रविवार, 28 मार्च 2010

विजय कुमार वर्मा की कविता

कुछ तो प्रतिदान जरूरी है,

जिन्दा रिश्तों की मजबूरी है.


दिल मेरा नवनीत-नरम है,

बस बातें तेरी छुरी है.


नकली वन में नकली मृग है

नहीं नाभी में अब कस्तूरी  है.


अभी बहुत बातें  कहनी है,

ये बातें अभी अधूरी  है.


फरियादी ना-उम्मीद हो बैठे ,

अभियुक्त के परिजन 'ज्यूरी' है.


खरी-खरी अब किसे है भाती

सब होठों पे जी- हजूरी है.


नफ़रत का दामन मत थामो

प्रीत ही जग की धुरी  है.


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विजय कुमार वर्मा ,डी एम्  डी -३१-बी

डी भी  सी ,बोकारो THERMAL

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