ने तक ही ठीक है।

ठीक.. लेकिन यार तुम्हारा यह पाँचवाँ और छठा संकल्प कुछ अजीब हैं। सड़क पर केला नहीं खाऊँगा। रात को माईकल जैक्सन का गाना नहीं गाऊँगा। ये केला नहीं खाने का संकल्प किसलिए?

यह संकल्प सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया है मैंने।

सुरक्षा.. कैसे? केला खाने का सुरक्षा से क्या संबंध?

ऐसा है कि पहले जब मैं छोटा था, तो सड़क पर चलते हुए केला खाता था और छिलका आगे की ओर फैंक देता था, उसी छिलके से फिसलकर मैं गिर पड़ता था। पिछले साल मैंने संकल्प लिया कि छिलका आगे नहीं पीछे फैंकूँगा। तब से सत्रह बार पिट चुका हूँ। केला खाकर छिलका पीछे फैंकता हूँ। पीछे आने वाला आदमी फिसल के गिरता है और उठकर मुझे पीटने लगता है। इसलिए इस बार इस समस्या का समूल नाश करने के लिए यह संकल्प लिया है।

यह बात तो समझ में आ गई, लेकिन यह माईकल जैक्सन के गाने वाला संकल्प भी मेरी समझ से बाहर है। तुम्हें तो गाने का बहुत शौक था और माईकल जैक्सन ही तो तुम्हारा प्रिय गायक है। उसी के गीत न गाने की प्रतिज्ञा क्यों? इस शंका का भी समाधान करो।

यह संकल्प मैंने किसी और के संकल्प-पत्र से प्रभावित होकर लिया है।

मैंने सोचा ज़रूर किसी और महान व्यक्ति के प्रभाव में यह संकल्प लिया गया होगा। जिज्ञासावश पूछा, किसके?

मेरे पड़ोस में एक पहलवान रहता है-रामू पहलवान हड्डी विशेषज्ञ। जवानी में दूसरों की हड्डियाँ तोड़ने के लिए प्रसिद्ध था। आजकल हड्डियाँ जोड़ने का काम करता है। उसने अपने इस बार के संकल्प-पत्र में लिखा है कि जब भी मैं रात को माईकल जैक्सन का गाना गाऊँगा, उस रात वो मेरी एक हड्डी ज़रूर तोड़ा करेगा। बस उसी भीष्म-प्रतिज्ञा से प्रभावित होकर मैंने यह संकल्प लिया कि कुछ भी हो जाए, रात को माईक्ल जैक्सन का गाना नहीं गाऊँगा।

लेकिन उसने ऐसी प्रतिज्ञा क्यों की? तुमने पूछा नहीं उससे?

पूछा था। कहने लगा- बेटा, जब तुम माईकल जैक्सन का गाना गाते हो, तो शहर के कुत्तों को यह भ्रम हो जाता है कि यमदूत किसी के प्राण ले रहे हैं और मरने वाला बेचारा दर्द से कराह रहा है। इसीलिए वे सभी मिलकर हमारी गली में सहानुभूति स्वरूप रोते हैं। इससे मेरी नींद में ख़लल होता है और मेरा कुश्ती करने का मन होने लगता है। इसलिए यदि भविष्य में तुम माईकल जैक्सन का गाना गाकर अपना शौक पूरा करोगे तो मैं भी अपना कुश्ती करने का शौक पूरा कर लिया करूँगा।

थोड़ी देर चुप रहने के बाद संता बोला, तुम ही कहो ऐसी परिस्थियों में मेरा यह संकल्प युक्तिसंगत नहीं है क्या?

मैंने सहमती में सिर हिलाया। वास्तव में मैं उसके इस संकल्प की युक्ति से पूरी तरह सहमत था और आश्वस्त भी था कि यह संकल्प अवश्य ही पूरा होने वाला है। आज भी जब नववर्ष की पूर्वसंध्या पर कोई संकल्प लेता है तो मुझे संता सिँह 'हट के' का संकल्प-पत्र बहुत याद आता है।

रवि कांत अनमोल

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(प्रविष्टि क्रमांक - 50)

इस बार मैं फिर कटघरे में हूं , मालिक नाराज है । हमेशा की तरह वादी भी वही है और न्यायधीश भी वही । उसका कहना है कि तुम गंदगी ज्यादा फैलाते हो , प्रदूषण करते हो। तुम इसका जुर्माना भरो । मैंने कहा-“ माई-बाप मैं ठहरा गरीब आदमी ,दिन को मिल जाय तो रात का भरोसा नहीं । मैं भला क्या कचरा फैलाऊंगा । ” सेठ नहीं माना, कहने लगा –“ बकवास बंद करो । सिगड़ी नहीं कुकिंग गैस का इस्तेमाल करो । कब तक पिछड़े बने रहोगे ...पीजा- बर्गर से ही काम नही चलेगा । तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है । ” मैंने कहा –“ साहब आपने तो पूरी धरती गर्मा रखी है मिसाइलें और बम दाग-दाग कर । आप तो आग लगा कर चैन से सो जाते हो और हम बरसों तक आपके खिलवाड़ का दंश भोगते रहते हैं । आपकी ऐय्याशी की लातें हम कब तक अपने पेट पर खाते रहें । ” सेठ का गुस्सा सातवें आसमान पर था । वो मुट्ठी भींचते हुए बोला – “हमने जो कुछ भी किया विश्व शांति के लिए किया ,उसमें हमारा कोई स्वार्थ नहीं था । हमारे मानवतावादी नजरिए की पुष्टि नोबेल प्राइज ने कर दी है । ” मैं भी बहसियाने के मूड में था । इसलिए तर्कों का असलाह ले पिल पड़ा-“ सही फरमा रहे हैं आप पड़ोसी पर आक्रमण मानवता की भलाई के लिए ही तो था । एड्स, बर्ड फ्लू ,एंथ्रेक्स, स्वाइन फ्लू सब आपकी कृपा का ही परिणाम है ।आपका मानवतावादी चेहरा तो आज तक हिरोशिमा और वियतनाम में झांक रहा है । वाह रे मानवता रक्षक क्या कहने आपके । ”

तब तक उस सेठ के दो-चार धनाढ्य साथी भी वहां आ चुके थे । उनमें खुसुर-पुसुर होने लगी । एक बोला –“इन ससुरों पर पाबंदी लगाओ ...देखो कितना शोर और गंदगी है इनकी बस्तियों में । ” दूसरा हस्तक्षेप करते हुए बोला – “आबादी तो देखो भुक्खड़ों की । चालीस प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं तब ये हाल है इनका । ” उनकी चर्चा चल रही थी कि एक गांधीवादी वहां आ टपके । बोले मैं बताऊं – “बापू ने हिन्द स्वराज्य में कहा है कि हाथ-पैरों से काम करो और तंदुरुस्त रहो । हमारे यहां तो वैसे ही इतनी मानव क्षमता है । ये कल कारखाने, सीमेंट के जंगल ही जलवायु को अधिक खतरा पैदा कर रहे हैं सेठ जी ...तुम्हारे शहर में ही सबसे ज्यादा कोयले से चलने वाले बिजलीघर हैं । ” गांधी भक्त की बात सुनकर तीसरा सेठ नाराज हो गया ।

क्रोधित होते हुए बोला –“ क्या सठिया गए हो तुम लोग...गया बापू का जमाना । किस पर फालतू टाइम रखा है आजकल । ” गांधी भक्त कहां मानने वाला था । उसने सत्याग्रह वाला पाठ अच्छी तरह पढ़ा , ओढ़ा, बिछाया था । वो सत्याग्रह फैला कर बैठ गया कहने लगा –“बापू इंद्रिय संयम पर जोर देते थे , शाकाहारी थे ।

...तुम सब ये भोगवाद का दुष्परिणाम भोग रहे हो । तुम्हारे बूचड़खाने ही अधिक कालापन फैला रहे हैं । उनका कचरा आसानी से रिसाइकल भी नही हो सकता है। ” गांधीवादी को देखकर मेरा उत्साह भी बढ़ गया । हम दोनों एक और एक ग्यारह हो गए।

मैंने कहा-“ तुम पैसेवालों का यही शगल है पहले समस्या खड़ी करो फिर उसमें पूरी दुनिया को शामिल करो । तुम्हारी आग है तुम बुझाओ , हमारी आहूति क्यों भला ?” मेरा सेठ बोल उठा –“ देखो , ये कृतज्ञता ज्ञापन का मामला है भाई । तुमने मेरा नमक ही नही गेहूं , दवाएं, पैसा तक खाया है तो अब बारुद , धुआं भी खाओ । उसे रोकने में भी हाथ बटाओ । हम-तुम तो मौसरे भाई ठहरे आखिर । ” भाई संबोधन सुन कर मेरी आत्मा पसीज उठी । मेरा मन उन्हें चूमने को हुआ । उनके व्हाइट हाउस की चौखट पर दंडवत करने की तीव्र इच्छा हुयी । मैंने लगभग रिरियाते हुए कहा –“ साहब, इसके लिए मुझे क्या करना होगा ?”

वे खुश होते हुए बोले –“ वेल ,नथिंग बस थोड़ा सा कार्बन... आई मीन थोड़ा सा कालापन कम करना होगा । ” मैं सकपकाया –“सेठ जी ये कैसे संभव है । हमारे यहां तो तरह-तरह का कालापन पसरा है । काले कारनामों का हमारा तो अत्यन्त समृद्ध इतिहास रहा है । न्याय से ले कर सत्ता तक के नियंताओं के हाथों में कालिख लगी हुयी है । कुछ एक तो न जाने कितनी बार कालामुँह करते हुए रंग हाथ पकड़े भी गए हैं । हम भला कालापन कैसे मिटा पाएंगे ...तरह-तरह की कालिमा है हमारे माथे पर सिक्ख नरसंहार से ले कर गुजरात दंगों तक की । नहीं ,नहीं सर हमसे ये सब न होगा ...देखिए, देखिए न जातिवाद , प्रांतवाद ,संप्रदायवाद का कालापन इधर ही तो बढ़ता आ रहा है । लगता है पूरा देश ढक गया है उसमें । ”

सेठ जी बोले-“ हम कुछ नहीं जानते तुम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । ये गंगा ,यमुना किसने प्रदूषित की हैं । हिमालय पर विकिरण फैलाने का जिम्मेदार कौन है? बंधु ये कोयले की दलाली है इसमें कितना भी बच कर जाओ कहीं-न-कहीं तो कालिख लगेगी ही । ” मैं क्या करता भला । पैर पटकते हुए और हाथ रगड़ते-रगड़ते वापिस लौट आया ।

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अतुल चतुर्वेदी

380 , शास्त्री नगर , दादाबाड़ी

कोटा राज .

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(प्रविष्टि क्रमांक - 49)

हमारा देश आयोग प्रधान देश है । कई आयोगों की रिपोर्टें पड़ी धूल खा रही हैं । यदि उन सब रिपोर्टों को इकट्ठा किया जाए तो लाल किले के प्राचीर तक की ऊंचाई हो जाएगी फिर वहां से एक और आयोग के गठन की घोषणा की जा सकती है । अमूमन देखा गया है कि अपने यहाँ आनन-फानन में आयोग गठित करने का फैशन है । भले ही उसके सुझाव कोने में पड़े दम तोड़ते रहे हों । आयोगों का कार्यकाल भी द्रौपदी के चीर सा लगातार बढ़ता रहता है । लोगों का बमुश्किल याद दिलाना पड़ता है कि ये फलां मामले में गठित आयोग था । आयोगों को सुझाव भी गोलमाल से होते हैं । उनकी व्याख्या स्वार्थानुसार होती है । उसमें नाम जुड़ते-घटते रहने पर शोर होता रहता है । कुछ लोग आयोग कि विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहते हैं ,कुछ उसके कार्य क्षेत्र को बढ़ाने की मांग करते रहते हैं । कुल मिलाकर आयोग एक चूं-चूं का मुरब्बा बन जाता है। इस मुरब्बे के सेवन से सरकार के कृपापात्र नौकरशाह स्वास्थ्य लाभ उठाते रहते हैं । जहां तक जनता का संबंध है उसे सिर्फ एक आयोग का पता है और वो है वेतन आयोग।वेतन आयोग की सिफारिशें जनता पर व्यापक असर डालती हैं ।

उसकी रिपोर्ट का इंतजार कर्मचारियों को ऐसे रहता है जैसे कोई नई नवेली दुल्हन अपने प्रियतम की बाट जो रही हो । वेतन आयोग की रपट से महंगाई , लोन की मात्रा , जीवन स्तर एक साथ बढ़ जाता है । व्यक्ति जीवन में ज्यादा आर्थिक रिस्क उठाने लगता है । उसका ये झूठा अहसास काफी दिनों तक बना रहता है कि वो प्रगति कर रहा है । यूं ही जीवन होम नहीं कर रहा । सिर्फ बाजार ही है जो इस भ्रम को तोड़ता है और याद दिलाता है कि- चल खुसरो घर आपने , रैन भई चहुं देस...। मेरा सरकार से विनम्र सुझाव है कि जब इतने सारे फालतू आयोग बनते ही रहते हैं तो कुछ काम के क्षेत्रों पर भी आयोग गठित हो जाएं । सबसे पहले तो साहित्य को ही लें , इस पर एक आयोग की तुरंत आवश्यकता है । आयोग इस बात पर विचार करे कि साहित्य के क्षेत्र में इतनी राजनीति क्यों फैली हुयी है ।

साहित्य वालों में जितनी द्वेषता है उतनी तो राजनीति वालों में भी नहीं । पुरुस्कारों का बंदरबांट कब तक जारी रहेगा । तीन-चार आलोचकों के चलते हिन्दी साहित्य की उन्नति कैसे हो सकेगी ? क्यों इस फील्ड में नयी प्रतिभाएं सामने नही आ रही हैं । जब किताबें थोक में रोज प्रकाशित हो रही हैं तो पाठक कहां बिला गया है । प्रकाशकों की तोंद क्यों लगातार निकलती जा रही है और लेखक क्यों सूख के छुआरा हो रहा है । लघु पत्रिकाएं कहीं अपने साथियों की लघु भड़ास निकालने का साझा मंच तो

नहीं बन गयी हैं । वैसे आयोग इस विषय पर भी जाँच कर सकता है कि कविता क्यों सिकुड़ती जा रही है और व्यंग्य क्यों पसरता जा रहा है । अखबार विचार की जगह प्रचार के पम्फलेट क्यों बनते जा रहे हैं । इस आयोग का अध्यक्ष सरकार अपने किसी चहेते संपादक या आलोचक को बना सकती है । साहित्य आयोग को समकालीन विदेशी साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन भी करना चाहिए । क्योंकि इस बहाने ही मेरे जैसे साहित्यकारों का विदेश यात्रा का जुगाड़ बैठ पाएगा । वैसे कोई जबरदस्ती नही है लेकिन अगर एक टिकट का बैठ जाए तो देख लें ...। मेरा मतलब है ठीक लगे तो ...। इसी तरह खेल के क्षेत्र में एक आयोग की सख्त जरुरत है । वहां बड़ी फ्री स्टाइल चल रही है। खेलों में हमारा फिसड्डीपन जग जाहिर है ।

इस फिसड्डीपन का कारण क्या है ? राजनीति या साधनों की कमी। व्याप्त भ्रष्टाचार या प्रतिभाओं का अकाल । हमें नए खेलों की ओर भी ध्यान देना चाहिए जिनमें हमारी गति अच्छी है । जैसे –कुर्सी पकड़ , घोटाला घोटन ,पुतला फूंकन आदि । इन नव खेलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के प्रयास किए जाएं । ये भी देखा जाए कि खिलाड़ियों को क्या भत्ता और सुविधाएं मिल रही हैं । क्या उनका खेल में कैरियर बनाना बेहतर रहेगा या किसी हलवाई के मजदूरी करना । भ्रष्टाचार हमारे यहां कि लोकप्रिय समस्या है इस पर आयोग का गठन खतरे से खाली नही है । क्योंकि इस आयोग के भ्रूणावस्था में ही भ्रष्टाचार के वायरस के चलते काल कवलित होने की पूरी संभावना है । इस आयोग का नाम किसी कर्मठ, ईमानदार महापुऱुष के नाम पर सत्य हरिश्चन्द्र आयोग या चाणक्य आयोग रखा जा सकता है । इस आयोग का दायरा विस्तृत रखना होगा । क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे यहां कण-कण में व्याप्त है । ऐसे में किसे परखा जाए और किसे छोड़ा जाए ये निर्णय करना अत्यन्त कठिन है ।

भ्रष्टाचार के पनपने की आदर्श स्थितियां क्या हैं –मजबूरी , शौक , आदत या स्टेटस सिंबल । कौन-कौन चेहरे भ्रष्ट हैं । कितना धन भ्रष्टाचार के चलते आम लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा है , इन सब बातों से आयोग स्वयं को दूर रखे तो ही वो चलता रहेगा । अन्यथा किसी बीमार इकाई की तरह बंद हो जाएगा ।इन विषयों पर वो अपनी रपट ही न प्रकाशित करे वरना जो कुछ भी सच सामने आएगा उससे हमारे सिर शर्म से झुक जाएंगे ।

क्या है कि हम भ्रष्ट हैं ये तो हम क्या पूरी दुनिया मानती है लेकिन कोई हमें आईना दिखाए ये हमें कबूल नहीं। इससे हमारा सौंदर्य बोध आहत होता है । आयोग बने अपना काम करे कोई गुरेज नहीं ।लेकिन वो भ्रष्टाचार के कारणों पर विमर्श करता रहे भ्रष्टाचारियों पर उंगली न धरे । अन्यथा आप जानते ही हैं कि भ्रष्टाचार के हाथ तो कानून के हाथ से लंबे ही हैं छोटे तो कत्तई नहीं ।

अतुल चतुर्वेदी

380 , शास्त्री नगर , दादाबाड़ी

कोटा राज .

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(प्रविष्टि क्रमांक - 48)

विष्णुलोक में भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ बैठे विश्राम कर रहे थे कि तभी नारायण-नारायण की आवाज सुनाई देती है जिसे सुनकर भगवान विष्णु हर्षित हो पूछते हैं - कहो नारद इतने दिनों बाद इधर का रास्ता कैसे भूल गये ? न कोई चिट्ठी, न पत्री, न कोई फोन, कहो कैसे हो? आजकल मृत्युलोक के क्या समाचार हैं ? नारदजी ने वीणा के तार छेड़ते हुए कहा - नारायण-नारायण ! ये कैसे हो सकता है प्रभु, मैं आपको कैसे भूल सकता हूं ? वो तो मैं ट्रैफिक में फंस गया था प्रभु । आजकल उपर आने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ता है । क्षमा करें प्रभु ! और चिट्ठी-पत्री का तो अब जमाना ही नहीं रहा आजकल तो डाकघरों में ताला लटकने वाला है । अब तो फोन, ईमेल और एसएमएस का जमाना आ गया है । आपका फोन भी मैंने कितनी बार किया हमेशा इंगेज ही आता है, मुझे क्षमा करें प्रभु !

आजकल तो मृत्युलोक की काया ही पलट गई है प्रभु ! आजकल वहां समानता की शहनाई बजने लगी है । गरीब क्या अमीर भी आजकल दाल रोटी खाकर फर्क महसूस करते हैं । लोगों को पानी तक खरीदकर पीना पड़ता है । सरकार भी इसके लिए नये-नये कानून बना रही है ।

तब तो लगता है नारद ! जल्दी ही सारी धरती स्वर्ग जैसी सुंदर बन जाएगी, जहां कोई भेदभाव नहीं होगा ।

तभी नारद बीच में ही चिल्लाते हुए बोले - बन जाएगी क्या, बन गई है प्रभु ! आप एक बार मृत्युलोक की सैर तो कर लीजिए । ऐसे भी आपने बहुत दिनों से भ्रमण नहीं किया है ।

यह सुनकर प्रभु ने कहा - नारद तुम्हारी इस बात पर हम विचार करेंगे । पहले तुम तनिक विश्राम तो कर लो । नारायण-2 प्रभु ! मेरे पास तो सांस लेने की भी फुरसत नहीं है । अभी मुझे धर्मराज महोदय के पास भी जाना है । मैं तो बस आपके दर्शन के लिए आ गया था । आज्ञा दीजिए प्रभु ! नारायण-2 कहते हुए नारद मुनि यमलोक के लिए चल पड़े ।

नारदजी जब यमराज के पास पहुंचे तो वे बहुत व्यस्त नजर आये । उन्हें देखकर नारदजी ने कहा - हे मृत्यु के देवता ! आप इतनी जल्दी-2 लोगों को क्यों अपने दरबार में आमंत्रित करते हैं । इससे आपको तो ओवरटाइम करना ही पड़ता है और उधर स्वर्ग आने जाने का मार्ग भी बाधित हो जाता है ।

मैं क्या करूं नारद इन्हें मैंने नहीं बुलवाया । ये तो बिन बुलाये मेहमान हैं जो जब इच्छा हो चले आते हैं । तुम्हें तो ज्ञात ही होगा आज पृथ्वी की क्या दशा हो गई है । मनुष्य जल्दी-जल्दी के चक्कर में दिन क्या रात क्या लगातार काम काम के पीछे भाग रहा है । हमने व्यवस्था की थी कि मनुष्य दिन में काम करे और रात में आराम करे । पर मनुष्य तो इतनी जल्दी में हैं कि प्रकृति से अभद्र खिलवाड़ कर रहा है । आये दिन लोग पेड़ों को काटते जा रहे हैं, खेतों को उजाड़कर इमारतें और कारखाने बनाये जा रहे हैं । गाड़ियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । जिससे वातावरण में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है । क्या बच्चे क्या बड़े सभी व्यसन में लिप्त होकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं । प्रकृति मनुष्य से इतना खिलाफ होती जा रही है कि बाढ़, सूखा आदि प्राकृतिक संकटों का खतरा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है । इस जल्दी के कारण आज मनुष्य समय से पहले ही मृत्यु के ग्रास में समाता जा रहा है ।

इधर नारदजी के जाने के बाद लक्ष्मीजी ने कौतूहलवश प्रभु से मृत्युलोक जाने की इच्छा प्रकट की । प्रभु लक्ष्मीजी के आग्रह को टाल न सके और लक्ष्मीजी के साथ गरूड़ पर सवार हो पृथ्वीलोक के भ्रमण के लिए निकल पड़े ।

पृथ्वी पर पहुंचते ही सभी उन्हें यूं आश्चर्य से देखने लगे जैसे किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हो । और उसमें से एक व्यक्ति ने तो हद ही कर दी वह आटोग्राफ लेने लक्ष्मीजी के पास जा पहुंचा । यह देखकर गरूड़जी ने कहा - यह क्या फिल्म की शूटिंग चल रही है । अरे ये तो साक्षात् भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी हैं जो विष्णुलोक से यहां आये हैं । इनके चेहरे पर तुम्हें दिव्य आभा नहीं दिखाई दे रही । इतना सुनना था कि सभी लोग लक्ष्मीजी की ओर आशीर्वाद लेने लपके । मां ने कहा - अरे सभी मेरे पास ही क्यों आ रहे हो ऐसे में तो गिर जाओगे । आशीर्वाद ही लेना हैं तो प्रभु से ले लो । तभी लोगों की आवाज आयी मां हमें तो तुम्हारा ही आशीर्वाद चाहिए । तुम आशीर्वाद दोगी तो घर में धन की वर्षा होगी । विष्णु भगवान आशीर्वाद में क्या देंगे बस मोक्ष ही न । हम लेकर क्या करेंगे । प्रभु ने लोगों की मनःस्थिति देखकर वहां से पलायन करना ही उचित समझा और तीनों अदृष्य हो गये । आज तो बाल बाल बचे प्रभु वर्ना पता नहीं क्या होता । लगता है आजकल तो पृथ्वी पर केवल धन की ही पूजा होती है । गरूड़जी ने कहा । अरे अभी देखा ही क्या है अभी तो सारी पृथ्वी बाकी है । चलो घूमकर आयें लेकिन इस बार अपना-अपना वेष बदल लो, ताकि हमें कोई पहचान न पाये । जो आज्ञा प्रभु !

अब वे लोग अपना रूप बदलकर पुनः पृथ्वीलोक का भ्रमण करने निकले । बड़ी - बड़ी पुलें, इमारतें, गाड़ियां देखते हुए वे एक जगह से दूसरे जगह घूम रहे थे तभी सामने एक अतिसुंदर इमारत देखा, जिसमें बहुत से लोग आ जा रहे थे । लोगों को जाते देखकर वे तीनों भी इमारत में प्रवेश कर गये । अंदर जाकर देखने पर पता चला ये तो कोई कार्यालय है । लेकिन यह क्या यहां तो सभी अधूरे व्यक्ति ही नजर आ रहे हैं गरूड़ । ब्रह्माजी ने तो अपनी सृष्टि में इतनी अधूरी रचनायें कभी नहीं बनाई हैं । फिर ये सब क्या है ? आपको नहीं पता प्रभु ! यहां सरकार ने विशेषतः असाधारण लोग जैसे महिलाएं, विक्लांग, पिछड़ी जाति आदि के लिए ही नौकरी मुहैया करायी है । अतः नौकरी लेने के लिए लोग जान बूझकर अपने आपको असाधारण कर लेते हैं ।

हे गरूड़ तब तो हमें ब्रह्मदेव को यह खुशखबरी देनी चाहिए कि वे मानवों को संपूर्णता प्रदान करने में व्यर्थ अपना समय नष्ट न करें, प्रभु ने कहा ।

तभी गरूड़जी ने कहा - प्रभु चलिए आगे चलें । आगे बढ़ने पर उन्हें एक ओर आलीशान और सजे हुए बंगले और बिल्डिंगें दिखाई दीं तो दूसरी ओर छोटी - छोटी झोपड़ियों से गरीबी झांकती नजर आयी, यह देखकर लक्ष्मीजी की आंखें भर आयीं । उन्होंने छलछलायी आंखों से प्रभु से कहा - कहीं लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती, तन ढ़कने को कपड़ा नहीं मिल पाता और जिनके पास सभी साधन उपलब्ध हैं वे विकासशीलता के नाम पर पैसों का दुरुपयोग करते हैं, ये कैसी विडम्बना है प्रभु ! परमाणु बम, मिसाइल आदि का निर्माण कर वे लोगों की जिंदगी छीन सकते हैं उन्हें जिन्दगी दे तो नहीं सकते, फिर ये विकास कैसा । क्या विकास की यही परिभाषा है ? यह सुनकर प्रभु ने कहा - नहीं देवी ! विकास तो वह है जिससे प्रकृति को और उसमें रहने वाले प्राणियों को लाभ और केवल लाभ पहुंचे । लेकिन आज मनुष्य की प्रवृत्ति एक पशु से भी निकृष्ट हो गई है । वह केवल अपने फायदे के लिये सोचता है वह कोई भी चीज मेहनत से नहीं बल्कि छीनकर हासिल करना चाहता है । ऊंचाई पर पहुंचने के वह मेहनत नहीं करना चाहता अपितु दूसरों को गिराकर खुद बड़ा बनना चाहता है । और इसी लालच के कारण आज मानव निर्माण से ज्यादा विध्वंस के लिए अपनी अकल का इस्तेमाल कर रहा है । वह यह नहीं जानता कि आज वह जो गड्ढा दूसरों को गिराने के लिए खोद रहा है, कभी वह खुद भी उसमें गिर सकता है ।

चलो अब वापस लौट चलें अपनी सबसे अनमोल कृति मानव का ऐसा विकास देखकर आज मेरा दिल भर आया । मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि यह वही धरती है जिसे ऋषि मुनियों ने अपने जप तप से पावन कर सोना बना दिया था । जहां जन्म लेने के लिये देवता क्या त्रिदेव भी सदा लालायित रहते हैं । जिसमें कभी मैंने राम, कृष्ण, बुद्ध बनकर जन्म लिया था । जहां मैंने गीता के रूप में लोगों को जीवन जीने की कला सिखायी थी, कर्तव्यपालन का अनूठा आदर्श प्रस्तुत किया था ।

क्या कर सकते हैं प्रभु ! वो सतयुग था और आज कलियुग है तब आपने बनाया था इंसान आज वो बन गये हैं हैवान, गरूड़जी ने कहा ।

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(प्रविष्टि क्रमांक - 47)

“गद्यं कवीनां निकषं वदंति” महाकवि दण्डी की यह उक्ति मुझे विचित्र लगती रही है। ऐसे समय में जबकि पद्य छंदशास्त्र के जटिल नियमों में बंधा था, छंद और कथ्य दोनों को सामने रखते हुए उसमें अलंकार भी पैदा करना कोई सरल काम तो नहीं था। गद्य तो कोई भी लिख सकता है। सीधे-सीधे वाक्यों में बात कहना क्या मुश्क़िल है? इसमें कसौटी जैसी क्या चीज़ है? और दण्डी महोदय कहते हैं कि गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। मैं तो मानने को तैयार ही नहीं था लेकिन फिर एक मित्र ने बताया कि छ्न्द में एक लय रहती है, एक संगीत उत्पन्न होता है और यह श्रोता को, पाठक को जल्दी से प्रभावित कर लेता है, लेकिन गद्य में पूरा प्रभाव साधारण वाक्यों और अपने भावों के द्वारा ही पैदा करना होता है। छ्न्द में तो अनुशासन में रहने से स्वतः संगीत पैदा हो जाता है और उसके लिए कवि को कई तरह की छूट भी होती है। गद्यकार बिना भाषा की कोई छूट लिए और बिना छ्न्द का सहारा लिए एक लय, एक संगीत पैदा करता है तभी श्रोता और पाठक को प्रभावित कर पाता है। यही कठिन कार्य है और इसी के कारण दण्डी ने गद्य को कवियों की कसौटी माना है। ख़ैर उक्ति कुछ भी रही हो, लेकिन उस ज़माने में कविता लिखना आसान काम नहीं था। साधारण व्यक्ति तो सपने में भी कविता लिखने के बारे में नहीं सोच सकता था। लघु, गुरु को समझना और यगण, रगण, सगण आदि में मगन होना हर किसी के लिए संभव न था। हिन्दी में भी आरंभिक काल में कविता के लिए छ्न्द बहुत आवश्यक था।

समय बदलाव लेकर आता है। कुछ युगपुरुष होते हैं, जो इस बदलाव का माध्यम बनते हैं। निराला जी को ऐसे ही युग पुरुष माना जाता है। उनकी यह कह कर प्रशंसा की जाती है कि उन्होंने कविता को हर प्रकार के बंधनों से आज़ाद कर दिया, जिससे कविता नए आसमानों को छू सके। किन्तु वास्तविकता यह नहीं है। असलियत तो यह है कि निराला जी ने केवल प्राचीन छ्न्दों का त्याग किया, लय और भाव के मामले में वे रुढ़िवादी ही रह गए । उनकी कविताओं में भाव भी हैं और लय भी। प्रमाण यह है कि अपनी छ्न्दमुक्त कविताओं को वे स्टेज पर लय से गाते थे और श्रोता भाव विह्वल हो जाया करते थे। निराला जी को केवल इसी बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने सबसे पहले छन्द मुक्त कविता का नाम लिया। वास्तव में कविता को छ्न्द से ही नहीं, लय और भाव से भी मुक्त बाद के कवियों ने किया। ऐसे कवियों ने कविता से छ्न्द और लय इत्यादि का पूर्ण बहिष्कार किया। दुर्भाग्यवश हम यह नहीं जानते कि यह महान कार्य सबसे पहले किस महानुभाव ने किया। संभवतः कई कवियों ने एक ही समय में यह क्रांतिकारी कार्य किया हो। जैसे बाड़े का दरवाज़ा खुलते ही कई भेड़ बकरियाँ एक साथ निकल पड़ती हैं और आप यह नहीं बता सकते कि कौन सी भेड़ या बकरी सबसे पहले बाहर आई थी। निराला जी केवल बाड़े का दरवाज़ा खोलने के अर्थों में ही क्रांतिकारी हैं । वास्तव में कविता को मुक्त करने वाले कवि और हैं और वही महान हैं।

इस सारी प्रक्रिया में कुछ लोगों नें यह भी बवाल खड़ा किया कि छ्न्द के बिना कविता और गद्य में अंतर कैसे होगा? लेकिन यह केवल क्रांति को रोकने का एक बहाना भर था। जानकार लोग जानते हैं कि पहचान बहुत सरल है। जिस रचना में वाक्य विन्यास सीधा हो, व्याकरण सम्मत हो वह गद्य है और जिस रचना में वाक्य विन्यास विचित्र हो,व्याकरण सम्मत न हो वही कविता है। यदि कहा जाए राम जाता है तो समझो गद्य पढ़ रहे हो और यदि लिखा हो जाता है राम तो समझो कि आप किसी महान कविता का पाठ कर रहे हो। एक और छोटा सा अंतर है- गद्य की पंक्तियों को सारे पृष्ठ पर फैला कर लिखा जाता है और कविता की पंक्तियों को यहाँ-वहाँ से तोड़ कर इस तरह से लिखा जाता है कि उनकी लंबाई समान न होने पाए और यदि किताब को आड़े रुख पकड़ा जाए तो ये पंक्तियाँ शहर की ऊँची नीची इमारतों की तरह नज़र आएँ। इस तरह कोई भी कविता की पहचान कर सकता है। अब तो कोई भी सरलता से कविता लिख सकता है। मान लीजिए आप के दोस्त ने आप को कोई चुटकला सुनाया, आप उसे विचित्र वाक्य-विन्यास में लिखिए, पंक्तियों को यहाँ- वहाँ से तोड़ कर लिख लीजिए। बस आपकी कविता तैयार है। आप बाज़ार गए, किसी स्कूटर वाले ने आपकी साइकिल ठोक दी। इस घटना का वर्णन अजीबो-गरीब तरीके से टूटे-फूटे वाक्यों में करके उन्हें असमान लम्बाई वाले हिस्सों में तोड़कर लिख लीजिए। एक महान कविता तैयार है।

कविता को छ्न्द के बंधन से मुक्त हुए लगभग ८० बरस हो गए। इसी बीच एक और बड़ी क्रांति हो चुकी है। कुछ और ज़्यादा महान कवियों ने कविता को अर्थ से भी मुक्त कर दिया है। छन्द और भाव से मुक्त होने के बाद भी एक बेड़ी कविता के पैरों में थी-अर्थ की। लेकिन अब इस बेड़ी को भी काट दिया गया है। अब कविता सचमुच उन्मुक्त हो कर खुले आकाश में उड़ सकती है। अब कविता लिखने के लिए आपको चुटकला सुनने या बाज़ार जाने की भी ज़रूरत नहीं है। आराम से घर में बैठिए, कुछ भी चित्र-विचित्र कल्पना कीजिए और यह भी न हो तो ऐसे ही कुछ शब्दों को किसी भी क्रम में लिखते जाइए, बस कविता तैयार है। अर्थ की चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे डॉक्टर की लिखावट को और कोई समझे न समझे, कैमिस्ट पढ़ ही लेता है। उसी तरह कवि की रचना के अर्थ को और कोई समझे न समझे, आलोचक समझ ही लेता है। आलोचक यदि कविता का अर्थ न समझ सके तो आलोचक अयोग्य है, कवि नहीं।

आज कविता सही मायनों में आज़ाद है। छ्न्द से आज़ाद, लय से आज़ाद, भाव से आज़ाद, अर्थ के बंधन से भी आज़ाद, यहीं बस नहीं श्रोता और पाठक भी कविता के मोह से आज़ाद हो गए हैं। पहले जहाँ श्रोता बिना बुलाए ही कवि सम्मेलनों में पहुँचते थे, रात भर बैठ कर कविता सुनते थे, अब बुलाने पर, चाय नाश्ते का लालच देने पर भी इस मोह-पाश में नहीं बंधते। किताबें मुफ़्त मिलने पर भी पाठक कविता नहीं पढ़ते। वे कविता के मोहजाल से मुक्त हो चुके हैं। जब से कविता मुक्त हुई है, पाठकों और श्रोताओं की संख्या चाहे कम हुई हो, कवियों की संख्या में उत्तरोत्तर बढ़ौतरी होती रही है। जहाँ शहर भर में दो-चार कवि हुआ करते थे, आज हर गली में छः-आठ कवि मिल जाते हैं। जो व्यक्ति अपने रिश्तेदारों को पत्र लिखने से कतराता है, कविता वह भी धड़ल्ले से लिखता है। एक-दो नहीं पूरी किताब भर कविताएँ लिख डालने में उसे कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन किताब की भूमिका लिखने के लिए किसी गद्य लिखने वाले को ढूंँढना पड़ता है । जब किताब छपकर आ जाती है तो उसे अपने पहचान वालों के पास भेजते समय जो पत्र लिखना पड़ता है उसे लिखने में कवि को पसीना आ जाता है। आज के प्रसंग में दण्डी की उक्ति में मुझे सच्चाई लगती है कि गद्यं कवीनां निकषं वदंति।

इति

रवि कांत अनमोल

पठानकोट, पंजाब

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(प्रविष्टि क्रमांक - 46)
सब आंखें बंद किए बैठे थे।
”आप सभी ध्यान लगाएं अपनी सांसों पर।
काउंट योर बै्रथ (सांसें गिनें अपनी)। आंखें न खोलें।“
सबकी आंखें बंद थीं। कुछ समय हो चुका था लोगों को ध्यान रमाए हुए। गुरुजी का एकालाप जारी था।
”आंखें खोलने से बड़ी हानि हो जाएगी। सांसें गिनने से आपके विचारों का क्रम टूटेगा। इससे आपको
नई ऊर्जा मिलेगी। आंखें खोलते ही सारी ऊर्जा बह जाएगी।“

सबको अपनी ऊर्जा की फ्रिक थी। किसी ने आंखें नहीं खोलीं। पर मेरे लिए यह मात्रा अनुमान का विषय था। केवल गुरुजी थे जो सबको देख सकते थे।
भक्त एक-दूसरे को नहीं देख सकते थे। उन्हें इसकी अनुमति नहीं थी। पर मेरा अनुमान है कि किसी ने आंखें नहीं खोलीं होंगी। सभी पराजय भाव से नत थे।

यह सत्ताहीनों का विमर्श था। एक ने यह घोषणा करके सत्ता प्राप्त कर ली थी कि उसे अब सत्ता की चाह नहीं रही। दूसरों ने यह सोचकर सशक्त महसूस करना सीख लिया था कि वे एक सत्ताशाली के निकट हैं। सारा खेल भावनाओं में ही चल रहा था और वहीं उसका फैसला भी हो जा रहा था।
पर मेरे लिए तनाव मुक्ति की चाह में यह परतंत्रता, यह अनुशासन अंसभव था। मेरी आंखें लगातार बंद नहीं रह पायीं।

गुरुजी के एकालाप का चरम क्षण निकट आ गया था। ”ध्यान रखिए गुरु पर आस्था का कोई विकल्प नहीं। जो मैं कहता हूं वैसा ही कीजिए। यह विधि जीवन में आपके बहुत काम आएगी। जब भी आप नियंत्रण खोने लगें, इस विधि को जीवन में उतारें। आपको नवजीवन प्राप्त हो जाएगा...।“
कुछ क्षण पश्चात उन्होंने कहा, ”अब एक-दो गहरी सांस लेकर आंखें खोल लीजिए।“
मुझे इन्हीं शब्दों की प्रतीक्षा थी। सबने आंखें खोल लीं। समझ में नहीं आया कि अब आंख खोलने से ऊर्जा क्यों नहीं बह सकती थी। पर नहीं बही। गुरुजी ने कहा है तो बह कैसे जाती।

किंतु गुरुजी संतुष्ट नहीं थे।
”मैंने देखा कि आपमें से कई भक्तों को आंखें बंद रखने में भी बड़ा कष्ट हो रहा था। ऐसे भक्त भला कितनी ऊर्जा प्राप्त कर पाए होंगे! मैं विस्मित नहीं हूं।
पर आप ही सोचिए, कई भक्तों ने तो कई बार आंखें खोल ली थीं।“
यह सुनते ही मेरी आंखों की सारी ऊर्जा बह गई। अब तक नहीं बही थी। मैं संतुष्ट था अब तक।
अब फिर सिर्फ बेचैनी बची थी। लगा वे मुझे ही कह रहे हैं, ‘तुम कृतघ्न हो।’
पर ईश्वर मेरे साथ था। कृतघ्नता की सीमा मुझ पर ही खत्म नहीं होती थी। इसी समय एक महिला का मोबाइल बज उठा। उसने फोन ऑन किया और धीमी आवाज में बोली - ”बाद में बात करना।’
गुरुजी के शिष्यों में महिलाएं ज्यादा थीं। उन्होंने अपनी चेलियों को संबोधित करते हुए कहा, ”इन्हें कहिए कल से न आएं।“

महिला ने फोन खत्म किया और इससे पहले कि चेलियां सक्रिय हो पातीं वह बीच में ही बोल पड़़ी, ”क्यों न आऊं मैं कल से! एक फोन आ ही गया तो क्या हुआ। कल से ऑफ कर दूंगी।“
गुरुजी को इस उद्दंडता की उम्मीद न थी। सारे भक्त-भक्तिनें उनकी आभा से अभिभूत थे। सब उनके पांव छूते थे। भवन में अगर सत्ता थी तो केवल उनकी।

इस महिला ने उनके आदेश को अस्वीकार कर दिया था।
चुनौती को सहज भाव से ले लेना सायास अर्जित सत्ता को रास नहीं आता। गुरुजी चेहरे की भंगिमा के विपरीत शांत स्वर में बोले, ”इससे सबके ध्यान में विघ्न पड़ता है। आप यहां जीवन की कला सीखने आए हैं। प्रेम के सागर को अनुभव करने आए हैं।“

”काहे के प्रेम का सागर...!“ महिला की बात पूरी नहीं हुई थी।
”यही तो तुम्हें यहां जानना है। प्रेम का अर्थ है अपूर्ण को चाहने की जो पूर्ण क्षमता अपने भीतर है उसे साकार करना। अभिव्यक्त...।“
उस महिला ने भी गुरुजी को बोलने का मौका दिए बिना कहा, ”आपको कैसे लगा कि मेरे अंदर प्रेम का भाव नहीं है। मैं अपूर्ण को पूर्ण रूप से प्रेम करना जानती हूं।“

गुरुजी को लगा कि महिला की बात पूरी हो गई है। मुंह खोल ही पाए थे कुछ कहने के लिए कि स्त्री
ने फिर हुंकार भरी-
”मेरी बेटी बीमार पड़ी है। अपूर्ण हुई न! उसका सुख, उसकी स्वतंत्राता, सब अधूरे हैं। फिर भी वही सब कुछ है मेरे लिए। आपकी समझ में नहीं आएगा पूर्ण-अपूर्ण का यह फेर। मुझे आता है।“
”तो आपको यह पहले बताना चाहिए था न।“

”आपने मौका कब दिया।“
”चलो अब दे दिया। कहो क्या बीमारी है तुम्हारी बेटी को।“
”मैं बता भी दूंगी तो आपको कोई फर्क पड़ेगा?
और उस नाजुक सी बच्ची की हालत में ही भला क्या फर्क आ जाएगा आपके जान लेने से? यह सब बताना यहां वेस्ट ऑफ टाइम है। मैं यहां आई थी इन तनावों के बीच खुद को जरा स्थिर करने के लिए।“
”तो उसमें तो हमने सहायता की है न!“

”जी नहीं, आपने तनाव को और बढ़ाया है।
समाधि के नियम मैं समझती हूं पर तनाव से मुक्ति के लिए भी अनुशासन चाहिए तो फिर मुक्ति कैसी! घर-दफ्तर
के अनुशासन क्या बुरे हैं।“ उसने हाथ हिला-हिला कर कहाµ ”आंख मत खोल देना, ऊर्जा बह जाएगी। किसी की तरफ देखना नहीं, ध्यान भटकेगा। फोन मत उठा लेना, औरों की समाधि में व्यवधान पड़ता है। इतने नियम तो मेरा अफसर भी मुझ पर नहीं थोपता। क्या सहायता दी आपने तनाव से मुक्ति में। मुझे और सचेत कर दिया अपने बारे में। आपने ही तो कहा था हमारी काँशसनेस ही हमारी समस्या है।“

महिला चुप हो गई।
गुरुजी भी चुप थे।
इस दौरान कुछ भक्त उठ कर बाहर जा चुके थे। अनुशासन भंग हो रहा था। उस महिला जैसे लोगों
को तनाव से मुक्ति मिल रही थी। कर्तव्यनिष्ठ चेले-चेलियां चुप थे। उनका तनाव बढ़ रहा था। बेचैन थे। उनके
लिए गुरुजी से बढ़कर कोई सत्ता नहीं थी। उन्हें उसी छोर से उम्मीद थी। पर गुरुजी तो चुपचाप बैठे थे।

एक चेली ने उस स्त्री से, जो अनाधिकार बहस करते हुए खड़ी हो गई थी, कहा -
”बैठ जाइए बहनजी। हम यहां निजी समस्याओं के बारे में भला क्या बात कर पाएंगे। बाद में बात करते हैं। आखिर हम भी तो एक परिवार जैसे ही हैं न! अभी सबको परेशान क्या करना।“

उस स्त्री ने खड़े-खड़े ही कहा,
”आप कितने दिन से यहां जीने की कला सीख रही हैं?“
”कई महीने हो गए। देखो मेरे पास तो गुरुजी का यह लॉकेट भी है।“ अनुशासन का एक और प्रतीक था यह।
विद्रोहिणी चिढ़ गई, ”तो फिर गिनो न अपनी सांसें। नवजीवन मिलेगा तुम्हें। तनाव खत्म हो जाएगा।“

यह कहकर वह महिला बाहर चली गई। जाहिर था कि वह कल से नहीं आएगी।
उसके जाते ही सबने राहत की सांस ली। बिना सांसें गिने।

यह मेरी ध्यान यात्रा का पहला दिन था।

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(प्रविष्टि क्रमांक - 45)

एक सरकारी स्कूल का दृश्य। स्कूल परिसर में दरी पर पांच गुरुजन और तीन मैडमें हैं। दो गुरुजन लेटे-लेटे बातों में मशगूल हैं। एक अख़बार पढ़ रहे हैं। एक खर्राटे ले रहे हैं। एक गुरुजी मैडमों की नज़रें बचाकर जर्दा लगा रहे हैं। तीनों मैडमें बातें कम और हँस ज्यादा रही हैं।

-घण्टा लगे आठ मिनट बीत चुके हैं। जर्दा लगाने वाले गुरुजी धीरे-धीरे कदमों से पेशाबघर की ओर बढ़ रहे हैं। एक गुरुजी पेशाबघर में पहले से ही खड़े हैं। कुछ देर बाद भीतर वाले गुरुजी बाहर आ गए।

-पेशाब करना है?

-पेशाब क्या करना है यार? फिर वे मुस्कराते हुए बोले-हम तो बस टाइम पास कर रहे हैं।

-सब टाइम पास ही तो करते हैं।

-आजकल टाइम पास भी तो नहीं होता। पेशाब भी कितनी बार करें। मैं तीसरी बार आ रहा हूं। अख़बार भी दो बार पढ़ लिया। दो बार चाय पी ली। घड़ी है कि चलने का नाम ही नहीं लेती। और जब स्कूल आना होता है तो घड़ी के मानो पंख ही लग जाते हैं। मैं तो रोज लेट हो जाता हूं।

-तुम क्या एक-दो को छोड़कर दुनिया लेट आती है। तुम मानते तो हो कि लेट आते हो। कुछ ऐसे भी हैं जो लेट भी आएं और रौब भी जमाएं। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ वाली बात यहां लागू नहीं होती। यहां तो ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ सटीक है।

-आओ...कक्षा की ओर चलते हैं। नहीं तो हैडसा’ब यूं ही ‘प्यां-प्यां’ करेंगे।

-इनकी तो आदत है ‘प्यां-प्यां’ करने की। दोनों साथ चल पड़ते हैं तभी एक बोला-क्या बात है पेशाब नहीं करोगे?

-ना रै...मैं तो यूं ही आ गया था इधर। जाना तो कक्षा में था। पर पता ही नहीं चला। यहां आने के बाद पता चला कि मैं पेशाबघर के पास हूं। चलो...आओ चलें।

-और वे बातें करते-करते पानी की टंकी के पास आ गए। दोनों ने हाथ धोए। कुल्ला किया। घण्टा लगे हुए अब पंद्रह मिनट हो गए। तभी एक लड़का उन दोनों गुरुजन के पास आया और बोला-सर, सारे बच्चे शोर कर रहे हैं जी।

-चल, मैं आ रहा हूं। एक गुरुजी बोले। लड़का कक्षा की तरफ जाने लगा। गुरुजन दबी आवाज़ में बातें करने लगे। एक बोला-बच्चों को मारना-पीटना मत। टाइम बहुत खराब है। पढ़ाई करवा कर तुहें कौनसे कलैक्टर बनाने हैं।

-तभी एक और लड़का आकर दूसरे गुरुजी से बोला-गुरुजी, हमारी कक्षा में सभी बच्चे शोर मचा रहे हैं जी।

-तो मैं क्या करूं?

-आपका पीरियड है जी।

-मेरा चुप करवाने का पीरियड नहीं है। चलो..कक्षा में चलो..मैं आ रहा हूं। बच्चा मायूस होकर कक्षा की तरफ जा रहा है।

-यार हैडसा’ब भी कम नहीं है...कोई पांच-चार मिनट कक्षा में नहीं पंहुचे तो बच्चे बुलाने आ जाते हैं।

-हां यार, हैडसा’ब सारे दिन ‘डांग’ ही रखते हैं। चलो, कक्षाओं में जाना तो पड़ेगा ही। और वे दोनों अपनी-अपनी कक्षाओं की तरफ जाने लगे। घण्टा लगे अब बीस मिनट हो चुके हैं।

-गुरुजी जैसे ही कक्षा के दरवाजे पर पहुंचे..बच्चों का शोर बंद। गुरुजी अब कक्षा में पधारे। बच्चे उनके समान में खड़े हुए। गुरुजी बोले-बैठ जाओ..और अपनी-अपनी किताबें निकालो। जिनके पास किताबें नहीं हैं, वे खड़े हो जाओ। सात बच्चे खड़े हो गए।

-क्यूं भई, किताबें क्यूं नहीं लाए? पढ़ना नहीं है क्या? जब सरकार फ्री में किताबें देती है, फिर लेकर क्यों नहीं आते? तुम इधर आओ..थोड़ प्रसाद ले लो। बिना किताब वाले सातों बच्चों की अच्छी तरह धुनाई करके गुरुजी हाथ झाड़ते हुए कक्षा से बाहर आ गए। कक्षा से जाते-जाते बोले-कल सब बच्चे किताबें लेकर आना..तभी पढ़ाऊंगा। समझे?

-‘हां जी।’ सब बच्चे एक साथ बोले।

-कोई भी लड़का शोर-शराबा नहीं करेगा। चुपचाप पढ़ाई करना। फिर एक लड़के की ओर इशारा करके बोले-तुम ऐसा करना.. शोर करने वाले बच्चे का नाम लिख लेना। और अब..गुरुजी विद्यालय परिसर में बिछी दरी की ओर बढ़ रहे थे।

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- दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़ जं., राजस्थान

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(प्रविष्टि क्रमांक - 44)
स्वर्ग-नर्क के बँटवारे की समस्या
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    महाराज कुछ चिन्ता की मुद्रा में बैठे थे। सिर हाथ के हवाले था और हाथ कोहनी के सहारे पैर पर टिका था। दूसरे हाथ से सिर को रह-रह कर सहलाने का उपक्रम भी किया जा रहा था। तभी महाराज के एकान्त और चिन्तनीय अवस्था में ऋषि कुमार ने अपनी पसंदीदा ‘नारायण, नारायण’ की रिंगटोन को गाते हुए प्रवेश किया।

    ऋषि कुमार के आगमन पर महाराज ने ज्यादा गौर नहीं फरमाया। अपने चेहरे का कोण थोड़ा सा घुमा कर ऋषि कुमार के चेहरे पर मोड़ा और पूर्ववत अपनी पुरानी मुद्रा में लौट आये। ऋषि कुमार कुछ समझ ही नहीं सके कि ये हुआ क्या? अपने माथे पर उभर आई सिलवटों को महाराज के माथे की सिलवटों से से मिलाने का प्रयास करते हुए अपने मोबाइल पर बज रहे गीत को बन्द कर परेशानी के भावों को अपने स्वर में घोल कर पूछा-‘‘क्या हुआ महाराज? किसी चिन्ता में हैं अथवा चिन्तन कर रहे हैं?
    महाराज ने अपने सिर को हाथ की पकड़ से मुक्त किया और फिर दोनों हाथों की उँगलियाँ बालों में फिरा कर बालों को बिना कंघे के सवारने का उपक्रम किया। खड़े होकर महाराज ने फिल्मी अंदाज में कमरे का चक्कर लगा कर स्वयं को खिड़की के सामने खड़ा कर दिया। ऋषि कुमार द्वारा परेशानी को पूछने के अंदाज ने महाराज को दार्शनिक बना दिया-‘‘अब काहे का चिन्तन ऋषि कुमार? चिन्तन तो इस व्यवस्था ने समाप्त ही कर दिया है। अब तो चिन्ता ही चिन्ता रह गई है।’’

    ऋषि कुमार महाराज के दर्शन को सुनकर भाव-विभोर से हो गये। आँखें नम हो गईं और आवाज भी लरजने लगी। वे समझ नहीं सके कि ऐसा क्या हो गया कि महाराज चिन्तन को छोड़ कर चिन्ता वाली बात कर रहे हैं? अपनी परेशानी को सवाल का चोला ओढ़ा कर महाराज की ओर उछाल दिया। महाराज ने तुरन्त ही उसका निदान करते हुए कहा-‘‘कुछ नहीं ऋषि कुमार, हम तो लोगों के तौर-तरीकों, नई-नई तकनीकों के कारण परेशान हैं। समझो तो हैरानी और न समझो तो परेशानी। अब बताओ कि ऐसे में चिन्तन कैसे हो?

    ऋषि कुमार समझ गये कि महाराज की चिन्ता बहुत व्यापक स्तर की नहीं है। ऋषि कुमार के ऊपर आकर बैठ चुका चिन्ता का भूत अब उतर चुका था। वे एकदम से रिलेक्स महसूस करने लगे और बेफिक्र अंदाज में महाराज के पास तक आकर थोड़ा गर्वीले अंदाज में बोले-‘‘अरे महाराज! हम जैसे टेक्नोलोजी मैन के होते आपको परेशान होना पड़े तो लानत है मुझ पर।’’ महाराज ने ऋषि कुमार के चेहरे को ताका फिर इधर-उधर ताकाझाँकी करके बापस खिड़की के बाहर देखने लगे। महाराज के बाहर देखने के अंदाज को देख ऋषि कुमार ने भी अपनी खोपड़ी खिड़की के बाहर निकाल दी।

    अच्छी खासी ऊँचाई वाली इस इमारत की सबसे ऊपर की मंजिल की विशाल खिड़की से महाराज अपने दोनो साम्राज्य-स्वर्ग और नर्क-पर निगाह डाल लेते हैं। ऋषि कुमार को लगा कि समस्या कुछ इसी  दृश्यावलोकन की है। अपनी जिज्ञासा को प्रकट किया तो महाराज ने नकारात्मक ढंग से अपनी खोपड़ी को हिला दिया।

    ‘‘कहीं स्वर्ग, नर्क के समस्त वासियों के क्रिया-कलापों के लिए लगाये गये क्लोज-सर्किट कैमरों में कोई समस्या तो नहीं आ गई?’’ ऋषि कुमार ने अपनी एक और चिन्ता को प्रकट किया। महाराज के न कहते ही ऋषि कुमार ने इत्मीनान की साँस ली। सब कुछ सही होना ऋषि कुमार की कालाबाजारी को सामने नहीं आने देता है। ‘‘फिर क्या बात है महाराज, बताइये तो? आपकी परेशानी मुझसे देखी नहीं जा रही।’’ ऋषि कुमार ने बड़े ही अपनत्व से महाराज की ओर चिन्ता को उछाल दिया।

    महाराज ऋषि कुमार की ओर घूमे और बोले-‘‘बाहर देख रहे हो कितनी भीड़ आने लगी है अब मृत्युलोक से। मनुष्य ने तकनीक का विकास जितनी तेजी से किया उतनी तेजी से मृत्यु को भी प्राप्त किया। अब दो-चार, दो-चार की संख्या में यहाँ आना नहीं होता; सैकड़ों-सैकड़ों की तादाद एक बार में आ जाती है। कभी ट्रेन एक्सीडेंट, कभी हवाई जहाज दुर्घटना, कभी बाढ़, कभी भू-स्खलन, कभी कुछ तो कभी कुछ........उफ!!! कारगुजारियाँ करे इंसान और परेशान होते फिरें हम।’’

    ऋषि कुमार हड़बड़ा गये कि महाराज के चिन्तन को हो क्या गया? इंसान की मृत्यु पर इतना मनन, गम्भीर चिन्तन? अपनी जिज्ञासा को महाराज के सामने प्रकट किया तो महाराज ने समस्या मृत्यु को नहीं बताया। महाराज के सामने समस्या थी स्वर्ग तथा नर्क के बँटवारे की। ऋषि कुमार ने अपनी पेटेंट करवाई धुन ‘नारायण, नारायण’ का उवाच किया और महाराज से कहा कि इसमें चिन्ता की क्या बात है, हमेशा ही अच्छे और बुरे कार्यों के आधार पर स्वर्ग-नर्क का निर्धारण होता रहा है; अब क्या समस्या आन पड़ी?

    महाराज ने अपने पत्ते खोल कर स्पष्ट किया कि ‘महाराजाधिराज ने युगों के अनुसार कार्यों का लेखा-जोखा तैयार कर रखा है। चूँकि भ्रष्टाचार, आतंक, झूठ, मक्कारी, हिंसा, अत्याचार, डकैती, बलात्कार, अपराध, रिश्वतखोरी, अपहरण आदि-आदि कलियुग के प्रतिमान हैं, इस दृष्टि से जो भी इनका पालन करेगा, जो भी इन कार्यों को पूर्ण करेगा वही सच्चरित्र वाला, पुण्यात्मा वाला होगा शेष सभी पापी कहलायेंगे, बुरी आत्मा वाले कहलायेंगे............’

    ‘‘.......तो महाराज, फिर चिन्ता कैसी? जो पुण्यात्मा हो उसे स्वर्ग और जो पापात्मा हो उसे नर्क में भेज दंे, सिम्पल सी बात।’’ ऋषि कुमार ने महाराज के शब्दों के बीच अपने शब्दों को घुसेड़ा। अपनी बात को कटते देख महाराज ने भृकुटि तानी और इतने पर ही ऋषि कुमार की दयनीय होती दशा देख थोड़ा नम्र स्वर में बोले-‘‘कितनी बार कहा है कि बीच में मत टोका करो, पर नहीं। यदि स्वर्ग-नर्क का निर्धारण इतना आसान होता तो समस्या ही क्या थी।’’

    ऋषि कुमार को अपनी गलती का एहसास हुआ और अबकी वे बिना बात काटे महाराज की बात सुनने को आतुर दिखे। महाराज ने उनसे बीच में न टोकने का वचन लेकर ही बात को आगे बढ़ाने के लिए मुँह खोला-‘‘समस्या यह है कि धरती से जो भी आता है वह भ्रष्टाचार, आतंक, बलात्कार, रिश्वतखोरी, मक्कारी, अत्याचार आदि गुणों में से किसी न किसी गुण से परिपूर्ण होता है। ऐसे में महाराजाधिराज के बनाये विधान के अनुसार उसे स्वर्ग में भेजा जाना चाहिए किन्तु स्वर्ग की व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाये रखने के लिए ऐसे लोगों में अन्य दूसरे गुणों-दया, ममता, करुणा, अहिंसा, धर्म आदि-को खोज कर उन्हें नर्क में भेज दिया जाता है।’’ तभी महाराज ने देखा कि ऋषि कुमार अपने मोबाइल के की-पैड पर उँगलियाँ नचाने में मगन हैं। ‘‘क्या बात है ऋषि कुमार, हमारी बातें सुन कर बोर होने लगे?’’ ‘‘नहीं, नहीं महाराज, ऐसा नहीं है। हम तो मोबाइल स्विच आफ कर रहे थे ताकि आपकी बातों के बीच किसी तरह का व्यवधान न पड़े।’’ ऋषि कुमार अपनी हरकत के पकड़ जाने पर एकदम से हड़बड़ा गये।

    महाराज ने ऋषि कुमार की ओर से पूरी संतुष्टि के बाद फिर से मुँह खोला-‘‘पहले स्थिति तो कुछ नियंत्रण में थी किन्तु जबसे धरती से राजनीतिक व्यक्तियों का आना शुरू हुआ है तबसे समस्या विकट रूप धारण करती जा रही है। इन नेताओं में तो किसी दूसरे गुण को खोजना भूसे में सुई खोजने से भी कठिन है। इस कारण स्वर्ग की व्यवस्था भी दिनोंदिन लचर होती जा रही है। सब मिलकर आये दिन किसी न किसी बात पर अनशन, धरना, हड़ताल आदि करने लगते हैं। किसी दिन ज्ञापन देने निकल पड़ते हैं। अब यही सब मिल कर हमारे अधीनस्थों को चुनाव के लिए, लाल बत्ती के लिए उकसा रहे हैं।’’ महाराज ने दो पल का विराम लिया और कोने में रखे फ्रिज में से ठंडी बोतल निकाल कर मुँह में लगा ली। गला पर्याप्त ढंग से ठंडा करने के बाद उन्होंने ऋषि कुमार की ओर देखा। ऋषि कुमार ने पानी के लिए मना कर आगे जानना चाहा।

    महाराज धीरे-धीरे चलकर ऋषि कुमार के पास तक आये और उनके कंधे पर अपने हाथ रखकर समस्या का समाधान ढूँढने को कहा-‘‘कोई ऐसा उपाय बताओ ऋषि कुमार जिससे इन सबको स्वर्ग की बजाय नर्क में भेजा जा सके और यहाँ के लिए बनाया महाराजाधिराज का विधान भी भंग न हो।’’

    ऋषि कुमार महाराज की समस्या को सुनकर चकरा गये। महाराज की आज्ञा लेकर पास पड़ी आराम कुर्सी पर पसर गये। दो-चार मिनट ऋषि कुमार संज्ञाशून्य से पड़े रहने के बाद उन्होंने आँखें खोलकर महाराज की ओर देखा। महाराज को चुप देख ऋषि कुमार आराम से उठे और बोले-‘‘महाराज धरती के नेताओं की समस्या तो बड़ी ही विकट है। उनसे तो वहाँ के मनुष्यों द्वारा बनाये विधान के द्वारा भी पार नहीं पाया जा सका है। बेहतर होगा कि मुझे कुछ दिनों के लिए कार्य से लम्बा अवकाश दिया जाये जिससे कि विकराल होती इस समस्या का स्थायी समाधान खोजा जा सके। तब तक एकमात्र हल यही है कि धरती पर नेताओं को हाथ भी न लगाया जाये। बहुत ही आवश्यक हो तो उनके स्थान पर आम आदमी को ही उठाया जाता रहा जाये।’’ इतना कहकर ऋषि कुमार महाराज की आज्ञा से बाहर निकले और अपनी मनपसंद रिंगटोन ‘नारायण, नारायण’ गाते हुए वहाँ से सिर पर पैर रखकर भागते दिखाई दिये।

डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
सम्पादक-स्पंदन

110 रामनगर, सत्कार के पास,
उरई (जालौन) उ0प्र0 285001
e-mail-dr.kumarendra@gmail.com
Blog-http://kumarendra.blogspot.com

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(प्रविष्टि क्रमांक - 43)

 

पुरस्कृत और सम्मानित होना नेताओं का ही नहीं लेखकों और कवियों का भी जन्मसिद्ध अधिकार है और उनके इसी जन्मसिद्ध अधिकार के कारण बेचारे साहित्य के विद्यार्थियों को उन सभी पुरस्कारों और सम्मानों तथा पुरस्कृत और सम्मानित कृतियों और कृतिकारों का लेखा-जोखा रखना पड़ता है, उन्हें रटना होता है तथा याद रखना होता है। पहले यह काम थोड़ा सरल था क्योंकि कुल मिलाकर पाँच-सात पुरस्कार थे। गिने-चुने लेखक-कवि होते थे जिन्हें ये पुरस्कार मिलते थे। कई बार स्तरीय रचना के अभाव में किसी साल कोई पुरस्कार दिया ही नहीं जाता था तो कई बार साल-साल दो-दो साल प्रतीक्षा कराने के बाद पुरस्कार की घोषणा होती थी। इतनी अधिक उत्सुकता और प्रतीक्षा के बाद पुरस्कृत कृति और कृतिकार को भला कैसे भुलाया जा सकता है? पुरस्कार के नाम से रचनाकार का नाम और रचनाकार या रचना के नाम से पुरस्कार का नाम झट से याद आ जाता था पर आज वो बात कहाँ? दर्जनों, सैकड़ों में नहीं हज़ारों में है आज पुरस्कारों की संख्या। एक रचनाकार को ही नहीं एक कृति या एक कविता को भी कई-कई दर्जन पुरस्कार मिल जाते हैं आजकल।

कल एक पत्रिका में एक कहानी पढ़ रहा था। कहानी के साथ रचनाकार का परिचय ही नहीं चित्रा भी था और इसके बाद प्राप्त साहित्यिक सम्मानों की सूची भी। सारे सम्मान साहित्यिक थे एक भी असाहित्यिक नहीं था। कहानी छोटी थी पर साहित्य सम्मान सूची अत्यंत विस्तृत। सूची इतनी लम्बी थी कि ख़त्म होने को ही नहीं आ रही थी। मैं अत्यंत धैर्य और सम्मान के साथ इस साहित्य सम्मान सूची को पढ़ रहा था लेकिन मेरा धैर्य जवाब दे गया और सम्मान भी साथ छोड़ने को तत्पर हो गया। अब मैं पढ़ना छोड़ कर संख्याएँ देख रहा था। मेरी नज़र तेज़ी से गिनती गिन रही थी। कुल मिलाकर सड़सठ साहित्यिक सम्मान लेखक महोदय की झोली में आ चुके थे। सेंचुरी पूरी होने में थोड़ी सी क़सर बाक़ी थी जो उम्मीद है अब तक पूरी हो चुकी होगी। इस संख्या से क्रिकेट और साहित्य जगत में समानता और एकरूपता का भी पता चलता था। जिस प्रकार एक-एक बॉल पर चौकों-छक्कों की बरसात होती है और बीस-बीस ओवर्स के एक मैच में लंबी-लंबी गाड़ियों और सुपर डीलक्स फ्लैटों की बरसात उसी तरह साहित्य जगत में भी एक-एक कहानी या एक-एक कविता पर सम्मानों की झड़ी लग जाती है और एक-एक किताब पर डॉक्टरेट और डी लिट की मानद उपाधियों के अंबार।

मैं सम्मानों के प्रभाव में ऐसा खोया कि कहानी और लेखक दोनों को भूल गया। सच पूछो तो मुझे एसिडिटी हो रही थी। पुनः वापस ऊपर जाकर कहानी और लेखक का नाम देखा। पूर्णतः अपरिचित था मेरे लिए ये नाम। न कभी ये नाम ही सुना था और न कभी ये चेहरा ही देखने का सौभाग्य मिला था। अपनी अल्पज्ञता पर कुढ़न हुई। अपने आप को धिक्कार। सड़सठ साहित्यिक सम्मान पाने वाला लेखक और तुम उसके कृतित्व से तो छोड़ो उसके नाम से भी परिचित नहीं। ख़ाक साहित्य-प्रेमी बने घूमते हो। धिक्कार है तुम पर और तुम्हारे साहित्य प्रेम पर। ख़ैर मन ही मन महान लेखक को इस संख्यातीत सम्मान पत्र संग्रह के लिए नमन किया और पुनः पुरस्कार और सम्मान सूची के विश्लेषण में व्यस्त हो गया।

विश्लेषण के क्रम में सबसे पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार की खोज की। मेरा विचार था कि ज्ञानपीठ पुरस्कार शायद ही मिला हो और मेरा विचार ठीक निकला। ज्ञानपीठ वालों को ये सौभाग्य अभी नहीं मिल पाया था। उसके बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार की खोज का काम शुरू हुआ पर दैवयोग से ये नाम भी सूची से नदारद था। सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार कब के बंद हो चुके हैं पर हो सकता है बंद होने से पहले ये पुरस्कार लेखक की झोली में आ गिरा हो इसी से सारा ध्यान इसी पर केंद्रित कर दिया लेकिन यहाँ भी असफलता ही हाथ लगी। मैं जिन पुरस्कारों के नामों से परिचित था उनमें से एक भी तो नहीं था इस सूची में। पुरस्कारों से संबंधित अपने संचित ज्ञान की यथार्थता पर ही नहीं उसकी सार्थकता पर भी मुझे शंका होने लगी।

किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले मैंने पुनः सारी सूची को ध्यान से देखा। सभी सम्मान लगभग अंतर्राष्ट्रीय स्तर के थे और सभी बड़े साहित्यकारों के नाम पर भी। अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का महादेवी पुरस्कार। मैं साहित्य अकादमी तक तो थोड़ा परिचित था लेकिन ये कोई उससे बड़ी अकादमी थी जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की थी और साहित्य के साथ-साथ संस्कृति को भी संभालती थी। इसी प्रकार मैं राजधानी स्थित हिन्दी अकादमी या अन्य राज्यों की साहित्य अकादमियों की तो थोड़ी बहुत जानकारी रखता था लेकिन लेखक को पुरस्कृत करने वाली अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी भाषा और साहित्य अकादमी से मैं पूरी तरह अनभिज्ञ था। मुझे अपने अल्पज्ञान और अज्ञान पर सचमुच तरस आ रहा था। पाँच सात पुरस्कारों और पच्चीस तीस किताबों के नाम रटकर पुरस्कारों का विशेषज्ञ और बड़ा तीसमार खाँ समझने लगा था अपने आपको मैं लेकिन एक ही झटके में मेरी विशेषज्ञता धूल चाटने लगी थी।

इसके बाद इन अंतर्राष्ट्रीय अकादमियों और संस्थानों के बारे में जानने की इच्छा और तीव्र हो गई। मुझे ये जानकर हैरानी हुई कि ये सारे संस्थान दुनिया के बड़े-बड़े देशों जैसे रूस, अमरीका, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, दक्षिणी अफ्रीक़ा, न्यूज़ीलैंड, आस्ट्रेलिया आदि में न होकर हमारे महान भारत देश में ही स्थित हैं और वो भी महानगरों और बड़े शहरों में नहीं अपितु छोटे-छोटे शहरों, क़स्बों और गाँवों में। जिस काम को बड़े-बडे देश और महानगर अंजाम नहीं दे सकते उनको पूरा करने का बीड़ा उठा रखा है हमारे गाँवों और क़स्बों ने। जिस प्रकार सफेद दाग़ के इलाज के लिए कतरी सराय के शफ़ाख़ानों की शोहरत पूरी दुनिया में है उसी प्रकार साहित्य, संस्कृति और कला के उत्थान के लिए भारत के गाँवों और क़स्बों का योगदान अद्वितीय है। आगे और विश्लेषण करने पर पता चला कि ये सभी गाँव और क़स्बे ज़्यादातर भारतीय रेलवे के मार्गों पर स्थित हैं और उनमें से ज़्यादातर रेलवे के जंक्शन स्टेशनों वाले स्थानों पर। इससे एक बात और साफ़ हो जाती है कि हिन्दी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए रेलवे की भी कम महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं है। यह अलग से शोध् का विषय है।

गाँधी जी ने कहा था कि असली भारत गाँवों में बसता है। मैं गर्व से कह सकता हूँ असली साहित्य प्रेमी गाँवों, क़स्बों और छोटे शहरों में बसते हैं और वो भी रेलवे के जंक्शन स्टेशनों के आसपास। गाँवों और क़स्बों के लोग हमारे अन्नदाता ही नहीं जो पूरे देश को अनाज, पफल-सब्ज़ियाँ और दूध् की आपूर्ति करते हैं अपितु साहित्य के लिए उत्प्रेरक तत्त्व सम्मान और पुरस्कारों के विश्वव्यापी वितरण का भार भी इन्हीं के कन्धें पर टिका है। जिस प्रकार एक व्यक्ति सैकड़ों लोगों के लिए अन्न, फल-सब्ज़ियाँ और दूध् पैदा कर रहा है उसी तरह कुछ व्यक्ति या संस्थान ऋ जो वन मैन बाउण्डरी पफोर्स की तरह एक ही व्यक्ति के कंधें पर स्थित हैं - पूरे देश के ही नहीं अपितु समस्त विश्व के साहित्यसेवियों को पर्याप्त मात्रा में सम्मान-पत्र उपलब्ध् करा रहे हैं और वो भी घर बैठे वीपीपी से बिल्कुल घरेलू लाइब्रेरी योजना की पुस्तकों की तरह।

आइये एक बार फिर अपने आदरणीय लेखक के सम्मानों की ओर ध्यान केंद्रित करें। हमारे सम्मानित लेखक को एक ही संस्थान से कई-कई बार सम्मानित किया जा चुका है। जिस प्रकार भारत सरकार देश के नागरिकों को और कभी-कभी विदेशियों को भी भारतमाता की सेवा के लिए पहले पद्मश्री पिफर पद्मभूषण और पद्मविभूषण तथा अंत में भारतरत्न से नवाज़ती है उसी प्रकार हमारे साहित्य सेवी संस्थान भी छोटे सम्मानों से प्रारंभ कर बड़े सम्मानों तक पहुँचते हैं जैसे साहित्यश्री के बाद साहित्यभूषण और साहित्यविभूषण तथा अंत में साहित्यरत्न। हमारे फिल्मकार सत्यजीत रे ने पद्मश्री से भारतरत्न तक पहुँचने के लिए पूरा जीवन लगा दिया। भारतरत्न से पहले ऑस्कर भी लेना पड़ा लेकिन साहित्य के क्षेत्र में इतना अंधेर नहीं है। साहित्यश्री से साहित्यरत्न तक चारों सम्मान आप चाहें तो एक ही वीपीपी से मँगवा सकते हैं।

इनके पास इससे बड़े पुरस्कार भी उपलब्ध् हैं। हमारे यहाँ भारतरत्न से बड़ा पुरस्कार नहीं लेकिन ये संस्थान आपको नोबल और ऑस्कर की टक्कर के पुरस्कार दिला सकते हैं। एक नहीं दर्जनों नोबल और ऑस्कर की टक्कर के पुरस्कार इनके यहाँ साल भर तैयार मिलते हैं अथवा ऑर्डर पर शीघ्र तैयार कराये जा सकते हैं। एक हमारा भारतरत्न है दिया तो दिया नहीं दिया तो सालों नहीं दिया। ये तो भला हो आडवानी जी का जिन्होंने याद दिला दिया कि सरकारी दफ्रतरों में काम करने वाले अत्युत्साही कर्मठ कर्मचारियों की मेडिकल व अर्नड लीव की तरह ही भारतरत्न भी कई सालों से पड़ा लैप्स हो रहा है।

कई लोग दबी ज़बान से ये भी कह रहे हैं कि जब भारतभूमि पर सम्मानित करने को कोई रत्न है ही नहीं तो किसे भारतरत्न से सम्मानित करें। अब दक्षिणी अफ्रीक़ा से कहाँ तक पकड़-पकड़ कर लाएँ भारतरत्न देने के लिए बन्दे। वैसे पड़ोसी मुल्क़़ों से कोशिश की जा सकती है। आडवानी जी न जाने क्यों वाजपाई जी का नाम घसीट रहे हैं भारतरत्न के लिए। अरे वाजपाई जी को तो देर सवेर मिल ही जाएगा। क्या कहा? आडवानी जी वाजपाई जी की सिफ़ारिश करेंगे तो कोई न कोई आडवानी जी की सिफ़ारिश भी कर ही देगा देर सवेर। अच्छा तो ये बात है? वैसे मिस्टर जिन्ना के बारे में क्या ख़याल है आडवानी जी? आप तो वैसे भी उनके प्रशंसक हैं। जब पाकिस्तान मोरारजी भाई को निशाने-पाकिस्तान से नवाज़ सकता है तो हम क्यों नहीं उनके एक बंदे को एक अदद भारतरत्न पेश कर सकते? आडवानी जी आपको तो इस मामले में फ़़राख़दिली दिखलानी ही चाहिए। ख़ैर इस मामले में साहित्य में कोई क़हता नहीं है। भारतरत्न के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकता लेकिन साहित्यरत्नों की कमी नहीं और न ही उनके लिए पुरस्कारों और सम्मानों की।

मेरी एसिडिटी और ज़्यादा बढ़ गई है। इतने बड़े-बड़े सम्मान यूँ ही लुटाये जा रहे हैं और मेरी झोली खाली पड़ी है। मेरे मुँह में भी पानी भर रहा है। काश मुझे भी एक आध दर्जन सम्मान-वम्मान मिल पाते! मैं भी तो बरसों से क़लम घिस रहा हूँ। मुझे क्यों कोई सम्मानित नहीं करता? क्या मुझे भी आडवानी जी की तरह पहले दूसरे लोगों की सिफ़ारिश करनी पड़ेगी तब जाकर कोई मेरी सिफ़ारिश करेगा? नहीं ऐसा नहीं है। आज यदि मेरे पास सम्मान-पत्रों की कमी है तो इसमें मेरी ग़लती है। मैंने ही इनकी क़दर नहीं की। जब मैंने इनकी क़दर नहीं की तो ये मेरी क़दर क्यों करते?

मुझे याद आ रहा है वो दिन जब पैंतीस साल पूर्व पहली बार मेरी रचना छपी थी। मैं बहुत ख़ुश था। और उससे भी ज़्यादा ख़ुशी तब हुई थी जब एक अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थान का पत्र मुझे मिला था। पत्र में लिखा था कि संस्थान मेरी साहित्यिक सेवाओं के लिए मुझे सम्मानित करना चाहता है। उन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचान लिया था लेकिन मुझे ही विश्वास नहीं हो रहा था और इसीलिए मैंने अपेक्षित राशि का एमओ तथा संलग्न प्रपत्र भरकर भेजा ही नहीं। उसके बाद तो सम्मान देने वाले संस्थानों के पत्रों की झड़ी लग गई। न जाने सम्मानित होने के कितने प्रस्ताव मुझे मिले लेकिन मैं हर बार चूक गया पृथ्वीराज की तरह। यदि समय पर न चूकता तो आज मैं भी शतक बना चुका होता लेकिन अब भी देर नहीं हुई है। देर आयद दुरुस्त आयद। हे अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थानों के प्रमुखों! मैं अपनी भूल स्वीकार करता हूँ और आप सबसे निवेदन करता हूँ कि आप मुझे पुनः प्रपत्र भिजवाएँ। मैं आपको एमओ भिजवाता हूँ और आप मुझे सम्मान-पत्र भिजवाएँ।

---

सीताराम गुप्ता,

ए.डी. 106-सी, पीतम पुरा,

दिल्ली - 110034

फोन नं. 011-27313954 srgupta54@yahoo.co.in

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(प्रविष्टि क्रमांक - 42)


क्या कहा ! अंधी दुनिया ! जी हाँ , आपके कर्ण पल्लवों ने ठीक ही सुना। वास्तव में बात यही है , सही है और कुछ भी नहीं है। आपने यूं तो बहुत से अंधे देखे होंगे पर आज हम आपको ऐसे 'ढाई घड़ी के अंधों ' की दुनिया से अवगत कराना चाहते हैं जो आपने देखते सुनते हुए भी नहीं देखी होगी।हो सकता है आप सोच रहे हों यह कलम तोड़ महामूर्ख 'बात का बतंगड़' ,'तिल का ताड़' बनाकर आपकी गणना भी अंधों में न कार दे।कहीं आप लेख को पढ़कर आपे से बाहर हो जायं तो इन पन्नों को सिगरेट सुलगाने में कदापि प्रयोग न लायें क्यूंकि ये शब्द सूक्ष्म -भाव होकर चाय या सिगरेट के धुएं के साथ समाहित होकर अंतर्मन में लीन हो जायेंगे। और यदि आप इन्हें अपने कम्प्यूटर मॉनीटर पर पढ़ रहे हैं तो और भी धैर्य रखें नहीं तो... वैसे भी, शब्द ब्रह्म है और अविनाशी ....| खैर आपतो स्वयं ही समझदार हैं ( अधिकतर लोगों के तो रिश्ते-नातेदार ही समझदार होते हैं) अतः आशा है आप ऐसा नहीं करेंगे।


हाँ, तो हमने कहा, अंधी दुनिया ! यह दुनिया वास्तव में ही अंधी है। आप कहेंगे वाह ! हम तो हैं ही नहीं। हमारे तो दो आँखें हें , बड़ी बड़ी, आकर्षक, प्रलोभनकारी. दूर तक देखने वाली, यहाँ तक कि दूसरों के कर्म व गुणों में छिद्रों का शीघ्र अन्वेषण कार लेतीं हैं। फिर हम कैसे......| पर श्रीमान ,हमारे अंधों की परिभाषा में तो बिना आँखों के अंधे थोड़े ही अंधे हें , अपितु आँखों वाले अंधे ही अंधे हैं। बिलकुल पूरी तरह दो आँखों वाले। जानना चाहते हैं तो राह चलते किसी से टकरा जाइए , अंधे की उपाधि पाइए और जान जाइए।


लीजिये , रास्ते चलते आप हमारे कहने से टकरा गए ( क्यों ?) , आपको शीघ्र ही चिरपरिचित शब्दों में उपाधियाँ प्राप्त होंगी ' अंधा है क्या' , 'दिखाई नहीं देता' , 'आँखें नहीं हैं बटन हें क्या ' , चश्मा लगा रखा है ,चार आँखें हैं फिर भी अंधे हो क्या ?' लीजिये हम तो अंधे बना ही दिए गए परन्तु हुज़ूर, आप भी क्या कम अंधे हैं , क्या आपको दिखाई नहीं देता कि हमारे आँखें हें या नहीं जो पूछते हैं।भाई क्या करें? यही है अंधी दुनिया की अंधी रीति।


आप किसी मित्र के घर पहुंचते हैं, वे छूटते ही कहेंगे ,अरे आप ! लो भई, क्या आप हमें टटोल कार ये पता कर रहे हैं कि ये हम हें। और आप भी सब कुछ देखते हुए भी' ढाई घड़ी के अंधे' होकर पूछ बैठेंगे कि 'कैसे हो', 'क्या कर रहे हो ?' और उत्तर भी उसी सुर-ताल में फ़टाफ़ट मिलता है जैसे वर्षों से सोच कर रखा हो , ' अजी कुछ नहीं '... समझ गए न।


अरे यह क्या ! आपके मन-मानस में क्रोध देवता का आविर्भाव होता जा रहा है। अब आप क्रोध में अंधे बनते जा रहे हैं। क्रोध में अंधों ने दुनिया में क्या-क्या कहर नहीं ढाया है। 'क्रोध पाप कर मूल'। दुर्योधन ने क्रोध में अंधा होकर द्रौपदी का चीर हरण कर डाला और रख डाली अपने कुल-नाश की नींव। द्रौपदी ने भी बदले के क्रोध में अंधी होकर महाभारत की रचना कर डाली। हम तो यही कहेंगे, क्रोध को तो आप त्याग ही दें श्रीमान !


कुछ आन्ह्कों वाले धन के मदांध होते हैं , कुछ यश में अंधे; और सत्ता के मद में अंधे तो संसार में जाने क्या क्या कुकर्म नहीं कर जाते।  'प्रभुता पाय काहि मद नाहीं' , राज्य मद में ही तो अंधा होकर नहुष ने इंद्राणी से विवाह प्रस्ताव रख डाला और स्वर्ग के राज्य से हाथ धोकर अधम योनि को प्राप्त हुआ। और काम मद में अंधेपन का क्या ही कहर है कि विश्व विजयी रावण को सीता के कारण कुल सहित नामो निशाँ से मिट जाना पडा। लोभी और लालची भी आँखों वाले अंधे हो जाते हैं। यहाँ तक कि उन्हें लोभ रूपी चश्मा लगाकर सभी एक से एक बड़े और अमीर दिखाई देते हैं --
          ""घर घर दोलत दीन ह्वै, जन जन जाँचत जाय|
दिए लोभ चश्मा चखनि , लघु पुनि बड़ो लखाय।|''


ये प्रेम भी बड़ी विचित्र वस्तु है। इसके अंधे का तो कोई इलाज़ ही नहीं। इन्हें तो सारा संसार ही एक सा दिखाई देता है| उंच-नीच, जाति-पांति, भेद-भाव , माँ- बाप, सभी को एक तराजू में तौल कर भुला देने को मन करता है। अपनी औकात भूलकर चाँद तारे तोड़ कर लाने का दम भरता है| चाहे कोई कितना भी नारकीय -पाप पंक मय क्यों न हो सारा विश्व 'सिया-राम मय, प्रेम मय ' लगता है।'सावन के अंधे ' को सर्वत्र हरा ही हरा सूझता है। इस रोग के अंधों पर तो कोटिभि ग्रन्थ व महाकाव्य लिखे जा सकते हैं। पर कुछ भी हो ये आँखों वाले अंधे कभी कभी बड़ी ऊंची बातें कर व कह जाते हैं| अपने तुलसी को ही लीजिये ,मुर्दे को नाव बनाकर तर गए यमुना पार,सांप को रस्सी समझ कर चढ़ गए प्रिया की खिड़की , डांट खाकर बन गए महाकवि तुलसीदास , रच गए " राम चरित मानस"| प्रेमी की धुन में अंधी 'गणिका' ने महाज्ञानी-ध्यानी ऋषि को ही तत्वार्थ-ज्ञान की राह दिखादी। आँखें ,मन और प्रेम की त्रिकल जोड़ी का अंधेपन से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। आँखें होते हुए भी शकुंतला महर्षि के आगमन को नहीं देख पायी और वर्षों के विरहानलव कष्टों की साक्षी बनी|


आजकल के स्वार्थ के अंधों की क्या कहें ! पूछिए ही मत ,अंधापन मानो युग चलन हो गया है| सत्ता वाले अंधे होकर त्राहि-त्राहि करती जनता , टूटी सड़कें,बुझी लाइटें,खुले मैनहोल ,अन्याय व बिकता न्याय नहीं देख पाते। नेता को वोट से अन्यथा कुछ दिखाई नहीं देता। पुलिस वाले को भले नागरिकों के गुनाहों से आगे ( क्योंकि वे सिर्फ डंडा फटकारने पर हीअपनी जेब ढीली करते हैं ) चोर,लुटेरे,बलात्कारी दिखाई ही नहीं देते| कर्मचारी रिश्वत के अंधे हैं, अधिकारी पद दुरुपयोग के। चिकित्सक को मरता हुआ मरीज़ व इन्जीनियर को वगैर सीमेंट का गारा व गिरती हुई बिल्डिंग नहीं दिखाई देती| व्यापारियों ,मिलावट खोरों ,धंधेबाजों को रोजाना मरते हुए लोग व बढ़ते हुए रोगियों की संख्या नहीं दिखाई देती| रह गए धर्मांध , उन्हें आतंकवाद के अलावा कुछ सूझता ही नहीं ,मरते हुए निर्दोष दिखाई ही नहीं देते| और तो और .. कहाँ तक कहें , हम स्वयं अंधे होकर सब कुछ देखते -सुनते हुए भी सब करते हैं, चुपचाप सब सहन करते हैं, अंधे होकर अंधेपन को बढ़ावा देते हैं|


तो पाठक गण ! हमें पूर्ण आशा है कि आप अंधी दुनिया से पूर्ण परिचित हो गये होंगे , और हमसे सहमत होंगे कि ' हम सब अंधे हैं'। यदि अब भी न समझे तो हम क्या करें , कहीं आप भी तो....| भई, बिना आँखों के अंधों का सहारा तो लाठी हो सकती है पर इन आँखों वाले अंधों का सहारा ....? ईश्वर ही मालिक है| यदि वे अपने अंतर्मन की आँखें खोल कर उसे देख सकें तो।नहीं तो सर्वत्र अन्धेरा ही अन्धेरा है। पर हमें पूर्ण आशा है कि शायद इसी अंधेरे से नई राह निकलेगी , क्योंकि सृष्टि से पहले भई चारों और मायावी अन्धेरा ही था---
           ''तम आसीत्तमसा गूढमग्रे अप्रकेतम सलिलं सर्वदा इदम ""
और फ़िर ॐ का प्रकाश हुआ । तभी तो कहा है ’ तमसो मा ज्योतिर्गमय’  और " ये अन्धेरा ही उजाले की किरण लायेगा "।
खैर तो पाठक गण ! आप हमसे सहमत हों या न हों ,पर बिना आँख वाले अंधे यदि इस लेख को पढेंगे तो अवश्य ही इतने सारे लोगों को अपनी श्रेणी में आया जान कर हमारी प्रशंसा करेंगे कि हम भई क्या दूर की कौड़ी लाये हैं।

                       -------- - डा श्याम गुप्त , सुश्यानिदी , के -३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२. मो.

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(प्रविष्टि क्रमांक - 41)

"स्कूल चलें हम"

चिड़ा, बार-बार चिड़िया की पीठ पर कूदता, बार-बार फिसल कर गिर जाता।

"चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़" ---चिड़ा चिड़चिड़ाया।

"चूँ चूँ- चूँ चूँ, चूँ चूँ-चूँ चूँ"-- -चिड़िया कुनमुनाई।

"क्या बात है? आज तुम्हारा मन कहीं और गुम है?  किसी खेल में तुम्हारा मन नहीं लग रहा? " चिड़े ने चिड़िया को डांट पिलाई।

"हाँ बात ही कुछ ऐसी है कि आज सुबह से मेरा मन परेशान है। देखो, मध्यान्ह होने को आया अभी तक मैने दाल का एक दाना भी मुंह में नहीं डाला‍‍"--- चिड़िया झल्लाई।

"बात क्या है ?"

"बात यह है कि आज सुबह-सुबह मैं रेडियो स्टेशन के पीछे बने एक दो पाए के घर में भूल से घुस गई थी। अरे, वहीऽऽ  जहाँ युकेलिप्टस के लम्बे-लम्बे वृक्ष हुआ करते थे, याद आया ?

हाँ-हाँ याद है। तो क्या हुआ?

वहीं मैने देखा कि कमरे के एक कोने में एक बड़ा सा डिब्बा रखा हुआ था उसमें तरह-तरह के चित्र आ जा रहे थे गाना बजाना चल रहा था।

"हाँ-हाँ, दो पाए उसे टी०वी० कहते हैं चिड़ा हंसने लगा। इत्ती सी बात पर तुम इतनी परेशान हो !"

"नहींऽऽ बात कुछ और है। तुम जिसे टी०वी० कह रही हो उसमें एक बुढ्ढा दो पाया धीरे-धीरे चलकर आया, सब उसे देखकर खड़े हो गये और फिर वह सबसे हमारी बात कहने लगा।"

क्या ?

कह रहा था- बच्चे तैयार हैं। सुबह हो चुकी है। चिड़ियाँ अपने घोंसलों से निकल चुकी हैं। हम भी तैयार हैं। स्कूल चलें हम। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आया। यह स्कूल क्या होता है ? जैसे हम घोंसलों से निकलते हैं वैसे ही ये दो पायों के बच्चे घरों से निकलकर स्कूल जाने को तैयार हैं। हम तो कभी स्कूल नहीं गये। क्या तुम गये हो ?

चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़---- चिड़ा खिलखिलाने लगा। तुम भी न, महामूर्ख हो। वे इन दो पायों के राजा हैं।

जैसे गिद्धराज !---- चिड़िया ने फटी आँखों से पूछा ?

हाँ। फिर समझाने लगा- ये दो पाये जीवन भर अपने बच्चों को अपनी छाती से लगाए रखते हैं। उन्हें खिलाते-पिलाते ही नहीं बल्कि अपने ही रंग में ढाल देते हैं। इन्होंने अपने-अपने धर्म बना रखे हैं। प्रत्येक धर्म को मानने वाले भी कई भागों में बंटे हुए हैं। बाहर से देखने मे सब एक जैसे दिखते हैं मगर भीतर से अलग-अलग विचारों के होते हैं। जैसे हमारे यहाँ बाज और कबूतर को देखकर तुरंत पहचाना जा सकता है मगर इनको देखकर नहीं पहचाना जा सकता कि कौन हिंसक है कौन साधू। ---चिड़े ने अपना ग्यान बघारा।

हाँ हाँ, मैने बगुले को देखा है। एकदम शांत भाव से तालाब के किनारे बैठा रहता है और फिर अचानक 'गडुप' से एक मछली चोंच में दबा लेता है। वैसा ही क्या !  चिड़िया ने कुछ-कुछ समझते हुए कहा।

हाँ-हाँ, ठीक वैसा ही। तो ये लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं-ताकि वहाँ जाकर एक दूसरे को जानने-पहचानने की कला सीख सकें, ताकि कोई उन्हें बाज की तरह झपट्टा मारकर खा न जाय।

अच्छा तो यह बात है। चलो हम भी स्कूल चलकर देखते हैं कि वहाँ क्या होता है।

ठीक है चलो। आखिर अपने देश के राजा की इच्छा का सम्मान करना हम चिड़िया प्रजाति का भी तो कुछ धर्म बनता है।

चिड़पिड़ाते-चहचहाते दोनो एक सरकारी प्राइमरी पाठशाला में जाकर एक वृक्ष की डाल पर बैठ जाते हैं।

अरे, यह क्या ! यहाँ तो बहुत कम बच्चे हैं --चिड़ा बोला।

जो हैं वे भी कैसे खेल रहे हैं !----चिड़िया बोली।

लगता है यहाँ एक भी मास्टर नहीं है।

अरे, वह देखो, वहाँ एक कुर्सी पर बैठकर कौन अखबार पढ़ रहा है ?

वे यहाँ के हेडमास्टर साहब लगते हैं।

तुम्हें कैसे मालूम ?

मैं जानता हूँ। जो हेड होते हैं वे मास्टर नहीं होते। मास्टर होते तो पढ़ाते नहीं ?

शायद तुम ठीक कहते हो।

चलो हम कमरे में घुसकर देखते हैं -चिड़िया बोली।

चलो।

अरे, यहाँ तो ढेर सारे कबूतर हैं ! देखो-देखो प्रत्येक बेंच पर इन कबूतरों ने कितना बीट कर छोड़ा है ! पूरा कमरा गंदगी से भरा पड़ा है।

दीवारों के प्लास्टर भी उखड़ चुके हैं।

हाँ हाँ, क्यों न यहीं घोंसला बना लें ?

हाँ, प्रस्ताव तो अच्छा है। स्कूल से अच्छा स्थान कौन हो सकता है एक पंछी को घोंसला बनाने के लिए !

तभी तो सीधे-सादे कबूतर यहाँ आकर रहते हैं।

चलो दूसरे कमरों में भी घूम लें।

अरे, यह कमरा तो और भी अच्छा है ! इसमें तो एक दीवार ही नहीं है !!

(तब तक बच्चों का झुण्ड चीखते-चिल्लाते, कूदते-फांदते, धूल उड़ाते कमरे में प्रवेश कर जाता है। मास्साब आ गए..... मास्साब आ गए.....।)

            डर के मारे दोनों पंछी टूटे दीवार से उड़कर भाग जाते हैं और पुनः उसी स्थान पर जा कर बैठ जाते हैं जहाँ पहले बैठे थे। थोड़े समय बाद क्या देखते हैं कि मास्टर साहब कमरे से बाहर निकल रहे हैं। बाहर निकल कर एक लोटा पानी पीते हैं और बेंच पर बैठकर अपने एक हाथ के अंगूठे से दूसरे हाथ की हथेली को देर तक रगड़ते हैं। जोर-जोर से ताली पीटते हैं फिर रगड़ते हैं फिर ताली पीटते हैं। कुछ देर पश्चात अपने निचले ओंठ को खींचकर चोंच बनाते हैं कुछ रखते हैं और दोनो पैर फैलाकर सो जाते हैं। कमरे के भीतर से दो पायों के बच्चों के जोर-जोर से चीखने की आवाज आती रहती है।

           बिचारे बच्चे ! चिड़िया को दया आ गई। इस आदमी ने बच्चों को जबरदस्ती कमरे में बिठा रखा है। देखो न, बच्चे कितने चीख-चिल्ला रहे हैं। क्या इसी को पढ़ाई कहते हैं ? क्या इन दो पायों के राजा को मालूम है कि स्कूल में क्या होता है ?  क्या इसलिए सुबह-सबेरे सबसे कहता है कि हम भी तैयार हैं स्कूल चलें हम ! वह तो कहीं दिखाई नहीं देता !

इनका राजा कहाँ है ? वह तो कहीं दिखाई नहीं देता !-- बहुत देर बाद चिड़िया ने मौन तोड़ा।

राजा, राजा होता है। ताकतवर और ग्यानी होता है। उसको स्कूल जाने की क्या जरूरत ? -चिड़ा बोला।

छिः। स्कूल तो बहुत गंदी जगंह होती है। यहाँ तो सिर्फ यातना दी जाती है।

नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। चिड़े ने समझाया -"यह गरीबों का स्कूल है। यहाँ मुफ्त शिक्षा दी जाती है। जो चीज मुफ्त में मिलती है वह अच्छी नहीं होती। टी०वी० में ऐसी बातें करके राजा जनता की सहानुभूति बटोरना चाहता है।"

अच्छा ! तो और भी स्कूल है ? यह गरीबों का स्कूल है तो अमीरों का स्कूल कैसा होता है ?----चिड़िया ने पूछा।

चलो चलकर देखते हैं।

चलो।

       (दोनों पंछी उड़कर एक अंग्रेजी पब्लिक स्कूल में पहुंच जाते हैं जहाँ की दीवारें रंगी-पुती हैं, बड़ा सा मैदान है, सुंदर सी फुलवारी है और बड़े से लोहे के गेट के बाहर मूछों वाला चौकिदार बंदूक लिए पहरा दे रहा है।)

यह तो बहुत सुंदर जगह है ! मगर तुमने देखा ? उस दो पाये के हाथ में बंदूक है। वह हमें मार भी सकता है ! -- चिड़िया एक आम्र वृक्ष की पत्तियों में खुद को छुपाते हुए डरते-डरते बोली।

नहीं-नहींss । डरने की कोई जरूरत नहीं है। यह चौकिदार है। दो पायों को हमसे नहीं अपने ही लोगों से ज्यादा खतरा है ! यह अमीरों का स्कूल है। उनके बच्चे गरीबों की तरह सस्ते नहीं होते। यह उन्हीं की सुरक्षा के लिए है।

अच्छा ! मगर यहाँ तो एक बच्चा भी खेलते हुए नहीं दिखता। बच्चे कहाँ हैं ?

अभी तो तुमने स्कूल की बाहरी दीवार ही पार की है। बच्चों को देखने के लिए कमरों में घुसना होगा जहाँ एक दूसरा चौकिदार बैठा है।

चलो यहाँ से भाग चलें। यह जगंह तो बड़ी भयानक है।

नहीं, जब आए हैं तो पूरा स्कूल देखकर ही चलेंगे डरो मत। चलो, उस दीवार के ऊपर की तरफ जो गोल सुराख दिखलाई पड़ रही है, वहीं से प्रवेश कर जाते हैं।

मुझे तो बड़ा डर लग रहा है --चिड़िया हिचकिचाई।

डरो मत। मेरे पीछे-पीछे आओ।

इतना कहकर चिड़ा फुर्र से उड़कर रोशनदान में प्रवेश करता है। चिड़िया भी पीछे-पीछे रोशनदान में घुस जाती है। वहाँ से दोनो कमरों में देखने लगते हैं। नीचे कक्षा चल रही है मैडम पढ़ा रहीं हैं।

वाह ! क्या दृश्य है। देखो, सभी बच्चे एक जैसे साफ-सुथरे कपड़े पहने सुंदर-सुंदर कुर्सियों पर बैठे हैं। इनके टेबल भी कितने सुंदर हैं !

दीवारें कितनी सुंदर हैं। जमीन कितनी साफ है।

वह देखो,  हवा वाली मशीन ! यह अपने आप घूम रही है !!

वह देखो, रोशनी वाली डंडियाँ ! कितना प्रकाश है !!

अरे, वह देखो,  वह मादा दो पाया एक कुर्सी में बैठकर जाने किस भाषा में बोल रही है। उसके पीछे की दीवार में काले रंग की लम्बी चौड़ी पट्टी लगी है।

लगता है यह मास्टरनी है !

हाँ, कितनी सुंदर है !

(दोनों की चिड़-पिड़-चूँ-चूँ से बच्चों का ध्यान बटता है। बच्चे रोशनदान की ओर ऊपर देखने लगते हैं। शोर मचाने लगते हैं।)

व्हाट ए नाइस बर्ड !

हाऊ स्वीट !

मैडम, चौकिदार को आवाज देती है और चौकिदार बंदूक लेकर आता है। बच्चों के शोर, मैडम की चीख, और चौकिदार की बंदूक देखकर दोनो पंछी मारे डर के भाग जाते हैं। कुछ देर तक हवा में उड़ते रहते हैं और एक तालाब के पास जाकर दम लेते हैं। चीड़िया ढेर सारा पानी पीती है देर तक हाँफती है और हाँफते-हाँफते चिड़े से कहती है----" जान बची लाखों पाए। अब हमें कभी स्कूल नहीं जाना। ये दो पाये तो दो रंगे होते हैं ! जैसे इनको देखकर समझना मुश्किल है कि कौन बाज है कौन कबूतर वैसे ही इनके स्कलों को देख कर समझना मुश्किल है कि कौन अच्छा है और कौन बुरा ! वह मास्टरनी क्या गिट-पिट गिट-पिट कर रही थी ?"

चिड़ा चिड़िया की बदहवासी देखकर देर तक खिलखिलाता रहा फिर बोला, "मेरी चिड़िया, ये दो पाये दो रंगे नहीं, रंग-बिरंगे होते हैं। जैसे इनके घर जैसे इनके कपड़े, जैसा इनका जीवन स्तर वैसे ही इनके स्कूल। जिसे तुम 'गिट-पिट गिट-पिट' कह रही हो, वह श्वेत पंछियों की भाषा है। तुमने देखा होगा कि जब जाड़ा बहुत बढ़ जाता है तो वे पंछी उड़कर यहाँ आ जाते हैं। बहुत दिनों तक यह देश भी उनके देश का गुलाम था। इन लोगों ने उनको भगा दिया मगर उनकी गुलामी करते-करते यहाँ के लोगों ने उनकी भाषा में बात करना उसी भाषा में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी शान समझने लगे। इन दो पायों में जो पैसे वाले होते हैं या वे जो पैसे वाले दिखना बनना चाहते हैं,  अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं। यहाँ की शिक्षा बहुत मंहगी है। ये पैसे वाले हैं इसलिए इनके स्कूल भी अच्छे बने होते हैं। गावों में गरीब लोग रहते हैं, शहरों में अक्सर अमीर लोग रहते हैं। हम भी गावों रहते हैं इसलिए गांव की भाषा ही जानते हैं। जैसे हम पंछियों की कई भाषाएँ होती हैं, वैसे ही इन दो पायों की भी कई भाषाएँ होती हैं। ये मात्र देखने में एक जैसे लगते हैं,  भाषा के मामले में भी रंग-बिरंगे होते हैं।

मेरी प्यारी चिड़िया अब मैं तुमको कितना समझाऊँ ? तुम तो एक ही दिन में दो पायों को पूरा समझ लेना चाहती हो जबकि गिद्धराज कहते हैं कि ये दो पाये बड़े अद्भुत प्राणी हैं। भगवान भी इन्हें पैदा करने के बाद इन्हें समझना नहीं चाहता !

"शायद तुम ठीक कहते हो"--चिड़िया बोली, "हमें इनके धोखे में नहीं फंसना चाहिए। देखो शाम हो चुकी है, बच्चे स्कूलों से घरों की ओर लौट रहे हैं, हम भी तैयार हैं, घर चलें हम।

चिड़ा चिड़िया की बोली सुनकर भय खाता है कि एक दिन में ही इसकी बोली बदल गई। हड़बड़ा कर इतना ही कहता है-"चलो चलें घर चलें हम।"

चिड़-पिड़, चूँ-चूँ .. चिड़-पिड़, चूँ-चूँ .... करते, चहचहाते, दोनों पंछी अपने घोंसले में दुबक जाते हैं और देखते ही देखते शर्म से लाल हुआ सूरज अंधेरे के आगोश में गुम हो जाता है।

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देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

सा-१०/६५, डी-६

शांति नगर कॉलोनी

गंज, सारनाथ-वाराणसी

पिन-२२१००७

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(लोगो – साभार पंकज बेंगाणी)

surendera -106

लम्पट

अरे ये लम्पट!

क्यों तू गा रहा है अग्निपथ-अग्निपथ!

अपने स्वार्थ के लिए

किसी का भी पाता सान्निध्य

जिसने दी जड़ों को खाद और पानी

उसी के साथ कर ली बेईमानी

मैं और मेरे बच्चों के लिए

करता रहा मेल-जोल

धन के लिए ही करता है

नाप तोल कर गोल

मंगल के अमंगल से बचने

बकरी के बच्चे सा

होने वाली बहू का कान पकड़

करता मन्दिरों की नाप जोख

काल के ताण्डव का

हो न अपने परिवार पर प्रकोप

देश, समाज, शहर के लिए

क्या किया बता सके यह सवाल?

अपने को कृषक बताकर लूटना चाहता

गरीबों का माल

कब चलाया है हल?

फिर क्यों लेना चाहते झूठा प्रतिफल!

छूट

जो जहां काबिज ह

उसे खुली छूट है

मर्यादाओं का खूब उल्लंघन करे

भावनाओं को जमके छले

लीपापोती की हास्यास्पद हरकत करे

आपकी असुविधा पर सुचिंतित दिखे

मतलब सिद्ध हुए बिन एक न सुने

जिस पर किसी का अंकुश नहीं

न किसी का चाबुक कर सके काबू

आजाद भारत का है वह बाबू!

इंतजार

द्वार पर दर्द की यादें है

दिखने और होने के बीच

घुंघलका छंटने का इंतजार है

बिगुल फूंकने के लिए जुगत जारी

संकेतों में कर ली पूरी तैयारी

अपने-अपने दर्द और समस्याओं की फेहरिस्त लेकर

अपने सामने आते-जाते रहते हैं

उपेक्षित क्या यह समझ नहीं पाते हैं

भीनी-भीनी खुशबू में उलझकर

सजी-धजी रह जाती है तैयारी।

शिद्दत

चिलचिलाती धूप में

तपती हुई तारकोल की सड़क पर

हम सवारियां ही नहीं मजबूरियां भी

कड़कड़ाती सर्दी में, मूसलाधार वर्षा में

बड़ी शिद्दत से ढो रहे हैं

आप रहे कूलरों-एअर कंडीशनरों में

हमें फर्क नहीं पड़ता है

बेरोजगारी और बेकारी में

पेट की आग बुझाने के लिए

कुछ न कुछ श्रम तो कर रहे हैं

सिर छुपाने की चिंता नहीं

हमने रिक्शे को बना लिया घर

जनपथ से राजपथ लगाए तीन चक्कर

नहीं थे पैसे अन्यथा खरीद लेता थ्रीव्हीलर

पर मुझे शहर से क्यों खदेड़ रहे।

हम भी मानव हैं

क्यों जानवर बना रहे हैं।

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सुरेन्द्र अग्निहोत्री

राजसदन 120/132 बेलदारी लेन, लालबाग, लखनऊ

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 40)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

विट्ठल ! महाराष्ट्र में कष्ट में, दुःखी होने पर लोग प्रायः विट्ठल की ही पुकार करते हैं। मुझे भी इस नाम से कोई कष्ट न था, बल्कि राह चलते यदि इनका मन्दिर दिखता तो हाथ जोड़ देती थी। यह बस तब तक था जब तक विट्ठल नामक ड्राइवर हमें नहीं मिला था। जब से वह मिला तब से इस नाम के साथ अपनी असहायता ही याद आती है। अब तो यह व्यक्ति दिखते ही असली विट्ठल को याद कर लेती हूँ, पुकारती हूँ उसे कि हे प्रभु, रक्षा करना। मुझे पूर्ण विश्वास है कि प्रभु रक्षा करना भी चाहता होगा परन्तु यह विट्ठल, हमारा विट्ठल उनके नेक इरादों पर पानी फेर ही देता है।

हम बहुत ही भयंकर गर्म जगह पर रहते हैं। आस पास जहाँ भी दृष्टि जाए केवल पत्थर, चट्टानें, बंजर जमीन, हरियाली का कहीं नामो निशान ही नहीं है। उस पर वर्ष में आठ महीने गर्मी रहती है। दो महीने बरसात में भी बरसात रुकी नहीं कि मारे गर्मी के भाप के भभके उठते हैं। ऐसे में ऊपर वाले विट्ठल की कृपा से एअर कंडिशंड कार है। परन्तु यह नीचे वाला, हमारा विट्ठल, इसे जैसे गर्मी से प्रेम है। यह ए.सी. का शत्रु है। कार बिल्कुल नई हो या पुरानी, यदि वह उसके हाथ आ जाए तो ए. सी. खराब ही होता है। कभी गैस लीक हो गई है तो कभी कुछ और बहाना, ए.सी. न चलाने का। जबर्दस्ती चलवा भी लो तो जब तक ठंडी हवा में नींद का झोंका आता है और मैं सपने में किसी पहाड़ पर पहुँचती हूँ तबतक टपटप टपकता पसीना मुझे मीठी नींद से उठा देता है। क्या हुआ विट्ठल, ए.सी. क्यों बंद किया पूछने पर वह बहरा बन जाता है या फिर अधिक बार पूछो तो गूँगा या फिर कुछ ऐसा बुदबुदा देता है जो मुझे सुनाई नहीं देता।

फिर जबर्दस्ती ए.सी. चलवाकर एक पुस्तक पढ़ने में खो जाती हूँ। अभी तो कहानी में आनन्द आना भी नहीं शुरू हुआ होता और पसीना चूने लगता है। मैं फिर ए.सी. चलवाती हूँ तो कार रुक जाती है। पूछने पर वह ए.सी. को दोष देकर बताता है कि इंजन गरम हो गया या ऐसा ही कुछ और। मैं हारकर खिड़कियाँ खोल लूं का आनन्द उठाती हुई यात्रा करती हूँ।

यदि ए.सी. चले तो कार की गति कुछ ऐसी होती है कि साइकिल सवार भी उसे पीछे छोड़ जाते हैं। वह कहता है कि ए.सी. चलता है तो कार गति नहीं पकड़ती। अब स्वयं कार चलाना तो आता नहीं सो कुछ कहूँ भी तो कैसे ? प्रायः ए.सी. चलवाने की सजा में स्टेशन पर दौड़ते हुए ट्रेन पकड़ी है। हवाईअड्डे पहुँचने तक विमान उड़ चुका होता है। विट्ठल को क्या कहें, वह सोचता है कि हम विमान भी दौड़ते हुए पकड़ कर उस पर लटक जाएँगे। फिर भी मैं हूँ कि ए.सी. चलवाने की जिद नहीं छोड़ पाती।

एक दिन तो ए.सी. चलवाकर मैं मीठी नींद सो रही थी। यहाँ यह बात बता दूँ कि मुझे अनिद्रा की बीमारी है और यह बीमारी केवल मेरे बिस्तरे व रात के समय तक ही सीमित है। बस, कार, ट्रेन, विमान में बैठते ही मुझे बढ़िया नींद के झोंके आने लगते हैं। हाँ, तो मैं मीठी नींद का आनन्द ले रही थी। अचानक एक झटके से गाड़ी रुकी। जब तक मैं आँखें मलती हुई उठकर देखती कि क्या हुआ है, सामने भीड़ इकट्ठी हो गई थी। विट्ठल जी बड़बड़ा रहे थे, "और चलवाओ ए. सी. ! मुझे ए.सी. में नींद आ जाती है। अब आँख लगेगी तो दुर्घटना तो होगी ही।" मेरे ज्ञान चक्षु खुले, 'अहा, तो यह था ए.सी. न चलाने का रहस्य !' परन्तु रहस्योद्घाटन बहुत देर से हुआ था। हम पूरी तरह से गाँव वालों की भीड़ से घिर चुके थे।

विट्ठल मुझे घूर रहा था जैसे कह रहा हो कि अब निपटो इनसे। वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था। उसकी निश्चिन्तता देख तो यही लगा कि कोई बड़ी दुर्घटना तो नहीं हुई है। भीड़ कार के बॉनेट तक पर सवार थी तो सामने मनुष्य क्या कोई बड़ा जानवर भी घायल नहीं हुआ हो सकता था। मैं कार से उतरी। एक ग्रामीण भीड़ को चीरता हुआ मेरे सामने आया। उसके हाथ में एक लहूलुहान मृत मुर्गी थी। मेरी कन्नड़ टूटी फूटी थी, ग्रामीण की हिन्दी टूटी फूटी थी। सो टूटी फूटी भाषा में स्वर्गवासी मुर्गी के स्वर्गवास पर मैंने दुख प्रकट किया और क्षमा माँगी। फिर मुर्गी का मूल्य लगाया गया।

वह बोला,"पूरे दो सौ रुपए में बेचने वाला था मैं इसे ।"

मैंने कहा,"डेढ़ सौ रुपए में तो मैं एक मुर्गी खरीदती हूँ।"

वह बोला,"मैं तो दो सौ में बेचता हूँ।"

भीड़ बढ़ती देखकर मैंने पर्स में से दो सौ रुपए निकाले और उसे दे दिए। सोचा कि मामला खत्म हो गया। एक बार फिर से क्षमा माँगकर कार में बैठने लगी।

वह बोला,"रोज दो रुपए का अंडा देती थी।"

मैंने कहा,"जब बेचने वाले थे तो अंडे कहाँ से मिलते?"

वह बोला,"छह महीने बाद बेचने वाला था।"

शेष गाँव वाले भी उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे। विट्ठल निर्लिप्त भाव से ऊँघ रहा था। मुर्गी मारी उसने और फँस मैं गई थी। कन्नड़ आती थी उसे और बोल मैं रही थी।

फिर से सौदा शुरू हुआ। ग्रामीण का गणित अच्छा था।

वह बोला,"एक महीने में तीस अंडे।"

मैंने टोका,"कोई मुर्गी रोज अंडे नहीं देती।" आखिर मैंने भी अपने घर में मुर्गियाँ यूँ ही तो नहीं पाली थीं। आज मेरा मुर्गी ज्ञान काम आने वाला था। मैं मन ही मन मुस्काई।

वह बोला,"आपकी मुर्गी रोज अंडा नहीं देती होगी। मेरी तो देती थी।"

मैंने कहा,"ऐसा हो ही नहीं सकता।"

वह बोला,"बिल्कुल होता था। पूछ लो मेरे पड़ोसी से।"

मैंने कहा,"मैं क्यों पूछूँ तुम्हारे पड़ोसी से?"

वह बोला,"क्योंकि लगभग रोज ही यही हमारी मुर्गी का अंडा चुराता था।"

पड़ोसी बोला,"हाँ, बिल्कुल रोज अंडा देती थी। मैं रोज अंडा चुराता था। अब मैं अंडा कैसे चुराऊँगा?"

अंडाचोर पड़ोसी अंडेविहीन भविष्य की कल्पना कर लगभग रोने लग गया था।

मैंने कहा,"जब अंडे चोरी हो जाते थे तो तुम बेचते कैसे थे? तुम्हारी तो कोई हानि नहीं हुई।"

वह बोला,"तो ठीक है, मेरे पड़ोसी की हानि तो हुई। उसको ही पैसे दे दो।"

वह और उसका पड़ोसी हिसाब लगाने लगे।

वह बोला,"एक महीने में तीस अंडे। छह महीने में एक सौ अस्सी अंडे।"

पड़ोसी बोला,"एक महीने में तीस अंडे। दो रुपए के हिसाब से साठ रुपए।"

वह बोला,"दो रुपए के हिसाब से तीन सौ साठ रुपए हुए।"

पड़ोसी बोला,"साठ रुपए महीने के हिसाब से छह महीने के तीन सौ साठ रुपए हुए।"

जब तक मैं उनके बचपन के स्कूल के गणित के अध्यापक को नतमस्तक होती तब तक पड़ोसी मुझसे तीन सौ साठ रुपए झटक चुका था।

मैं कार का दरवाजा खोलने लगी।

ग्रामीण बोला,"मैं उसे दो दिन बाद पकाने वाला था।"

मैंने पूछा,"किसे?"

वह बोला,"मुर्गी को।"

मैं बोली,"उसे तो तुम बेच रहे थे।"

वह बोला,"छह महीने बाद।"

मैंने कहा,"फिर पकाते कैसे?"

वह बोला,"जिन्दा होती तो पका भी सकता था। दो दिन बाद मेरे मेहमान आने वाले हैं। अब उन्हें क्या खिलाऊँगा? अब मुझे दो सौ रुपए में मुर्गी खरीदनी पड़ेगी।"

कार का दरवाजा खोल ही नहीं सकती थी। वह रोके हुए था। कार के अंदर से विट्ठल जी तमाशा देख रहे थे। मुझे तो लग रहा था कि मन ही मन मुस्करा रहा था। मेरी सहायता को बाहर ही नहीं आ रहा था। यह वही विट्ठल था जो सब्जी खरीदते समय तो थैले ना उठाने पड़ें इसलिए आस पास नहीं फटकता था किन्तु यदि कपड़े, जूते, चप्पलों की दुकान के अन्दर जाऊँ या यहाँ तक की बाल कटवाने भी जाऊँ तो परछाई की तरह साथ लगा रहता था। मैंने बेबसी से कार के दरवाजे की तरफ देखा। बिना ए.सी.के ही सही परन्तु कार के अंदर होना कितना सुखद होगा।

हारकर कहा,"दो सौ रुपए भी दूँगी पर पहले अन्दर बैठने दो।"

रास्ता मिला तो ग्रामीण बोला,"पहले दो सौ रुपए दो तभी अन्दर बैठने दूँगा।"

मैंने कहा,"बैठने दोगे तभी दूँगी।"

किसी तरह सुलह कर उसने मुझे एक पैर कार में रखने दिया। मैंने दो सौ रुपए पकड़ा दिए। उसने बड़े आराम से मुस्करा कर धन्यवाद कहा। फिर कार का दरवाजा बन्द करते करते कहा,"मेमसाहब, सबसे पहले अपने ड्राइवर को नौकरी से निकाल देना।"

अहा, क्या बात कही थी! यही जो मेरे वश में होता। विट्ठल था यूनियन का सदस्य। मैं नौकरी से निकाली जा सकती थी विट्ठल नहीं। फिर भी उसकी बात से मैं इतनी खुश हुई कि एक दस का नोट और उसे पकड़ाकर उसे नमस्ते कह दिया।

परन्तु न जाने क्यों मुझे लगा कि विट्ठल और वह दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्करा रहे थे। क्या यह मेरी आँखों का भ्रम था या उन्होंने आँखों ही आँखों में आपस में कुछ बात की थी?

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अँग़ेज़ी हिन्‍दी व गुजराती के प्रसिद्ध साहित्‍यकार जयन्‍ती एम. दलाल से परिचय अनायास ही ई-मेल के माध्‍यम से हो गया। इन्‍टरनेट पर उनके उपन्‍यासों से पूर्व परिचय था। पिछले दिनों वे जयपुर में अन्‍तरराष्ट्रीय साहित्‍यकार सम्‍मेलन में भाग लेने आये थ्‍ो, तो उनसे व्‍यक्‍तिगत परिचय हुआ। विचारों, जानकारियों का आदान-प्रदान हुआ। वे बुजुर्ग साहित्‍यकार है मगर तन और मन से युवा लेखक है। देशी-विदेशी साहित्‍यकारों को उन्‍होनें खूब पढ़ रखा है। गुजराती में उनकी 22 पुस्‍तकें छप चुकी है। जिनमें 14 उपन्‍यास तीन लघु कहानियों के संग्रह व अन्‍य पुस्‍तकें हैं। वे गुजराती के पहले साहित्‍यकार है जिनका उपन्‍यास आखं सगपन आंसूना का अंग्रेजी अनुवाद अमेरिका में 2005 में छपा। इस रचना के प्रमोशन हेतु उन्‍होने अमेरिका, केनाडा, यू.के. की यात्रा की। बाद में यहीं उपन्‍यास भारत में भी छपा इन्‍टरनेट पर भी प्रकाशित हुआ और चर्चित हुआ। उनका दूसरा उपन्‍यास स्‍पेशल इकोज भी अमेरिका तथा भारत में छपा। इन्‍टरनेट पर हजारों पाठकों ने इसे पढ़ा और सराहा।
जयन्‍ती एम. दलाल का एक बेटा लगभग पचास वर्ष से सेरेब्रल पालिसी से पीड़ित है, उसकी सेवा करना ही उनका मुख्‍य ध्‍येय है। वे इसे ईश्वर की सेवा मानते हैं। जयन्‍ती दलाल विज्ञान के स्‍नातक है और व्‍यापार में भी दखल रखते हैं। वे भारतीय प्‍लास्‍टिक संघ के उपाध्‍यक्ष रहे है। भारत में प्‍लास्‍टिक उद्योगों को विकसित करने में उनके योगदान को भारत सरकार ने सराहा हैं। उन पर 20 मिनिट की डोक्‍यूमेंटरी भी बनाकर जारी की गई है।
दलाल का अगला उपन्‍यास ब्‍लीडिंग हाइटस आफॅ कारगिल शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। इस उपन्‍यास में दलाल सीमा पार के आतंकवाद को आधार बनाया है।
स्‍पेशल इकोज नामक उपन्‍यास 514 पृप्‍ठों का है। और इसमें जीवन के विविध पहलुओं को छुआ गया है। इसमें न्‍यूक्‍लियर युद्ध, आतंकवाद की चर्चा है।
ओरडिएल ऑफ इन्‍नोसेसं में दलाल ने शशांक और सुकन्‍या के माध्‍यम मानवीय सम्‍बन्‍धों की गहरी पड़ताल की है। उपन्‍यास अत्‍यन्‍त पठनीय है।
दो दिन तक जयपुर में दलाल से ढेरों बातें हुई। हम दोनो ने जयपुर शहर का भ्रमण भी किया। आतंकवादियों ने जिन स्‍थानों पर बम फोड़े थ्‍ो, हम वहां भी गये। आतंक के अन्‍ध्‍ो युग को आंखों से देखा। सांगानेरी गेट, हवामहल, सिटीपेलेस, जन्‍तर मन्‍तर, गुजराती समाज एम. आई. रोड पर भी गये । खाना भी खाया। घूमे फिरे चर्चाएं हुई। वे प्रसन्‍न वदन जयपुर से गये। उन्‍हे इस बात का मलाल था कि गुजरात साहित्‍य अकादमी ने उनका मूल्‍यांकन नहीं किया लेकिन मस्‍त मौला लेखक से मिलने का जो सुख होता है वो तो मुझे ही मिला।
पचहत्तरवें जन्‍म दिवस पर शुभ कामनाएं।
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यशवन्‍त कोठारी
86.लक्षमीनगर ब्रहमपुरी
बाहर जयपुर . 302002
फो.2670596

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 39)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)


सुबह-सुबह अखबार देखा तो अपने मूड का स्विच ऑफ हो गया। नहीं-नहीं, फिर से वही महँगाई बढऩे वाली खबर नहीं थी। खबर थी- 'देश में भ्रष्टाचार का तेजी से विकास..। भारत विश्व के टॉप-टेन भ्रष्ट देशों में एक''।


''छी-छी, स्साले...भ्रष्टाचार की इतनी हिम्मत! इसको तो मिटाकर ही दम लूँगा।''
मैंने चाय की चुस्कियों के साथ कसम खाई कि 'भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार संघर्ष करूँगा और तब तक चैन से नहीं बैठूंगा और...और जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा न हो जाए, एक पैग से ज्यादा शराब नहीं पीऊँगा। जब तक हमारे जैसे पलन्टू जिंदा हैं, भ्रष्टाचार की खैर नहीं। अबे भ्रष्टाचार, तुझे जलाकर राख कर दूंगा।''


मुझमें नाना पाटेकर टाइप का हौसला आ गया। मेरी चिल्लाहट सुन कर पत्नी दौड़ी चली आई कि मुझे कुछ हो तो नहीं गया।
मैंने पत्नी से कहा- ''देखो डार्लिंग, भ्रष्टाचार तेजी के साथ बढ़ रहा है। इसे खत्म करना है, हाँ। उसे मिटाकर ही चैन मिलेगा। तुम मेरे साथ हो न?''
पत्नी सिर पीटते हुए बोली- ''नाथ, मैं तो जन्म-जन्म से हूँ तुम्हारे साथ, लेकिन भ्रष्टाचार तो बाद में मिटाना, पहले आप घर के मच्छरों को तो मिटाओ।''


मैं भड़क गया-''ओफ्फो....ये क्या तमाशा है? मैं यहाँ राष्ट्रीय समस्या पर बात कर रहा हूँ और तुम हो, कि एकदम से पार्षद टाइप की हरकत करने लगती हो। लोकल मुद्दे पर उतर आयी। मेरा पूरा 'स्टैंडर्ड' खराब कर के रख दिया। आखिर हो न वही झुमरीतलैया वाले रामखिलावन की बेटी। अभी थोड़ी देर बाद मैं ग्लोबल-वार्मिंग जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर आने वाला था। धत् तेरे की। पूरा 'मूडई' चौपटा गया। तुम औरतों की वस यही समस्या है-मच्छर,खटमल और टीवी सीरियल। थोड़ी देर बाद कहोगी पहले जल संकट मिटाओ, फिर कहोगी महंगाई कम करो, बाद में भ्रष्टाचार मिटाना। हुंह। मैं तो पहली प्राथमिकता भ्रष्टाचार मिटाने को ही दूँगा।''


पत्नी ने मुँह बिचका कर सब्जी का झोला थमा दिया। मार्केट जाने के पहले मैंने अपने डैडी से भी भ्रष्टाचार के बढऩे पर गहन चिंता जताई। उन्होंने शुभकामना दी कि इस जनम में ही भ्रष्टाचार मिटाने में भगवान तुम्हें सफलता प्रदान करें। थोड़ी देर बाद बेटा स्कूल से लौटा तो मैंने उसको भी बताया कि ''बेटे, देखो, भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है। उसके खिलाफ लड़ाई लडऩी है। हम नहीं लड़ेंगे तो बताओ न, कौन लड़ेगा। अपने बाप से कभी झूठ नहीं बोलना।''


बेटा कभी मुझे, कभी अपनी माता को देखता रहा, उसका इशारा मैं समझ रहा था, कि वह कहना चाहता है, कि पिताजी के साथ कोई मेंटल प्रॉब्लम तो नहीं शुरू हो गया। खैर, मैंने उसके इशारे को अनदेखा कर दिया। फिर मैंने बेटे को हिदायत दी कि ''देखो, किराना दूकान वाला आए तो साफ-साफ कह देना डैडी आऊट ऑफ स्टेशन हैं। दो-चार बाद आयेंगे।''


रास्ते भर मैं भ्रष्टाचार को खत्म करने के बारे में ही सोचता रहा। मेरी आदत है। जब किसी बात की धुन सवार हो जाती है, तो उसी को लेकर सोचता रहता हूँ। उस दिन सोचा कि ऑफिस-गर्ल को अपने वश में करना है। बस, कुछ दिन लगे और सफल हो गया। 


दफ्तर में घुसने के पहले ही दो कुलीग मिल गए पान ठेले पर। हम भी पहुँच गए। पहले चाय पी फिर पान चबाकर इधर-उधर घूमते रहे। बीच-बीच में भ्रष्टाचार के तेजी के साथ बढऩे पर चिंता भी जताई।
सारे मित्रों ने कहा- ''बिल्कुल ठीक कह रहे हो यार। इस भ्रष्टाचार को समाप्त करना हम सबका परम कर्तव्य है। अच्छा, यो तो बताओ कि कल ठेकेदार रामभरोसे आया था न, उसके टेंडर का क्या हुआ?''
मैंने मुसकराते हुए कहा- ''भाई, अगर हमको कुछ दान-दक्षिणा दे दे तो उसी का टेंडर पास करवा देंगे। वो साला तो आज आया ही नहीं।'' 


मित्र ने मुसकराते हुए बताया- ''चिंता मत करो, ठेकेदार तुम्हारे पैसे जमा कर गया है।''
मैंने कहा- ''मतलब, अगला कुछ-कुछ ईमानदार है। ठीक है, तब तो उसका काम करना ही पड़ेगा। वरना यह भ्रष्टाचार हो जायेगा। और मैं ठहरा भ्रष्टïाचार विरोधी। मैं इस भ्रष्टाचार को मिटाकर रहूंगा। तुम लोग मेरा साथ दोगे न?''


सारे मित्रों ने सिगरेट हाथ में लेकर कसम खाई- ''हाँ, हम भ्रष्टाचार मिटाने में तुम्हारा साथ देंगे।''
मुझे राहत मिली। भ्रष्टाचार की लड़ाई में मैं अकेला नहीं हूँ।  मेरे दोस्त भी मेरे साथ हैं।


मैं दफ्तर में घुसा और रोज की तरह अपनी कुर्सी पर बैठकर जासूसी उपन्यास 'ये लहू किसका है' पढऩे लगा। बहुत ही प्यारा उपन्यास है। कभी आप भी पढ़ें। पढऩे की मेरी आदत है। एक बार जो भी जासूसी या सैक्सी उपन्यास हाथ में लेता हूँ तो उसे पूरा करके ही दूसरे काम निपटाता हूँ। सिद्धांत मतलब सिद्धांत। उसमें कोई समझौता नहीं कर सकता। दफ्तर में लोग आते रहे, मैं सबको टरकाता रहा। पाँच बजा तो उपन्यास के पृष्ठ को मोड़कर रख दिया। उठ खड़ा हुआ। इसे कहते हैं समय की पाबंदी। समय की पाबंदी ही सफलता की कुंजी है।


दफ्तर के बाहर निकला, चाय पी। सिगरेट के दो-चार कश मारा और घर की तरफ रवाना हो गया।
मैं आज काफी खुश था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मैं जो लड़ाई छेडऩा चाहता हूँ, उसमें कई लोग मेरे साथ हैं अब तो भ्रष्टाचार दम तोड़कर ही रहेगा। रास्ते में कांजी हाउस, नहीं-नहीं....कॉफी हाऊस पड़ गया। वैसे काफी हाउस और काँजी हाउस में ज्यादा फर्क नहीं होता। कांजी हौस में आवारा पशुओं को पकड़ कर लाया जाता है और कॉफी हाउस में लोग अपने आप चले आते हैं। अपनु को सुबह-शाम यहाँ एक-दो घंटा बैठने का पुराना रोग है। काहे कि यहाँ दो-चार ठलहे किस्म के क्रांतिवीर बैठे मिल ही जाते हैं। आज भी मिल गए।


हमने पहले अपने आँखें मार-मार कर आस-पास की महिलाओं की चरित्र हत्याएँ कीं, फिर अश्लील साहित्य पर विचार-विमर्श किया। अचानक मुझे याद आया कि मुझे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩी है। मैंने जोर-जोर से टेबल ठोंकते हुए कहा- ''दोस्तो, मैं एक न एक दिन भ्रष्टïाचार को खत्म करके रहूँगा। तुम लोग मेरा साथ दोगे न?''


मित्र-मंडली हँसते हुए बोली- 'अबे, हम लोग तो हमेशा तुम्हारा साथ देते हैं। तुम्हारे बॉस की चरित्र हत्या करने के लिए परचे किसने तैयार किए थे? हमने..। याद करो, तुमने कालू सेठ का काम किया था और जब वह पैसे नहीं दे रहा था, तो उसको हड़काकर  वसूली का काम किसने किया था, हमने। तो हम तुम्हारे यार हैं। अच्छा, ये तो बताओ, आज हमारी कॉफी का बिल तुम ही पेमेंट करोगे न? करोगे तो हम तुम्हारा साथ फिर देंगे।''


मेरे पास पर्याप्त मात्रा में ऊपर की कमाई थी, सो थोड़ी-बहुत जनहित में खर्च करनी ही पड़ी। यही सामाजिक नैतिकता है, सदाचार है। शिष्टाचार है। समाजवादी सिद्धांत है, कि मिल-बाँटकर खाओ। रिश्वत का पैसा अकेले हजम करो, यह भ्रष्टाचार है। मैं ऐसे भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हूँ।
मित्रों को कॉफी पिलाने के बाद मैं और खुश हुआ कि अब तो इतने सारे लोग एकजुट हो गए। अब भ्रष्टाचार बच के कहाँ जायेगा। मैं इस पट्ठे की जान लेकर ही रहूँगा।
अब तो आपको यकीन हुआ न, कि इस धरा पर कोई तो वीर है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩा चाहता है। आमीन।

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गिरीश पंकज
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
जी-३१,  नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 38)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

अनीता मिश्रा

दोस्तों ये कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। ये कानपुर के राम नारायण बाजार में रहने वाले राधेश्याम जी के जीवन का दर्द है.. मुझे तो बड़ी तकलीफ हुई उनकी कहानी जानकार, सोच रही हूँ आपको भी सुना दूं....... यद्यपि राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया (बकौल उनकी माता जी .... चने चबाते-चबाते कब राधे हुई गए पता ही नहीं चला तबसे उनका नाम राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया है।)

हालांकि राधे भइया ने कहा है कि मैं भले ही लेखिका हूँ पर उनकी कहानी किसी को न बताऊँ क्योंकि ''सुनि इठिलैहैं लोग सबै, बांट लहै न कोय....... लेकिन सिर्फ लेखिका होती तो न बताती, स्त्री भी तो हूँ कैसे हजम कर जाऊँ अकेले, बिन बताए मुझे चैन कहाँ ..... पर आपको कसम हैं जो राधेश्याम जी की दस्तान आपने किसी को बताई।

तो .............. दोस्तों किस्सा ये है कि जब राधेश्याम जी ने ''सच का सामना'' टी0वी0 पर देखा तो उससे इतने प्रभावित हो गये कि उन्हें लगा जीवन में व्यक्ति को सिर्फ सच ही बोलना चाहिए ... हैरानी की बात है वेद, पुराण भी तो यही कहते हैं लेकिन राधे जी की समझ में ये बात टीवी देखकर आई ... (अपरम्पार महिमा मीडिया की....) खैर, सच का सामना से प्रभावित राधे जी ने पहला सच बोलने का बीड़ा उठाया और अपनी पत्नी को बताया कि उनके मायके जाने पर काम वाली झुमकी के एक दफा स्तन दबाये थे...... अब इसके पहले झुमकी, राधे उर्फ चब्बन भइया की झाडू उठा के मिट्टी पलीद करती, उन्होंने पांच सौ का नोट झुमकी को थमा दिया। जरूरतमंद झुमकी चब्बन भइया की इस हरकत को चबा गई। लेकिन सच सुनते ही पत्नी ने चंडिका का रूप धारण कर लिया उन्हें राधे भइया की हरकत से ज्यादा पांच सौ के नोट के जाने का गम था। उन्होंने अपने पति परमेश्वर को सारी चुनिन्दा गालियां दे डालीं। उनका प्रकोप हजार का नोट लेकर ही शान्त हुआ।

राधेश्याम जी समझ गये कि सच महंगा है। पर उन पर एक जुनून तारी था और उन्होंने सोच लिया था कि सच बोलने के रास्ते में कितनी भी कठिनाइयां आएं वो डिगेगें नहीं। राधेश्याम जी सच के सिवा कुछ नहीं बोलेंगे ये बात जल्दी ही सारे मुहल्ले में फैल गई ............ तो हुआ ये कि नगर निगम चुनाव होने वाले थे और लोगों को लगा कि स्वच्छ, साफ और बेदाग होने की ओर अग्रसर राधे भइया को चुनाव में खड़ा कर दिया जाये।

राधेश्याम जी धक्का देकर लोगों द्वारा सभासदी के चुनाव में खड़े कर दिए गये। चतुर चंट मीडिया वालों ने उनसे अजीब प्रश्न किए और उन्होंने ऐसे सच्चे जवाब दिए कि चुनाव परिणाम आने पर पता चला राधे उर्फ चब्बन भइया भारी बहुमत से पराजित हुए हैं। झूठ की एडिक्ट जनता चब्बन भइया का सच नहीं चबा पाई।

खैर, सच का रास्ता कांटों भरा है ये बात राधेश्याम भइया समझ गये थे लेकिन उन्होंने प्रण किया था कि सिर्फ सच ही बोलेंगे सो अब तक जोश कम नहीं हुआ था। यहां तक कि मुहल्ले के लड़के उन्हें चब्बन के बजाय *तिया कहने लगे थे पर उनके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा।

राधेश्याम जी की परचून की दुकान तो चुनाव के चक्कर में बंद हो गयी थी तो उन्हें अब एक पान मसाले की व्यापारी के यहां मुनीमगिरी की नौकरी करनी पड़ी।

अब वहां पान मसाले में क्या-क्या मिलावट होती है, घटिया कत्था, सुपारी किस तरह मसाले में मिलाए जाते हैं, सारे राज फाश राधेश्याम जी बाहर खोलने लगे.......नौकरी तो जानी ही थी... पर राधे उर्फ चब्बन भइया को खुद पान मसाला चबाने से घृणा हो गयी उन्होंने इसके बाद सड़क-दीवारें पीक से रंगीन करना बंद कर दिया।

राधेश्याम जी की आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है। रिश्ते नौकरी सब छूट रहे हैं। मुहल्ले वाले अलग तफरीह करते हैं। टीन एजर्स उन्हें मि॰एस॰एच॰ (सत्यवादी हरिश्चन्द्र) कहकर चिढ़ाते हैं। बीबी के तानों से उनका दम घुटता रहता है। दोनों बेटे नफरत से देखते हैं।

अब राधे उर्फ चब्बन भइया करें तो क्या करें मुझे तो नहीं समझ में आ रहा कि उन्हें क्या सलाह दूं। आपको कुछ सूझ रहा हो तो बताइए, उन्हें बता दूंगी कि आजकर जीने का सही सलीका क्या है। मैंने सिर्फ इतना कहूंगी ............ ऐ मूरख, तुझे जीने का सलीका ही नहीं,

सच छुपाने के लिये है, या बताने के लिये।

अब आप कहेंगे कि राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया की कहानी में गुलजार (ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी) जी कहां से आ गए। हुया ये कि सर्दी के मौसम में हमें वो अपनी दास्तान सुनाने निकले थे उस वक्त धूप थी सो सच्चाई के जुनून से भरे राधे भाई ने स्वेटर नहीं पहना। कुछ ही देर बाद बदली छा गई, ठंडी हवा चलने लगी, तो कांपते हुए राधे भइया बोले, देखा बहन जी सच्चाई का साथ ऊपर वाला भी नहीं देता ससुरी ठंडी हवा भी अभी चलनी थी।

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