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पर्यावरण दिवस पर प्रस्तुत है हरीश नारंग की एक कविता - वृक्ष की पुकार - यह कविता पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रथम पुरुस्कार से सम्मानित है.

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वृक्ष की पुकार

मैं सदा ही

निःस्वार्थ अर्पण करता रहा

अपना सर्वस्व तुम्हें

और ----

 

पल पल बिखेरता रहा हरियाली

तुम्हारे जीवन की हर पग पर

और ----

 

सँवारता रह इस धरा को

किसी सुहागिन की

मांग की तरह

परन्तु----

 

क्या हो गया है तुम्हें

किस कारण तुले हो

मेरे मूल को ही नष्ट करने पर

मैं तुमसे अपने जीवन की

भीख नहीं मांग रहा

मैं तो दुहाई दे रहा हूं

तुम्हारी आने वाली पीढ़ी की

क्या छोड़ोगे उसके लिए

घुटने के बल चलने को

तपती लू से दहकता आँगन ?

 

अथवा

क्रीड़ास्थल के नाम पर

अथाह रेतीले मैदान ?

अथवा

ऐसी दूषित वायु

जिसमें जीवन का संचार नहीं

संघर्ष की चुनौती हो ?

जब वह पीढ़ी चीख चीख कर

मांगेगी

जीवन का अधिकार

क्या तब

सुन सकोगे

उसकी वह

दर्द भरी चीत्कार ?

 

यदि नहीं ---

तो आज

मेरी यह विनय सुनो

रोक दो इस विनाश को

क्योंकि यह मेरा नहीं

स्वयं तुम्हारा ही

विनाश है ।।।

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