28 अप्रैल 2010

माणिक का व्यंग्य : बारह लाइन लिखकर बन गए साहित्यकार

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आजकल सभी तरफ छपने छपाने का जो दौर चल पड़ा है,कई बार दिल इतना क्रोधित होता है कि,कुछ कर नहीं पाने पर बस सिर फोड़ने की इच्छा होती है. देश भर के लगभग सभी इलाकों में आजकल जो बात बड़ी जोर पकड़ती जा रही है,वो एक बीमारी के माफिक ही है, साहित्यकार बनाने और बनने की. कुछ गलतफहमी में बन बैठे हैं तो कुछ को इलाके के अनपढ़ अखबारी संवाददाता, बना देते हैं. हमारे इलाके में भी जो पी.एचडी. करने बाबत जरुरत के मुताबिक् मेहनत नहीं कर पाए वे अपनी दिखावटी इज्जत बचाने को प्रोफ़ेसर लिखते है.उन्हें ये मालूम नहीं की कॉलेज वाले ही प्रोफ़ेसर बन जायेंगे तो विश्वविद्यालय वाले कहाँ जायेंगे. खैर. पिछले कुछ दिनों के स्थानीय अखबारों की प्रतियां बांच रहा था. बड़ा ताज्जुब हुआ जब किसी तहसील के छोटे से गाँव में वहाँ के इलाके के साहित्यकारों की बैठक आयोजन की खबर छपी थी. भैया जी, जहां हमारे पूरे मेवाड़ में कहा जाता है कि मीरा के बाद कोई कवि और मुनि जिनविजय के बाद कोई विद्वान् नहीं हुआ, वहां गाँव-गाँव में आजकल साहित्यकार बने मिल जायेंगे.

पिछले दिनों की कहूं तो लम्बे अरसे से मीडिया में लगे लोग भी आजकल अपनी बुद्धि को ताक में रख नज़र आये हैं, या उसे भी बेच खाए हैं. बढिया से बढिया खबर भी विज्ञापन के हिसाब से लगती है.,शहरों में जो कुछ भी आयोजन हो अपने पास-पड़ोस के साथियों को बुलाकर तथाकथित बुद्धिजीवियों की बड़ी ज़मात पैदा कर रहे हैं. कभी पुराने मकान मालिक मुख्य अतिथि हैं,तो कभी नए किरायेदार कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हैं. अच्छा समझौता है. यहीं से कुछ नासमझ लोगों को साहित्यकार जैसा प्राणी बनने का चस्का लग जाता है. बस फिर क्या, बस और ट्रकों के पीछे लिखे दोहों की तरह की दो चार लाइन रोजाना लिखने ,ज़बरन दोस्तों को सुनाने का ये सिलसिला उन्हें प्रायोजित जानकार या साहित्यकार बना देता है. किसी भी प्रकार का साहित्य हो ऐसे नाम के भूखे और काम के कच्चे लोगों से कुछ असली कामकार भी अखबारों की नज़र में नकली नज़र आते हैं. समाज में पढ़ने वालों का स्वाद बिगाड़ने में इन का पूरा हाथ होता है. लिखावट कम करके भी दिखावट ज्यादा कर लें, यही इनकी फितरत और हाथ की सफाई है.

बीस तक कवितायें इकठ्ठी हो जाए बस फिर क्या शहर के किसी बाबा-तुम्बा को पकड़ कर शुभकामना सन्देश आयात कर किताब छपा देते हैं. उन्हें शर्म तक नहीं आती कि जो हिंदी या किसी और भाषा के इतने जानकार साहित्यकर्मियों को पढ़े नहीं, उनके लिखी एक किताब का नाम तक नहीं जानते, माफ़ करें पढ़ना तो उनके बस का है ही नहीं, क्योंकि उन्हें इतनी फुरसत मिल जायेगी तो फिर शहर के मिलने मिलाने वाले सरकारी टाइप के आयोजन में सांठ-गाँठ करने कौन जाएगा. घर में बैठ किताबें पढ़ने से तो उनका सारा मामला ही गड़बड़ हो जाएगा ना. ये काम उनके लिए बनाया भी नहीं गया है. उन्हें तो बस बड़े नेताओं और अफसरों के आस-पास रहने का मौक़ा चाहिए,भले ही उसके लिए स्वाभिमान जाए भाड़ में.

हाँ तो मामला नज़र में आया गाँव में होने वाली उस साहित्यकारों की बैठक की खबर से,बहाना कुछ चाहे कुछ भी हो मगर ये समस्या पूरे देश की है. ऐसे नादाँ और अधपके पाठकों तक हमारी ये चिंता भरी बात , ये कोशिश पहुंचे बस. विचार तो तब भी आता है जब, खाते पीते घर के लोग भी कम ज्ञान वाले अफसरों के धोक लगाते फिरते है, वे ही ज्यादातर होने वाले समारोह में सम्मानित भी हो जाते हैं. अफसर भी कान में तेल और आँख पर पट्टी लगाए रहते हैं, उन्हें केवल और केवल हजुरिये बन्दे या धोक लगाते छुट भैया ही याद आते हैं. अगर आप भी अपने इलाके में दस बारह लाइन की कविताएं इधर उधर से लिख लें तो बस आपका साहित्यकार बन जाना पक्का समझ लीजिएगा. लोग आपको हर समारोह में बुलायेंगे, यदा कदा ईनाम भी देंगे. उम्र आपकी ठीक-ठाक है तो मुख्यअतिथि का पद तो आपके लिए हमेशा हाज़िर रहेगा.

कुल मिलाकर ये एक खेल की भांति लगा कि आओ मिलकर भाई साहेब-भाई साहेब खेलें. एक दूजे को बड़ा बनाने का बुलाने और आगे की कुर्सियों पर बिठाने का आपसी समझौता हो जाता है. आदमी को पता नहीं चलता कि वो कब बुद्धिजीवी बन गया .ये अलग बात है कि उन्हें कभी किसी गोष्ठी में उद्बोधन को नहीं कहा गया,वरना सुनने वालों और बुलाने वालों की गलतफहमियाँ दूर हो जाती.

चलो हम भी तैयारी करें एक साफ़ सुथरी कविता लिखने की,उसी एक कविता को हर समारोह में गाने की, जिद पर अड़े रहें. जिस किसी बैठक-समागम में हमें वो कविता पढ़ने से मना कर दे,उसमें कभी नहीं जाने की कसम खाएं. जहां भी जाएँ कोई तो स्वार्थ पूरा हो हमारा,फ्री तो हम हैं नहीं ना. आखिर हमें भी साहित्यकार बनना है,मालूम तो हमें ये भी है अभी कि इन्तजार की सूचि बहुत लम्बी है. ज्यादा लम्बी होगी तो मैं शॉर्टकट भी जानता हूँ. ज़माना भी इसी बात का है. बेचारे बहुत से पढाकू तो कमरों में पढ़ते पढ़ते ही मर जायेंगे. वे कब साहित्यकार कहलाने का सुख भोग पायेंगे, ये तो राम ही जाने. कोई जाकर उन्हें भी कह दो ,कि आजकल बाबा-तुम्बा संस्कृति की चलती है,या किसी अफसर को अपना गुरु बनाओ, परिवार सहित धोक लगाओ, जल्दी ही अच्छे परिणाम आयेंगे.

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सादर,
माणिक
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2 प्रतिक्रियाएँ.:

  1. मानिक जी, बहुत चुतील व्यंग्य है आप का. साहित्य के हालत चाहे जो भी हो, आप मे ज़रूर एक अछे सहित्यकार बनने के लक्शन मौजूद है.

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  2. सही बात है, जो साहित्यकार नहीं बनपाते वे रोज़ एक व्यन्ग्य लिखने वाले व्यन्गकार बन जाते हैं।

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