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महावीर सरन जैन की किताब : हिंदी की अन्तर-क्षेत्रीय, सार्वदेशीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका – अध्याय 4

(अध्याय 3 से जारी…)

अध्याय 4.

विदेशी विद्वानों द्वारा हिन्दी वाङ्मीमांसापरक अध्ययन

(फिलॉलाजिकल स्टडीज) (सन् 1940 ईस्वी तक)

अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में केवल ब्रिटिश नागरिक ही नहीं आए; हालैण्ड, जर्मनी, फ्रांस, रूस एवं अमेरिका आदि देशों के नागरिक भी आए। आगत विदेशी पादरियों, कर्मचारियों, प्रशासकों में से बहुत से विदेशियों ने श्रम एवं निष्ठपूर्वक हिन्दी सीखी तथा हिन्दी सीखकर हिन्दी की पाठ्य पुस्तकों, हिन्दी के व्याकरणों एवं कोशों का निर्माण किया। उनके अध्ययन आज के भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं पद्धति के अनुरूप भले ही न हों किन्तु हिन्दी भाषा के वाड्.मीमांसापरक अध्ययन की दृष्टि से उनका ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। इन विदेशी विद्वानों में डॉ0 हार्नले, डॉ0 ग्रियर्सन तथा डॉ0 टर्नर जैसे प्रख्यात एवं मेधावी भाषाविद् भी हैं। इनके कार्यों से न केवल हिन्दी भाषा का विकास हुआ अपितु भारतीय आर्यभाषाओं की अध्ययन -परम्परा का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। भारत विद्या के क्षेत्र में कार्य करने वाले विदेशी विद्वानों की संख्या शताधिक है। आगे हिन्दी वाड्.मीमांसा के प्रमुख विदेशी विद्वानों एवं उनकी कृतियों का काल क्रमानुसार परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है :-

1. जान जेशुआ केटलेर (1659-1718)

डच भाषी केटलेर व्यापार के लिए सूरत शहर में आए। व्यापार के लिए इन्हें सूरत से दिल्ली, आगरा और लाहौर आना पड़ता था। भारत आने के बाद इन्होंने हिन्दी सीखी तथा अपने देश के लोगों के लिए डच भाषा में हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण लिखा। इस डच मूल की नकल इसाक फान दर हूफ (Isaac Van der Hoeve) नामक हॉलैण्डवासी ने सन् 1698 ईसवी में की। इसका अनुवाद दावीद मिल ने लैटिन भाषा में किया। हॉलैण्ड के लाइडन नगर से लैटिन भाषा में सन् 1743 ईस्वी में यह पुस्तक प्रकाशित हुई। इस प्रकाशित पुस्तक की एक प्रति कोलकता की नेशनल लाईब्रेरी में उपलब्ध है।

इस व्याकरण का विवरण सर्वप्रथम डॉ0 ग्रियर्सन ने प्रस्तुत किया :-

‘‘अब हम पहले हिन्दुस्तानी व्याकरण पर आते हैं। जान जेशुआ केटलेर(यह कोटलर, केसलर तथा केटलर भी लिखा जाता है) धर्म से लूथरन थे। इन्होंने शाह आलम बहादुर शाह तथा जहाँदरशाह से डच प्रतिनिधि के रूप में मान्यता प्राप्त की थी।'' (1)

डॉ0 ग्रियर्सन ने अनुमान के आधार पर इसका रचनाकाल सन् 1715 माना है किन्तु वास्तव में इसका रचनाकाल सन् 1698 के पूर्व का है।

डॉ0 सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने अपने निबंध संग्रह ‘ऋतम्भरा' में इस कृति के

सम्बन्ध में परिचय एवं विवरण प्रस्तुत किया। डॉ0 चाटुर्ज्या के लेख का शीर्षक है - ‘हिन्दुस्तानी का सबसे प्राचीन व्याकरण'। डॉ0 चाटुर्ज्या का इसके रचनाकाल के सम्बन्ध में अभिमत है -

‘‘हालैंड के लाइडन नगर में कर्न इंस्टीट्यूट् नामक एक नवीन सभा है। यह भारत तथा बृहत्तर भारत की संस्कृति की आलोचना के लिए स्थापित की गई है। उसके मुख्य अधिष्ठाता स्वनामधन्य पंडित डाक्टर फांॅगल ने स्वयं एक पत्र लिखकर केटलेर के व्याकरण के विषय में बहुत कुछ तथ्य बताये हैं। उनसे पता चलता है कि केटलेर ने हिन्दुस्तानी और फारसी दोनों भाषाओं के व्याकरण डच भाषा में लिखे थे। डच मूल की एक नकल इसाक फान दर हूफ (Isaac Van der Hoeve) नामक हालैंडवासी ने सन् 1698 ई0 में लखनऊ में की थी। यह पुस्तक हालैण्ड के हाग (Hague) नगर के पुराने राजकीय पत्रों के संग्रहालय में सुरक्षित है।'' (2)

प्रस्तुत लेखक ने जुलाई 1985 में नीदरलैण्ड्स की यात्रा के दौरान पुस्तक की प्रति का अवलोकन किया। प्रति का मुख पृष्ठ निम्न है :-

"instructe off onderwij singe der hindostane en persianse talen nevens hare declinatie en conjugative etc. door joan josua katelaar, Ellingensem en Gekopiert door Isaacq Van Der Hoeve Van Utreght tot Gechenawe A. 1698.

हिन्दी के कुछ विद्धानों में यह भ्रान्त धारणा है कि केटलेर ने इस व्याकरण की रचना सूरत के आसपास व्यापारी वर्ग में प्रचलित हिन्दी के आधार पर की थी। इस भ्रान्त धारणा का निराकरण हिन्दी में सर्वप्रथम डॉ0 उदयनारायण तिवारी एवं श्री मैथ्यु वेच्चुर ने किया। इस कृति के सम्बन्ध में डॉ0 उदयनारायण तिवारी के विचार प्रस्तुत करना समीचीन होगा :-

‘‘............... केटलेर कृत ‘‘हिन्दुस्तानी भाषा'' की रचना आगरे में हुई थी। अतएव इस पर ब्रजभाषा एवं पश्चिमी हिन्दी का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।........ केटलेर का व्याकरण अति संक्षिप्त है। यह लगभग 30 पृष्ठों का है किन्तु इसमें हिन्दी सीखने वालों के लिए प्रायः सभी आवश्यक बातों का समावेश है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसमें अति प्रयुक्त क्रियाओं की रूपरेखा, ‘कालरचना-सारिनी' सहित, दी गई है। पुस्तक के अन्त में प्रार्थनाओं का हिन्दुस्तानी अनुवाद भी दिया गया है। इनमें ‘‘दस नियम', ‘‘प्रेरितों का विश्वास'', और ‘‘हे पिता'' के अनुवाद उपलब्ध हैं। जैसा मैंने ऊपर कहा है, इन गद्यांशों में आगरे की हिन्दी या खड़ी बोली का आरम्भिक रूप देखा जा सकता है और उस पर ब्रज-भाषा का प्रभाव भी दिखाई पड़ता है।(3)

श्री मैथ्यु वेच्चूर ने कोलकता की नेशनल लाइब्रेरी में इस कृति के लैटिन अनुवाद को आधार बनाकर इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया है। (4)

इसकी भाषा में कहीं-कहीं अशुद्ध रूप मिलते हैं जैसे ‘‘मैं'' के स्थान पर ‘‘मे'', ‘‘तुम्हारा'' के स्थान पर ‘‘तोम्मारा'' तथा ‘‘तुम'' के स्थान पर ‘‘तोम''। ‘ने' परसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है। ‘‘इसने'' के स्थान पर ‘‘इन्ने'', ‘‘मुझको'' के स्थान पर ‘‘मुकों (मोकों), ‘‘नहीं'' के स्थान पर ‘‘नई'' का प्रयोग हुआ है जो आगरे में बोली जाने वाली स्थानीय हिन्दी के प्रभाव का द्योतक है। अनूदित प्रार्थनाओं में से एक उदाहरण प्रस्तुत है, ‘‘मे है साहेब तोम्मारा अल्ला, वह जो तोम एजिप्ति गुलामी से निकाल ले गया, तोम और अल्लाहे मेरा बराबर मत लीजियो।'' (मैं प्रभु तुम्हारा ईश्वर हूँ, जो तुम्हे मिस्र देश की दासता से निकालकर ले आया, मेरे सिवाय तुम और किसी ईश्वर को न मानना)

2. बेंजामिन शूल्ज़ : ग्रामाटिका हिन्दोस्तानिका

डेनिश भाषी डॉ0 शूल्ज़ प्रोटेस्टेन्ट मिशनरी थे। ये पहले तमिलनाडु में कार्यरत थे, बाद में हैदराबाद आ गए। आपकी मृत्यु सन् 1760 ई0 में जर्मनी के हाले नगर में हुई। कार्य करते हुए इनको दायित्व-बोध हुआ कि भारत में आने वाले मिशनरियों को हिन्दुस्तानी भाषा से अवगत कराना चाहिए। हिन्दुस्तानी भाषा के सम्बन्ध में लेखक ने अपनी भूमिका में लिखा, ‘‘यह भाषा अपने आप में बहुत ही सरल है। मैं जब यह भाषा सीखने लगा तो मुझे अत्यधिक कठिनाई का अनुभव हुआ ............. लेकिन इस भाषा को सीखने की तीव्र इच्छा के कारण लगातार दो महीने के परिश्रम के फलस्वरूप सारी कठिनाई जाती रही। आरम्भ में ही मैंने इस भाषा के ज्ञान की आवश्यक बातों, विशेष रूप से शब्द-क्रम को लिख लिया था। धीरे-धीरे एक व्याकरण की सामग्री एकत्र हो गयी। बाद में इसे क्रमानुसार सजाकर पुस्तक का रूप दिया गया।'' (5)

शूल्ज़ ने अपना व्याकरण लैटिन भाषा में लिखा। भूमिका की तिथि 30 जून सन् 1741 ई0 है। प्रकाशन तिथि 30 जनवरी 1745 ई0 है।

इस व्याकरण में कुल छह अध्याय हैं। अध्याय एक में वर्णमाला से सम्बन्धित विचार हैं। इसी अध्याय में लेखक ने हिन्दुस्तानी भाषा के सम्बन्ध में तमिल भाषियों की इस मान्यता का प्रतिपादन किया है कि हिन्दुस्तानी भाषा या देवनागरम सारी भाषाओं की माता है। अध्याय दो में संज्ञा एवं विशेषण, अध्याय तीन में सर्वनाम, अध्याय चार में क्रिया, अध्याय पांच में अव्यय (परसर्ग, क्रिया विशेषण, समुच्चय बोधक, विस्मयादि बोधक) तथा अध्याय छह में वाक्य रचना का विवेचन है। परिशिष्ट में प्रेरितों के विश्वास की प्रार्थना, खावंद की बंदगी, बपतिसमा, खावंद की रात की हाजिरी, दस नियम, हे पिता प्रार्थना का विश्लेषण आदि हिन्दुस्तानी भाषा में दिए गए हैं जिस पर हैदराबाद में उस समय बोली जाने वाली दक्खिनी हिन्दी का प्रभाव परिलक्षित है। शब्दों को रोमन लिपि एवं फारसी लिपि में दिया गया है।

डॉ0 ग्रियर्सन ने इस रचना के सम्बन्ध में लिखा है :-

‘‘............... इसका पूरा शीर्षक है Benjamini Schulzii, Grammatica, Hindostanica, .................. व्याकरण लैटिन में है। हिन्दुस्तानी शब्द फारसी-अरबी लिपि में अनुवाद सहित दिये गये हैं। ..........उन्होंने मूर्धन्य वर्णों की ध्वनियों को और अपने अनुवाद में महाप्राणों को छोड़ दिया है। वे पुरूषवाचक सर्वनामों के एकवचन एवं बहुवचन रूपों से परिचित हैं, किन्तु सकर्मक क्रियाओं के भूतकालों के साथ प्रयुक्त होने वाले ‘‘ने'' के प्रयोग से अनभिज्ञ हैं।''(6)

लेखक ने कर्मकारक एवं सम्प्रदान कारक का रूप ‘‘कुँ'' माना है जो दक्खिनी हिन्दी के प्रभाव के कारण है।

हुमाकुं (हमको, हमारे लिए), मिझकुं (मुझे, मेरे लिए)। इसी प्रकार ‘‘तुझकुं'' ‘‘कौन कुं'' ‘‘उन कुं'' ‘‘इनकुं'' ‘‘इसकुं'' ‘‘किन कुं'' ‘‘कोई कुं'' आदि रूप दिए गए हैं।

इस पुस्तक से एक उदाहरण प्रस्तुत है :-

‘‘छोटा भाई भाग गया कको हमारा बाप मिझकुं मालूम किये।''

(हमारे पिता ने मुझे समझाया (मालूम कराया) कि छोटा भाई भाग गया।)

3. कैसियानो बेलिगत्ती : अल्फाबेतुम ब्रम्हानिकुम

आप कैथलिक कैपूचिन मिशनरी इटली के मचेराता नगर के रहने वाले थे। आरम्भ में इन्होंने तिब्बत में कार्य किया था। बाद में नेपाल होकर बिहार के बेतिया नगर में आ बसे। इन्होंने पटना में भी धर्म प्रचार का कार्य किया। पटना में रहकर इन्होंने ‘‘अल्फाबेतुम ब्रम्हानिकुम' का लैटिन भाषा में प्रणयन किया। इसका प्रकाशन सन् 1771 ई0 में हुआ। इसकी विशेषता यह है कि इसमें नागरी के अक्षर एवं शब्द सुन्दर टाइपों में मुद्रित हैं। ग्रियर्सन के अनुसार यह हिन्दी वर्णमाला सम्बन्धी श्रेष्ठ रचना है :-

"taking it together, the Alphabetum Brammhanicum is, for its time, a wonderfully good piece of work." (7)

अध्याय एक में स्वर, अध्याय दो में मूल व्यंजन, अध्याय तीन में व्यंजनों के उच्चारण के विशेष विवरण, अध्याय चार में व्यंजनों के साथ स्वरों का संयोग, अध्याय पाँच में स्वर-संयुक्त व्यंजन, अध्याय छह में संयुक्ताक्षर और उनके नाम, अध्याय सात में संयुक्ताक्षर की तालिका, अध्याय आठ में किस प्रकार हिन्दुस्तानी कुछ अक्षरों की कमी पूरी करते हैं, अध्याय नौ में नागरी या जनता की वर्णमाला, अध्याय दस में हिन्दुतानी वर्णमाला की लैटिन वर्णमाला के क्रम और उच्चारण के साथ तुलना, अध्याय ग्यारह में अरबी अंको के साथ हिन्दुस्तानी अंको और अक्षरों में संख्याएं तथा अध्याय बारह में

अध्येताओं के अभ्यास के लिए कुछ प्रार्थनाएं भी ‘‘हिन्दुस्तानी लिपि'' में दी गई हैं। इसमें लैटिन प्रार्थनाओं का ‘‘हिन्दुस्तानी लिपि'' में केवल लिप्यंतरण मिलता है। अंत में हिन्दुस्तानी भाषा में ‘‘हे पिता'' आदि प्रार्थनाएं अनूदित हैं।

अध्याय नौ के अंतर्गत जनता की वर्णमाला पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने लिखा है :-

‘‘यहाँ जनता के ‘‘नागरी'' वर्णों के सम्बन्ध में कुछ कहना शेष रह गया है। यह वर्णमाला साधारणतः घरेलू पत्रों, साधारण पुस्तकों, राजनीतिक या धार्मिक बातों को लिखने के लिए प्रयुक्त होती है। इसे यहाँ की बोली में ‘‘भाखा बोली'' कहते हैं। इसमें केवल चौंतालीस वर्ण हैं।'' (8)

इस रचना की भूमिका इटली की राजधानी रोम में क्रिश्चियन धर्म के प्रचारार्थ संस्था ‘‘प्रोपगन्दा फीदे'' के अध्यक्ष योहन ख्रिस्तोफर अमादुसी ने लिखी। डॉ0 जार्ज ग्रियर्सन ने इस भूमिका को बहुत महत्व दिया। (9)

भूमिका में हिन्दुस्तानी भाषा की सार्वदेशिक व्यवहार की भूमिका स्पष्ट रूप में प्रतिपादित है :-

‘‘हिन्दुस्तानी भाषा जो नागरी लिपियों में लिखी जाती है, पटना के आसपास ही नहीं बोली जाती अपितु विदेशी यात्रियों द्वारा भी, जो या तो व्यापार या तीर्थाटन के लिए भारत आते हैं, प्रयुक्त होती है। हम इसके लिए यह कह सकते हैं कि यह भारत की माध्यम-भाषा (linqua media) है।''(10)

इस भूमिका से यह स्पष्ट है कि सन् 1771 ई0 में भी नागरी लिपि में लिखी जनभाषा हिन्दी या हिन्दुस्तानी का राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार था। जो विदेशी उस समय भारत में व्यापार करने के लिए अथवा घूमने फिरने के लिए आते थे, वे भारत आने के पूर्व इसको सीखते थे तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसके माध्यम से अपना कार्य सम्पन्न करते थे।

इन तीन रचनाकृतियों का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। इनके समेकित महत्व की डॉ0 उदय नारायण तिवारी ने सारगर्भित विवेचना की है :-

‘‘यह तीनों कृतियाँ, दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक और सन् 1650 से लेकर 1800 तक, प्रचलित हिन्दी के रूप को हमारे समक्ष प्रकट करती हैं। हम इन तीनों विदेशी लेखकों के प्रति अत्यधिक कृतज्ञ हैं।

इन्होंने इन व्याकरणों को लिखने में जो प्रयास किया है वह वास्तव में स्तुत्य है। चूंकि ये कृतियाँ आरम्भिक हैं अतएव इनमें त्रुटियां स्वाभाविक हैं। किन्तु इन्हें तैयार तथा प्रस्तुत करने में इन विदेशी विद्वानों को कितना कठिन परिश्रम करना पड़ा होगा, इसका अनुमान भी आज सहज नहीं है।'' (11)

इन तीनों रचनाओं को श्री मैथ्यु वेच्चुर ने लैटिन से हिन्दी में अनुदित किया है। उनकी सेवाएं भी प्रशंसनीय हैं। (12)

आगे शेष विदेशी विद्धानों एवं उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम दिए जा रहे हैं। जहाँ बहुत आवश्यक होगा, वहीं संक्षिप्त टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जाएंगी :-

4. जॉर्ज हेडले : (भारत में निवास सन् 1763-1771) (मृत्यु तिथि सन् 1798 ई0)

ग्रैमेटिकल रिमार्क्स ऑन द प्रैक्टिकल एण्ड वल्गर डाइलेक्ट ऑफ द हिन्दोस्तान लैंग्वेज

यह रचना लन्दन से सन् 1773 में प्रकाशित हुई। डॉ0 ग्रियर्सन ने जार्ज हेडले के इस व्याकरण से हिन्दी व्याकरण परम्परा में एक नवीन युग का आरम्भ माना है।(13) इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए। लखनऊ के मिर्जा मुहम्मद फितरत ने इसमें परिवर्धन एवं संशोधन किया। सन् 1801 ई0 में लन्दन से इसका परिवर्धित एवं संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ। इस संस्करण के भी कई अन्य संस्करण बाद के वर्षों में प्रकाशित हुए।

(5) जॉन फर्गुसन : ए डिक्शनरी ऑफ द हिन्दुस्तान लैंग्वेज

यह कोश ‘हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी' एवं ‘अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी' क्रम से है। इसका प्रकाशन भी लन्दन से सन् 1773 ई0 में हुआ।

(6) जॉन बार्थविक गिलक्राइस्ट : (1759-1841)

(i) इंग्लिश-हिन्दुस्तानी डिक्शनरी, कलकत्ता (1787)

(ii) हिन्दुस्तानी ग्रामर (1796)

गिलक्राइस्ट का महत्व इस दृष्टि से बहुत अधिक है कि शिक्षा माध्यम के रूप में इन्होंने हिन्दी का महत्व पहचाना। माक्विस बेलेज़ली ने अपने गर्वनर जनरल के कार्यकाल (1798-1805) में अंग्रेज प्रशासकों तथा कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने तथा उन्हें भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए कलकत्ता में 4 मई सन् 1800 ई0 को फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। सन् 1800 में कालेज के हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष के रूप में गिलक्राइस्ट को नियुक्त किया गया। आप ईस्ट इंडिया कम्पनी में सहायक सर्जन नियुक्त होकर आए थे। उत्तरी भारत के कई स्थानों में रहकर इन्होंने भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। सन् 1800 ई0 में ही गिलक्राइस्ट के सहायक के रूप में लल्लू लाल की नियुक्ति सर्टिफिकेट मुंशी के पद पर हुई। गिलक्राइस्ट ने हिन्दी में पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने की दिशा में प्रयास किया। गिलक्राइस्ट ने भारत में बहुप्रयुक्त भाषा रूप को ‘खड़ी बोली' की संज्ञा से अभिहित किया। ‘खड़ी बोली' को अपने भारत की खालिस या खरी बोली माना है। गिलक्राइस्ट ने इसको ‘प्योर स्टर्लिंग' माना तथा अपने कोश में Sterling का अर्थ किया है - Standard, Genuine. इसी भाषा रूप में गिलक्राइस्ट ने लल्लूलाल को लिखने का निर्देश प्रदान किया। लल्लूलाल ने अपने ग्रन्थ ‘प्रेमसागर' की भूमिका में लिखा है :-

‘‘ श्रीयुत गुनगाहक गुनियन-सुखदायक जान गिलकिरिस्त महाशय की आज्ञा से सम्वत् 1860 (अर्थात् सन् 1803 ई0) में श्री लल्लू जी लाल कवि ब्राह्मन गुजराती सहस्र अवदीच आगरे वाले ने जिसका सार ले, यामिनी भाषा छोड़, दिल्ली आगरे की खड़ी बोली में कह, नाम ‘प्रेमसागर' धरा''।(14)

7. हेनरी हैरिस : डिक्शनरी : इंगलिश एण्ड हिन्दूस्तानी, मद्रास (1790)

8. हेरासिम स्तेपनोविच लेबिदोव (1749-1820)

जैसा कि इनके नाम से स्पष्ट है कि ये रूसी भाषी थे। आप सन् 1785 से सन् 1800 ई0 की अवधि में भारत में रहे। भारत में रहकर इन्होंने हिन्दी सीखी तथा हिन्दी का व्याकरण तैयार किया। इनका व्याकरण अपेक्षाकृत अधिक प्रमाणिक है। सन् 1801 ई0 में इन्होंने यह व्याकरण अपने व्यय से लन्दन में प्रकाशित कराया। व्याकरण ग्रन्थ का नाम है - ‘ग्रामर ऑफ् द प्योर एण्ड मिक्स्ड ईस्ट इंडियन डाइलेक्ट्स'।

9. कैप्टन जोसेफ टेलर (1793-1835)

इन्होंने ‘हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी' कोश अपने स्वाध्याय के लिए निर्मित किया था। कोश अत्यंत उपयोगी था। फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यापकों ने इसका संशोधन किया। इसका प्रकाशन सन् 1808 में डब्ल्यू हंटर द्वारा कराया गया।

10. विलियम हंटर (1755-1812)

(i) हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी डिक्शनरी, कलकत्ता (1808) (जोसेफ टेलर द्वारा स्वाध्याय के

लिए निर्मित शब्दकोश का सम्पादन)।

(ii) ए कलेक्शन ऑफ् प्रोवर्ब्स : परशियन एण्ड हिन्दुस्तानी (अपूर्ण कृति)

11. जॉन शेक्सपियर : (1774-1858)

(i) विलियम हंटर के कोश का आपने सन् 1808 में संशोधन किया। इसका चतुर्थ संस्करण सन् 1849 ई0 में प्रकाशित हुआ जिसमें ‘हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी' के बाद ‘अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी कोश' भी जोड़ दिया गया।

(ii) ए ग्रामर ऑफ् द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज (1813) - इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए। द्वितीय संस्करण- 1818, तृतीय संस्करण - 1826, चतुर्थ संस्करण - 1843, पंचम संस्करण - 1846 आदि।

(iii) इन्ट्रोडक्शन टु द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज (1845)

12. फ्रांसिस ग्लैडविन - इनकी मृत्यु सन् 1813 ई0 में हुई। इसके पूर्व इनका

फारसी-हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी कोश सन् 1805 ई0 में प्रकाशित हुआ। लेखक को यह कृति

प्राप्त नहीं हो सकी।

13. विलियम प्राइस : (1780-1830)

(i) ए वोकेबुलरी : खुरी बोली एण्ड इंगलिश ऑफ् द प्रिन्सिपल वड्र्स आकरिंग इन द प्रेम सागर ऑफ् लल्लू जी लाल कवि, कलकत्ता (1814) - शब्द नागरी तथा रोमन दोनो लिपियों में दिए गए हैं।

(ii) हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण (1828)

(iii) हिन्दी-हिन्दुस्तानी सलेक्शंस (1828)

14. टामस रोएबक : (1781-1819)

(i) एन इंगलिश एण्ड हिन्दुस्तानी नेवल डिक्शनरी ऑफ् टेक्निकल ट्रम्स एण्ड सी फरेज़िज, कलकत्ता (1811) यह छोटी सी रचना है। इसका महत्व ऐतिहासिक है। इससे हिन्दी के आधुनिक पारिभाषिक कोशों की परम्परा का आरम्भ माना जा सकता है।

(ii) आपने होरिस हेमैन विलसन के साथ मिलकर विलियम हंटर (दे0 क्रम सं0 9) की अपूर्ण कृति को पूर्ण किया। आपकी मृत्यु सन् 1819 ई0 में हो गई थी। आपकी मृत्यु के बाद सी0 स्मिथ ने इसे कलकत्ता से सन् 1824 ई0 में प्रकाशित कराया।

15. होरिस हेमैन विलसन (1786-1860)

इनके योगदान की चर्चा की जा चुकी हैं। (दे0 क्रम सं0 14)

16. पादरी मैथ्यू थामसन एडम (भारत में निवास 1819-1830)

(i) ए ग्रामर ऑफ् हिन्दी लैंग्वेज (हिन्दी भाषा का व्याकरण) (1827)

श्री कामता प्रसाद गुरू ने हिन्दी की सर्वमान्य पुस्तकों में इसे प्रथम स्थान दिया है। (15)

(ii) हिन्दी कोश संग्रह किया हुआ पादरी एडम साहब का, कलकत्ता (1829)

डॉ0 श्याम सुन्दर दास ने इसे देवनागरी अक्षरों में आधुनिक पद्यति का वर्णक्रमानुसार संयोजित पहला एक भाषीय हिन्दी कोश माना है। (16)

17. ऐवरेंड विलियम येट्स (1792-1845)

(i) हिन्दुस्तानी भाषा का परिचय (व्याकरण एवं संक्षिप्त शब्दकोश सहित) (1827)

(ii) हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी कोश, कलकत्ता (1847)

18. चार्ल्स विल्किन्स -

आपकी मृत्यु तिथि सन् 1836 ई0 है। इसके पूर्व आपने भारत में रहकर देवनागरी के वर्णों के टाइप ढलवाने का कार्य कर देश में देवनागरी के टाइप-मुद्रण की नींव रखी।

19. जेम्स राबर्ट बैलन टाइन-

(i) आपकी मृत्यु तिथि सन् 1864 है। इसके पूर्व आपने हिन्दी में वैज्ञानिक शब्दावली की समस्या पर विचार किया। रसायनशास्त्र के एक संदर्भग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद करने के लिए अंग्रेजी पारिभाषिक शब्दावली की समानार्थी हिन्दी शब्दावली का निर्माण किया। शब्दावली निर्माण करते समय आपने संस्कृत को आधार बनाया।

(ii) ब्रजभाषा व्याकरण, लंदन एण्ड एडिनबरा (1839)

(iii) हिन्दुस्तानी व्याकरण, एडिनबरा (1839)

व्याकरणिक अभ्यासों की दृष्टि से पुस्तक का महत्व अधिक है।

20. डंकन फोर्ब्स : (1798-1868)

(i) हिन्दुस्तानी मैनुअल : संक्षिप्त व्याकरण और संक्षिप्त शब्दावली, लन्दन (1845) इसका नवीन संस्करण सन् 1850 ई0 में प्रकाशित हुआ। जॉन टामसन प्लाट्स ने इस पुस्तक को संशोधित किया। संशोधित पुस्तक का प्रकाशन सन् 1874 में हुआ। बाद में, लंदन से ही इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए।

(ii) ए ग्रामर ऑफ् द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज इन द ओरियंटल एण्ड रोमन कैरेक्टर, लंदन (1846)

(iii) ए डिक्शनरी ऑफ् हिन्दुस्तानी एण्ड इंगलिश, लंदन (1847)

21. जोसेफ टी0 थाम्पसन :

(i) डिक्शनरी इन हिन्दी एण्ड इंगलिश, कलकत्ता (1846)

22. एडवर्ड बैंकहाक ईस्टविक : (1814-1883)

(i) हिन्दुस्तानी व्याकरण, लंदन (1847)

23. एडविन टी0 एटकिन्सन : (मृत्यु तिथि 1890)

(i) स्टैटिकल डिस्क्रिप्टिव एण्ड हिस्टॉरिकल अकाउन्ट्स ऑफ् द नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेस ऑफ् इंडिया, इलाहाबाद (1847)

(प्रथम खण्ड में पृष्ठ 104-105 में बुन्देलखंडी का संक्षिप्त शब्दकोश)

24. हेनरी एन0 ग्रान्ट :

(i) एन ऐंग्लो-हिन्दोस्तानी वोकेबुलरी, कलकत्ता (1850)

25. विलियम नास्सू लीस (1825-1889)

थाम्पसन (दे0 क्रम संख्या-21) के कोश के तृतीय संस्करण का सम्पादन किया।

26. गार्सां द तासी : (1794-1878)

फ्रांसीसी लेखक गार्सां द तासी की प्रतिभा बहुआयामी थी। हिन्दी साहित्य के इतिहास की जानकारी रखने वाले हिन्दी साहित्य के विद्वान इस तथ्य से परिचित हैं कि आधुनिक दृष्टि से हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने की परम्परा का सूत्रपात आपके द्वारा फ्रेंच भाषा में लिखित ‘इस्तवार द ला लित्रेत्यूर ऐंदुई -ए- ऐंदूस्तानी'(हिन्दुई तथा हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास) के प्रकाशन से होता है। इस ग्रन्थ का प्रकाशन पैरिस से सन् 1839 ई0 में हुआ। इसका परिवर्धित एवं संशोधित संस्करण सन् 1870 ई0 में प्रकाशित हुआ।

आपने हिन्दी भाषा सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की भी रचना की।

(i) ले ओत्यूर ऐन्दुस्तानी ए ल्यूर उबरत, पैरिस (1868)

(ii) ल लांग ऐ ल लित्रेत्यूर ऐन्दुस्तानी (1850)

(iii) हिन्दी-हिन्दोई मुन्तखबात, पैरिस (1849)

(iv) रुदीमां द ल लांग ऐन्दुई

(v) रुदीमा द ल लांग ऐन्दुस्तानी

27. चार्ल्स फिलिप ब्राउनः

(i) द जिल्लाह डिक्शनरी इन द रोमन कैरेक्टर, मद्रास (1852)

28. रेवरेंड के0 विलियम : (1820-1886)

(i) द डेटिव एण्ड अक्यूजेटिव केसिस इन बेंगाली एण्ड हिन्दुस्तानी, जनरल ऑफ् एशियाटिक सोसायटी, बंगाल Vol. XXI (1852)

29. एस0 डब्ल्यू फैलन (1817-1880)

(i) ए इंगलिश - हिन्दुस्तानी लॉ एण्ड कामार्शियल डिक्शनरी, कलकत्ता (1858)

(ii) न्यू इंगलिश एण्ड हिन्दुस्तानी डिक्शनरी, बनारस (1876)

(iii) ए न्यू हिन्दुस्तानी- इंगलिश डिक्शनरी, बनारस (1879)

(iv) डिक्शनरी ऑफ द हिन्दुस्तानी प्रोवर्ब्स (आर0सी0 टेम्पल द्वारा संशोधित) बनारस (1886)

30. राबर्ट काटन मैथर (1808-1877)

(i) हिन्दुस्तानी अंग्रेजी संक्षिप्त शब्द कोश (1861)

(ii) हिन्दुस्तानी व्याकरण (1862)

(iii) मोनियर विलियम्स के ‘ए पै्रक्टिकल हिन्दुस्तानी ग्रामर (1862) में हिन्दुस्तानी पाठावली का संकलन किया।

31. सर मोनियर विलियम्सः

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बोडन-चेयर के प्रोफेसर, संस्कृत व्याकरण, संस्कृत-अंग्रेजी कोश, अंग्रेजी-संस्कृत कोश आदि विश्वविख्यात रचनाओं के प्रणेता सर मोनियर विलियम्स ने हिन्दी व्याकरण पर भी कार्य किया है।

(i) रुडीमेन्ट्स ऑफ् हिन्दुस्तानी ग्रामेर (1858)

(ii) हिन्दुस्तानी : प्राइमर एण्ड ग्रामर (1860)

(iii) प्रैक्टिकल हिन्दुस्तानी ग्रामर (1862)

32. हेनरी जॉर्ज रैवेर्टी : (जन्म सन् 1825 ई0)

संदर्भ मिलता है कि इन्होंने अंगे्रजी-हिन्दुस्तानी के पारिभाषिक एवं प्राविधिक शब्दों का कोश बनाया जिसका प्रकाशन सन् 1859 ई0 में हुआ। प्रस्तुत लेखक को यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हो सका।

33. पादरी एथरिंगटन साहिब :

(i) भाषा-भास्कर अर्थात् हिन्दी भाषा का व्याकरण, लाहौर (1871)

पादरी एथरिंगटन का सन् 1870 ई0 में अंग्रेजी में ‘स्टूडेण्ट्स ग्रामर ऑफ् द हिन्दी लैंग्वेज' बनारस से प्रकाशित हुआ था। नार्थ-वेस्टर्न प्रोविन्सिस के डी0पी0 आई0 ने इस कृति पर पुरस्कार देने के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर को संस्तुति की। लेफ्टिनेन्ट गर्वनर ने सुझाव दिया कि इसका हिन्दी अनुवाद किया जाए। इस कारण एक वर्ष बाद हिन्दी में हिन्दी-भास्कर का प्रकाशन हुआ। यह हिन्दी का एकमात्र व्याकरण-ग्रन्थ है जिस पर ब्रिटिश शासन ने पुरस्कार प्रदान किया। यह विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। स्कूलों में हिन्दी शिक्षा के लिए पाठ्य पुस्तक के रूप में यह लोकप्रिय हुआ।

34. जान डाउसन (1820-1881)

(i) ए ग्रामर ऑफ् उर्दू एण्ड हिन्दुस्तानी लैंग्वेजिज, लंदन (1872)

(ii) हिन्दुस्तानी एक्सरसाइजिज बुक (1872)

35. जॉन बीम्स (1837-1902)

जॉन बीम्स सिविल सर्विस में थे। सन् 1857 ई0 में भारत आने के बाद इन्होंने भारतीय भाषाओं का अध्ययन आरम्भ किया। इनके अनेक लेख एशियाटिक सोसायटी बंगाल, रायल एशियाटिक सोसायटी लंदन, इंडियन एन्टीक्वेरी आदि शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।

इनका तीन खण्डों में प्रकाशित ‘कम्पैरेटिव ग्रामर ऑफ् द माडर्न एरियन लैंग्वेजिज़ ऑफ् इंडिया' अति प्रसिद्ध ग्रन्थ है जिसमें सिन्धी, पंजाबी, हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया आदि आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के व्याकरणों का ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

प्रथम खण्ड सन् 1872 ई0 में, द्वितीय खण्ड सन् 1875 ई0 में तथा तृतीय खण्ड सन् 1879 ई0 में प्रकाशित हुए।

36. जॉन टामसन प्लाट्स (1830-1904)

(i) ए ग्रामर ऑफ् द हिन्दुस्तानी एण्ड उर्दू लैंग्वेजिज, लंदन (1874) अन्य संस्करण 1926, 1941

(ii) ए डिक्शनरी ऑफ् उर्दू, क्लासिकल हिन्दी एण्ड इंगलिश, लंदन (1911)

37. रेवरेंड सेमुअल एच0 केलाग : (1839-1899)

आपसे हिन्दी व्याकरण के इतिहास में एक नए युग का आरम्भ होता है। आप अमेरिकी पादरी थे। आपके समय तक जिन विदेशी विद्वानों ने व्याकरण ग्रन्थ लिखे थे, केलाग महोदय ने उन सबका पारायण किया। चिन्तन एवं मनन के पश्चात् अपना व्याकरण ग्रन्थ तैयार किया। आपने हिन्दी भाषा के अन्तर्गत गढ़वाली, खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बैसवाड़ी, अवधी, भोजपुरी राजस्थानी और रीवांई आदि को स्वीकार किया है। केलाग ने तत्सम और तद्भव के साथ विदेशी शब्दों पर भी विचार किया है। आपके व्याकरण में ध्वनि, रूप रचना, वाक्य विन्यास, शब्द स्रोत, व्युत्पत्ति आदि सभी पर विचार किया गया है। एक अमेरिकी पादरी हिन्दी भाषा की ऐसी सूक्ष्म विवेचना कर सकता है - यह विस्मयपूर्ण आह्लाद का विषय है। आपके ग्रन्थ का नाम है -

(i) ग्रामर ऑफ् द हिन्दी लैंग्वेज (1875-76)

इसका संशोधित संस्करण लंदन से सन् 1893 में प्रकाशित हुआ। श्री कामता प्रसाद गुरू ने केलाग के व्याकरण को अंग्रेजी में लिखी हिन्दी व्याकरण की पुस्तकों में प्रथम स्थान दिया है। (17)

38. सर चार्ल्स जेम्स ल्याल (जन्म-सन् 1845 ई0)

(i) ए हिस्ट्री ऑफ हिन्दुस्तानी लैंग्वेज (1880)

39. आगस्तस रुडोल्फ हार्नले : (1841-1918)

आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन करने वाले भाषाविदों में जर्मन भाषी हार्नले का महत्वपूर्ण स्थान है। सन् 1880 ई0 में डॉ0 हार्नले ने अपना यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि आर्यों के भारत पर कम से कम दो बार आक्रमण हुए। पहला आक्रमण करने वाले आर्य पंजाब में बस गए थे। दूसरी बार जिन आर्यों ने भारत पर आक्रमण किया वे मध्य एशिया से चलकर काबुल नदी के मार्ग से गिलगित एवं चित्राल होते हुए भारत के मध्य देश में आए। मध्य देश की सीमा उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्य पर्वत, पश्चिम में सरहिन्द तथा पूरब में गंगा-जमुना के संगम तक थी। इस दूसरे आक्रमण का परिणाम यह हुआ कि पूर्व आक्रमण में आगत आर्यों को तीन दिशाओं (पूरब, दक्षिण तथा पश्चिम) में फैलने के लिए बाध्य होना पड़ा।

मध्य देश अथवा केन्द्र में होने के कारण दूसरे आक्रमण में आगत आर्यों को केन्द्रीय अथवा भीतरी आर्य के नाम से अभिहित किया गया। पूर्वागत आर्य बाहरी आर्य कहलाए।

इसी सिद्धान्त को आधार बनाकर परवर्ती भाषा वैज्ञानिकों ने आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का बाहरी उपशाखा तथा केन्द्रीय अथवा भीतरी उपशाखा में विभाजन किया।

डॉ0 हार्नले ने आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की क्रियाओं पर गम्भीर अन्वेषण कार्य किया है।

हिन्दी भाषा की दृष्टि से डॉ0 हार्नले के निम्नलिखित कार्य उल्लेखनीय हैं :-

(i) ए कलेक्शन ऑफ् हिन्दी रूट्स विद रिमार्क्स ऑन देयर डेरिवेशन एण्ड क्लासिफिकेशन

(हिन्दी की 582 - मूल एवं यौगिक धातुओं का संग्रह एवं विवेचन) जर्नल ऑफ् एशियाटिक सोसायटी, बंगाल (1880)

(ii) ग्रामर ऑफ् द ईस्टर्न हिन्दी (1880)

(iii) कम्परेटिव डिक्शनरी ऑफ द बिहारी लैंग्वेज, (सहलेखक-डॉ0 ग्रियर्सन), कलकत्ता (1885)

(iv) ए कम्परेटिव ग्रामर ऑफ् द गौडियन लैंग्वेजिज, लंदन (1880)

इसमें आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का तुलनात्मक व्याकरण है। इन्होंने चार प्रकार की गौडियन भाषाएं मानी हैं।

(क) पूर्वी गौडियन - पूर्वी हिन्दी, बंगाली, उड़िया

(ख) पश्चिमी गौडियन - पश्चिमी हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, सिन्धी

(ग) उत्तरी गौडियन - गढ़वाली, कुमायूँनी, नेपाली

(घ) दक्षिणी गौडियन - मराठी

यह आधुनिक आर्य भाषाओं की विवेचना की दृष्टि से महत्वपूर्ण कृति है।

40. रेवरेण्ड थामस क्रावेन (जन्म-सन् 1846 ई0)

(i) द रायल स्कूल डिक्शनरी इन इंगलिश एण्ड रोमन उर्दू, बनारस (1881)

(ii) इंगलिश-हिन्दुस्तानी एण्ड हिन्दुस्तानी - इंगलिश डिक्शनरी, लखनऊ (1888)

(iii) द इंगलिश एण्ड हिन्दी डिक्शनरी, लखनऊ (1889)

41. एडवर्ड हेनरी पामर : (1840-1882)

(i) सिम्पलिफाइड ग्रामर ऑफ् हिन्दुस्तानी, पर्शियन एण्ड अरेबिक, लन्दन (1882)

42. फेड्रिक पिंकॉट (1836-1896)

(i) हिन्दी मैनुअल, लंदन (1882) अन्य संस्करण 1883, 1890. कामता प्रसाद गुरु ने अंग्रेजी में लिखी हुई हिन्दी व्याकरण की उत्तम पुस्तकों के लेखकों के अन्तर्गत पिंकाट का उल्लेख किया है। (19)

(ii) आपने बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री कृत ‘खड़ी बोली का पथ' शीर्षक पुस्तक की सन् 1888 ई0 में भूमिका लिखी तथा उसका सम्पादन किया।

आपने पंडित श्रीधर पाठक तथा स्वामी दयानन्द को जो पत्र लिखे उनमें हिन्दी को नेशनल लैंग्वेज का अधिकारी माना। डॉ0 कैलाश चन्द्र भाटिया ने सन् 1888 में पंडित

श्रीधर पाठक को लिखे पत्र का एक अंश उद्धृत किया है जिसमें आपके ब्रिटिश शासन पर डाले जाने वाले उस प्रभाव का उल्लेख है जिसके कारण ब्रिटेन से भारत जाने वाले अंग्रेज प्रशासकों के लिए हिन्दी की परीक्षा पास करना अनिवार्य माना गयाः

‘‘बीस साल पहले मैं एकमात्र यूरोपियन था, जिसने सरकार पर हिन्दी के बारे में दबाव डाला और दस साल बाद इस नियम को बनवाने में सफल रहा कि भारत जाने वाले अंग्रेजों को हिन्दी की परीक्षा पास करना अनिवार्य किया जाए।''(20)

43. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1851-1941)

भारतीय भाषाओं एवं साहित्य के अध्ययन की दृष्टि से विदेशी विद्वानों में डॉ0 ग्रियर्सन का नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की शासी परिषद् ने सन् 1993 ई0 में अपनी बैठक में हिन्दी सेवी सम्मान योजना के अन्तर्गत प्रतिवर्ष एक विदेशी हिन्दी सेवी विद्वान को भी सम्मानित करने का निर्णय लिया तो सर्वसम्मति से पुरस्कार का नाम ‘‘डॉ0 जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार'' रखा गया। भारत के राष्ट्रपति ने 14 सितम्बर, 1994 को आयोजित समारोह में अपने भाषण में प्रथम जॉर्ज ग्रियर्सन सम्मान प्राप्त करने वाले विदेशी विद्वान को विशेष रूप से अपनी हार्दिक बधाई दी। (21)

साहित्येतिहास की दृष्टि से इनकी ‘मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ् हिन्दुस्तान' ग्रन्थ का महत्व है। इसका प्रकाशन एशियाटिक सोसायटी ऑफ् बंगाल, कलकत्ता द्वारा सन् 1889 ई0 में हुआ। आपने ग्रामीण शब्दावली एवं लोक साहित्य पर भी कार्य सम्पन्न किए। आपने काश्मीरी भाषा पर व्याकरण एवं कोश सम्बन्धी स्वतन्त्र ग्रन्थों की भी रचना की। आपके बिहारी भाषाओं तथा भारत की भाषाओं से सम्बन्धित निम्न ग्रन्थों का उल्लेख करना प्रासंगिक है जिनमें हिन्दी भाषा क्षेत्र की उपभाषाओं का भी विस्तृत विवेचन समाहित है :-

(i) सेविन ग्रैमर्स ऑफ् द डाइलेक्ट्स एण्ड सब-डाइलेक्ट्स ऑफ् बिहारी लैंग्वेजिज, जर्नल ऑफ् एशियाटिक सोसायटी, बंगाल (1883-1887)

(ii) मार्डन आर्यन लैंग्वेजिज, जर्नल ऑफ् एशियाटिक सोसायटी, बंगाल, Vol. 64, No.-1

(iii) लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ् इंडिया

सन् 1894 ई0 में इन्होंने भारत के भाषा सर्वेक्षण का कार्य आरम्भ किया। 33 वर्षों के अनवरत परिश्रम के फलस्वरूप यह कार्य सन् 1927 ई0 में समाप्त हुआ। मूलतः यह ग्यारह खण्डों में विभक्त है। अनेक खण्डों (खण्ड एक, तीन, पॉच, आठ एवं नौ) के

एकाधिक भाग हैं। ग्यारह हजार पृष्ठों का यह सर्वेक्षण-कार्य विश्व में अपने ढंग का अकेला कार्य है। विश्व के किसी भी देश में भाषा-सर्वेक्षण का ऐसा विशद् कार्य नहीं हुआ है। प्रशासनिक अधिकारी होते हुए आपने भारतीय भाषाओं और बोलियों का विशाल सर्वेक्षण कार्य सम्पन्न किया। चूँकि आपका सर्वेक्षण अप्रत्यक्ष-विधि पर आधारित था, इस कारण इसमें त्रुटियों का होना स्वाभाविक है। सर्वेक्षण कार्य में जिन प्राध्यापकों, पटवारियों एवं अधिकारियों ने सहयेाग दिया, अपने अपने क्षेत्रों में बोले जाने वाले भाषा रूपों का परिचय, उदाहरण, कथा-कहाँनियां आदि लिखकर भेजीं, वे स्वन-विज्ञान एवं भाषा विज्ञान के विद्वान नहीं थे। अपनी समस्त त्रुटियों एवं कमियों के बावजूद डॉ0 ग्रियर्सन का यह सर्वेक्षण कार्य अभूतपूर्व है तथा भारत की प्रत्येक भाषा एवं बोली पर कार्य करने वाला शोधकर्ता सर्वप्रथम डा0 ग्रियर्सन की मान्यता एवं उनके द्वारा प्रस्तुत व्याकरणिक ढॉचे से अपना शोधकार्य आरम्भ करता है। यह कहा जा सकता है कि आपके कार्य का ऐतिहासिक महत्व अप्रतिम है।

44. टामस हेनरी थार्नटन (जन्म सन् 1832 ई0)

(i) स्पेसिमेन सोंग्स फ्राम पंजाब लिटरेचर एण्ड फॉक लोर, रायल एशियाटिक जर्नल,

लंदन,Vol. XVIII (1885)

इस लेख में पंजाब प्रान्त के हिन्दी एवं उर्दू साहित्य की चर्चा एवं उनके नमूने दिए गए हैं।

45. ब्रेन्टल हेमलिन बडले (जन्म सन् 1849 ई0)

आप अमेरिकी पादरी थे। आपने क्रावेन (दे0 क्रम संख्या 40) के द्वारा सन् 1888 में प्रकाशित डिक्शनरी का सन् 1889 ई0 में संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण निकाला।

46. जान क्रिश्चियन :

(i) बिहार प्रोवर्ब्स, लंदन (1891)

47. एडविन ग्रीव्ज (जन्म सन् 1854 ई0)

(i) ग्रामर ऑफ् मार्डन हिन्दी (1896)

श्री कामता प्रसाद गुरु ने अपने हिन्दी व्याकरण में अंग्रेजी में लिखी हुई हिन्दी व्याकरण की पुस्तकों के लेखकों के अन्तर्गत इनका उल्लेख किया है। इन्होंने तुलसीकृत रामचरितमानस की भाषा के व्याकरण पर भी निबन्ध लिखा।

48. विलियम एफ0 जॉनसन (जन्म सन् 1838 ई0)

(i) हिन्दी कहावत संग्रह, इलाहाबाद (1898)

49. सर रिचर्ड कारनेक बोरोनेट टेम्पल (जन्म 1850 ई0)

(i) ए ग्लासरी ऑफ् इंडियन ट्रम्स, लंदन (1897)

(ii) सत्रहवीं शताब्दी में हिन्दुस्तानी, इंडियन ऐन्टीक्वेरी, fVol. XXXII (1903)

50. डगलस क्रावेन फिलाट (1860-1930)

(i) हिन्दुस्तानी मेनुअल, कलकत्ता (1910)

(ii) अंगे्रजी-हिन्दुस्तानी शब्द-संग्रह (1911)

51. डब्ल्यू सैंट क्लेयर तिस्दाल

(i) ए कन्वर्सेशन ग्रामर ऑफ् द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज, लंदन-हाइडेलबर्ग (1911)

52. डॉ0 एल0पी0 टेसीटॅरी (1888-1919)

इतालवी भाषी डॉ0 टेसीटॅरी हिन्दी के प्रथम शोधकर्ता हैं जिन्हें शोधकार्य के लिए किसी विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ् फिलासफी की उपाधि प्राप्त हुई। आप तुलसीदास एवं उनकी प्रमुख रचना ‘रामचरितमानस' के अनुसंधानकर्ता हैं। आपने अपने शोध में रामचरितमानस की कथावस्तु की तुलना बाल्मीकि कृत ‘रामायण' की कथावस्तु से की है। ‘इल रामचरितमानस ए इल रामायण' शीर्षक आपका शोध लेख इतालवी पत्रिका ‘ज्योर्नेल डेला सोसाइटा एशियाटिका इटालियाना' में सन् 1911 ई0 में प्रकाशित हुआ। इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘इंडियन ऐन्टिक्वेरी' में सन् 1912 से सन् 1913 ई0 में प्रकाशित हुआ।

भाषा सम्बन्धी आपके प्रमुख कार्य निम्न हैं :-

(i) तुलसीदास की प्राचीन बैसवाड़ी के व्याकरण के कुछ नमूने, जनरल ऑफ् रायल एशियाटिक सोसायटी, लंदन (1914)

(ii) पश्चिमी राजस्थानी का व्याकरण, इंडियन ऐन्टीक्वेरी, Vol. XXXXIII & XXXXIV

(1914-1916)

53. टी0 ग्राहम बैली

(i) हिन्दुस्तानी, लंदन (1934)

(ii) स्टडीज इन नार्थ इंडियन लैंग्वेजिज, लंदन (1938)

54. एच0सी0 शोलवर्ग

(i) कन्साइज ग्रामर ऑफ् द हिन्दी लैंग्वेज, लंदन (1940) द्वितीय संस्करण (1950)

कामता प्रसाद गुरु ने अंग्रेजी में लिखी हुई हिन्दी व्याकरण की पुस्तकों की सूची के अन्तर्गत रेवरेंड शोलवर्ग के हिन्दी व्याकरण का उल्लेख किया है।

55. सर राल्फ लिलि टर्नर

(i) नेपाली डिक्शनरी (1931)

यह कोश केवल नेपाली भाषा का ही नहीं अपितु आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का प्रथम वैज्ञानिक कोश है जिसमें नेपाली भाषा के शब्दों की व्युत्पत्ति दी गई है तथा अन्य प्रधान आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के शब्दों से तुलना भी की गई है। ‘भारतीय आर्यभाषाओं से सम्बन्ध रखने वाला वास्तव में यह प्रथम वैज्ञानिक नैरुक्तिक कोश है।' (22)

(ii) ए कम्पेरेटिव डिक्शनरी ऑफ् द इंडो-आर्यन लैंग्वेजिज, लंदन (1969) भारतीय आर्यभाषाओं के ऐतिहासिक अध्ययन तथा भारतीय आर्य भाषाओं के पुनर्निमाण के अध्ययन की दृष्टि से इस ग्रन्थ का अप्रतिम महत्व है। डॉ0 सुमित्र मंगेश कत्रे ने इसके प्रकाशन को भारतीय आर्यभाषाओं के लिए युगान्तरकारी योगदान की संज्ञा से अभिहित किया है। (23) प्रस्तुत ग्रन्थ वाड्.मीमांसा परक अध्ययन की सीमा रेखा से परे तुलनात्मक भाषा विज्ञान एवं कालक्रमिक भाषा विज्ञान की सीमा के अन्तर्गत आता है। इस कारण बीसवीं शताब्दी में द्वितीय महायुद्ध के बाद विभिन्न देशों में हिन्दी भाषा से सम्बन्धित भाषा वैज्ञानिक अध्ययनों के विवरण के अन्तर्गत इसका उल्लेख किया जाएगा।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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