शनिवार, 31 जुलाई 2010

दामोदर लाल ‘जांगिड़‘ की ग़ज़ल

ग़ज़ल रो ज चीखते अखबार तो, सरकार क्‍या करे। पसरे हैं भ्रष्‍टाचार तो, सरकार क्‍या करे॥ डिप्‍लोमा, डिग्रियां लिये, तादाद में इतने, ब...

सुख नन्दन का आलेख संस्‍कृति के चार अध्‍यायः कवि और चिंतक का द्वंद्व

सुखनंदन एडवोकेट सिविल कोर्ट, आजमगढ़, उ.प्र., 276001 दिनकर हिन्‍दी के उन कुछ एक साहित्‍यकारों में से हैं, जिनकी प्रतिभा का लोहा चिन्‍त...

सुभाष राय की कवितायें

1. तलाश ---------- मौसम साफ होने पर कोई भी बाढ़ के खिलाफ पोस्टर लगा सकता है बिजली को गालियाँ बक सकता है तूफान...

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

सुनील संवेदी की कविता : बड़ी हो गई बिटिया

उन्हें- पड़ोस की वह छोटी सी बिटिया बहुत अच्छी लगती थी। वह उसे- बिटिया ही कहते थे सुंदर, लाडली, मासूम बिटिया। और बिटिया- ...

शोभा गुप्ता के हास्य व्यंग्य दोहे

जिम्मेदार कौन ? नेता ने जनता से बोला ये रोना-धोना छोड़ बात पुरानी बोझ बन गई उसको ढोना छोड़ बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं कारण कहा हाथ को ज...

रत्नकुमार सांभरिया का आलेख : दलित, प्रेमचंद, तुलसीदास और शहीद भगत सिंह

मुं शी प्रेमचंद (1880-1936) को वर्णवादी आलोचक साहित्य जगत का बरगद मानते आ रहे हैं। बरगद तक पहुँचाने में उनकी कितनी ही खामियाँ ढंक-दबा दी गईं...

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

यशवन्‍त कोठारी का आलेख : सतत संघर्षशील व्‍यक्‍तित्‍व -डा़.प्रो.सी.पी.जोशी

  षष्टिपूर्ति - 29.7.10 पर सतत संघर्षशील व्‍यक्‍तित्‍व -डा़.प्रो.सी.पी.जोशी यशवन्‍त कोठारी सी.पी.जोशी एक कर्मठ राजनेता, अदभुत प्...

विजय वर्मा की हास्य कविता - भिखारी

      भिखारी   [निराला जी की आत्मा से क्षमा याचना सहित ] -- वह आता! मोबाइल पर बतिआते , निश्चिन्त-भाव से आता. आकर कॉल-बेल बजाता. ...

बुधवार, 28 जुलाई 2010

महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द'' की कविताएँ व दोहे

हिन्‍दी के दोहे (हिन्‍दी महिमा) हिन्‍दी मे गुण बहुत है, सम्‍यक देती अर्थ। भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्‍कृति सहित समर्थ॥1॥ वैयाकरणि...

शरद जायसवाल की हास्य व्यंग्य कविताएँ व ग़ज़लें

‘ आशा की किरण फूटी है ‘ पढ़ी लिखी है वो हम उससे कमतर जमीं पे हम वो आसमां को छूती है ! प्रेम के धागे को तुम कच्‍चा मत समझो ...

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

ग़ज़ल सब का मन ललचाये कुर्सी। क्‍या क्‍या नाच नचाये कुर्सी ॥   यूं ही सहज नहीं मिल जाती , सैण्‍डल तक उठवाये कुर्सी ,   नींद उस...

सोमवार, 26 जुलाई 2010

सुनील संवेदी की कविता : लेडीज फर्स्ट

लेडीज फर्स्ट आधुनिक साहित्य ने जब- औरत के सदियों पुराने दबे-कुचलेपन, आकांक्षाओं, संभावनाओं आस्थाओं, संवेदनाओं की असमय-अस्वाभाविक...

दामोदर लाल जांगिड की कविता : फुटपाथ

फुटपाथ फुटपाथ भी पैदा होते हैं, फुटपाथ जवानी पाते हैं। फुटपाथ से डोली उठती तो, माँ बाप के आँसू आते हैं।   फुटपाथ भी रोते मय्‍यत पे, ...

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा की ग़ज़ल

बना है आन भारत की हुआ है शान भारत की। यकीनन आज भ्रष्‍टाचार है पहचान भारत की॥   चरम सीमा पे ताण्‍डव भूख बेकारी ग़रीबी का, कि क्रंदन ...

रविवार, 25 जुलाई 2010

कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : हम स्वतंत्र हैं

हम स्वतंत्र हैं डा० कान्ति प्रकाश त्यागी बलिदानों से मिली आज़ादी, हम स्वतंत्र हैं परन्तु हम ज़रूरत से ज्यादा ही स्वतंत्र हैं हम ...

शनिवार, 24 जुलाई 2010

प्रमोद भार्गव की कहानी : नक्टू

कहानी नक्‍टू प्रमोद भार्गव    नकटू अब दस साल का हो गया था। अपने नाम के ही अनुरूप वह बेशरम था, बल्‍कि यों कहा जाए कि उसका नाम उसके...

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