February 2010

यशवन्त कोठारी का होली विशेष आलेख - कामदेव के वाण और प्रजातंत्र के खतरे

     होली का प्राचीन संदर्भ ढूंढने निकला तो लगा कि बसंत के आगमन के साथ ही चारों तरफ कामदेव अपने वाण छोड़ने को आतुर हो जाते हैं मानो होली क...

राकेश शर्मा का व्यंग्य : कोई जूते से ना मारे मेरे दिवाने को

जूते का मानव सभ्यता से बड़ा गहरा संबंध रहा है । कहते हैं कि किसी जमाने में किसी नाजुक बदन और तुनक मिजाज़ राजा को बागिचे में टहलते हुए कांटा...

हरेन्द्र रावत की कविता : जुदाई

चलो अब चलते है हम बिच्छू डटे हैं, थोड़ा सा हंसकर थोड़ा रो लेते हैं, तुम्हें तो जाना है लंबे सफ़र में, मुझे यहीं रहना है, कह दो तुम ...

विवेक रंजन श्रीवास्तव का रेडियो नाटक : लाल सलाम

रेडियो नाटक लाल सलाम ... ! लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव   अवधि ३० मिनट लगभग पात्र परिचय ...

डंडा लखनवी की हास्य रचना : लदी जो जेवरों में नित टहलती है निडर हो कर, किया जब खोज तो एस.पी. सिटी की फैमली निकली।।

हास्य           भयानक खलबली  निकली                -डा0 डंडा लखनवी    मुखौटा देख कर  उसका, अचानक खलबली  निकली। मेरी तकिया के नी...

ब्लॉग जगत के ग़ज़ल गुरू पंकज सुबीर को ज्ञानपीठ पुरस्कार

बहुमुखी प्रतिभा के धनी, हिन्दी ब्लॉग जगत के लोकप्रिय ग़ज़ल गुरू – माट्साब – पंकज सुबीर को उनके उपन्यास ‘यह वो शहर तो नहीं’ पर ज्ञानपीठ का...

सतीश कुमार चौहान का आलेख - महंगाई

मंहगाई दस पैसे कप चाय तीस पैसे का दोसा से दादाजी का नाश्‍ता हो जाता था आज ये सच्चाई जितनी सुखद लगती है, उतनी ही दुखद लगती है कि हमारा ...

अशोक गौतम का व्यंग्य - साहित्य में दस्युवाद!

  खुद को पता नहीं आज फिर क्यों खुशी देख बल्लियां उछल रहा था कि वे सामने से चेहरा लटकाए आते दिखे तो आधी खुशी हवा हो गई। आजकल अपनी खुशी...

श्वेता सुधांशु की कविता : मैं

मैं कभी-कभी लगता है जैसे मैं, मैं नहीं और यह कैसा इत्तफ़ाक़ हैं कि ऐसा तब होता हैं जब मैं पूरी तरह से होती हूँ-'मैं'. ...

आर. के. भारद्वाज की दो कविताएँ

तलाश मुझे तलाश है, न आग की, न पानी की न धूप की, न छांव की सिर्फ एक अदद गांव की, लहलहाती फसलें हो, सोना उगलते खेत कलकल ब...

संजय ग्रोवर का व्यंग्य : पौट्टू जी का दूसरों से प्रेम

पौट्‌टू जी खासे प्रगतिशील आदमी थे। प्रगतिशील इसलिए कि उन्‍हें लगता था कि प्रगतिशील दिखना अच्‍छी बात है। इसलिए भी कि प्रगतिशीलता का फैशन ह...

गिरीश पंकज का व्यंग्य : रामलुभाया…बजट आया

रामलुभाया जाग। छोड़ आलस का राग। देख बजट आ गया। क्या तुझे भा गया। नहीं भाया तो भायेगा। बेटे, बच कर कहाँ जाएगा? अरे, देश का ...

कृष्ण मुरारी प्रसाद का व्यंग्य : साहब

साहब  कोई काम नहीं करते हैं , उन्हें केवल आदेश देना होता है. साहब के सारे काम उनके मातहतों को करना होता है चाहे वो ऑफिस का काम हो या घर क...

रामभरोसे मिश्र की समीक्षा : राजनारायण बोहरे का उपन्यास - मुखबिर

समीक्षा- चम्‍बल का प्रमाणित आख्‍यान-मुखबिर चम्‍बल घाटी का नाम फिल्‍मी दुनिया से लेकर लोकप्रिय साहित्‍य तक और राजपथ से जनपथ तक ; डकैतों...

गिरीश पंकज का व्यंग्य : शाम को उसे ‘टच’ मत करना

बहुत दिनों से इच्छा थी कि  गपोडूराम के घर  जा कर  मिलूँ, कुछ बतियाऊं. कुछ उसकी सुनूं, कुछ अपनी सुनाऊँ, लेकिन टीवी देखने से मुझे फुरसत म...

हरिहर झा का आलेख : बूमरैंग – ऑस्ट्रेलिया से कवितायें

  १५ जनवरी २०१० को दिल्ली के स्थानीय हिन्दी भवन सभागार में ऑस्ट्रेलिया के अप्रवासी भारतीय कवियों की कविताओं का संग्रह ’बूमरैंग’ का लोकार्...

वीरेन्द्र जैन का संस्मरण : बैंकिंग जैसी ज़रूरी सेवा में मानवीय सम्बन्ध बदले हैं

मैंने सन 1971 में जिस बैंक मैं नौकरी शुरू की थी उसका नाम हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक था जो आज़ादी के पूर्व एक बड़ा बैंक हुआ करता था किंतु देश...

शीबा असलम फ़हमी का आलेख – जेंडर जिहाद : शरीअत का हौआ

( शीबा का ब्लॉग – खयाल यहाँ पढ़ें)   जेंडर जिहाद शरीअत का हौआ परदा इधर : परदा उधर शीबा असलम फ़हमी [शीबा असलम फ़हमी का अत्यं...