संदेश

March, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

श्याम गुप्त की ‘हनुमान जी –प्रार्थना’

चित्र
(देव घनाक्षरी-३३वर्ण, अन्त में दो नगण)बाल ब्रह्मचारी पवन पुत्र जब हांक भरें ,कांपें दुष्ट और कुविचारी थर थर थर ।सारे लोक मॆं हैं तभी पूज्य अन्जनी के लाल,रहते हें सदा हर ग्राम नगर घर घर ।चाहे कलियुग हो या हो शनि दुष्ट ग्रह कोई,सुमिरे पवन सुत भागें सर सर सर ।काल सम कराल विकराल ,रवि गाल धर ,श्याम के निवारें शोक दोष हर हर कर ॥-----डॉ. श्याम गुप्त

हरेन्द्र सिंह रावत की रचनाएँ

सोचो इस धरती का क्या होगा ? इंसान इंसान का दुश्मन बन गया, ज्वालामुखी फटने वाला है,  प्रदूषण का दानव आ रहा लगता कितना काला है ? सज्जन सहमें सहमें से, दुर्जनों की बन आई, कुदरत भी गुस्से में है देखो काली घटा नभ में छाई! गर्जन तर्जन नभ में हो रही, तूफान आने वाला है, बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! १ ! देखो हिमालय पिघल रहा है एवरेस्ट बदरंग हुआ, इंसान की काली करतूतों से जग कर्ता भी दंग हुआ ! जंगल कट गये वन चर मर गये नदियों का पानी सुख गया, संतुलन बिगड़ गया कुदरत का यह सब इस मानव ने किया ! प्रदूषण का काला जहर अब स्वर्ग तक जाने वाला है, बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! २ ! बुजुर्ग वरगद पीपल आम कह रहे हो गयी है शाम, अरे वो कुकर्मी इंसान अब तो कर कुछ अच्छे काम ! बसंत में भी पतझर है जंगल का मंगल रूठ गया, नेता की अचकन टोपी पर काला दाग है नया नया ! ऋषि मुनियों का ये देश बदल रहा है अपना भेष, जुर्मों की इस दुनिया में नेता पर है हत्या केस ! नील गगन में हल चल मच गई वो अग्नि बरसाने वाला है, बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! ३ ! पानी की मछली तड़प रही पानी में…

सुरेन्द्र सुकुमार की लघुकथा – धर्म का सदुपयोग

चित्र
ट्रेन में सफर कर रही एक मुस्लिम महिला का दो वर्ष का बच्चा बहुत परेशान कर रहा था. मां का दूध पीने की जिद कर रहा था. मां बार-बार शीशी का दूध मुंह से लगाती. पर बच्चा शीशी से मुंह नहीं लगाता. महिला झुंझला कर कभी बच्चे को मारती, फटकारती, डराती. धमकाती कभी पुचकार कर बहलाती, पर बच्चा नहीं मानता.पास ही बैठी एक हिंदू महिला की गोद में भी लगभग दो वर्ष का बच्चा सो रहा था. उसने पूछा, ‘क्यों बहन जी, आपका बच्चा ऊपर का दूध नहीं पीता?’“कहाँ पीवै है, हमारी हड्डियों को ही चिचोड़े है, जबकि बूंद भर भी दूध न निकले. घर में तभी थोड़ा बहुत पी लेवे है, अब मैं यहाँ कहाँ से कनकटिया बुराऊं. घर में कनकटिया के डर से पी लेवे है.”“कनकटिया क्या?”“क्या बताऊँ, मस्जित से पांच टेम अजान की आवाज़ लौड़ स्पीकर में आवे हैं तो हमने उसे कह रखा है कि ये कनकटिया की आवाज है जो बच्चा दूध न पीवे है उसके कान काट लेवै है. सो जैसे ही अजान होवे है अपने आप दूध मांग लेवे है. अब मैं कहाँ से कनकटिया बुराऊं.” महिला फिर झींकने लगी.हिंदू महिला अनायास हंसती हुई बोली, “हमने भी ऐसे ही डरा रखा है मंदिर में जब शंख बजता है तो हमने इसे कह रखा है ये हउ…

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की 3 कविताएँ

पानीकिस पाताल में छुप गया पानीमेघ नहीं सुना रहे कहानीटूट गये तालाबचुक गई कुएं की रवानीटर्र-टर्र की आवाजबन गई अतीत की कहानीऋतु चक्र कहा बहक गयादिखने लगी तलछट पुरानीमनुष्यता ठहाके लगातीखतरे में है प्रकृतिजलचर तक की जवानी।----सियासतसियासत में हो गयाचापलूसों का बोलबालामानवीय संवेदनाओं कोनहीं कोई पूछने वालाआतंकी विस्‍फोट मेंपैर गंवाने वाले को मिलते पाँच लाखऔर सरकारी बस से मौत होने परमिलता है एक लाख!मौत और दुर्घटना में भी हो रही है सौदेबाजीअगर शिकार बनना ही है तोलोग करे प्रकृति से प्रार्थनामुझे दुर्घटना का शिकार बनाते वक्‍त मेरे खाते मेंइतना जरूर लिख देनाजो भी बुरा हो वह विस्‍फोट में होनहीं तो सियासत की भेंट चढ़ जाएंगेमौत पर कमदुर्घटना पर अधिक मुआवजा पांएगे।----प्रतिबद्धतासामान्‍य से कहीं अधिक मजबूत है मेरी प्रतिबद्धताव्‍यवस्‍था में कुछ काली भेड़ेंभौतिक वस्‍तुओं के माध्‍यम से राह आसान नहीं होने देती हैपग-पग पर कील औरकाटें बोती हैंछूत और अछूत की माया मेंस्‍वेत-श्याम करती हैहवा और पानी परकोई रूख तो करेतभी घर से निकलेगें लोगतब तक हम चुप क्‍यों रहेहम अपनी प्रतिबद्धता के कारण लड़ेंगे।---सुरेन्‍द…

रामदीन के अर्द्धसत्य दोहे - इस होली में भइया सुनी है अजब कहानी, टाप सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी।

चित्र
अर्द्धसत्‍यइस होली में भइया सुनी है अजब कहानी,टाप सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी।
बिरियानी के बाद वह मांगे कुल्‍फी और मलाई,देश के बच्‍चे दूध को तरसें, उल्‍टे होय पिटाई।
अब तक 36 (करोड़) खरच हो चुके, आगे कब क्‍या होगा?जब जब वह मुँह खोले भइया मर जाये मेरी नानी।टाप सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी॥
कभी तो माँगे मनमोहन को कभी रसगुल्‍ले,देष के बच्‍चे भूखे बिलखे झूठे करते कुल्‍ले।
बीच बजरिया अगर उसे हम उल्‍टा टंगवा देते,दहशतगर्दी कम हो जाती, हम भी चैन से सोते।
पर, गल्‍ती मेरी, हमी नपुंसक, हम यह कर ना पाये।दुनियाँ वाले मटक रहे है देख मेरी नादानी,कड़ी सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी॥
रामदीनजे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी,कृष्णानगर, कानपुर रोड, लखनऊ।

सुभाष जैन सरल का हास्य व्यंग्य कविता पाठ

सुभाष जैन सरल का गद्गद् करता हास्य व्यंग्य कविता पाठ देखें / सुनें नीचे वीडियो पर

ओम प्रकाश भार्गव का जीवंत हास्य व्यंग्य पाठ

ओम प्रकाश भार्गव का मजेदार हास्य व्यंग्य पाठ जीवंत देखें नीचे वीडियो पर

प्रदीप नवीन का हास्य व्यंग्य कविता पाठ

प्रदीप नवीन अपनी खास हास्य व्यंग्य शैली के लिए जाने जाते हैं. उनकी प्रस्तुति भी लाजवाब होती है. उनकी रचनाओं का देख-सुन कर आनंद लें – नीचे दिए गए वीडियो डब्बे पर

सीमा साहा का निबंध : यदि जीवन दुबारा जीने को मिले

चित्र
यदि जीवन दुबारा जीने को मिले: सीमा साहा,वर्ग : नवम्,जवाहर नवोदय विद्यालय,(पश्चिम बंगाल)जीवन विषम परिस्थितियों का दूसरा नाम है। सुख-दुःख, आशा-निराशा, उत्साह-निरुत्साह आदि क्रमबद्ध रूप से इसके अङ्ग हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उपर्युक्त परिस्थितियाँ आती ही हैं। मैं भी कोई अपवाद नहीं।अब तक के जीवन कई भूलें हुईं, कई बार जीवन-पथ पर ठोकर मिले, क ने कहा जीवन व्यर्थ है; पर, क्या जीवन सचमुच व्यर्थ है? मनुष्य तो परिस्थितियों के अधीन होता है। परिस्थितिवश उससे कुछ ऐसा कृत्य हो जाता है, जो बाद में उसके लिए घातक सिद्ध हो जाता है। तो क्या वह गलतियाँ करना छोड़ दे, क्या वह ठोकर न खाए? मैं ऐसा नहीं मानता। ये भूलें, ये गलतियाँ उस व्यक्ति-विशेष के व्यक्तित्व-निर्माण, जीवन-निर्मिति में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। गलतियों से वह सीखता है, ठोकर खाकर संभलता है और इसी बहाने वातावरण से परिचित होता है।यदि मुझसे कोई पूछे, क्या तुम अब तक के जीवन से सन्तुष्ट हो? क्या तुम्हें तुम्हारा मनचाहा मिल गया? मैं कहूँगा, नहीं। आख़िर कोई कभी सन्तुष्ट हो सकता है भला! मैं भी नहीं हूँ। और जहाँ तक रही इच्छा पूर्ति की बात, तो व…

मधु सक्सेना का हास्य व्यंग्य पाठ

मप्र प्रादेशिक लेखक संघ द्वारा आयोजित हास्य व्यंग्य गोष्ठी के अवसर पर मधु सक्सेना द्वारा हास्य व्यंग्य का पाठ किया गया. रेकॉर्डेड वीडियो से हास्य व्यंग्य का आनंद लें-

राघवेन्द्र शर्मा का हास्य व्यंग्य कविता पाठ

रघवेन्द्र शर्मा अपने कविता पाठ में पूरी ऊर्जा से निर्मल हास्य – व्यंग्य बिखेरते हैं. एक जलवा देखिए नीचे दिए वीडियो में-

शरद नागर का हास्य व्यंग्य कविता पाठ

शरद नागर का जबर्दस्त हास्य व्यंग्य कविता पाठ का आनंद लें नीचे दिए वीडियो पर

एल एन भावसार – ‘हुसैन’ हमारे हैं, हमारे रहेंगे – चाहे जहाँ रहें

दुनिया या हुसैन हा हुसैन कर रही है. इन सबके बीच जीवन के शतायु को छू रहे हुसैन अपनी कूँची से कला की दुनिया में नित्य नया संसार रच रहे हैं. हुसैन की कला को वरिष्ठ चित्रकार व शिक्षाविद् डॉ. लक्ष्मी नारायण भावसार ने बेहद करीब से देखा-जाना है. हुसैन की कलायात्रा के शुरूआती दौर से ही हुसैन व उनकी कलाकृतियों के साथ व साक्षी रहे एल एन भावसार हुसैन विवाद को एक कलाकार के दृष्टिकोण से देख रहे हैं और बता रहे हैं कि हुसैन तो कला के सागर हैं. विस्तृत साक्षात्कार देखें वीडियो में यू-ट्यूब पर-

हरि जोशी का हास्य - व्यंग्य पाठ (जीवंत प्रसारण - वीडियोकास्ट)

जाने माने, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरि जोशी द्वारा उनके स्वयं के द्वारा किए गए व्यंग्य पाठ  का आनंद लें यूट्यूब वीडियो पर

दीप तलैया पंछी का हास्य - व्यंग्य कविता पाठ

नुकीले नश्तर युक्त तीखे हास्य व्यंग्य की कविताएँ दीप तलैया की खासियत है. स्मित हास्य से देखें/सुनें उनका हास्य व्यंग्य कविता पाठ -

विजया तैलंग का हास्य – व्यंग्य पाठ (जीवंत प्रसारण – वीडियोकास्ट)

विजया तैलंग की चुटीली, मजेदार हास्य – व्यंग्य पाठ का आनंद उनके स्वयं के स्वरों से लें. देखें यूट्यूब वीडियो पर -

राजीव नामदेव का हास्य – व्यंग्य कविता पाठ (जीवंत प्रसारण - वीडियोकास्ट)

राजीव नामदेव के करारे, चुटीले हास्य व्यंग्य का आनंद लें यू-ट्यूब वीडियो पर

मनोहर बाथम का जीवंत कविता पाठ

मनोहर बाथम के बारे में लीलाधर मंडलोई कहते हैं कि वे ऐसे एकमात्र कवि हैं जिनकी कविताओं में सरहद नहीं है, सीमाएँ नहीं हैं. निस्सीम कविताएँ हैं. शायद यही वजह है कि जहाँ अन्य कवियों के कविता संग्रह प्रकाशक का मुंह जोहते रहते हैं, वहीं मनोहर बाथम के एक कविता संग्रह का अंग्रेज़ी समेत दस भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.विगत दिवस दुष्यंत कुमार संग्रहालय में अपने कविता संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर उन्होंने कविता पाठ किया. रचनाकार के पाठकों के लिए जीवंत प्रसारण प्रस्तुत है :

लीलाधर मंडलोई का जीवंत कविता पाठ

विगत दिवस दुष्यंत कुमार संग्रहालय, भोपाल में लीलाधर मंडलोई ने अपने किताब के लोकार्पण के अवसर पर जीवन के अपने मार्मिक अनुभवों को भी साझा किया और बताया कि कैसे विदयार्थी जीवन में वे और उनके तीन मित्र एक दफा तीन दिन तक बिना खाए रहे और चौथे दिन भी जो उन तीनों को नसीब हुआ था, वो आधी कटोरी आटे का घोल था. उस वक्त सभी श्रोताओं समेत लीलाधर मंडलोई की आँखें भी नम हो गई थीं. उस अवसर पर उनसे विशेष आग्रह रचनाकार के लिए कविता पाठ के लिए किया गया. प्रस्तुत है उस वक्त सुनाई गई उन्हीं के स्वरों में उनकी कविता-

एस.के.पाण्डेय की बाल कविता – लेना-देना

बच्चों के लिए: लेना-देना (1)दिन में जो प्रकाश-पुंज शशि रवि से लेता है । रात में वह ही वापस धरती को दे देता है ।। जल वाष्प रूप में शोषित कर सूरज जो धरा से लेता है । घन लेकर उसको धरती पर वापस वर्षा देता है ।। (2) लेना-देना, आना-जाना सब संसार चक्र में चलते हैं । देकर-लेना, लेकर-देना व्यवहार जगत में मिलते हैं ।। लाओ ! लेने के चक्कर में लोभी पच-पचकर मरते हैं ।जो आये काम दूसरों के उसे पर-उपकारी कहते हैं । (3)माता-पिता भी बच्चों पे धन-प्यार निछावर करते हैं । बच्चों को खुश रखने हित कष्ट भी सहते रहते हैं ।। लेकिन कितने हैं ऐसे जो आगे इसे समझते हैं । माता-पिता भी बच्चों से कुछ पाने की इच्छा रखते हैं । । (4)जीवन में माँ-बाप सहित हम कितनों के ऋणी होते हैं । पा करके सहयोग सभी का जीवन में आगे बढ़ते हैं ।। माने जो उपकार उसे कृतज्ञ सुजन सब कहते हैं । लेकिन देखो आज यहाँ कृतघ्न ही जादा मिलते हैं ।। (5)ले-देकर ही देखो हम-सब दुनिया में जीते हैं । लेकर के कुछ लोग सदा देने को तत्पर होते हैं । लेकिन बहुतेरे ऐसे हैं जो लेकर कभी न देते हैं ।सच में ही कुछ लोग सदा जगते हुए भी सोते हैं । ----- डॉ एस के पाण्डेय,स…

क़ैश जौनपुरी का देशभक्ति गीत․ भारत का बेटा हूं मैं…

चित्र
भारत का बेटा हूं मैं
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․
देश के लिए जियें
देश के लिए मरें
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․ भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․ तीन रंग का अपना तिरंगा
अपनी यही शान है․․․․․․․․․
देश के लिए जियें
देश के लिए मरें
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․ भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․ सारे भारत में गणतन्‍त्र आया
धरती पे आई नई रोशनी
बापू, भगत सिंह, “आजाद“ जैसे
वीरों ने हमको ये दी रोशनी
अमर वो रहेंगे, जन्मों-जन्म तक
कुर्बां हुए हैं, जो देश के लिए
नाम लिखा जाए, स्‍वर्ण अक्षरों में
हंस के हैं मरते, जो देश के लिए
“इण्डिया․․․․ इज द गे्रट“
अपना भारत महान है
देश के लिए जियें
देश के लिए मरें
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․ भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․ गांधीजी सबकी, आंखों के तारे
आये थे बनके वो भगवान न्‍यारे
सत्‍य-अहिंसा के वो पुजारी
आजादी मिली उनके ही सहारे
चोट सह लिया, जवाब नहीं दिया
शान तिरंगे का, ऊंचा किया है
सत्‍य पे चलके, अहि…

दीनदयाल शर्मा की रचना – तक़ाजा वक्त का

चित्र
चेहरे पर ये झुर्रियां कब आ गई,
देखते ही देखते बचपन खा गई.

वक्त बेवक्त हम निहारते हैं आईना,
सूरत पर कैसी ये मुर्दनी छा गई. 

तकाज़ा वक्त का या ख़फ़ा है आईना.
सच की आदत इसकी अब भी ना गई.

है कहाँ हकीम करें इलाज इनका,
पर ढूँढ़ें किस जहाँ क्या जमीं खा गई. 

बरसती खुशियाँ सुहाती बौछार, 
मुझको तो "दीद" मेरी कलम भा गई.

अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद्, 
हनुमानगढ़ जं. - 335512 
http://deendayalsharma.blogspot.com
सृजन : 21 March , 2010, Time : 7:25 AM

महावीर सरन जैन का आलेख : भगवान महावीर

चित्र
भगवान महावीर प्रोफेसर महावीर सरन जैनभगवान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। वे प्रवर्तमान काल के चौबीसवें तीर्थंकर हैं। आपने आत्‍मजय की साधना को अपने ही पुरुषार्थ एवं चारित्र्य से सिद्ध करने की विचारणा को लोकोन्‍मुख बनाकर, भारतीय साधना परम्‍परा में कीर्तिमान स्‍थापित किया। आपने धर्म के क्षेत्र में मंगल क्रान्‍ति सम्‍पन्‍न की। आपने उद्‌घोष किया कि आँख मूँदकर किसी का अनुकरण या अनुसरण मत करो। धर्म दिखावा नहीं है, रूढ़ि नहीं है, प्रदर्शन नहीं है, किसी के भी प्रति घृणा एवं द्वेषभाव नहीं है। आपने धर्मों के आपसी भेदों के विरुद्ध आवाज उठाई। धर्म को कर्म-कांडों, अन्‍ध विश्‍वासों, पुरोहितों के शोषण तथा भाग्‍यवाद की अकर्मण्‍यता की जंजीरों के जाल से बाहर निकाला। आपने घोषणा की कि धर्म उत्‍कृष्‍ट मंगल है। धर्म एक ऐसा पवित्र अनुष्‍ठान है जिससे आत्‍मा का शुद्धिकरण होता है। धर्म न कहीं गाँव में होता है और न कहीं जंगल में, बल्‍कि वह तो अन्‍तरात्‍मा में होता है। साधना की सिद्धि परमशक्‍ति का अवतार बनकर जन्‍म लेने में अथवा साधना के बाद परमात्‍मा में विलीन हो जाने में नहीं है, बहिरात्‍मा के अन्‍तरात्‍म…

विजय कुमार वर्मा की कविता

कुछ तो प्रतिदान जरूरी है, जिन्दा रिश्तों की मजबूरी है.
दिल मेरा नवनीत-नरम है, बस बातें तेरी छुरी है.
नकली वन में नकली मृग हैनहीं नाभी में अब कस्तूरी  है.
अभी बहुत बातें  कहनी है, ये बातें अभी अधूरी  है.
फरियादी ना-उम्मीद हो बैठे , अभियुक्त के परिजन 'ज्यूरी' है.
खरी-खरी अब किसे है भातीसब होठों पे जी- हजूरी है.
नफ़रत का दामन मत थामोप्रीत ही जग की धुरी  है.
====विजय कुमार वर्मा ,डी एम्  डी -३१-बीडी भी  सी ,बोकारो THERMAL

शेफाली वर्मा की कविता

बचपन पढ़ते-पढ़ते याद आ गयीबचपन की यादें फिर से छा गयी.
मेरा रोना और उफ़ करना , माँ- पापा का चुप - चुप कहना .
भाई-बहन संग धींगा - मस्ती , बचपन की थी अलग ही हस्ती,
बचपन की यादें आती मुझे  , वापस बचपन में जाने का , अब तो कोई राह ना सूझे .
आसमां में उड़ने का , अब भी रखती हूँ मैं हौसलापर चार-चार टेस्ट लेने का , स्कूल का है आया है फैसला ====
शेफाली वर्मा ,क्लास -६, डी ,ए भी, कथारा,बेरमो,

राजेश कुमार मिश्र की बाल कविता

कौआ काका बच्चों देखो कौआ आया
चोंच में अपनी रोटी लाया। खाली रहना इसका काम
जगत में अमर है इसका नाम। बड़ा आलसी जीव निराला
काली-काली चोंच वाला। मेहनत से है यह घबराता
सदा चुराकर रोटी खाता। गर मेहनत से घबराओगे
कौआ काका कहलाओगे। डॉ0 राजेश कुमार मिश्र

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : लोकतंत्र की लँगोट

चित्र
किसी देश के किसी प्रांत की किसी राजधानी में एक विधान सभा थी। विधान सभा वैधानिक कार्यों के लिए थी मगर प्रजातंत्र का आनंद था। सभी तरह के कार्य आसानी से और बिना रोक - टोक के सम्पन्न होते रहते थे। ऐसे ही एक दिन विधान सभा की बैठक के दौरान एक माननीय सदस्य ने एक सुरक्षा कर्मचारी की पैंट उतार कर हवा में उछाल दी। पैंट उछली मानो लोकतंत्र की टोपी उछली, मगर केवल उछली नहीं, पैंट उछल कर आसन की टेबल पर गिरी, मानो प्रजातंत्र की भैंस पानी में पड़ गयी।
मैं इस सम्पूर्ण घटनाक्रम का दूरदर्शी गवाह था। दूरदर्शन के सभी चैनल इस पराक्रमी घटना क्रम को बार-बार दिखा रहे थे। मैं और मेरे जैसे लाखों-करोड़ेां जनमानसों के सिर शर्म से झुक जा रहे थे। समझ में नहीं आ रहा था। लोकतंत्र की लँगोट खोल कर ये जन-प्रतिनिधि क्या दिखाना चाहते हैं।
मैं जन्मजात मूर्ख इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर चर्चा के लिए उतावला था। एक जन-प्रतिनिधि जो अभी-अभी लाउन्ज में आये थे, से पूछ बैठा-'' प्रभु! ये क्या हो रहा है। सभा में लोकतंत्र को नंगा करने के प्रयास क्यों हो रहे हैं ?''
   ''तुम नहीं समझोगे, जो स्वयं नंगा नहीं होन…

अमिता कौंडल की दो कविताएँ : श्रीमान श्रीमती, मेरे पहाड़

चित्र
श्रीमान श्रीमतीश्रीमती जी सखियों संग बतिया रहीं थींपति की सख्ती के किस्से सुना रही थीं.  

कहतीं हमारे वो तो बड़े सख़्त मिज़ाज हैं
सुबह आठ बजे चाहिए उन्हें ब्रेकफ़स्ट है.

कहते हैं सुबह सवेरे झाड़ू पोंछा लगाओ
वरना टिकट तुम अपने मायके का कटवाओ.

अरी इक पल भी मैं चैन से रह नही पाती
उनको तो चाहिए गर्मा गर्म चपाती.

पर जब हमने देखा उनके श्रीमान जी का हाल
तो हमारी आँखों में उतर आया सैलाब.

बेचारे सुबह सुबह झाड़ू लगा रहे थेआँगन को अपने आँसुओं से नहला रहे थे.

जब थक कर हुए बेहाल तो बोले
श्रीमती जी बज गये हैं बारह
कुछ खाने का प्रबंध करो हमारा.
तो श्रीमती जी बोलीं आकर तैश में
दिखता नहीं बैठे हो बड़ी ऐश में.

अभी अभी पड़ोसन के घर से आई हूँ
पढ़ने को नई नई गृहशोभा लाई हूँ.

सारा दिन निठल्लों की तरह पड़े रहते हो
हर काम मुझे ही करने को कहते हो.

जाओ फ्रिज में रात का खाना पड़ा है खा लो
फिर मेरे लिए एक फ्रेश सैंडविच बना दो.
मेरे पहाड़इस
तपते धरातल पर
याद आते हैं
मुझे मेरे पहाड़

वहां था जीवन
सुखद और शांत
अपनापन, ईमानदार…

प्रमोद भार्गव की कहानी : सती का ‘सत’

चित्र
कनकलता पैंतालीस-छियालीस साल की एक सुशिक्षित संभ्रात महिला। अच्‍छी मां, सुघड गृहिणी। घर के कामकाज में पारंगत। जैसी नियमित दिनचर्या उसी के अनुरूप सलीके से व्‍यवस्‍थित घर। आदर्श पत्‍नी के रूप में पति की आज्ञाकारी भी वे रहीं, पर भला पति का साथ उन्‍हें मिला ही कितना...., मात्र सात साल। तभी से उनके भावविहीन गौरवर्णी गोल चेहरे पर दुख दर्द की परत ठहरी हुई है। इधर ठहराव के बावजूद कैसे पंख लगाकार फुर्र हो गए बीस-इक्‍कीस साल....। आज सुबह कनकलता की नजर जब अखबार की मुख्‍य हेडलाइन पर ठहरी ‘95 साल की महिला सती, बेटों ने ही मां को सती होने के लिये उकसाया' तो उनका मस्‍तिष्‍क बुरी तरह परेशान हो गया। सती होने वाली घटनाओं से संबंधित समाचार पढ़कर वे अक्‍सर भीतर तक दहल जाया करती हैं। आज से ठीक बीस साल पहले राजस्‍थान के दिवराला गांव में रूपकुंवर के सती होने की घटना सामने आई थी तब भी वे परेशान हो उठी थीं। कैसे अठारह-उन्‍नीस साल की यौवन ग्रहण कर रही नवौढ़ा रूपकुंवर को पति की चिता के साथ जल जाने के लिये लाखों लोगों के बीच चूनरी रस्‍म का आयोजन किया गया। ढोल धमाकों के बीच सती होने के लिये उकसाकर लाचार बना द…

प्रमोद भार्गव की कहानी - नकटू

चित्र
नकटू अब दस साल का हो गया था। अपने नाम के ही अनुरूप वह बेशरम था, बल्‍कि यों कहा जाए कि उसका नाम उसके जन्‍म के कारण ही नकटू पड़ गया था तो ज्‍यादा व्‍यावहारिक होगा। वह अपनी विधवा मां का नाजायज पुत्र था। मां ने गांव के लोगबागों के गिले शिकवे और विष बुझे वाणों की भार से घायल होते रहने से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए खारे कुंए में कूद कर आत्‍महत्‍या कर ली थी। घर में नकटू की नानी के अलावा और कोई था नहीं। नानी ने ही जैसे-तैसे उसे पाला पोसा, बड़ा किया। नकटू का पिता कौन है ठीक-ठीक किसी को ज्ञात नहीं है। बताते हैं एक बार उसकी मां का देवर यानि कि उसका काका अपनी विधवा भाभी भुर्रो की सुधबुध लेने के बहाने गांव आया था और अर्से तक रूका था। उसके जाने के बाद से ही भुर्रो के शरीर में परिवर्तन शुरू हो गए थे और पूरे गांव में यह काना-फूंसी होने लगी थी कि भुर्रो के पैर भारी हो गए हैं। अवैध संतान होने के कारण ही उसे उच्‍च जाति का होने के बावजूद जाति-बिरादरी सगे-संबंधी, नाते-रिश्‍तेदारों और गांव में वह आदर नहीं मिला जिसका वह हकदार था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, नानी की पकड़ से बाहर होता चला गया था। ब्राह्मण…

राजनारायण बोहरे की कहानी - न्‍याय : उर्फ तसल्‍लीबख्‍श फैसला

चित्र
फरियादिया का बयान              - मेरा नाम विमला है हुजूर । स्‍वर्गीय मास्‍टर जी गोविंद सिंह मेरे पति थे । मेरी उम्र पच्‍चीस साल नौ महीने है ।               - जी हां, इन सब लोगों को अच्‍छी तरह से जानती हूं मै । ये सब मेरे ही गांव के लोग है ।               - जी हां मैंने या किसी दूसरे आदमी ने इन लोगों को मेरे पति पर हमला करते नहीं देखा ।               - जी हां, इन लोगों की मेरे पति से रंजिश थी और गांव के सरपंच पद के पिछले चुनाव से यह लोग मेरे पति को परेशान करते रहते थे ।               - कारण तो यही था जज साहब, कि मेरे पति चुनाव में खुद उम्‍मीदवार थे, और इन लोगों को ये बात नागवार गुजरी थी, क्‍योंकि दलपत सिंह पिछले बीस वर्ष से इस गांव के तानाशाह सरपंच थे, मेरे पति ने उन्‍हें पहली बार चुनौती दी थी ।               - जी नहीं, और कोई कारण नहीं था ।               - ये गलत है हुजूर, इन लोगों में से किसी भी आदमी से मेरे कोई संबंध नहीं रहे हैं ।               - जी हां, हम लोग यहां के रहने वाले नहीं है । मेरे पति बहुत दूर के रहने वाले थे । उन्‍होंने घरवालों की मर्जी के बिना मुझसे ब्‍याह किया था, इ…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.