सोमवार, 5 जुलाई 2010

महावीर सरन जैन की किताब : हिन्दी की अन्तर-क्षेत्रीय, सार्वदेशीय एवं अन्तरराष्ट्रीय भूमिका (भाग 1)

हिन्दी की अन्तर-क्षेत्रीय, सार्वदेशीय एवं अन्तरराष्ट्रीय भूमिका

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

अनुक्रम

अध्याय 1.

हिन्दी भाषा का क्षेत्र एवं हिन्दी के क्षेत्रगत रूप

अध्याय 2.

हिन्दी एवं उर्दू का अद्वैत

अध्याय 3.

हिन्दी भाषा की सार्वदेशीय भूमिका ( भारत में हिन्दी का सम्पर्क भाषा के रूप में व्यवहार

अध्याय 4.

विदेशी विद्वानों द्वारा हिन्दी वाङ्मीमांसापरक अध्ययन

(फिलॉलाजिकल स्टडीज) (सन् 1940 ईस्वी तक)

अध्याय 5.

विदेशों में हिन्दी शिक्षण : समस्याएँ और समाधान

अध्याय 6.

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् विदेशों में हिन्दी भाषापरक अध्ययन

अध्याय 7.

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् विदेशों में हिन्दी साहित्य सृजन एवं साहित्य समीक्षा

अध्याय 8.

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् हिन्दी की साहित्यिक कृतियों का विदेशी भाषा में तथा विदेशी साहित्यिक कृतियों/लोककथाओं का हिंदी में अनुवाद

अध्याय 9.

संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी

भूमिका

स्वाधीनता के लिए जब-जब आन्दोलन तीव्र हुआ, तब-तब हिन्दी की प्रगति का रथ भी तीव्र गति से आगे बढ़ा। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गई। हिन्दी को राष्ट्रभाषा की मान्यता उन नेताओं के कारण प्राप्त हुई जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व जिन नेताओं के हाथों में था उन्होंने यह पहचान लिया था कि विगत 600-700 वर्षों से हिन्दी सम्पूर्ण भारत की एकता का कारक रही है, यह संतों, फकीरों, व्यापारियों, तीर्थ यात्रियों, सैनिकों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग तक प्रयुक्त होती रही है। बंगाल के केशवचन्द्र सेन, राजा राम मोहन राय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, पंजाब के बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, गुजरात के स्वामी दयानन्द, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, महाराष्ट्र के लोकमान्य तिलक तथा दक्षिण भारत के सुब्रह्मण्यम भारती, मोटूरि सत्यनारायण आदि नेताओं के राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्बंध में व्यक्त विचारों से मेरे मत की संपुष्टि होती है।

जब संविधान सभा ने देश की राजभाषा के सम्बन्ध में विचार किया तब तक राष्ट्रीय चेतना की धारा का प्रवाह इतना तेज था कि संविधान सभा ने एकमतेन हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया। संविधान सभा में इस विषय पर कोई मतभेद कभी नहीं हुआ कि संघ की राजभाषा हिन्दी को बनाया जाए अथवा नहीं। बहस का मुद्दा कभी भी यह नहीं रही कि संघ की राजभाषा हिन्दी को बनाया जाए अथवा अंग्रेजी को। दिनांक 8 नवम्बर, 1948 को देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ‘ ने एक अखिल भारतीय भाषा की आवश्यकता ' पर बल देते हुए यह स्पष्ट कहा कि एक स्वतंत्र देश को अपनी ही भाषा में राजकाज चलाना चाहिए तथा यह भाषा अन्तत: जनता के मध्य से ही विकसित होगी (कान्स्टीट्यून्ट एसेम्बली डिबेट्स, दिनांक 8 - 11 - 1948)। बहस के मुद्दे रहे कि (1) अंग्रेजी के चलते रहने की अवधि 10 वर्ष रखी जाए अथवा 15 वर्ष (2) हिन्दी का स्वरूप कैसा हो (3) अंक देवनागरी के नागरी अंक हों अथवा अन्तरराष्ट्रीय हों। 26 अगस्त,1949 को इस विषय पर काफी बहस हुई जिसमें मुख्य मुद्दा अंको का था। मतदान में समान मत पड़े। यह मत विभाजन इतना चर्चित हुआ कि बाद में अंग्रेजी के कुछ विद्वानों ने यह मिथक गढ़ दिया कि संविधान सभा में इस विषय पर बहस हुई कि संघ की राजभाषा हिन्दी हो अथवा अंग्रेजी हो। वास्तव में संविधान सभा ने एकमतेन अर्थात सर्वसम्मति से संघ की राजभाषा हिन्दी को स्वीकार किया। 14 सितम्बर,1949 को भारी तालियों की गड़गड़ाहट में ‘ मुंशी - आयंगर' फामूर्ला स्वीकार करते हुए जब हिन्दी राजभाषा के पद पर एकमतेन प्रतिष्ठित हुई तो सभा के अध्यक्ष ने अपने जो उद्गार व्यक्त किया वह तत्कालीन सभा के सदस्यों के मनोभावों को आत्मसात करने का लिखित दस्तावेज है: ‘आज पहली बार हम अपने संविधान में एक भाषा स्वीकार कर रहें हैं जो भारत संघ के प्रशासन की भाषा होगी। - - - हमने अपने देश का राजनैतिक एकीकरण सम्पन्न किया है। राजभाषा हिन्दी देश की एकता को कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिक सुदृढ़ बना सकेगी। अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषा को स्थापित करने से हम निश्चय ही और भी एक दूसरे के नज़दीक आयेंगे।'

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सत्ताधीशों ने सामान्य जन से अपनी दूरी दिखाने तथा सामान्य जन को अपनी प्रभुता दिखाने के लिए सामान्य जन की भाषा को प्रशासन एवं शिक्षण की भाषा नहीं बनने दिया। तर्क दिया गया - हिन्दी में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली का अभाव है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन कर दिया गया। काम सौंप दिया गया - शब्द बनाओ, शब्द गढ़ो। आज स्थिति यह है कि एक ओर हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या विश्व में चीनी भाषा के बाद सर्वाधिक है तथा इसका प्रचार प्रसार एवं अध्ययन अध्यापन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर है वहीं दूसरी ओर कुछ ताकतें हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का कुचक्र रच रही हैं। इनकी शक्ति यद्यपि कम नहीं है फिर भी मेरा आकलन है कि हिन्दी को आगे बढ़ने से अब कोई ताकत रोक नहीं सकती क्योंकि हिन्दी निरन्तर आगे बढ़ रही है। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में एक सम्मेलन का समापन करते हुए मैंने यह मत व्यक्त किया था कि 19वीं शताब्दी फ्रेंच भाषा की थी, 20 वीं शताब्दी अंग्रेजी भाषा की थी तथा 21 वीं शताब्दी हिन्दी की होगी। इस मत की स्थापना के कारण थे - भाषा बोलने वालों की संख्या, भाषा व्यवहार क्षेत्र का विस्तार, हिन्दी भाषा एवं लिपि व्यवस्था की संरचनात्मक विशेषताएँ, भविष्य में कम्प्यूटर के क्षेत्र में Text to Speech तथा Speech to Text तकनीक का विकास, भारतीय मूल के आप्रवासी एवं अनिवासी भारतीयों की संख्या, श्रमशक्ति, मानसिक प्रतिभा में निरन्तर अभिवृद्धि।

सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1991 के सैन्सस आफ इण्डिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ (दे0 Census of India 1991 Series 1 - India Part I of 1997, Language : India and states - Table C - 7) यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फॉर द वर्ल्ड लैंग्वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा यूनेस्को-प्रश्नावली के आधार पर हिन्दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्त दायित्व के निर्वाह के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा। प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने दिनांक 25 मई ,1999 को यूनेस्को को अपनी विस्तृत रिपोर्ट भेजी।

प्रोफेसर जैन ने विभिन्न भाषाओं के प्रामाणिक आंकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्ताओं की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्थान हिन्दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय प्रोफेसर जैन ने ब्रिटिश काउन्सिल आफ इण्डिया से अंग्रेजी मातृभाषियों की पूरे विश्व की जनसंख्या के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया। ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया ने इसके उत्तर में गिनीज बुक आफ नालेज (1997 संस्करण, पृष्ठ-57) फैक्स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्सिल द्वारा भेजी गई सूचना के अनुसार पूरे विश्व में अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) है। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या का योग 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। प्रोफेसर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिद्ध किया कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभी देशों के अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या के योग से अधिक जनसंख्या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक-समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है।

यह कहना अप्रसांगिक न होगा कि हिन्दी भाषा की अर्थवत्ता, हिन्दी - उर्दू का सम्बन्ध, हिन्दी भाषा क्षेत्र तथा हिन्दी का व्यवहार क्षेत्र आदि बिन्दुओं को लेकर न केवल सामान्य व्यक्ति के मन में बहुत सी भ्रान्त धारणाएँ बनी हुई हैं बल्कि हिन्दी भाषा के कतिपय विद्वानों, आलोचकों तथा अध्येताओं का मन भी तत्संबंधित भ्रान्तियों से मुक्त नहीं है।

प्रथम अध्याय में हिन्दी भाषा की अर्थवत्ता को स्पष्ट करने के लिए ‘हिन्दी भाषा क्षेत्र' की मीमांसा की गई है। इस अध्याय में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक भाषा क्षेत्र में अनेक क्षेत्रगत, वर्गगत एवं शैलीगत भिन्नताएँ होती हैं। प्रत्येक भाषा क्षेत्र में किसी क्षेत्र विशेष के भाषिक रूप के आधार पर उस भाषा का मानक रूप विकसित होता है, जिसका उस भाषा-क्षेत्र के सभी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे व्यक्ति औपचारिक अवसरों पर प्रयोग करते हैं। पूरे भाषा क्षेत्र में इसका व्यवहार होने तथा इसके प्रकार्यात्मक प्रचार-प्रसार के कारण विकसित भाषा का मानक रूप भाषा क्षेत्र के समस्त भाषिक रूपों के बीच संपर्क सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है। किसी भाषा के मानक रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान भले ही की जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक रूप होता है : मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। इस अध्याय में हिन्दी भाषा के संदर्भ में यह स्पष्ट किया गया है कि खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्दी का विकास अवश्य हुआ है किन्तु खड़ी बोली ही हिन्दी नहीं है। तत्वतः हिन्दी भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उन सबकी समष्टि का नाम हिन्दी है। हिन्दी भाषा क्षेत्र के प्रत्येक भाग में व्यक्ति स्थानीय स्तर पर क्षेत्रीय भाषा रूप में बात करता है। औपचारिक अवसरों पर तथा अन्तर-क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं सार्वदेशिक स्तरों पर भाषा के मानक रूप अथवा व्यावहारिक हिन्दी का प्रयोग होता है।

दूसरे अध्याय का प्रतिपाद्य हिन्दी एवं उर्दू के अद्वैत की विवेचना है। इस अध्याय में मैंने यह सिद्ध किया है कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है।

तीसरे अध्याय में हिन्दी की भारत के हिन्दीतर क्षेत्र की भूमिका के सम्बंध में सूत्रवत विवेचना की गई है। स्वाधीनता आन्दोलन में हिन्दी की भूमिका के सम्बंध में पर्याप्त विचार हो चुका है। किस प्रकार विभिन्न हिन्दीतर क्षेत्रों के नेताओं ने हिन्दी के राष्ट्रीय महत्व का आकलन किया तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा माना तथा इसके प्रचार प्रसार में अपना योगदान दिया - इस सम्बंध में विपुल सामग्री उपलब्ध है। इस दृष्टि से भी प्रचुर सामग्री उपलब्ध है कि हिन्दी में उन रचनाकारों, साहित्यकारों, अनुसंधानकर्ताओं एवं प्रचारकों का कितना योगदान है जिनकी मातृभाषा यद्यपि हिन्दी नहीं है। इस कारण मैंने प्रस्तुत अध्याय में व्यवहारिक हिन्दी भाषा के सम्पूर्ण भारत में प्रसार एवं व्यवहार को रेखांकित करने का प्रयास अधिक किया है।

आगे के अध्यायों में हिन्दी की अन्तरराष्ट्रीय भूमिका के बारे में विचार अपेक्षित है।

विश्व के लगभग 93 देशों में हिन्दी का या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रयोग होता है अथवा उन देशों में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन की सम्यक् व्यवस्था है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु हिन्दी बोलने वालों की संख्या अंग्रेजी भाषियों से अधिक है।

विश्व के इन 93 देशों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -

( I ) इस वर्ग के देशों में भारतीय मूल के आप्रवासी नागरिकों की आबादी देश की जनसंख्या में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है।

( II ) इस वर्ग के देशों में ऐसे निवासी रहते हैं जो हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में सीखते हैं, पढ़ते हैं तथा हिन्दी में लिखते हैं। इन देशों की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में प्रायः स्नातक एवं / अथवा स्नातकोत्तर स्तर पर हिन्दी की शिक्षा का प्रबन्ध है। कुछ देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी में शोध कार्य करने तथा डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने की भी व्यवस्था है।

( III ) भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है। भारत एवं पाकिस्तान के अलावा हिन्दी एवं उर्दू मातृभाषियों की बहुत बड़ी संख्या विश्व के लगभग 60 देशों में निवास करती है। इन देशों में भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, भूटान, नेपाल आदि देशों के आप्रवासियों / अनिवासियों की विपुल आबादी रहती है। इन देशों की यह आबादी सम्पर्क-भाषा के रूप में ‘हिन्दी-उर्दू' का प्रयोग करती है, हिन्दी की फिल्में देखती है; हिन्दी के गाने सुनती है तथा टेलीविजन पर हिन्दी के कार्यक्रम देखती है।

अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में केवल ब्रिटिश नागरिक ही नहीं आए; हालैण्ड, जर्मनी, फ्रांस,रूस एवं अमेरिका आदि देशों के नागरिक भी आए। आगत विदेशी पादरियों, कर्मचारियों, प्रशासकों में से बहुत से विदेशियों ने श्रम एवं निष्ठापूर्वक हिन्दी सीखी तथा हिन्दी सीखकर हिन्दी की पाठ्य पुस्तकों, हिन्दी के व्याकरणों एवं कोशों का निर्माण किया। उनके अध्ययन आज के भाषावैज्ञानिक विश्लेषण एवं पद्धति के अनुरूप भले ही न हों किन्तु हिन्दी भाषा के वाड्.मीमांसापरक अध्ययन की दृष्टि से इनका ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। चौथे अध्याय में इन्हीं विदेशी विद्वानों के द्वारा सम्पन्न हिन्दी भाषा से संबंधित अध्ययनों का लेखा जोखा प्रस्तुत है।

पाँचवे अध्याय में विदेशों में हिन्दी शिक्षण की समस्याओं की विवेचना की गई है तथा इनके समाधान के लिए क्या करणीय है, हिन्दी की प्रगति एवं विकास के लिए किन किन दिशाओं में कदम उठाना जरूरी है, - इस बारे में दिशा निर्देश देने का विनम्र प्रयास किया गया है।

छठे अध्याय में द्वितीय महायुद्ध के बाद हिन्दी भाषा के विभिन्न पक्षों पर विदेशी विद्वानों द्वारा सम्पन्न अध्ययनों की विवेचना प्रस्तुत है।

सातवें अध्याय में द्वितीय महायुद्ध के बाद विदेशी विद्वानों एवं साहित्य सर्जकों के द्वारा हिन्दी साहित्य सृजन एवं साहित्य की आलोचना एवं समीक्षा की झाँकी प्रस्तुत है।

आठवें अध्याय का प्रतिपाद्य है कि हिन्दी की किन किन साहित्यिक कृतियों का किन किन विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है तथा किन किन विदेशी साहित्यिक कृतियों एवं लोक कथाओं का हिन्दी में अनुवाद हो चुका है।

अन्तिम अध्याय का विषय है - ‘ संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी'। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाएँ हैं। इन भाषाओं के मातृभाषियों के बोलने वालों की संख्या के प्रामाणिक आँकड़ों की तुलना हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या से की गई है तथा हिन्दी को भी संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की तार्किक अनुशंसा की गई है।

जो अध्येता प्रस्तुत पुस्तक को पढ़कर एर्सी सामग्री की सूचना देने की अनुकम्पा करेंगे जिसे इसमें जोड़ा जा सके तथा अध्ययन सामग्री को अद्यतन बनाया जा सके, लेखक उनके प्रति आभारी होगा।

अध्याय 1.

हिन्दी भाषा का क्षेत्र एवं हिन्दी के क्षेत्रगत रूप

‘हिन्दी भाषा क्षेत्र' के अन्तर्गत भारत के निम्नलिखित राज्य ∕ केन्द्र शासित प्रदेश समाहित हैं - 1.उत्तर प्रदेश 2.उत्तराखंड 3. बिहार 4. झारखंड 5. मध्यप्रदेश 6. छत्तीसगढ़ 7. राजस्थान 8. हिमाचल प्रदेश 9. हरियाणा 10. दिल्ली 11. चण्डीगढ़।

‘ हिन्दी भाषा क्षेत्र ' में हिन्दी भाषा के जो प्रमुख क्षेत्रगत रूप बोले जाते हैं उनकी संख्या 20 है। भाषाविज्ञान का प्रत्येक विद्यार्थी जानता है कि प्रत्येक भाषा क्षेत्र में भाषिक भिन्नताएँ होती हैं। किसी ऐसी भाषा की कल्पना भी नहीं की जा सकती जो जिस ‘भाषा क्षेत्र' में बोली जाती है उसमें किसी प्रकार की क्षेत्रगत एवं वर्गगत भिन्नताएँ न हों। भिन्नत्व की दृष्टि से तो किसी भाषा क्षेत्र में जितने बोलने वाले व्यक्ति रहते हैं उस भाषा की उतनी ही ‘व्यक्ति बोलियाँ' होती हैं। इसी कारण यह कहा जाता है कि भाषा की संरचक ‘बोलियाँ' होती हैं तथा बोलियों की संरचक ‘व्यक्ति बोलियाँ'। इसी को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि ‘व्यक्ति बोलियों' के समूह को ‘बोली' तथा ‘बोलियों' के समूह को भाषा कहते हैं। बोलियों की समष्टि का नाम ही भाषा है। किसी भाषा की बोलियों से इतर व्यवहार में सामान्य व्यक्ति भाषा के जिस रूप को ‘भाषा' के नाम से अभिहित करते हैं वह तत्वत: भाषा नहीं होती। भाषा का यह रूप उस भाषा क्षेत्र के किसी बोली ∕ बोलियों के आधार पर विकसित उस भाषा का ‘मानक भाषा रूप' होता है। भाषा विज्ञान से अनभिज्ञ व्यक्ति ‘मानक भाषा रूप' को ‘भाषा' कहने एवं समझने लगते हैं तथा ‘भाषा क्षेत्र' की बोलियों को अविकसित, हीन एवं गँवारू कहने, मानने एवं समझने लगते हैं। भारतीय भाषिक परम्परा इस दृष्टि से अधिक वैज्ञानिक रही है। भारतीय परम्परा ने भाषा के अलग अलग क्षेत्रों में बोले जाने वाले भाषिक रूपों को ‘देस भाखा∕ देसी भाषा' के नाम से पुकारा तथा घोषणा की कि देसी वचन सबको मीठे लगते हैं - ‘ देसिल बअना सब जन मिट्ठा '। ( विशेष अध्ययन के लिए देखें - प्रोफेसर महावीर सरन जैन : भाषा एवं भाषा विज्ञान, अध्याय 4 - भाषा के विविधरूप एवं प्रकार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1985 )

हिन्दी भाषा क्षेत्र में हिन्दी की मुख्यत: 20 बोलियाँ अथवा उपभाषाएँ बोली जाती हैं। इन 20 बोलियों अथवा उपभाषाओं को ऐतिहासिक परम्परा से पाँच वर्गों में विभक्त किया जाता है - पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, राजस्थानी हिन्दी, बिहारी हिन्दी और पहाड़ी हिन्दी।

1. पश्चिमी हिन्दी - 1.खड़ी बोली 2. ब्रजभाषा 3. हरियाणवी 4. बुन्देली 5.कन्नौजी

2. पूर्वी हिन्दी - 1.अवधी 2.बघेली 3. छत्तीसगढ़ी

3.राजस्थानी - 1.मारवाड़ी 2.मेवाती 3.जयपुरी 4.मालवी

4. बिहारी - 1. भोजपुरी 2. मैथिली 3. मगही 4.अंगिका 5.बज्जिका ( इनमें ‘मैथिली' को अलग भाषा का दर्जा दे दिया गया है हालाँकि हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में अभी भी मैथिली कवि विद्यापति पढ़ाए जाते हैं तथा जब नेपाल में रहने वाले मैथिली बोलने वालों पर कोई दमनात्मक कार्रवाई होती है तो वे अपनी पहचान ‘हिन्दी भाषी' के रूप में उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार मुम्बई में रहने वाले भोजपुरी, मगही, मैथिली एवं अवधि आदि बोलने वाले अपनी पहचान ‘हिन्दी भाषी' के रूप में करते हैं। )

5. पहाड़ी - ‘आधुनिक भारतीय भाषाओं का वर्गीकरण' के अन्तर्गत डॉ. सर जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण के संदर्भ में इसका उल्लेख किया जा चुका है कि ग्रियर्सन ने ‘पहाड़ी' समुदाय के अन्तर्गत बोले जाने वाले भाषिक रूपों को तीन शाखाओं में बाँटा - पूर्वी पहाड़ी अथवा नेपाली, मध्य या केन्द्रीय पहाड़ी एवं पश्चिमी पहाड़ी। हिन्दी भाषा के संदर्भ में वर्तमान स्थिति यह हेै कि हिन्दी भाषा के अन्तर्गत मध्य या केन्द्रीय पहाड़ी की उत्तराखंड में बोली जाने वाली 1. कूमाऊँनी 2.गढ़वाली तथा पश्चिमी पहाड़ी की हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली हिन्दी की अनेक बोलियाँ आती हैं जिन्हें आम बोलचाल में ‘ पहाड़ी ' नाम से पुकारा जाता है।

हिन्दी भाषा के संदर्भ में विचारणीय है कि अवधी, बुन्देली, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली आदि को हिन्दी भाषा की बोलियाँ माना जाए अथवा उपभाषाएँ माना जाए। सामान्य रूप से इन्हें बोलियों के नाम से अभिहित किया जाता है किन्तु लेखक ने अपने ग्रन्थ ‘ भाषा एवं भाषाविज्ञान' में इन्हें उपभाषा मानने का प्रस्ताव किया है। ‘ - - क्षेत्र, बोलने वालों की संख्या तथा परस्पर भिन्नताओं के कारण इनको बोली की अपेक्षा उपभाषा मानना अधिक संगत है। ( भाषा एवं भाषाविज्ञान, पृष्ठ 60)

इसी ग्रन्थ में लेखक ने पाठकों का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि हिन्दी की कुछ उपभाषाओं के भी क्षेत्रगत भेद हैं जिन्हें उन उपभाषाओं की बोलियों अथवा उपबोलियों के नाम से पुकारा जा सकता है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इन उपभाषाओं के बीच कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। प्रत्येक दो उपभाषाओं के मध्य संक्रमण क्षेत्र हैं।

विश्व की प्रत्येक विकसित भाषा के विविध बोली अथवा उपभाषा क्षेत्रों में से विभिन्न सांस्कृतिक कारणों से जब कोई एक क्षेत्र महत्वपूर्ण हो जाता है तो उस क्षेत्र के भाषा रूप का सम्पूर्ण भाषा क्षेत्र में प्रसारण होने लगता है। इस क्षेत्र के भाषारूप के आधार पर पूरे भाषाक्षेत्र की ‘मानक भाषा' का विकास होना आरम्भ हो जाता है। भाषा के प्रत्येक क्षेत्र के निवासी इस भाषारूप को ‘मानक भाषा' मानने लगते हैं। भाषा के प्रत्येक क्षेत्र के निवासी भले ही इसका उच्चारण नहीं कर पाते, फिर भी वे इसको सीखने का प्रयास करते हैं, इसको मानक मानने के कारण यह मानक भाषा रूप ‘भाषा क्षेत्र' के लिए सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक बन जाता है। मानक भाषा रूप की शब्दावली, व्याकरण एवं उच्चारण का स्वरूप अधिक निश्चित एवं स्थिर होता है एवं इसका प्रचार, प्रसार एवं विस्तार पूरे भाषा क्षेत्र में होने लगता है। कलात्मक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम एवं शिक्षा का माध्यम यही मानक भाषा रूप हो जाता है। इस प्रकार भाषा के ‘मानक भाषा रूप' का आधार उस भाषाक्षेत्र की क्षेत्रीय बोली अथवा उपभाषा ही होती है, किन्तु मानक भाषा होने के कारण इसका प्रसार अन्य बोली क्षेत्रों अथवा उपभाषा क्षेत्रों में होने लगता है। इस प्रसार के कारण इस भाषारूप पर ‘भाषा क्षेत्र' की सभी बोलियों का प्रभाव भी पड़ता है तथा यह भी सभी बोलियों अथवा उपभाषाओं को प्रभावित करता है। उस भाषा क्षेत्र के शिक्षित व्यक्ति औपचारिक अवसरों पर इसका प्रयोग करते हैं। भाषा के मानक भाषा रूप को सामान्य व्यक्ति अपने भाषा क्षेत्र की ‘मूल भाषा', केन्द्रक भाषा', ‘मानक भाषा' के नाम से पुकारते हैं। यदि किसी भाषा का क्षेत्र हिन्दी भाषा की तरह विस्तृत होता है तथा यदि उसमें ‘हिन्दी भाषा क्षेत्र' की भॅांति उपभाषाओं एवं बोलियों की अनेक परतें एवं स्तर होते हैं तो ‘मानक भाषा' के द्वारा समस्त भाषा क्षेत्र में विचारों का आदान प्रदान सम्भव हो पाता है, संप्रेषणीयता सम्भव हो पाती है। भाषा क्षेत्र के यदि अबोधगम्य उपभाषी अथवा बोली बोलने वाले परस्पर अपनी उपभाषा अथवा बोली के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान नहीं कर पाते तो इसी मानक भाषा के द्वारा संप्रेषण करते हैं। भाषा विज्ञान में इस प्रकार की बोधगम्यता को ‘पारस्परिक बोधगम्यता' न कहकर ‘एकतरफ़ा बोधगम्यता' कहते हैं। एर्सी स्थिति में अपने क्षेत्र के व्यक्ति से क्षेत्रीय बोली में बातें होती हैं किन्तु दूसरे उपभाषा क्षेत्र अथवा बोली क्षेत्र के व्यक्ति से अथवा औपचारिक अवसरों पर मानक भाषा के द्वारा बातचीत होती हैं। इस प्रकार की भाषिक स्थिति को फर्गुसन ने बोलियों की परत पर मानक भाषा का अध्यारोपण कहा है (Ferguson: Diglossia: Word,15 pp. 325 - 340) तथा गम्पर्ज ने इसे ‘बाइलेक्टल' के नाम से पुकारा है। ( Gumperz: Speech variation and the study of Indian civilization, American Anthropologist, Vol. 63, pp. 976 - 988)

हम यह कह चुके हैं कि किसी भाषा क्षेत्र की मानक भाषा का आधार कोई बोली अथवा उपभाषा ही होती है किन्तु कालान्तर में उक्त बोली एवं मानक भाषा के स्वरूप में पर्याप्त अन्तर आ जाता है। सम्पूर्ण भाषा क्षेत्र के शिष्ट एवं शिक्षित व्यक्तियों द्वारा औपचारिक अवसरों पर मानक भाषा का प्रयोग किए जाने के कारण तथा साहित्य का माध्यम बन जाने के कारण स्वरूपगत परिवर्तन स्वाभाविक है। प्रत्येक भाषा क्षेत्र में किसी क्षेत्र विशेष के भाषिक रूप के आधार पर उस भाषा का मानक रूप विकसित होता है, जिसका उस भाषा-क्षेत्र के सभी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे व्यक्ति औपचारिक अवसरों पर प्रयोग करते हैं। पूरे भाषा क्षेत्र में इसका व्यवहार होने तथा इसके प्रकार्यात्मक प्रचार-प्रसार के कारण विकसित भाषा का मानक रूप भाषा क्षेत्र के समस्त भाषिक रूपों के बीच संपर्क सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है। प्रत्येक देश की एक राजधानी होती है तथा विदेशों में किसी देश की राजधानी के नाम से प्रायः देश का बोध होता है, किन्तु सहज रूप से समझ में आने वाली बात है कि राजधानी ही देश नहीं होता।

हिन्दी भाषा का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। इस कारण इसकी क्षेत्रगत भिन्नताएँ भी बहुत अधिक हैं।‘खड़ी बोली' हिन्दी भाषा क्षेत्र का उसी प्रकार एक भेद है, जिस प्रकार हिन्दी भाषा के अन्य बहुत से क्षेत्रगत भेद हैं। हिन्दी भाषा क्षेत्र में ऐसी बहुत सी उपभाषाएँ हैं जिनमें पारस्परिक बोधगम्यता का प्रतिशत बहुत कम है, किन्तु ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पूर्ण भाषा क्षेत्र एक भाषिक इकाई है तथा इस भाषा-भाषी क्षेत्र के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने क्षेत्रगत भेदों को हिन्दी भाषा के रूप में मानते एवं स्वीकारते आए हैं। भारत के संविधान की दृष्टि से यही स्थिति है। सन् 1997 में भारत सरकार के सैन्सस ऑफ इण्डिया द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ में भी यही स्थिति है। वस्तु स्थिति यह है कि हिन्दी, चीनी एवं रूसी जैसी भाषाओं के क्षेत्रगत प्रभेदों की विवेचना यूरोप की भाषाओं के आधार पर विकसित पाश्चात्य भाषाविज्ञान के प्रतिमानों के आधार पर नहीं की जा सकती।

अपने 28 राज्यों एवं 07 केन्द्र शासित प्रदेशों को मिलाकर भारतदेश है, उसी प्रकार भारत के जिन राज्यों एवं शासित प्रदेशों को मिलाकर हिन्दी भाषा क्षेत्र है, उस हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अन्तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उनकी समाष्टि का नाम हिन्दी भाषा है। हिन्दी भाषा क्षेत्र के प्रत्येक भाग में व्यक्ति स्थानीय स्तर पर क्षेत्रीय भाषा रूप में बात करता है। औपचारिक अवसरों पर तथा अन्तर-क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं सार्वदेशिक स्तरों पर भाषा के मानक रूप अथवा व्यावहारिक हिन्दी का प्रयोग होता है। आप विचार करें कि उत्तर प्रदेश हिन्दी भाषी राज्य है अथवा खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी, अवधी, बुन्देली आदि भाषाओं का राज्य है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश हिन्दी भाषी राज्य है अथवा बुन्देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का राज्य है। जब संयुक्त राज्य अमेरिका की बात करते हैं तब संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्तर्गत जितने राज्य हैं उन सबकी समष्टि का नाम ही तो संयुक्त राज्य अमेरिका है। विदेश सेवा में कार्यरत अधिकारी जानते हैं कि कभी देश के नाम से तथा कभी उस देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा होती है। वे ये भी जानते हैं कि देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा भले ही होती है, मगर राजधानी ही देश नहीं होता। इसी प्रकार किसी भाषा के मानक रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक रूप होता है : मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। इसी प्रकार खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्दी का विकास अवश्य हुआ है किन्तु खड़ी बोली ही हिन्दी नहीं है। तत्वतः हिन्दी भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उन सबकी समष्टि का नाम हिन्दी है। हिन्दी एक विशाल भाषा है। विशाल क्षेत्र की भाषा है। अब यह निर्विवाद है कि चीनी भाषा के बाद हिन्दी संसार में दूसरे नम्बर की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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  1. महावीर सरन जी की यह विद्वतापूर्ण कृति देश एवं काल (टाइम एण्ड स्पेस) के सापेक्ष हिन्दी का इतिहास ही है। बहुत ज्ञानवर्धक। अन्तरजाल पर इसके आ जाने से इसके विस्तार की खिड़की भी खुल गयी है।

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