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महावीर सरन जैन की किताब : हिंदी की अन्तर-क्षेत्रीय, सार्वदेशीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका – अध्याय 5

(अध्याय 4 से जारी…)


हिंदी की अन्तर-क्षेत्रीय, सार्वदेशीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका


प्रोफेसर महावीर सरन जैन

एम0ए0, डी0फिल, डी0लिट्0

प्रोफेसर महावीर सरन जैन(सेवानिवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान) 123, हरिएन्‍कलेव, चांदपुर रोड, बुलन्दशहर - 203001

 

अध्याय 5.

विदेशों में हिन्दी शिक्षण : समस्याएँ और समाधान

सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था । सन् 1997 में सैन्सस ऑफ इंडिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन् 1998 में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अंग्रेजी भाषियों से अधिक है।

विश्व के लगभग 100 देशों में या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग होता है अथवा उन देशों में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था है। इन देशों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -

(i) वे देश जिनकी भारतीय मूल के आप्रवासी नागरिकों की आबादी अपने देश की जनसंख्या में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है।

(ii) इस वर्ग में वे देश आते हैं जो हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में सीखते हैं।

(iii) वे देश जिनमें हिन्दी-उर्दू मातृभाषियों की बड़ी संख्या निवास करती है। इन देशों में भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान आदि देशों के अप्रवासियों/अनिवासियों की रहने वाली विपुल आबादी सम्पर्क भाषा के रूप में ‘हिन्दी-उर्दू' का प्रयेाग करती है, हिन्दी-उर्दू की फिल्में देखती है, गाने सुनती है, टेलीविजन के कार्यक्रम देखती है।

हिन्दी के वैश्विक व्यवहार एवं प्रयोग की संक्षिप्त विवेचना के साथ ही यह विवेच्य है कि विदेशों में हिन्दी शिक्षण की प्रमुख समस्याएँ कौन सी हैं तथा उनका व्यवहारिक दृष्टि से क्या समाधान है, क्या करणीय है। इस सम्बंध में सूत्रवत शैली में कुछ विचार हिन्दी के विद्वानों के लिए प्रस्तुत हैं।

(1) प्रत्येक देश के शिक्षण स्तर एवं हिन्दी प्रशिक्षण के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर हिन्दी शिक्षण के पाठ्यक्रम का निर्माण करना चाहिए। पाठ्यक्रम इतना व्यापक एवं स्पष्ट होना चाहिए जिससे शिक्षक एवं अध्येता का मार्गदर्शन हो सके।

(2) विदेशों में हिन्दी शिक्षण करने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण एवं नवीकरण पाठ्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन होना चाहिए ।

(3) श्रवण कौशल, वाचन कौशल, वार्तालाप कौशल एवं रचना कौशल के शिक्षण की दृष्टि से सामग्री के निर्माण की परियोजना बननी चाहिए एवं उस दिशा में विद्वानों को कार्य सम्पन्न करना चाहिए।

(4) विदेशी अध्येताओं के भाषा शिक्षण के उद्देश्य एवं लक्ष्य को ध्यान में रखकर आवृत्ति के आधार पर आधारभूत शब्दावली के निर्माण का कार्य होना चाहिए।

(5) देवनागरी लेखन तथा हिन्दी वर्तनी व्यवस्था की दृष्टि से निम्न लिखित क्षेत्रों में कार्य सम्पन्न होने चाहियें :

( क ) देवनागरी लिपि के लिपि चिन्हों का विश्लेषण।

( ख ) एक लिपि चिन्ह से रूपान्तरित होने वाले अन्य लिपि चिन्हों का क्रमिक विस्तार।

( ग ) मात्राओं से युक्त व्यंजन एवं संयुक्त व्यंजन तथा हिन्दी वर्तनी की अन्य विशेषताओं के अनुरूप वर्णों से बनने वाले शब्दों के अनुप्रयोगात्मक पाठों का निर्माण।

(6) वास्तविक भाषा व्यवहार को आधार बनाकर व्यावहारिक हिन्दी संरचना - ध्वनि संरचना, शब्द संरचना तथा पदबंध संरचना - के अनुप्रयोगात्मक पाठों के निर्माण के क्षेत्र में विद्वानों को कार्य करते समय समस्त सामग्री का निर्माण अभिक्रमित रूप में करना चाहिए तथा शिक्षार्थी के अधिगम की पुष्टि के लिए प्रत्येक बिन्दु पर विभिन्न अभ्यासों की योजना भी होनी चाहिए।

(7) हिन्दी के आर्थी प्रयोगों के लिए सामग्री का निर्माण होना चाहिए।

(8) जीवन के विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए हिन्दी भाषा के आधारभूत व्याकरणिक एवं संरचनात्क बिन्दुओं की अनुस्तारित सामग्री निर्मित होनी चाहिए।

(9) हिन्दी साहित्य का अध्ययन करने वाले विदेशी अध्येताओं के लिए ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास' का निर्माण करते समय प्रत्येक काल की मुख्य धाराओं, प्रमुख प्रवृत्तियों, प्रसिद्ध रचनाकारों तथा उनकी रचनाओं का विवरण भारत के हिन्दी समाज के उस काल की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत की जानी चाहिए।

(10) हिन्दी की संस्कृति :- हिन्दी साहित्य में अभिव्यक्त सांस्कृतिक संकल्पनाओं से परिचित कराने के लिए सामग्री का निर्माण सचित्र होना चाहिए।

(11) कम्प्यूटर साधित हिन्दी भाषा शिक्षण की प्रभूत सामग्री के निर्माण के लिए ऐसी परिचालन प्रणाली का विकास किया जाना चाहिए जिससे हिन्दी में काम करना अधिक सुविधाजनक हो। हिन्दी इन्टरफेस सभी प्लेटफार्मों पर उपलब्ध हो, जिससे सारे आदेश उपकरण पटि्टयाँ, संवाद कक्ष तथा मदद हिन्दी में उपलब्ध हो सके।

(12) विदेशी अध्येताओं को ध्यान में रखकर ‘स्पेल चैकर' तथा ‘आन-लाइन शब्दकोष' की सुविधा का विकास किया जाना चाहिए।

(13)लीला प्रबोध की तर्ज पर जीवन के विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए हिन्दी में स्वयं शिक्षण पैकेज की दिशा में प्रगति एवं विकास होना चाहिए।

(14) कम्प्यूटर आधारित भाषा प्रयोगशाला के उपयोग में आने वाली सामग्री का निर्माण होना चाहिए।

(15) डाउनलोड करने वाली अनेक प्रसिद्ध साइटों पर विश्व की अन्य सभी प्रमुख भाषाएं उपलब्ध हैं किन्तु हिन्दी नहीं है। इसके लिए सार्थक पहल की जानी चाहिए।

(16) महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा आदि संस्थाओं को हिन्दी में ऐसे पॉर्टल विकसित करने चाहिए जिससे कोई भी विदेशी अध्येता हिन्दी से सबन्धित प्रत्येक जानकारी प्राप्त कर सके। लाइनेक्स और ओपन सोर्स साफ्टवेयर के जरिए इन संस्थाओं को हिन्दी का लोकलाइजेशन ग्रुप विकसित करना चाहिए जो हिन्दी भाषा की ध्वनि, लिपि, शब्द, भाषा प्रयोग आदि के सम्बन्ध में अपने विचार हिन्दी में दे सकें, हिन्दी में अभिलेख एवं ई-मेल अधिकाधिक भेज सकें, विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत कर सकें, प्रस्तुत विचार-सामग्री में संशोधन कर सकें। हिन्दी में साफ्टवेयर निर्मिति का कार्य तीव्र गति से होना चाहिए। हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान की प्रत्येक शाखा के प्रत्येक विषय पर प्रभूत सामग्री कप्यूटर पर उपलब्ध होनी चाहिए।

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(शेष अगले अंकों में जारी…)

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