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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : जाना सौंवी बैठक में

yashwant kothari new (Mobile)    

अभी-अभी सौंवी बैठक में जाकर आया हॅू। दाह कर्म के मृतक की शोक सभा ही सबसे महत्वपूर्ण होती है लेकिन हमारे समाज को क्या हो गया हैं?
    इस बैठक को ही ले मैंने एक मित्र को फोन किया भाई कल की तीये की बैठक है चलोगे क्या?
    'उसका मासूम सा जवाब था, शाम को कुछ जरूरी काम है। यार तुम चले जाना।'
    एक अन्य मित्र को फोन किया यार कल तीये की बैठक है, चलना है, तुम कहां मिलोगे। उसका जवाब था, 'यार जरूर चलता मगर क्या करू सास-ससुर आये हुए हैं।'
    तीसरा मित्र और भी ज्यादा दुनियादार था बोल पड़ा, 'बैठक 4 से 5 बजे की है। साढ़े चार पोने पांच तक पहुंच जायेगें। जल्दी ही छुट्टी मिल जायेगी।'
    मैं सोचने लगा ये ही मित्र लोग मृतक के हम प्याला हम निवाला थे। हर खुशी के मौके पर उसके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करते थे और आज उसकी बैठक के लिए समय का अभाव है। किसी ने सच ही कहा है 'बड़े आदमी का कुत्ता मर जाता है तो पूरा शहर मानसपुसी करता है और बड़ा आदमी मर जाता है तो शमशान घाट तक लोग नहीं जाते।
    बैठक में भी अजीब नजारा था। कुछ लोग मोबाइल पर बात कर रहे थे। नई पीढ़ी के लोग चकाचक कपड़े पहन कर मुस्तेदी से खड़े थे। पण्डित जी थे। वे गरूड पुराण, गीता और रामधुनी का पाठ कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त थे। कुछ आंखे बंदकर भगवान की स्तुति में लीन थे। मृतात्मा की आत्मा की शान्ति के लिए कुछ भले मानस शोक सन्देश लेकर आगे बैठे हुए थे। अवसर मिलते ही शोक सन्देश पढ़ने लग गये। कुछ और थे जो जल्दी जाना चाहते थे। कुछ को शादी में जाना था, कुछ को बहुत दूर जाना था। रास्ते में टे्फिक जाम की समस्या थी। बैठक में बुजुर्ग लोग अलग बैठे थे, वे शादी विवाह सम्बन्धों की चर्चा कर रहे थे। महिलाएं अलग बैठी थी, मगर वे चुप ही थी। बाद में पत्नी ने बताया महिलाएं अन्य बातचीत में व्यस्त थी। कोई साड़ी की तारीफ कर रही थी तो कोई दूसरी के गहनों को ईप्या से निहार रही थी। महिलाएं वैसे शोकाकुल थी, कुछ की आंखों में आंसू भी थे, मगर थेाड़ी देर बाद वे वापस सामान्य स्थिति को प्राप्त हो गई थी।
    एक महिला सबके आकर्पण का केन्द्र थी, बाद में पता चला कि किसी राजनैतिक पार्टी की कार्यकर्ता थी।
    पण्डित जी रामधुन गा रहे थे। मृतात्मा की शान्ति के लिए पाठ चल रहा था। शान्ति पाठ के बीच-बीच में शोक सन्देश पढ़े जा रहे थे। कुछ वक्ताओं ने दिवंगत आत्मा के सद्गुणों की चर्चा भी की। बैठक चल रही थी। लेकिन लोगों का ध्यान बैठक की समाप्ति की ओर ज्यादा था। कुछ लोग घड़ी देख रहे थे, कब पांच बजे और चले।
    बैठक समाप्त हुई, पुप्पांजलि हुई। सभी ने एक दूसरे से राम-राम किया। पास के मन्दिर में दर्शन किए और बैठक पूर्ण हुई। लेकिन मूल प्रश्न अभी भी यही है कि बैठक में जाने तक के लिए लोगों के पास समय नहीं है और एक दिन जाना सबको है। और अन्त में सन्तवाणी
        ''मरणों भलो विदेश को जहां नहीं आपणों कोय।
         माटी खावे जनावरा महामहोरथ होय।।''

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-यशवन्त कोठारी, 86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन – 2670596

ईमेल - ykkothari3@yahoo.com

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