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5 जून 2010

हरीश नारंग की कविता – वृक्ष की पुकार

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पर्यावरण दिवस पर प्रस्तुत है हरीश नारंग की एक कविता - वृक्ष की पुकार - यह कविता पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रथम पुरुस्कार से सम्मानित है.

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वृक्ष की पुकार

मैं सदा ही

निःस्वार्थ अर्पण करता रहा

अपना सर्वस्व तुम्हें

और ----

 

पल पल बिखेरता रहा हरियाली

तुम्हारे जीवन की हर पग पर

और ----

 

सँवारता रह इस धरा को

किसी सुहागिन की

मांग की तरह

परन्तु----

 

क्या हो गया है तुम्हें

किस कारण तुले हो

मेरे मूल को ही नष्ट करने पर

मैं तुमसे अपने जीवन की

भीख नहीं मांग रहा

मैं तो दुहाई दे रहा हूं

तुम्हारी आने वाली पीढ़ी की

क्या छोड़ोगे उसके लिए

घुटने के बल चलने को

तपती लू से दहकता आँगन ?

 

अथवा

क्रीड़ास्थल के नाम पर

अथाह रेतीले मैदान ?

अथवा

ऐसी दूषित वायु

जिसमें जीवन का संचार नहीं

संघर्ष की चुनौती हो ?

जब वह पीढ़ी चीख चीख कर

मांगेगी

जीवन का अधिकार

क्या तब

सुन सकोगे

उसकी वह

दर्द भरी चीत्कार ?

 

यदि नहीं ---

तो आज

मेरी यह विनय सुनो

रोक दो इस विनाश को

क्योंकि यह मेरा नहीं

स्वयं तुम्हारा ही

विनाश है ।।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. यदि नहीं ---

    तो आज

    मेरी यह विनय सुनो

    रोक दो इस विनाश को

    क्योंकि यह मेरा नहीं

    स्वयं तुम्हारा ही

    विनाश है ।।।

    बहुत ही उम्दा विचार ,कास हमारे देश के राजनेता इस भावना को समझ पाते !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut sundar.....

    http://iisanuii.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. सटीक और प्रेरणाप्रद रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  4. Jabtak janta is berahmi se ho rahi vrukshon ki qatl kaa, dant ke virodh nahi karti,yahi sab chalega.
    Pune me ek pahadi ke neeche sainkdon log jama ho gaye,ek human chain bana dee,aur us pahadi ko nasht hone se bacha liya.

    उत्तर देंहटाएं
  5. काश अब भी मानव अपने द्वारा किये जा रहे विनाश को अपनी आँखों से देख कर पहचान ले ... और संभल जाए ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 06.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. नश्तर सा चुभता है उर में कटे वृक्ष का मौन
    नीड़ ढूढ़ते पागल पंछी को समझाए कौन..!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेनामी5:07 pm

    Bahut bahut sunder prastuti....kaash sabhi log aise hi vichaar mann mein le aain....keep it up !!!

    Aarti Harish

    उत्तर देंहटाएं
  9. Aparna Bose12:04 pm

    Harishji, your poem is very thought provoking and touches the heart. Wish your message reaches all and sundry. Beautiful

    उत्तर देंहटाएं
  10. Sir, Aaj bahut dinon ke baad aapka Kavita padhke woh din yaad aaya jab aap ke sath baith ke kavita sunte-sunate enjoy karte the. Kaash woh din phir aajaye!!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बेनामी4:54 pm

    aap ke jrurt hi es duniya me kuch kena he to judo logo se or prerit kero kesano ko jo apne keeto me pade podey lagaye
    Rpss
    join

    उत्तर देंहटाएं

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