रविवार, 28 मार्च 2010

शेफाली वर्मा की कविता

बचपन

पढ़ते-पढ़ते याद आ गयी

बचपन की यादें फिर से छा गयी.


मेरा रोना और उफ़ करना ,

माँ- पापा का चुप - चुप कहना .


भाई-बहन संग धींगा - मस्ती ,

बचपन की थी अलग ही हस्ती,


बचपन की यादें आती मुझे  ,

वापस बचपन में जाने का ,

अब तो कोई राह ना सूझे .


आसमां में उड़ने का ,

अब भी रखती हूँ मैं हौसला

पर चार-चार टेस्ट लेने का ,

स्कूल का है आया है फैसला

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शेफाली वर्मा ,क्लास -६, डी ,ए भी, कथारा,बेरमो,

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