अपर्णा भटनागर की कविता : सागर और हम

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भावना नवरंग की कलाकृति bhawna navarang

सागर और हम
तेरी अनंत देहरी पर
सागर का दीपक
जिसमें लहरें
नेह -कंप
जीती उद्वेलित -
उन पर झिर-झिर
एक झिरी- सी
निस्तब्ध,
मूक ऊपर को उठती
सूरज की
रह-रहकर हलकी
लौ सिहरती है.
किसी अनंत बूंद के भीतर
आवेग ठेल
खुद से लड़ती
चप्पू के काट बनाकर के
पानी की कोमल मज्जा
विद्रोह कोख से करती है
तब लहर सिरजती है .


सागर की निस्सीम देह पर
एक उछाल छोटी मछली का -
टूटे घोंघे
सीप-सीपियाँ
बहते शंख
चट्टान दरकना
उनकी तह में
मुक्ता-मणियों की
आँख लरजती है .


इस अनंत विस्तार शून्य में
एक कंप
गति ;
एक शब्द ,विस्फोट
वाष्प
जलते बादल से
सूरज की सौ लीक तोड़
बिजली की चांदी -रेखा
नभ के अधरों के छोरों पर
निष्काम विहंसती है .
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(चित्र – भावना नवरंग की कलाकृति)

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1 टिप्पणी "अपर्णा भटनागर की कविता : सागर और हम"

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