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February 2010
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   होली का प्राचीन संदर्भ ढूंढने निकला तो लगा कि बसंत के आगमन के साथ ही चारों तरफ कामदेव अपने वाण छोड़ने को आतुर हो जाते हैं मानो होली की पूर्व पीठिका तैयार की जा रही हो । संस्कृत साहित्य के नाटक चारूदत्त में कामदेवानुमान उत्सव का जिक्र है, जिसमें कामदेव का जुलूस निकाला जाता था । इसी प्रकार 'मृच्छकटिकम्' नाटक में भी बसंतसेना इसी प्रकार के जुलूस में भाग लेती है ।
   एक अन्य पुस्तक वर्ष-क्रिया कौमुदी के अनुसार इसी त्योहार में सुबह गाने-बजाने, कीचड़ फेंकने के कार्य संपन्न किये जाते हैं । सायंकाल सज्जित होकर मित्रों से मिलते हैं । धम्मपद के अनुसार महामूखरें का मेला मनाया जाता है । सात दिनों तक गालियों का आदान-प्रदान किया जाता था । भविष्य पुराण के अनुसार बसंत काल में कामदेव और रति की मूर्तियों की स्थापना और पूजा-अर्चना की जाती है । रत्नावली नामक पुस्तक में मदनपूजा का विषद है । हर्ष चरित में भी मदनोत्सव का वर्णन मिलता है ।
  

मदनोत्सव


   पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी 'प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद' पुस्तक में मदन पूजा का वर्णन किया है ।
   दशकुमार चरित्र नामक पुस्तक में भी मदनोत्सव का वर्णन किया है । इस त्योहार पर राजा और आम नागरिक सभी बराबर हैं ।
   संस्कृत की पुस्तक कुट्टनीमतम् में भी गणिका और वेश्याओं के साथ मदनोत्सव मनाने का विशद वर्णन है ।
   मदनोत्सव का वर्णन कालिदास ने भी अपने ग्रंथों में किया है । ऋतुसंहार के षष्ठ सर्ग में कालदास ने बसंत का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है । कुछ उदाहरण देखिए-
   इन दिनों कामदेव भी स्त्रियों की मदमाती आंखों की चंचलता में, उनके गालों में पीलापन, कमर में गहरापन और नितंबों में  मोटापा बनकर बैठ जाता है ।
   काम से स्त्रियां अलसा जाती हैं । मद से चलना बोलना भी कठिन हो जाता है और टेढ़ी भौंहों से चितवन कटीली जान पड़ती है ।
   मदनोत्सव ही बाद में शांति निकेतन में गुरूदेव के सान्निध्य में दोलोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा । कृष्ण ने रासलीला के रूप में इस उत्सव को एक नया आयाम दिया । हर गौरी राधा बन गयी । आधुनिक काल में होली का स्वरूप बिगड़ गया है मगर फिर भी होली हमारी सांस्कृतिक विरासत और लोक संस्कृति का एक प्रखर नक्षत्र है ।
   मदनोत्सव, बसंतोत्सव, कामदेवोत्सव ये सभी हमारे लोकानुरंजन के लिए आवश्यक थे, हैं और रहेंगे ।
  

बौराया तन और मन


   प्राचीन भारत में मदनोत्सव के समय रानी सर्वाभरण भूषिता होकर पैरों को रंजित करके अशोक वृक्ष पर हल्के से बायें पैर से आघात करती थी और अशोक वृक्ष पर पुष्प खिल उठते थे । चारों तरफ बसंत और कामोत्सव की दुंदुभी बज उठती थी । कामदेव के डाकिये सब तरफ बसंत और फाल्गुनी हवाओं की पातियां बांट देते हैं और तन-मन सब बौरा जाता है ।
   खेतों में गेहूं, जौ, सरसों की बालियों में निखार आने लगता है और गांव की गोरी के गालों पर रस छलकने लगता है । और गुलमोहर तथा सेमल का तो कहना ही क्या सब पत्ते (कपड़े) फेंकफांक कर मदनोत्सव की तैयारी में जुट जाता है । मौसम के पांव धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं और छा जाती है एक नयी मस्ती, उल्लास, उमंग और उत्सवप्रियता । प्राचीन भारत का कामोत्सव, मदनोत्सव, बसंतोत्सव और कौमुदी महोत्सव सब एक ही नाम के पर्यायवाची है । रंग ही रंग, उमंग ही उमंग, बौराना मगर यह सब कहां चला गया । सांप्रदायिकता का जहर होली को भी लील गया । मगर क्या उल्लास का स्वर या उमंग का आनंद कभी दब पाया है ? शायद हां..... शायद नहीं ? कामदेव के वाण हों या प्रजातंत्र के खतरे सब झेलने ही पड़ते हैं ।
   सम्राट हर्ष ने अपने नाटक रत्नावली तथा नागानंद में ऋतु-उत्सव यानि मदनोत्सव का विशद वर्णन किया है । वाल्मीकी रामायण में भी बसंतोत्सव का वर्णन मिलता है । कालिदास इसे ऋतु-उत्सव कहते हैं । नागानंद नामक नाटक नें एक वृद्धा के विवाह का विशद और रोचक वर्णन किया गया है ।
   दंडी ने अपने नाटक दशकुमार चरित में कामदेव की पूजा के लिए आवश्यक ऋतुओं को बताया है । पुस्तक के अनुसार प्रत्येक पति एक कामदेव है तथा प्रत्येक स्त्री एक रति । वासवदत्ता नामक नाटक में सुबंधु ने बसंत के आगमन की खुशी में राजा उदयन तथा राजकुमारी वासवदत्ता के माध्यम से बसंतोत्सव का वर्णन किया है । राजशेखर की काव्य-मीमांसा में भी ऋतु वर्णन है । यदि इस अवसर पर झूले डाले जाएं तो महिलाएं झूलकर शांत हो जाती है ।
   संस्कृत के अन्य ग्रंथो में इन अवसरों पर हास-परिहास, नाटक, स्वांग, लोंक नृत्य, गीत आदि के आयोजनों का भी वर्णन किया है । रास नृत्य का भी वर्णन है । गायन, हास्य, मादक द्रव्य और नाचती गाती, खेलती, इठलाती रूपवती महिलाएं । और सीमित समय । जो समय सीमा से मर्यादित था । सबसे बड़ी बात यह है कि निश्छल-स्वभाव और आनंद था । आज की तरह कामुकता का भौंडा प्रदर्शन नहीं ।
 

श्रृंगार की प्रधानता


   मदनोत्सव का वर्णन केवल साहित्यिक कृतियों में ही हो ऐसा नहीं है । मूर्तिकला, चित्रकला, स्थापत्य आदि के माध्यमों से भी कामोत्सव का वर्णन किया जाता था । ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ही इस प्रकार की मूर्तियों के निर्माण की जानकारी है । राधा-कृष्ण के प्रेम के चित्र तथा होली और बसंतोत्सव के चित्र मन को मोहते हैं । इसी प्रकार बाद के काल में मुगल शासन के दौरान भी चित्र कलाओं में श्रृंगार प्रधान विषय रहा है । उस जमाने में हर रात बंसत थी और यह सब चलता रहा, जो अब जाकर होलिका या होली बन गया । कामदेव के नामों में मदन, मन्मथ, कदर्प, प्रधुम्न, अनंग, मकरध्वज, रतिपति, पुष्पधन्वा, रतिनायक प्रमुख हैं । यूनान में ये क्यूपिड है ।
   वास्तव में काम संपूर्ण पुरूषाथरें में श्रेष्ठ है । प्रत्येक नर कामदेव और प्रत्येक नारी रति है । आधुनिक स्त्री-पुरूषों के संबंधों के व्याख्याता शायद इस ओर ध्यान देंगे ।
   आखिर बीच में कौन-सा समय आया जब काम (सेक्स) के प्रति मानवीय आकर्षण को वर्जनाओं के अंतर्गत एक प्रतिबंधित चीज मान लिया गया । उन्मुक्त वातावरण और उन्मुक्त व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचार और कुंठाओं ने ले लिया ।
   संपूर्ण प्राचीन भारतीय वाड्ंगमय काम की सत्ता को स्वीकार करता है और जीवन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को मानकर जीवन जीने की सलाह देता है । शरदोत्सव में काम और रति की पूजा का विधान है । राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह के एक लेख के अनुसार कामदेव की उपासना नहीं करने से कामदेव के श्राप के कारण जीवन नरक हो जाता है । और जीवन की कला (काम-कला) के विशद और प्रामाणिक ग्रंथ वात्स्यायन का काम शास्त्र भी भारतीय धरोहर है । कुमार संभव में काम कलाओं का विशद वर्णन है । जो बसंतोत्सव या शरदोत्सव या ऋतु उत्सव को दर्शाता है ।
   उपनिषदों, वेदों, पुराणों में भी काम के प्रति सहजता का एक भाव पाया गया है । इस संपूर्ण साहित्य में काम की अभिव्यक्ति बहुत ही सहज है, और पता नहीं कब सहज कामोत्सव आज का विकृत होली-उत्सव हो गया ।
   पूरे भारतीय समाज को अपनी अस्मिता, गौरव और प्राचीन पंरम्पराओं को ध्यान में रखते हुए होली केा एक पवित्र, सहज उत्सव मनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत कलंकित न हो । इस दिन न कोई राजा न कोई रंक रहे । सब बस मानव रहें और हमारा व्यवहार, हमारी संस्कृति केवल सहज रहे । हाव-भाव सब मिलकर मर्यादित रहें और हम सब बसंतोत्सव का आनंद ले कहीं किसी पर कीचड़ नहीं उछालें । क्योंकि किसी के मन को दुःखी करना हमारी परंपरा कभी नहीं रही । हम तो सब के साथ मिलकर, सबको साथ लेकर चलने की विराट परंपरा के वारिस
है । मदनोत्सव कामकुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है, कौमुदी महोत्सव का वर्णन चाणक्य ने भी किया है । शांति निकेतन में भी दोलोत्सव मनाया जाता था । आइये इस होली पर यह शपथ लें कि होली को शालीनता के साथ मनाएंगे ।

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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर 302002
फोन 2670596

rakesh sharma (Mobile)

जूते का मानव सभ्यता से बड़ा गहरा संबंध रहा है । कहते हैं कि किसी जमाने में किसी नाजुक बदन और तुनक मिजाज़ राजा को बागिचे में टहलते हुए कांटा चुभ गया । फिर क्या था उसने सारी पृथ्वी को चमड़े से मढ़ देने का आदेश दिया । अब इतना चमड़ा आखिर पैदा कैसे हो, तो किसी बीरबल टाइप दरबारी ने एक छोटे से चमडे़ के टुकड़े को काट कर राजा के पांव में पहना दिया और तब से धरती पर जूते का चलन चल पड़ा । अब आदमजात की यह बड़ी अजीब आदत रही है कि वो हर उपयोगी वस्तु का बहुमुखी उपयोग कर लेना चाह्ता है । अब यही उसने जूतों के साथ भी किया । सदा पैर में पड़े जूतों का सम्माननीय उपयोग करते हुए किसी ने शादी-ब्याह में इसे पैसे ऐंठने का माध्यम बनाया तो किसी ने इसकी माला बना स्वागत-सत्कार की पारंपरिक पद्धति को मौलिक आयाम प्रदान किया, तो किसी हत्थकटे ठाकुर ने अपने जूते में कील छिपाकर एक नवीन हथियार का विकास कर अपने दिल के `शोलों’ को शांत किया । परंतु जूते से खोपड़ी तोड़ने के तरीके के ईजाद ने जूते के इतिहास को सदा के लिए बदलकर उसकी गरिमा को एक नई उंचाईं प्रदान की । हिंदुस्तान में तो जूतियाने को सदा से ही एक विशिष्ट ‘हूनर’ का दर्जा दिया गया है । इसकी अपनी तकनीक है । कहनेवाले कहते हैं कि जूतियाने से पहले अगर जूते को रात भर पानी में भिगो दिया जाए तो सुबह जूतियाने बखत आबाज़ अच्छी आती है । यह भी कहा गया है कि जूतियाने का सही तरीका यह है कि गिनती के साथ जूते बरसाना शुरु करो और 30-40 तक पहुंचते पहुंचते गिनती भूल जाओ और फिर नए सिरे से शुरु करो । जूते के साथ भारतीय पौराणिक साहित्य में भी एक कथा आती है कि रघुकूल के लघुपूत भरत ने कूटनीतिक चालाकी से राम की पादुका को सिंहासन पर रख दिया और राम को नंगे पांव ही गहन वन में भेज दिया ताकि चौदह बरस तक कांटे-कंकड़ खाते हुए राम वन में ही सेप्टिक-गैंग्रिन से मर खप जाएं और चौदह बर्ष बाद सत्ता हस्तातंरण का लफ़ड़ा ही खत्म हो ।

अब यह तो हो गई परंपरा और पुराण की बात परंतु लगभग बरस भर पहले प्रात: स्मरणीय मान्यवर मुंतजर अल जैदी के एक जूते के प्रक्षेपण ने जूते से जुड़ी समस्त धारणाओं-मिथकों को बदल कर रख दिया । बेचारा जूता जो लाचार जबान लड़की के बाप के पैरों में पड़ा घिसता था वही अचानक बुश जैसे महापुरुष के मस्तक पर सवार हो सारी दूनिया में अपनी प्रतिभा का जूता मनवाने लगा । यह वही जूता है जो जैदी के हाथ से प्रक्षेपित होकर, आदम के पैर से निकल कर दिमाग की मरम्मत करने का अनन्य प्रतीक बन गया । यह वही जूता है जो अपना नंबर बुश की मुंदी मुंदी सी आंखों को पढ़वाकर भारत सहित सारे विश्व में जूता क्रांति उपस्थित कर दी । इस पादुका प्रक्षेपण के बाद तो जो जूताफेंक होड़ चालू हुई उसने क्या हिंदुस्तान, क्या चीन सभी मुल्कों को अपनी जद में ले लिया । जहां देखो वहां जूते ऐसे बरसने लगे मानों किसी परम कृपालु देवता की आशीष बरस रही हो । जो जूता जैदी के करकमलों से निकल कर बुश का मुखचुंबन करने निकला था उसका निर्माण करनेवाली कंपनी के लिए मानो छींका ही टूट गया । पांचो ऊंगलियां जूते में डालकर उसने जूतों से कमाई की जो फसल काटी है उसकी मिसाल कोई ओर नहीं । खैरियत यह रही कि इन कंपनियों का की कोई ‘जैदी’ ब्रांड का जूता ही ना निकाल दिया । मार्केट में बाटा, एक्शन, रीबाक आदि पांव जमाई कंपनियों के शेयर रातोंरात सातवें आसमान पर पहुंच गये । नेता और मंत्रियों के खेमे में हडकंप मच गया । अब ये सारे बदनाम प्राणी बुलेटप्रुफ़ को छोड़ कर जूताप्रुफ़ प्रोटेक्शन की खोज़ में एडियां रगड़ने लगे । कई कंपनियों ने तो एक जोड़ी जूते के साथ एक अतिरिक्त एयरोडायनमिक्स जूता फ्री देने की भी योजना बना ली । एक जोड़ी जूता पांव में डालिए और अतिरिक्त एयरोडायनमिक्स जूते को फोल्ड़ करके सदैव अपने साथ रखिए । क्या पता कब, किसे, कहां जूतियाने के मौका हाथ आ जाए । जो भी जिससे महीनों-सालों से खार खाए बैठा था उसे अपनी भंडास निकालने का यह सुनहरा अवसर हाथ लग गया । सड़े अंडे, टमाटर फेंककर और काली रिबन पहन कर विरोध जताने का फंडा वैसे भी काफी पुराना हो गया था । ऐसे में मान्यवर जैदी जी ने विरोध की जो नई तकनीक ईजाद की वह मानो विरोध के उबाऊ माहोल में ताजी हवा का झोंका था । मेरी मानें तो शांतिपूर्ण विरोध की इस अनुपम तकनीक के ईजाद के लिए शांति का अगला नोबल इन्हें ही मिलना चाहिए । दूसरी ओर सस्ती या कहे कौड़ी के भाव की लोकप्रियता हासिल करने का भी इससे क्रांतिकारी तरीका कोई हो ही नहीं सकता था । बस मौका देख कर किसी नामी-गिरामी हस्ती को जूतिया दो और आपकी लोकप्रियता की टी.आर.पी. कुंलाचें भरती नजर आयेगी । अजी, फिर जाए तो नौकरी जाए और हो जाए गिरफ्तार कुछ हफ्तों के लिए तो हो जाएं । चंद दिनों में आप रिहा होकर शान से निकलेंगें और जिसे जूता पड़ा होगा उसके विरोधी पक्ष आपको सर आंखों पर बिठाने के लिए दौड़ा चला आएगा । इनामों की बरसात हो जाएगी और टी.वी. चैनल वाले अपनी टी.आर.पी. के चक्कर में आपको मशहूर करा देंगें सो अलग । जैदी का जूताकांड इतना हिट हुआ कि बगदाद में उनके नाम पर एक जूता स्मारक ही बना दिया गया । गाहेवगाहे यदि आपका जूता भी निशाने पर लग गया तो आप भी चाहें तो अपनी जूतानुमा समाधी बना कर इस मृत्युलोक में सदा के लिए अमर हो सकते हैं । हिंदी के महान क्रांतिकारी कवि स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने दमित, दलित और शोषित जनता के लिए प्रतीक चुना था_ कुकुरमुत्ता । परंतु दमित शोषित जन के विरोध का प्रतीक क्या हो इस पर शायद उन्होंने सोचा नहीं । इसके लिए ऐसे क्रांतिकारी प्रतीक चुनने का समग्र श्रेय जाता है महान जूतामार क्रांतिकारी मुंतजर अल जैदी को ।

ये तो हुई साल भर पहले विश्व के राजनीतिक पटल पर जूते से मची हलचल की खबर । अब इस जूते फिर से कौन सा नया गुल खिलाय है वो भी सुन लीज़िए । अपने बुश साहब जो अपनी नाक पर मक्खी तक बैठने नहीं देते थे, जूते की मार से तिलमिलाए जरूर पर अपनी खीज को कूटनीतिक चालाकी से छिपा गए थे । अब जूता चलाना कोई ड्रोन चलाना थोड़े ही है कि आसमान से चोरी-छिपे हमला कर दिया । इसका प्रक्षेपण तो जनाब एक विशिष्ट कला है जो चलाते चलाते ही आती है । अब बुश साहब को यह तो पता था कि ईंट का जवाब पत्थर से देने की पुनीत परंपरा रही है पर अब कोई भरी महफिल में जूता दे मारे तो उसका जबाव आखिर किस चीज़ से दिया जाए इस बारे में अमरीका के घाघ कूटनीतिज्ञ भी एक-दूसरे की ओर ताक कर मौन रह गए । पर अब आखिर एक साल के गहन अनुसंधान के बाद इसका जबाव पैरिस में खोज़ लिया गया है । जूते का जबाव जूते से इसका उत्तर तो सरल है पर इसके पीछे बडा़ गहरा दर्शन छिपा हुआ है । जो पत्रकार महोदय एक वर्ष पूर्व बुश साहब से सवालों की बोछार करते करते अपना जूता ही जोर्ज साब की ओर उछाल बैठे आज वही जैदी साहब जब संवाददाता सम्मेलन में प्रश्नकर्ता की भूमिका को त्याग कर उत्तरदाता के रूप में शान से डेस्क पर विराजमान थे तो अचानक ही एक जूता उनकी ओर उछला और मान्यवर जैदी जी की खोपड़ी चाक होते होते बाल-बाल बची । यह तो वही बात हो गई कि कोई बंदूक के आविष्कर्ता की खोपड़ी में ही उसी के द्वारा आविष्कृत बंदूक की पहली गोली उतार दे । शायद ज़ैदी साहब की यह गलती हो गई कि इस आविष्कारी जूतामार फार्मुले को पेटेंट करवाने से वो चूक गए । अरे भाई, किसी अमरीकी संस्था को कुछ दे-दिवा कर किसी प्रकार पेटेंट-शेटेंट करा लेते तो आज हर चलने वाले जूते पर कुछ रायल्टी बन जाती या नहीं, अब चाहे वो जूता खुद पर पड़े या किसी ओर पर । खैर, आज रिटायर्ड़ बुश महोदय की जूते से छलनी आत्मा को ठंडक मिल गई होगी । डूबते व्यक्ति से भी प्रतिक्रिया लेने में माहिर हिंदुस्तानी मीड़िया जैदी पर पड़े जूते पर बुश साहब की प्रतिक्रिया लेने में कैसे चूक गया यह शोध का विषय है । जो जूता लगभग साल भर पहले उनकी पूजा करने के लिए ब्रह्मास्त्र सा उनकी और बढ़ा था आज़ समय ने उसकी गति बूमेरां सी निक्षेपकर्ता की ओर ही मोड़ दी । एक जूतेमार के ऊपर ही जूते से प्रतिआक्रमण ने से हिंदी के कई मुहाबरों को चरितार्थ कर धन्य कर दिया । जैसी करनी वैसी भरनी, जैसा बोओगे वैसा काटोगे, ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं, जिसकी जूती उसीका सर आदि आदि । जिस जैदी ने शेर बनकर दुनिया के शंहशाह राष्ट्र के महामहिम की महिमा को नष्ट-भ्रष्ट करने की जो गुस्ताखी की थी आखिर उस शेर को आज एक सवा शेर मिल ही गया । स्थान बदल गया, लोग बदल गए पर इतिहास ने खुद को दोहराने की प्रक्रिया में जिसे नहीं बदला वो था अमोघ अस्त्र जूता ।

जरनैल जी सावधान, अगला जूता.........।

------

द्वारा- राकेश शर्मा

हिंदी अधिकारी

राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान

दोना पावला, गोवा

इ-मेल rksh99@gmail.com

mallibai jhabua (2) (Mobile)

चलो अब चलते है हम बिच्छू डटे हैं,

थोड़ा सा हंसकर थोड़ा रो लेते हैं,

तुम्हें तो जाना है लंबे सफ़र में, मुझे यहीं रहना है,

कह दो तुम अब दिल की बातें जो कुछ तुमको कहना है,

 

पता नहीं कब दिन आए वो जब हम फिर बताएँगे,

गिला शिकवा आपस में मिल इक दूजे को बताएँगे,

जब आएगी रिमझिम बारिश बच्चे शोर मचाएंगे,

गरमी से परेशान सब भीगने बाहर आएँगे,

 

बैठ अकेला एक किनारे मैं यादों की खिड़की खोलूँगा,

साथ साथ बीते हर पल, हँसते हँसते रो दूँगा !

क्या सचमुच ऐसे ही एक दिन सभी जुड़े होते हैं,

चलो अब चलते हैं, हम जुदा होते हैं,  थोड़ा सा हंसकर चक्षु भिगा लेते हैं !

 

रोज सबेरे ब्रह्म मुहूर्त में बजेगी घंटी मंदिर की,

याद आएगी प्रिये तुम्हारी जैसे लहरें समुद्र की,

दिन गिनता हूँ तुम आओगी सात समुद्र पार से,

करूँगा स्वागत अर्धांगिनी का गुल दस्ता और हार से,

 

जुदाई के दिन कट जाएँगे, सुबह का सूरज निकलेगा,

होगा मिलन हम दोनों का फिर, मन मयूर फिर हर्षेगा,

ये विडंबना है जीवन की मिलके जुड़ा होते हैं,

चलो अब चलते हैं हम जुड़ा होते हैं,

थोडा सा हँसकर चक्षु भिगा लेते हैं !

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(चित्र – मल्लीबाई - झाबुआ की कलाकृति, सौजन्य मानव संग्रहालय, भोपाल)

रेडियो नाटक

लाल सलाम

... !

लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव

 

अवधि ३० मिनट लगभग

पात्र परिचय

. पत्रकार ...

. पप्पू ..एवं...बदरू...बाल नक्सली

. रजनी युवती नक्सली

. कमांडर आकाश युवा नक्सली नेता

. एक बुजुर्ग सेवा निवृत व्यक्ति

. अखबार का हाकर

. राजू बुजुर्ग का नाती

. शालिनी बुजुर्ग की नातिन

.

वाद्य यंत्रो के साथ गायक दल

नेपथ्य स्वर हेतु पुरुष व नारी उद्घोषक

दृश्य १

करमा गीत पर मादंर की थाप के साथ

चलो नाचे जाबा रे गोलेंदा जोड़ा.........

करमा तिहार आये है

..., नाचे जाबो रे...........।

पहली मैं सुमिरौं सरस्वती माई रे

...

पाछू गौरी गणेश रे

.......गोलेंदा जोड़ा ...।।

गांव के देवी देवता के पइंया लगारे

....

गोड़ लागौ गुरुदेव के रे

..... गोलेंदा जोड़ा ..।।

+=+=+

धीरे धीरे

करमा नृत्य गीत के स्वर मद्धिम होते जाते हैं .

नारी स्वर गूंजता है

मैं, बस्तर की आवाज हूं हजारों-हजार साल का जिन्दा इतिहास । जैव विविधता, लोक संस्कृति ,सघन वनो को समेटे हुये , मेरे आगोश में यहां लोग हजारो हजार साल पुरानी संस्कृति भी जीते हैं तो आज की आधुनिकता भी। पहाड़ी मैना भी मेरा ही अंश है तो प्रकृति की देन , केशकाल की घाटी की वह खूबसूरती भी , जिसे निहारने देश-दुनिया से लोग निरंतर यहां आते हैं, चित्रकूट जलप्रपात ...भोले भाले आदिवासी ..मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद मेरी पूंजी है .।

सरकार साल दर साल मेरे विकास के लिये करोड़ो का बजट बनाती है .. ..चैक कटते हैं .. कुछ न कुछ मेरी धरती तक भी पहुंचता ही है .. विकास की भाषा में बस्तर की उन्मुक्त शोडषी की मुस्कराती तस्वीर छप जाती है ..इन दिनो मुझे नक्सलवाद से बचाने के लिये भी बढ़ चढ़ कर बजट स्वीकृत हो रहा है ..अर्ध सैन्य बलो और पोलिस की टुकड़ियां जंगल के चप्पे चप्पे पर तैनात की जा रही है . मेरी पहचान केवल आदिवासियो का लोकनृत्य या उनकी घोटुल प्रथा ही नही है ... मुझे दुख है कि मेरे वास्तविक दर्द को न तो कोई पहचान रहा है न ही उसका निदान करने का सच्चा प्रयत्न ही हो रहा है . मुझे तब भी उतनी ही पीड़ा होती है जब कोई पुलिस वाला नक्सलवादी घटना में शहीद हो जाता है और उस वक्त भी मैं बेबस होती हूं जब कोई कथित नक्सलवादी मारा जाता है ...मरता तो इंसान ही है ना . संहार में नही समग्र विकास में विश्वास है मेरा ..सबको साथ लेकर, सबको समाहित कर सृजन की संस्कृति है मेरी ..

दृश्य परिवर्तन की ध्वनि

युवती

बच्चों आप हैं प्रसिद्ध अखबार सुबह के पत्रकार रवि वर्मा ..इन्हें चीफ ने भेजा है ..आज ये तुम सबसे बातें करेंगे ..

बच्चे एक साथ

लाल सलाम !

पत्रकार

..

नमस्ते बच्चो नमस्ते . एक बच्चे की ओर मुखातिब होकर ..बेटा क्या नाम है तुम्हारा?

पप्पू

.

. पूरे आत्म विश्वाश से ... नाम जान कर क्या करेंगे ? नाम तो कुछ भी हो सकता है- पिंटू, गुड्डू, छोटू, मोटू... नाम में क्या धरा है ? सभी नाम हैं मेरे.

पत्रकार

.

पर फिर भी ..तुम्हें तुम्हारी मां क्या कहती थी बेटे ..

पप्पू

.

. मां !, भावुक होकर .. मेरा असली नाम पप्पू है ! मां मुझे पप्पू कहती थी .

पत्रकार

...

तुम क्या करते हो यहां ?

पप्पू

.

मैं हथियार ढोने, खाना लाने-ले जाने, खबरें पहुंचाने का काम करता हूं . कभी-कभी कार्रवाइयों में भी शामिल होता हूं .हर बार मेरा एक अलग नाम तय किया जाता है

पत्रकार

.. अच्छा तो पिंटू, गुड्डू, छोटू, मोटू.. ये सारे नाम तुम्हारे ही हैं !

पप्पू

..

हां , जितने काम उतने नाम .

पत्रकार

..

अच्छा ! प्यार से एक दूसरे बच्चे से ....और बेटा .तुम यहां कैसे आये ? तुम घर पर क्यो नही रहते ?

बदरू

..दूसरा नक्सली बच्चा

मेरे पिता नक्सली संगठन पार्टी यूनिटी में थे , एक पुलिस मुठभेड़ में उनकी मौत के बाद से गांव गांव और जंगलों में घूमता रहा हूं ,मां हैजा से मर चुकी थीं रिश्तेदारो ने भगा दिया . घर में रहता तो भूखों मर जाता. यहां अच्छा खाना मिल रहा है , इज्जत से जीना सीख रहे हैं .आप क्या करोगे मेरे लिये ? स्टोरी बनाकर सनसनी फैलाओगे अपना नाम कमाओगे ...

पप्पू

.. नेता जी ने क्या किया हमारे लिये ? साहूकार ने पटवारी से मिलकर हमारे दद्दा की जमीन हड़प ली ..दद्दा नेता जी के पास गये तो फटकार के भगा दिया ..साहूकार की बैठक जो है नेता जी के यहां ... पटवारी की शिकायत बड़े साहब से की तो महिने भर की मेहनत बाद तो मुश्किल से मिले .. बोले ..चुप रहो नही तो बंद करवा दूंगा ..मैं तो बड़ा होकर भून दूंगा सालो को ..अखबार के दफ्तर में गये दद्दा तो भी कुछ नही छपा, तब कमांडर ने ही साथ दिया था हमारा .

पत्रकार

..

पर फिर भी बेटा जिस उम्र में तुम्हारे हाथों में क़लम और किताब होने चाहिए थे, तुम बच्चों के हाथों में हथियार हैं...यह ठीक नहीं है ! तुम लोग स्कूल जाना चाहते हो?

नक्सली नेता कमांडर आकाश

..

अरे इन बच्चो से क्या पूछता है भई ..मुझ से पूंछ , सरकार इन ग़रीबों के लिए क्या कर रही है, यह गांवों में जा कर क्यों नहीं देखते ? पिछले सालों में भूखे, गरीबों की संख्या बढ़ी है। राजनीतिक-आर्थिक तंत्र पूरी तरह अमीरों के हवाले हैं। वर्तमान व्यवस्था में बहुसंख्यक लोग हाशिये पर खड़े हैं और उनका तीमारदार कोई नहीं है। हमारा नक्सलवाद देश के एक-तिहाई से अधिक क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमा चुका है । समस्या यह है कि सरकार नक्सलियों के दमन की नीति पर चलती रही है , उन समस्याओं पर गौर नही करती जिनके कारण नक्सलवाद का जन्म हुआ ।

पत्रकार

. .. यह ठीक है कि नक्सलवाद को लेकर हमेशा यह दुविधा रही है कि इसे कानून-व्यवस्था की समस्या माना जाए या सामाजिक-आर्थिक समस्या . यह भी सही है कि उल्फा, बोडो आंदोलन की तरह नक्सलवाद कोई पृथकतावादी आंदोलन नहीं है। नक्सली संगठनों को स्थानीय स्तर पर समर्थन भी पृथकतावादी संगठनों की अपेक्षा ज्यादा है। फिर भी आखिर इस समस्या का अंत कैसे होगा ,क्या सोचते हैं आप ?

नक्सली नेता कमांडर आकाश

.

हँसते हुये.. जिन मुद्दों पर यह आंदोलन शुरू हुआ था, वे आज भी मौजूद हैं इसलिए कोई कारण नहीं कि आंदोलन दमनकारी नीतियो से समाप्त हो जाए। आज देश में लगभग 56 नक्सल गुट मौजूद हैं . समाज से असंतोष और विक्षोभ का नाश नहीं हुआ है। हजारों लोग भूखे, पीड़ित, शोषित और अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, ऐसे में नक्सलवाद समाप्त कैसे होगा ? अर्थव्यवस्था का जब तक असंतुलित विकास होगा, दबे-कुचले लोग व्यवस्था के प्रतिरोध में आवाज उठाएंगे । लेकिन क्या विकास के आंकड़ों को बेलने और खेलने वाले लोग हमारी आवाज़ सुन रहे हैं ?

पत्रकार

.

पर हम लोकतंत्र में रह रहे हैं .. अपनी बात मनवाने के और भी कई लोकतांत्रिक तरीके हैं बहुत से लोग आज नक्सलवादी गतिविधियो के चलते ही अशिक्षित रह गये हैं, पलायन कर रहे हैं ..या मारे जा रहे हैं, आम आदमी के मानव अधिकारो का हनन नक्सलवादी गतिविधियो के कारण ही हो रहा है । क्या यह सच नही है कि नक्सलवाद कभी आन्दोलन हुआ करता था आज यह विशुद्ध आतंकवाद है। नक्सलवाद अब केवल 'मनी गेम' बन कर रह गया है. नक्सलियों के लिए नीति और सिद्धांत जैसे शब्द अब बेमानी हो गए हैं ? नक्सलाइट भ्रांति में फंसी क्रांति है ..क्या नही ?
नक्सली नेता कमांडर आकाश .. ऐ भई ..तू बहुत बोल रहा है.. अपने को ज्ञान नही मांगता ..तुझे चीफ ने भेजा है इसलिये सुन रहा हूं ..चल लड़कों के फोटो वोटो खींच और फूट ले .और सुन ..स्टोरी में कुछ ऐसा वैसा नही होना समझा .... पप्पू ..इन साहब को बस में बिठा कर आने का, क्या समझा

.

पत्रकार अलग अलग एंगल से कुछ फोटो खींचता है ..कैमरे के क्लिक की आवाजें

दृश्य

परिवर्तन ध्वनि .........

नेपथ्य से पुरुष स्वर

..

गणतंत्र दिवस की परेड में जब हाथी पर सवार वीर बच्चो को गणतंत्र दिवस की परेड में घुमाया जा रहा होगा , तब भी सैकड़ों छोटे-छोटे बच्चे हाथो में हथियार थामे जंगलों में नक्सलवाद की नर्सरी में आतंक का पाठ पढ़ रहे होगे .. आज झारखंड, छत्तीसगढ़ , पश्चिम बंगाल,बिहार के कई ज़िलों में आधे से अधिक नक्सली ऐसे हैं, जिनकी उम्र 16 साल से कम है. शुरुवाती दौर में नक्सली संगठनों द्वारा इन बच्चों का इस्तेमाल केवल सूचना के आदान-प्रदान के लिए किया जाता था. कथित खुली सभा या जन अदालत में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने का काम बच्चे करते थे.लेकिन अब दृश्य बदला हुआ है. नक्सली संगठनों द्वारा इन दिनों बच्चों को हथियार चलाने और बारूदी सुरंग बिछाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.नक्सली दस्ते में शामिल अधिकांश बच्चे दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के हैं.कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके परिवार वाले पुलिस या भूपतियों की सेना के हाथों मारे गए और जिनके पास लौटने के लिए कोई घर ही नहीं है .

.

दृश्य परिवर्तन ध्वनि

अखबार का हाकर

..आज की ताजा खबर ...नक्सली कैम्प से होकर लौटा पत्रकार ..आंखों देखी रपट ...छोटे छोटे बच्चे बन रहे हैं नक्सलवसदी .."सलवा जुडुम एक विफल प्रयोग" आज की ताजा खबर ..

शालिनी

दादा जी मुझे नक्सल समस्या पर कालेज में निबंध लिखना है ..यह अखबार खरीद लीजिये .

बुजुर्ग व्यक्ति

अरे भाई एक अखबार देना , ये लो दो रुपये , का ही है ना !

अखबार का हाकर

हाँ जी पूरे दो रुपये का ही है , ये लीजीये

बुजुर्ग व्यक्ति

शालिनी बेटा , यही तो विडम्बना है . नक्सलवाद पर कालेजों में निबंध लिखवाये जा रहे हैं .. अखबारो में खूब चर्चायें हो रही हैं ..टीवी चैनल्स में बहस की जा रही है ,ब्यूरोक्रेसी नक्सलियो के खिलाफ पुलिस की सारी ताकत झोक रही है पर जिन लोगो को जमीनी कदम उठाकर समस्या मिटा देनी चाहिये वे कुछ नही कर रहे .

शालिनी

अखबार के पन्ने फड़फड़ाने की ध्वनि , जोर से पढ़ती है .

.नक्सलवाद् और आतंकवाद में कोई अंतर नहीं।... नक्सल संगठनों ने बिल्कुल निचले स्तर से अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं। सबसे पहले आदिवासियों को बिचौलियों और तेंदू पत्ता के ठेकेदारों के खिलाफ एकजुट किया गया। जमीनी स्तर पर यह आंदोलन शुरू हुआ, इसलिए सरकार के लिए आज यह एक बड़ी चुनौती बन चुका है । सरकारी व्यवस्था की कमजोरी और पुलिस के पंगु होने का ही नतीजा है कि नक्सलवाद का प्रसार तेजी से हो रहा है।बच्चो की नई पीढ़ी की पीढ़ी नक्सलवादी बनने को विवश है ..

राजू

दादा जी वास्तव में ये नक्सलवाद है क्या ?

बुजुर्ग व्यक्ति

नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के विघटन स्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुआ , जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने १९६७ में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये तत्कालीन सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार थीं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और परिणाम स्वरुप कृषितंत्र पर दबदबा हो गया है; और यह सिर्फ़ सशस्त्र क्रांति से ही खत्म किया जा सकता है। "नक्सलवादियों" ने कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग हो गये और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी।

शालिनी

मतलब आजाद भारत में भी आर्थिक आजादी के लिये लड़ाई ..

बुजुर्ग व्यक्ति

हां पर , मजूमदार की मृत्यु के बाद इस आंदोलन की बहुत सी शाखाएँ हो गयीं और आपस में प्रतिद्वंदिता भी करने लगीं।समय के साथ इन गुटो की सैद्धांतिक लड़ाई ने अपना वजूद खो दिया और अब यह विक्षिप्त मानसिकता के लोगों द्वारा संचालित वर्गगत आतंक का रूप धारण कर चुका है ,लगभग वैसे ही जैसे कि विक्षिप्त किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा धार्मिक कट्टरता से उत्पन्न जातिगत आतंकवाद का प्रसार देश के विभिन्न अंचलों में लगातार बढ रहा है.

राजू

यह तो सामाजिक और राजनैतिक जागरूखता का विषय है !

बुजुर्ग व्यक्ति

हमारे राजनीतिज्ञों को आतंक के कारणो और समाधान की कोई चिंता नहीं। चिंता है वोट की। मनुष्य को और मनुष्यता को सभी धर्मों ने या कथित विकृत नक्सलवाद ने मिलकर मार डाला है। राजनीतिज्ञ व्यक्ति वोट के लिये धर्म का उपयोग करना अच्छी तरह जानता है और कट्टपंथी लोग भी राजनीतिज्ञों का उपयोग करना सीख गए हैं। नक्सलवादी भी निहित स्वार्थो के लिये राजनीति का दुरुपयोग कर रहे हैं . धर्म का विकास लोगों को कबीलो से बाहर निकालकर सभ्य बनाने के लिए हुआ था लेकिन हालात यह है कि इसी धर्म या वर्ग के नाम पर हम असभ्यता की पराकाष्ठा तक पहुंचने को तत्पर है।

शालिनी

और दादा जी , क्या है यह "सलवा जुडुम "

बुजुर्ग व्यक्ति

सलवा जुडुम नक्सलवादी आतंक के विरोध में बस्तर के आदिवासियो की एकता के आंदोलन का नाम है, ये और बात है कि यह प्रयोग अब तक विफल ही रहा है . नक्सलवाद से तिहाई भारत प्रभावित है लेकिन बस्तर के आदिवासियो को छोड कर किसी और प्रांत के लोग इन नक्सली आतंकवादियों के खिलाफ कहीं भी और किसी भी तरह अब तक लामबंद नहीं हुए .

राजू

दादा जी प्रश्न है कि बस्तर के लोगो ने तो नक्सलवादियों को बुलाया नहीं .फिर ये क्यो और किस तरह यहां आये ? ..

बुजुर्ग व्यक्ति

बिल्कुल ठीक कह रहे हो बेटा , बस्तर की कराह यहाँ के आम आदमी से सुन कर देखो. यहां के सुकारू -बोदी- बुदरू.... अपनी लडाई खुद लडना जानते हैं उन्हे लाल-पीली सोच वाले लोगों की न तो सहानुभुति चाहिये न ही बंदूके। जिस लोकशाही की परिकल्पना हमारा संविधान करता है आज इस अंचल में कहीं भी दृष्टिगोचर नही होती ? दारू पिलाओ , कपडा बाँटो और वोट लो, इसी सच पर आज इस अंचल का जनप्रतिनिधित्व टिका है . कोई राजनीतिज्ञ ऐसा नही दिखता जो जनमानस की आत्मा में बसता हो. नक्सलवादी समस्या के बस्तर में प्रारंभ और लगातार पनपते रहने का कारण सरकारी नीतियों की विफलता और सच्चे जन प्रतिनिधित्व का अभाव है ?

राजू

क्या ऐसे आदर्श जनप्रतिनिधि हो भी सकते हैं दादा जी जो जनता के लिये ही जियें , अपने स्वार्थो के लिये , घर भरने के लिये नहीं ?

बुजुर्ग व्यक्ति

क्यो नही ? महात्मा गांधी क्यो और कैसे बापू बने थे ?

अच्छा

चलो अब घर लौटे अंधेरा हो रहा है

दृश्य

परिवर्तन ध्वनि

रेडियो पर गाने की आवाज

ओय होय होय ओय होय होय

सईयाँ छैड़ देवै, ननद जी चुटकी लेवै
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवै, देवर समझा
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का आँगन भावे डेरा पिया का होऽऽऽ
सास गारी देवै, देवर समझा लेवै
ससुराल गेंदाफूल
सईयाँ है व्यापारी, चले हैं परदेस,
सुरतिया निहारूँ, जियरा भारी होवे
ससुराल गेंदा फूल

ये आकाशवाणी है

.अब आप विनोद कश्यप से समाचार सुनिये ....

."झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम से गोइलकेरा थानाक्षेत्र के सारूगढ़ा घाटी में सारंडा के जंगलों में नक्सलवादियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट किया, जिसमें थानाप्रभारी, सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर समेत 11 जवान शहीद हो गये। दूसरी ओर, छत्तीसगढ के बीजापुर स्थित गंगालूर इलाके के कोरचूली में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के असिस्टेंड कमांडेंट रामपाल सिंह मारे गये जबकि 5 जवान शहीद हो गये। इसके दूसरे ही दिन 11 जून को माओवादियों ने छत्तीसगढ के ही दूसरे हिस्से धमतरी जिले में घात लगाये नक्सलियों ने पुलिस बल के 15 जवान को गोलियों से भून दिया। सुरंगी विस्फोट में १८ निर्दोष ग्रामीणो की मौत हो जाने का समाचार मिला है ....."

राजू

दादा जी ..मेरे दोस्त तो कहते है कि नेता जी चाहते ही हैं कि नक्सली यहां बने रहे ,जिससे वे अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदितो को इनकाउंटर के नाम पर मरवा सकें ..पुनर्वास के नाम पर ढ़ेर सा बजट मिले . वे तो बेरोजगार लड़को से कहते है ..अरे कोई रोजगार न मिले तो नक्सली बन जाओ ..

बुजुर्ग व्यक्ति

यही तो रोना है बेटा जब तक नेतृत्व सक्षम नही होगा और हममें इच्छाशक्ति नही होगी तब तक होती रहेंगी ये बेवजह हत्यायें ..क्यो जनप्रतिनिधि नहीं सुलझाते है मूल समस्या शायद तुम ठीक ही बता रहे हो ..

शालिनी

क्या नक्सलवाद इस शासकीय विफलता के विरोध की क्रांति है ?

बुजुर्ग व्यक्ति "क्रांति वह होती है बेटा ! जो भीतर से पनपती है, क्रांति प्रायोजित नहीं अपितु स्वत:स्फूर्त होती है। क्रांति बाहरी नहीं होती न ही विचारधारा का इश्तेहार ले कर उपजती है । क्रांति एक घटना है जिसकी चिंगारी भीतर ही सुलगती है और फिर ऐसा दावानल हो जाती है जो बदल देती है एक पूरी की पूरी व्यवस्था। क्रांति नारों से नहीं आती, बल्कि क्रांति के दौरान नारे पैदा होते हैं। क्रांति किसी लाल-पीले झंडे की छाया में नहीं होती क्रांति गुजरती है तब उसपर गीत बनते है, रंग भरे जाते हैं और उसे पहचान दी जाती है।

शालिनी

आप सत्य कह रहे हैं , किंतु यह आदिवासी समाज ऐसे ही तो नक्सलियों के प्रभाव में नहीं आया होगा ? आखिर क्या है नक्सलवादी मनोविज्ञान?

बुजुर्ग व्यक्ति

निश्चित ही प्रशासनिक विफलताये भी कारण है नक्सलवाद का ...एक कारण यह भी है कि इतना बड़ा भौगोलोक क्षेत्र इन , उन कारणो से उपेक्षित होता गया। फिर भी आतंकवाद को कैसे क्रांति का मुलम्मा चढा कर महिमामंडित किया जा सकता है? आज क्या हालात है ? जो पिस रहा है वह यह गरीब अंचल है और वहाँ के निरीह मुरिया-माडिया ही तो हैं ?

शालिनी

आप क्या यह नहीं मानते कि इन आदिमों को अपनी आवाज उठानी नहीं आती और एक तरह से नक्सली इनकी सहायता ही कर रहे हैं, शोषण के खिलाफ उनके संघर्ष में?

बुजुर्ग

इन आदिवासियों को किसी आयातित सिद्धांतों या कि संघर्षकर्ताओं की आवश्यकता नहीं है, इनके ही भीतर ऐसी आग है जो प्रलयंकारी है . यदि नक्सलवाद स्वाभाविक होता तो किसी बंगाली, किसी तेलुगु ..लाल-आतंकी के कंधे पर चढ कर नहीं बल्कि किसी आदिवासी के वाणों की नोंक से आरंभ होता। इसका जवाब उन कथित बुद्धिजीवियो के पास भी नहीं है जो इन आदिवासियों को दिग्भ्रमित करने वाले नक्सलियों के महिमामंडन में मानवाधिकार की कहानियाँ गढते हैं।

शालिनी

हां , इन दिनो नक्सलवाद के पक्ष विपक्ष में मानव अधिकारो पर बहुत चर्चायें होती है .

आप क्या सोचते है ? आखिर नक्सलवाद की समाप्ति कैसे होगी ?

बुजुर्ग

नेतृत्व विहीन जनता को दिग्भ्रमित कर, फुसला कर ,उन्हें दिवा स्वप्न दिखलाकर नक्सल आतंकवादी बनाया जा रहा है ..यह ठीक नही है , सही नही है ...नक्सल प्रभावित क्षेत्रो के लोगो का संघर्ष, क्षेत्र विशेष का संघर्ष है अपने ही देश की सरकार से अपने छोटे मोटे अधिकारो के लिये , थोड़ी सी स्वायत्ता चाहने का संघर्ष है ..उन्हें उनके दिलो पर राज करने वाला उनकी सुनने और मानने वाला जन प्रतिनिधित्व चाहिये .. नक्सलवाद के नाम पर गुमराह कर आतंक फैलाने वाले मकड़जाल से उन्हे , उनका ..उनके लिये , उनके ही द्वारा चलाये जाने वाला सुशासन ही बचा सकता है ..आदिवासियो को उनके जमीनी अधिकार दे दिये जाये ..इसी तरह उन्हें नक्सलवादियो से विमुख कर देश की मूल धारा में मिलाया जा सकता है .. और जब यहां के मूल निवासी ही बाहरी नक्सलवादियों से विमुख हो जायेंगे तो स्वतः ही ये बाहर से आने वाले मुट्ठी भर नक्सली बिना शर्त आत्म समर्पण करने पर विवश हो जायेंगे ..उन्हें भी क्षमा दान दे दिया जाये .. और रोजगार देकर समाज का हिस्सा बना कर उनकी उर्जा का रचनात्मक उपयोग हो ..इसी तरह अंत हो सकेगा नक्सली आंदोलन .

गायक दल

पूरा प्रतिदान मिले मेहनत का ,

ना अब कोई बने नक्सली

फल का सबको सम भाग मिले ,

फिर कोई क्यो बने नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

सब तक पहुंचे किरणें विकास की ,

हो न कोई गुमनाम नक्सली

सब हों शिक्षित , सब को अवसर ,

और न हों बदनाम नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

जंगल के जज्बात पुकारें,

बैठ करो अब बात नक्सली

आतंकी बनने से बेहतर ,

पढ़ें प्रेम का पाठ नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

सब को मानव अधिकार मिलें ,

सच सपनो का संसार मिले

जब सब का ही ध्येय वही है ,

तो फिर क्यो हो घात नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

हिंसा से सुलझें न समस्या,

समझें अब यह बात नक्सली

अप्रासंगिक नक्सलवाद हो ,

खत्म होये अब रात नक्सली

खत्म होये अब रात नक्सली

...(

स्वरचित)

पुरुष स्वर

नक्सलवाद विचार और चिंतन शून्य है । यह देश के बहुसंख्यक सर्वहारा जन के अमन

-चैन, समृद्धि और सुख की विरोधी विचारधारा है ।यह एक भटका हुआ आंदोलन है । अतिवाद का एक धूर्त तरीका है । यह अधैर्य की उपज है । जिसके मूल में हिंसा है .यह जन के लुटे हुए सत्व के लिए नहीं अपितु हितनिष्ट ताकतों की राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र है, नक्सलवाद को वस्तुतः जनता के कल्याण से कोई वास्ता नहीं है ।

स्त्री स्वर

नक्सलवाद से जूझती झारखण्ड

,बिहार ,उड़ीसा ,छत्तीसगढ़ ,बंगाल ,आंध्रप्रदेश सरकारों को केंद्र और हमारे जन समर्थन की जरुरत है । विकास के लिए आरक्षित धनराशि का एक बड़ा हिस्सा पुलिस और सैन्य व्यवस्था के नाम पर व्यय हो रहा है जो अनुत्पादक है । इससे तरह-तरह का भ्रष्ट्राचार भी पनप रहा है ।

शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर छिपा कर हम कथित बुद्धिजीवी अब और चुप नही रह सकते ..हमें नक्सलवाद के विरुद्ध खुलकर सामने आना ही होगा .पहले नक्सल प्रभावित पिछड़े लोगो को समाज मे समाहित कर उन्हें नक्सलवादियो से विमुख करना होगा ..और साथ साथ नक्सलवादियो को भी क्षमा दान देकर, देश की मूल धारा में मिलाकर ही नक्सलवाद का अंत किया जा सकता है ...

पुरुष स्वर

आइये कामना करे कि देश से जल्दी से जल्दी नक्सलवाद का पूर्ण रूपेण अंत हो

. नक्सली हिंसा के शिकार लोगो को यही हमारी पीढ़ी की सच्ची श्रद्धांजली होगी .

"

नक्सलवादी"

.... समाप्त

-----

लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव

ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

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हास्य

          भयानक खलबली  निकली

               -डा0 डंडा लखनवी

  
मुखौटा देख कर  उसका, अचानक खलबली  निकली।
मेरी तकिया के नीचे से, मियाँ जब, छिपकली निकली।।

कचहरी में  पहुँच  कर मैं  भी  धोखा खा  गया ऐसा,
जिसे जज़ साहबा समझा,  वो उनकी अर्दली निकली।।

बुढ़ापा  छा  गया उनपे,  बना  पाए  न  इक  रिस्ता-
हुए आखि़र  फ़िदा  जिसपे वो लड़की मंगली निकली।।

इधर  कुछ  चाय से  उनका हुआ  ऐसा  एफैक्शन है,
कराया  एक्सरे  जब  तो  उदर  में केतली निकली।।

लदी  जो  जेवरों  में  नित  टहलती है निडर हो कर,
किया जब खोज तो एस0पी सिटी की फैमली निकली।।

बड़ी   उम्मीद  ले  कर  सेंधमारी  किया   चोरों  ने,
मगर  घर से  मेरे केवल गज़ल की पोटली निकली।।

किया दादी औ दादा ने,  अजी  होली में  तब डिस्को,
जब उनके  सन्निकट से नौजवां  की मंडली निकली।।

                               सचलभाष-09336089753

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी, हिन्दी ब्लॉग जगत के लोकप्रिय ग़ज़ल गुरू – माट्साब – पंकज सुबीर को उनके उपन्यास ‘यह वो शहर तो नहीं’ पर ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार प्राप्त हुआ है. इस संबंध में प्रतीकात्मक तरीके से उन्होंने आज अपने पोस्ट में घोषणा भी की है. पंकज जी की इस विनम्रता को सलाम व उन्हें बधाई.

mahangai

मंहगाई

दस पैसे कप चाय तीस पैसे का दोसा से दादाजी का नाश्‍ता हो जाता था आज ये सच्चाई जितनी सुखद लगती है, उतनी ही दुखद लगती है कि हमारा पोता बीस रुपये कप चाय पीकर दो सौ रुपये का दोसा खाएगा, बात साधारण सी इसलिए हो जाती है क्योंकि आज जिस वेतन पर पिताजी सेवानिवृत हो रहे हैं. बेटा आज उस वेतन से अपनी सेवा की शुरुआत कर रहा है, सन् 1965 में पेट्रोल 95 पैसे लीटर था चालीस सालों में पचास गुना बढ़ गया तो आश्‍चर्य नहीं की 2050 में भी अगर हम इसके विकल्प को न तलाश पाए तो 2500 रुपये लीटर आज जैसे ही रो के या गा के खरीदेंगे, मंहगाई के नाम पर इस औपचारिक आश्‍वासन से किसी का पेट नहीं भरता पर कीमत का बढना एक सामान्य प्रक्रिया जरुर है, पर ये सिलसिला पिछले कुछ सालों से ज्यादा ही तेज हो गया है. जहां आमदनी की बढोतरी इस तेजी की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर महसूस कर रही है वही से शुरू होती हैं मंहगाई की मार, दरअसल मंहगाई उत्पादक व विक्रेता के लिए तो मुनाफा बढाने का काम करती है पर क्रेता की जेब कटती जाती है.

देश में तेजी से बढ़ती मंहगाई पर राजनेताओ की लम्बे समय से खामोशी समझ से परे है. बस कैमरे के सामने आपस में कोस कर इतिश्री कर ली जा रही है. पूर्व में प्याज के दाम पर सरकार गिरने की जैसी बेचैनी कहीं भी दिखती नही दरअसल इस देश में भष्‍ट्राचार और मंहगाई अब प्रजातांत्रिक मुद्दा ही नही रहा, कहानी कुछ इस तरह है कि डीजल के दाम बढे तीन रुपये लीटर, औसतन सौ सवारी लेकर चलने वाली बसें रोज तीन फेरे लगाती हैं. एक फेरे में लगते है बीस लीटर डीजल, बस मालिकों ने भी तीन रुपये सवारी बढ़ाने के नाम पर हड़ताल, यातायात अस्त व्यस्त, मंत्री जी ने सक्रियता का परिचय देते हुए बस मालिकों के साथ पांच सितारा बैठक ली बात दो रुपये प्रति सवारी पर सफलतापूर्वक सेटल कर ली गई, बस मालिकों का मंहगाई बढ़ने से प्रतिदिन 1140 रुपये का लाभ बढ़ गया, उसी एवज में तमाम मंत्री संत्री की कमीशन बढ़ गई, सिर्फ सवारी के जेब पर पड़ी महंगाई की मार जिसे कहा जाता हैं कानून सम्मत लूट.....


राजनेताओं की चुप्पी के अलावा आम लोगों की बेफिक्री का ही नतीजा है कि आक्रामक रुप से बढ़ती मंहगाई के बावजूद भी केन्द्र सरकार का लोक सभा चुनाव फिर जीत गई । जिस मध्यम वर्ग की दुहाई में छाती पीट पीट कर मंहगाई की पैरवी की जाती है. दरअसल वही विश्‍व का सबसे बडा अतिवाद से ग्रसित खरीददार हैं जो अपनी जेब से ज्यादा बाजार को टटोल रहा है और इससे पनपते असन्तोष व हीनभावना पर आग में घी डालने का काम कर रहा हैं विज्ञापन जगत जो इस बात में माहिर हैं कि आम आदमी से पैसा कैसे निचोड़ा जाता है. चतुर वर्ग इसलिए व्यवस्था के साथ मिलकर उसको खोखला करना या फिर अंगूर खट्रटे कह कर उसे कोसते रहना ही उचित समझ रहा है , आज जिस दस साल में हम मंहगाई बढ़ने की बात करते हैं उसी अंतराल में आश्‍चर्यजनक ढंग दस गुना ज्यादा कार की बिक्री बढ़ी जिसके ईधन व लोन रकम में ही इस मध्यमवर्ग की आय का एक बड़ा हिस्सा खिसक रहा है. गौरतलब है कि लाख कोशिशों, कटौतियों के बाद मध्यमवर्ग आज लोन की कार घर के सामने खडाकर ऐसे फूल के बात करता है लम्बी दूरी दौड़कर धावक विजयी सांस भरता है जबकी न तो कार खड़ी करने की जगह हैं न चलाने बैठने का सहूर.....।

मंहगाई का हास्यास्पद पहलू यह भी हैं कि रतन टाटा के द्वारा भारतीय मघ्यम वर्ग के बजट को ध्यान में रख कर बनाया नैनो का सबसे सस्ता माडल सबसे कम बिका मंहगे माडल की मांग आज भी बनी हुई है. अर्थात सस्ती क्यों ले, अरहर दाल नब्बे रुपये किलो हुई बाजार में विकल्प के रुप में मटर दाल को पैंतीस रुपये किलो लाया गया जिसमे अपेक्षाकृत ज्यादा फैट, प्रोट्रीन, कारर्बोहाईड्रेट और मिनरल और विटामिन हैं और बनाने बघारने की कला के साथ ज्यादा स्वाद भी लिया जा सकता था पर गले उतरना तो दूर इसकी पूछ परख भी नहीं हुई । दरअसल उपयोगिता से ज्यादा सुविधा को महत्व दिया जा रहा और इसी मनोविज्ञान के साथ घातक ढंग से लोगों में संघर्ष करने की क्षमता खत्म हो रही है. परिणामत: आत्महत्या की प्रवृति बढी इसीलिए इस सच को समझ लेना चाहिये की अमीर बनने के लिए खर्च करना जरुरी हैं, खर्च करना सीख गए फिर, कमाना तो खुद ही सीख जाएंगे, कटुसत्‍य है कि बचत करके कोई अमीर नहीं बना । दुर्भाग्य से प्रजातंत्र का वोट बैंक इसी बात से बेपरवाह सामाजिक आर्थिक अराजकता फैला रहा है. जिस सरकारी खजाने से अच्छे सड़क, अस्पताल, स्कूल, पानी, कुटीर व पांरम्पारिक व्यवसाय के अलावा अनाज व उर्जा उत्पादन में उपयोग होना चाहिये वह मुफ्तखोरी के चावल बिजली बांटकर वोट बैंक बनाने में खर्च किया जा रहा है. इस वजह से लोग मेहनत कर अपनी जरुरतें जुटाने के बजाय मक्कार बनकर सरकारी सहूलियतों के लिए गरीब बना रहना अपेक्षाकृत ज्यादा बेहतर समझ रहे हैं. देश के तमाम नीतिर्निधारक समृद्ध राष्‍ट्र निर्माण के लिए अगर अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सड़क, पानी जैसी बुनियादी आवश्‍यकताओं को उचित नहीं समझते तो फिर अनिश्चित व दगाबाज वर्षा, बीज, और खाद पर जी तोड़ मेहनत कर भी कुछ उत्पादन की उम्मीद पर जीने वाला कुछ उत्‍पादन कर भी ले तो न्यूनतम् मूल्य के लिए आत्महत्या करने को मजबूर होने के बजाय किसान क्यों न अपनी खेतिहर भूमि को किसी बिल्डर या उद्योगपति को मोटी रकम में बेचकर वह भी जींस टी शर्ट पहन चकाचैंध करते बड़े बड़े शापिंग माल में पिज्जा बर्गर खाते हुए घूमे क्योंकि एक छोटी जमीन के टुकडे का मालिक किसान भी लोन की शहरी जिन्दगी से बेहतर है. इसलिए बढ़ती जनसंख्या के बावजूद लगातार अनाज उत्पादन में कमी आई है. किसान के प्रति सरकारी बेरुखी के आत्‍मघाती परिणाम है जय जवान जय किसान के देश में जब जवान सत्ता की सहूलियतों से महज वोट बैंक बनकर निकम्‍मा हो जाएगा और किसान बेबस लाचार तो मंहगाई के आगे अराजकता भी मुंह बाए खड़ी हैं सत्‍ता से ही जुड़े लोग वे दलाल किस्म के लोग भी हैं जो आयात निर्यात की कमीशनबाजी और जमाखेरी के खेल से अकेले महाराष्‍ट्र में पिछले प्‍याज के नाम पर तीन हजार करोड़ डकार गए थे.

satish chauhan (Mobile)

सतीश कुमार चौहान भिलाई
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Satish Kumar Chouhan
RADHA PATHOLOGY LAB
Supela
Bhilai

ashok gautam

 

खुद को पता नहीं आज फिर क्यों खुशी देख बल्लियां उछल रहा था कि वे सामने से चेहरा लटकाए आते दिखे तो आधी खुशी हवा हो गई। आजकल अपनी खुशी तो जैसे छुपाने की चीज हो गई है। मैंने अपने इधर उधर देखा कि कहीं कोई मेरे दांए बांए अनहोनी तो नहीं हो गई। अजीब से दौर में जी रहा हूं साहब इनदिनों। पर अपने को चारों ओर से खुश पा लगा कि अगर अब इनकी उदासी में शरीक न हुआ तो पता नहीं क्या क्या कह डालेंगे सो अपनी खुशी को वहीं लगाम दे उनके उदास चेहरे के साथ अपने चेहरे को उदास करने की रिहर्सल करने लगा। मुझ तक पहुंचते पहुंचते उनका चेहरा उदासी से रोने के कगार पर आ पहुंचा था। उनका रोना निकालने के लिए मैंने ही उन्हें गले लगाते पूछा,' क्या हो गया साहब जो वसंत के आने पर भी रोना पूरे के पूरे चेहरे पर पोते हो।' मैं भी चाहता था कि मेरे ये पूछने पर वे फूट फूट कर रो पड़ें और मेरे मन में दनादन लड्डू फूटें। और मजे की बात कि मेरे मन की मुराद पूरी हो गई। अपने गले से वे अपने रोने को उम्र के चरम तक ले जाते बोले,' क्या बताऊं यार! पहली बार तो मौलिक रचना लिखी थी। छपने को भेजी थी।'

'तो छप तो गई होगी? मौलिक आजकल लिख ही कौन रहा है?' ख़ारिश सी होने लगी थी सो मैंने उन्हें अपने गले से हटाते पूछा।

'हां ! छपी तो सही!' कह फिर उन्होंने लंबी आह भरी। हद है यार! लोग औरों की मारी हुई रचना को अपने नाम से छपवा सरस्वती के मानस पुत्र हुए जा रहे हैं और एक आप हो कि,' फिर तो बधाई! बहुत बहुत बधाई!! चलो रचना का प्रकाशन सेलिब्रेट करते हैं। और वह भी मौलिक रचना का। सच कहूं! ये मौलिक शब्द साहित्य में बड़े दिनों बाद सुना। इस खुशी में कुछ दारू शारू हो जाए!'

'रचना छपी तो सही पर मेरे नाम से नहीं...' कह उन्होंने अपने पूरे के पूरे चेहरे की भद्द कर डाली,' किसी और के नाम से छपी है।' कह उन्होंने टूटी न्वार की चारपाई सा अख़बार मेरे सामने पसार दिया,' ये देखो! कोमे से लेकर फुलस्टाप तक सबकुछ मेरा ही। पर रचना के नीचे मेरा नाम नहीं।' देखा तो मजा आ गया । मुझे बरसों मे मेरा खोया भाई जैसे मिल गया। हे मेरे भाई तुम आज तक थे कहां? क्या है न कि हिंदी का बंदा होने के बाद भी मैंने लिखा तो कुछ नहीं पर मां शारदे के आशीर्वाद से छपा बहुत। मौलिक एक तो आज कुछ है नहीं, अगर है तो वह छपता नहीं। कुछ भी उठा कर देख लीजिए, अधिकतर मारा हुआ ही मिलेगा। लगेगा ,यार ये तो पहले कहीं पढ़ा था। पढ़ा था तो क्या हो गया यार! एकबार फिर पढ़ लो। नहीं मन करता तो रहने दो। हम कौन सा आपको पढ़ऩे के लिए कह रहे हैं? पढ़ने से तो हमें खुद अलर्जी है। हम तो अपनी रचनाओं की संख्या में श्री वृद्वि में डटे हैं बस! मरते मरते किसी पुरस्कार के हकदार हो जांए तो मोक्ष मिले। इतना की जुगाड़ तो हम भी कर लेंगे। बथेरी साहित्यिक संस्थाएं हैं कुकरमुत्तों सीं जो ले देकर पुरस्कृत कर देती हैं। साहित्यकार कितना ही लिखे, अगर उसे मरने से पहले पुरस्कार न मिले तो वह नरक को जाता है। पर ऐसा हुआ बहुत ही कम है। मेरे एक परम मित्र ने मारे दस लेख तो पुरस्कार बटोरे तीस। अभी भी ताक में बैठे हैं। मैं दावे से कह सकता हूं वे मरने के बाद तो छोड़िए,अब वे जिंदे ही स्वर्ग को जा सकते हैं, किसी भी टाइम! इसे कहते हैं पुरस्कारू- कम- जुगाड़ू साहित्यकार!

वैसे कौन पूछता है साहब आज की भाग दौड़ में कि ये असली लेख है या चोरा हुआ! बल्कि लोग तो आज चोरी हुआ हाथों हाथ उठा रहे हैं। सस्ता जो ठहरा। लेखक हैं कि चोरी का माल अपने नाम छपवाए जा रहे हैं, मूर्धन्य हुए जा रहे हैं। उन्होंने कहने के बाद दोनों हाथों से अपना सिर पीटना शुरू किया तो मैंने मजा लेते हुए उन्हें समझाने की कोशिश करते कहा, हालांकि मैं यह भली भांति जानता हूं कि जिस लेखक को यह पता लग जाए कि उसकी रचना किसी और ने अपने नाम से छपवा मारी है वह समझता कम ही है,' तो क्या हो गया! रचना आपके नाम से नहीं तो उसके नाम से ही सही जनता तक तो पहुंच गई। अब लेखक का काम खत्म और समीक्षक का काम शुरू!' पर वे थे कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तब लगा कि जिस बच्चे से कोई उसका खिलौना छीन ले उसे रोने से मनाया जा सकता है पर जिस लेखक की रचना चोरी हो गई हो उसे रोने से चुप कराना बहुत मुश्किल होता है,' अच्छा तो एक बात बताओ?' मैंने उनके मन को नैराश्य को धोने के लिए एक के साथ एक फ्री वाला साबुन निकाला,' हिंदी साहित्य का आधुनिक काल पढ़ा है?'

'हां!'

'पहले कौन सा काल आया?'

'भारतेंदु काल!'

'फिर?'

'द्विवेदी युग!'

'गुड! फिर?'

' छायावाद!' कह वे मेरा सिर खुजलाने लगे पर मुझे इससे कोई परेशानी नहीं हुई। वैसे भी आजकल औरों के लेख मार मार थकावट से मेरे बाल सफेद होने के कारण सिर में खुजली होने लगी है।

'उसके बाद?'

'प्रयोगवाद ! पर तुम मेरा टेस्ट ले रहे हो या....'

'टेस्ट तो मैं उनका भी नहीं लेता जिनके कारण पेट पर हाथ फेर फेर खा रहा हूं। उनके नंबर भी उनके चेहरे देख ही लगा देता हूं। साहित्य में वाद,युग बदलते रहे हैं उनको बदलते रहना है। इनदिनों साहित्य में जानते हो कौन सा वाद चल रहा है?' मैंने पूछा तो वे फिर मेरा सिर खुजलाने लगे तो मैंने अपने सिर पर से उनके हाथों को हटाते कहा,'दस्युवाद।'

'दस्युवाद बोले तो???'

'मतलब औरों की रचनाएँ ईमानदारी से चोर अपने नाम से छापकर साहित्य के उद्देश्य को पूरा करने का दौर। साहित्य में चोरी आज कहां नहीं? फिल्मों में कहानी किसी की तो कहानीकार कोई। मार्केट में उपन्यास किसी का तो उपन्यासकार कोई। संग्रह में कविता किसी की तो कवि कोई । रिसर्च में शोध-प्रबंध किसीका तो शोधार्थी कोई। कल तुलसीदास भी आकर यही शिकायत कर रहे थे।'

'तो?'

'तो क्या? मैंने कहा ज्यादा ही लग रहा है तो थाने रपट लिखवा आओ।'

'तो क्या हुआ??'

'थाने से वापस आए तो जाने का किराया भी मेरे से ले गए।'

'तो अब कुछ नहीं हो सकता??'

' संपादक को बता देते हैं। पारिश्रमिक की व्यवस्था होगी तो आपके नाम भिजवा देगा। आपका भी उद्देश्य पूरा हो जाएगा।' .....अब वे काफी हल्का महसूस कर रहे हैं।

---

डॉ.अशोक गौतम

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सोलन-173212 हि.प्र.

pradeep bharavi s3 (Mobile)

मैं

कभी-कभी लगता है

जैसे मैं, मैं नहीं

और यह कैसा इत्तफ़ाक़ हैं

कि ऐसा तब होता हैं

जब मैं पूरी तरह से होती हूँ-'मैं'.

 

वजूद की तलाश

अपने नये अभियान पर

चलते हुए मेरे क़दमों को

अचानक दिख पड़ी एक नदी

जिसमें सोया पड़ा था

सारा का सारा आकाश

चुपचाप गहरी नींद में

किनारे खड़ी देखती रही

 

कुछ देर

फिर चुहल सूझी

चाही

चुरा लूँ थोड़ा-सा आकाश

मेरे ही इशारे पर बढ़े दो हाथ

और ले लिया

उसका एक टुकड़ा

 

किंतु यह क्या?

देखते-देखते

वह टुकड़ा फैल कर

बन गया एक विस्तृत आकाश

मेरे दो लघु हाथों में

एक 'विस्तृत आकाश'-

उड़ते बगुलों की पंक्तियाँ

तैरते सफेद मेघ खंड

पूरा का पूरा हवाई जहाज़

चमकता हुआ सूरज

रात के अँधेरे में

बादलों से झाँकता चाँद

और जलते बुझते तारे

जो दिख रहे थे अब तक नदी में

दिख पड़े मेरे भी हाथों में

 

मुझे लगा समस्त आकाश

कालचक्र की गति

और सारा संसार(मेरे सहित)

समा गया मेरी हथेलियों में

इस तरह अपने वजूद को ढूँढने का

जो अभियान मैंने किया था शुरू

मिला मुझे अपने ही हाथों में.

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(चित्र – प्रदीप भारावी की कलाकृति)

ladobai jhabua3 (Mobile)

तलाश


मुझे तलाश है,
न आग की, न पानी की
न धूप की, न छांव की
सिर्फ एक अदद गांव की,

लहलहाती फसलें हो, सोना उगलते खेत
कलकल बहती हो नदिया और किनारे रेत
बैठ किनारे नदी रेत पर हास करूं परिहास करूं,
वाद करूं, विवाद करूं और न कभी परिवाद करूं

केश हों, कंघी हो, कमर में कृपाण हो
मस्जितद से अजान हो
मन्दितर से जयकार हो
वाहे गुरू की ललकार हो
बच्चों की पाठशाला हो,
हर धर में गौशाला हो

न कोई लाचार हो, न कोई मजबूर हो,
औरत की मांग में सिंदूर हो
राम हो, रहीम हो
बलजीत हो, इब्राहीम हो,
मीरा हो,गीता हो, टेरेसा हो, हरप्रीत हो
अमन चैन के गीत हों ,

पंचायत का राज हो, सुसंस्कृ त समाज हो
डामर की डगर हो, गांव लगता नगर हो,
सुख हो, सुविधा हो, मन में न कोई द्वुविधा हो
बिरहा हों, आल्हा उदल के गीत हो,
पक्षियों का कलरव हो, कोयल का संगीत हो ।

कौन देगा ऐसा गांव
नेताओं के थके हैं पांव
नीति निर्माता नशे में चूर हैं
मेरे सपनों का गांव अभी दूर है ।

 


आदमी

तुम आदमी बन जाओं
किसी ने एक दिन कहा था मुझे
मैं सोच रहा था कि कैसे बनूं आदमी
क्या  उस आदमी जैसा बन जाऊं
जो मोटे चश्में के बाद भी
नहीं देता हैं मजदूर की मजदूरी
नहीं देख पाता उसकी मजबूरी

क्या  उस जैसा बन जाऊं
जो कर देता है भीड-भाड में विस्फोतट
नहीं देख पाता जली लाशें, जख्मों पर लगी चोट
क्या  उस जैसा बन जाऊं
जो काट देते हैं वन उपवन
नहीं समझ पाते धरती का दर्द उसका मन

क्या  उस जैसा बन जाऊं
जो अपने मरीज के पेट में फेंक आते हैं अपने औजार
छोड देते हैं उसे जिन्दां लाश की तरह, बेजान, लाचार
या फिर बन जाऊ उस जैसा
जो हर पॉच साल के बाद आता हैं
अपने लुभावने वादों के बीज बो जाता हैं
और फिर चला जाता है किसी गद्‌दे दार कुर्सी पर सोने
छोड देता हैं उन सूनी आँखों में सपने सलोने

या फिर बन जॉऊ उस जैसा
जो हाथ में लिये डण्डा, कन्धों पर लगाये सितारा
किसी निर्दोष को लाकअप में बन्द, कर लगाता है धारा
या फिर बन जाऊं उस जैसा
जे अपनी ही बेटी समान लडकी को पढाने के बहाने
लगता है अपने बिस्तर पर सुलाने

यदि ऐसा ही बनता है आदमी
तो मैं आदमी बनने को नहीं तैयार
मैं इस दुनिया का आदमी नहीं, नहीं चाहिये ये संसार
यदि आपको पता हैं तो बतायें
मेरी बात पर गौर फरमायें
मुझे आदमी बनना है
एक सपना बुनना है
कोई और तरीका हो तो बतायें
कम से कम मुझे आदमी की श्रेणी में लायें ।

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RK Bhardwaj,
151/1 Teachers’ Colony,Govind Garg,Dehradun(Uttarakhand)
e-mail: rkantbhardwaj@gmail.com
Phone: 0135-2531836 ®  9456590052 (M)

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(चित्र – लाडो बाई झाबुआ की कलाकृति)

sanjay grover

पौट्‌टू जी खासे प्रगतिशील आदमी थे। प्रगतिशील इसलिए कि उन्‍हें लगता था कि प्रगतिशील दिखना अच्‍छी बात है। इसलिए भी कि प्रगतिशीलता का फैशन है। सबसे ज्‍यादा इसलिए कि मौक़े के मुताबिक़ प्रगतिशील दिखना हमारी परम्‍परा है।

अपने इसी प्रगतिशीलता के शौक़ के तहत पौट्‌टू जी काफी किताबें वगैरह भी खरीदा करते थे। जब खरीदने से फुरसत मिलती तो पढ़ते भी थे। एक दिन ‘किताबें खरीदते हुए प्रगतिशील दिखने‘ के फैशन के तहत पौट्‌टू जी एक बुक-स्‍टॉल पर खड़े थे कि उनकी नज़र एक किताब पर पड़ी। शीर्षक था ‘हाऊ टू लव अदर्स ः दूसरों से प्रेम करने के 301 उपाय'। इधर कई दिनों से टी.वी. के देसी-विदेशी चैनलों और रंगीन पत्र-पत्रिकाओं में घुस कर पौट्‌टू जी खोज लाए थे कि दूसरों से प्रेम करते हुए प्रगतिशील और परम्‍परा-पकड़ू दोनों साथ-साथ दिखा जा सकता है।

क़़िताब की जिन बातों से पौट्‌टू जी ज्‍यादा प्रभावित हुए, उनमें से एक थी कि प्रेम तो रस्‍सी की तरह दूसरों को बांध लेता है। पौट्‌टू जी उन लोगों में से थे जो हर बात की व्‍याख्‍या अपनी समझ से, अपने स्‍तर पर करते हैं। सो पौट्‌टू जी ने अर्थर् निकाला कि अगर प्रेम रस्‍सी की तरह है तो जरूर रस्‍सी भी प्रेम की तरह होनी चाहिए। इस निष्‍कर्ष पर पहुँचते ही वह बाज़ार से एक लम्‍बी रस्‍सी लाए और अपने तमाम रिश्‍तेदारों, जानकारों, मित्रों, बीवी-बच्‍चों वगैरह को किसी न किसी तरह पटा कर, फुसला कर, धमका कर, ललचा कर उस लम्‍बी व मजबूत रस्‍सी में बांध दिया।

उनमें से बहुत से लोग चीखे-चिल्‍लाए कि यह क्‍या अत्‍याचार कर रहे हो। पौट्‌टू जी बोले कि अत्‍याचार नहीं दूसरों से प्रेम कर रहा हूं। लोग कराहे कि हमें नहीं करवाना प्रेम। पौट्‌टू जी बोले कि अजी आजकल अच्‍छे कामों में कोई अपनी मर्जी से सहयोग थोड़े देता है। लेना पड़ता है।

वक्‍त बीतने के साथ-साथ बन्‍धे हुए लोगों को भूख-प्‍यास सताने लगी। वे रोटी-पानी की गुहार मचाने लगे। पौट्‌टू जी किताब की जिस दूसरी बात से प्रभावित थे उसके अनुसार प्‍यार से अगर कोई ज़हर दे तो वह भी अमृत होता है। तत्‍काल अपनी निजी व्‍याख्‍या के मुताबिक़ वे एक ज़हर की शीशी ले आए और बोले कि अपना-अपना मुँह खोलो, मैं अभी तुम्‍हारी भूख-प्‍यास सब मिटाता हूं। तूम इस शीशी में भरे प्रेम का चमत्‍कार देखो। लोग बोले कि इस अमृत को तुम खुद क्‍यों नहीं पीते? पौट्‌टू जी ने फिर समझाया कि दूसरों से प्रेम मैं कर रहा हूं तुम नहीं। यह तुमने तब सोचना था जब तुम मुझे प्रेम करते थे।

मगर लोग थे तो नासमझ ही, सो माने फिर भी नहीं। वे जहर की शक्‍ल वाले अमृत को न पीने पर अड़ गए। पौट्‌टू जी ने किताब में पढ़ा था कि प्रेम में लोग कभी-कभी बच्‍चों जैसी हरकतें करने लगते है। इसके आगे पौट्‌टू जी ने खुद जोड़ा कि बच्‍चों को रास्‍ते पर लाने के लिए डाँट भी लगानी पड़ती है। और पिटाई भी करनी पड़ती है। बस फिर क्‍या था, पौट्‌टू जी ने पहले तो लात-घूँसे बरसाए। लोग फिर भी नहीं माने तो वे डंडा लेकर पिल पड़े। लोग तो तब भी नहीं माने, मगर पौट्‌टू जी प्रेम की इस मशक्‍कत में खासे थक गए और हांफने लगे। फिर वे अपने अध्‍ययन कक्ष में आकर थोड़ी देर सुस्‍ताने के लिए बैठ गए। ‘प्रेम करने के 301 उपाय' सामने मेज पर ही पड़ी थी। पौट्‌टू जी से रहा नहीं गया और उन्‍होंने उसे उठा लिया। तब वे प्रेम करने का कोई नया तरीक़ा ढूंढने लगे ... ...।

पाठक गण, पौट्‌टू जी का यह क़िस्सा मैंने भी एक क़िताब में पढ़ा था। दूसरों से प्रेम करने वाले पौट्‌टू जी के जानकारों का क्‍या हश्र हुआ होगा यह अन्‍दाजा आप लगा सकते हैं। आज जब मैं कथित सामाजिक लोगों को दूसरों से प्रेम करते देखता हूं तो मेरी आंखें कभी घबराहट के मारे बन्‍द हो जाती हैं तो कभी आतंक से फट पड़ती हैं। लगता है कि मेरा पूरा वजूद रस्‍सियों में बन्‍धा हुआ है और लोग ज़हर की शीशियां लिए हुए मुझे चारों ओर से घेरे खड़े है। ऐसे में मैं ऐसे ही किसी लेख में घुस कर पंख फड़फड़ाने लगता हूं। एक बात बताइए, आप भी कहीं दूसरों से ऐसा ही प्रेम तो नहीं करते ? कृपया मुझे तो बख़्श ही दें।

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-संजय ग्रोवर

147 ए,पॉकेट ए,

दिलशाद गार्डन,

दिल्‍ली-95

Email : samvadoffbeat@yahoo.co.in

Blog : www.samwaadghar.blogspot.com

(19 जनवरी, 1996 को पंजाब केसरी में पूर्वप्रकाशित)

girish_pankaj
रामलुभाया जाग। छोड़ आलस का राग।
देख बजट आ गया। क्या तुझे भा गया। नहीं भाया तो भायेगा।
बेटे, बच कर कहाँ जाएगा?
अरे, देश का आम जनता।

तेरे बिना सरकार का कभी काम नहीं बनता।


माना कि रेल बजट मे किराया नहीं बढ़ता मगर समस्या तो हर बार बढ़ जाती है।
हमारे पास आते-आते ही हर दाल सड़ जाती है।
चावल में कंकर और पानी में कमल की जगह कीड़े खिल जाते हैं। बेचारे मनुष्यों से हिल-मिल जाते हैं।
सरकार अपनी ओर से ममता दिखाती है। लेकिन बात नहीं बन पाती है।
और एक रेल चलते-चलते दूसरे पर चढ ज़ाती है।


रामलुभाया, सबसे ज्यादा तेरी दुर्गति होती है। तू जनता है न, घर में बैठे-बैठे रोती है।
लेकिन कोई बात नहीं। यही तेरा नसीब है। हर व्यवस्था जनता की रकीब है। इसलिए जो होता है, जनता के लिए होता है। ये और बात है, कि जन का कुछ नहीं होता है। ये तो अच्छा हुआ कि चैनलों की भरमार है और अपुन को टेंशन मिटाने के लिए मनोरंजन की दरकार है। चैनलों के कारण कोई फर्क नहीं पड़ता है, कि कैसा है बजट, और कैसा होना चाहिए। जैसा है ठीक है। यह तो पुरानी लीक है। खराब होगा तो क्या होगा? हमारे कहने से कौन-सा ठीक हो जाएगा।
इसलिए जैसा है चलने दो। तुम अपनों से छले जाते हैं, अब सरकार भी छल रही है तो छलने दो।


भाया रामलुभाया, जाग। देख सरकार तेरे लिए सपने बुन रही है। मन ही मन कुछ गुन रही है।
तू क्या सोच रहा है, उसको भी सुन रही है। चारों तरफ खुफिया विभाग वाले डोल रहे हैं। तेरे अंदर को भी टटोल रहे हैं।
ये मत सोच कि सरकार गूँगी है, बहरी है। झाँक कर देख, यह तो तेरे दरवज्जे पर ही ठहरी है।
पिछली सरकार ने शायद तेरा भला किया था, अब शायद यह भी करेगी। यह नहीं करेगी तो शायद अगली सरकार करेगी।
इस शायद के चलते ही तू अब तक जी रहा है। और वायदों का मीठा-मीठा जूस पी रहा है।
बजट में आँकड़े होते हैं। सरकार की अकड़ होती है। धूर्तताओं पर गहरी पकड़ होती है। इसी के आधार पर तो वोटरों पर जकड़ होती है।


रामलुभाया, कुछ समझ में आया? न आया हो तो समझ को साफ कर और सत्ता में बैठे लोगों को माफ कर।
ये हर बार झलेंगे और मुसकराएँगे। हम इनकी चालाकियों से बच कर आखिर कहाँ जाएँगे?
हर नये बजट की संभावना मात्र से ही लगता है, कि बस अब हमारे भाग संवर जाएँगे। सारे दुख हर जाएँगे,लेकिन बजट आते ही महँगाई बढ़ जाती है।
पता नहीं किस कुरसी की छाया पड़ जाती है। बजट हमें जटता है (यानी मूर्ख बनाता है) जोंक की तरह लिपटता है। हम इससे बच नहीं पाते।
हाय.... हादसे भी कमाल होते है।
हम रोज किस्तों में हलाल होते है।


रामलुभाया, बजट का सामना कर। इसे साँप समझ कर मत डर।
घर का बजट भी फेल होता है, फिर यह तो देश का है। इसलिए बजट को मेहमान समझ कर आने दे। जहाँ से मरजी हो, वहीं से खाने दे।
बजट पेश करने वाले में ममता हो, वह मनमोहन भी हो। मगर हमारा तो न दोहन हो। लेकिन होता है। क्या करें। क्या इस दुख में जा कर कहीं मरें?
नहीं भाई, नहीं। ये गीत गुनगुनाएँ,और मुसकराएँ, कि -


दुनिया में हम आएँ हैं, तो जीना ही पड़ेगा,
बजट अगर जहर है तो पीना ही पड़ेगा।

   
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गिरीश पंकज
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
जी-३१,  नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१

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साहब  कोई काम नहीं करते हैं , उन्हें केवल आदेश देना होता है. साहब के सारे काम उनके मातहतों को करना होता है चाहे वो ऑफिस का काम हो या घर का. जो साहब ऑफिस में खुद अपने हाथ से कुछ काम करते हैं उन्हें निकम्मा समझा जाता है, खास कर बड़े साहब की नज़र में. साहब हमेशा सही होते हैं. गलत उनके मातहत को ही होना होता है. ये मातहतों  की जिम्मेवारी होती है कि अपनी गलती माने.

साहब गलती खोजने तथा डांटने में  एक्सपर्ट होते हैं. साहब तुनुकमिजाज होते हैं. दूसरों के सामने डांटने में वे  ज्यादा अच्छा महसूस करते हैं क्योंकि सामने वाला उस परिस्थिति में कुछ बोल नहीं पाता  है. इसी बहाने अन्य लोग भी डरते हैं. कभी-कभी एक कड़े प्रशासक की छवि बनाने के लिए  भी झूठ-मूठ दूसरों को डांटना पड़ता है.

जिस दिन साहब किसी को नहीं डांटते उस दिन  उनका हाजमा बिगड़ा रहता है. इन परिस्थितियों में साहब को बार –बार बाथरूम जाना पड़ता है. यही कारण है कि अगर साहब घर में भी हों तो फोन पर कम बाथरूम में ज्यादा पाए  जाते हैं. “साहब बाथरूम में हैं”—ये तकिया-कलाम साहब के घर बालों के जुबान पर स्वाभाविक रूप से चढ़ा रहता है. ऑफिस में शेर बने रहने बाले साहब घर में अपनी ऊर्जा बचाए रखते हैं इसीलिये वे मेमसाहब के सामने एकदम आज्ञाकारी जीव होते हैं, वल्कि उन्हें रहना पड़ता है.

साहब के ऑफिस के बाहर एक स्टूल पर एक चपरासी की ड्यूटी रहती है जो प्रायः सोया पाया जाता है. उसे सोने की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है ताकि कोई आगंतुक अचानक  से साहब के कमरे में न घुस जाये. आगंतुक को पहले सोये हुए चपरासी को जगाना पड़ता है ताकि वो अंदर जाकर सोये हुए साहब को जगाए. इतने में साहब को कुछ समय भी मिल जाता  है.

  साहब का यह विशेषाधिकार होता है कि वे  ऑफिस की गाड़ी से ही घर के सारे काम करवाएं. साहब जब कोई निर्णय नहीं लेते या लेने  में देर करते हैं तो यह माना जाता है कि साहब बड़े सूझ-बूझ बाले सोच समझ कर धीरज के  साथ काम करने बाले व्यक्ति हैं. लेकिन अगर कोई मातहत देर करे तो वह आलसी होता है. दरअसल मातहतों को किसी काम में देर करनी भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे साहब के ऊपर बोझ  बढ़ता है और कई बार अपनी साहबी छोड़कर उन्हें मजबूरी में कुछ काम करना पड़ता है.

गाहे –बगाहे कभी साहब से गलती हो भी जाती है तो यह उनका  काम करने का “स्टाईल” कहलाता है. साहब होने का परफेक्ट लक्षण यह है कि वे निर्णय नहीं लें बल्कि उसे दूसरे पर टाल दें ताकि अपनी  जिम्मेवारी से बचे रहें.

सबसे पावरफुल साहब वही माना जाता है जो काम रुकवा सके. काम  करवाने बाले साहबों को तो सभी हीन-दीन नज़र से देखते हैं. उनकी पूछ भी नहीं होती क्योकि वे साहब धर्म के खिलाफ काम करने के कारण अयोग्य भी माने  जाते हैं. काम पूरा होने या विशेष उपलब्धि का सारा श्रेय  साहब को खुद लेना चाहिए और अगर काम बिगड़ जाए तो दोष अपने मातहतों पर मढ़ना चाहिए.

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(डाक्टर साहब.....मुझे ऑफिस में नींद नहीं आती   से साभार, संक्षिप्त अंश)

समीक्षा-

चम्‍बल का प्रमाणित आख्‍यान-मुखबिर

चम्‍बल घाटी का नाम फिल्‍मी दुनिया से लेकर लोकप्रिय साहित्‍य तक और राजपथ से जनपथ तक ; डकैतों, बीहड़ों , समर्पणों और मुठभेड़ों के लिए जाना जाता है, लेकिन सचाई यह है कि चम्‍बल के डकैतों पर सिवाय अखबारी रिपोर्ताजों और सतही व पापुलर किस्‍म के उपन्‍यासों के रूप में सामग्री मिलती है, जो न तो यथार्थ है न सही विश्‍लेषण । सच तो यह है कि इस सम्‍बंध में रामकुमार भ्रमर के बाद किसी ने गंभीरता से नहीं लिखा । हां इस सन्‍दर्भ में पिछले दिनों पहली बार इस इलाके को कथाभूमि बनाकर कुछ कहानियां लिखी गई। हिन्‍दी कथासाहित्‍य की पांचवी और छठवीं पीढ़ी के लेखक महेश कटारे , ए0 असफल , राजनारायण बोहरे और प्रमोद भार्गव ने यानी उन लेखकों ने जो ठेठ इन बीहड़ों में रहते और यहां की त्रासदी को भोगते है उनके द्वारा इस इलाके की परत दर परत पड़ताल करता कथा साहित्य लिखा गया तो पाठकों का ध्‍यान आकृष्‍ट किया। महेश कटारे की कहानी ‘पार' , ए0असफल की ‘ लैफ्‌ट हैंडर' और प्रमोद भार्गव की ‘ मुखबिर ' नामक कहानी ने चम्‍बल के उस रूप को प्रकट किया जो आज बीहड़ों में दिखाई दे रहा है। इसी सिलसिले में राजनारायण बोहरे का नया उपन्‍यास ‘ मुखबिर ' अपने विशद विवरणों और त्रासद सच्‍चाइयों के साथ एक ऐसा आख्‍यान बन कर सामने आया है जो एक नये विमर्श की मांग करता है।

उपन्‍यास में यूं तो सारी कथा गिरराज नामक एक ऐसे पात्र द्वारा याद करते हुए सुनाई गई है जिसे डाकू श्‍यामबाबू घोसी के गिरोह की तलाश में बीहड़ों में भटकती पुलिस ने अपने साथ एक गाइड के रूप्‍ में लिया हुआ हे। दरअसल गिरराज को कुछ समय पहले श्‍यामबाबू ने अपहृत कर लिया था और लगभग नब्‍बै दिन तक अपने मूवमेंट के साथ उसे साथ लिये डोलता रहा था, इसलिए वह पुलिस के लिए एक मुफीद गाइड और मुखबिर महसूस होता है। पाठक गिरराज के साथ उस घटना से रू ब रू होता हैं जहां एक बस को रोक कर डाकू गिरोह एक युवती केतकी समेत छै सवर्ण यात्रियों को पकड़ के अपने साथ ले जाता है, और फिर आरंभ होती है इस गिरोह की यात्रा- जिसमें गिरोह के मुखबिरों से लेकर, उनके मददगार तक, उनके बिरादरी भाई, दूसरे डाकू, सरपरस्‍त नेता और वह पूरी दुनिया पाठकों के सामने खुलती चली जाती है, जो हर मोड़ पर नये तथ्‍य बताती है। यह कथा अपने अंदाज में चलती हुई अनायास ही चम्‍बल घाटी में खौल रहे जातिवादी झगड़ों के उस यथार्थ को प्रकट करती है जहां हर जाति के अपने डाकू हैं और हर डाकू के मददगार अपने सरपरस्‍त नेता और बिरादरी भाई। राजनीति में विगत दस साल से मंडल आयोग के बाद उभरे पिछड़े वर्ग के नेताओं की तरह चम्‍बल में भी इस समय उस पिछड़े वर्ग के डाकुओं का उदय हुआ है जो एक जमाने में सवर्ण और प्रायः ठाकुर या बामन डाकू द्वारा सताये गये। इन डाकुओं की बोली-बानी, व्‍यवहार और मंतव्‍य सवर्ण बिरादरी के साथ ठीक उसी प्रकार का है जैसा कभी उनके साथ ऊंची जाति के डाकुओं का रहा करता था। पूरे उपन्‍यास में डाकुओं के साथ लगातार पाठक भी डर की मनोदशा में रहता है , और उसे भी आशा रहती है कि गिरराज को केतकी मिल जायगी। उपन्‍यास का अंत चम्‍बल के वर्तमान परिवेश को प्रकट करता है जहां के निवासी यह कतई नहीं मानते कि श्‍यामबाबू घोसी मारा गया है। आरंभ और अंत तो एक औपचारिकता भर होती है, असल चीज है कथा की यात्रा, तो इस उपन्‍यास में पाठक एक ऐसी यात्रा पर निकलता है जो अपनी मंजिल तक पहुंचते पहुंचते उसे बहुत सारे भावों-विभावों और जानकारी से समृद्ध करती है।

इस क्षेत्र में इन दिनों कई मंदिर, कई सन्‍यासियों के नाम के साथ सरकार शब्‍द प्रयुक्‍त हो रहा है, इस शब्‍द को लेकर भी इस उपन्‍यास में एक शानदार चिकौटी काटी गई है,। प्रसंग है जबकि एंटी डकैती कोर के डी एस पी के पास अपने मित्र लल्‍ला के साथ पहुंचा गिरराज बातचीत में सरकार शब्‍द का प्रयोग करता है तो पुलिस आफीसर पूछता है- चम्‍बल के रहने वाले हो क्‍या? चौंकते हुए लल्‍ला को आफीसर बताता है - ‘चम्‍बल में ही तो आजकल बहुत सारी सरकारें मौजूद है।'

जैसा कि वर्तमान कथा परंपरा में प्रचलित है इस कहानी का भी कोई नायक नहीं है हां, कहानी में कथा की मांग के अनुरूप बहुत सारे पात्र है, उनके अपने रूप्‍ रंग और बोली बानी है तो अपने चरित्र भी हैं। उपन्‍यास का हर चरित्र एक वास्‍तविक चरित्र ही लगता है, कृत्रिम या थोपा हुआ चरित्र नहीं ।

चम्‍बल क्षेत्र बृज मंडल से लगा हुआ है, इस कारण यहां बृज भाषा से मिलती जुलती भाषा प्रचलित है, लेकिन भदावर, तंवरघार और सिकरवारी यानि भदौरिया,तोमर और सिखरवार राजाओं के द्वारा शासित रहे इस क्षेत्र की बोली में अपने कुछ शब्‍द और कुछ शैलियां सम्‍मिलित हो गई हैं। लेखक ने उपन्‍यास के संवादों को सहज व स्‍वाभाविक भाषा में लिखा है, और वे विश्‍वसनीय व पात्रोचित लगते हैं। चम्‍बल घाटी की प्रवृत्‍ति, त्रासदी और समाज की ठीक-ठीक व्‍याख्‍या करने वाले कवि सीताकिशोर खरे के दोहे लेखक ने यहां वहां खूब प्रयोग किए हैं जिन्होंने लेखक का बहुत सा काम आसान कर दिया है। लेखक ने उपयोग तो अखबारों की कटिंग्‍स का भी स्‍थान-स्‍थान पर किया है, जिनके कारण उपन्‍यास का विस्‍तार अप्रत्‍यक्ष क्षेत्रों तक होता चला गया है।

उपन्‍यास के कइ्र प्रसंगों में मुखबिरी इस क्षेत्र की मजबूरी है, बल्‍कि यूं कहें कि यहां का हर आदमी मुखबिर बनने को मजबूर है- चाहे वह पुलिस का मुखबिर बने या फिर डाकुओं का। कई लोग तो दुहरे मुखबिर यानी क्रॉस ऐजेंण्‍ट बन जाते हैं । मुखबिर को एक संज्ञा के रूप में न लेकर यदि एक कार्य के रूप में लिया जाय, तो उपन्‍यासकार ने हर पत्रकार, हर लेखक और राजनैतिक गठबंधन के हर दल के शुभचिन्‍तक को मुखबिर कहा है।

उपन्‍यास पढ़ने के बाद पाठक इस निष्‍कर्ष पर पहुंचता है कि आमने सामने भले ही पुलिस और डाकू लड़ते दिखाई दें लेकिन असली लड़ाई मुखबिरों के बीच होती है, मुखबिरों के जरिये होती है। अगर गहराई से देखें तो रामायण से लेकर महाभारत तक का युद्ध मुखबिरों के सहारे ही तो लड़ा गया दिखाई देता है। रामायण में विभीषण और त्रिजटा रामदल के मुखबिर थे तो सुक-सारन रावण दल के। मुखबिरी की यह परंपरा जयचंद और मीरजाफर तक चली आई है,जिन के द्वारा दी गई खबरों के बिना विदेशी आक्रांता कभी भी सफल नहीं हो सकते थे।

सारांशतः इस उपन्‍यास को चम्‍बल घाटी के आज के समाज, आज की राजनीति, आज के जातिवाद, आज के आपराधिक माहौल और दिनोंदिन बढ़ रही अमानुषिकता का आईना या सच्‍चा आख्‍यान कहा जा सकता है।

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राधाविहार, स्‍टेडियम, दतिया

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पुस्‍तक - मुखबिर (उपन्‍यास)

लेखक- राजनारायण बोहरे

rajnarayan bohare
LIG-19,housing colony datia m.p.

प्रकाशक- प्रकाशक संस्‍थान दिल्‍ली

मूल्‍य- 250/-रूपये

girish_pankaj
बहुत दिनों से इच्छा थी कि  गपोडूराम के घर  जा कर  मिलूँ, कुछ बतियाऊं. कुछ उसकी सुनूं, कुछ अपनी सुनाऊँ, लेकिन टीवी देखने से मुझे फुरसत मिले तब न।
जब से टीवी ने टीबी की  बीमारी की तरह जोर पकड़ा है, तब से न तो किसी के घर  जाना अच्छा लगता है और न किसी का अपने घर पर  आना। ये ससुरे चैनल चैन नहीं लेने देते। इस चैनल के चक्कर में लोग बेचैन होने लगे हैं। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। लगता है पुराने दोस्तों से मिल लिया जाय।
मैंने मित्र हपोड़ूराम से कहा- ‘‘चलो यार, आज शाम गपोड़ूराम के घर चलते हैं।’’
इतना सुनना था कि मित्र बोला- ‘‘अरे... अरे, उसे शाम को  ‘टच’ मत किया  करो। कभी दिन में, हाँ, छुट्टी वाले दिन मिलने चलेंगे न ।’’
मैं समझ गया कि गपोड़ू भी शाम को मेरी तरह टीवीबाजी में व्यस्त हो जाता होगा, इसलिए भाई हपोड़ू मना कर  रहे हैं।


कुछ दिन बाद फिर मेरी इच्छा  ने जोर मारा।
मैंने क हा- ‘‘चलें आज, गपोड़ू भाई के घर ?’’
मित्र  ने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘शाम को  उसे ‘टच’ करना ठीक नहीं ।’’
मैंने झल्ला कर कहा- ‘‘अरे यार, तुम अपने मित्र को  इस टी.वी.फ़ोबिया से मुक्त करो। ये क्या  तमाशा है कि  शाम होते ही वह टीवी से चिपक जाता है।’’
मित्र  बोला- ‘‘यह बात नहीं है पार्टनर,  मामला कुछ और है।’’
‘‘क्या ? उसके घर  में कोई  बीमार है, जिसकी सेवा गपोड़ूराम करनी पड़ती है?’’
मित्र हंस कर  बोला- ‘‘यह बात भी नहीं, अब तुम …ज्यादा  जोर दे रहे हो तो बता देता हूं। हमारे मित्र  पीने-पाने के  शौकीन है। किसी बार में तो जा नहीं सकते, सो बेचारे घर पर ही शौक  पूरा कर लेते हैं। दो-चार पैग मारकर मस्त हो जाते हैं। और ऐसे माहौल में तुम उसके पास चले जाओगे तो रंग में भंग हो जाएगा। इसलिए कहता हूं कि भैया, शाम को  उसे  टच मत करना।’’


हमारे-आप के  शहर में भी ऐसे जीवों की भरमार होगी जिन्हें आप शाम को या रात को  टच करना पसंद नहीं करते होंगे। कुछ लोग तो दिन में भी टच न करने की  स्थिति में पाए जाते हैं। ये दारू चीज ही -कुछ ऐसी मस्त-मस्त है कि  जो पीता है, वही इसका  मजा लेता है। ये मैं नहीं कह रहा, वे पियककड  कह रहे हैं जो पीने का भयंकर किस्म का  शौक  पाल चुके  हैं। और हर वक्त ‘मधुशाला’ की  पंक्तियां दोहराते हैं।


मैं उनसे कहता हूं कि  जिस ‘मधुशाला’ की कविता आप सुना रहे हैं उसके कवि ने कभी शराब नहीं पी।
पियककड ने कहा- ‘इसीलिए तो उस ‘मधुशाला’ में वो बात नहीं है जो होना चाहिए। अरे, बिना ‘प्रेक्टिकल किये अच्छे नंबर भी कभी मिलते हैं.भला?’
मैंने कहा- ‘ये शराब का  नशा तो ऐसा है बंधु कि,  पीने के  बाद कुछ होश भी तो रहे। तभी तो किसी  प्रेक्टिकल ज्ञान की  प्राप्ति होगी।’
पियककड  भाई बोले- ‘ये भी ठीक रह रहे हो। लेकिन मैं तो सच-सच कह रहा हूं कि ये चीज बड़ी है मस्त-मस्त।’
उनकी  पंक्ति को  मैंने आगे बढ़ाते हुए -कहा- ‘


‘ये चीज बड़ी है मस्त-मस्त,
कर देती सब-को त्रस्त-त्रस्त,
हो जाता घर  भी अस्त-व्यस्त,
स्वास्थ्य  भी रहता लस्त-पस्त।
ये चीज है ऐसी मस्त-मस्त।’’


पियककड  महाराज बोले- तुम हमारे शराब संघ के आदमी नहीं हो, जाओ दुगध पान क-रो।
बाद में पता चला कि ये सज्जन भी ऐसे हैं कि  लोगबाग इन्हें  शाम को  ‘टच’ नहीं करते। ऐसे लोगों की संख्या  बढ़ती जा रही है जो शाम होते ही आबकारी  विभाग की  आय में वृद्धि -करने पर तुल जाते हैं। इसमें कुछ तो मौज-मस्ती वाले होते हैं, तो कुछ मजदूर भाई होते हैं जो सोचते हैं कि  दारू पी लो, थकान उतर जाती है। पता नहीं किस चालाक शराब ठेकेदार ने उनके दिमाग में यह  फिट कर  दिया है. जबकि  थकान तो घर पहुंच कर परिवार के  बीच जाने से वैसे ही उतर जाती है। ज़िंदगी की  आपाधापी पतझर है तो घर  एक  मधुमास है। और ये दारू क्या  है? दुष्यंत ने खूब अच्छे  से समझाया है-


दिनभर धूप का  पर्वत काटा,
शाम को  पीने निकले हम,
जिन गलियों में मौत बिछी थी,
उनमें जीने निकले हम।


तो, शाम को मौत की  गलियों में भटकने वाले लोगों की संख्या  बढ़ती जा रही है। कुछ लोग ' घर'  में, कुछ लोग 'बार' में, अब तो जो ज्यादा 'माडर्न' हो गए है, वे लोग ''परिवार' में पीने लगे हैं..कुछ लोग ‘अड्डे’ में शौक  पूरा करते हैं। आपका कोई दोस्त अगर किसी के बारे में यह कहे कि  उसे शाम को  ‘टच’ मत करना, तो आप थोड़ा-सा पुन्य  जरूर कमाएं और उन्हें टच करें और समझाएं कि आप दारू को  टच न करें। क्योंकि ये जब शरीर के भीतरी हिस्से को  टच करना शुरू  करती है तो शरीर ‘बच’ नहीं पाता। और हाँ, इस बात का भी ध्यान रखें, कि दारू छुड़ाने के चक्कर में खुद भी शराबी न बन जाये. मेरे एक मित्र के साथ यही हुआ. अब उनका दरुहा मित्र अपने मित्र की शराब छुड़ाने की कोशिश कर रहा है.
मैं आज शाम अपने मित्र  गपोड़ूराम के घर  जा रहा हूं... उसे ‘टच’ करने। और जाकर बोलूंगा-


छोड़ दे पीना छोड़ शराबी,
बोतल अपनी तोड़ शराबी।
जीले जीवन को मस्ती से,
मौत से ले मत होड़ शराबी।

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गिरीश पंकज
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
जी-३१,  नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१

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१५ जनवरी २०१० को दिल्ली के स्थानीय हिन्दी भवन सभागार में ऑस्ट्रेलिया के अप्रवासी भारतीय कवियों की कविताओं का संग्रह ’बूमरैंग’ का लोकार्पण किया गया था । यह पुस्तक रेखा राजवंशी द्वारा संपादित है जिसमे उनके द्वारा ऑस्ट्रेलिया में बसे ११ भारतीय कवियों की कविताओं का संग्रह किया गया है । “द इंडियन डाउन अंडर” व अक्षरम द्वारा प्रायोजित इस कार्यक्रम में श्री अशोक चक्रधर व कन्हैया लाल नन्दन ने प्रवासियों द्वारा की गई हिन्दी-सेवा की प्रशंसा की । श्री अशोक चक्रधर ने कहा कि ये कवितायें नस्ली(!) नहीं असली हैं ।

साहित्यकार श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने बताया कि ये सारी कवितायें हिन्दी साहित्य को समृद्ध करती है । इस पुस्तक में भारत के प्रति चिन्ता नज़र आती है । लेखिका अनामिका ने बताया कि इन कविताओं में वतन का दर्द अभिव्यक्त होता है । मंच की संचालिका अल्का सिन्हा के अनुसार स्मृतियां जीवन का आधार होती हैं जिसे कवियों ने कविता के माध्यम से तराशा है । बूमरैंग फैंकने पर वापस लौट आता है और यह भारतवंशी साहित्यकारों की भावनाओं का , वृत्तियों का, इच्छाओं का प्रतीक है जो बार बार भारत की ओर उन्मुख होता है । पर ऐसा क्यों होता है ?

यू.के. व अन्य देशों के भारतीय साहित्यकारों द्वारा बार बार यह आवाज उठाई जाती है कि अगर साहित्य समाज का दर्पण है तो हम जिस पश्चिमी-मिट्टी में रहते हैं - उसके बारे में नहीं लिखते हैं । वे कहते हैं कि विदेश में भी हमारा भारतीय दिमाग ही सलामत रहता है । पर कहाँ और किस तरह ? पुस्तक के संदर्भ से इसका अर्थ यह निकलता है कि अब्बास रज़ा अलवी को क्यों “तेज हवा का यह झोंका सावन की याद दिलाता है “ और क्यों राय कूकणा को वित्तिय छलांगो में आकाश नापने में भूल नज़र आती है । सुभाष शर्मा उनको “सगी मां को दे तलाक सौतेली पाए हैं” कह कर इमोशनल ब्लैकमेल करने वाले नज़र आते हैं । आलोचकों का कहना है कि प्रवासी कवि और साहित्यकार क्यॊं नन्हे बालक की तरह "माँ माँ" करते हुये भारत की गोद से बाहर कुछ नहीं सोंचते? क्यों पाश्चात्य संस्कृति के वातावरण में रह कर भी “माँ के हाथों की बनी जब दाल-रोटी याद आई….” ( इन्ही पंक्तियों का लेखक ) का रोना रोते रहते हैं ? उनके हिसाब से यह सब विचारों की अपरिपक्वता का नमूना है ।

मेरा नम्र निवेदन है कि सामान्यत: काव्य भावना प्रधान होता है व गद्य विचार प्रधान । जब जब पुस्तकें गद्य में याने मस्तिष्क के स्वतन्त्र प्रवाह में लिखी जायगी, रचनाओं में समकालिन स्थितियों का बयान याने विदेशी परिवेश भी होगा । पर कवितायें भाव प्रधान होने से शाश्वत और स्थानातीत हो जाती है - मस्तिष्क से परे भी सोंचना शुरू कर देती हैं - “न जाने क्यों / क्यों और क्यों ? / मेरे आँख, कान, हाथ, पग – सब के सब दिमाग़ होगये है / और दिमाग़ ? / इन धूर्त बाजीगरों की कठपुतली।” (हरिहर झा) – कवितायें पंख पर उड़ने के साथ साथ अपनी जड़ों से याने भारतीय संस्कृति से जीवन रस लेने में कतई संकोच नही करती । प्रेम माथुर के शब्दों में जड़ का अपना अस्तित्व है और “पेड़ जड़ नहीं होते” ।

वैसे तो समारोह में उपस्थित सभी साहित्यकारों व श्रोताओं ने ’बूमरैंग’ की प्रशंसा की पर कुछ आलोचकों ने यह भी शिकायत की कि इन कविताओं को छ्न्दों की बेड़ियों में जकड़ कर अनुशासित क्यों नही किया गया ? भाव आलोचकों के हैं पर शब्द मेरे हैं ताकी उत्तर प्रश्न में ही समाहित हो जाय ।

आज के युग में भारत सहित विश्व-भर में पद्य को मात्रा की गणनाओं से मुक्त करने की हवा चल पड़ी है तो इस स्वतन्त्रता का उपयोग भारतीय प्रवासी कवि भी क्यों न करें ? फिर अगर अनिल वर्मा ने जब दोहो को माध्यम चुना तो भाव और छन्द दोनो का कुशलतापूर्वक निर्वाह भी किया है इसके बाद भी यदि पुस्तक में देशी व्यंजन परोसते हुये ऑस्ट्रेलिया की रीति-नीति समाहित हो जाय तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि रेखा राजवंशी के शब्दों में यहाँ पर “ दिल्ली का इंडिया गेट / बन गया डार्लिंग हार्बर / गंगा और यमुना / बनने लगी / हाक्सबरी और यारा रीवर ।“ यही उनका प्रत्युत्तर है जो भारतीय मानसिकता की आलोचना करने वालों को शायद दिखाई नहीं दिया ।

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मैंने सन 1971 में जिस बैंक मैं नौकरी शुरू की थी उसका नाम हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक था जो आज़ादी के पूर्व एक बड़ा बैंक हुआ करता था किंतु देश के विभाजन से उसकी अनेक शाखायें पाकिस्तान में डूब गयीं थीं और घाटा होने के कारण के इसकी अनेक शाखाओं को बन्द करना पड़ा था। उस दौर में सभी बड़े औद्योगिक घराने अपना बैंक चलाते थे यूको बैंक बिड़ला का था, सेंट्रल बैंक टाटा का था, पंजाब नेशनल बैंक डालमियाँ का था उसी क्रम में हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक सिंघानियाँ[जेके] औद्योगिक घराने का था। राष्ट्रीयकरण के पहले बैंकों के लेन देन के आंकड़ों के आधार पर ए,बी.सी ग्रेडिंग हुआ करती थी उस के अनुसार हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक –बी ग्रेड में आ गया था जो 1975 में जाकर फिर से –ए ग्रेड- बन पाया। 1969 में श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने राजनीतिक दबाव में जिन 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था वे सभी –ए ग्रेड के बैंक थे। बाद में 1986 में इस बैंक का विलय पंजाब नेशनल बैंक में हो गया था।

मैंने जब बैंक में बतौर क्लर्क नौकरी ज्वाइन की थी तब मेरा मूल वेतन कुल 180/- रुपये था और कुल वेतन लगभग 270/- रुपये मिलते थे किंतु जब मैंने 29 साल की नौकरी के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृति ली तब मेरा वेतन लगभग 20000/- रुपये हो गया था।

मेरे सर्विस में आने तक हालात बदल चुके थे काम के घंटे कुल सात हो गये थे जिसमें से आधा घंटा लंच के लिये था तथा शनिवार को आधे दिन ही काम होता था। समय के बाद काम करने पर ओवर टाइम भत्ता मिलता था। बाद में आपात काल लागू होने पर ओवर टाइम भत्ता बन्द कर दिया गया था।

राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग जगत में तेज़ी से बदलाव और विस्तार हुआ जिससे बहुत सारी नई भर्तियाँ और प्रमोशन हुये। मैं पोस्ट ग्रेजुएट था इसलिये मुझे चार साल में ही प्रमोशन मिल गया और में आफीसर बन गया था। मेरा बैंक कम शाखाओं वाला बैंक था इसलिये इसमें जूनियर अधिकरियों के भी ट्रांसफर पूरे देश में होते थे जिससे मुझे हरपालपुर, हरदोई, हाथरस, भरतपुर, गाज़ियाबाद, हैदराबाद, जबलपुर, कानपुर आदि स्थानों पर पदस्थ होने का मौका कुल पन्द्रह साल की नौकरी में ही मिल गया था। बाद में निरीक्षक बन जाने के बाद देश भर में अनेक जगह जाने के मौके मिले। पंजाब नेशनल बैंक जैसे बड़े बैंक में आने पर बार बार राज्य तो नहीं किंतु स्थान बदलने पड़े और मैंने लीड बैंक आफिस दतिया में छह साल गुज़ारे जहाँ राज्य शासन के अधिकारियों के साथ मिलकर ज़िले में बैंकों द्वारा किये जाने वाले कुल ऋण की योजनायें बनती थीं और उनके कार्यांवयन का मूल्यांकन होता था।

पहले बैंक बचत करने वाले मध्यम वर्ग की ज़मा और हैसियतदार व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिये ऋण उपलब्ध कराने के केन्द्र होने के कारण इलीट क्लास [शालीन वर्ग] का सेवा केन्द्र हुआ करते थे जो राष्ट्रीयकरण के बाद आम आदमी और किसान को कृषि ऋण उपलब्ध कराने के कारण सभी वर्गों के लिये उपयोगी संस्था में बदल गये थे। सरकार द्वारा प्रायोजित अनुदान से बल प्रदान करने वाली योजनाओं के आने के बाद सरकारी अधिकारियों और स्थानीय राजनीति की दखलन्दाज़ी बैंकों में आयी जिसने बैंकों की स्वच्छता को प्रभावित किया।

बैंक जो कभी ग्राहक के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध का अहसास देते थे वे किसी रेलवे या पोस्ट आफिस की तरह के मशीनी सम्बन्धों में बदलते गये। जब मैं बैंक से जुड़ा था तब केल्कुलेटर भी नहीं होते थे और वार्षिक लेखाबन्दी के दिन सारे खातों में ब्याज़ लगा कर और लेज़रों के बैलेंस मिला कर शाखा की बैलेंस शीट को अंतिम रूप देने के बाद ही कोई घर जा पाता था। सारे काम में इतनी सावधानी रखी जाती थी जैसे कि डाक्टर आपरेशन के समय रखते हैं।

आज अधिकांश बैंकों की सभी शाखायें सीबीएस सिस्टम से जुड़ गयी हैं और बैंकों के काम में बेहद विस्तार होने के बाबज़ूद भी काम में मानवीय भूल होने का भय नहीं रहा। मशीनें घंटों का काम सेकिंडों में सही सही कर देती हैं। ग्राहक सुविधाओं में बढोत्तरी हुयी है, पर बैंक वालों से दूरियाँ इतनी बढ गयी हैं कि न बैंक वाले अपने ग्राहकों को पहचानते हैं और ना ही ग्राहक बैंक वालों को। बैंक वालों की जानकारियाँ इतनी कम हो गयीं हैं कि कभी कोई बात पूछने पर वरिष्ठ अधिकारी भी कहते हैं कि हम यह तो नहीं बता सकते कि यह गणना किस नियम से की गयी है किंतु इतना विश्वास ज़रूर दिलाते हैं कि गणना सही ही होगी क्योंकि मशीन गलती नहीं करती। पुराने कर्मचारियों और अधिकारियों को कम्प्यूटर के प्रयोग में पारंगत होने में वक़्त लगेगा जो अभी कई बार असमंजस की स्थिति में फंसे दिखते हैं।

मशीन आने के बाद मानवीय सेवा सम्बन्धों में आये परिवर्तनों के अध्ययन के लिये बैंकिंग जगत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

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वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र

 

[दैनिक भास्कर भोपाल दिनांक 15 फरबरी 2010 में पूर्व प्रकाशित]

sheeba

(शीबा का ब्लॉग – खयाल यहाँ पढ़ें) 

जेंडर जिहाद

शरीअत का हौआ

परदा इधर : परदा उधर

शीबा असलम फ़हमी

[शीबा असलम फ़हमी का अत्यंत लोकप्रिय व चर्चित स्तंभ – जेंडर जिहाद हिन्दी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में पिछले कुछ अंकों से सिलसिलेवार जारी है. वैसे तो हंस अब पीडीएफ रूप में मई 2009 से नेट पर फिर से उपलब्ध हो गया है, मगर यूनिकोड में नहीं होने से बात नहीं बनती. रचनाकार के पाठकों के लिए खासतौर पर यह स्तंभ सिलसिलेवार रूप में यूनिकोडित कर, साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. पेश है जुलाई 2009 का आलेख.  जून 2009 का आलेख सब धान बाइस पंसेरी यहाँ तथा  मई 2009 का आलेख संविधान और क़बीला  यहाँ पढ़ें]

इस स्तंभ में पिछले पाँच अंकों से भारतीय मुसलमान महिलाओं की स्थिति पर चर्चा और पाठकों के उठाए प्रश्नों का विश्लेषण करते हुए, जिस एक मुद्दे को सबसे अधिक बार उठाया गया है वह है 'शरीअत क़ानून' मुसलमान, ग़ैर-मुसलमान, स्त्री-पुरूष, बु़द्धिजीवी व साधारण पाठक वर्ग सभी ने इस विषय पर न सिर्फ़ चिंता जताई है बल्कि इनका यह भी मानना है कि शरीअत-क़ानूनों के चलते ही मुस्लिम समाज में औरतों की दशा दयनीय है. अधिकतर प्रतिक्रियाओं में मुझ से आग्रह किया गया है कि शरीअत क़ानूनों से ऊपर उठ कर मुझे बात करनी चाहिये.

कुछ पाठकों ने इस पर उपहास भी किया है कि मैं शरीअत-क़ानूनों और महिला चिंतन को साथ-साथ कैसे चला रही हूं? भारत ही नहीं पूरी दुनिया में शरीअत क़ानूनों के अंतर्गत मुसलमान समाज पर जो प्रतिबंध लागू होते हैं वे अक्सर चर्चा का विषय बनते हैं. हालिया उदाहरण तालिबान का स्वात घाटी में शरिया-क़ानून का लागू करना एक ज्वलंत मुद्दा बना. भारत की हद तक देखें तो शाह बानो प्रकरण के बाद से लगातार इस मुद्दे पर भारतीय समाज में बहस छिड़ी हुई है. 2005 में इमराना प्रकरण ने फिर इसे केन्द्र में ला खड़ा किया था.

हालत यह है कि बृन्दा करात, सुभाषिनी अली आदि साम्यवादी फ़ेमनिस्ट लीडरों, जिन्होंने नारी-उत्पीड़न व पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई है, के साथ-साथ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, भारतीय जनता पार्टी जो कि मुसलमान महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार कर, उनके पेट फाड़कर अजन्मे शिशुओं को त्रिशूल की नोक पर टाँग कर विजय-उत्सव मनाते हैं, को भी शरीअत क़ानून व्यवस्था ने घोर चिंता में घेर रखा है.

आख़िर यह शरीअत क्या है? इसकी क्या ज़रूरत है? इस्लाम धर्म एक अक़ीदे (विश्वास) के साथ-साथ एक जीवन पद्धति भी है. इस्लाम जिन जीवन मूल्यों जैसे इन्सानी बराबरी, इंसाफ़, भाइचारा, करूणा आदि की स्थापना की बात करता है. इन मूल्यों के पालन व सामाजिक जीवन में इनकी स्थापना जिन क़ानूनी प्रावधानों द्वारा हो सकती है, मोटे तौर पर वे ही शरीअत क़ानूनों का आधार हैं.

किसी भी ज़हन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि कहां करूणा, इंसाफ़, बराबरी और भाईचारे की बातें और कहां शरीअत के सख़्त, बेरहम, पुरातनपंथी क़ानूनी प्रावधान! तालिबानी हरकतें देखकर तो तयशुदा तौर पर 'जंगल के क़ानून' का आभास होता है. बहुत से शिक्षित व फ़िक्रमन्द मुसलमान स्त्री-पुरूष इस मसले पर आकर हताश हो जाते हैं. वे इस्लाम धर्म में आस्था के बावजूद, अल्लाह और उसके पैग़म्बर में विश्वास के बावजूद, 'शरीअत' के मसले पर क्रोध, झुंझलाहट और लाचारी के सिवा कुछ नहीं ज़ाहिर कर पाते. इस मसले पर आकर अच्छे-अच्छों को 'डिफ़ेन्सिव' होकर भीगी बिल्ली बनते देखा जा सकता है.

इस स्तम्भ के पाठकों ने मुझे भी धिक्कारा है कि क्या मैं शरीअत से ऊपर नहीं उठ सकती? स्वयं राजेन्द्र यादव साहब ने अपने सम्पादकीय में शरीअत की बिना पर इस्लाम धर्म से मुक्ति पा लेने का सुझाव रखा है. हालाँकि राजेन्द्र यादव साहब तो बराबर उन विषयों पर लिखते रहे हैं जो इन्सानी स्वतंत्रता और गरिमा के विरूद्ध हों, चाहे वे किसी भी धर्म के हों पर वे लोग जो अन्यथा तटस्थ भाव से 'सभी धर्म अच्छे हैं' की लीपापोती से काम चलाते हैं, शरीअत के मामले में तटस्थ नहीं रह पाते.

शरीअत क़ानून के मुख्यतः चार स्रोत हैं- 1 कुरान (जो कि अल्लाह का कलाम है अतः संशोधन से परे है) 2 सुन्नः , 3 इज्मा व 4 क़यास. शिया फ़िरक़े में इज्मा व क़यास को मान्यता प्राप्त नहीं है वे इसकी जगह 'मनतक़' या लॉजिक सम्मिलित करते हैं. शिया मुसलमान कुरान, सुन्नः मनतक़ और अक़्ल को शरीअत क़ानून का स्रोत मानते हैं. पूरे कुरान में 'शरियाः' शब्द बतौर संज्ञा केवल एक बार आया है (45:18). जबकि 'शरियाः' शब्द के व्युत्पत्ति (डेरीवेटिव) अन्य तीन जगह आए हैं. 42:13, 42:21 और 5:51 आयतों में. इसके अलावा दीगर स्रोत जैसे 'फ़िक़्ह' भी मान्यता प्राप्त स्रोत है. कुल मिला कर कुरान और सुन्नः को छोड़ कर बाक़ी सभी स्रोत इन्सानी समझ, राय और व्याख्या ही हैं.

विद्वानों का मानना है कि ईश्वरीय आदेशों (कुरान) और सुन्नः की मानवीय व्याख्याओं के इस मिश्रण को 'सेक्रो-सेक्ंट' और अतिपवित्र मानकर जो जड़ता पैदा हुई है उसके कारण ही शरिया विवादित हुआ है. इसके अलावा ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि शरीअत क़ानून नौंवी सदी की शुरुआत में 'अल-रिसाला' नामक पुस्तक में पहली बार क़लम बन्द किये गए. इस किताब के रचयिता आलिम मुहम्मद इब्न इदरीस अश्'शफ़ी, जो कि शाफ़इ फ़िरक़े के इमाम भी हैं ने यह महत्वपूर्ण काम किया. शरीअत क़ानून शुरूआती दौर में जिन समाजों के लिये आए वे क़बीलाई समाज थे और यह क़ानून उनकी क़बीलाई जीवन पद्धति को केन्द्र में रखकर बनाए गए थे. अतः इन क़ानूनों में व्यक्तिवाद की झलक कहीं नहीं मिलती, भले ही क़ानून बनाने वाला एक व्यक्ति ही क्यों न हो. इस्लाम मज़हब जो कि एकेश्वरवाद और अल्लाह और बन्दे के बीच सीधे संवाद और इबादत की स्थापना करता है वहीं मुस्लिम समाज को एक सामुदायिक व्यवस्था भी देता है. उपरोक्त तथ्यात्मक परिचय की ज़रूरत इसलिये थी कि वर्तमान में शरीअत क़ानूनों को लेकर च्ंहम 65 जुलाई, 2009 65 जो जड़ता, पिछड़ापन और कट्टरता आई है उसका समाधान सामने लाया जा सके.

ऊपर दिये संक्षिप्त परिचय से यह साफ़ है कि शरीअत क़ानून और कुरान की कोई बराबरी नहीं. ना ही शरीअत क़ानून ईश्वरीय वाणी हैं और न मुहम्मद साहब की सुन्नः. हां शरीअत का आधार दोनों की मानवीय स्मृतियां, व्याख्याएं, उलेमाओं की जमा राय व इन तीनों स्रोतों से निकला 'क़यास' है. इसलिये शरीअत कोई ऐसी चीज़ नहीं जो इन्सानी व्याख्या से परे हो बल्कि यह तो है ही इन्सानी व्याख्या. ऐसी स्थिति में कठमुल्लों का यह तर्क कि 'शरीअत क़ानूनों में कोई तब्दीली मुमकिन नहीं, यह अटल व ईश्वरीय है' कि हवा इस हक़ीक़त से निकल जाती है कि इस्लाम में शुरू से पांच फ़िरक़े (मज़हब) अपनी-अपनी शारियः के साथ मौजूद रहे और बिना किसी झगड़े के. बाद में जाफ़री मज़हब में तीन शाखें और जुड़ीं सो अब चार सुन्नी और चार शिया फ़िरक़े वजूद में हैं. इतने अकाटय तथ्यों के बावजूद जड़ और मर्दवादी मुल्ला लगातार यह झूठ दोहराते रहते हैं कि शरीअत क़ानून में बदलाव मुमकिन नहीं.

इंडोनेशिया, मलेशिया, तुर्की, इराक़, इरान, मोरक्को, मिस्र, बांग्लादेश, त्यूनिशिया, स्पेन आदि मुल्कों में अनगिनत शरिया सुधार किये जा चुके हैं और यह सुधार केवल औरतों से सम्बन्धित नहीं हैं बल्कि आज के वक़्त के तक़ाज़ों को ध्यान में रख कर किये गए हैं जो पूरे समाज के लिये ज़रूरी हैं. स्वयं कठमुल्ले भी तथाकथित 'नई व्याख्याएं' कर के अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं. तालिबानी अफ़ग़ानिस्तान में स्कूलों, अस्पतालों, बामियान में आसारे क़दीमा (बुद्ध की मूर्ति) को नेस्तनाबूद कर के ऐलानिया तौर पर एक 'नई' शरीअत व्यवस्था सामने लाई जा रही है. स्वात घाटी में तो इससे भी आगे जाकर पशतून क़बीले की अत्यंत कट्टरपंथी व्यवस्था जिसे पशतूनी क़बीलाई क़ानून या 'पशतूनवाली' कहते हैं सामने आई है.

इस्लाम की इस रेडिकल 'देवबन्दी- वहाबी' व्याख्या और पशतूनवाली के घालमेल से जो शरीअत उपजी है वह लड़कियों के इल्म हासिल करने के ख़िलाफ़ है, यह शिया मसलक को इस्लाम में नहीं मानते, जबकि एक शिया इरान ही है जो अमरीका और इस्राइल को खुली इस्लामी चुनौती देता रहा है वहीं तालिबान के सऊदी प्रयोजक व फाइनेन्सर अमरीका के जूते चाटते रहे हैं. ये 'हज़ारा' मसलक को भी इस्लाम से बेदख़ल मानते हैं. इनकी शरीअत के अनुसार इस्लाम सियासत व सियासी पर्टी की इजाज़त नहीं देता इसलिये ये सरकारी अफ़सरों और सैनिकों को तनख़्वाह भी नहीं देते, केवल खाना, कपड़ा, जूते और हथियार देते हैं, ये अर्थव्यवस्था, अकाउन्ट रखना, प्रेस, फोटोग्राफ़ी, पतंग उड़ाना, ताली बजाना, दाढ़ी कटवाना, औरतों के खेलकूद को ग़ैर इस्लामी बताते हैं. हां यह अफ़ीम के प्रत्येक ट्रक से 20 प्रतिशत का 'ज़कात' टैक्स वसूल करते हैं जबकि इस्लाम में 'ज़कात' जायज़ बचत की 2.5% ही है.

कुल मिलाकर यह 'ज़कात' जैसी बुनियादी संस्था जो कि इस्लाम के पांच खम्बों में से एक है, से इतनी बड़ी छेड़-छाड़ कर लेते हैं अपनी अलग 'शरीअत' बना कर. और इस जंगली क़ानून को 'शरीअत-ए- मुहम्मदी' नाम देने की जुर्रत भी कर लेते हैं. अपने इन भूतपूर्व शागिर्दों की इस हरकत पर दारूल उलूम देवबन्द कोई फ़तवा जारी नहीं करता.

शरीअत में स्त्री-विरोधी बदलाव की एक और मिसाल देखिये- 27 जुलाई 2003 में मलेशिया की शरीअत कोर्ट ने और बाद में सऊदी अरब व क़तर में भी मोबाइल फ़ोन से 'एस.एम.एस' द्वारा त्वरित तलाक़ को शरीअत मुताबिक़ क़रार दिया गया. जिस कुरान में औरत को तलाक़ देने की शर्तें लिखित रूप में आई हों, उसी किताब पर आधारित शरीअत क़ानून ऐसी धांधलियों की इजाज़त दे रहे हैं. चौदह सौ साल पहले किसी ने मोबाइल फ़ोन और एस.एम.एस की कल्पना भी नहीं की होगी पर आज इसका ऐसा इस्तेमाल इस्लाम सम्मत है? ऐसी अनेकों मिसालें हैं जहां नई से नई शरीअत गढ़ कर कठमुल्ले और धोखेबाज़ मर्द बेहयाई से अपनी औरतों का हक़ मार रहे हैं, उन्हें बेसहारा और यतीम कर रहे हैं. शरीअत की ऐसी नई और 'क्रांतिकारी' व्याख्याओं से कभी किसी मौलाना को आपत्ति नहीं होगी क्योंकि इन्होंने इस्लाम को 'मेन्स ओनली क्लब' समझ रखा है. हां अगर एक 69 साल की बुजुर्ग और पांच बच्चों की मां को शौहर तलाक़ दे और कुरान की हिदायत के मुताबिक़ वह अदालत से 25/- रु. महीने का गुज़ारा ख़र्च शौहर से बंधवा ले तो पढ़े लिखे सयद शहाबुद्दीनों और उबेददुल्लाह ख़ां आज़मियों का इस्लाम ख़तरे में पड़ जाता है. वे देश व्यापी रैलियां कर सरकार की ईंट से ईंट बजा सकते हैं. पर जब एक ज़्यादा ताक़तवर गिरोह जबरिया और एलानिया एक मस्जिद गिराने निकलता है तो कोई बुख़ारी, कोई आज़मी, कोई एम जे अकबर, कोई शहाबुद्दीन अपने बिल से नहीं निकलता. तब यह मर्द-मुजाहिद 'क़ानून-क़ानून' की तोता रटन्त लगाते हैं.

शाहबानों केस से प्राणवान होने वाले आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हमेशा मुसलमान औरतों के हक़ पर डाका डाला है. इसकी एक और मिसाल यह कि सन 2002 में महराष्ट्र हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने 'दग्धू पठान बनाम रहीम-बी दग्धू पठान' मामले में यह निर्देश दिया कि मुसलमान पति को तलाक़ का रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी होगा क्योंकि अक्सर गुज़ारा भत्ता के मामलों में पति यह कह कर बच निकलता है कि वह तो बरसों पहले तलाक़ दे चुका है तो अब कैसा गुज़ारा भत्ता? क्योंकि भारत में मौखिक त्वरित-तलाक़ जैसी ग़ैर इस्लामी परम्परा अभी तक मान्य है तो इस हालत में यह एक सही फ़ैसला था. पर बोर्ड ने इतने सीधे और सेहतमन्द निर्देश का भी व्यापक विरोध यह कह कर किया कि यह हमारे 'राइट टू प्राइवेसी' पर हमला है. यही नहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार से मुसलमान बच्चों को शारदा एक्ट से भी बाहर रखने का आग्रह किया. अभी कुछ महीने पहले उ॰प्र॰ मदरसा बोर्ड ने आठवीं जमात के बाद 25,000 लड़कियों को 1600 सहशिक्षा मदरसों से यह कह कर बाहर कर दिया कि इससे बेपर्दगी होगी और इस्लाम की रूह को नुक़सान पहुंचेगा. मुज़फ़्फ़रनगर के एक गांव की मुस्लिम पंचायत बलात्कारी ससुर को 'इस्लाम व शरीअत अनुसार', पीड़ित-बहू 'पत्नी' के रूप में भेंट कर 'इंसाफ़' करती है, और देवबन्द इस शरियती इंसाफ़ के पक्ष में फ़तवा देता है.

सत्ता के भूखे तालिबान शरीअत को अपराध-सम्मत बना कर अफ़ीम से 20 च्ंहम 66 जुलाई, 2009 66 प्रतिशत का ज़कात टैक्स वसूल कर सकते हैं, सामूहिक बलात्कार को 'सज़ा' के रूप में मुस्लिम क़बीलाई स्थापित कर सकते हैं, एस.एम.एस से तलाक़ देकर बुज़दिल शौहर हर ज़िम्मेदारी से फ़रार हो सकता है, शरीअत के नाम पर मुसलमान लड़कियों को दीनी इल्म से महरूम किया जा सकता है, पर जब औरतें शरीअत क़ानून की इन मर्दवादी व्यवस्थाओं में सुधार की बात करें तो यह बेचारी हर तरह से तोड़ी-मरोड़ी-ऐंठी शरीअत क़ुरान के बराबर ला कर बिठा दी जाती है. कोई ताज्जुब नहीं कि सारी दुनिया शरीअत क़ानूनों पर एतराज़ करती है, उन्हें बर्बर, मर्दवादी और नाइंसाफ़ी का स्रोत समझती हैं. जब राजेन्द्र यादव जैसे इन्सान-दोस्त और साफ़गो विश्लेषक शरीअत पर सवाल उठाते हैं, जब तमाम शिक्षित मुसलमान, ग़ैर-मुस्लिम, स्त्री-पुरूष शरीअत के इस विरोधाभासी, ग़ैर भरोसेमन्द और अन्यायपूर्ण संस्करण पर झुंझलाते हैं तब सभी मुस्लिम इदारे इधर-उधर हो लेते हैं. कोई पर्सनल लॉ बोर्ड, कोई मदरसा बोर्ड, कोई फ़िक़्ह आकादमी, कोई मजलिस मुशावरत और कोई जमात या जमियत इस धुन्ध को साफ़ कर सही इस्लाम को सामने नहीं लाती. भला हो हिन्दुस्तानी न्यायालयों का जो घरेलू मामलों में क़ुरान की रौशनी में फ़ैसले दे कर इंसाफ़ कर रहे हैं.

पूरे विश्व में जहां जहां 'इस्लामी फ़ेमनिज़्म' मुस्लिम महिलाओं को जागरूक बना रहा है वहां वहां शरीअत में बदलाव की मांग बढ़ रही है. जून 2009 के हंस में इस स्तम्भ के पाठकों ने और दूसरी प्रतिक्रियाओं ने शरीअत पर गंभीर आरोप लगाए हैं जो कि बहुत हद तक ठीक हैं. शरीअत क़ानून' अल्लाह का कलाम नहीं है जो कि अटल और पवित्रतम हों. वरना हर मुस्लिम देश व समाज में अलग-अलग शरीअत प्रावधान न होते. यह अल्लाह के कलाम की इन्सानों (कुलीन मर्दों) द्वारा की गयी क़बीलाई व्याख्या है, यह मुहम्मद साहब के जीवन के उन उदाहरणों की मदद से बनी है जो कि उनके साथियों यानी 'सहाबा' ने अपनी स्मृति अुनसार दर्ज करवाए या जो कि 'सहाबा' के साथियों ने जिन्हें ताबिइन' कहा जाता है, ने 'सहाबा' के हवाले से दर्ज करवाए या 'ताबि अत-ताबिइन' जो कि 'ताबिइन' के साथी थे और उनके हवाले से वाक़्यात दर्ज करते थे- यानी 'सहाबा' के अलावा बाक़ी दोनों हवाले मुहम्मद साहब को न कभी देख सके न सुन सके. शरीअत का तीसरा आधार आलिमों की सर्वसम्मत राय यानी 'इज्मा' यानी फिर इन्सानी समझ के आधार पर निष्कर्ष और चौथा स्रोत 'क़यास' यानी उपरोक्त तीनों स्रोतों के मद्देनज़र एक इन्सानी समझ आधारित निष्कर्ष.

एक पाठकीय प्रतिक्रिया में मुझसे तीखा सवाल पूछा गया है कि इस्लाम, क़ुरान और शरीअत में रहकर कैसा नारी चिंतन? स्वयं अधिसंख्य मुसलमान औरतें (व मर्द भी) मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के फैलाए हुए भ्रम का शिकार हैं कि इस्लाम, क़ुरान, सुन्नः, शरीअत और फ़िक़्ह एक ऐसा हौआ है जिसे आम आदमी न समझ सकता है न छू सकता है. जबकि हक़ीक़त यह है कि यह सब एक लंबी डोर का हिस्सा ज़रूर हैं पर अलग-अलग स्तर पर यथोचित गरिमा के साथ पिरोये गए हैं.

इस्लाम, कुरान, सुन्नः और शरीअत के बीच इस बहुत अहम बारीकी को समझे बग़ैर जब शिक्षित, वर्ग चाहे वह मुसलमान हो या ग़ैर-मुस्लिम, 'मुस्लिम समाज' की आलोचना को इस्लाम, कुरान या सुन्नः तक ले जाता है तो अपनी तमाम वाजिब फ़िक्र व जिज्ञासा के बावजूद उनकी आलोचना 'बूमरैन्ग' कर जाती है. उनका सुधारवादी विमर्श इस्लाम के विरुद्ध 'पूर्वाग्रह' या 'साज़िश' के ख़ाने में जा गिरता है. और इस असफल प्रक्रिया का फ़ायदा हिंदुत्व, मुस्लिम कटटरपंथी व अमरीका/इस्राइल जैसे उठाते हैं.

मुस्लिम कट्टरपंथी व यथास्थितिवादी इस समीक्षा और आलोचना को अल्लाह, इस्लाम, कुरान व मुहम्मद साहब के विरुद्ध प्रचार व कुफ्ऱ की पहचान देकर हंगामा खड़ा करवा देते हैं. इससे वे न सिर्फ़ आंतरिक व बाहरी आलोचना का गला घोंट पाते हैं बल्कि राज व सरकार को आतंकित कर अपना 'बारगेनिंग पावर' भी बढ़ाते हैं. दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथी व हिंदुत्व शक्तियों से मुस्लिम असहिष्णुता और सरकारी तुष्टीकरण के बतौर पेश कर स्वयं के ग़ैरसंवैधानिक व 'हेट-एजेंडें' को 'जस्टीफ़ाई' करती हैं. विश्वस्तर पर अमेरिका इसे 'सभ्यताओं के टकराव' के ढांचे में बिठाकर एक पूरे समाज को असभ्य व आपराधिक संस्कृति घोषित कर अपने हथियार-उद्योग को सदा प्राणवान बनाए रखता है. इन सबके बीच नुक़सान में वह पीड़ित वर्ग (महिला, अजलाफ़, अरज़ाल, शिक्षित, तरक़्क़ीपसंद) रहता है जिसके लिए कुछ नहीं बदलता. बस हताशा बढ़ती जाती है. इस्लाम एक इन्सान-दोस्त, इंसाफ़पसन्द, बराबरी और भाईचारे का मज़हब है. जबकि शरीअत के क़ानून कई स्रोतों के निहितार्थ की इंसानी व्याख्या. शरीअत में जब विकृत तालिबानी और मर्दवादी 'बिगाड़' मुमकिन हैं तो न्यायवादी 'सुधार' भी मुमकिन हैं.

मैं फिर दोहराऊंगी कि मुस्लिम औरतें नारीवादी सुधारों के लिए क़ुरान का सहारा लें. क़ुरान में औरतों के अधिकार और पुरुषों के कर्तव्य हैं जबकि 'शरीअत क़ानूनों' में हर मसलक में (कहीं ज़्यादा कहीं कम) औरतों के कर्तव्य और मर्दों के अधिकार दर्ज करवाए गए हैं. बात साफ़ है-अल्लाह के कलाम को 'मर्दों की व्याख्या' से नहीं उसके मूल पाठ के अर्थों से समझिये, संतुलन वापस आ जाएगा. इस स्तम्भ के किसी भी लेख में या अपने पहले के लेखन में भी मैंने शरीअत को कभी उधृत नहीं किया सिर्फ़ क़ुरान व सुन्नः को ही आधार बनाया है. अल्लाह का कलाम क़ुरान एक आम बोलचाल की विकसित भाषा में आया है जिसे 'समझ' कर पढ़ना मुम्किन है. ग़ैर अरबी क्षेत्रों के लिये अनुवाद उपलब्ध हैं. वह मुसलमान जो क़ानून-विद डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर हैं यदि ज़रा सी मेहनत क़ुरान समझने में करें तो कठमुल्लों और यथास्थितिवादियों की हिमाक़तों को चुनौती भी दे सकेंगे और सही इस्लाम को दुनिया के सामने ला सकेंगे. बाक़ी इस्लामी दुनिया में औरतों ने यह बीड़ा उठाना शुरू कर दिया है, और मुस्लिम सरकारों को उनके आगे झुकना भी पड़ रहा है पर उनकी तुलना में भारत में यह प्रक्रिया बहुत धीमी है. हिन्दोस्तान में तथाकथित 'शरीअत लॉ' के नाम पर जो धाँधली चल रही है उसका ख़ुलासा अगले लेख में.

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(हंस, जुलाई 2009 से साभार)

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