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यशवन्त कोठारी का आलेख : आदिवासी असंतोष : कारण-निवारण

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आदिवासी-चार अक्षरों का एक छोटा सा नाम, लेकिन सामाजिक व्यवहार के रूप में अनेक समुदाय, जातियां और किस्मों में बंटा संसार और इस संसार की अपनी समस्याएं, अपना राजवेश, अपने रीति-रिवाज। सामान्यतः शांत और सरल, लेकिन विद्रोह का नगाड़ा बजते ही पूरा समूह सम्पूर्ण प्रगतिशील शहरियों के लिए एक ऐसी चुनौती, जिसे सह पाना लगभग असंभव। एक चिंगारी जो कभी भी आग बनकर सबको लपेटने की क्षमता रखती है।आदिवासियों के उपयुक्त संबंधों, रंगबिरंगी पोशाकों, संगीत, नृत्य और संस्कृति के बारे में हमारी अपनी कल्पनाएं हैं। हम उन्हें पिछड़ा, असभ्य, गंदा, गैर-आधुनिक और न जाने क्या-क्या कहते हैं।अंग्रेजी राज ने भारतीय आदिवासियों को दूसरे दर्जें का नागरिक समझा। जिसके अंतर्गत उनके जीवन, संस्कृति और सामाजिक संसार को बाकी दुनिया से अलग-थलग रख कर उसे अध्ययन और कौतूहल का विषय बना दिया हैं। लेकिन भारतीय समाज में अंग्रेजों को पहली चुनौती सन् 1824-30 भीलों ने दी और बाद में 1846-46 में संथालों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।आजादी के बाद हमारे इस नजरिए में परिवर्तन आए। पं. नेहरू ने आदिवासियों से पूर्णतया अलगाव के बजाय उनसे सम्पर्क रखने का …

विजय वर्मा की कविता : तत्वमसि

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तत्वमसि
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि! दूर गगन में फटती पौ-सी
दीपक की एक मद्धिम लौ-सी
किसी योगी के अपने ही रौ-सी
हौले से मन में आन  बसी. तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि!
सरिता की मंथर हलचल-सी
मृग-शावक की चाल  चपल सी
चन्द्र-प्रभा की मंद टहल-सी
भू-चित्र-पटल,प्रकृति मसि.
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि! दग्ध-ह्रदय ज़ग को हर्षाने
अमृत की एक धरा बरसाने
पल-पल नूतन रूप दिखाने
ऊर-अन्दर तू आन धंसी
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि ! चन्द्र-सूरज की- सी दो नैनें
उतरी  अम्बर से शनैः-शनैः
अपलक-अविचल देखी मैंने
किसी देव-लोक की आभा-सी
तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि!  ----तत्वमसि=तुम वही हो -----
वी के वर्मा डी एम् डी ३१\बी बोकारो थर्मल
vijayvermavijay560@gmail.com

दामोदर लाल जांगिड़ की हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल

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रुतबा भी सरकारी अजीमों शान सरकारी ।मेरा कुछ भी नहीं छोड़कर पहचान सरकारी॥
बहुत बौना हूँ मैं अब भी यदि तुलना करुं तुमसे,बढ़ा पाया नहीं है कद मेरा सम्‍मान सरकारी।
मेरी हर जीत होती हैं हमेशा हार से बदतर, पैदी मात खाऊं जो न हो मैदान सरकारी।
किसी का भी कोई अभिशाप मुझको छू नहीं पाये,कि कुर्सी हैं हिफाजत के लिए वरदान सरकारी।
नहीं हूँ वो जो दिखता कोई विस्‍मय नहीं करना,मिले तब हाथ फैलाये मेरा अभिमान सरकारी। ----.

चंद चुनिंदा शेरो – शायरी

अब भी कुछ नहीं बिगड़ा प्यारे पता करो लोहारों काधार गिराना काम नहीं है लोहे पर सोनारों का- नीरज कुमार------.अपने मंसूबों को नाकाम नहीं करना हैमुझको इस उम्र में आराम नहीं करना है- शाहिद लतीफ़------.अपनी चाहत का यूँ पता देनासामना हो तो मुस्करा देना- रफ़ीक जाफ़र------.अब तो मजहब कोई ऐसा चलाया जाएजिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए- नीरज------.इस जहाँ में प्यार महके जिंदगी बाकी रहेये दुआ मांगो दिलों में रोशनी बाकी रहे- देवमणि पांडेय------.अपना ग़म लेके कही और न जाया जाएघर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए- निदा फ़ाज़ली------.अबके सावन में शरारत ये मेरे साथ हुईमेरा घर छोड़कर कुल शहर में बरसात हुई- नीरज------.अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूंअब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूं- ख़लील धनतेजवी------.आँसू की क्या क़िस्मत है, बहने में बाधाएँ कितनीबाहर चहल पहल हलचल है, भीतर बंद गुफाएं कितनी- शैल चतुर्वेदी------.अभी साज़े दिल में तराने बहुत हैं, अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैंनए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से, जो पुरसोज़ नग़मे पुराने बहुत हैं- नौशाद------.इस जहाँ से कब कोई बचकर गयाजो भी आया खा के क…

श्याम गुप्त की पुस्तक समीक्षा : अमेरिकी प्रवासी भारतीय:हिदी प्रतिभाएं

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पुस्तक- समीक्षा
पुस्तक- -अमेरिकी प्रवासी भारतीय : हिन्दी प्रतिभाएं ( प्रथम व द्वितीय भाग ),  लेखिका -डा ऊषा गुप्ता , प्रकाशक -न्यू रायल बुक कंपनी , लालबाग , लखनऊ.;  समीक्षक --डा श्याम गुप्त.
           " जननी जन्म भूमि स्वर्गादपि गरीयसी ", यही सच है ; और यह सच पूरी तरह उभर कर आया है डा ऊषा गुप्ता,भू. पू. प्रोफ. हिन्दी विभाग लखनऊ वि. विद्यालय द्वारा दो भागों में रचित समीक्ष्य पुस्तक 'अमेरिकी प्रवासी भारतीय:हिदी प्रतिभाएं ' में। पुस्तक में लेखिका ने अपने देश से दूर बसे विभिन्न धर्म,व्यवसाय व क्षेत्र के व्यक्तियों के भावोद्गारों को उनकी कृतियों , काव्य रचनाओं , कहानियों द्वारा बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। जहां विभिन्न रचनाओं में देश की माटी की सुगंधित यादें है ,  बिछुड़ने का दर्द है , वहीं संमृद्धि   में मानवता के डूबने का कष्ट एवं अपने देश भारत की दुर्दशा की पीड़ा भी है। देखिये---   ----                  
                                                        "वह बात आई ,
न बल्ख़ में न बुखारे में  ,
जो छज्जू के चौबारे में।" ---परिचय -प्र.१७…

संस्कृता मिश्रा की कविता : घूंघट के पीछे

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चार हाथ घूँघट के, पीछे, कैसा है तेरा संसारजो तुमने इसमें छुपकर, लाखों जीवन दिए गुज़ार..वो नभ का सुथरा नीलापन, मैला सा लगता होगावो धवल चन्द्रमा भी शायद, धुंधला सा दिखता होगाजब भीना सा घूंघट कोई, मर्यादा का नाम लिए मौन तुम्हारी आँखों पर, बरबस ही चढ़ता होगा.क्या इन नैंनो की पुतली भी, कर पायेगी गगन विहार.चार हाथ घूँघट के पीछे है कैसा तेरा संसार.जब बादल छाये काले से, और चली ठंडी पवन,नभ में तड़ित यष्टिका चमकी, उल्लास हो उठा मन में.तब तुम गरमी की मारी, छोटे से कमरे में,कैद रही बस अपने इस किस्मत के अवगुंठन में,क्या तुम भी महसूस करोगी, सावन की पहली बौछार,चार हाथ घूँघट के पीछे, है कैसा तेरा संसार..हे मुनियों, हे शास्त्रसर्जकों, किस पर समय गंवाया,अवगुंठन के अभिनन्दन में, अपना ज्ञान लड़ाया.सदा तुम्हारी हितैषिणी इस, कोमल सी रचना पर,जीवित रहते ही बोलो, क्यों, ऐसा कफ़न चढाया.तो तुमने इस तरह निभाया, नारी की रक्षा का भार,चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.सोचो तुम किस भांति करोगे इतने त्यागों का प्रतिकार,चार हाथ घूँघट के पीछे, देखो तो कैसा संसार.एक चहकने को आतुर, चिड़िया के पंखों की हार,रण में चलने …

विजय कुमार वर्मा की हास्य व्यंग्य कविताएँ : ३ x साढ़े तीन

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हास्य कविता [१]दो करोड़ घूस  लेते धराये एम सी आई अध्यक्ष,पैसा लेकर मान्यता  प्रदान करने का था लक्ष्यगुणवत्ता  अब गौण हो गयी,मजबूत है मुद्रा-पक्ष युधिष्ठिर! अब क्या पूछेगा यक्ष ?   [२]मनरेगा मजदूर हैं बैठे तालाब खोदे जे.सी.बी.मशीन.ऐसे ही सरकारी योजना को वे मिल करे छिन्न -भिन्ननेता-अफसर  सांप के आगे ठीकेदार बजाये बीन.तक धिना धिन धिन ! [३]   मनचाही ट्रान्सफर-पोस्टिंग की मची हुई है धूमट्रान्सफर-पोस्टिंग इंडस्ट्री में आ गयी फिर से बूमऐसे सोर्सें! इतनी मुद्रा कि  बस सर जायेगा घूम झूम बराबर  झूम !----.विजय कुमार वर्मा ,बोकारो थर्मल डी एम् डी-३१\बीv k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

मुकुल ‘सरल’ की ग़ज़लें - मैं हूं कि मैं कि तू है, तू है कि तू ही तू - छूकर तुझे तस्दीक मैं करता हूं कि मैं हूं

***ग़ज़लें***(1)
करें क्या शिकायत अँधेरा नहीं है
अजब रौशन है कि दिखता नहीं है ये क्यों तुमने अपनी मशालें बुझा दीं
ये धोखा है कोई, सवेरा नहीं है ये कैसी है बस्ती, ना दर, ना दरीचा
हवा के बिना दम घुटता नहीं है! नई है रवायत या डर हादसों का
यहाँ कोई भी शख्स हंसता नहीं है ये किसका है खंजर, ये खंजर से पूछो
ये तेरा नहीं है, ये मेरा नहीं है
****
(2)
जलता हूं, सुलगता हूं, पिघलता हूं कि मैं हूं
जीता हूं कि तू है कहीं, मरता हूं कि मैं हूं मैं हूं कि मैं कि तू है, तू है कि तू ही तू
छूकर तुझे तस्दीक मैं करता हूं कि मैं हूं होना मेरा क्या होना है, राजा न सिपाही
हर रोज रजिस्टर में ये भरता हूं कि मैं हूं ये इश्क, जुनूं क्या है, क्या खौफ, क्या गिला
ये आग है अपनी ही, जलता हूं कि मैं हूं
*****.
(3)
रिश्ते सीढ़ी हुए पतवार हुए
जबसे हम लोग समझदार हुए सेज के फूल थे जो कल शब में
वो सहर में नजर के खार हुए किसी भँवर में उतर गए हम तुम
लग रहा था कि अबके पार हुए हम तो निकले थे बदलने दुनिया
अपने ही घर में शर्मसार हुए इतने उलझे मेरे सभी रिश्ते
बैठा सुलझाने तार-तार हुए
----.…

अशोक गौतम का व्यंग्य : श्री संतन की सेवा

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वैसे पूछें तो सभी के पास होती हैं। क्‍या जानवर, क्‍या आदमी। क्‍या उच्‍च वर्ग, क्‍या मध्‍यम वर्ग। पर जो जानवरों से अपने को जरा सभ्‍य मानते हैं वे उसे सावधानी पूर्वक छुपाकर रखते हैं। चालाक कहीं के!! ये एक चालाकी ही तो है जो उन्‍हें और जानवर को एक दूसरे से अलग करती है। यदि वे चालाक न होते तो सच मानिए उनमें और जानवर में आज भी कोई अंतर न होता। कई दिनों से देख रहा था कि वे छुपी पूँछ हिलाए बड़े मजे से जी तो रहे थे पर कल वे अचानक साक्षात्‌ अपनी पूँछ हवा में सरेआम सादर हिलाते हुए आए तो मैं दंग रह गया! अति सभ्‍य लोगों को ये सब शोभा देता है क्‍या! उन्‍हें अति सादर बैठने के लिए कुर्सी तो पूँछ के लिए स्‍टूल दे मैंने दोनों हाथ सानुनय जोड़ कहा,‘ धन्‍य हो प्रभु! जो आज आपने अपनी पूँछ के प्रत्‍यक्ष दर्शन करवाए। मैं आज आपकी पूँछ के दर्शन कर गद्‌गद्‌ हो गया। इतनी गद्‌गद्‌ तो राम के दर्शन पा शबरी भी न हुई होगी।' वे बिन कुछ कहे केवल मुस्‍कुराते हुए स्‍टूल पर खुद बैठे और पूँछ कुर्सी पर दे धरी तो समझते देर न लगी कि आज के दौर में आदमी से ज्‍यादा महत्‍ता बंदे की पूँछ की है। कुछ देर तक मौन मुस्‍कुराते रहने …

यशवंत कोठारी का आलेख : बच्चों की छुट्टियों का सदुपयोग करें

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शीध्र ही बच्चों की गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं। इन लम्बी छुट्टियों में मध्यम वर्गीय परिवार के लोग न तो लम्बे समय के लिए पर्यटन पर जा सकते हैं, और न ही रिश्तेदारों के यहां लम्बी छुट्टियां व्यतीत कर सकते हैं। ऐसे में बच्चे इधर उधर फिरते रहते हैं, आलस्य से घर पर पड़े रहते हैं, और सामान्य कार्यों से भी उनका जी उचट जाता है। कुछ बच्चे सिनेमा, टीवी, वीडियो, ताश, तथा अन्य खेलों में स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं। तो कुछ आस पड़ोस के बच्चों के साथ मिलकर केवल गप्पे मारते रहते हैं। ये सब चीजें बच्चों को अकर्मण्य बनाती है। अतः माता पिता कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि इन छुट्टियों का बच्चों के लिए सदुपयोग हो सके।बच्चों के सामाजिक विकास के लिए बच्चों का एक क्लब बनाएं जहां वे अपने अभिभावकों के निर्देशन में उत्सव, वाद विवाद, खेलकूद, शारीरिक श्रमदान, समारोह आदि करें।बच्चे एक बाल पुस्तकालय बनाये और रोचक, ज्ञानवर्धक पुस्तकों को पढ़ें। बच्चे वीडियो पर जानवरों, पेड़-पौधों, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों का अवलोकन कर सकते हैं।बच्चे साहित्य, यथा कवि गोष्ठी, कहानी प्रतियोगिता, चित्रकला प्र…

यशवंत कोठारी का आलेख : कैसा हो बच्चों का साहित्य

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पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी व भारतीय भाषाओं में प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन हुआ है। अंग्रेजी के साहित्य से तुलना करने पर हिन्दी व भारतीय भाषाओं का साहित्य अभी भी काफी पीछे है। मगर संख्यात्यमक दृष्टि से काफी साहित्य छपकर आया है। सरकारी थोक खरीद, कमीशन बाजी तथा नये प्रकाशकों के कारण साहित्य में संख्यात्मक सुधार हुआ है, मगर गुणात्मक हास भी हुआ है। पाठ्यक्रम की पुस्तकों पर तो विचार-विमर्श तथा जांच परख होती हैं मगर अन्य जो खरीदी योग्य साहित्य छप कर आ रहा है उसकी स्थिति ज्यादा सुखद नहीं है। इन पुस्तकों का सम्पादन, प्रकाशन कैसा है ? लेखक बाल मनोविज्ञान से कितना परिचित है या नहीं ? एक ही लेखक विज्ञान से लगाकर कविता, कहानी, बैंकिग या मुर्गी पालन पर लिख रहा हैं तो स्पष्ट हो जाता है, कि व्यावसायिकता बुरी तरह हावी हैं और गुणवत्ता नष्ट हो रही है। राष्ट्रीय बाल पुस्तक न्यास, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद तथा अन्य सरकारी संस्थाओं की स्थिति भी ज्यादा ठीक नहीं है। पुस्तकों की छपाई, कागज, कवर, जिल्द, प्रोडक्शन, गेट-अप और अन्दर की सामग्री की कठोर जांच परख बहुत जरूरी है। क्योंकि बच्चों और…

आर के भारद्वाज की कहानी : केयर टेकर

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प्रातः कालीन भ्रमण मेरा शौक है, सुबह की हवाखोरी से मुझे दिन भर ताजगी, स्‍फूर्ति मिल जाती है, सुबह के दौरान मैं कई अपने जैसे लोगों को भी देखता हूं। कोई दौड़ लगा रहा होता, तो कुछ अपने झुण्‍ड के साथ राजनैतिक चर्चा करते हैं, प्रायः महिलायें तो विगत दिन उन्‍होंने क्‍या किया इसकी चर्चा करती मिल जाती हैं। बाबा रामदेव ने जो अपना आंदोलन योग के लिये चलाया है उससे कितनी सामाजिक जाग्रति आई है यह बखूबी सुबह सैर के दौरान देखने को मिल जाता है, अनुलोम विलोम, कपाल भाति, प्रणव जाप करते लोग मिल जायेगें, हैरत तो तब होती है जब बुजुर्ग व्‍यक्‍ति भी योग करते देखने को मिल जाते हैं इस योग से उन्‍हें कितना फायदा होता होगा यह तो वही बता सकते हैं जो इसे करते हैं, बहरहाल लोग अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूक हुए हैं यह आशा जगाने वाली बात है।जब से तीन नये प्रदेशों का गठन हुआ है तब से बहुत से लोग इधर से उधर हुए हैं कोई अपने मूल प्रदेश में गया तो किसी ने उसी में रहने का अपना विकल्‍प दिया । मैं भी इस शहर में नया नया आया हूँ हालांकि प्रदेश गठन से मेरे तबादले को कोई अर्थ नहीं हैं मै केन्‍द्रीय सरकार का कर्मचारी हूँ, और…

रवींद्र नाथ टैगोर 150 वीं जयंती वर्ष पर यशवंत कोठारी की विशेष प्रस्तुति

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मैं अपने परिवेश के प्रति बहुत ही सतर्क रहता हूं !-रवीन्द्रनाथ टेगौर- -तथा श्रीमती सत्यवती देवी ने रवींद्रनाथ ठाकुर से उनकी रचना प्रक्रिया पर बातचीत की थी, जो ‘फारवर्ड’ पत्रिका में 23 फरवरी, 1936 के अंक में छपी थी, प्रस्तुत है वह सदाबहार बातचीत।सुदर्शन: क्या आप अपनी रचनाओं की पृप्ठभूमि पर कुछ बोलना चाहेंगे ? कहानियाँ आप के मन में कैसे पनपती हैं ? कवि: बहुत कम उम्र से ही मैंने कहानियाँ लिखनी शुरु की। जमींदार होने के नाते, मुझे गांव जाना पड़ता था। इस तरह मैं गांव के सहज-सरल लोगों के संपर्क में आया, ग्राम्य बंगाल का सौंदर्य और परिवेश दोनों भाते थे, बंगाल नदियों का देश है, इन नदियों का सौंदर्य और विस्तार आश्चर्यचकित कर देने वाला है, वहां का जीवन मैंने बहुत करीब से देखा है और इसने मुझे प्रेरित किया है, मेरा जन्म और लालन-पालन कलकत्ते में हुआ था। अतः ग्राम्य जीवन से मैं अपरिचित था, इसी वजह से गांव मेरे लिए रहस्यावृत्त-सा था, ज्यों-ज्यों मैं सहज-सरल ग्रामीणों के संपर्क में आता गया, त्यों-त्यों मैं उन्हीं में से एक हो गया, मैंने अनुभव किया कि इनका परिवेश, इनकी दुनिया, कलकत्ता की दुनिया से एकदम प…

रचनाकार के नित्य के नियमित पाठकों की संख्या प्रतिदिन 2000 से ऊपर पहुँची

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हिन्दी साहित्य को समर्पित ब्लॉग के लिए यह आंकड़ा मायने रखता है. जहाँ हिन्दी की किताबें अधिकतम 250 – 500 की संख्या में छप रही हों, हिन्दी पाठकों की कमी का रोना चहुँ ओर हो रहा हो, वहां रचनाकार के नियमित पाठकों की संख्या प्रतिदिन 2000 से ऊपर पहुँच गई है.रचनाकार को नियमित सब्सक्राइब (ईमेल तथा फ़ीड रीडरों के जरिए) कर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या 500 तक जा पहुँची है. नीचे स्क्रीनशॉट देखें:साथ ही, रचनाकार में सामग्री को खोज-बीन कर पढ़ने वालों की संख्या औसतन 1500 (वस्तुत: पेज लोड) पहुँच चुकी है. नीचे स्टेट काउंटर का स्क्रीनशॉट देखें. सप्ताहांत के दिनों को छोड़ दें तो बाकी के सप्ताह के दिनों में पेज लोड प्रतिदिन 1500 से ऊपर पहुँच चुकी है:इसी प्रकार, रचनाकार के अब तक के कुल पेज लोड्स की संख्या 7 लाख तक पहुँच रही है. नीचे स्क्रीनशॉट देखें:रचनाकार के पाठकों तथा रचनाकारों का हार्दिक धन्यवाद.

संस्कृता मिश्रा की कविताएँ

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समय के पदचिह्न
ये पदचिह्न समय के
आरंभ यही है अंत यही,और बीच का सफ़र यही
हर एक बीतती घटना का, कर्ता ये आधार यही
इनकी चलती गति को ही, हमने जीवन कह डाला
जीवन की जड़ को थामे
ये पदचिह्न समय के
कभी शौर्य ने कभी दंभ ने, इन्हें रोकना चाहा
कितनों ने बल से अपनी ही, ओर मोड़ना चाहा
लेकिन उनको मिटा दिया, खुद ये मुड़कर रुके नहीं
बस चला किये हर युग में
ये पदचिह्न समय के
छोटा सा अंकुर फूटा था जाने कब वटवृक्ष बना
नन्ही सी कोमल कालिका से, खिला हुआ अरविन्द बना
परिवर्तन के कर्णधार ये, सृष्टि कुम्भ के कुम्भकार ये
अस्थिरता के रखवाले
ये पदचिह्न समय के
इस जग के लीलामंड़प में,कुछ मिलता कुछ खोता है
भाग्य कभी इठलाता है तो कभी स्वयं पे रोता है
हर्ष शोक पाने खोने की इस अनंत सी क्रीडा में
निर्णायक बनने वाले
ये पदचिह्न समय के
जो घटित हुआ इतिहास बन गया, भूतकाल का दास बन गया
बीते कल के प्रासादों पर, खंडहरों का आज बन गया
सदियों सदियों की लम्बी इस अनंत सी यात्रा में
क्षण भर ना रुकने वाले
ये पदचिह्न समय के.----.महासतीसेउपालंभहे सीते, कैसा पंथ …

हास-परिहास – 30 साल पहले और आज

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~~~~~~~~~~~ 30 साल पहले - स्कूल बैग.
आज - ऑफ़िस बैग. 30 साल पहले - नोटबुक
आज - नेटबुक 30 साल पहले - हीरो रेंजर
आज - हीरो होंडा 30 साल पहले - हाफ पैंट
आज – लो-कट फुल पैंट 30 साल पहले – मिट्टी की गाड़ी से खेलना
आज – मेटल की पेट्रोल चलित गाड़ी से खेलना 30 साल पहले - शिक्षक और परीक्षा से डर!
आज - बॉस और टार्गेट का डर 30 साल पहले - कक्षा में अव्वल होना चाहते थे
आज – एम्प्लाई ऑफ द मंथ होना चाहते हैं30 साल पहले - त्रैमासिक परीक्षा
आज - तिमाही परिणाम 30 साल पहले - वार्षिक परीक्षा
आज - वार्षिक एप्राइजल 30 साल पहले - पॉकेट मनी
आज -  सेलरी 30 साल पहले – दीवाली के पटाखों के लिए इंतजार
आज - दीवाली बोनस के लिए इंतजार 30 साल पहले – दोस्त के हाथ के नवीनतम खिलौने के लिए तरसते थे
आज – विश्व के चुनिंदा बाजारों में लाँच हुए नवीनतम गॅजेट के लिए तरसते हैं 30 साल में क्या कुछ बदला है? – कुछ भी तो नहीं!

हरीश चंदर : झुग्गी नं. 208 से निकला आईएएस

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दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर।
यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाड़ी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।
मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें
मैंने संघर्ष की ऐसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन …

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता – दो गीध

बच्चों  के लिए :      दो गीध
(१) जटायु सम्पाती नामके
  दो भाई गीध थे रहते ।
सूरज के वो पास जा पहुँचे
    एक दिन उड़ते-उड़ते ।।
जटायु तो वापस लौट पड़ा
     जलने से बचते-बचते ।
सम्पाती न लौटा तो
     गिरा बहुत तड़फते ।।
           (२)
साथ दोनों का छूट गया
       करते तो क्या करते ।
साधू ने  सम्पाती को समझाया
        अब क्यों हो तुम रोते ।
पंख तुम्हारा जामेंगा
   बानर दल से मिलते ।
जब से छूटा साथ
  जटायु पंचवटी में रहते ।।
         (३)
राम-लखन-सीता
      जब पंचवटी में आये ।
जटायु राह में बैठे थे
   अपना पंख फुलाए ।।
रामजी ने प्रणाम किया
         नाम पता बतलाये ।
दशरथ जी का नाम सुना
तो जटायु अति हर्षाये ।।
                 (४)
धन्य हुआ मैं देख तुम्हे
   थे दशरथ मित्र हमारे ।
रामजी बोले मित्र पिता के
        पिता तुल्य हमारे ।।
जटायु ने फिर कहा
   बसो अब गोदावरी किनारे ।
देख-रेख मैं रक्खूँगा
         मैं हूँ साथ तुम्हारे ।।
   (५)
पंचवटी में रावण एकदिन
  साधू बनकर  आया  ।
कुटिया…

सुरेंद्र सिंघल की ग़ज़लें

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ग़ज़ल   (1) ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
न आदम से ख़फ़ा होता वो जो भी चाहता, खाता
ये उसका फ़ैसला होता वो करता प्यार हव्वा से
मेरा दिल ख़ुश हुआ होता उमीदें बाँधता उनसे
दुआएँ दे रहा होता खिलाता पोती पोते को
ख़ुशी से झूमता होता ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
तो दुनिया से जुड़ा होता बजाय आसमानों के
ज़मीं पर रह रहा होता मुझे सब देखते होते
मैं सबको देखता होता न गुत्थी बन उलझता मैं
न परदों में छिपा होता मुझे अपना समझते सब
मैं सबसे खुल चुका होता ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
तो इन्सां का हुआ होता मैं उससे दूर ही रहता
जो फ़िरकों में बँटा होता किसी मन्दिर न मस्जिद से
न मेरा वास्ता होता भरोसा ख़ुद पे ही करता
वो इन्सां जो मेरा होता इबादत वो नहीं करता
न सजदों में झुका होता ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
व तू बन्दा हुआ होता ख़ुद अपने आपको मैंने
तेरी जगह रखा होता तड़प उठता मैं ख़ुद भी जब
तेरे दुख देखता होता तेरी तरह कभी भी मैं
न पत्थर दिल हुआ होता ख़ुशी के वास्ते अपनी
न तुझसे खेलता होता ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता
तो अब तक मर चुका होता या इस दुनिया का अफ़साना

सुकरात मृदुल की कविता – मैं रावण हूँ…

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मैं रावण हूँ मैं रावण हूँमैं इसमें हूँ मैं उसमें हूँमैं हर बुरे जिस्म में हूँमैं रावण हूँ मैं रावण हूँअब रावण नहीं राम मरेगाहर अच्छा इंसान मरेगाकलयुग का पैगाम रहेगाभ्रष्टाचार और बेईमान रहेगालूट -खसोट का जोर रहेगाअब हर राज्य में चोर रहेगाअब रावण नहीं राम मरेगारावण विद्यमान रहेगामैं रावण हूँ मैं रावण हूँ ........सुकरात मृदुल

श्याम गुप्त की ग़ज़ल की ग़ज़ल

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शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है |
हो काफिया ही जो नहीं,बेचारी ग़ज़ल होती है। और भी मतले हों, हुश्ने तारी ग़ज़ल होती है ।
हर शेर मतला हो हुश्ने-हजारी ग़ज़ल होती है। हो रदीफ़ काफिया नहीं नाकारी ग़ज़ल होती है ,
मतला बगैर हो ग़ज़ल वो मारी ग़ज़ल होती है। मतला भी, मकता भी रदीफ़ काफिया भी हो,
सोच समझ के लिख के सुधारी ग़ज़ल होती है। हो बहर में सुरताल लय में प्यारी ग़ज़ल होती है।
सब कुछ हो कायदेमें वो संवारी ग़ज़ल होती है। हर शेर एक भाव हो वो जारी ग़ज़ल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो वो भारी ग़ज़ल होती है। मस्ती में कहदें झूम के गुदाज़कारी ग़ज़ल होती है,
उनसे तो जो कुछ भी कहें दिलदारी ग़ज़ल होती है। जो वार दूर तक करे वो करारी ग़ज़ल होती है ,
छलनी हो दिल आशिक का शिकारी ग़ज़ल होती है। हो दर्दे दिल की बात मनोहारी ग़ज़ल होती है
मिलने का करें वायदा मुतदारी ग़ज़ल होती है। तू गाता चल ऐ यार,    कोई कायदा न देख,
कुछ अपना ही अंदाज़ हो खुद्दारी ग़ज़ल होती है। जो उसकी राह में कहो , इकरारी ग़ज़ल होती है,
अंदाज़े बयाँ हो श्याम का वो न्यारी ग़ज़ल होती है॥ - डॉ. श्याम गु…

बंशीधर मिश्र का आलेख : ज्ञान पर पाखंड भारी

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भाषा भी क्या चीज है। आदमी को जानवर से इन्सान बना देती है। जब मनुष्य को बोलना नहीं आता था तो वह संकेतों से संवाद कर लेता था। उसके आंसू बता देते थे, वह दुखी है। ठहाके उसकी ख़ुशी बयाँ करते थे। लाल आँखें और फड़कते होठ उसका गुस्सा जाहिर करते थे। वह अन्दर जो कुछ भी सोचता, महसूस करता था, वही उसके चेहरे पर भी छा जाता था. पर जब से उसने भाषा सीखी, वह झूठ बोलने लगा. वह अपने पड़ोसी का दुःख देखकर भीतर से खुश होता है लेकिन बाहर रोने का नाटक करता है। पड़ोसी का जमता व्यापार उसे परेशान करता है लेकिन ऊपर से गदगद होने का ड्रामा करता है. जब से उसने भाषा सीखी, उसे झूठ बोलने आ गया. जब से सभ्य हुआ, वह असभ्य हो गया. नेताजी भाषण देते हैं, हमे एक बार मौका दीजिए, गरीबी मिटा देंगे , हर हाथ को काम देंगे । दूध की नदियाँ बहा देंगे । समाज में अमन कायम कर देंगे । चोरों को दंड मिलेगा। हर अमीर गरीब के जीवन और संपति की सुरक्षा होगी। पर नेताजी जब कुर्सी पा जाते हैं तो सारे वादे भूल जाते हैं। गरीबी मिटती है पर जनता की नहीं, नेता के घर की. इसकी रफ्तार इतनी तेज होती है कि देखते-देखते नेताजी का हुलिया बदल जाता है. कई शहरों म…

सुभाष राय का आलेख : वक्त की आवाज हैं शब्द

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साहित्य-चिंतन ---------------वक्त की आवाज हैं शब्दडा. सुभाष राय  अगर आप किसी पत्रकार, लेखक या  साहित्यकार से पूछें कि वह  आखिर  लिखता  क्यों हैं? उसे लिखने का  रोग है या मजबूरी या किसी खास किस्म की जरूरत या कुछ और? इससे उसे क्या हासिल होता है? तो वह  क्या जवाब देगा ? कोई कहेगा वह लिखकर प्रसन्नता का अनुभव करता है क्योकि बहुत कुछ जो वह चाहते हुए भी कह नहीं पाता है, कागज पर उतार देता है. यह विरेचन उसे आनंदित करता है. इसे स्वान्तः सुखाय  लेखन भी कहा जा सकता है. कोई कहेगा कि  वह परिवर्तन के लिए लिखता है. शब्दों में बड़ी शक्ति होती है और उनका  सधा हुआ प्रयोग जर्जर और जीर्ण को ध्वस्त कर  नए निर्माण की सम्भावना पैदा कर सकता  है. और भी तर्क हो सकते हैं पर  सच यह है कि जो लोग युगीन विषमताओं के खिलाफ चुप नहीं रह सकते,  तटस्थ नहीं रह सकते और तलवार भी नहीं उठा सकते, वे लिखते हैं. जो अपने समय के भीतर खड़े होकर उससे आमने-सामने  जबान लड़ाने का हौसला रखते हैं, उनका हाथ युग की नब्ज पर होता है. और केवल वही सार्थक लिख पाते हैं.  अगर आप की रचना में अपने वक्त की आवाज है तो वह अपने-आप बोलेगी, बड़ी नजर आयेगी…

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