शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

सतीश वर्मा की कविताएँ

सतीश वर्मा ने अपने कई काव्य संग्रह प्रकाशित किये हैं बड़ी उग्र और नितान्त मौलिक शैली में। आपको आघात लगता है, रोष उत्पन्न होता है और हिंसा क...

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

असग़र वजाहत का संस्मरण - 'फ़ैज' पर कुछ अलग ढंग से

असगर वजाहत का एक संस्मरण ई-बुक पर पढ़िए उनकी अपनी ही हस्तलिपि में - 'फ़ैज' पर अलग ढंग से -

संजय दानी की ग़ज़ल - बस प्यार है

  प्यार बस प्यार है प्यार बस प्यार है दोस्तों, ज़ीस्त का सार है दोस्तों। चांदनी बेवफ़ा है अगर, चांद की हार है दोस्तों । मुल्क में मूर्खों ...

उमेश कुमार चौरसिया की लघुकथाएँ

लघु कथा 1 : -( संदर्भ गुर्जर आन्‍दोलन) संवेदना आज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश-भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍...

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत

      जैसे को तैसा   उस दिन सुबह दादाजी भोर भ्रमण को निकल पड़े , बहुत तेज चलते जाते थे जैसे जाते उड़े उड़े |   बीच सड़क एक कुत्ता आया उन्हें देख...

विजय वर्मा के हाइकु

विषमता की खाई बढ़ गयी है विषमता की खाई राम दुहाई . दहेज़ बिना उठी ना डोली,तब ज़हर खाई . भोजन नहीं घर जिसके,लाये कैसे दवाई.? तंग हाल में र...

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

वेद प्रताप वैदिक का आलेख - संदर्भ बिनायक सेन अदालती फ़ैसला : कामरेडों का फ़िजूल रोदन

अदालत को बिनायक सेन के बारे में जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवा...

कुछ उम्दा कविताएँ

—निरंजन कुमार ‘निराकार’, रतलाम जरूरत के जबड़े में आदमी के सामने— जरूरत का विशाल पहाड़ खड़ा है। आदमी परेशान है जरूरत की एक पूर्ति के बाद ...

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

असग़र वजाहत का नया कहानी संग्रह - यही तो डेमोक्रेसिया है, भइया

लोकप्रिय कथाकार असग़र वजाहत का नया कहानी संग्रह है - यही तो डेमोक्रेसिया है भइया . इस कथा संग्रह की एक ख़ास कहानी दिल की दुनिया आप पढ़ें ई...

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो हास्य-व्यंग्य कविताएँ

भाग्य विधायक ‌ नेता गुंडा दादा तस्कर और पर पीड़ा दायक ‌ इन ‌ पांचों तत्वों से मिल ‌ कर ‌ बनता भाग्य विधायक ‌   इसी कड़ी में कुछ ‌ विशिष्ट ...

नागेश पांडेय 'संजय' का गीत - कौन आया

कौन आया ?   द्वार पर आहट हुई है, देख तो लो, कौन आया ?   तड़पते मन की कसक की गंध शायद पा गया वह, उसे आना ही नहीं था मगर शायद आ गया वह...

रविवार, 26 दिसंबर 2010

डी.एल. खन्‍ना ‘प्‍यासा' की कविताएँ

तलाक प्रश्न चिन्ह जब सम्‍बंधों पर लग जाते हैं, सात जन्‍म के जीवन साथी पल में दूर चले जाते हैं। शंका के अंकुश से उपजे, बीज कहां फल पाते हैं।...

देवी नागरानी की दो ग़ज़लें

ग़ज़लः 100   पहचानता है यारों, हमको जहान सारा हिंदोस्ताँ के हम है,  हिंदोस्ताँ हमारा   यह जंग है हमारी, लड़ना इसे हमें है यादें शहादत...

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : जाते वर्ष की यादें

जाता हुआ बरस बहुत सी यादें छोड़ कर जा रहा है। सरकार ने नित नये घोटाले दिये, और सब कुछ बस ऐसे ही चलता रहा। सरकार है यह अहसास भी खतम हो गया। ...

प्रमोद भार्गव का आलेख - भूमि की बिगड़ती सेहत

हमारे देश में रोटी और रोजगार का सबसे बड़ा संसाधन बनी भूमि की गुणवत्ता अथवा उसकी बिगड़ती सेहत को जांचने का अब तक कोई राष्‍ट्रव्‍यापी पैमाना ...

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल - तेरे तसव्वुर ने किया पागल मुझे

तेरे तस्व्वुर ने किया पागल मुझे, कोई दवा भी है नहीं हासिल मुझे। किरदार मेरा हो चुका दरवेश सा, अपनी  ग़मों की पहना दे पायल मुझे। ज़ख्मों की ...

विजय वर्मा की कविता - जाड़े की धूप है, जरा सेंकने दीजिए...

देखने दीजिये. इंसानियत के ख्वाब हैं, देखने दीजिये जाड़े की धूप है ,जरा सेंकने  दीजिये.   हम तो आज सच बात ही कहेंगे, लोग पत्थर फेंकते है, फ...

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ और गीत

बरखा तेरे कितने रूप नभ के आँचल से पानी की फुहार जब, धरा को अपने आगोश में, लेती है,तो बरखा कहलाती है, बरखा कई रूपों में आती है!  ...

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - नारी! तुम ये सब कैसे सह लेती हो!

  अपने ही घर में अपमानित हो कर, तुम कैसे रह लेती हो, दिन में कई बार तिरस्कृत होती हो,ये सब कैसे सब हेती हो!   अपने नर्म हाथों से रोटी बनात...

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

प्रमोद भार्गव का आलेख : विकीलीक्‍सः विचार बनती तकनीक

विकीलीक्‍स द्वारा अमेरिका जैसे शक्‍तिशाली देश से जुड़ी एक साथ ढाई लाख गोपनीय सूचनाओं को उजागर करने की घटना को एक ऐसे विचार के रूप में देखने...

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - मैंने भी वर्जिश की

मैंने भी वर्जिश की यशवन्‍त कोठारी आखिर मुझे गुस्‍सा आ ही गया, सहनशक्‍ति की भी हद होती है, रोज-रोज सवेरे उठते ही पत्‍नी टोकती है, तुम्‍हार...

गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ, दोहे, पहेलियाँ

दोहे         ------ पहरे जबसे दे रहे, लोहे के इंसान। राहजनी करने लगे,सड़कों के ईमान ।। रहना मुश्किल है बहुत, छोड़ें कैसे गाँव। छालों से लबरेज़...

राकेश शर्मा की कविता - ओ गौरैया

  ओ गौरैया..... ओ गौरैया नहीं सुनी चहचहाहट तुम्हारी इक अरसे से ताक रहे ये नैन झरोखे कुछ सूने और कुछ तरसे से। फुदक फुदक के तुम्हारा हौले स...

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

रामशंकर चंचल की लघुकथा - अलाव

लघुकथा अलाव —डॉ. रामशंकर चंचल, झाबुआ बरसाती सर्द रात, साँय—साँय करते वीरान जंगल, ऊँची पहाड़ियों पर बसी झोपड़ियों में निवास करते भोले—भाले आद...

रामप्रताप गुप्ता का आलेख - देश में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा

देश में बुजुर्गौं की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा —डॉ. रामप्रताप गुप्ता, उज्जैन समय के साथ—साथ चिकित्सा सुविधाओं और पोषण स्तर में बेहतर...

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

जयकुमार जलज की लघुकहानी : हासिल

लघुकहानी हासिल — डॉ. जयकुमार जलज, रतलाम उस तरफ नाला और उजाड़ मैदान होने से गली बंद हो गई थी। लोगों ने काँटेदार तार लगाकर उसे और भी बंद कर लिय...

विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : हम गधे हैं

हम गधे हैं. हमारे देश आकर सबके उल्लू सधे हैं, हाँ ,जी ,हाँ !हम गधे हैं.   'अंकल सैम'भी आयें अपना व्यापार बढ़ाएं जबतक W T C नहीं ग...

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत

भ्रष्ट तंत्र को मार भगाओ सड़क सड़क पर गिट्टी गिट्टी गली गली में मिट्टी मिट्टी देखो मेरे गाँव में आकर नहीं एक भी सड़क है पक्की| नेता आते वोट मा...

मुक्तक पंड्या की कविता - चलो सब मिलकर काम करें

चलो सब मिलकर काम करें मुक्तक पंड्या कक्षा 8 चलो सब मिलकर काम करें। पेड़ लगाकर तापमान का काम तमाम करें!! ओज़ोन परत हो रही क्षीण औ’बढ़ा रही ह...

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता - नटों के लिए नहीं आया फरमान

नटों के लिए नहीं आया फरमान , अधूरे रह गये बस सभी अरमान , खेल प्रतिभा को नहीं मिली पहचान , जिन्‍दगी ठोकर खाने को हलकान , किलों की फतह के...

नागेश पांडेय ‘संजय’ का गीत - जाने कितनी छवियों से संपृक्त लगी हो तुम!

गीत जाने कितनी छवियों से   जाने कितनी छवियों से संपृक्त लगी हो तुम! गरम थपेड़ों में तुम मुझको शीतल हवा लगीं, रोगग्रस्त जब हुआ, मुझे तुम म...

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