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मधु संधु की पुस्तक समीक्षा : धूप से रूठी चांदनी - गम्भीर विचारों का रागात्मक उच्छलन

अगर गम्भीर चिंतन की भावात्मक अभिव्यक्ति काव्य है तो धूप से रूठी चांदनी की चिंतन प्रभूत कविताएं निश्चय ही संवेदनशील पाठक को आन्दोलित करने की जादुई शक्ति रखती हैं। यह अतीत की यादें लिए अनजान सफर पर निकली कवयित्री के गुमसुम विचारों का उद्वेलन है। प्रवासी जीवन में भी सुधा रिश्तों की डोर को ही नहीं मूल्य चेतना को भी सुदृढ़ और सुघड़ ढंग से पकड़े हैं। उनका मनुष्य नियति के हाथों कठपुतली बना नाना नाच नाच रहा है। उसे विश्वसनीयता की तलाश है। बचपन, यौवन, घर, परिवार की स्मृतियां उन्हें रुला-रुला देती हैं। सुनामी लहरों की मानिंद बिखर रहे रिश्तों की स्मृतियां उनकी अनेक कविताओं में मिलती हैं। मां ने कहा था, मां तुम बहुत याद आती हो, मां की फरियाद, मां कहती थी में मां की वेदना को स्वर मिला है। खुश हूं मैं में बेटी की मनःस्थितियां हैं। पिता, मौसी, प्रेमी, मित्र भी यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। रूमानी लोक कथाएं सोहनी-महिवाल, हीर रांझा, सस्सी-पुन्नू, शीरी फरिहाद, साहिबां-मिर्जा का प्रेम, वेदना और न मिल पाने की विडम्बना को स्वर देती लिखती हैं-आवाज़ देता है कोई उस पार...सोहणी तैर जाती है चनाब के पानियों में....ससी भटकती है थलों में...साहिबा ने छोड़ा घर-बार।
उनका नारी विमर्श स्त्री को इन्सान मानने की जिद्द करता है। महाभारत की द्रोपदी का हवाला देती लिखती हैं-क्या औरत की नियति हर युग में लुटना ही है। पुरुष के हाथों कठपुतली बनी अभिशप्त स्त्री यहां चित्रित है। अग्नि परीक्षाएं ले रहे राम, वनवास काट रही सीता भी यहां चित्रित है। कहती हैं कि नेताओं और धर्म के लिए सिर्फ सिपाही शहीद होता है, पर स्त्री के लिए वह बेटा, पति, भाई, पिता भी है। उन्होंने उस सशक्त स्त्री का चित्रण किया है जो लता की तरह वृक्ष से लिपटती नहीं, अपितु वृक्ष रूपी पुरुष को अपने बदन से लिपटाए मजबूत खड़ी है।
अनेक स्थलों पर काव्य के भाव लोक पर बुद्धि के हस्तक्षेप की चेष्टाएं देखी जा सकती हैं। मजबूरियों की कहानी कहती सुधा जी लिखती हैं- कुछ न कहने की मजबूरी दिल पर भारी है..... कुछ कहने की मजबूरी बुद्धि पर भारी है.... रिश्तों के टूटने की मजबूरी आत्मा पर भारी है..... रिश्तों को निभाने की मजबूरी विवेक पर भारी है। अनेक काव्य पंक्तियां रुमानियत से विद्रोह यांत्रिक जीवन एवं नवीन मूल्य चेतना के जीवन सत्य से साक्षात्कार कराती हैं जैसे- विरह के मारें कहाँ, इधर दिल टूटा, उधर जुड़ जाता है आदि।
प्रवासी जीवन की विवशताओं, अपने देश एवं संस्कृति की याद के स्वर और अपनी मिट्टी से उखड़ने की पीड़ा को रूह कविता में अभिव्यक्त करती कहती है - रूह... हर बार, जख्मी, लुटी -पिटी, प्रताड़ित परदेस लौट आती है।....... रूह ज्यादा दिन, चिल्ला नहीं पाएगी, दो वक्त की रोटी, बच्चों की पढ़ाई, बाप की बीमारी, माँ की तीमारदारी में खो जाएगी। यह वह देश है, जहां ग्रीन कार्ड पाने की ललक में दूरियां बढ़ती जाती हैं। खुश हूँ मैं विदेश में ब्याही उस बिटिया के पत्र को लिए है, जो पल पल अपना देश भी ढूंढ रही है और बदली संस्कृति में अपने को ढालने में प्रयास रत भी है। एक संस्कृति वह थी जिसमें कहते थे कि कर्ज कोढ़ के रोग की तरह होता है और एक संस्कृति यह है जहां घर कार फर्नीचर-सब किश्तों पर खरीद लिया जाता है। जहां चादर के अंदर नहीं चादर के बाहर पैर पसारते हैं। जहां नैतिक मूल्य रोग का पर्याय माने जाते हैं। परदेस की धूप में संस्कृति का वह रूप है, जहां आई लव यू कहते कहते तलाक की अर्जी दे दी जाती है और पति पत्नी तलाक के बाद अच्छे दोस्त बन जाते हैं। अपने देश में तो व्यक्ति रोता भी है तो साथ-साथ, जबकि प्रवासी जीवन में दुख बांटने की सुविधा नहीं।
समय की हलचल को भी उन्होंने काव्य में बांधा है। भ्रूण हत्या और विनय कविता कहती है कि उस देश में भी भूण हत्या का एक कारण सामाजिक कलंक ही है। नेक दिल में स्वतंत्रता संग्रामियों को भूलने वाले कपटी राजनेता हैं। सुनामी, मुख्तार माई, ईरान-ईराक युद्ध आदि के प्रसंग भी आए हैं।
व्यंग्यात्मकता अनेक स्तरों पर है। अमेरिका स्वर्ग है और इंद्र भी उसके लिए ललायित है। राजनीति पर व्यंग्य करती कहती हैं- अमेरिका की पतझड़ कितनी सुहानी है, गिरते पत्तों की भी एक कहानी है....रंगबिरंगे सूखे पत्ते गिरते गिरते धरती भर जाते हैं, नेता जाते जाते देश को खाली कर जाते हैं।
धूप से रूठी चांदनी नाम ही कवयित्री के प्रकृति के प्रति अनुराग को स्पष्ट करता है। शीशे की घास निहार तो सकती हूँ, पांव नहीं रख सकती, फिसलने का जो डर है। धूप भी यहां बर्फ से चौंधिया रही है। कैनेडा की रातों के आकाश का वर्णन करती लिखती हैं- मेरे शहर में तारे कभी-कभी झलक दिखलाते हैं, खुले आकाश में फैले तारों को हम तरस-तरस जाते हैं, जब कभी निकलते हैं, तो फीकी सी मुस्कान दे इठलाते हैं, पराये से लगते हैं, फिर भी उनमें अपनों को खोजना अच्छा लगता है। बर्फीली सर्दियों में धूप भी शीश बगीचे की चमक से चुंधिया कर सिमट जाती है।
पौराणिक आख्यानों के प्रसंग सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। गोकुल की ग्वालिनों की वेदना, सामाजिक मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा, सीता का छला जाना, दुर्योधन की दुष्टता, द्रौपदी का चीर हरण, महा भारत, शंकर, हनुमान। पर भक्ति की शिक्षा देने वाले शैतान को भी उन्होंने नहीं छोड़ा।
भवानी प्रसाद मिश्र की मैं गीत बेचता हूँ की तर्ज पर जी हाँ मैं दीप बाँटती हूँ मिलती है। उनके पास बांटने को प्रेम, स्नेह, अनुराग के दीप हैं और नफरत, ईर्ष्या, द्वेष कलह के टूटे फूटे दीपक बटोरने का साहस भी। वादा करो में गज़ल शैली है। तुम्हें क्या याद आया... ? प्रश्नचिन्हों से भरे संबोधन गीत द्वारा स्मृतियों की यात्रा है। हमें तो टूटा सा दिल अपना याद आया, तुम्हें क्या याद आया... ? .....हमें तो बचपन अपना याद आया, तुम्हें क्या याद आया... ?..... हमें तो अधूरा सा घरोंदा अपना याद आया, तुम्हें क्या याद आया... ? पंजाबियत का पुट-मंजी, धोबी पटका, खेस उन्हें पंजाब की धरती पर पहुँचा देता है। उर्दू शब्द- क्यूँ, सहर, जु़रूरत, जुरूरी आदि भी मिल जाते हैं।
डेनमार्क के रेडियो सबरंग के निर्देशक चांद शुक्ला लिखते हैं कि सुधा जी पुरकशिश आवाज़ की मालकिन हैं और यह पढ़ते ही पुस्तक को उलटा सीधा कर सी.डी. ढूंढनी अनिवार्य हो जाती है, पर सुधा जी आपने पाठकों को इस उपहार से वंचित क्यों रखा।
डॉ. अफरोज़ ताज के शब्दों में उन्होंने मर्दों की कठपुतली या मोम की गुड़िया को लोह की देह दी है। नए समाज की कल्पना करती कहती है- मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी, जहां औरत सिर्फ मां, बेटी, पत्नी, बहन, बहू , सखी, प्रेमिका ही नहीं, एक इन्सान, सिर्फ इन्सान हो। वेदना का अंडर करेंट सभी रचनाओं में दौड़ रहा है। चाहे यह वेदना नारी विमर्श का हिस्सा हो, या प्रवासी जीवन का। चाहे इसके मूल में विसंगति हो या अपने देश की याद के स्वर।
पुस्तक का नाम ः धूप से रूठी चांदनी
प्रकाशक ः शिवना प्रकाशन, पी.सी. लैब, सम्राट काम्प्लैक्स, बेसमेंट,  सीहोर 466001
वर्ष ः 2010
पृष्ठ ः 112
मूल्य ः 300 रुपये
डॉ. मधु संधु, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर-143005, पंजाब
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समीक्षा के लिये आभार । बहुत ही सुंदर समीक्षा लिखी है डॉ मधु जी ने । उनको तथा रचनाकार दोनों को आभार । कृपया शिवना के आगे लिखा हुआ भोपाल, सीहोर कर दें क्‍योंकि शिवना भोपाल की संस्‍था नहीं है सीहोर की है । कई बार स्‍थान के नाम से भी गलतफहमी हो जाती है ।

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