रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

महावीर सरन जैन की किताब : हिंदी की अन्तर-क्षेत्रीय, सार्वदेशीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका – अध्याय 3 – हिंदी भाषा की अन्तरदेशीय भूमिका

अध्याय 3.

हिन्दी भाषा की अन्तरदेशीय भूमिका

ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक-समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है जो हिन्दी के सार्वदेशिक व्यवहार का प्रमाण है। भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है।

स्वाधीनता के लिए जब-जब आन्दोलन तीव्र हुआ, तब-तब हिन्दी की प्रगति का रथ भी तीव्र गति से आगे बढ़ा। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गई। हिन्दी को राष्ट्रभाषा की मान्यता उन नेताओं के कारण प्राप्त हुई जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व जिन नेताओं के हाथों में था उन्होंने यह पहचान लिया था कि विगत 600-700 वर्षों से हिन्दी सम्पूर्ण भारत की एकता का कारक रही है, यह संतों, फकीरों, व्यापारियों, तीर्थ यात्रियों, सैनिकों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग तक प्रयुक्त होती रही है। बंगाल के केशवचन्द्र सेन, राजा राम मोहन राय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, पंजाब के बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, गुजरात के स्वामी दयानन्द, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, महाराष्ट के लोकमान्य तिलक तथा दक्षिण भारत के सुब्रह्मण्यम भारती, मोटूरि सत्यनारायण आदि नेताओं के राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्बंध में व्यक्त विचारों से मेरे मत की संपुष्टि होती है।

जब संविधान सभा ने देश की राजभाषा के सम्बन्ध में विचार किया तब तक राष्ट्रीय चेतना की धारा का प्रवाह इतना तेज था कि संविधान सभा ने एकमतेन हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया। संविधान सभा में इस विषय पर कोई मतभेद कभी नहीं हुआ कि संघ की राजभाषा हिन्दी को बनाया जाए अथवा नहीं। बहस का मुद्दा कभी भी यह नहीं रही कि संघ की राजभाषा हिन्दी को बनाया जाए अथवा अंग्रेजी को। दिनांक 8 नवम्बर, 1948 को देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ‘ ने एक अखिल भारतीय भाषा की आवश्यकता ' पर बल देते हुए यह स्पष्ट कहा कि एक स्वतंत्र देश को अपनी ही भाषा में राजकाज चलाना चाहिए तथा यह भाषा अन्तत: जनता के मध्य से ही विकसित होगी (कान्स्टीट्यून्ट एसेम्बली डिबेट्स, दिनांक 8 - 11 - 1948)। बहस के मुद्दे रहे कि (1) अंग्रेजी के चलते रहने की अवधि 10 वर्ष रखी जाए अथवा 15 वर्ष (2) हिन्दी का स्वरूप कैसा हो (3) अंक देवनागरी के नागरी अंक हों अथवा अन्तरराष्ट्रीय हों। 26 अगस्त,1949 को इस विषय पर काफी बहस हुई जिसमें मुख्य मुद्दा अंकों का था। मतदान में समान मत पड़े। यह मत विभाजन इतना चर्चित हुआ कि बाद में अंग्रेजी के कुछ विद्वानों ने यह मिथक गढ़ दिया कि संविधान सभा में इस विषय पर बहस हुई कि संघ की राजभाषा हिन्दी हो अथवा अंग्रेजी हो। वास्तव में संविधान सभा ने एकमतेन अर्थात सर्वसम्मति से संघ की राजभाषा हिन्दी को स्वीकार किया।

14 सितम्बर,1949 को भारी तालियों की गड़गड़ाहट में ‘ मुंशी - आयंगर' फार्मूला स्वीकार करते हुए जब हिन्दी राजभाषा के पद पर एकमतेन प्रतिष्ठित हुई तो सभा के अध्यक्ष ने अपने जो उद्गार व्यक्त किया वह तत्कालीन सभा के सदस्यों के मनोभावों को आत्मसात करने का लिखित दस्तावेज है: ‘आज पहली बार हम अपने संविधान में एक भाषा स्वीकार कर रहें हैं जो भारत संघ के प्रशासन की भाषा होगी। - - - हमने अपने देश का राजनैतिक एकीकरण सम्पन्न किया है। राजभाषा हिन्दी देश की एकता को कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिक सुदृढ़ बना सकेगी। अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषा को स्थापित करने से हम निश्चय ही और भी एक दूसरे के नज़दीक आयेंगे।'

किस प्रकार विभिन्न हिन्दीतर क्षेत्रों के नेताओं ने हिन्दी के राष्ट्रीय महत्व का आकलन किया तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा माना तथा इसके प्रचार प्रसार में अपना योगदान दिया - इस सम्बंध में विपुल सामग्री उपलब्ध है। इस दृष्टि से भी प्रचुर सामग्री उपलब्ध है कि हिन्दी में उन रचनाकारों, साहित्यकारों, अनुसंधानकर्ताओं एवं प्रचारकों का कितना योगदान है जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है।
केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा जनवरी 2001 में भारत व्यापी हिन्दी के स्वरूप के सर्वेक्षण पर आधारित परियोजना का जो प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ है उससे यह प्रमाणित है कि हिन्दीतर द्विभाषिक समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करते हैं। प्रतिवेदन ‘ भारतीय बहुभाषिक परिवेश और हिन्दी ' शीर्षक से प्रकाशित है। इसका महत्व व्यवहारिक हिन्दी भाषा के सम्पूर्ण भारत में प्रसार एवं व्यवहार को रेखांकित करने की दृष्टि से बहुत अधिक है। हिन्दी के विद्वानों को इस शुरुआत को आगे बढाना चाहिए।
---
(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)
विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

yeh pustak kahan uplabdh hogi ! kripya batayen! jaankari poorn rachna ! agli kadi ka intjaar rahega !

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget