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पुष्पा सक्सेना की कहानी – दूरियों का साथ

दूरियों का साथ

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पुष्पा सक्सेना

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इलाहाबाद में जन्म. भूगोल एवं हिंदी में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ हासिल कीं. सवा सौ से अधिक कहानियाँ हिन्दी की

प्रतिष्ठित एवं नामी पत्रिकाओं में प्रकाशित. ९ कहानी-संग्रह, ५ उपन्यास १ नाटक-संग्रह तथा बाल साहित्य पर ७ पुस्तकें प्रकाशित.

टीवी तथा आकाशवाणी- -दूरदर्शन, एनएफ़डीसी, एनएसडी, फ़िल्म डिवीज़न आफ़ इंडिया तथा दूरदर्शन द्वारा कहानियों पर फ़िल्म

तथा सीरियल का निर्माण. पुरस्कार- -ऑदर्स गिल्ड ऑफ इंडिया अवार्ड, भारतेंदु हरिश्चन्द्र अवार्ड, (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय,

भारत सरकार) पर्यावरण मंत्रालय, राष्ट्रीय महिला आयोग के अतिरिक्त अन्य कई पुरस्कार.

सम्पर्क - ईमेल - pushpasaxena@hotmail.com

टेड होम में तुम्हारा स्वागत हैं दीदी! नाटकीय मुद्रा में सम्मान प्रदर्शित करती सुमिता मुस्करा दी थी। छिः, अभी तक तेरा बचपना नहीं गया सुमि! जो जी में आया बोल दिया। तेरे रहते ‘हांटेड होम’ - हुई न बेमेल बात? प्रतिमा दीदी के चेहरे की झल्लाहट देख सुमिता हंस पड़ी थी।

ये बेमेल बात नहीं है, दीदी! सच सुबह सात बजे से रात दस-ग्यारह बजे तक बेचारा घर मेरे आने की राह जोहता रहता है। दस के पहले तो शायद ही कभी स्कूल से वापस आ सकी हूँ। यहाँ शोध-कार्य मजाक नहीं है, दीदी! थोड़ा-सा गर्व बिखर आया सुमिता के मुख पर।

तू सात बजे निकल जाती है, सुमि। घर में तो तुझे जगाते हार जाते थे हम। छुट्टी के दिन तो नौ बजे भी नींद नहीं टूटती थी तेरी।

वह घर था न दीदी... अच्छा दीदी, वह रहा सामने बाथरूम... मुंह धोकर आओ, तब तक चाय लगाती हूँ।

नहीं, चाय तो रहने ही दे, सुमि, अभी थोड़ी देर पहले ही पी थी। नींबू का शर्बत तो शायद होगा नहीं।

तुम जल्दी आओ न दीदी, सब-कुछ तैयार रहेगा। अपनी सुमि के बारे में कम ही जानती हो तुम।

बाथरूम की ओर जाती प्रतिमा ठिठक गई थीं-

भई यहाँ बाथ-टब में नहाना मुझे तो रास नहीं आया, सुमि! तू कैसे मैनेज करती है?

टब में बाल्टी रख के नहा लेना, दीदी... वही कोने में रखी है। सुमिता हँस पड़ी थी।

टेबल पर समोसे और कचौड़ियाँ देख प्रतिमा चौंक गई थीं।

ये सब कहाँ से आया, सुमि... तूने बनाया है क्या?

और नहीं तो क्या तुमने सोचा ये अपना घर है जहाँ किसी के आते ही अम्मा समोसे ओर जलेबी लाने दौड़ा देती थीं? जरा खाकर तो देखो, मजा आ जाएगा।

वाह! समोसे तो अच्छे बनाए हैं, काफी होशियार हो गई है अम्मा की दुलारी बिटिया।

वो तो घर में मैं काम नहीं करती थी इसीलिए तुम्हारे बनाए खाने की तारीफ होती थी, अगर मैं खाना बनाती तो...लोग खाना छोड़ देते। इस बार प्रतिमा ठठाकर हंस पड़ी थीं।

थोड़ा रुककर प्रतिमा ने पूछा था, ये सब क्या हो गया सुमि?

यही बात पूछने इत्ती दूर, सात समुन्दर पार अम्मा ने तुम्हें भेजा है। है न दीदी?

क्यों, क्या ये बात जानने का भी हमें अधिकार नहीं है सुमि? तू तो जैसे सबसे रिश्ते तोड़ बैठी है। जानकर तो सपने में भी किसी ने तेरा बुरा नहीं चाहा था, सुमि, फिर... प्रतिमा का गला रुंध गया था।

ऐसा मैंने कब कहा, दीदी? अपना प्राप्य मुझे ही तो झेलना चाहिए न?

क्या है तेरा प्राप्य? विवाह के समय सभी तो तेरा भाग्य सराह रहे थे। बिना दान-दहेज के इतना क्वालीफाइड, यूएसए में इतनी अच्छी नौकरी वाला लड़का क्या आसानी से मिलता है किसी को?

किसने चाहा था ये सब दीदी? शान्त स्वर में सुमि पूछ बैठी थी।

जानती हूँ सुमि, पर अर्पित की तुलना में सुधीर कुछ भी तो नहीं था... इसीलिए कभी सोचती हूँ कहीं सबसे बदला लेने के लिए तो तूने अर्पित को नहीं छोड़ दिया?

दीदी... बस इतना ही जान सकीं अपनी सुमि को? सुमिता की आँखें जल उठी थीं।

अर्पित में क्या कमी थी, सुमि?

कौन, अर्पित?

तू अर्पित को नहीं जानती, सुमि? प्रतिमा का स्वर तीखा था।

इस देश में कोई अपने को ठीक से जान सके, यही सम्भव नहीं, दूसरे को जानने-पहचानने का समय ही किसके पास है? कुछ दिन यहाँ रहोगी तो इस सत्य से अच्छी तरह परिचित हो

जाओगी। एक-एक पल कीमती है यहाँ का।

मुझे किसी सत्य से परिचित नहीं होना है, सुमि! अर्पित से नहीं पटी तो वापस घर चली आती। यहाँ इस अनजान देश में यूं अकेले रहना क्या आसान है?

उस अपने देश में, उन अपनों के बीच, क्या अपनी इस स्थिति में रह पाना आसान था, दीदी? प्रश्नवाचक दृष्टि प्रतिमा के चेहरे पर निबद्ध थी।

इस प्रश्न को झेल पाना प्रतिमा को कठिन था। क्या उत्तर देतीं अपनी इस छोटी बहिन को? कितने लाड़-चाव से पाला गया था! घर की सबसे छोटी दुलारी सुमिता अगर परित्यक्ता के रूप में भारत वापस जाती तो हजार-हजार विषैले प्रश्न उसकी कोमल काया को डंस न जाते? पर इस अनजान, सहस्त्रों मील दूर देश में, अकेली इस धरती पर खड़ी होने का दुस्साहस भी तो घर में सबको आतंकित किए हुए है।

जानती है अम्मा दिन-रात रोती हैं, बाबूजी को चक्कर आने लगे हैं!

वहाँ रहूँगी तो क्या वे ठीक हो जाएँगे, दीदी।

क्यों नहीं, तुझे अपने सामने देख उन्हें तसल्ली तो होगी? यहाँ तेरे अकेले रहने से उनकी चिन्ता बढ़ गई है। लड़की की बात ठहरी- कल को कोई जरूरत पड़े तो कोई सहारा देनेवाला भी नहीं।

सच कहूँ दीदी, यहाँ लड़कियाँ अपने देश से ज्यादा सुरक्षित हैं। तुम लोग क्या यह नहीं सोच सकते मैं शोध पूर्ण करने यहाँ आई हूँ? बहुत सामान्य जीवन जी रही हूँ, यहाँ मैं। न कोई ताने देता है, न दया की दृष्टि से देखी जाती हूँ। सच तो यह है कि अगर घर से पत्र न आयें तो मैं अपने विवाह की बात भी भूल जाऊं।

अर्पित भी तो इसी शहर में रहता है, कभी कहीं मिला तुझसे?

हाँ, कल ही तो उसके बेटे का जन्मदिन है। बहुत आग्रह से बुलाया है मुझे। तुम चलोगी न ,दीदी?

उसके बेटे का जन्मदिन? पागल हो गई है, सुमि! अभी आठ महीने पहले तुझसे शादी हुई है उसकी, फिर ये उसका बेटा...?

मैंने भी यही तो कहा दीदी, अर्पित का बेटा। एक शैतान मुस्कान सुमिता के होठों पर तैर गई। बचपन में दीदी ने न जाने कितनी पहेलियाँ बुझाई हैं, आज उसकी पहेली बूझ दें दीदी तो सुमिता मान जाएगी।

मेरी कुछ समझ मे नहीं आता, सुमि! असल बात बता, मेरा तो दिल घबरा रहा है।

आराम से ये नींबू का शर्बत पी डालो, दीदी! अभी कुछ दिन तो ठहरोगी न?

न बाबा, वो तो तेरे जीजाजी का आफिस का काम निकल आया सो आ गई, वर्ना...

सुमि मर रही है या जी रही है की चिन्ता किसे है।

फिर वही बकवास! हम तो तेरे कोई लगते ही नहीं हैं न। वहाँ अम्मा के खत पर खत आ रहे हैं- मेरी सुमि की खोज-खबर ला दे, प्रतिमा, यहाँ देवीजी व्यंग्य-बाण चला रही हैं! तू क्या जाने माँ की ममता।

सॉरी दीदी, गलती हो गई। हाँ, ये तो बताओ जीजाजी यहाँ कब आ रहे हैं? दीदी के गले में बाहें डाल सुमिता मचल रही थी।

उन्नीस अप्रैल को उनकी कान्फ्रेंस खत्म हो जाएगी, उसके बाद एकाध दिन के लिए ही यहाँ आ सकेंगे। तू तो उनके काम के बारे में जानती ही है, सुमि!

शानू और रोहित कैसे हैं दीदी?

बहुत याद करते हैं अपनी सुमि मौसी को।

शानू को मेरे पास भेज दो न दीदी, सच ये हांटेड होम आबाद हो जाएगा।

पराई औलाद से घर आबाद करेगी, सुमि?

अच्छा तो शानू पराई हो गई? बचपन में किसकी गोद में चढकर बड़ी हुई है, भूल गई, दीदी।

ओह दीदी, बातों में मैं बिल्कुल भूल ही गई, राहुल की प्रेजेण्ट भी तो खरीदनी है। आज सण्डे है, पाँच बजे मॉल बन्द हो जाएगी। चलो न दीदी, वैसे भी अन्दर कितनी घुटन है न।

बेमन से प्रतिमा को सुमिता के साथ मॉल जाना पड़ गया था। सुमिता अर्पित के बेटे के लिए प्रजेण्ट तलाश कर रही थी। प्रतिमा का पारा चढ़ता जा रहा था- ये क्या मजाक है! बहिन से भी सचाई छिपाई जा रही है! किस चालाकी से बात टाल जाती है! मन जल रहा था। वहाँ घर वाले नाहक जान दिए दे रहे हैं, यहाँ यह लड़की मस्त है! चेहरे का उल्लास देख कौन कहेगा यह तलाकशुदा स्त्री है?

घर लौट प्रतिमा ने खाना खाने को मना कर दिया।

बहुत थक गई हूँ, सुमि, अब सोऊंगी।

माथा दबा दूं, दीदी?

न, नींद आ रही है।

करवट बदलती दीदी को देख सुमिता हंस पड़ी थी।

सो पाओगी, दीदी?

तुझे क्या मतलब? मैं कौन लगती हूँ तेरी?

याद है दीदी, मैंने विवाह नहीं करना चाहा था। मैं अपना शोध-कार्य पूरा करने को कितनी उत्सुक थी।

सब याद है सुमि, विवाह करने के लिए सबसे ज्यादा जोर मैंने ही दिया था। शायद तेरे इस दुर्भाग्य के लिए मैं अपने को क्षमा नहीं कर पाती हूँ, सुमि! प्रतिमा का स्वर अवरुद्ध हो उठा था।

अपने को व्यर्थ कष्ट दे रही हो, दीदी! कोई किसी का भाग्य-विधाता नहीं होता। विवाह का विरोध किया था मैंने, पर मन के किसी कोने में इस देश-परिवेश में आने की आकांक्षा भी रही होगी, अन्यथा यूं आसानी से मान जाने वाली तो मैं नहीं थी।

कुछ समझ में नहीं आता। वहाँ तो कैसी मीठी-मीठी बातें कर रहा था अर्पित। सब मुग्ध थे उसकी नम्रता पर-अमेरिका में बसा लड़का इतना विनयी? और उसकी माँ भी तो तुझ पर निहाल थीं।

मम्मी तो मुझे आज भी उतना ही प्यार करती हैं। भारत में रहती यहाँ की सचाई से तो वह स्वयं अपरिचित थीं। धक्का उन्हें भी बहुत लगा। मेरे साथ रहने को भी आई थीं।

आखिर बात क्या हुई, सुमि? तू तो हमारे हर पत्र के उत्तर में इस प्रश्न पर मौन ही रही। अर्पित से अलग हो गई हूँ, इस संक्षिप्त सूचना से जानती है, हम पर क्या बीती है।

मैं वह सच स्वीकार नहीं कर सकी दीदी, विशेषकर जिस रूप में मेरा उससे साक्षात्कार हुआ।

वही सच जानने तो इतनी दूर भागी आई हूँ, सुमि!

विवाह के बाद यहाँ आकर लगा कभी-कभी अर्पित कहीं खो-से जाते थे। कभी मेरी ही पग-चाप पर चौंक-से उठते थे। याद है दीदी, अगस्त में हम लोग डिजनीवर्ल्ड गए थे। तुम्हें फोटोग्राफ्स भी भेजे थे न।

बहुत अच्छे आए थे फोटोग्राफ्स। अर्पित और तेरी जोड़ी सभी सराहते थे। बस, कुछ ही दिनों बाद तो तूने न जाने क्या लिख भेजा कि अम्मा-बाबूजी सब घबरा गए।

तुम्हें पत्र में लिखा था सपनों के देश में घूम रहे थे हम।

शानू और रोहित तो उतावले हो उठे थे, सुमि मौसी के पास

जाएँगे, डिज्नीवर्ल्ड घूमेंगे।

मैजिक किंगडम में उस दिन हमने ‘हांटेड मैंशन’ यानी प्रेतलोक की यात्रा की थी।

प्रेत-लोक?

हाँ दीदी, मैंशन के बाहर एक कल्पित ग्रेवयार्ड है। कल्पना की जाती है, इस ग्रेवयार्ड में सोई प्रेतात्माएँ उस हांटेड मैंशन में रहती हैं। मैंशन में प्रवेश करते ही लगता है प्रेत-नगरी में पहुंच गए हैं। भयानक आवाजें, अजीब-अजीब शक्लों वाली प्रेतात्माएँ, राजसी भोज एवं नृत्य का दृश्य और अचानक सब गायब हो जाता था। बस रह जाता था दिल दहलानेवाला अंधेरा। न जाने क्यों मैं बहुत डर गई थी।

डरपोक तो तू बचपन से रही है सुमि, अम्मा कभी तुझे कहीं अकेला नहीं छोड़तीं थीं और आज तू यहाँ यूं अकेली पड़ी है।

जानती हो दीदी, जहाँ ये प्रेत-लोक की यात्रा समाप्त होती हैं, वहाँ यात्रा कर रहे व्यक्तियों के चेहरे साइड में लगे टीवी पर आ जाते हैं। अचानक मेरे चेहरे पर एक लड़की का चेहरा आकर, मेरा चेहरा छिपा गया था। मैंशन से आवाज आ रही थी- ‘इस प्रेतात्मा ने तुम्हें चुन लिया है। हमारे हांटेड मैंशन में तुम्हारी जगह आरक्षित है... जल्दी आना! तुम घर जाओगी तब भी यह प्रेतात्मा तुम्हारे साथ रहेगी।’

डरकर मैं अर्पित से लिपट गई थी। अर्पित के मौन पर मैं हंस पड़ी थी, ‘घबराओ नहीं अर्पित, अब तो दुनिया की कोई लड़की भी तुम्हें मुझसे नहीं छीन सकती, इन प्रेतात्माओं की हस्ती ही क्या है?

अर्पित का मौन तोड़ना चाहा था मैंने, ‘हाँ सच बताना, मेरे आने से पहले किसी और लड़की का भूत तो सवार नहीं था जनाब पर? सुना है अक्सर सीधे लड़के यहाँ की लड़कियों के चक्कर में जल्दी आ जाते हैं।’

चलो देर हो रही है, होटल काफी दूर है यहाँ से। अर्पित लौटने की जल्दी में थे।

अर्पित, वह देखो - वो रही मेरी प्रेतात्मा की कब्र... क्या नाम लिखा है- रोज टेलर। तो भई रोज चलते हैं, तुम मेरा साथ तो छोड़ोगी नहीं न।

चलें, मुड़कर अर्पित की ओर देखा तो अर्पित जैसे चौंक-से गए।

अजीब आवाज में बोले थे, ‘ये क्या बचपना है सुमि? यहीं सब छोड़कर चलो, साथ किसी को नहीं ले चलना है- किसी भी स्थिति में यह पॉसिबिल नहीं है।’ अर्पित अपने-आपसे बातें करने लगे थे।

उसके बाद अर्पित डिजनीवर्ल्ड ठहरे ही नहीं। पाँच दिन की जगह दो दिन बाद ही हम वहाँ से चल दिए थे। वापस आते ही मुझे यूनीवर्सिटी से अपने एडमिशन की सूचना मिली थी। किस्मत अच्छी थी, मुझे स्कॉलरशिप भी मिल गई। नहीं, किस्मत को व्यर्थ ही क्रेडिट दे रही हूँ। असल में मेरे वायोडाटा से मेरे गाइड बहुत इम्प्रेस्ड थे इसलिए...

जानती हूँ तू दुनिया की सबसे प्रतिभाशाली छात्रा है, पर बात टालने से नहीं चलेगा सुमि, आगे क्या हुआ? प्रतिमा व्यवधान सह नहीं पा रही थीं।

बस शुरू हो गई थी हमारी जिन्दगी। सुबह सात बजे हम दोनों निकल जाते थे। तुम तो जानती ही हो दीदी, कुकिंग की तो मुझे प्रैक्टिस थी नहीं, बस जैसा-तैसा, उल्टा-सीधा बना देती और अर्पित खा लेते।

क्या कभी तेरे जले-भुने खाने की शिकायत भी नहीं की, सुमि? तेरे जीजाजी तो मेरे बनाए खाने में मीन-मेख ही निकालते रहते हैं।

कभी नहीं दीदी, बल्कि स्वयं भी कुकिंग में मेरी हेल्प करते थे।

सब-कुछ इतना सामान्य था, फिर ये बिजली कैसे गिरी, सुमि?

प्रतिमा सचमुच अस्थिर हो उठी थीं।

अचानक ही तो गिरती है बिजली। उस दिन की याद करके तो आज भी स्तब्ध हूँ, दीदी!

ऐसा क्या हो गया, सुमि?

सत्रह फरवरी मैं भूल नहीं पाती, दीदी! पिछली रात किसी के घर बारबी क्यू में गए थे। पुरुष-वर्ग चिकन की ग्रिलिंग में व्यस्त था और हम सब गप्पों में मस्त थे। बाहर बातें करते बहुत रात हो गई, ठंड खा गई थी मैं। सुबह सिर में बेहद दर्द और शायद तेज बुखार भी था। अर्पित को एक काम से बोस्टन जाना था, जाते-जाते टेबलेटस के साथ आराम करने की ताकीद कर गए थे, ‘सुमि, दूध और ब्रेड खाकर आराम करना- आज स्कूल नहीं जाना है। मेरा जाना जरूरी है वर्ना रुक जाता।’

जानती हो दीदी, यहाँ यूनीवर्सिटी को भी स्कूल कहा जाता है, वैसे ही छोटे बच्चों की तरह पीठ पर बैग लादे स्टूडेंटस यूनीवर्सिटी जाते हैं।

बंद कर अपनी स्कूल-गाथा... आगे क्या हुआ? प्रतिमा झुँझला उठी थीं।

करीब बारह बजे होंगे, हल्की-सी झपकी आई होगी। फोन की घंटी घनघना रही थी। शायद काफी पहले से बज रही थी। फोन उठाते ही एक नारी-स्वर सुनाई दिया था- ‘इज मिस्टर कुमार देयर?

नहीं, वह तो बाहर गए हुए हैं, कौन बोल रही हैं?

कैलीफोर्निया ऑरफेनेज सेंटर की इंचार्ज नैनसी विलियम... आप कौन हैं?

जी मैं मिसेज कुमार हूँ।

‘मिसेज कुमार? फिर मिस्टर कुमार ने अपने बेटे को ऑरफेनेज में क्यों छोड़ रखा है?’

‘बेटा...? आप किसके बेटे की बात कर रही हैं, मिसेज विलियम?

मिस्टर कुमार की तो अभी आठ माह पूर्व मुझसे मैरिज हुई है। आप जरूर कहीं गलती कर रही हैं।’

‘आई एम श्योर मिसेज कुमार, मैंने ठीक जगह कॉल लगाई है। आई एम लुकिंग फॉर मिस्टर ए कुमार, सी ए। वह पहले कैलीफोर्निया में काम करते थे। पुअर फेलो... वाइफ से डाइवोर्स के बाद कितना टूट गया था! साथ में छह माह के बेटे की समस्या, एकदम डेसपरेट था बेचारा। मैं उसकी नेबर थी, मैंने ही सजेस्ट किया था- जब तक कोई अरेंजमेंट नहीं होता, उसके बेटे को मैं अपने पास रख लूंगी।’

बहुत नियंत्रण रख मैंने पूछा था, बेटे के बारे में मिस्टर कुमार को समय-समय पर आप इन्फार्म तो करती रही होंगी। किस एड्रेस पर पत्र भेजती थीं आप?

‘लेटर्स, फोटोग्राफ्स और बेटे की प्रोग्रेस रिपोर्ट तो उनके दिए बॉक्स-नम्बर पर भेजती रही हूँ। यों तो उसका बेटा अब दो साल का हो गया है। कुमार देखकर खुश हो जाएगा... लवली चाइल्ड।’

‘आज ये फोन पहली बार किया है, मिसेज विलियम? पिछले आठ महीनों में कभी आपने...’ कुमार ने जो फोन नम्बर दिया था, वहाँ कई बार ट्राई किया। नो रेसपोंस। उनके बेटे का शायद अपेंडिक्स का ऑपरेशन कराना पड़ेगा, कुमार की परमीशन लेना जरूरी है। ट्रंक असिस्टेंस ने ये नम्बर दिया तो लक ट्राई कर लिया। कुमार से कहिए तुरंत कांटेक्ट करें।’

सच कहती हूँ दीदी, मेरा सारा रक्त जम गया। उस सर्दी में भी पसीने से नहा उठी थी। दिमाग सुन्न हो गया था। स्तब्ध-शून्य में ताकती रह गई थी... क्या यह सच है? अर्पित विवाहित... एक बेटे के पिता अनाथालय में पलता उनका अपना रक्त...

वक्त कब और कैसे गुजर गया याद नहीं। दूसरे दिन अर्पित आए थे... काफी थके और परेशान-से...

कैसी हो, सुमि...?

‘शायद जीवित तो हूँ न?’ घृणा, क्रोध, आक्रोश से मन सुलग रहा था।

‘ओह सुमि... सच इतना बिजी रहा... चाहकर भी तुम्हें फोन नहीं कर सका। कान्फ्रेंस के बाद सबसे मिलना जरूरी था, फिर डिनर देर रात तक चलता रहा। सोचा तुम सो गई होगी, डिस्टर्व न करूँ। आई एम रियली सॉरी, सुमि!’

‘मिसेज विलियम का फोन आया था।’ अजीब कटुता आ गई थी मेरे स्वर में।

‘मिसेज विलियम...’

‘क्यों, उन्हें नहीं जानते? आपके बेटे को पाल रही हैं, उन्हें याद करने में इतनी देर लगती है?’

‘सुमि...’

‘ये सब क्या है, अर्पित? इतना बड़ा झूठ... इतना बड़ा धोखा... क्यों... किसलिए? क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा?

किस जन्म की दुश्मनी निभायी है तुमने?’ आगे गला रुंध गया था।

सिर झुकाए खड़े रह गए थे अर्पित। धीमे से सप्रयास बोलना चाहा था, ‘कई बार चाहा तुम्हें सब-कुछ बता दूं, पर...‘डर लगता था न? विवाह करने आते समय कहाँ गया तुम्हारा भय? कितनी आसानी से इतना सब-कुछ छिपा डाला, अर्पित... और मैं अपने को भाग्यशालिनी समझने का अपराध

करती रही। तुम्हारे झूठ के आड़े मैं मानिनी बनी रही...’ आगे के स्वर सिसकी में डूब गए थे।

तैश में मैं बिस्तर से उठ गई थी। पिछले दिन के उपवास और टेंशन से शायद डगमगा गई थी। अर्पित ने सम्हालना चाहा तो चिल्ला पड़ी थी मैं-‘मुझे छूने की कोशिश मत करना... यू चीट, लायर!’ एक सूटकेस में दो-चार साड़ियाँ डाल जब मैं घर से निकलने लगी तो अर्पित राह रोक खड़े हो गए थे-‘इतनी जल्दी कोई निर्णय नहीं लो, सुमि! अपनी स्थिति स्पष्ट करने का एक मौका तो दो!’

‘एक मौका...? पूरे आठ महीनों का समय मिला था तुम्हें, अर्पित! यह झूठ तो कल्पना से भी परे था। तुम-जैसों के कारण विश्वास शब्द अपना अस्तित्व खो चुका है। आई सिम्पली हेट यू... आई कांट स्टैंड यू एनी मोर। छोड़ो मेरा रास्ता...!’

उत्तेजना में आँसू भाप बन उड़ गए थे। उसी स्थिति में मैं एड्रीना के घर पहुंची थी।

एड्रीना... ये एड्रीना कौन है, सुमि?

मेरी अमेरिकन मित्र। उस दिन अगर उसने साथ न दिया होता तो पता नहीं आज मैं जीवित भी होती या नहीं... पूरी बात सुनते ही एड्रीना ने कहा था-‘बहुत अच्छा किया सुमि, ऐसे फरेबी के साथ रहना तेरा अपमान होता। हमारी सोसायटी में विवाह टूटते हैं, पर उनमें झूठ का आश्रय नहीं लिया जाता। बड़ी ईमानदारी से अपने साथी को सब-कुछ बताकर अलग हो जाते हैं। सचाई के साथ ही हम सब कटु सत्य को स्वीकार करते हैं और सचाई के साथ सब छोड़ देते हैं।’

एड्रीना ने मुझे जीने की नयी राह दिखाई थी, दीदी! मैं उसकी रूममेट बन गई। पहली प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप में भारत वापस जाने की थी, पर एड्रीना ने ही समझाया था, ‘वहाँ वापस जाकर दूसरों की दया-पात्री बनने से क्या ये अच्छा नहीं तुम एक नया जीवन शुरू करो, सुमि? यहाँ की स्कॉलरशिप पाने के लिए लोग क्या-कुछ नहीं करते और तू उसे छोड़ जाएगी? अपने भविष्य का निर्णय सोच-समझ के लेना, सुमि!’

और मैंने, यहाँ इस देश में ही रहने का निर्णय लिया था, दीदी!

इस पराए देश में तुझे क्या-कुछ नहीं झेलना पड़ा! सुमि, आने दे अपने जीजाजी को, उस अर्पित के बच्चे की नौकरी न छुड़ा दी तो मेरा नाम प्रतिमा नहीं। पूरे खानदान की खबर लूंगी मैं!

दीदी के उत्तेजित स्वर पर सुमिता हंस पड़ी थी- पराजित को परास्त करने में क्या आनन्द, दीदी!

क्या कहती है, सुमि? तेरी पूरी जिन्दगी बर्बाद कर दी और तू उसे पराजित कह रही है?

इसी भारतीय मनोवृत्ति के कारण तो मैं वापस नहीं गई, दीदी! सबकी सहानुभूति पा कितनी असहाय रह जाती मैं! यहाँ मैं मेधावी छात्रा... सुमिता वर्मा भर हूँ। मेरे अतीत को न कोई जानता है, न जानना चाहता है।

अच्छा उस दिन के बाद कभी अर्पित आया तेरे पास?

हाँ, आने की चेष्टा तो कई बार की थी। एक लम्बा-सा पत्र भेजा था, अपनी दयनीय परिस्थितियों का हवाला दे क्षमा भी चाही थी।

आखिर असली बात क्या थी, सुमि?

मेरे लिए तो असली बात इतनी-भर थी कि मेरी आस्था, मेरे विश्वास का अपमान हुआ। उसकी जो भी विवशता रही हो, विवाह के पूर्व बतानी थी। यह बात मैं कभी नहीं भूलूंगी, दीदी!

अमेरिकन लड़की से उसने विवाह क्यों किया था, सुमि?

ग्रीन कार्ड पाने के लिए वह एक समझौते का विवाह था। शायद - व्यंग्य से सुमिता के अधर खिंच गए थे।

वाह, भली सुनाई! समझौते के विवाह में बेटे के जन्म की भी शर्त थी क्या? घृणा प्रतिमा के चेहरे पर लिख गई थी।

वह किन्हीं दुर्बल क्षणों का परिणाम है, दीदी... शायद यही स्पष्टीकरण तो देना चाहा था अर्पित ने।

कितना पैसा देना पड़ा अर्पित को उस चुड़ैल से पीछा छुड़ाने को?

किसे चुड़ैल कह रही हो, दीदी? अर्पित की मित्र थी वह, क्या पता निःस्वार्थ मदद की हो उसने... और किसने किसे छोड़ा यह जानने की तनिक भी इच्छा रह नहीं गई थी। ग्रीन कार्ड दिलाने के लिए ऐसे विवाह सामान्य बात तो नहीं, पर किए भी जाते हैं।

अर्पित के मन में वह लड़की आज भी है, कहीं ऐसा सोचकर ही तूने उसे... प्रतिमा का वाक्य काट सुमिता ने तीखे स्वर में कहा था, अर्पित के मन में उसका क्या स्थान है, नहीं जानती, पर उसके बेटे के प्रति मैंने अन्याय नहीं होने दिया, दीदी! उसके अधिकार दिलाए हैं मैंने।

अपने अधिकार छोड़कर न?

अधिकार तो उस पर होता है, दीदी, जो बस अपना हो। अर्पित पर तो मेरे अधिकार का प्रश्न ही नहीं उठता।

फिर अर्पित से बात भी क्यों करती है, सुमि?

ऑपरेशन के बाद बेटे को यहाँ पहुंचते ही न्यूमोनिया हो गया था।

दीन-असहाय अर्पित रो पड़े थे। उस समय प्रेम-द्वेष का प्रश्न ही कहाँ रह गया था? भागती हुई हॉस्पिटल गई थी साथ में। उस गम्भीर बीमारी में मेरे ही हाथ से दूध की बोतल लेता था। न जाने क्यों टुकुर-टुकुर ताकता था मुझे... पिता के अन्याय की क्षमा माँगता-सा...

तो क्षमा कर देती, सुमि?

क्षमा का प्रश्न वहाँ उठता है, जहाँ अपराध अनजाने में होता है, यहाँ तो सब-कुछ पूर्व-नियोजित षड्यन्त्र था न?

उसकी सफाई पर तो ध्यान देती, सुमि?

सफाई देने के लिए कोर्ट है, मैं तो उसकी विवाहिता पत्नी थी...

तो ले जाती उसे कोर्ट, कम-से-कम मेण्टेनन्स तो ले लेती! दाल-आटे का भाव पता लग जाता बच्चू को। क्या समझा है उसने? क्या हम सब मर गए हैं? तू जरा भी कुछ लिखती तो हम उसे मजा चखाते।

किसे मजा चखातीं, दीदी? अपमान की जिस आग में वह जल रहा है वही दण्ड क्या कम है?

अजीब लड़की है तू, सुमि! उसने तेरा जीवन व्यर्थ कर दिया, पर तुझे कोई फर्क ही नहीं पड़ा?

जो फर्क पड़ा है उसे नहीं समझोगी। जिस पर अपने से भी ज्यादा विश्वास किया उसका किया विश्वासघात सह पाना क्या आसान है? एक हल्की-सी उसाँस ली थी सुमि ने।

सच सरेआम कोड़े लगने चाहिए ऐसे आदमी के। नीच, पापी कहीं का! प्रतिमा का स्वर क्रुद्ध था।

जानती हो दीदी, एलेन का पत्र आया है मेरे पास। मेरे प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है। मैंने उसके बेटे को उसके पिता के पास पहुंचाने में मदद की है न? सच बड़ा क्यूट है रोहित... कल उसके बर्थ-डे में चलोगी न, दीदी?

ये कैसा रिश्ता बाँधे बैठी, है सुमि? डूब जाएगी तू। प्रतिमा का स्वर हारा हुआ था।

रिश्ता तो हम-दोनों के बीच बस अब दूरियों का है, दीदी! हम दो समानांतर रेखाएँ बन गए हैं, साथ चलते हुए कभी न मिलने के लिए...

कैसे जी पाएगी, सुमि? प्रतिमा का कण्ठ अपनी इस दुलारी बहिन के लिए भर आया था।

मैं जीवन से निराश नहीं हूँ, दीदी! आज का यह अनुभव अपने प्रति, अपनी शक्ति के प्रति मेरा विश्वास बना है।

तू फिर विवाह करेगी, सुमि?

फिलहाल तो किसी नये एक्सपेरिमेंट का कतई इरादा नहीं है, दीदी!

फिर क्या इरादा है तेरा? अम्मा से क्या कहूँगी जाकर, सुमिया?

बस अभी तो सोने का प्रोग्राम है, दीदी! एक पल रुक सुमिता ने कहा था- मैंने जीना सीख लिया... क्या अम्मा-बाबूजी के सन्तोष के लिए ये बात काफी नहीं है, दीदी? तुम उन्हें मेरी ओर से आश्वस्त तो कर सकोगी न? बहुत दुलार से दीदी से लिपटकर लेटती सुमिता मनुहार कर उठी थी। पास लेटी सुमिता को प्रतिमा ने कस के अपने से चिपटा लिया था।

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साभार – गर्भनाल जुलाई 2010  (http://www.garbhanal.com )

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dil ko andar tak chhune vaalee kahaanee. itanee sundar kahaanee ke liye badhaaee .

तलाक के कारणों में ये मुख्य कारण हो सकते है विदेश में ?कितु अपने देश में दूसरी तरह के धोखे खाकर भी महिलाये अपने पावो पर खड़ा होना सीख गई है \
एक संदेस देती अछि कहानी \

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