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May 2010
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yashwant kothari new (Mobile)

आदिवासी-चार अक्षरों का एक छोटा सा नाम, लेकिन सामाजिक व्यवहार के रूप में अनेक समुदाय, जातियां और किस्मों में बंटा संसार और इस संसार की अपनी समस्याएं, अपना राजवेश, अपने रीति-रिवाज। सामान्यतः शांत और सरल, लेकिन विद्रोह का नगाड़ा बजते ही पूरा समूह सम्पूर्ण प्रगतिशील शहरियों के लिए एक ऐसी चुनौती, जिसे सह पाना लगभग असंभव। एक चिंगारी जो कभी भी आग बनकर सबको लपेटने की क्षमता रखती है।

आदिवासियों के उपयुक्त संबंधों, रंगबिरंगी पोशाकों, संगीत, नृत्य और संस्कृति के बारे में हमारी अपनी कल्पनाएं हैं। हम उन्हें पिछड़ा, असभ्य, गंदा, गैर-आधुनिक और न जाने क्या-क्या कहते हैं।

अंग्रेजी राज ने भारतीय आदिवासियों को दूसरे दर्जें का नागरिक समझा। जिसके अंतर्गत उनके जीवन, संस्कृति और सामाजिक संसार को बाकी दुनिया से अलग-थलग रख कर उसे अध्ययन और कौतूहल का विषय बना दिया हैं। लेकिन भारतीय समाज में अंग्रेजों को पहली चुनौती सन् 1824-30 भीलों ने दी और बाद में 1846-46 में संथालों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।

आजादी के बाद हमारे इस नजरिए में परिवर्तन आए। पं. नेहरू ने आदिवासियों से पूर्णतया अलगाव के बजाय उनसे सम्पर्क रखने का सिलसिला बनाया। संविधान में उनके लिए विशेष सुविधाएं रखी गई। लेकिन इन प्रशासनिक प्रयासों के बावजूद आदिवासी अलग-थलग रहा और चतुर महाजन इनका शोषण और उत्पीड़न करते रहे।

लगभग 15 करोड़ आदिवासी इस देश के विभिन्न राज्यों में बिखरे पड़े हैं। मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उड़ीसा, पं. बंगाल, केरल आदि इलाकों में आदिवासियों की बहुत बड़ी संख्या है। पिछले कुछ वर्षों में आदिवासियों के प्रति एक नई चेतना का विकास हुआ है।

वास्तव में आदिवासियों की इस दुःखद स्थिति का प्रमुख कारण उनका गरीब होना है, इस आर्थिक पिछड़ेपन के साथ-साथ वे सामाजिक सांस्कृतिक रूप से भी अलग है। पूरे देश का आदिवासी समुदाय एक सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। इसके कारण आदिवासियों में अलगाव और मुख्य धारा से अलग रहने की प्रवृत्ति का विकास हो रहा है। शोषण, असंतोष, गरीबी और सामाजिक बदलाव के कारण आज आदिवासी स्वयं की उद्धेलित और असंतुष्ट महसूस करता है।

आदिवासी असंतोष के प्रमुख कारण आर्थिक और सामाजिक है। ईसाई मिशनरियों तथा धर्म परिवर्तन की घटनाएं भी एक कारण हैं। जब तक बाहरी लोगों ने इनके जीवन और जीवन-पद्धति तथा इनकी परम्पराओं में घुसपैठ की, इन आदिवासियों ने हथियार उठा लिए। जब-जब इनका दमन और शोषण हुआ, ये चुप नहीं रहे, इनकी मजबूरियों का फायदा उठाने की हर कोशिश का उन्होंने विरोध किया है। आदिवासी आंदोलनों की पृष्ठभूमि को देखना, समझना एक उचित आधार होगा।

वास्तव में आदिवासी आंदोलन अंग्रेजों के जमाने से काफी पहले से चल रहे हैं। मुगल शासनकाल में औरंगजेब ने जब धर्म-परिर्वतन और जाजिया कर चलाया तो इन आदिवासियों ने इसका विरोध किया।

सन् 1817 में भीलों ने खान देश पर आक्रमण किया। यह आंदोलन 1824 में सतारा और 1831 में मालवा तक चला गया। 1846 में जाकर अंग्रेज इस विद्रोह पर काबू पा सके। इस पराजय से भीलों में चेतना जागी और वे हिन्दुओं की तरह रहने लगे और इसी दौरान भीलों में धार्मिक आंदोलन शुरू हुए। डूंगरपूर में ललोठिया तथा बांसवाड़ा, पचमहाल (गुजरात) में गोबिंद गिरी ने धार्मिक आंदोलन चलाए। 1812 में गोबिंद गिरी को अंगेजों ने गिरफ़्तार कर लिया।

वास्तव में भीलों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि था और भूमि पर साहूकारों, व्यापारियों ने कब्जा कर लिया। वनों की लगातार और अंधाधुंध कटाई के कारण बनों पर आश्रित वनवासी, गिरिजन और अन्य समुदायों के आदिवासियों को खाने के भी लाले पड़ गए।

इन्हीं कारणों से लगातार आदिवासी आंदोलन होने लगे। उड़ीसा में 'मल का गिरी' का कोया विद्रोह 1871-80 में हुआ। फूलबाने का खांडे विद्रोह (1850) में तथा साओरा का विद्रोह (1810-1940) में हुआ। ये विद्रोह आर्थिक शोषण के कारण हुए।

सन् 1853 में संथाल-विद्रोह हुआ। 1895 में मुंडा विद्रोह हुआ। 1914 में उंरावों का ताना-मगत विद्रोह हुआ। मिजो आंदोलन लंबे समय तक चला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।

पिछले डेढ़ वर्षों के आदिवासी असंतोष और व्यग्रता से पता चलता है कि अभी भी आदिवासी अपने हकों के लिए लड़ रहे हैं।

वास्तव में शासन के विरुद्ध आदिवासियों की लड़ाई शासक और शासित की लड़ाई है, जिसमें बेचारा शासित और दब जाता है। उसके ऊपर और दुःखों का पहाड़ आ जाता है। शासन को आदिवासियों के बारे में विवेकशील जानकारी हो और वे आदिवासियों के प्रति संवेदनशीलता रखें तो आदिवासियों को समझने में आसानी होगी।

प्रारम्भ से ही आदिवासियों के साथ शोषण की प्रवृत्ति तथा सौतेला व्यवहार हुआ है इसी बात को मुद्दा बनाकर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग आंदोलन पृथक राज्यों की मांग को लेकर लंबे समय तक चलते रहे। छोटा नागपुर (बिहारी), संथाल, आदिलाबाद (आंध्र प्रदेश) आदि ऐसे ही स्थल थे।

महाजनी चक्र के कारण आदिवासियों, बंधुओ मजदूरों खेतिहरों का शोषण लंबे समय से होता आया है। गरीबी और मजबूरी का मारा आदिवासी बनिये के पास जाता है और अपना शोषण कराता है। आजकल आदिवासियों में खुद एक तबका बन रहा है जो महाजनों की तरह ही अपने समाज का शोषण कर रहा है और स्वयं महाजन बन बैठा है।

अकाल, बाढ़, बीमारी, चिकित्सा आदि ऐसे तात्कालिक कारण होते हैं, जब आदिवासी को महाजनों की शरण में जाना पड़ता है या ईसाई मिशनरियों के पास धर्म परिवर्तन कराना होता है।

आदिवासियों में व्याप्त असंतोष, विद्रोह या आंदोलनों के तथा उनकी समस्याओं को समझने और सुलझने के लिए हमें हमारे नजरिए में परिवर्तन करना होगा। उन्हें उपेक्षित, बेसहारा और मजबूर समझने के बजाय उन्हें हम में से एक समझना होगा।

उन्हें राष्ट्रीय धारा से जोड़ने के लिए उनकी भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके रहन-सहन, उनकी संस्कृति, उनकी जीवन पद्धति को समझना होगा। उनकी सामाजिक बनावट का व्यापक और समग्र अध्ययन किया जाना उचित होगा।

आदिवासियों को केवल केलेंडर या उन्मुक्त सेक्स के रंगीन चश्मे से देखना बंद करना होगा।

उन्हें देखने,समझने और परखने के लिए हमें अपनी आंखों पर लगे चश्मे के नम्बर बदलने होंगे। अर्ध्विश्वास या पूर्व ग्रहों की दीवारों को तोड़कर जो प्रकाश आएगा, उसमें ये आदिवासी हमें हमारी जमीन से जोड़ेगे।

आर्थिक शोषण, सामाजिक शोषण, वनों की कटाई और खेती को महाजनी सभ्यताओं से मुक्त कराने से आदिवासियों की काफी समस्याओं का हल हो सकता है और वे हमारी मुख्य धारा में जुड़कर राष्ट्रीय विकास में योगदान दे सकते हैं, क्योंकि उनके पास लोक-साहित्य, लोक-चिकित्सा और लोक-कलाओं का एक समग्र संसार है।

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-यशवन्त कोठारी, 86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002फोनः-2670596

ykkothari3@yahoo.com

तत्वमसि

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तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि!

दूर गगन में फटती पौ-सी
दीपक की एक मद्धिम लौ-सी
किसी योगी के अपने ही रौ-सी
हौले से मन में आन  बसी.

तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि!
सरिता की मंथर हलचल-सी
मृग-शावक की चाल  चपल सी
चन्द्र-प्रभा की मंद टहल-सी
भू-चित्र-पटल,प्रकृति मसि.
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि!

दग्ध-ह्रदय ज़ग को हर्षाने
अमृत की एक धरा बरसाने
पल-पल नूतन रूप दिखाने
ऊर-अन्दर तू आन धंसी
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि !

चन्द्र-सूरज की- सी दो नैनें
उतरी  अम्बर से शनैः-शनैः
अपलक-अविचल देखी मैंने
किसी देव-लोक की आभा-सी
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि! 

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तत्वमसि=तुम वही हो

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वी के वर्मा डी एम् डी ३१\बी बोकारो थर्मल
vijayvermavijay560@gmail.com

 hasparihas

रुतबा भी सरकारी अजीमों शान सरकारी ।

मेरा कुछ भी नहीं छोड़कर पहचान सरकारी॥


बहुत बौना हूँ मैं अब भी यदि तुलना करुं तुमसे,

बढ़ा पाया नहीं है कद मेरा सम्‍मान सरकारी।


मेरी हर जीत होती हैं हमेशा हार से बदतर,

पैदी मात खाऊं जो न हो मैदान सरकारी।


किसी का भी कोई अभिशाप मुझको छू नहीं पाये,

कि कुर्सी हैं हिफाजत के लिए वरदान सरकारी।


नहीं हूँ वो जो दिखता कोई विस्‍मय नहीं करना,

मिले तब हाथ फैलाये मेरा अभिमान सरकारी।

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अब भी कुछ नहीं बिगड़ा प्यारे पता करो लोहारों का

धार गिराना काम नहीं है लोहे पर सोनारों का

- नीरज कुमार

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अपने मंसूबों को नाकाम नहीं करना है

मुझको इस उम्र में आराम नहीं करना है

- शाहिद लतीफ़

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अपनी चाहत का यूँ पता देना

सामना हो तो मुस्करा देना

- रफ़ीक जाफ़र

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अब तो मजहब कोई ऐसा चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

- नीरज

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इस जहाँ में प्यार महके जिंदगी बाकी रहे

ये दुआ मांगो दिलों में रोशनी बाकी रहे

- देवमणि पांडेय

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अपना ग़म लेके कही और न जाया जाए

घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए

- निदा फ़ाज़ली

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अबके सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई

मेरा घर छोड़कर कुल शहर में बरसात हुई

- नीरज

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अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूं

अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूं

- ख़लील धनतेजवी

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आँसू की क्या क़िस्मत है, बहने में बाधाएँ कितनी

बाहर चहल पहल हलचल है, भीतर बंद गुफाएं कितनी

- शैल चतुर्वेदी

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अभी साज़े दिल में तराने बहुत हैं, अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं

नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से, जो पुरसोज़ नग़मे पुराने बहुत हैं

- नौशाद

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इस जहाँ से कब कोई बचकर गया

जो भी आया खा के कुछ पत्थर गया

- राजेश रेड्डी

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इस तरह कुछ आजकल अपना मुकद्दर हो गया

सर को चादर से ढंका तो पाँव बाहर हो गया

- देवमणि पांडेय

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उनके अंदर भी कहीं तू है, कहीं तू न गिरे

बस यही सोच के इन आँखों से आँसू न गिरे

- कुंअर बेचैन

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आपसे झुक के जो मिलता होगा

उसका क़द आपसे ऊँचा होगा

- नदीम क़ासमी

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आदमी आदमी को क्या देगा, जो भी देगा वही खुदा देगा

जिंदगी को क़रीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

- सुदर्शन फ़ाकिर

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सब कुछ झूठ है लेकिन फिर भी बिलकुल सच्चा लगता है

जानबूझकर धोखा खाना कितना अच्छा लगता है

- दीप्ति मिश्र

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( संकलन - संस्कृति संगम से साभार)

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पुस्तक- समीक्षा
पुस्तक- -अमेरिकी प्रवासी भारतीय : हिन्दी प्रतिभाएं ( प्रथम व द्वितीय भाग ),  लेखिका -डा ऊषा गुप्ता , प्रकाशक -न्यू रायल बुक कंपनी , लालबाग , लखनऊ.;  समीक्षक --डा श्याम गुप्त.
           " जननी जन्म भूमि स्वर्गादपि गरीयसी ", यही सच है ; और यह सच पूरी तरह उभर कर आया है डा ऊषा गुप्ता,भू. पू. प्रोफ. हिन्दी विभाग लखनऊ वि. विद्यालय द्वारा दो भागों में रचित समीक्ष्य पुस्तक 'अमेरिकी प्रवासी भारतीय:हिदी प्रतिभाएं ' में। पुस्तक में लेखिका ने अपने देश से दूर बसे विभिन्न धर्म,व्यवसाय व क्षेत्र के व्यक्तियों के भावोद्गारों को उनकी कृतियों , काव्य रचनाओं , कहानियों द्वारा बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। जहां विभिन्न रचनाओं में देश की माटी की सुगंधित यादें है ,  बिछुड़ने का दर्द है , वहीं संमृद्धि   में मानवता के डूबने का कष्ट एवं अपने देश भारत की दुर्दशा की पीड़ा भी है। देखिये---   ----                  
                                                        "वह बात आई ,
न बल्ख़ में न बुखारे में  ,
जो छज्जू के चौबारे में।" ---परिचय -प्र.१७.
                                                        *         *            *
यहाँ आदमी बहुत थोड़े हैं ,
फिर भी न जाने क्यों ,
इक दूजे से मुंह मोड़े हैं।------कैलाश नाथ तिवारी
                                                        *      *           *
कैसी थी माधुर्य प्रीति ,
पल पल के उस जीवन में ,
भूल गया हूँ आज,
मशीनी चट्टानों के वन में।----कैलाश नाथ तिवारी .
                                                     *             *                          *
   " दूर छूट गया बचपन का वह युग जहां सचमुच डाल डाल पर सोने की चिडियाँ बसेरा करती थीं ; अब वह भारत कहाँ रहा। विज्ञान ने , समय की दौड़ ने भारत को विदेशों की स्पर्धा में लाकर खडा कर दिया है ? "  ---- निर्मला अरोरा .
                                                             *            *                   *
वैभवों को भोगते वे ही यहाँ / जो यहाँ सन्मार्ग पर न चले कभी ।----- शकुन्तला माथुर .
और भी--- अमरीका में हमको आये, अपने ऊपर हांसी।
भारत में हम साहब थे, अमरीका में चपरासी।
अमरीका है ऐसा लड्डू , जो भी इसको खाए ,
खाए सो पछताए और न खाए सो पछताए।    ---- देवेन्द्र नारायण शुक्ल .
                       *          *                 *
और तू कितना सोयेगा हिंद, हो गई आधी रात अब तो जाग।  -----देवेन्द्र नारायण शुक्ल .
परिचय में यद्यपि लेखिका ने अमेरिका की प्राकृतिक सुषमा, भौतुक सौन्दर्य, वैज्ञानिक प्रगति, समृद्धि व एश्वर्य का सांगोपांग वर्णन किया है जो वास्तव में व्यक्ति को दूर दूर से खींच लाती है ;परन्तु साथ में ही ...." नंदन कानन के सौन्दर्य .....", " कैसर बाग़ के इमली के पेड़ ....", कभी ऐसा ही था मेरा लखनऊ ...."  की याद तथा यहाँ अमेरिका में  "..बड़े अपनत्व से हाय हेलो! कहकर आपका मन जीत लेंगे , बस इतना ही , आगे फुल स्टाप। "  एवं   " भारत में जीवन की कठिनाइयों पर जोरों शोरों से विवाद , आध्यात्मिक चर्चा , गली मुहल्लों की गप-शप, - वयस्कों व वृद्धों के समय काटने के अच्छे साधन हैं। पर अमेरिका में क्या करें ?......"   कहकर समृद्धि व ऐश्वर्य की चमक धमक के पीछे जीवन के भयावह खोखलेपन के सत्य को भी उजागर किया है। कवि अंतर्मन निष्पक्ष होता है।


पशु -पक्षी के तरह सुबह सुबह निकल जाना,और देर शाम को अपने अपने कोटरों में लौट आना ही जीवन है तो सारे ऐश्वर्य का क्या ?  ऐसे में अपने देश के सुगंध बरबस याद आती ही है।यही भाव इस पुस्तक की आत्मा है। सबका मिलकर त्यौहार मनाना, होली, दिवाली ,ईद व क्रिसमस भी ; यही आत्मीयता .. " वसुधैव कुटुम्बकम " भारत है,  जो कहीं नहीं है। सचमुच- सुदूर में भारत को जीवित रखना एक पुनीत कर्म है;  हाँ यह स्पष्ट नहीं होता कि अमेरिकी भी उसी जोश से होली दिवाली ईद मनाते हैं या नहीं ?


अभिव्यक्ति, काव्य प्रतिभा, या प्रतिभा किसी देश, काल, जाति, धर्म , व्यवसाय , उम्र व भाषा के मोहताज़ नहीं होती। यह सिद्ध किया है प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका डा ऊषा गुप्ता ने ; जिसमें अमेरिका स्थित प्रवासी भारतीयों के काव्य प्रतिभा, उनके भारत व अमेरिका के बारे में विचार के साथ साथ वहां हिन्दी के प्रचार प्रसार व भारतीय संस्कृति को जीवित रखने के प्रयासों को भी भारतीयों व विश्व के सम्मुख रखने का प्रयत्न किया है| यह एक महत्वपूर्ण बात है। प्रवासी भारतीयों के हिन्दी प्रेम, कृतित्व, काव्यानुभूति के विषद वर्णन के लिए वे विशेषतः बधाई के पात्र हैं। प्रस्तुत पुस्तक भारतीय व विश्व काव्यजगत में , विश्व साहित्य क़ी एक धारा के भांति प्रवाहित होकर अपना स्थान बनायेगी एवं प्रेरणा स्रोत होगी , ऐसा मेरा मानना है।


एक महत्व पूर्ण बात और है कि लगभग सभी कवियों ने छायावादी गीतों से लेकर अगीत विधा तक समान रूप से लिखा है। सभी गीत , अगीत, गद्य - पद्य सभी विधाओं में समान रूप से रचना रत हैं। विधाओं का कोई टकराव नहीं है । यह  "अतीत से जुड़ाव व प्रगति से लगाव " ही प्रगति का लक्षण है। समस्त कवि, कहानीकार, लेखक एवं प्रस्तुत कृति की लेखिका डा ऊषा गुप्ता जी बधाई की पात्र हैं।


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डा श्याम गुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना ,लखनऊ -२२६०१२

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चार हाथ घूँघट के, पीछे, कैसा है तेरा संसार

जो तुमने इसमें छुपकर, लाखों जीवन दिए गुज़ार..

वो नभ का सुथरा नीलापन, मैला सा लगता होगा

वो धवल चन्द्रमा भी शायद, धुंधला सा दिखता होगा

जब भीना सा घूंघट कोई, मर्यादा का नाम लिए

मौन तुम्हारी आँखों पर, बरबस ही चढ़ता होगा.

क्या इन नैंनो की पुतली भी, कर पायेगी गगन विहार.

चार हाथ घूँघट के पीछे है कैसा तेरा संसार.

 

जब बादल छाये काले से, और चली ठंडी पवन,

नभ में तड़ित यष्टिका चमकी, उल्लास हो उठा मन में.

तब तुम गरमी की मारी, छोटे से कमरे में,

कैद रही बस अपने इस किस्मत के अवगुंठन में,

क्या तुम भी महसूस करोगी, सावन की पहली बौछार,

चार हाथ घूँघट के पीछे, है कैसा तेरा संसार..

 

हे मुनियों, हे शास्त्रसर्जकों, किस पर समय गंवाया,

अवगुंठन के अभिनन्दन में, अपना ज्ञान लड़ाया.

सदा तुम्हारी हितैषिणी इस, कोमल सी रचना पर,

जीवित रहते ही बोलो, क्यों, ऐसा कफ़न चढाया.

तो तुमने इस तरह निभाया, नारी की रक्षा का भार,

चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.

 

सोचो तुम किस भांति करोगे इतने त्यागों का प्रतिकार,

चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.

एक चहकने को आतुर, चिड़िया के पंखों की हार,

रण में चलने को विह्वल, बंद म्यान में एक कटार.

एक पुरुष के वृथा दंभ पर, बलिदान हो गयी नारी के,

स्वप्नों के टुकड़ों पर लटकी, मर्यादाओं की तलवार.

चार हाथ घूँघट के पीछे, ऐसा ही बसता संसार,

इसी तरह जीकर नारी ने इतने जीवन दिए गुज़ार

चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.

---

(चित्र – साभार – स्वराज भवन महिला दिवस चित्र प्रदर्शनी 2010)

हास्य कविता

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[१]

दो करोड़ घूस  लेते धराये एम सी आई अध्यक्ष,

पैसा लेकर मान्यता  प्रदान करने का था लक्ष्य

गुणवत्ता  अब गौण हो गयी,मजबूत है मुद्रा-पक्ष

युधिष्ठिर! अब क्या पूछेगा यक्ष ?

   [२]

मनरेगा मजदूर हैं बैठे तालाब खोदे जे.सी.बी.मशीन.

ऐसे ही सरकारी योजना को वे मिल करे छिन्न -भिन्न

नेता-अफसर  सांप के आगे ठीकेदार बजाये बीन.

तक धिना धिन धिन !

[३]  

मनचाही ट्रान्सफर-पोस्टिंग की मची हुई है धूम

ट्रान्सफर-पोस्टिंग इंडस्ट्री में आ गयी फिर से बूम

ऐसे सोर्सें! इतनी मुद्रा कि  बस सर जायेगा घूम

झूम बराबर  झूम !

----.

विजय कुमार वर्मा ,बोकारो थर्मल डी एम् डी-३१\बी

v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

***ग़ज़लें***

(1)


करें क्या शिकायत अँधेरा नहीं है
अजब रौशन है कि दिखता नहीं है

ये क्यों तुमने अपनी मशालें बुझा दीं
ये धोखा है कोई, सवेरा नहीं है

ये कैसी है बस्ती, ना दर, ना दरीचा
हवा के बिना दम घुटता नहीं है!

नई है रवायत या डर हादसों का
यहाँ कोई भी शख्स हंसता नहीं है

ये किसका है खंजर, ये खंजर से पूछो
ये तेरा नहीं है, ये मेरा नहीं है
****

(2)


जलता हूं, सुलगता हूं, पिघलता हूं कि मैं हूं
जीता हूं कि तू है कहीं, मरता हूं कि मैं हूं

मैं हूं कि मैं कि तू है, तू है कि तू ही तू
छूकर तुझे तस्दीक मैं करता हूं कि मैं हूं

होना मेरा क्या होना है, राजा न सिपाही
हर रोज रजिस्टर में ये भरता हूं कि मैं हूं

ये इश्क, जुनूं क्या है, क्या खौफ, क्या गिला
ये आग है अपनी ही, जलता हूं कि मैं हूं
*****.

(3)


रिश्ते सीढ़ी हुए पतवार हुए
जबसे हम लोग समझदार हुए

सेज के फूल थे जो कल शब में
वो सहर में नजर के खार हुए

किसी भँवर में उतर गए हम तुम
लग रहा था कि अबके पार हुए

हम तो निकले थे बदलने दुनिया
अपने ही घर में शर्मसार हुए

इतने उलझे मेरे सभी रिश्ते
बैठा सुलझाने तार-तार हुए
----.

साभार – आउटलुक, मई 2010

ashok gautam

वैसे पूछें तो सभी के पास होती हैं। क्‍या जानवर, क्‍या आदमी। क्‍या उच्‍च वर्ग, क्‍या मध्‍यम वर्ग। पर जो जानवरों से अपने को जरा सभ्‍य मानते हैं वे उसे सावधानी पूर्वक छुपाकर रखते हैं। चालाक कहीं के!! ये एक चालाकी ही तो है जो उन्‍हें और जानवर को एक दूसरे से अलग करती है। यदि वे चालाक न होते तो सच मानिए उनमें और जानवर में आज भी कोई अंतर न होता।

कई दिनों से देख रहा था कि वे छुपी पूँछ हिलाए बड़े मजे से जी तो रहे थे पर कल वे अचानक साक्षात्‌ अपनी पूँछ हवा में सरेआम सादर हिलाते हुए आए तो मैं दंग रह गया! अति सभ्‍य लोगों को ये सब शोभा देता है क्‍या! उन्‍हें अति सादर बैठने के लिए कुर्सी तो पूँछ के लिए स्‍टूल दे मैंने दोनों हाथ सानुनय जोड़ कहा,‘ धन्‍य हो प्रभु! जो आज आपने अपनी पूँछ के प्रत्‍यक्ष दर्शन करवाए। मैं आज आपकी पूँछ के दर्शन कर गद्‌गद्‌ हो गया। इतनी गद्‌गद्‌ तो राम के दर्शन पा शबरी भी न हुई होगी।' वे बिन कुछ कहे केवल मुस्‍कुराते हुए स्‍टूल पर खुद बैठे और पूँछ कुर्सी पर दे धरी तो समझते देर न लगी कि आज के दौर में आदमी से ज्‍यादा महत्‍ता बंदे की पूँछ की है। कुछ देर तक मौन मुस्‍कुराते रहने के बाद वे उवाचे, 'पारथ! जिस बंदे के पास आज पूँछ नहीं समाज में उसकी तनिक पूछ नहीं। पूछ के लिए बंदे के पास कम से कम एक अदद पूँछ होना बहुत जरूरी है। जो पूँछ इतने काम की हो उसे छिपाना क्‍या! अब छिपाव का जमाना गया। अब बंदे खून तक को छिपाते नहीं। उसकी नैतिक जिम्‍मेदारी ले खुलके सामने आते हैं। ऐसे में जब विकसित समाज के लोग औरों के खून भी बहादुरी दिखाने के लिए अपने जिम्‍मे ले रहे हों तो पूँछ छिपाकर क्‍या जीना? पूँछ दिखाकर जिओ तो बात बने।' मैंने उनकी पूँछ की कंपनी का लोगो देखने के लिए तनिक इधर उधर करने की कुचेष्‍टा की कि पूँछ देसी है या विदेशी तो उन्‍होंने विस्‍मय से पूछा,‘ क्‍या देख रहे हो पारथ?'

‘प्रभु, देख रहा हूं कि पूँछ कौन सी मेड इन है?'

‘अपने देश की ही है, पूर्ण स्‍वदेशी! अपने पड़ोसी को छोड़कर बाहर की बनी पूँछों में इतनी लचक नहीं होती जितनी अपने देश में निर्मित पूँछों में होती है। क्‍या करें पार्थ! साला जमाना ही आज पूँछें हिलाने वालों का चल रहा है। गए दिन वे जब आदमी मेहनत की खाता था। ईमानदारी की खाता था। आज तो मेहनत से कमाने निकलो तो शाम को सूखी रोटी भी नसीब न हो। कुर्सी और इस पापी पेट के लिए अपने आकाओं को रिझाने- पटाने के लिए आज संसद से पगडंडी तक क्‍या- क्‍या नहीं करते पूँछिए ? अपने आप अपना फर्ज समझ आज की डेट में तो गाय भी दूध दे के राजी नहीं। उसके आगे दुधिए को भी अपनी पूँछ हिलानी पड़ती है। तब जाकर दूध दे गई तो दे गई।

पारथ! पहले भला जामाना था। थोड़ी सी मक्‍खन बाजी से ही काम हो जाया करते थे। थोड़ा सा मक्‍खन लगाया और काम बनाया। तब मक्‍खन में बंदे से ज्‍यादा दम होता था। पर जबसे बाजार में मक्‍खन नकली आने लगा है कम्‍बख्‍त किलो के हिसाब से बंदे के पूरे बदन पर रगड़ते रहो, रगड़ते रहो,पर बंदा है कि टस से मस नहीं होता। खुश्‍क का खुश्‍क! उसे चाहे मक्‍खन के टब में ही डूबो दो, बाहर निकलते ही पूछता है तुम कौन! अरे भैये! हम वो हैं जिसने अपने पेट को काट कर तुम्‍हें मक्‍खन के टब में ठुंसाया हुआ था। ये समाज तो हद से ज्‍यादा नमक हराम होता जा रहा है। अब काम तो करवाने हैं पारथ! लाइन में पानी के कनेक्‍शन के लिए ईमानदारी से लगे रहोगे तो अगले जन्‍म में भी पानी का कनेक्‍शन न मिले। रिश्‍वत खा खा कर भी अब अपने देश में रिश्‍वत के पुरोधाओं के असली दांत तो असली, नकली दांत भी सड़ने लग गए हैं। आउट ऑफ वे का देश है। सिस्‍टम यहां नहीं चलने का। जहां सिस्‍टम खत्‍म हो जाता है उससे आगे पूँछ चलती है। पैसा पूँछ के आगे पानी भरता है। जब कैसे भी काम न निकल रहा हो तो हे पारथ! बेहिचके झोले में छुपाई पूँछ निकाल, सारी लोक लाज त्‍याग उसे बंदे के आगे हिलाने लग जाओ। और लो ! काम हो गया! चलो मुहल्‍ले में लड्‌डू बांटो। जब किसी के आगे पूँछ हिला ही दी तो अब और शेष रह ही क्‍या जाता है? जब पूँछ इतने काम की चीज हो तो उसे सम्‍मान से चौबीसों घंटे निकाले रखिए, विवाह होने के बाद प्रेमिका की तरह छुपाकर नहीं। पारथ! इसलिए समाज में जो निर्भय हो जीना है तो कपड़े पहनने भले ही भूलो पर पूँछ पहनना मत भूलो। '

हे तथाकथित भले मानसो! किसके डर से तुम लोग पूँछ को क्‍यों छुपाए फिरते हो? इधर समाज में अपने हाइट से दुगनी लंबी पूंछें लगाए भद्रपुरूष हर चबूतरे पर बैठे हंसिया -खिसिया रहे हैं। उठो! शान से पूँछ धारणकर सड़कों पर विचरण करो! ये समाज दिखावे वालों का है। मन की आस्‍थाओं को तो अब देवता भी नकारने लगे हैं। वे भी उन्‍हीं के प्रिय हो रहे हैं जिन्‍हें उनके आगे पूंंछ की तरह आस्‍थांए हिला- हिला दिखाने का हुनर आता हो।

प्रभु! मर गया धक्‍के खाता- खाता! एक बेहतर सी, विश्‍वसनीय, दिखाने वाली, हिलने में पूरी तरह नेचुरल से भी दो कदम आगे वाली उत्‍तराधुनिक पूँछ अगर हो सके तो मेरे लिए भी। सच मानो! मैं उसे सोते हुए भी नहीं खोलूंगा।

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अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन 7173212 हि.प्र.

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शीध्र ही बच्चों की गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं। इन लम्बी छुट्टियों में मध्यम वर्गीय परिवार के लोग न तो लम्बे समय के लिए पर्यटन पर जा सकते हैं, और न ही रिश्तेदारों के यहां लम्बी छुट्टियां व्यतीत कर सकते हैं। ऐसे में बच्चे इधर उधर फिरते रहते हैं, आलस्य से घर पर पड़े रहते हैं, और सामान्य कार्यों से भी उनका जी उचट जाता है।

कुछ बच्चे सिनेमा, टीवी, वीडियो, ताश, तथा अन्य खेलों में स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं। तो कुछ आस पड़ोस के बच्चों के साथ मिलकर केवल गप्पे मारते रहते हैं। ये सब चीजें बच्चों को अकर्मण्य बनाती है। अतः माता पिता कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि इन छुट्टियों का बच्चों के लिए सदुपयोग हो सके।

बच्चों के सामाजिक विकास के लिए बच्चों का एक क्लब बनाएं जहां वे अपने अभिभावकों के निर्देशन में उत्सव, वाद विवाद, खेलकूद, शारीरिक श्रमदान, समारोह आदि करें।

बच्चे एक बाल पुस्तकालय बनाये और रोचक, ज्ञानवर्धक पुस्तकों को पढ़ें। बच्चे वीडियो पर जानवरों, पेड़-पौधों, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों का अवलोकन कर सकते हैं।

बच्चे साहित्य, यथा कवि गोष्ठी, कहानी प्रतियोगिता, चित्रकला प्रतियोगिता आदि का आयोजन कर सकते हैं। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास तो होगा ही, साथ ही जीवन को देखने का नजरिया भी बदलेगा।

कमजोर स्वास्थ्य के बच्चे अपने शारीरिक विकास के लिए प्रयास कर सकते हैं। तैरना एक अच्छा व्यायाम है। वे जूडो कराटे भी सीख सकते हैं। वे स्थानीय शारीरिक व्यायाम शाला में जा सकते हैं।

बच्चे, मोहल्ले, आस पडोस की सफाई व्यवस्था, रोशनी, पानी की व्यवस्था, गलियों के नामकरण, मकान संख्या अंकित करने आदि कार्यों को भी मोहल्ला विकास समिति के माध्यम से हाथ में ले सकते हैं। बच्चे प्रौढ़ शिक्षा के काम में हाथ बटा सकते हैं। प्रौढ़ शिक्षा मिशन को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

अपने शहर की गलियों, बाजारों, प्रमुख स्थलों आदि का भ्रमण भी बच्चे कर सकते हैं। बड़े शहरों में रहने वाले बच्चे अपने ही शहर से अनभिज्ञ होते हैं और उन्हें छुट्टियों में शहर को जानने, समझने का प्रयास करना चाहिए।

अपने गांव या शहर का भूगोल, इतिहास तथा प्रमुख व्यक्तियों के बारे में जानकारी प्राप्त होने से उनके प्रति एक प्रकार के अपनत्व का विकास होता है।

यदि बच्चे अपना शहर छोड़ कर अन्यत्र जाते हैं, तो उस शहर की बालसभा या पुस्तकालय आदि में जाकर गतिविधियों में भाग ले सकते हैं। घरेलू खेलों, यथा-कैरम, शतरंज आदि का भी प्रयोग छुट्टियों के सदुपयोग के लिए किया जा सकता है।

जिन बच्चों की हस्तलिपि अच्छी नहीं है, वे छुट्टियों का उपयोग उसे सुधारने में कर सकते हैं। लड़कियों के लिए आजकल कई प्रकार के छोटे छोटे पाठ्यक्रम चल रहें हैं, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, खाना बनाना, चित्रकारी, ब्यूटी पार्लर, आदि पाठ्यक्रमों को सीख कर वे स्वयं का रोजगार तक शुरू कर सकती है।

कुछ बच्चे पढ़ने में अपेक्षाकृत होशियार होते हैं। यदि वे अन्य कमजोर बच्चों को पढ़ाये तो छुट्टियों का बहुत ही सुन्दर उपयोग संभव है।

बच्चों को समाज उत्पादकता के कामों की जानकारी देने के लिए अभिभावकों को प्रयास करने चाहिए। लघु रोजगार के लिए विभिन्न व्यावसायिक कार्य सिखाए जा सकते हैं।

ग्रामीण बच्चों को खेती बाड़ी, खाद बीज, कृषि उपकरण आदि की जानकारी देने के लिए शिविरों का आयोजन कर सकते हैं।

अध्यापक, अभिभावक व बच्चे यदि मिलकर बच्चों के अवकाश के समय का सदुपयोग करें, तो भावी पीढ़ी सुसंस्कृत व अनुशासित हो सकती है। बच्चे घर पर बोर भी नहीं होंगे। सच में अवकाश को अच्छी तरह गुजारना ही आराम है और आराम के बाद बच्चे जब वापस स्कूल जाएंगे तो तरोताजा रहेंगे और पाठ्यक्रमों को ज्यादा रूचि से पढ़ेंगे।

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यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्मी नगर ब्रहमपुरी बाहर, जयपुर-302002

फोनः-0141-2670596

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पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी व भारतीय भाषाओं में प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन हुआ है। अंग्रेजी के साहित्य से तुलना करने पर हिन्दी व भारतीय भाषाओं का साहित्य अभी भी काफी पीछे है। मगर संख्यात्यमक दृष्टि से काफी साहित्य छपकर आया है। सरकारी थोक खरीद, कमीशन बाजी तथा नये प्रकाशकों के कारण साहित्य में संख्यात्मक सुधार हुआ है, मगर गुणात्मक हास भी हुआ है। पाठ्यक्रम की पुस्तकों पर तो विचार-विमर्श तथा जांच परख होती हैं मगर अन्य जो खरीदी योग्य साहित्य छप कर आ रहा है उसकी स्थिति ज्यादा सुखद नहीं है। इन पुस्तकों का सम्पादन, प्रकाशन कैसा है ? लेखक बाल मनोविज्ञान से कितना परिचित है या नहीं ?

एक ही लेखक विज्ञान से लगाकर कविता, कहानी, बैंकिग या मुर्गी पालन पर लिख रहा हैं तो स्पष्ट हो जाता है, कि व्यावसायिकता बुरी तरह हावी हैं और गुणवत्ता नष्ट हो रही है। राष्ट्रीय बाल पुस्तक न्यास, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद तथा अन्य सरकारी संस्थाओं की स्थिति भी ज्यादा ठीक नहीं है। पुस्तकों की छपाई, कागज, कवर, जिल्द, प्रोडक्शन, गेट-अप और अन्दर की सामग्री की कठोर जांच परख बहुत जरूरी है। क्योंकि बच्चों और किशोरों का साहित्य भविष्य में पूरे देश को प्रभावित करेगा। एक पूरी पीढ़ी इस साहित्य को पढ़ कर आगे बढ़ने का सपना देखती है, और यदि इस साहित्य में वांछित स्तर नहीं हैं, तो बच्चे दूसरे दर्जे के नागरिक बनेंगे।

अधिकांश बाल साहित्य हमारी संस्कृति, इतिहास, विश्वास, परम्परा और आचरण की दृष्टि से ठीक नहीं निकल रहा है। लेखक जो कुछ लिख कर देता हैं प्रकाशक वही छाप देता है, अधिकांश प्रकाशकों के पास सम्पादक नहीं है, वे लेखकों को एक मुश्त राशि देकर बाल व प्रौढ़ साहित्य की पाण्डुलिपि खरीद लेते हैं। और थोक खरीद में कमीशन देकर पुस्तक को बेचकर भारी मुनाफा कमा लेते है। प्रकाशकों को बच्चों की रूचि, पुस्तक के स्तर या सामग्री की स्तरीयता की चिंता नहीं है। वे शुद्ध व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाते हैं, और उन्हें भी बहुत ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता, जो पैसा लगायेगा वो पैसे का मूल्य भी वसूलेगा।

वास्तव में बाल साहित्य की पुस्तकों का प्रोडक्शन व गेट अप ऐसा सुन्दर व रोचक होना चाहिए कि बच्चों को पुस्तक खिलौनों की तरह आकर्षित करे। पुस्तकों की देखभाल भी आवश्यक हैं घर पर कम से कम बाल पुस्तकें तो अवश्य ही होनी चाहिए। वैसे भी जिस तेजी से बाल पत्रिकाएं बन्द हो रही है, उसे देखते हुए बाल पुस्तकों का महत्व और भी बढ़ जाता है। माता पिता, अध्यापक और अभिभावकों को बच्चों द्वारा पढ़ी जा रही पुस्तकों पर ध्यान देना चाहिए।

पुस्तकें बच्चों का मानसिक भोजन है, और शारीरिक विकास के लिए जैसे दूध, फल, विटामिन चाहिए वैसे ही मानसिक विकास हेतु श्रेष्ठ पुस्तकें चाहिए। स्वस्थ व मनोरंजक साहित्य से बच्चे के चरित्र का समुचित और आवश्यक विकास होता है। अच्छी पुस्तकों से अच्छे संस्कार बनते है। महाभारत, रामायण, पुराण, गीता आदि की कहानियों से बच्चों में मनुष्यत्व का विकास होता है। बाल साहित्य के लेखक को यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा भावी नागरिक है और उसके मन पर अभी जो अंकित हो जायेगा, वही आगे तक रहेगा। मनोवैज्ञानिक भी बाल मन पर पड़ने वाली छाप को बहुत महत्व देते हैं।

बच्चों के मन में जिज्ञासु प्रवृति बहुत होती है। वो ज्यादा से ज्यादा जानकारी चाहता है और इस जानकारी हेतु सदैव माता पिता, गुरू से पूछना चाहता है। यदि पूछना संभव न हो तो बच्चा पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान चाहता है, अतः बाल साहित्य का महत्व बहुत अधिक है।

महात्मा गांधी का कहना है- सच्ची शिक्षा वही है, जो बच्चे के चरित्र का विकास करे। उसे यह सिखाया जाये कि जीवन के संघर्ष में सत्य द्वारा असत्य पर, प्रेम द्वारा घृणा पर और अहिंसा द्वारा हिंसा पर विजय किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है। इसी बात को ध्यान में रखकर बाल साहित्य की रचना की जानी चाहिए। बच्चों के चरित्र निर्माण में, बुद्धि व विवेक का विकास करने में बाल साहित्य का बड़ा योगदान होता हैं साहित्य से ही संस्कारित बच्चे बनते है। अतः पुस्तकें ऐसी होनी चाहिए, जो बच्चों को मनोरंजन, ज्ञान तथा संस्कार दें।

चित्रों का अपना महत्व हैं बड़े, सुन्दर और स्वच्छ चित्रों के होने से पुस्तक का महत्व बहुत बढ जाता है। चित्र यदि कई रंगों में हों तो और भी अच्छा रहता है। आज कल आफसेट मुद्रण प्रणाली के विकास के कारण इस प्रकार की सचित्र पुस्तकों को मुद्रण बहुत आसान हो बया है। जो बच्चों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है।

बाल साहित्य बच्चे के प्रतिदिन के जीवन से जुड़ा होने से बच्चे का झुकाव इस ओर अधिक हो जाता हे। भाषा, मुहावरा, शैली और शिल्प बच्चों की मानसिक आयु को ध्यान में रखकर प्रयुक्त की जानी चाहिए। धर्म, नीति शिक्षा, उपदेश, सच्चा चरित्र आदि गुणों का विकास हो यहीं कोशिश रहनी चाहिए। बच्चों को अश्लील, भय, निराशा, कुंठा, अंधविश्वास आदि का साहित्य नहीं पढ़ाया जाना चाहिए। उदासी आये, ऐसा साहित्य भी बच्चों के लिए उचित नहीं है। बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कहानी, कविता, उपन्यास भी रोचक तथा जानकारी से पूर्ण होने चाहिए।

बच्चों को विज्ञान, पर्यावरण, रोजगार आदि की जानकारी भी पुस्तकों के माध्यम से दी जानी चाहिए। बच्चों को बैंक, पोस्ट ऑफ़िस, सरकारी कार्यालयों, सामाजिक रीति-रिवाजों, उत्सवों आदि की भी पुस्तकें मिलनी चाहिए।

बच्चों में पुस्तक-प्रेम का विकास किया जाना चाहिए। बिना पुस्तक प्रेम के बच्चे अच्छी से अच्छी पुस्तकों को भी एक तरफ सरका देंगे। पाठ्यक्रम से इतर पुस्तकों को पढ़ने की भी प्रेरणा बच्चों को दी जानी चाहिए।

बच्चों को महान व बड़े व्यक्तियों की प्रेरणादायक जीवनियों को भी पढ़ाया जाना चाहिए। मेले, व्रत, त्यौहार, उत्सव, जन्मदिन, आजादी का संघर्ष आदि विषयों पर भी अच्छी पुस्तकों की आवश्यकता है।

आज का बालक क्या बनेगा ? यह इस बात पर निर्भर रहता है कि उसकी शिक्षा दीक्षा कैसी हुई है। उसके संस्कार कैसे हैं? और उसने किस प्रकार का बाल साहित्य पढ़ा है। बच्चों को जीवन के सत्य से परिचित कराया जाना चाहिए। उसे जीवन संधर्ष की प्रेरणा मिलनी चाहिए। उसे जीवन की कठोरता की पूण्र जानकारी मिलनी चाहिए। रोचक और हृद्यग्राही सामग्री से बच्चा जल्दी सीखता है। त्याग, तपस्या, ईमानदारी, आदर्श के सहारे बच्चा एक बहुत ही जिम्मेदार नागरिक बन सकता है। वीरता की कथाएं, ऐतिहासिक कथाएं, साहस की कथाएं, और महापुरूषों की जीवनियों को पढ़ पढ़कर हजारों लोगों ने अपने जीवन को सफल बनाया हैं एक सफल व्यक्ति की जीवनी पढ़कर प्रेरणा पाकर लाखों करोड़ों बच्चे अपने जीवन को सफल कर सकते है।

बच्चा जो पढ़े वह उसके माता पिता या अध्यापक द्वारा अनुमोदित हो, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य होगा। हमारे देश में साक्षरता की कमी है, अतः बाल साहित्य की आवश्यकता और भी ज्यादा है। हमें श्रेष्ठ बाल साहित्य के संरक्षण, प्रकाशन की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। और उसे बच्चों तक उचित मूल्य पर पहुंचाना चाहिए। ताकि देश एक संस्कारित राष्ट्र बन सके।

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यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्मी नगर ब्रहमपुरी बाहर, जयपुर-302002

फोनः-0141-2670596

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प्रातः कालीन भ्रमण मेरा शौक है, सुबह की हवाखोरी से मुझे दिन भर ताजगी, स्‍फूर्ति मिल जाती है, सुबह के दौरान मैं कई अपने जैसे लोगों को भी देखता हूं। कोई दौड़ लगा रहा होता, तो कुछ अपने झुण्‍ड के साथ राजनैतिक चर्चा करते हैं, प्रायः महिलायें तो विगत दिन उन्‍होंने क्‍या किया इसकी चर्चा करती मिल जाती हैं। बाबा रामदेव ने जो अपना आंदोलन योग के लिये चलाया है उससे कितनी सामाजिक जाग्रति आई है यह बखूबी सुबह सैर के दौरान देखने को मिल जाता है, अनुलोम विलोम, कपाल भाति, प्रणव जाप करते लोग मिल जायेगें, हैरत तो तब होती है जब बुजुर्ग व्‍यक्‍ति भी योग करते देखने को मिल जाते हैं इस योग से उन्‍हें कितना फायदा होता होगा यह तो वही बता सकते हैं जो इसे करते हैं, बहरहाल लोग अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूक हुए हैं यह आशा जगाने वाली बात है।

जब से तीन नये प्रदेशों का गठन हुआ है तब से बहुत से लोग इधर से उधर हुए हैं कोई अपने मूल प्रदेश में गया तो किसी ने उसी में रहने का अपना विकल्‍प दिया । मैं भी इस शहर में नया नया आया हूँ हालांकि प्रदेश गठन से मेरे तबादले को कोई अर्थ नहीं हैं मै केन्‍द्रीय सरकार का कर्मचारी हूँ, और अपने परिवार को अभी मै यहां नहीं ला पाया हूँ। सरकारी गेस्‍ट हाउस में ठहरा हूँ। इस शहर की आबोहवा ने मुझे मोह लिया है, सोचता हूँ अगर यहीं कोई मकान या प्लाट मिल जाये तो बाकी उमर भी यही काटने का मेरा इरादा है।

तो बात चल रही थी सुबह के दौरान घूमने की, मैंने अपने दो तीन सहकर्मियों से यहाँ सुबह घूमने वाली सड़कों के बारे में जान लिया था । सुबह घूमते हुए मै काफी दूर तक निकल गया, यह कैन्‍ट का इलाका है, जहाँ काफी दूर जाकर कैंट का इलाका खत्‍म हो जाता हू, लेकिन खुली खुली जगह, सामने दूर दिखाई देती पहाड़ियाँ हरा भरा माहौल बरबस अपनी ओर खींच लेता है । पहले ही दिन उस सड़क पर मेरी नजर एक ऐसे मकान पर पड़ गई जो वास्‍तुकला का अद्‌भुत नमूना था बनाने वाले की कला दृष्‍टि निसंदेह आश्‍चर्यजनक थी। एक विशेष बात जिसने फिर मुझे आश्‍चर्य में डाल दिया वह था एक बुजुर्ग व्‍यक्‍ति की झोपड़ी जो उसी मकान के सामने एक आम के पेड़ के नीचे थी। उसी सड़क पर यों तो और भी बहुत सी कोठियाँ थी लेकिन उस इलाके की अगर कोई नायाब और खूबसूरत कोठी थी तो बस वही थी, लेकिन आश्‍चर्य तब और अधिक हुआ, जब उस गेट पर मैंने ताला पाया। अपने ही ख़्यालों में मैं सोचता जाता था कि शायद इस मकान का मालिक कोई बहुत ही पैसे वाला व्‍यक्‍ति होगा जो शायद अपने परिवार के साथ विदेश में रह रहा होगा यहाँ वह कभी कभी आते होंगे। मेरी प्रतिदिन की सैर अब उसी कोठी के आसपास तक होने लगी। अगर यह कोठी मैं खरीद लूं तो कैसा रहेगा लेकिन मकान मालिक का तो कुछ पता नहीं था। शायद इस बूढ़े व्‍यक्‍ति से कुछ पता चल सके धीरे धीरे मैंने उस बूढ़े से दोस्‍ती करनी शुरू कर दी पहले मैंने ही उसे नमस्‍ते कर दी उसने नमस्‍ते ली उसके बाद न वह बोला न मै ही बात को आगे बढ़ा पाया ।

बरसात के दिन थे, उस दिन सुबह से ही काले काले बादलों ने अपना मकान बनाना शुरू कर दिया था, मैं फिर भी अपना छाता लेकर घूमने निकल ही गया । थोड़ी दूर चलने पर हल्‍की हल्‍की बूंदा बांदी शुरू हो गयी थी, कैन्‍ट का इलाका खत्‍म होते ही बारिश जोर से शुरू हो गयी, उस इलाके में ऐसा शेड आदि नहीं था जहाँ रूककर मैं बरसात रूकने का इंतजार करता, बूढ़े ने मुझे नमस्‍ते की और कहा,

'' आप यही बैठ जाइये, जगह तो कम हैं पर बरसात में भीगने से बच जायेगें''

मुझे आज अपना काम होता नजर आया ।

कितना स्‍वार्थी होता है आदमी, अपने हित के लिये कुछ भी करने को तैयार, तुलसीदास ने कहा भी तो हैं '' सुर नर मुनि सब की यह रीति, स्‍वार्थ लगें कर सब प्रीति'' आज रोज ही देखने में आ रहा है अपने स्‍वार्थ के लिये क्‍या क्‍या नहीं कर रहा है आदमी, सरकार को अपने हजार के लिये लाखों का नुकसान पहुंचा रहे है लोग, भाई-भाई कितना लड़ रहे हैं रिलायन्‍स के दो होनहार भाइयों का समझौता कराने के लिये सरकार तक को कूदना पड़ा है इनके बीच, पति पत्‍नी जरा से स्‍वार्थ के लिये अदालतों का दरवाजा खटखटा रहें है कितने ही किस्‍से हैं '' हरि अनंत हरि कथा अनंता'' वाली बात है।

बूढ़े ने मुझे बैठने के लिये अपनी चारपाई दी, कितना समझदार, खुद पायताने की तरफ बैठा मुझे सिरहाने की तरफ बैठाया। संसाधन कम थे, पर फिर भी पूरे घर का सामान व्‍यवस्‍थित था, लगा इस अकेले को भी साफ सफाई का कितना ध्‍यान है। बात को मैंने ही आगे बढाया...............

'' आप यहाँ अकेले रहते है?''

''हाँ''

''आप के बाल बच्‍चे वगैरह''

''....................''

शायद वह अपने बारे में बताने को तैयार नहीं था ।

''आप के लिये चाय वगैरह बना दूं’' बूढ़े ने मुझसे पूछा।

''नहीं अभी मैंने नहाना धोना है, उसके बाद ही कुछ ले पाता हूँ''

''आज तो इस मौसम की सबसे बडी बारिश है'' बूढ़े ने कहा

''हाँ बरसात के दिन है बारिश तो होगी ही, कम या ज्‍यादा यह तो इन्‍द्र भगवान ही बता सकते है''

''उसकी मरजी वो ही जाने''

''आप को तो बडी परेशानी होती होगी इस छोटे से मकान में''

''अब तो आदत सी पड़ गयी है।

''वैसे यह इलाका काफी अच्‍छा है, मुझे पूरे शहर में यह इलाका अच्‍छा लगा''

''हाँ , ये बात तो है''

बूढ़ा अपने बारे में ज्‍यादा बातें नहीं कर रहा था, मुझे थोड़ा आश्‍चर्य हुआ कि यह अकेली जान, क्‍या इसका मन नहीं करता लोगों से बातें करने का, अकेला दिन-रात कैसे कटती होगी इसकी। मैं अभी अपना स्‍वार्थ उसे बताना नहीं चाहता था।

अजीब है मानव मन भी, अन्‍दर चाहे कितना जहर भरा हो, जितना स्‍वार्थ हो, लेकिन सामने वाले पर हम अपने प्रभाव छोड़ने में कोई कसर नहीं उठाना चाहते। कुछ ऐसी ही स्‍थिति मेरी भी है न, मेरी नजरों में बूढ़ा एक साधारण आदमी है जिससे बातचीत का मेरा मकसद सिर्फ अपने स्‍वार्थ की प्रतिपूर्ति तक ही सीमित था। बरसात अब कम हो चली थी, मैंने बूढ़े से बिदा ली.....फिर मिलने का वायदा किया और वापस लौट आया ।

अब मेरी दिनचर्या दस पन्‍द्रह मिनट बूढ़े के पास रूकने की हो चली थी, अक्‍सर हम इधर उधर की बातें करते, लेकिन अभी तक न तो मैं अपनी बात उस तक कह सका था न ही उसके बारे में और अधिक जान सका था। लेकिन इतने दिनों में एक बात स्‍पष्‍ट थी कि बूढ़ा न सिर्फ पढ़ा लिखा था बल्‍कि उसके बाल केवल धूप में ही सफेद नहीं हुए थे बल्‍कि उसे जिन्‍दगी का तर्जुबा भी था, मै इतना तो जोर देकर कह सकता हूँ कि किसी बात ने उसे हिलाकर रखा हुआ था। मैं सिर्फ अब उसके बारे में जानने का इच्‍छुक था अब मेरी मकान या प्‍लाट खरीदने की इच्‍छा गौण हो चुकी थी, मुझे बात ही बात में पता चला कि बूढ़ा एक बाल बच्‍चेदार आदमी है लेकिन फिर वह यहाँ इस झोपड़ी में क्‍यों रहा रहा है ये प्रश्‍न आज भी अनुत्‍तरित था। समय गुजरता गया, मेरी और बूढ़े की अब अच्‍छी खासी जान पहचान हो चुकी थी और उसे में अपने बारे में सब कुछ बता चुका था, मेरी कोई बात अब उससे छिपी नहीं थी, लेकिन मैं अभी उसके बारे में शून्‍य था ।

एक दिन मैंने उससे कहा कि '' आप अपने बारे में कुछ बतायें''

वह टाल गया ।

बोला'' फिर कभी और अब मेरे बारे में जानकर करें भी क्‍या ? बुझते दीपक डूबते जहाज पर सिर्फ अफसोस ही तो कर सकते हैं और अफसोस करते करते मैं इतना थक चुका हूँ कि अब अफसोस शब्‍द सुनना भी नहीं चाहता।''

मैं हैरत में था कि इन बुजुर्गवार के साथ ऐसी कौन सी घटना घट गई कि जो अब यह अपने बारे में बात करते हुये हिचकता है। ज्‍यों ज्‍यों समय गुजरता गया त्‍यों त्‍यों मेरी दिलचस्‍पी उसमें बढ़ने लगी। एक दिन मैंने उसे बड़े अपनेपन से पूछ ही लिया कि मैं आपके बारे में जानना चाहता हूँ, उसने उस दिन भी टाल दिया कहा, फिर कभी.......अब तो जिन्‍दगी का कुछ ही समय बचा है, हो सकता है कि मेरी बात आप समझ जायें, फैसला जो भी हो?

कुछ दिनों के बाद फिर एक दिन वह अवसर आया, जब मैं फिर बूढ़े से मिलने गया, इधर उधर की बातों के बाद मैंने फिर उसके जख्‍म कुरेदने शुरू किये, कितना आनन्द आता है न किसी के जख्‍म कुरेदने में और उस पर हमारी हेठी यह कि हम कितने इंसाफ पसन्‍द हैं, दूसरों के लिये हमारे दिल में कितना दर्द हैं, लेकिन अपने बारे में हम जरूरी नहीं समझते क्‍योंकि जो अपने चेहरे पर हमने नकाब ओढा हुआ है अच्‍छे आदमी का, कही वह बेनकाब न हो जायें । मैं अपनी ही बात करता हूँ कि मैंने ही अपने बारे में उसे कितना बता दिया था।

उसने बताना शुरू किया '' मेरा नाम मुकेश मोहन पाण्‍डे हैं, कभी हमारे पूर्वज गढ़वाल में रहा करते थे वो किस गांव के थे कौन से गढ़वाल के थे मुझे नहीं मालूम यह मेरे जन्‍म से पहले की बात है, जब मेरे दादा परदादा गढ़वाल से पलायन कर इस शहर में आये थे । हम दो भाई और दो बहने थी, हमारे बाप ने अपनी पूरी मेहनत से हमें पढ़ाया लिखाया, बहनों की शादी की। जैसा कि आम होता है शादी के बाद हम भाई अलग अलग हो गये किसी से कोई शिकायत नहीं......भाई की नौकरी तबादले वाली थी इसलिये उसने दिल्‍ली शहर में अपना मकान बना लिया और अपने बच्‍चों के साथ वहीं रहने लगा। पिताजी जिस मकान में रहते थे भाई के अनुरोध पर हमने वह मकान और जमीन बेच दी मैंने उस पैसे से जो मुझे विरासत के मिले थे जमीन खरीद ली, मेरे दो बच्‍चे थे एक लड़का और एक लड़की, लड़का बड़ा था, धीरे धीरे वह बड़ी क्‍लास में पहुंच गया पढ़ने में कुशाग्र था उसकी इच्‍छा एक डाक्‍टर बनने की थी, लेकिन मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि उसे डाक्‍टरी करा पाता, उधर उसकी माँ ने कहा बच्‍चे कि जिन्‍दगी का सवाल है आप किसी भी तरह से इसे डाकटरी पढ़ा दें, मैं असमंजस में था, परेशान था कि कैसे? किस तरह से इसकी डाक्‍टरी की पढ़ाई कराऊं? रात दिन परेशान रहने लगा, उधर लड़के की जिद थी कि मैंने डाकटरी ही पढ़नी है, अजब से भंवर में फंसा था मैं। । फिर मैंने एक दिन सोचा कि आखिर मेरा सब कुछ इनका तो ही है क्‍यों न जमीन बेच दूं लेकिन उसके पैसे उस समय बहुत ही कम मिल रहे थे यानि खाल के चक्कर में ढोल से भी जाने वाली बात थी । लिहाजा मुझे अपना इरादा बदलना पड़ा, फिर अपने सहकर्मियों के सुझाव पर मैंने अपने जी0पी0एफ0 से पैसे निकलवाने की सोची, कुछ मेरे पास विरासत के पैसे थे कुल मिलाकर उसकी पढ़ाई का खर्चा तो निकल सकता था, लेकिन हास्‍टल अन्‍य खर्चों में आगे परेशानी आने वाली थी। पत्‍नी न एक ही जिद पकड़ी थी, कि चाहे जैसे हो उसे डाक्‍टर बनाना ही है। मैंने अपनी जमा पूंजी से उसकी फीस आदि भर दी, इस हिदायत के साथ कि चाहे भूखा रहना पड़े, लेकिन और खर्चों के लिये मुझसे कुछ नहीं मांगोगे, किसी तरह खींच तान कर मैंने उसे डाक्‍टरी पढ़ा दी वह गोल्‍ड मेडल लेकर पास हुआ और दिल्‍ली के अस्‍पताल में नौकरी कर ली, इस बात का ताना वह अक्‍सर मुझे दिया करता कि फीस अलावा आपने कुछ नहीं दिया । जिस समय वह डाकटरी पढ़ रहा था मैंने काफी पहले अपने भवन निर्माण अग्रिम के लिये जा ऋण आवेदन किया हुआ था उसकी मंजूरी आ गई करीब 6 लाख के रू0 के करीब मुझे मिलने थे बाकी मैंने बैंक से ऋण ले लिया और अपनी पसन्‍द का एक मकान बनवा दिया । मेरा सारा वेतन कटौतियों में चला जाता था, बडी मुश्‍किल से घर का खर्च चल रहा था, पैसे की तंगी के चक्कर में अब मेरे और पत्‍नी की बीच अक्‍सर किच किच होने लगी थी, अपनी जगह वह भी सही थी और मै भी । इस बात का पता जब लड़के को लगा तो उसने मां का पक्ष लिया और कहा''.....आपको मैं पैसे भेज दिया करूंगा आप खर्चे से परेशान न हों'', पत्‍नी भी अक्‍सर मुझे ताना देने लगी......''अगर मेरा लड़का पैसे नहीं भेजता तो आपने तो कटोरा पकड़ा देना था। मैं अक्‍सर चुप रहने लगा, मेरे सिर पर कर्जे का एक भारी बोझ था, लड़का कहता जब पैसे नहीं थे तो इतना बडा मकान बनवाने की क्‍या जरूरत थी? सभी लोगों को आपने परेशान कर रखा है। अब पत्‍नी अक्‍सर उसके पास दिल्‍ली जाकर रहने लगी दोनों माँ बेटों में अक्‍सर मेरे ही बारे में बातें होती, एक तरह से अब मुझे अलग कर दिया गया था। फिर एक दिन मेरे पास एक संदेशा आया कि '' विकास ने अपनी पसंद की लड़की से कोर्ट मैरिज कर ली, अर्न्‍तजातीय विवाह था। मुझे क्‍या आपत्‍ति होनी थी, मैंने भी हालात देखकर समझौता कर लिया। बहू ने हमारे परिवार के बारे में सब कुछ जान लिया था, उसकी नजरों में मैं एक खलनायक था, जब भी वह घर आती अक्‍सर मेरी ओर उसकी उपेक्षा की दृष्‍टि होती, मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे से गल्‍ती कहाँ हुई, पत्‍नी अपने बेटे बहू के साथ खुश थी, पैसों का रोना अब वह मुझसे नहीं करती थी। समय गुजरता गया मैं अपने ही घर में एक अजनबी हो गया, एक दिन फिर वह लावा फूटा, जिसको बहुत पहले फूट जाना चाहिये था। आखिर कोई कब तक सब्र करता, मै अपने अकेलेपन से परेशान था और बाकी लोग मुझसे। उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि बहु के कुछ करीबी रिश्तेदार घर पर आ गये मैं अपने कमरे में था, न मुझे किसी ने बुलवाया न मै ही गया, मैंने अपने हाथों से अपने घर में तरह तरह के फूल पौधे लगा रखे थे अब वह ही मेरे जीने का सहारा थे, उन्‍हें मैं बड़े जतन से पालता था, बहू के रिस्‍तेदारों के बच्‍चों ने वहीं पर अपना क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया, काफी उधम चौकडी मचा रखी थी बच्‍चों के अभिभावक उन्‍हें रोक नही रहे थे पूरे घर में उन्‍होंने गन्‍दगी का साम्राज्‍य फैला दिया, मैंने बात बढ़ने के डर से कुछ नहीं कहा, फिर अपनी क्रिकेट की गेंद से उन्‍होंने सामने के सारे शीशे तोड़ दिये, मैंने एक दो बार उन्‍हें रोकने की कोशिश की, लेकिन बहु ने मुझे कुछ ऐसी नजरों से देखा कि मानों मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह किया हो, फिर खेलते खेलते उन्‍होंने फूल पौधे तोड़ने शुरू कर दिये, अब मुझसे रहा नहीं गया मैंने बच्‍चों को जोर से डांट दिया और उनका खेल रूकवा दिया । बच्‍चे अपने अभिभावकों के पास जाकर बैठ गये एक तल्‍खी सी वातावरण में छा गई, कुछ देर बाद वह चले गये।

अब बाकि के सब लोग मेरे पीछे पड़ गये, पत्‍नी और लड़का तो ज्‍यादा नहीं बोले लेकिन बहु ने मेरी वो कलास ली कि मुझे भी गुस्‍सा आ गया, काफी लानत मलामत हुई, हैरत मुझे इस बात की थी कि मेरी पत्‍नी और बेटा भी सारा दोष मेरा ही निकाल रहे थे, काफी रात देर तक वाक युद्ध होता रहा। आखिर मैंने फैसला किया '' लो सम्‍भालो अपना घर'' और मै घर से बाहर आ गया, मुझे किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की । मैं घर छोड़कर बाहर आ गया, सारी रात मैं सड़कों पर घूमता रहा, लेकिन मुझे बुलाने कोई नहीं आया। मैं अपने घर से काफी दूर निकल गया था, सुबह करीब आठ बजे जब मैं वापस घर पहुंचा यह सोचकर कि चलो अब मामला ठण्‍डा हो गया होगा, तो गेट पर ताला लगा था, सब लोग चले गये थे, मैंने इधर उधर नजर डाली शायद मेरे लिये कोई संदेश हो, लेकिन मुझे कुछ नहीं मिला.....उसके बाद दिन गुजरे......महीने गुजरे.......साल गुजरे.......वो लोग अक्‍सर आते हैं लेकिन न मुझे किसी ने बुलाया, न मेरी कोई खबर ही ली.....इतना कहकर बूढ़ा चुप हो गया।

मैंने पूछा'' इस सारे मामले में आपकी बेटी ने कुछ नहीं कहा''

बूढ़ा बोला '' वो बेचारी क्‍या कहती, वह तो जन्‍म से ही गूंगी और बहरी थी''

''और फिर उस मकान का क्‍या हुआ? वह अब किसके पास है?

बूढ़ा बोला '' वह जो सामने मकान देख रहे हैं? जिस पर ताला लगा है वह ही है वह मकान....और मैं उसका केयर टेकर...

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony, Govind Garg,

Dehradun (Uttarakhand)

E mail:  rkantbhardwaj@gmail.com

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(चित्र – भावना नवरंग की कलाकृति)

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मैं अपने परिवेश के प्रति बहुत ही सतर्क रहता हूं !

-रवीन्द्रनाथ टेगौर

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तथा श्रीमती सत्यवती देवी ने रवींद्रनाथ ठाकुर से उनकी रचना प्रक्रिया पर बातचीत की थी, जो ‘फारवर्ड’ पत्रिका में 23 फरवरी, 1936 के अंक में छपी थी, प्रस्तुत है वह सदाबहार बातचीत।

सुदर्शन: क्या आप अपनी रचनाओं की पृप्ठभूमि पर कुछ बोलना चाहेंगे ? कहानियाँ आप के मन में कैसे पनपती हैं ?

कवि: बहुत कम उम्र से ही मैंने कहानियाँ लिखनी शुरु की। जमींदार होने के नाते, मुझे गांव जाना पड़ता था। इस तरह मैं गांव के सहज-सरल लोगों के संपर्क में आया, ग्राम्य बंगाल का सौंदर्य और परिवेश दोनों भाते थे, बंगाल नदियों का देश है, इन नदियों का सौंदर्य और विस्तार आश्चर्यचकित कर देने वाला है, वहां का जीवन मैंने बहुत करीब से देखा है और इसने मुझे प्रेरित किया है, मेरा जन्म और लालन-पालन कलकत्ते में हुआ था। अतः ग्राम्य जीवन से मैं अपरिचित था, इसी वजह से गांव मेरे लिए रहस्यावृत्त-सा था, ज्यों-ज्यों मैं सहज-सरल ग्रामीणों के संपर्क में आता गया, त्यों-त्यों मैं उन्हीं में से एक हो गया, मैंने अनुभव किया कि इनका परिवेश, इनकी दुनिया, कलकत्ता की दुनिया से एकदम पृथक है। मेरी शुरु की कहानियाँ इसी पृष्ठभूमि पर आधारित है और वे ग्राम्य जीवन से मेरे संपर्क की कथा कहती है। इन रचनाओं में यौवन की ताजगी है। इन कहानियों के लिखे जाने से पहले बंगला साहित्य में ऐसा कुछ नहीं लिखा गया था। निःसंदेह बंकिम चंद्र ने कुछ कहानियाँ लिखी थी, पर वे रचनाएं रोमांटिक थी, मेरी रचनाएं ग्राम्य जीवन के सुख-दुख, शोपण तथा संघर्पो पर आधारित थीं, उनमें एक गंवईपन भी है, उन कहानियों को आज जब मैं पढ़ता हूं, इनमें से काफी भूल गया हूं - दुर्भाग्यवश मेरी याददाश्त बहुत अच्छी नहीं है, कभी कल लिखी गयी चीज मैं आज भूल जाता हूं- बहरहाल, आज भी वे रचनाएं मेरे सामने उन बीते क्षणों को एकदम उसी रुप में ला खड़ा करती हैं, इन रचनाओं में एक विश्वव्यापी अपील है,क्योंकि दुनिया भर में आदमी के दुख और सुख एक ही है, मेरी बाद की रचनाओं में यह ताजगी और कोमलता नहीं आ पायी है,

सुदर्शन: क्या जीवित व्यक्तियों की आपकी रचनाओं में स्थान मिला है ?

कवि: जी हां, मेरी कहानियों के कुछ पात्र एकदम जीवन से उठाये गये हैं, उदाहरणतः ‘छुट्टी’ कहानी में लड़के ‘फटिक’ का चरित्र, गांव के एक बालक पर आधारित है, इस कोमल, कल्पनाशील बालक को देखकर मुझे लगा, अगर इसे अपने परिवेश से दूर कलकत्ता ले जाकर, एक असहानुभूति शील परिवार में, मामी के पास रखा जाये तो इस नन्हे बच्चे पर क्या बीतेगी ?

चंद्रगुप्त: आप अपनी किस रचना को श्रेष्ठ समझते हैं ?

कवि: ‘हंसते हुए’ यह कहना बहुत कठिन हें। कइ्र ऐसी रचनाएं है, जो प्रिय हैं...नदी के किनारे व्यतीत मेरा जीवन हर्ष और विवाद से परिपूर्ण था। थोड़ी-सी कल्पना, चित्र और दृश्य रचनाओं का सृजन करते थे। एक रचना, जिसका उल्लेख मैं करना चाहूंगा, ग्रामीण परिवेश लिये हुए है। कहानी में वर्णित उस लड़की को मैंने गांव में देखा है। लड़की बहुत जिद्दी, बागी और असाधारण थी। अपनी आजादी को वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं वाहती थी। प्रतिदिन दूर से वह मुझे निहारती थी। कभी-कभी वह अपने साथ एक बच्चे को भी लाती थी और मेरी ओर उंगली उठाकर उस बच्चे से कुछ कहती थी। दिन-प्रतिदिन वह इस तरह आती रही। फिर एक दिन वह नहीं आयी। उस दिन नदी में पानी लेने आयी हुई ग्रामीण औरतों की बातचीत मैंने सुनी तो पता चला कि वह लड़की ससुराल जा रही है। ग्रामीण औरतें उस लड़की के भविष्य पर बहुत चिंतित थीं, क्योंकि लड़की बागी थी और व्यवहार-कुशल नहीं थी। अगले दिन नदी में एक छोटी-सी नाव दिखी। उस लड़की को जबर्दस्ती नाव पर बिठाया जा रहा था। संपूर्ण परिवेश उदासी और व्यथा से परिपूर्ण था। उसकी सखियां बेकाबू-सी हो रही थीं और कुछ उस लड़की से न डरने का अनुरोध कर रही थीं। धीरे-धीरे वह नाव नदी में अदृश्य हो गयी। यही घटना मेरी एक कहानी का आधार बन गयी। उस कहानी का शीर्षक है-‘समाप्ति’।

एक पोस्टमास्टर था। वह मेरे पास आता था। वह अपने घर से काफी दिनों से बाहर था और वापस लौटने के लिए परेशान था। गांव का परिवेश अच्छा नहीं था। उसे लगता था कि जंगलियों के बीच उसे जबरदस्ती रखा गया है। वह छुट्टी पाने को इतना बेचैन था कि नौकरी से इस्तीफा तक देने के लिए तैयार था। वह मुझसे मिलता और ग्रामीण जीवन के बारे में बातें करता। वस्तुतः उसी की बातों से कहानी ‘पोस्टमास्टर’ लिखने की प्रेरणा मिली।

चतुर्वेदी: ‘काबुलीवाला’ की रचना कैसे हुई ? इस कहानी की अपील विश्वव्यापी है तथा यह बहुत ही लोकप्रिय रचना हैं।

कवि: मेरी इस रचना में थोड़ी-सी कल्पना है। यद्यपि एक काबुलीवाला हमारे घर आया करता था और वह हम लोगों से काफी घुल-मिल गया था। मैंने कल्पना की कि उसके देश में उसकी भी कोई छोटी बच्ची होगी, जो उसे याद करती होगी।

चतुर्वेदी: कहानी का वह अंश जिसमें काबुलीवाला अपनी ससुराल जाने की बात कहता हे, मुझे बहुत अच्छा लगा।

कवि: हमारे इधर जेल को ‘श्वसुर-बाड़ी’ भी कहा जाता है। क्या आपके उधर भी ऐसा ही कहा जाता है ?

चतुर्वेदी: जी हां। ‘ठहाका’ हमारे इधर भी इसे ससुराल ही कहते हैं।

चंद्रगुप्त: आपकी बाद की कहानियों की शैली पृथक है। आपको अपनी पिछली रचनाएं कैसी लगती हैं ?

कवि: मेरी बाद की रचनाओं में वह ताजगी नहीं है, यद्यपि वे कई समस्याएं ‘सामाजिक’ उठाती हैं और इनमें मनोवैज्ञानिक अपील भी है। जब मैं युवक था, तब मेरे सामने कोई सामाजिक अथवा राजनीतिक समस्या नहीं थी। अब ऐसी कई समस्याएं हैं। जो लिखते वक्त स्वतः रचनाओं में चली आती है। मैं अपने परिवेश के प्रति बहुत ही सतर्क रहता हूं। और जब तक उचित परिवेश न मिले, तब तक मैं कोई भी कलात्मक कार्य नहीं कर सकता। जब मैं युवक था, मैं जो कुछ देखता, वह करुणा के साथ घुल-मिलकर मेरी रचनाओं में आ जाता। अतः मेरी नजर में उन रचनाओं का साहित्यिक मूल्य अधिक है। वे स्वतः स्फुर्त भी हैं। मेरी बाद की रचनाओं की ‘शैली इसलिए भी पृथक है कि उसमें कहानी के लिए आवश्यक तकनीक है। वैसे अब भी यह इच्छा होती है कि मैं अपने यौवन के दिनों में वापस लौट जाउं। मेरा जीवन कई भागों में विभक्त है और मेरी समस्त रचनाएं कई कालखंडों में विभाजित की जा सकती हैं। हम सब एक ही जीवन में कई बार जन्म लेते हैं। एक काल-खंड से निकलकर जब हम अगले काल में प्रवेश करते हैं तो वह पुनर्जन्म के समान होता हैं। अतः हमारी रचनाएं भी निरंतर नव-जन्म लाभ करती हैं। मेरे साथ यह अंतर इतना तीव्र है कि मैं अपने पिछले साहित्यिक जन्मों को बहुत जल्द भूल जाता हूं। पिछले दिनों जब मैं अपने यौवन काल की कहानियों के प्रूफ पढ़ रहा था तो लगा कि इनमें आज भी कितनी ताजगी है ?

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काजल घोष एवं आशीष सिन्हा

सारिका -16 अक्टूबर, 1982 से साभार

 

प्रस्तुति-यशवन्त कोठारी

यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर 302002 फोन 2670596

हिन्दी साहित्य को समर्पित ब्लॉग के लिए यह आंकड़ा मायने रखता है. जहाँ हिन्दी की किताबें अधिकतम 250 – 500 की संख्या में छप रही हों, हिन्दी पाठकों की कमी का रोना चहुँ ओर हो रहा हो, वहां रचनाकार के नियमित पाठकों की संख्या प्रतिदिन 2000 से ऊपर पहुँच गई है.

रचनाकार को नियमित सब्सक्राइब (ईमेल तथा फ़ीड रीडरों के जरिए) कर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या 500 तक जा पहुँची है. नीचे स्क्रीनशॉट देखें:

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साथ ही, रचनाकार में सामग्री को खोज-बीन कर पढ़ने वालों की संख्या औसतन 1500 (वस्तुत: पेज लोड) पहुँच चुकी है. नीचे स्टेट काउंटर का स्क्रीनशॉट देखें. सप्ताहांत के दिनों को छोड़ दें तो बाकी के सप्ताह के दिनों में पेज लोड प्रतिदिन 1500 से ऊपर पहुँच चुकी है:

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इसी प्रकार, रचनाकार के अब तक के कुल पेज लोड्स की संख्या 7 लाख तक पहुँच रही है. नीचे स्क्रीनशॉट देखें:

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रचनाकार के पाठकों तथा रचनाकारों का हार्दिक धन्यवाद.

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समय के पदचिह्न


ये पदचिह्न समय के
आरंभ यही है अंत यही,और बीच का सफ़र यही
हर एक बीतती घटना का, कर्ता ये आधार यही
इनकी चलती गति को ही, हमने जीवन कह डाला


जीवन की जड़ को थामे
ये पदचिह्न समय के
कभी शौर्य ने कभी दंभ ने, इन्हें रोकना चाहा
कितनों ने बल से अपनी ही, ओर मोड़ना चाहा
लेकिन उनको मिटा दिया, खुद ये मुड़कर रुके नहीं


बस चला किये हर युग में
ये पदचिह्न समय के
छोटा सा अंकुर फूटा था जाने कब वटवृक्ष बना
नन्ही सी कोमल कालिका से, खिला हुआ अरविन्द बना


परिवर्तन के कर्णधार ये, सृष्टि कुम्भ के कुम्भकार ये
अस्थिरता के रखवाले
ये पदचिह्न समय के
इस जग के लीलामंड़प में,कुछ मिलता कुछ खोता है
भाग्य कभी इठलाता है तो कभी स्वयं पे रोता है
हर्ष शोक पाने खोने की इस अनंत सी क्रीडा में


निर्णायक बनने वाले
ये पदचिह्न समय के
जो घटित हुआ इतिहास बन गया, भूतकाल का दास बन गया
बीते कल के प्रासादों पर, खंडहरों का आज बन गया
सदियों सदियों की लम्बी इस अनंत सी यात्रा में
क्षण भर ना रुकने वाले
ये पदचिह्न समय के.

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महासती से उपालंभ

हे सीते, कैसा पंथ चुना?

कैसे मैं तुमको धन्य कहूँ कैसे मैं तेरा मान करूँ,

जो तेरी रामायण पढ़कर मन का हास उदास हुआ.

आदर्श बनी तुम हम सबकी घर घर में पूजी जाती हो,

किन कर्मों के कारण सीते, ऐसा तेरा भाग्य हुआ.

 

तुम जैसी कितनी सतियों से तो ये इतिहास भरा है,

फिर हे राघवललना सोचो तुम ही क्यों सिरमौर कहातीं,

तुम न मिलीं होतीं राघव को तब भी वो पुरुषोत्तम बनते,

लेकिन क्या तुम बिना राम के महासती सीता बन पातीं?

कुछ बाहों में बल भरतीं, शास्त्रों पर अधिकार जमातीं,

नैनों से भया नीर नहीं साहस कि ज्वालाएं जलातीं,

कुछ तो भय का बोध करातीं रावण को निज पौरुष से,

आज हो रहे परिवर्तन का उस युग से प्रारंभ करातीं.

 

तब तो तेरे रामायण को सीतायन बन जाना होता,

सबने तुझको राम से नहीं तुझसे ही पहचाना होता,

यदि तुमने कोमल सतीत्व का पंथ नहीं अपनाया होता,

तो अबला जैसा कोई भी शब्द नहीं बन पाया होता,

तुमने त्रासद ये जाल बुना

हे सीते कैसा पंथ चुना?

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30 साल पहले - स्कूल बैग.
आज - ऑफ़िस बैग.

30 साल पहले - नोटबुक
आज - नेटबुक

30 साल पहले - हीरो रेंजर
आज - हीरो होंडा

30 साल पहले - हाफ पैंट
आज – लो-कट फुल पैंट

30 साल पहले – मिट्टी की गाड़ी से खेलना
आज – मेटल की पेट्रोल चलित गाड़ी से खेलना

30 साल पहले - शिक्षक और परीक्षा से डर!
आज - बॉस और टार्गेट का डर

30 साल पहले - कक्षा में अव्वल होना चाहते थे
आज – एम्प्लाई ऑफ द मंथ होना चाहते हैं

30 साल पहले - त्रैमासिक परीक्षा
आज - तिमाही परिणाम

30 साल पहले - वार्षिक परीक्षा
आज - वार्षिक एप्राइजल

30 साल पहले - पॉकेट मनी
आज -  सेलरी

30 साल पहले – दीवाली के पटाखों के लिए इंतजार
आज - दीवाली बोनस के लिए इंतजार

30 साल पहले – दोस्त के हाथ के नवीनतम खिलौने के लिए तरसते थे
आज – विश्व के चुनिंदा बाजारों में लाँच हुए नवीनतम गॅजेट के लिए तरसते हैं

30 साल में क्या कुछ बदला है? – कुछ भी तो नहीं!

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दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर।


यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाड़ी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।


मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें


मैंने संघर्ष की ऐसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पड़ता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढ़ाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाड़ी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।


मेरी हिम्मत: मां और बाबा


मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढ़ाने की हर संभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढ़ाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढ़ाई पर पड़ा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढ़ाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढ़ाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पड़ेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।


मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेंद्र सर


यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढ़ने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विषय थे। विषय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेंद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड़ है। उनका पढ़ाने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।


मेरा जुनून : हार की सोच भी दिमाग में न आए


मैंने जिंदगी के हर मोड़ पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थितियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और खुद भी पढ़ता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।


मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान


मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऐसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सब कुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।


मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो


मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छा शक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, 'मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.. '


- प्रस्तुति: हेतप्रकाश व्यास

(राजस्थानपत्रिका.कॉम से साभार)

बच्चों  के लिए :      दो गीध


(१)

जटायु सम्पाती नामके
  दो भाई गीध थे रहते ।
सूरज के वो पास जा पहुँचे
    एक दिन उड़ते-उड़ते ।।
जटायु तो वापस लौट पड़ा
     जलने से बचते-बचते ।
सम्पाती न लौटा तो
     गिरा बहुत तड़फते ।।
           (२)
साथ दोनों का छूट गया
       करते तो क्या करते ।
साधू ने  सम्पाती को समझाया
        अब क्यों हो तुम रोते ।
पंख तुम्हारा जामेंगा
   बानर दल से मिलते ।
जब से छूटा साथ
  जटायु पंचवटी में रहते ।।
         (३)
राम-लखन-सीता
      जब पंचवटी में आये ।
जटायु राह में बैठे थे
   अपना पंख फुलाए ।।
रामजी ने प्रणाम किया
         नाम पता बतलाये ।
दशरथ जी का नाम सुना
तो जटायु अति हर्षाये ।।
                 (४)
धन्य हुआ मैं देख तुम्हे
   थे दशरथ मित्र हमारे ।
रामजी बोले मित्र पिता के
        पिता तुल्य हमारे ।।
जटायु ने फिर कहा
   बसो अब गोदावरी किनारे ।
देख-रेख मैं रक्खूँगा
         मैं हूँ साथ तुम्हारे ।।
   (५)
पंचवटी में रावण एकदिन
  साधू बनकर  आया  ।
कुटिया के वो पास में आके
      भीख की टेर लगाया ।।
भिक्षा देने  सिया  जब  आयीं
  अपना रूप दिखाया ।
राम-लखन थे वहाँ नहीं
         रथ पे झट बैठाया ।।
सीताजी रोयें चिल्लाएं
कोई पास न आया ।
जटायु ने जब सुना तो
बड़े वेग से धाया ।।
              (६)
रावण कोई बात न माने
    लेकिन बहु समझाया  ।
रावण से पुनि किया लड़ाई
    लेकिन जीत न पाया ।।
खड्ग से अपने पंख काटके
   रावण उन्हें गिराया ।
सीता को रावण लेजाके
   वन अशोक ठहराया ।।
  (७)
पीड़ा में ही सोचें  जटायु
कुछ भी न कर पाए ।
रावण तो ले गया सिया को
  उसको रोक न पाए  ।।
प्राण पयान करनेवाले
  बिन  सीता हाल बताये ।
राम-राम रटि गीध जटायु
सोच यही अकुलायें ।।
(८)
राम-लखन ने आके देखा
सूनी कुटिया पाए ।
सिया को खोजत दोनों भाई
    इसी ओर को आये ।।
सुनि निज नाम पुकारत कोई
    सिया की याद भुलाये ।
गीधराज ढिंग राम दयामय
  सोच विमोचन आये ।।
  (९)
घायल जटायु गोद राखि प्रभु
  नयनन नीर बहाए ।
गीध जटायु को लक्ष्मणजी
   पानी लाके पिलाये ।।
रामजी बोले रखो तात तन
  नाथ !  न अवसर आये ।
रावण लेकर गया सिया को
उसको रोक न पाए ।।
सिया सुधि कहकर
गीध जटायु  प्रभु के धाम सिधाए ।
क्रिया किए निज कर रघुनायक
जलजनयन जल लाये ।।
(१०)
गीध जटायु ने हम सबको
परहित करना सिखलाये ।
बिना स्वार्थ के लेकिन मानव
     कभी काम न आये ।।
गीध जटायु ने परहित में
    अपने प्राण गवांये  ।
याते ही वो सबसे उत्तम
सुर दुर्लभ गति पाए ।।
                (११)
सिया को खोजत आगे प्रभुजी
  पम्पा सर तट आये ।
अनुज सहित करके विश्राम
   निर्मल जल में नहाए  ।।
आगे चलकर ऋष्यमूक गिर
राम-लखन नियराये ।
सुग्रीवादि  सब रहते जिस  पर
  बानर बालि सताए ।।
(१२)
सुग्रीव ने भेजा हनूमानजी
    भेद जानने आये ।
भेद के बदले उन्हें ही लाके
      गाढ़ी प्रीति कराए ।।
सुग्रीव दशा सुनि राम प्रभू
     उनको कपिराज बनाये ।
सीता खोजन बानर-भालू
     बहु कपिराज पठाए ।।
    (१३)
सिया को खोजत बानर-भालू
   समुन्द्र किनारे आये ।
बहु दिन बीते खोजत-खोजत
   सीता सुधि नहि पाए ।।
सागर तट पर बैठ सभी
   सोच यही पछितायें  ।
पास वहीं गिर खोह सम्पाती
     थे निज बास बनाये ।।
                    (१४)
बानर-भालू की सुनि बातें
    खोह से बाहर आये ।
देख अनेकों बानर-भालू
अतिसय वो हर्षाये ।।
पंख नहीं  है   पास  हमारे
  याते न उड़ पायें ।
भूंखे ही दिन-रात बिताऊँ
    कबहुँ न पेट अघाए ।।
मेरे हित सब बानर-भालू
      आये  ईश पठाए  ।
एकहि बार मिले बहु बानर
     भूंख मिटे अब खाए ।।
                    (१५)
सम्पाती की  बातें  सुनकर
  बानर -भालू  भय खाए ।
लेकिन अंगद धरि धीरज
   जटायु हाल सुनाये ।।
नाम जटायु का सुनते ही
  बोले डर न आये ।
जबसे बिछुड़े दोनों भाई
खबर आज ही पाए ।।
    (१६)
जटायु-मरण सुना तो
सम्पाती नयन जल छाये ।
सोचा परहित में भाई ने
   अपने प्राण गवांये ।।
तात सरिस किए रामजी क्रिया
   यह सुनिके पुलकाए ।
करुना-दया, सुख, शील के सागर
   कहि  राम के गुन को पाए ।।
         (१७)
बानर मदद से गीध सम्पाती
       सागर जल तक आये ।
तिलांजलि दिया जटायु को
     अपना धर्म निभाए ।।
बानर-भालू को सम्पाती
   अपनी  कथा  सुनाये ।
बोले  देखो तुमसे मिलकर
   पंख हमारे आये ।।
                 (18)
बूढ़ा  हूँ  मैं बहुत
  इसीसे मदद नहीं हो पाए ।
फिर भी मैं हो सकता हूँ
   कुछ तो बचन सहाए । ।
सागर  पार  है  लंका नगरी
    राक्षस गण तंह छाये ।
रावण  राक्षस   बड़ा प्रतापी
   सीताजी को छुपाये । ।
                (१९)
गीध देखते बहुत दूर तक
      सबको नहीं दिखाए ।
वन अशोक में  बैंठी सीता
    देख के वो बतलाये । ।
राम कृपा से देखो मेरे
जले पंख उग आये ।
रामदूत होकर भी भाई
काहे मन कदराए । ।
    (२०)
लाँघे जो शत योजन सागर
    सीता सुधि वो पाए  ।
साहस करके उद्योग करो
   सबको वो समझाये । ।
ढाढ़स देकर गीध सम्पाती
  वहां से उड़कर   आये ।
जितना वो कर सकते थे
       देखो कर दिखलाये । ।
              (२१)
साधु-सुजन , सदग्रंथ सभी
  परहित को धर्म बताये ।
सबसे होता पाप बड़ा
    परपीड़ा  जीव  सताये । ।
अहं-स्वार्थ के चलते मानव
       करता  जो भी भाए ।
फिरते हैं बहु लोग यहाँ
परपीड़ा शौक बनाये । ।
मानव अब कुछ भी न माने
     दिन-दिन मति पथराये ।
जटायु-सम्पाती गीध भी  होकर
          सबको राह दिखाए । ।
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(डॉ. एस. के . पाण्डेय रचित ' श्रीराम कथावली: बाल रामायण' से अंशतः परिवर्तित संक्षिप्त अंश  ) 
                                               डॉ एस के पाण्डेय,
                                                समशापुर  (उ. प्र.) ।

Paash (Grip) - by Rekha Shrivastava - Acrylic on Canvas - 30x36 (Mobile)

ग़ज़ल

   (1) ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता

ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
न आदम से ख़फ़ा होता

वो जो भी चाहता, खाता
ये उसका फ़ैसला होता

वो करता प्यार हव्वा से
मेरा दिल ख़ुश हुआ होता

उमीदें बाँधता उनसे
दुआएँ दे रहा होता

खिलाता पोती पोते को
ख़ुशी से झूमता होता

ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
तो दुनिया से जुड़ा होता

बजाय आसमानों के
ज़मीं पर रह रहा होता

मुझे सब देखते होते
मैं सबको देखता होता

न गुत्थी बन उलझता मैं
न परदों में छिपा होता

मुझे अपना समझते सब
मैं सबसे खुल चुका होता

ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
तो इन्सां का हुआ होता

मैं उससे दूर ही रहता
जो फ़िरकों में बँटा होता

किसी मन्दिर न मस्जिद से
न मेरा वास्ता होता

भरोसा ख़ुद पे ही करता
वो इन्सां जो मेरा होता

इबादत वो नहीं करता
न सजदों में झुका होता

ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
व तू बन्दा हुआ होता

ख़ुद अपने आपको मैंने
तेरी जगह रखा होता

तड़प उठता मैं ख़ुद भी जब
तेरे दुख देखता होता

तेरी तरह कभी भी मैं
न पत्थर दिल हुआ होता

ख़ुशी के वास्ते अपनी
न तुझसे खेलता होता

ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
तो अब तक मर चुका होता

या इस दुनिया का अफ़साना
जो है उससे जुदा होता

सभी मेहनत किया करते
ज़रूरत भर लिया करते

न कोई भूख से मरता
न प्यासा ही मरा होता

न होती जंग दुनिया में
न ऐटम बम गिरा होता

ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
न तुझ जैसा हुआ होता

(2)आदिम समाज पर एक ग़ज़ल

मेरी मेहनत, तेरी मेहनत, बीच में कोई न था
थी ज़रूरत भर की आदत, बीच में कोई न था

तू कहाँ, कब, किस ख़ला से आन टपका, ओ ख़ुदा
वरना मैं था और क़ुदरत, बीच में कोई न था

जातियां, मज़हब नहीं थे, मैं था मैं और तू थी तू
और इक-दूजे की चाहत, बीच में कोई न था

पादरी, पंडित न मुल्ला थे, न जन्नत के दलाल
यानी ख़ुद दुनिया थी जन्नत, बीच में कोई न था

                                           प्रस्तुति
                                   रवीन्द्र कुमार चौधरी
                             फ़ोन- 9810412300
                           ई-मेल- choudhary_7 @yahoo.com

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मैं रावण हूँ मैं रावण हूँ

मैं इसमें हूँ मैं उसमें हूँ

मैं हर बुरे जिस्म में हूँ

मैं रावण हूँ मैं रावण हूँ

अब रावण नहीं राम मरेगा

हर अच्छा इंसान मरेगा

कलयुग का पैगाम रहेगा

भ्रष्टाचार और बेईमान रहेगा

लूट -खसोट का जोर रहेगा

अब हर राज्य में चोर रहेगा

अब रावण नहीं राम मरेगा

रावण विद्यमान रहेगा

मैं रावण हूँ मैं रावण हूँ

........सुकरात मृदुल

   gazal          

शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है |
हो काफिया ही जो नहीं,बेचारी ग़ज़ल होती है।

और भी मतले हों, हुश्ने तारी ग़ज़ल होती है ।
हर शेर मतला हो हुश्ने-हजारी ग़ज़ल होती है।

हो रदीफ़ काफिया नहीं नाकारी ग़ज़ल होती है ,
मतला बगैर हो ग़ज़ल वो मारी ग़ज़ल होती है।

मतला भी, मकता भी रदीफ़ काफिया भी हो,
सोच समझ के लिख के सुधारी ग़ज़ल होती है।

हो बहर में सुरताल लय में प्यारी ग़ज़ल होती है।
सब कुछ हो कायदेमें वो संवारी ग़ज़ल होती है।

हर शेर एक भाव हो वो जारी ग़ज़ल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो वो भारी ग़ज़ल होती है।

मस्ती में कहदें झूम के गुदाज़कारी ग़ज़ल होती है,
उनसे तो जो कुछ भी कहें दिलदारी ग़ज़ल होती है।

जो वार दूर तक करे वो करारी ग़ज़ल होती है ,
छलनी हो दिल आशिक का शिकारी ग़ज़ल होती है।

हो दर्दे दिल की बात मनोहारी ग़ज़ल होती है
मिलने का करें वायदा मुतदारी ग़ज़ल होती है।

तू गाता चल ऐ यार,    कोई कायदा न देख,
कुछ अपना ही अंदाज़ हो खुद्दारी ग़ज़ल होती है।

जो उसकी राह में कहो , इकरारी ग़ज़ल होती है,
अंदाज़े बयाँ हो श्याम का वो न्यारी ग़ज़ल होती है॥

- डॉ. श्याम गुप्त

banshidhar

भाषा भी क्या चीज है। आदमी को जानवर से इन्सान बना देती है। जब मनुष्य को बोलना नहीं आता था तो वह संकेतों से संवाद कर लेता था। उसके आंसू बता देते थे, वह दुखी है। ठहाके उसकी ख़ुशी बयाँ करते थे। लाल आँखें और फड़कते होठ उसका गुस्सा जाहिर करते थे। वह अन्दर जो कुछ भी सोचता, महसूस करता था, वही उसके चेहरे पर भी छा जाता था. पर जब से उसने भाषा सीखी, वह झूठ बोलने लगा. वह अपने पड़ोसी का दुःख देखकर भीतर से खुश होता है लेकिन बाहर रोने का नाटक करता है। पड़ोसी का जमता व्यापार उसे परेशान करता है लेकिन ऊपर से गदगद होने का ड्रामा करता है. जब से उसने भाषा सीखी, उसे झूठ बोलने आ गया. जब से सभ्य हुआ, वह असभ्य हो गया.

नेताजी भाषण देते हैं, हमे एक बार मौका दीजिए, गरीबी मिटा देंगे , हर हाथ को काम देंगे । दूध की नदियाँ बहा देंगे । समाज में अमन कायम कर देंगे । चोरों को दंड मिलेगा। हर अमीर गरीब के जीवन और संपति की सुरक्षा होगी। पर नेताजी जब कुर्सी पा जाते हैं तो सारे वादे भूल जाते हैं। गरीबी मिटती है पर जनता की नहीं, नेता के घर की. इसकी रफ्तार इतनी तेज होती है कि देखते-देखते नेताजी का हुलिया बदल जाता है. कई शहरों में उनकी आलीशान कोठिया खड़ी हो जाती हैं, घर के हर सदस्य के लिए महँगी कारें आ जाती हैं, देशी-विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा हो जाता है, करोड़ों-अरबों के ठेकों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में उनकी हिस्सेदारी हो जाती है. वह काम और दाम की भी व्यवस्था करते हैं, पर जनता की नहीं, अपने नातेदारों-रिश्तेदारों की.. किसी को ठेका तो किसी को ऊपरी आमदनी वाली नौकरी. दूध की नदियाँ बहती हैं लेकिन उनके रास्ते जनता- जनार्दन के दरवाजे से न होकर उनके खुद के द्वार से होकर गुजरते हैं।

उनकी कोशिश होती है कि उनके घर में अमन-चैन रहे पर सत्ता में बने रहने के लिए वह समाज को टुकड़ों में बाँटने से बाज नहीं आते. वे दंगे करवाते हैं. इसके लिए वे बदमाशों का इस्तेमाल करते हैं, उनकी हर तरह से रक्षा करते हैं, उन्हें जेल जाने से बचाते हैं, पनाह देते हैं. सजा से बचाते हैं. वे और उनके गुर्गे बेवा, अनाथ की संपत्ति हड़पते हैं. जनता के नाम पर आये धन को हड़पने के इंतजाम में दिन-रात लगे रहते हैं. उनके गुर्गों की फ़ौज दिन-रात अनैतिक और अवैध कामों को अंजाम देने में लगी रहती हैं। समाज का बड़ा हिस्सा अभावों और अत्त्याचार के अँधेरे में जीता है और नेताजी ऐश करते हैं। चुनावों के वक्त उन्होंने जनता से रामराज का वादा किया था लेकिन जनता के हाथ में आया दरिद्रता और भयराज. असली रामराज नेताजी के दरबार में आया. नेताजी ने जो कहा, किया उसका ठीक उल्टा. नेताजी की भाषा संसद में कुछ और होती है और सडक पर कुछ.

पूरी दुनिया में एक दस्तूर बहुत आम रहा है. शासन व्यवस्थाएं चलाने के लिए शासकों ने हमेशा दो चेहरे रखे हैं. एक राजा का, दूसरा उसके नाम पर काम करने वाली नौकरशाही का. राजा का रूप कोई भी हो सकता है. मसलन, राजतन्त्र में राजा , प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति. नौकरशाही का रूप भी व्यवस्थाओं की प्रकृति के हिसाब से अलग-अलग होता है. लेकिन उसके चरित्र में बुनियादी फर्क नहीं होता. लोकतंत्र में नौकरशाहों को जनसेवक कहा जाता है. जनता की भूमिका राजा की होती है. इंडियन सिविल सर्विस के नाम से जानी जाने वाली भारतीय नागरिक सेवा के चरित्र की पड़ताल की जाय तो उसका असली चरित्र समझ में आता है. झूठ का इतना बड़ा मायाजाल शायद ही कहीं देखने को मिले। इस तिलस्म में कोई एक देश ही नहीं पूरी दुनिया फँसी हुई है। बौद्धिकता के शीर्ष पर बैठा यह वर्ग झूठ का दस्तावेज तैयार करने में बहुत माहिर है।

दुनिया के इतिहास लेखन पर उसी के शासन की छाप होती है. गजट अर्थात वस्तुगत इतिहास का बुनियादी दस्तावेज नौकरशाही द्वारा ही तैयार किया जाता है। मिसाल के तौर पर लें। मौजूदा वक्त में जो भी गजट तैयार किया जा रहा है, उसमे देश की तस्वीर चमकते हुए भारत की है। भंडार गृहों में अनाज रखने की जगह नहीं है। सूचकांक आसमान छू रहा है। जीडीपी और जीएनपी दरें बहुत ऊँची हैं। देशभर में चमचमाती सडकों का जाल बिछा है। देश बहुत तरक्की कर चुका है. यहाँ अब कोई भूखा नहीं मरता। मोबाईल दुनिया के किसी भी कोने में पलक झपकते ही दिल की बातें करा देते हैं. देश का शासन लोकतान्त्रिक संविधान के आधार पर चलाया जा रहा है। देश परमाणु शक्ति बन चुका है। हर तरफ बहुत तरक्की है।

आने वाली पीढियां इन्हीं आंकड़ों पर भरोसा करेंगी और कहेंगी कि अतीत में देश में चारों तरफ अमन-चैन था. रामराज था. पर सच तो बड़ा भयावह है। बुंदेलखंड, कालाहांडी समेत देश के कई हिस्सों में भूख से लोग मर रहे हैं। सोमालिया और इथियोपिया का सच पूरी मानव सभ्यता के लिए कलंक है। वहां की अस्सी फीसदी आबादी पिछले तीस सालों में अकाल और दुर्भिक्ष की भेंट चढ़ चुकी है। महीनों भूख से तडपता आदमी जिन्दा नरकंकाल बन चुका दीखता है। जमीन पर पड़ी जिन्दा लाशों की अंतिम सांसें गिद्ध और चील गिना करते हैं। अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों के लोग जिस अनाज को फ़ेंक देते हैं या जिस पके हुए भोजन को जूठन कि तरह कुडाघरों में सडा देते हैं, उसे दुनियां के कई गरीब मुल्कों के लोग अपनी भूख मिटाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. मानव सभ्यता ने शायद ही कभी इतना बड़ा विरोधाभास देखा हो। अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों में जितना अनाज और भोजन सड़-गल जाता है और जानवरों को खिला दिया जाता है, उससे दुनिया के कई देशों की करोड़ों भूखी मानवता का पेट भरा जा सकता है।

नौकरशाही अपना पेट भरने में लगी रहती है। गरीब जनता के नाम आने वाले करोड़ो-अरबों का बजट बंदरबांट कर लिया जाता है। कचहरी से लेकर सस्ते गल्ले की दुकानों तक लूट का खेल बदस्तूर जारी है। भ्रष्टाचार का नंगा खेल पूरी बेशर्मी के साथ खेला जाता है। अफसरों, शासकों को घूस खिलाकर बाजारों में जहर बेचने का काम किया जा रहा है। अफसरों को रिश्वत देकर आदमखोर ताकतें समाज और प्रकृति दोनों का दोहन करने में लगी हैं। पुलिसवाला डंडे मारकर खोमचेवाले से वसूली करता है। पेशकार तारीख देने के नाम पर सुदूर गांव से आने वाले दरिद्रनारायणों की जेबें खाली कर लेता है। पंसारी आपूर्ति निरीक्षक और अधिकारी को पैसे देकर मिलावटखोरी का धंधा करता है। बोर्ड लगाता है ग्राहक हमारे भगवान हैं और उन्हीं भगवान को घी के बदले इसेंस डालकर डालडा, मसाले की जगह घोड़े की लीद और दवा की जगह जहर बेच देता है। परंतु सरकारी दस्तावेजों में सब कुछ बहुत अच्छा है। न गरीबी है और न कहीं अभाव। शब्दों की बाजीगरी ऐसी कि ऊपर से उतरे हुए फरिश्ते भी गच्चा खा जाएं। कागजों पर हर गांव रोशन हैं। वहां सड़कें हैं, नदियों पर पुल हैं। खेतों में लहलहाती फसलें हैं। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। आला अफसरों की ऊंची कुर्सियों के ऊपर अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की फोटो लगी होती है। न्यायालयों में गीता और कुरान पर हाथ रखवाकर कसमें खिलवाने वाले जज हैं। पर झूठ और भ्रष्टाचार की गति इन सबसे तेज है। ज्ञान पर झूठ और पाखंड भारी पड़ गया। यही इस सभ्यता की विडंबना है।

भाषा के साथ सबसे ज्यादा खिलवाड़ उन लोगों ने किया, जिन पर इसके पालन-पोषण, संरक्षण-संवर्द्धन का दारोमदार था। अर्थात लेखक, साहित्यकार और मीडिया। भाषा और व्याकरण को मानकों की सीमा में बांधने और उसे अनुशासित करने का काम समाज के इसी प्रबुद्ध वर्ग ने किया। शब्द गढ़े। शब्दों के अर्थ दिए। उसके भावार्थ दिए। व्याकरण के रूप में अनुशासन की डोर खींची। पर कितनी विचित्र बात कि इतिहास ही बदल गया। जो लिखा गया, उस पर सत्यापन की मुहर लगी, पर वैसा था नहीं। मनुष्य ने अपने चेहरों पर नकाब ओढ़ा। वह जो अंदर था, वैसा बाहर दिखना बंद हो गया। विष रस भरा कनक घट जैसे। झूठ पर सच का मुलम्मा चढ़ाकर समाज में चलाया गया। मनुष्य ने भाषा को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।झूठ के शब्द गढ़े। शब्दों को पैर दिया। पैर को गति दी। सत्य को बिना हाथ-पैर कर दिया। दौड़ में उसका ठहर जाना, पीछे हो जाना और गुम हो जाना स्वाभाविक था। सो हुआ। इतिहास लेखन का काम करीब-करीब बंद है। अब प्रिंट मीडिया को इतिहास का हिस्सा मान लिया गया है। कहा जाता है यह दस्तावेजी इतिहास है। पर यह माध्यम कहां से कहां पहुंच गया, दुनिया जानती है। लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाने वाला यह वर्ग अब समाज, मानव सभ्यता और मानव हित की बात नहीं करता। उसे बिकाऊ माल चाहिए। ऐसा माल जो सनसनी पैदा करे। जो बिकाऊ हो। इलेक्ट्रॉनिक चैनल टीआरपी की बात करते हैं। वह खबर जो एक समय सबसे ज्यादा देखी जाए। जाहिर है वही देखी जाएगी, जो आंखों को झकझोरेगी। भले ही वह मनुष्य की अंत:चेतना को विकृत करती हो। हिंसा, सेक्स इस दौड़ में अव्वल हैं।

ध्यान कीजिए, जब बहुराष्ट्रीय  फौजों के दर्जनों युद्धक विमान खाड़ी में बेशुमार बमबाजी कर रहे थे, तो सीएनएन उसका सजीव दूरसंप्रेषण (लाइव टेलीकास्ट) कर रहा था। धरती पर चारों तरफ आग लगी थी। तेल के कुए धूं-धूं कर जल रहे थे। लपटें आसमान छू रहीं थीं। बस्तियां जल रहीं थीं। जिंदा आदमी, हजारों महिलाएं और बच्चे पुतलों की मानिंद जलकर खाक हो रहे थे। और, दूर देशों के दर्शक डाइनिंग टेबल पर पराठों के साथ सॉस और चाय की चुस्कियां ले रहे थे। सोमालिया और इथोपिया में अकाल और दुर्भिक्ष से लाखों की मौत खबर नहीं बन सकी। इंसानियत की जिंदा मौत और तबाही पर जश्न मनाने का ऐसा दृश्य इतिहास में शायद ही कहीं और देखने को मिले। नंगे और अधनंगे फैशन समारोहों से कोई चैनल अछूता नहीं रहता। मचलती, बलखाती सुंदरियां हर चैनलों पर देखी जाती हैं। उन्हें वह चटनी की तरह परोसते हैं ताकि दर्शक आंखें सेंकते रहें। प्रिंट मीड़िया के जितने भी ग्रुप हैं, उनकी लिखित घोषणा में यह शामिल होता है कि हम समाज में सत्य को उद्घाटित   करने, उसकी रक्षा करने, बिना किसी लालच व भय के समाचार व विचार को प्रकाशित करने का संकल्प लेते हैं। पर सब झूठ। धन, पद, सत्ता में भागीदारी के लालच में सत्य को बार-बार बेचा जाता है। जिसके पास पैसा है, पूरा पन्ना क्या, पूरा अखबार ही खरीद लेता है। झूठ जीतता है, सच कोने में दुबक जाता है। भाषा में जो बड़े तमीजदार दिखते हैं, वे कर्म के स्तर पर असभ्य, अशिष्ट  और पाखंडी होते हैं।

लेखक परिचय

जुलाई १९५९ में प्रतापगढ़ के ग्रामीण अंचल में जन्म. शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी  में.  राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर. पेशे से पत्रकारिता. तीन  दशकों से निरंतर पठन-पाठन और लेखन. बीच में कुछ  समय तक बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी  के पत्रकारिता विभाग के डिरेक्टर के रूप में कार्य-भार संभाला. विभागाध्यक्ष  के रूप में अपने निर्देशन में बुद्ध, गाँधी, अरविन्द और  आंबेडकर के जीवन दर्शन पर कई पुस्तकों का प्रकाशन कराया. वापस फिर पत्रकारिता में. समसामयिक राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर लगातार  लेखन. सभ्यता का संकट नाम से एक पुस्तक प्रकाशित. सम्प्रति झाँसी से प्रकाशित डीएलए दैनिक समाचारपत्र में संपादक के रूप में कार्यरत.

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साहित्य-चिंतन

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वक्त की आवाज हैं शब्द

डा. सुभाष राय 

अगर आप किसी पत्रकार, लेखक या  साहित्यकार से पूछें कि वह  आखिर  लिखता  क्यों हैं? उसे लिखने का  रोग है या मजबूरी या किसी खास किस्म की जरूरत या कुछ और? इससे उसे क्या हासिल होता है? तो वह  क्या जवाब देगा ? कोई कहेगा वह लिखकर प्रसन्नता का अनुभव करता है क्योकि बहुत कुछ जो वह चाहते हुए भी कह नहीं पाता है, कागज पर उतार देता है. यह विरेचन उसे आनंदित करता है. इसे स्वान्तः सुखाय  लेखन भी कहा जा सकता है. कोई कहेगा कि  वह परिवर्तन के लिए लिखता है. शब्दों में बड़ी शक्ति होती है और उनका  सधा हुआ प्रयोग जर्जर और जीर्ण को ध्वस्त कर  नए निर्माण की सम्भावना पैदा कर सकता  है. और भी तर्क हो सकते हैं पर  सच यह है कि जो लोग युगीन विषमताओं के खिलाफ चुप नहीं रह सकते,  तटस्थ नहीं रह सकते और तलवार भी नहीं उठा सकते, वे लिखते हैं. जो अपने समय के भीतर खड़े होकर उससे आमने-सामने  जबान लड़ाने का हौसला रखते हैं, उनका हाथ युग की नब्ज पर होता है. और केवल वही सार्थक लिख पाते हैं.  अगर आप की रचना में अपने वक्त की आवाज है तो वह अपने-आप बोलेगी, बड़ी नजर आयेगी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप के पास अपने  समय को और उसकी जरूरत को समझने की दृष्टि है या नहीं।

परिवर्तन को लक्ष्य करके जो  भी लिखा जाय, वह साहित्य ही हो, कोई जरूरी नहीं. एक पत्रकार भी लिखता है. वह अपनी कलम तात्कालिक महत्त्व के  मसाइल पर उठाता है. सामाजिक, राजनीतिक जड़ता के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, लोगों की तटस्थता के खिलाफ, सामाजिक विषमताओं के खिलाफ, सरकारी उदासीनता के खिलाफ और जो कुछ भी सड़ता, बजबजाता दिखायी पड़ता है, उसके खिलाफ। ऐसा लेखन पत्रकारीय भी हो सकता है और साहित्यिक भी। ज्यादातर स्वतंत्र और चेतन पत्रकार परिवर्तन के लिए लिखते हैं। यह अलग बात है कि उनका लेखन नियोजित और संस्थागत पत्रकारिता से निकलती तमाम परस्परविरोधी और अलक्षित आवाजों के बीच बहुत असर नहीं दिखा पा रहा है। पूंजी से नियंत्रित मीडिया ने जिस व्यावसायिक लेखन को प्रश्रय और विस्तार दिया है, उसकी तो चर्चा भी बेमानी है। वह तो सिर्फ धन कमाने का जरिया है। पत्रकारों को इसलिए लिखना होता है क्योंकि उन्हें इसके लिए वेतन मिलता है। एक साहित्यकार खबरों में अपने युग को ढूढ़ता है और यही बोध उसे साधारण पत्रकारीय फलक से ऊपर ले जाता है।  उच्च कोटि की रचना लिखी या कही नहीं जाती। वह सिर्फ होती है, भीतर चेतन के सबसे ऊर्जस्वित क्षेत्र में एक विस्फोट की तरह पैदा होती है और विद्युत की तरंगों की तरह विस्तार ग्रहण करती है। जिसके भीतर से रचना जन्म लेती है, उसे पता ही नहीं चलता। भाव की आत्यंतिक उत्कटता और विचार का सघन प्रवाह उसे आगे बढ़ाता है और एक छोर से दूसरे छोर तक नदी की धार की तरह बहा ले जाता है।
जैसे बादल का बरसना कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं होती। गर्मी सागर की सतह से वाष्प पैदा करती है। यह वाष्प ऊपर उठती है। सागर की इतनी विशाल सतह से उठती वाष्प उमड़ती-घुमड़ती हुई हवा के साथ बहती चली जाती है। दूर खड़ा एक पहाड़ उसे रोक देता है, ऊपर की ठंड उसे पानी में बदल देती है। हम बारिश देखते हैं तो सागर तक कहां पहुंचते? इसी तरह मनुष्य के भीतर विशाल आकाश में बाहर के समाज, देश और परिस्थिति की विडंबनाओं से पैदा हुए विचार और भाव के बादल सघन से सघनतर होते जाते हैं। समय का कोई क्षण उसमें विस्फोट पैदा कर देता है, उसे पिघला देता है और अतिचेतन से रचना बरसने लगती है। रचनाकार के सामर्थ्य से उसके भीतर स्थित कला स्वयं ही उसे धारण लेती है। बरसते मेघ का पानी जैसे घट में ठहर जाता है, वैसे ही रचना रचनाकार की मेधा में बुनी हुई संश्लिष्ट कला में उतरकर ठहर जाती है। यह साधारण आदमी के वश की बात नहीं। जो रचता है, उसे भी नहीं मालूम होता कि रचना आखिर कैसे हुई। इसलिए कहना पड़ेगा कि लिखना तो नियोजित कारोबार है लेकिन रचना स्वत:स्फूर्त कलात्मक स्फोट। वह रचनाकार की संवेदना, उसकी दृष्टि और उसके हेतु में स्वयं ही लिपटकर बाहर आती है। श्रेष्ठ रचना स्वयं ही स्वयं को रचती है, तभी तो वह केवल होती है।

रचनात्मक लेखन की विधाओं में कविता को श्रेष्ठतम दर्जा हासिल है. कविता क्या है? अक्सर यह सवाल किया जाता है। कोई नहीं जानता कि पहली कविता ने कब जन्म लिया, किसने सबसे पहले शब्द को कविता का रूप दिया लेकिन इतना कोई भी कह सकता है कि कविता ने दुख से ही जन्म लिया होगा। उमड़ कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। दुनिया भर के विद्वानों, कवियों, आलोचकों ने कविता को परिभाषाओं में बांधने का काम किया। भारतीय मेधा ने स्वीकार किया कि रस ही काव्य है। जिसे पढ़ने या सुनने से आदमी के भीतर बहुत गहरे रस की अनुभूति हो। उसे महसूस हो कि जो बात कही गयी लगती है, वह उतनी ही नहीं है। वह जितना डूबे, उतना ही आनंद से सराबोर होता चला जाय। यह आनंद अभिव्यक्ति की सचाई से पैदा होता है। सुनने वाला या पढ़ने वाला वैसी ही अनुभूति अपने भीतर ढूंढ लेता है और यह अनुभूति की साम्यता ही उसे आह्लादित करती है। गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति से एकाकार होते ही आंखों में आंसू आ जाते हैं। इस तरह कविता व्यक्ति को अपने कथ्य के केंद्र की ओर खींच ले जाती है। वह कवि की तरह ही सोचने लगता है, अनुभव करने लगता है। अगर कोई कविता ऐसा नहीं कर पाती तो उसके कविता होने पर संदेह स्वाभाविक है।

पश्चिमी विद्वानों ने भी कविता को समझने-समझाने की कोशिश की। वर्ड्सवर्थ ने कहा कि कविता गहरे भावों का आकुलता भरा उफनता प्रवाह है। एमिली डिकिंसन ने कहा कि जब मैं कोई पुस्तक पढ़ती  हूं और वह मुझे इतना शीतल कर देती है कि कोई भी आग गरम न कर पाये, मैं समझ जाती  हूं कि वह कविता के अलावा और कुछ नहीं हो सकती है। तमाम परिभाषाओं के बावजूद समय के साथ कविता अपने रूप बदलती रहती है और इसीलिए वह किसी भी परिभाषा में बंधने से इंकार करती रही है। फिर भी उसे समझने के लिए हमेशा ही नयी-नयी परिभाषाएँ गढ़ने की कोशिशें होती रहती हैं। पूरी दुनिया में कविता के आंदोलन चलते रहे हैं। अलग-अलग दौर में कविता को अलग-अलग तरीके से समझने का प्रयास किया गया। पारंपरिक अनुशासन को आवश्यक मानने वाले लोगों का कहना है कि कविता में गेय तत्व होना ही चाहिए अन्यथा गद्य और काव्य में अंतर क्या रह जायेगा। परंतु इस नाते क्या जो भी गेय हो, उसे कविता कह देना समीचीन होगा? कविता की और भी जरूरतें होती हैं और उनके होने पर ही वह कविता होगी।
कवि अपनी बात सीधे नहीं कहता। वह उसे कलात्मक संक्षिप्ति के साथ व्यक्त करता है। इस कला में शब्द की व्यंजना, बिम्ब, प्रतीक, ध्वन्यार्थ आदि आते हैं। यही कविता को सीधे गद्य से अलग करते हैं। गेयता भी काव्य कला का एक तत्व है, लेकिन एकमात्र या अंतिम तत्व नहीं। और यह भी जरूरी नहीं कि किसी कविता को कविता तभी माना जायेगा, जब उसमें सारे तत्व समाहित हों। इसी अर्थ में गेयता न भी हो और बाकी तत्व हों तो भी कविता बन सकती है। कविता की सबसे बड़ी ताकत उसमें पढ़ने या सुनने वाले की उपस्थिति है, आम आदमी की उपस्थिति है। यह काव्य का प्रमुख और अनिवार्य तत्व है। अगर कोई कविता सारे अनुशासन से लैस है, अलंकार, छन्द, प्रतीक, बिम्ब और उत्तम भाषा-शैली से भी संपन्न है लेकिन उसका कथ्य लोगों की संवेदना को झकझोरता नहीं, उनमें गुस्सा, भय, क्रोध या प्यार नहीं पैदा नहीं करता तो उसे कविता कहने की कोई मजबूरी नहीं है। इसीलिए कविता करना बहुत कठिन और विरल बात है। कविता प्रयास और कल्पना से नहीं बनती। कवि जन्म लेता है, पैदा होता है। कोई भी कवि बन जाय, सहज संभाव्य नहीं है। शब्द जिसके हाथों में खेल सकते हों, अर्थ जिसके भाव के  अनुगामी हो, ऐसे लोगों को प्रकृति अलग से ही रचती है। समय उन्हीं के चरण चूमता है, जो समय के आगे चल सकते हैं, सच्चे सपनों को पहचान सकते हैं और यह काम केवल कवि ही कर सकता है।

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लेखक परिचय

जन्म जनवरी १९५७ में मऊ नाथ भंजन के बड़ा गाँव में. प्रारंभ से ही लेखन में रूचि. छात्र जीवन से ही कविताओं, कहानियों तथा लेखों का प्रकाशन. शिक्षा-दीक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में. भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर. संत कवि दादू दयाल के रचना संसार पर शोध के लिए आगरा विश्व विद्यालय से पीएच- डी की उपाधि. पेशे से पत्रकार. लोकगंगा, वर्तमान साहित्य, वसुधा, अभिनव कदम, शोध-दिशा, मधुमती, अभिनव प्रसंगवश, समन्वय जैसी  श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में  रचनाओं क प्रकाशन. ई -पत्रिका अनुभूति  में कवितायेँ, सृजनगाथा में कविताएँ और लेख. भोजपुरी वेब पत्रिका अंजोरिया में भोजपुरी  रचनाएँ. कृत्या के अगले अंक में कवितायेँ प्रकाशनाधीन.  

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