शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य - कंकालों के कारनामें

चाचा दिल्लगी दास आज जब मिले, तो काफी खौफजदा थे। मेरी तसल्ली भरी बातों से उनके होशोहवास जरा ठिकाने आए, तो बोले कि भतीजे, आजकल मैं डरा-डरा -सा महसूस कर रहा हूं। मुझे सोते-जागते, उठते-बैठते अपने चारों ओर कंकाल ही कंकाल नजर आते है। और मैं दावे के साथ कह नहीं सकता कि ये नरकंकाल किसके हैं, क्योंकि कंकालों की कोई पहचान नहीं होती। ये कंकाल निठारी के भी हो सकते हैं, तो आंध्रप्रदेश के किसानों या असम के हिंदी-भाषियों के भी हो सकते हैं। कंकाल चाहे जिनके भी हों, मुझे ये ही नजर आते हैं। अब इसका क्योंकि इलाज कि टेलिविजन के पर्दे पर चाहे कोई भी प्रोग्राम आ रहा हो, मुझे कंकाल नजर आते है।

अखबार में चाहे किसी खबर के साथ जिस किसी का भी फोटो छपा हो, मुझे कंकाल नजर आते है। फुटपाथ से लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक सिर्फ और सिर्फ कंकाल नजर आते है। चाचा जरा रुक कर बोले कि भतीजे, ये कंकाल बहुत ताकतवर होते हैं। ये न पुलिस के डण्डे् से, न अण्डरवर्ल्ड के भाइयों की धौंस से, न न्यायालय के कानून-कायदों से घबराते, न लफ्फाज नेताओं के भाषणों से विचलित होते हैं ये तो बस ये हैं, जो भी दिल में ठान लेते है, उसे अंजाम देकर ही दम लेते हैं। मैं इसलिए इन कंकालों से डर रहा हूं। और अकेला मैं ही क्याद, इनसे तो बड़े-ब तीसमारखां तक डर कर थर-थर कांप रहे हैं। अभी इन्होंने जो कोर्ट में कर दिखाया, उसे देखते हुए तो लग यूं रहा हैं मानो वादी से लेकर पुलिस, वकील, जज और जल्लाद तक सब ये कंकाल खुद ही हैं।

इन्होंने न्याय मांगा नहीं, बल्कि न्याय कैसे पाया जाता हैं,एक प्रयोग कर दिखाया हैं। और जो न्याय के लिए अदालत का मुंह नहीं ताकते, उनसे खतरनाक इस दुनिया में कोई नहीं हो सकता। बस यही सोच -सोच मैं इन कंकालों से डर रहा हूं। चाचा ने अपना तपसरा मुसलसल जारी रखते हुए कहा कि भतीजे, तुम मेरी बात को इतना सहज ही मत लेना, बल्कि इसकी गंभीरता को जरा अपने जेहन पर जोर डाल कर समझना। ये कंकाल वाकई बङे खतरनाक साबित होंगे। अभी तो ये सिर्फ मिले ही हैं कि कइयों की वर्दियां छिन गई, कईयों की कुर्सी की चूलें हिल गईं, जब ये अपनी जुबान खोलेंगे, तब देखना इनकी करामात कि ये कंकाल अपने जाल में किस-किस को गिरफ्तार करते हैं।

जो भी फिलहाल इनके प्रति अपनी सहानुभूति जताते हुए लम्बे-चौड़े भाषण दें रहे हैं, ये कंकाल उनकी बोलती बंद कर देंगे। चाचा जाते-जाते कह गए कि मैं तो नाहक ही डर रहा हूं। डरना तो उनको चाहिए जो कि इन कंकालों की कहानी से संबद्ध हैं और डरना उनको भी चाहिए, जिन पर कंकालों की गाज गिरने वाली हैं और यकीनन उनको पल-पल ये कंकाल ही नजर आ रहे होंगे, कभी अपने जब से राजफाश करते, तो कभी गर्दन की तरफ पंजे फैलाकर दबोचने को लपकते।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

pvishvkarma@gmail.com

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