गुरुवार, 15 जुलाई 2010

अशोक गौतम का व्यंग्य : प्रेमचंद के बहाने

ashok gautam

विश्‍वविद्यालय से थका हारा, हद से परे की राजनीति कर, अपने सहयोगी को पटखनी दे बैंड बाजे के साथ घर पहुंच चैन की सांस लेने को तैयार ही हुआ था कि फोन की घंटी बज उठी। वैसे एक बात कहूं। जबसे विश्‍वविद्यालय में गया हूं, पठन पाठन कहीं गांव की तरह कोसों पीछे छूट गया है। अब तो कभी सपने में भी गांव जाना नहीं होता। बस राजनीति करते रहो, पगार लेते रहो। जाहिर था कि फोन लोग सहयोगी को पटखनी देने की खुशी में बधाई देने के लिए ही कर रहें होंगे। रिसर्च पेपर छपने पर तो सभी गालियां देते हैं। बड़े थके दिमाग का होने का सफल अभिनय करते हुए फोन उठाया तो दूसरी ओर से मरी सी आवाज आई। हद है यार !लोग बाग किसी के मरने पर तो मरी सी आवाज में बात करते ही हैं, खुशी के मौके पर बधाई देते हुए भी मरी सी आवाज करने लगे हैं। माना, औरों की खुशी अपने लिए मरने के समान होती है पर औपचारिकता भी तो कोई शब्‍द है,‘ हैलो हैलो․․․'

‘कौन??'मैंने आवाज को इतना थका दिया कि बंदे को लगे कि विश्‍वविद्यालय में बुद्धिजीवियों के अतिरिक्‍त और कोई होता ही नहीं। या कि विश्‍वविद्यालय तथाकथित बुद्धिजीवियों की बपौती होती है। तभी तो अपने विश्‍वविद्यालय में चाय बनाने वाला भी डॉ․ साहब है।

‘डॉ․ साहब! मैं अकादमी से बोल रहा था।' दूसरी ओर से आवाज आई तो जीभ मूतने लगी। तय था किसी लेखक की जयंती या पुण्‍यतिथि का रंगारंग कार्यक्रम होगा। ऐसे कार्यक्रमों का पट्‌टा तो हम ही लिखवा कर लाए हैं सो मैंने फुदकते हुए कहा,‘ और शर्मा जी, क्‍या हाल हैं? कैसे याद किया?'

‘आपको याद किए बिना मरना है किसी लेखक की पुण्‍यतिथि या जयंती मना।'

‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं। इस बहाने लेखक को श्रद्धांजलि हो जाती है बस। तो किस किस को बुला रहे हो?'

‘जिसको आप कहेंगे। आप कहो तो जिस लेखक की जयंती मना रहे हैं उसे भी न बुलाएं।' दूसरी ओर से विनम्रता से अधिक विनम्र शब्‍द कानों में पड़े तो एक बार फिर अपने वजन पर भरोसा हुआ,‘ हां तो ऐसा कीजिए, अपोजिशन का एक भी लेखक तो लेखक, मच्‍छर तक नहीं होना चाहिए समारोह में। वरना हमारा बायकाट समझिए।' मैंने साफ कह दिया तो कह दिया। ये क्‍या कि वहां जाकर लेखक की जयंती मनाने के बदले खींचते रहे एक दूसरे की धोती और जयंती में हो जाए पुण्‍यतिथि॥ याद रखिए, ये जयंती तो प्रेमचंद की हो पर पुण्‍यतिथि हो विपक्षी टोले की।

‘आप निश्‍चिंत रहिए बस! लेखकों के दिमाग के कीड़े को हम अच्‍छी तरह जानते हैं। ये बाल यों ही सफेद नहीं हुए डॉ․ साहब! अपोजिशन का एक भी लेखक तो क्‍या, मक्‍खी का साया भी हम नहीं बुलांएगे। हमें भी तो सरकार को जवाब देना है साहब! जिसकी रोटी खाते हैं उससे गद्‌दारी! ऐसा तो कुत्‍ते भी नहीं करते और हम तो बुद्धिजीवी हैं बुद्धिजीवी। हम कार्यक्रम में गधे बुला लेंगे पर तय मानिए विरोधी खेमे का एक भी बुद्धिजीवी नहीं होगा। आपको इस कार्यक्रम में प्रेमचंद पर एक शोध पत्र पढ़ना है। हां कहो तो हम कृतार्थ हों।' उन्‍होंने कहा तो मुझे चक्‍कर सा आया। अब जब कोई मेरे आगे पढ़ने पढ़ाने का नाम लेता है तो मुझे कै सी आने लगती है।

‘अरे यार, अब कहां वक्‍त लगता है कुछ लिखने का! पार्टी के कामों से फुर्सत मिले तो कुछ लिखें। सच कहूं! पार्टी के कामों में इतना व्‍यस्‍त हो गया हूं कि कई बार तो अपने नाम के अक्षर भी गलत लिख बैठता हूं।'

‘ ऊपरले दर्जे के बुद्धिजीवियों के साथ ऐसा ही होता है डॉ․ साहब! वह पुराने वाला प्रतिशोध पत्र ही पढ़ देना। चलेगा।'

‘पर वह तो कबीर पर है और ये रही प्रेमचंद जयंती।' मेरे मन में पता नहीं शंका क्‍यों उपजी?

‘अरे तो क्‍या हो गया डॉ․साहब! कबीर की जगह प्रेमचंद कर दो।' लगा वे मुझे आब्‍लाइज करके ही दम लेंगे। उन्‍हें भी किसी ने बता दिया होगा कि इन दिनों मैं किताबों के नहीं मुख्‍यमंत्री के बहुत नजदीक हूं। वैसे भी नौकरी में रह आप एक साथ दो के नजदीक तो हो ही नहीं सकते,‘ एक बात कहूं डॉ․ साहब!'

‘कहो?'

‘वैसे भी अब मौलिक शोध हो ही कहां रहा है? चिपकने चिपकाने के दौर में मौलिकता को थू। तो आपकी हां समझूं?'

‘पर कार्यक्रम है क्‍या? सीएम साहब तो आ ही रहे होंगे?'

‘वह तो आएंगे ही। उनके बिना तो भगवान की जयंती भी नहीं होती।'

‘लंच लुंच तो रहेगा ही। अबकी बार कुछ लीक से हटकर होना चाहिए साहब!'

‘ वह चिंता न कीजिए डॉ․ साहब! प्रेमचंद जयंती पर प्रेमचंद को शिकायत हो सकती है पर बुलाए गए लेखकों को कोई शिकायत का अवसर देने वाले हम नहीं। आगे भी तो जयंतियां करवानी हैं।'

‘ शिकायत तो नहीं कर रहा पर पिछली बार भी कबीर जयंती पर लंच में किसी को चपाती मिली थी तो किसी को दाल के दाने तो किसी को दाल का पानी। थोड़ा सा तो ध्‍यान रखना ही चाहिए न बुद्धिजीवियों का।'

‘ पर डॉ․ साहब! बुरा न माने। वह टाटा, बिरला की जयंती तो थी नहीं, कबीर की थी। दूसरे, कबीर तक आते आते अकादमी का जयंती बजट ही खत्‍म हो गया था। कबीर की पुण्‍यतिथि होती तो क्‍या मजाल आप ये शिकायत कर रहे होते। ऐसे में लंच का स्‍तर ऊंचा कर देते तो ऑडिट आब्‍जेक्‍शन लग जाता। कबीर की आत्‍मा एक बार फिर विद्रोह कर देती तो?? हमारी विवशता भी समझा कीजिए। हमें तो दो दो का एक साथ ध्‍यान रखना पड़ता है।'

‘मतलब???'

‘मरे लेखकों का भी और वर्तमानों का भी। तो प्रेमचंद प्रतिशोध पत्र वाचन के लिए आपको फाइनल समझूं न? निमंत्रण पत्र में आपका नाम छपवा दें?'

‘ आप मान ही नहीं रहे तो हां कर ही देता हूं। चलो, इस बहाने प्रेमचंद से मैं भी तनिक उऋण हो जाऊंगा और दो चार दोस्‍त मिल बैठ बतिया भी लेंगे, कुछ खा पी लेंगे। मुफ्त में तो आजकल कोई मरना भी नहीं चाहता।' वे भी खुश तो मैं भी खुश! प्रेमचंद तो जब थे तब ही खुश नहीं रहे तो अब तो क्‍या होंगे। हे प्रेमचंद! तुम्‍हारी जयंती तो एक बहाना है, असल में इस बहाने अपने गुट के बुद्धिजीवियों पर बजट लुटाना है।

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डॉअशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, सोलन-173212 हिप्र

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