बुधवार, 14 जुलाई 2010

आलोक श्रीवास्‍तव की ग़ज़लें

ग़ज़लें

1

असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है,

पुरानी नदियों का मीठा पानी, नए समंदर से झांकता है.

 

न जिस्‍म कोई, न दिल न आंखें, मगर ये जादूगरी तो देखो,

हर एक शै में धड़क रहा है, हर एक मंज़र से झांकता है.

 

लबों पे' ख़ामोशियों का पहरा, नज़र परेशां उदास चेहरा,

तुम्‍हारे दिल का हर एक जज़्‍बा, तुम्‍हारे तेवर से झांकता है.

 

चहक रहे हैं चमन में पंछी, दरख्‍़त अंगड़ाई ले रहे हैं,

बदल रहा है दुखों का मौसम, बसंत पतझर से झांकता है.

 

गले में मां ने पहन रखे हैं, महीन धागे में चंद मोती,

हमारी गर्दिश का हर सितारा, उस एक ज़ेवर से झांकता है.

 

थके पिता का उदास चेहरा, उभर रहा है यूं मेरे दिल में,

कि प्‍यासे बादल का अक्‍स जैसे, किसी सरोवर से झांकता है.

 

2

वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,

मैं जब भी तन्‍हां होता हूं, मुझे घर याद आता है.

 

मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,

तेरे अपनों को गांव में, तू अक्‍सर याद आता है.

 

जो अपने पास हो उसकी कोई क़ीमत नहीं होती,

हमारे भाई को ही लो, बिछड़कर याद आता है.

 

सफलता के सफ़र में तो कहां फुर्सत के, कुछ सोचें,

मगर जब चोट लगती है, मुक़द्दर याद आता है.

 

मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,

नवंबर याद आता है, दिसंबर याद आता है.

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(साभार – हंस, जुलाई 2009)

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