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16 मई 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : खोज पनघट की

yashwant kothari new (Mobile)

कुछ दिन पहले मैं गांव गया । वहां पर मैंने पनघट की खोज की, मगर मैं पनघट तलाशने में असफल रहा। पनघट गांवों से नदारद वैसे ही हो गया, जैसे गधे के सिर से सींग हो गया है। अब वहाँ भी हैंडपंप है, पनघट की संस्कृति नष्ट हो गई है। कहां गया पनघट ? कोई तो बताये।

सच पूछे आप तो पनघट का नाम लेते ही मेरे दिलों-दिमाग में एक रोमांटिक और प्यारा-सा सपना तैरने लग जाता है। वह भी क्या जमाना था, जब दादी और मां, नानी, मौसी और मामी मुंह अंधेरे उठकर गांव के कुंए, बावड़ी या पोखर या तालाब पर जाती और पानी के साथ-साथ अपने निजी जीवन के सुख-दुख, दर्द और सांसें बांटती। रस्सी और मटकी के सहारे जिन्दगी के रंगों को घोल-घोल कर एक नया संसार बसाया जाता । मगर आज-माफ करें सरकार। शहरों की नल संस्कृति ने दम्पत्तियों को आराम पहुंचा दिया, यह प्रदूषण हैन्डपंपों के सहारे गावों में गया और पनघट की लोक संस्कृति को खा गया।

आप शायद नहीं जानते पूरे गांव का समाचार पत्र हुआ करता था पनघट, मर्दों की चैपाल अपनी जगह और महिलाओं का पनघट अपनी जगह। किसकी बहू नहाई धोई है, कौन कि बिटिया गौने पर जाने वाली है। कौन भौजाई किस देवर के साथ आंख मटका रही है, ये सब जानकारियां मटिकयों के साथ-साथ पनघट पर महका करती थी।

उमंग भरे, माहौल में खेलती, कूदती किशोरियां यहीं पर सपने बुनती, भाभियां और मामियां इन सपनों में रंग भरती और छेला बने कृष्ण कन्हैया घंटों रास्तों पर खड़े होकर अपनी महबूबा का इंतजार करते।

यहीं पर होती छेड़छाड़, आंख मिचैनी, मनुहार, रूठने और मनाने की बांकी अदाएं, मगर सब काल के गाल में समा गया। प्यार के अरमान यहीं परवान चढ़ते और शादी के बाद जब दुल्हन की डोली उठती तो पनघट पर खड़ी कोई गौरी चुपके से दो आंसू बहा देती। आह ? काश बेचारी की डोली यहीं इसी गांव में रह जाती। मगर बेजुबान पनघट सब देखता, महसूस करता, किसी बड़ी-बूढ़ी के साये तले सिसक पड़ता।

सबके सब नन्दलाल शहरों में रोजगार की तलाश में चले गये। गांव की गोरियां अपनी पतली कमर पर मटका रखना अपना अपमान समझने लगीं। प्रजातंत्र ने सबको आजाद कर दिया। पनघट सूने और पॉहुने भूखे। कहां पर मर गई मेरी गांव गंवई की लोक संस्कृति। इसी पनघट पर दफन है न जाने कितने सामन्तवादी राजों रजवाड़ो के कामपिपासा के किस्से और गौरियों के अरमान। है कोई जो पूछे हाल इस पनघट के । एक मटकी पानी नहीं एक पूरी जिन्दगी जीते थे पनघट और पनघटवालियां। मगर अफसोस कोई नहीं जानता नल-कूपों ने सब क्यों राख कर दिया। इसी पनघट पर सास-बहू, ननद-भौजाई, साली, देवरानी-जेठानी के किस्से गढ़े जाते। मुकदमे सुने जाते और फैसले दिये जाते और सभी को मान्य होते थे ये निर्णय। मगर अब......। मत पूछिये। सब मर-खप गया। देखते-देखते कुओं का पानी सूख गया। नल कूप लग गये। नहरें खुद गईं और प्रकृति ने ऐसा कोप किया कि एक गिलास पानी को तरस गये।

कृष्ण हो या राधा या कोई और गौरी, शाम हुई और बौराई राधा पनघट की ओर चल पड़ती थी, अपने-अपने कृष्ण रास्ते में मिलते, आखों ही आंखों में इशारे होते और गौरी पानी की मटकी कमर पर साधे अपनी गली में मुड़ जाती।

सत्यानाश हो नलों का जो संस्कृति को पी गये और केवल हवा की सूं सूं आवाज करते हैं। गांव ही नष्ट हो गये तो पनघट की क्या बिसात। कभी किसी फिल्म में या दूरदर्शन में चौपाल में कोई पनघट का सीन देखता हूं तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं।

अब भी पनघट पर खनकती हँसी और राह चलते बिना प्यास के पानी पीने की आकांक्षा वाले युवक याद आ जाते हैं। एक संत ने एक हरिजन कन्या से कुएं पर पानी मांगा तो कन्या ने कहा।

बाबा मैं हरिजन हूं।

संत ने जवाब दिया, जाति नहीं, पानी मांगा है। संत ने पानी पिया आशीर्वाद दिया और चले गये । अब कहां है ऐसा माहौल। नंगा क्या नहाये और क्या निचोड़े ? खुद को ही पीने के लिए पूरा नहीं पड़ता । किसी को क्या पिलाए ।

गांव की पनघट की संस्कृति नष्ट हो रही है, गांव नष्ट हो रहे हैं। गांव की गौरी की मटकी रीती है, सोलह श्रृंगार किये वो कन्हैया का इंतजार कर रही है। पानी तो जीवन है, जिजीविषा है और पनघट पानी का खजाना। इस खजाने को बचाओ दोस्तों तो कोई बात बने । पनघट ही नहीं रहेगा तो राधा कहां से पानी खींच कर ला पायेगी।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002

फोन 2670596

1 टिप्पणी:

  1. कहां गए पनघट...
    वाकई चिंतनीय हालात है।
    बेहतरीन रचना।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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