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राजीव - जया – अपर्णा की कविता : सागर

तीन रचनाकारों - राजीव-जया-अपर्णा ने मिलकर एक कविता लिखी है. यह एक अनूठा प्रयोग है. पाठकों की प्रतिक्रियाएँ वांछित हैं.

सागर
सागर अपनी अतल गहराइयों में
शामिल किये हुए है
सृष्टि के कई रत्न-बीजों को
जिनसे उत्पन्न हुआ चाहता
अलौकिक अलंकरण ...
...कालांतर में जो देदीप्यमान रहेगा
प्रलयों के आने पर भी
और लिखी जाएगी जिससे
संसार और प्रकृति की कई विकास-गाथाएं
मनुज जिसमें सिर्फ एक कर्ता होगा
संततियों को आगे बढ़ाते जाने का.......!

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समंदर मौन है अब भी...
वह, जो ज्वालामुखी फटा था
अंतर में उस के....
क्या तुम सुन पाए
उसका उद्वेलन?...
बस...
इसी तरह
ह्रदय में दबाये
हज़ारों ज्वालामुखी...
लेटा है -
चुप...
बस कभी कभी
आभास दिला जाती हैं...
लहरें समंदर की
कि वह मृतप्राय
कांप रहा है...
शायद....
कितने नौसादर फूटते हैं
बहते हैं
बिखरी लहरों के भीतर
क्या इस बिखराव को जान पाए तुम ?
रोज़ चट्टानों के हाथ पर ...
क्लांत सो जाता है
अवसाद का खारा समंदर !
अपने में अकेला
अपनी विशालता से सहमा -
किसी ज्वार की सम्भावना
भविष्य का नेपथ्य से आना -
कहीं टूट कर यूँ न बिखर जाऊं
कि तुम ठिठक भी न पाओ
और तुम्हारी निगाहों के रास्ते
चलने भर रेत भी खो बैठें !
मेरे डर कहीं तुम्हारे हिस्से न आयें -
इसलिए कांपता हूँ
रह-रहकर सिहरता हूँ
कभी सन्नाटे में शोर करता हूँ
सुन रहे हो न !
जो भीतर से बोलता हूँ !

विषय:

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कितने नौसादर फूटते हैं
बहते हैं
बिखरी लहरों के भीतर
क्या इस बिखराव को जान पाए तुम ?
रोज़ चट्टानों के हाथ पर ...
क्लांत सो जाता है
अवसाद का खारा समंदर !
dil ko chone vali, bahut khoob


पॉल बाबा का रहस्य आप भी जानें
http://sudhirraghav.blogspot.com/2010/07/blog-post_10.html

विषय एक है पर लगता है कविताएं दो हैं । दोनो ही सुंदर ।
कालांतर में जो देदीप्यमान रहेगा
प्रलयों के आने पर भी
और लिखी जाएगी जिससे
संसार और प्रकृति की कई विकास-गाथाएं
मनुज जिसमें सिर्फ एक कर्ता होगा
संततियों को आगे बढ़ाते जाने का.......!
बहुत ही गहरे पैठ कर लिखा है ।

मेरे डर कहीं तुम्हारे हिस्से न आयें -
इसलिए कांपता हूँ
रह-रहकर सिहरता हूँ
कभी सन्नाटे में शोर करता हूँ
सुन रहे हो न !
जो भीतर से बोलता हूँ ! bahut sundar pankiyan ...समंदर के भीतर करवट लेता है ज्वालामुखी ... शायद वही दर्द लहरों का शोर बनकर उभरा है ..

अपर्णा दी, जया दी, मै तो पहले ही आप लोगो की लेखन की कायल हूँ,
और जहाँ ये अदभुत संगम हो तो फिर तो कहना ही क्या.... अद्वितीय...
"..कालांतर में जो देदीप्यमान रहेगा
प्रलयों के आने पर भी
और लिखी जाएगी जिससे
संसार और प्रकृति की कई विकास-गाथाएं "
बहुत खूब...यहाँ प्रलय की भी परवाह नहीं...
"रोज़ चट्टानों के हाथ पर ...
क्लांत सो जाता है
अवसाद का खारा समंदर ! "
और यहाँ समंदर की वेदना, पीड़ा मानो सब उभर आई हो....

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