दामोदर लाल जांगिड़ की कविता - लकड़हारा

लकड़हारा

मुझे मत काट अपने पेट की खातिर लकड़हारे!

अभी भी वक्‍त कुछ बेरहम अब भी सँभल जा रे!!

मेरी हर डाल पर जो नीड़ ये दिखलाई पड़ते हैं,

बड़ी मेहनत से तिनके चुन पंखेरु इनको बुनते हैं।

इन्‍ही तिनकों में इनके कुछ सलोने स्‍वन पलते हैं,

कुल्‍हाड़ी मुझपे पड़ती हैं ये बेचारे बिलखते हैं।

मुझे काटा तो बेघरबार हो जायेंगे ये सारे

मुझे मत काट अपने पेट की खातिर लकड़हारे!

 

कभी जब काट कर के पेड़ धरती पर गिराया है ,

तेरी भी सांस फूली तन पसीने से नहाया है।

तभी चारों तरफ देखा कहाँ वृक्षों की छाया है,

जहाँ तक भी नज़र दौड़ी नज़र ना पेड़ आया है।

चिढ़ा कर धूप बोली आखिरी ये ही बचा था रे !

मुझे मत काट अपने पेट की खातिर लकड़हारे!

 

सरल वन प्राणियों ने आसरा आहार पाया है,

तुम्‍हारे वास्‍ते फल ,फूल और औषधि जुटाया है।

गरल पी हमने , दुनिया के लिये अमृत जुटाया है,

तो किस उपकार का बदला कुल्‍हाड़ी से चुकाया है।

विरासत की ये नेमत पीढ़ियों को तू भी दे जा रे !

मुझे मत काट अपने पेट की खातिर लकड़हारे!

 

हैं काटा तूने जिन पेड़ों को उनका शाप लगजाये,

तेरा षव दाह करने के लिये लकड़ी न मिल पाये।

तवे जैसी तपे धरती कहर लू तुझपे बरपाये,

सताये वन्‍य प्राणी , लाष तेरी नोच कर खाये।

ये तेरे हाथ हैं विध्‍वंसरत क्‍योंकर सृजनहारे??

मुझे मत काट अपने पेट की खातिर लकड़हारे!

 

दामोदर लाल जांगिड़

टिप्पणियाँ

  1. दामोदर जी की कविता, खास्तौर पर अंतुइम शाप वाली पंक्त्तियाँ कुछ सवाल खड़े करती है।
    उत्सुकता है जानने की कि कवि उन प्रश्नों से दो चार हुआ या नहीं।
    लकड़हारा तो एक अपने और अपने परिवार का पेट भरने के लिये पेड़ से लकड़ी काटता होगा। कितनी काट लेगा?
    बाकी जब कभी लोग लकड़ी खरीदते थे खाना बनाने को, वो कहाँ से आती थी?
    जिन कागजों को कवि, लेखक रात दिन काला करते हैं वह किस तरह के वन से बना है?
    खाने के लिये जितने वन काटने की जरुरत नहीं होती उससे कई गुना वन कागज बनाने के लिये कटते हैं,
    फर्नीचर बनाने के लिये कटते हैं
    ऐसे में शाप खाली एक गरीब लकड़हारे को क्यों?

    उत्तर देंहटाएं
  2. दामोदर जी की कविता, खास तौर पर अंतिम शाप वाली पंक्त्तियाँ कुछ सवाल खड़े करती है।
    उत्सुकता है जानने की कि कवि उन प्रश्नों से दो चार हुआ या नहीं।
    लकड़हारा तो एक अपने और अपने परिवार का पेट भरने के लिये पेड़ से लकड़ी काटता होगा। कितनी काट लेगा?
    बाकी जब कभी लोग लकड़ी खरीदते थे खाना बनाने को, वो कहाँ से आती थी?
    जिन कागजों को कवि, लेखक रात दिन काला करते हैं वह किस तरह के वन से बना है?
    खाने के लिये जितने वन काटने की जरुरत नहीं होती उससे कई गुना वन कागज बनाने के लिये कटते हैं,
    फर्नीचर बनाने के लिये कटते हैं
    ऐसे में शाप खाली एक गरीब लकड़हारे को क्यों?

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